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रिपोर्ट में खुलासा: अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच पाकिस्तान ने सऊदी में बल बढ़ाया
18 May, 2026 08:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। वैश्विक कूटनीति और रक्षा गलियारों से एक बेहद बड़ी खबर सामने आ रही है। एक द्विपक्षीय रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान ने अपने सदाबहार मित्र देश सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए वहाँ लगभग 8,000 जांबाज सैनिक, अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों का पूरा स्क्वाड्रन और खतरनाक एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर दिया है। पाकिस्तान एक तरफ जहाँ रियाद के साथ अपने सैन्य और रणनीतिक गठजोड़ को नए शिखर पर ले जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह क्षेत्रीय शांति के लिए ईरान युद्ध में एक मुख्य मध्यस्थ (मिडिएटर) की अहम भूमिका भी निभा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट में पहली बार हुआ इस गुप्त तैनाती का खुलासा
अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक विशेष रिपोर्ट के जरिए इस बेहद गोपनीय और महत्वपूर्ण रक्षा तैनाती की जानकारी पहली बार दुनिया के सामने आई है। इस रणनीतिक कदम की पुष्टि तीन शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों और दो आधिकारिक सरकारी सूत्रों ने की है। इन सभी सूत्रों ने इस संयुक्त सैन्य बल को एक बेहद शक्तिशाली और 'युद्ध-सक्षम' दस्ता बताया है। इस विशेष फोर्स को तैनात करने का मुख्य उद्देश्य किसी भी बाहरी या अचानक होने वाले हमले की स्थिति में सऊदी अरब की सेना को तुरंत और मजबूत बैकअप सहायता प्रदान करना है।
चीन के सहयोग से बने JF-17 लड़ाकू विमान और ड्रोन के दो स्क्वाड्रन भेजे
रक्षा सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान ने अपनी वायुसेना के करीब 16 लड़ाकू विमानों का एक पूरा स्क्वाड्रन सऊदी अरब की धरती पर उतारा है। इस बेड़े में मुख्य रूप से वे 'JF-17' फाइटर जेट्स शामिल हैं, जिन्हें पाकिस्तान ने चीन के साथ मिलकर संयुक्त रूप से विकसित किया है। इन लड़ाकू विमानों को अप्रैल महीने की शुरुआत में ही सऊदी अरब रवाना कर दिया गया था। इसके साथ ही दो वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों ने खुलासा किया है कि विमानों के अलावा पाकिस्तान ने जासूसी और हमले में माहिर ड्रोन के दो अत्याधुनिक स्क्वाड्रन भी रियाद की सुरक्षा में तैनात किए हैं।
2025 में हुए ऐतिहासिक द्विपक्षीय रक्षा समझौते के तहत हुई कार्रवाई
आपको बता दें कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पिछले साल 2025 में एक ऐतिहासिक और बेहद अहम रक्षा समझौता हुआ था। इस आधिकारिक संधि की शर्तों के मुताबिक, यदि दोनों में से किसी भी देश पर कोई बाहरी हमला होता है, तो दोनों देश एक-दूसरे की संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा के लिए सैन्य रूप से आगे आएंगे। वर्तमान में की गई यह बड़ी सैन्य तैनाती इसी आपसी समझौते का हिस्सा मानी जा रही है, और सूत्रों का कहना है कि आवश्यकता पड़ने पर पाकिस्तान और अधिक सैनिक भेजने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
सऊदी अरब को मिलेगा पाकिस्तान का 'परमाणु सुरक्षा कवच'
इस सैन्य सहयोग के रणनीतिक और दूरगामी परिणामों को लेकर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी पूर्व में एक बड़ा संकेत दिया था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि इस नए सुरक्षा समझौते के प्रभावी होने के बाद सऊदी अरब व्यावहारिक रूप से पाकिस्तान की 'परमाणु सुरक्षा छतरी' (Nuclear Umbrella) के दायरे में आ जाता है। हालांकि, इस बेहद संवेदनशील और बड़े सैन्य कदम पर अभी तक पाकिस्तान सेना, वहां के विदेश मंत्रालय या सऊदी अरब के आधिकारिक सरकारी मीडिया कार्यालय की तरफ से कोई भी औपचारिक प्रतिक्रिया या सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है।
पाकिस्तान-चीन की ‘सीक्रेट डील’ का पर्दाफाश, अमेरिकी रिपोर्ट से मचा हड़कंप
18 May, 2026 05:34 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन: अमेरिका के एक स्वतंत्र समाचार आउटलेट 'ड्रॉप साइट न्यूज़' ने पाकिस्तान के बेहद गोपनीय सैन्य दस्तावेजों की समीक्षा के आधार पर एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान अपनी सैन्य जरूरतों के लिए चीन के सामने बेहद कड़ा मोलभाव कर रहा है। पाकिस्तान ने चीन को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण ग्वादर पोर्ट को एक स्थायी सैन्य अड्डे के रूप में इस्तेमाल करने की हरी झंडी दी है, लेकिन इसके बदले में वह बीजिंग से ऐसी परमाणु पनडुब्बियों की मांग कर रहा है जो 'सेकेंड स्ट्राइक' की क्षमता से लैस हों। इसका सीधा मतलब यह है कि यदि कोई दुश्मन देश पहले हमला करके पाकिस्तान के जमीनी और हवाई परमाणु ठिकानों को नष्ट भी कर दे, तब भी समुद्र की गहराइयों में छिपी ये पनडुब्बियां दुश्मन पर भारी जवाबी परमाणु हमला करने में सक्षम रहें।
जनरल आसिम मुनीर की अगुआई में हुआ था गुप्त मोलभाव
इस सनसनीखेज सौदे की कड़ियां साल 2024 में पाकिस्तानी सेना और चीन के बीच हुई एक उच्च स्तरीय द्विपक्षीय बातचीत से जुड़ती हैं। उस समय पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल आसिम मुनीर इस गुप्त वार्ता का नेतृत्व कर रहे थे। साल 2024 की शुरुआत में पाकिस्तान ने बीजिंग को निजी तौर पर आश्वस्त किया था कि वह ग्वादर को चीनी सेना के स्थायी बेस के रूप में विकसित करने देगा, जिसके बाद उसने चीन से परमाणु-सक्षम पनडुब्बियों की मांग सामने रख दी। पाकिस्तान का मकसद इसके जरिए 'न्यूक्लियर ट्रायड' यानी जल, थल और नभ तीनों जगहों से परमाणु हमला करने की सर्वोच्च ताकत हासिल करना था। हालांकि, चीन ने पाकिस्तान की इस मांग को बहुत ज्यादा और अनुचित माना, जिसके कारण यह बातचीत वहीं रुक गई।
अमेरिका और चीन के बीच पाकिस्तान का दोहरा खेल
'ड्रॉप साइट न्यूज़' की हालिया रिपोर्ट पाकिस्तान की एक ऐसी तस्वीर पेश करती है, जो अपने दो सबसे बड़े रणनीतिक साझेदारों—चीन और अमेरिका—के साथ एक ही समय पर दोहरा खेल खेल रहा है। एक तरफ जहां पाकिस्तान खुद को अमेरिका के करीब लाने और वॉशिंगटन के साथ अपने दशकों पुराने अविश्वास को दूर करने में लगा है, वहीं दूसरी तरफ वह चीन से घातक और रणनीतिक हथियार ऐंठने के लिए ग्वादर का सौदा करने से भी पीछे नहीं हट रहा है। पाकिस्तान के इस रवैये ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की रफ्तार को भी धीमा किया है, जिससे चीन नाराज है, जबकि अमेरिकी प्रशासन के साथ इस्लामाबाद की नजदीकियां लगातार बढ़ रही हैं।
चीनी 'माल' के भरोसे समुद्र में ताकत बढ़ाने की नाकाम कोशिश
पाकिस्तान का परमाणु इतिहास गवाह है कि उसने हमेशा चीन की बैसाखियों का इस्तेमाल किया है। 1970 और 1980 के दशक में चीन ने ही पाकिस्तान को परमाणु बम के ब्लूप्रिंट और एनरिच्ड यूरेनियम मुहैया कराया था, जिसके बाद 1990 के दशक में चीन से मिली एम-11 मिसाइलों के दम पर पाकिस्तान ने हवा और जमीन से परमाणु हमले की क्षमता पाई थी। लेकिन समुद्र के नीचे से परमाणु मिसाइल दागने की तकनीक बेहद जटिल और महंगी होने के कारण यह हमेशा से इस्लामाबाद की पहुंच से बाहर रही है। वर्तमान में दुनिया के केवल छह देशों—अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन और भारत—के पास ही यह अचूक क्षमता मौजूद है।
हैंगोर क्लास पनडुब्बी सौदा और अधूरी हसरत
भारत के सुरक्षा विशेषज्ञों का लंबे समय से यह अनुमान था कि पाकिस्तान की अब तक की सबसे बड़ी 5 अरब डॉलर की 'हैंगोर क्लास' पनडुब्बी डील उसे समुद्र से परमाणु हमला करने की ताकत दे देगी। इस सौदे के तहत आठ पनडुब्बियों में से पहली 'पीएनएस हैंगोर' को चीन के सान्या में सर्विस में शामिल भी किया जा चुका है। भारतीय विश्लेषकों का मानना था कि इनमें से दो पनडुब्बियां 'S-30' क्लास की होंगी जो पानी के भीतर 30 दिनों तक रहकर 1,500 किलोमीटर दूर तक परमाणु क्रूज मिसाइल दाग सकेंगी। लेकिन 'ड्रॉप साइट न्यूज़' के नए खुलासे से यह साफ हो गया है कि पाकिस्तान का यह तीन-चरणों वाला परमाणु सौदा फिलहाल खटाई में पड़ गया है क्योंकि चीन उसकी ग्वादर के बदले परमाणु पनडुब्बी की बड़ी मांग को पूरा करने के मूड में नहीं है।
रात से लापता दो युवक, नहर में उतरते समय हुई हादसे में मौत
18 May, 2026 05:21 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
महेंद्रगढ़। हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के अंतर्गत आने वाले गांव पाथेड़ा में उस वक्त शोक की लहर दौड़ गई, जब दो पक्के दोस्तों की नहर के गहरे पानी में डूबने से असमय मौत हो गई। दोनों युवक रविवार शाम को खेतों की तरफ टहलने के लिए निकले थे, लेकिन जब वे देर रात तक वापस नहीं लौटे, तो परिजनों की चिंता बढ़ गई। काफी खोजबीन के बाद सोमवार सुबह दोनों के शव पाथेड़ा और धनौंदा गांव के बीच बनी पुलिया के पास पानी में तैरते हुए मिले। पुलिस ने परिजनों के बयानों के आधार पर नागरिक अस्पताल में पोस्टमार्टम कराने के बाद शवों को अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया है। गांव में एक साथ दो सहेलियों जैसी दोस्ती निभाने वाले युवकों की अर्थी उठने से हर आंख नम है।
खेतों में घूमने निकले थे हेमराज और रविंद्र, सुबह मिला शव
मृतक युवक के भाई वीरेंद्र ने पुलिस को बताया कि उसका 34 वर्षीय भाई हेमराज और उसका बचपन का परम मित्र रविंद्र उर्फ बजरंग (34) रविवार शाम को घर से यह कहकर निकले थे कि वे खेतों की तरफ चक्कर लगाने जा रहे हैं। जब देर रात तक दोनों का कोई सुराग नहीं मिला, तो परिवार वालों ने रातभर उन्हें हर संभावित जगह पर ढूंढा। सोमवार सुबह ग्रामीणों ने धनौंदा पुल के पास नहर में दो इंसानी शरीर उतराते देखे, जिसकी सूचना तुरंत पुलिस को दी गई। मौके पर पहुंची पुलिस टीम ने ग्रामीणों की मदद से दोनों शवों को बाहर निकाला।
नहर के किनारे मिले कपड़े और चप्पल, तैरना न जानना बना काल
सोमवार सुबह जब ग्रामीण और पुलिस मौके पर पहुंचे, तो नहर के किनारे रविंद्र के कपड़े और चप्पल करीने से रखे हुए मिले, जबकि हेमराज का शव कपड़ों समेत पानी के भीतर था। ग्रामीणों के अनुसार, पाथेड़ा नहर से पूरे जिले में पीने के पानी की सप्लाई होती है और करीब एक हफ्ते पहले ही इसमें पानी का बहाव बंद किया गया था। इसके बावजूद पाथेड़ा से धनौंदा के बीच बनी पुलिया के पास नहर में करीब 8 से 10 फीट गहरा पानी जमा था। आशंका है कि रविंद्र नहाने के लिए कपड़े उतारकर पानी में उतरा होगा, लेकिन गहराई का अंदाजा न होने से वह डूबने लगा।
दोस्ती निभाने के चक्कर में डूबा दूसरा दोस्त, परिवारों पर टूटा दुखों का पहाड़
स्थानीय लोगों का अनुमान है कि जब रविंद्र पानी में छटपटाने लगा होगा, तो किनारे पर खड़े हेमराज ने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने जिगरी दोस्त को बचाने के लिए नहर में छलांग लगा दी। चूंकि दोनों में से किसी को भी तैरना नहीं आता था, इसलिए 10 फीट गहरे पानी और दलदल के कारण दोनों ही जिंदगी की जंग हार गए। दोनों दोस्त बेहद साधारण परिवार से थे और खेती-किसानी व मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालते थे। इस हादसे ने दो हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया है; मृतक रविंद्र अपने पीछे एक बेटा (15) व बेटी (10) छोड़ गया है, वहीं हेमराज के सिर से भी उसके दो बेटों (9 और 13 वर्ष) का साया उठ गया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
स्वीडन के बाद नॉर्वे पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी, प्रवासी भारतीयों ने किया स्वागत
18 May, 2026 04:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ओस्लो (नॉर्वे): भारत और नॉर्वे के राजनयिक संबंधों में एक नया अध्याय जुड़ गया है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी द्विपक्षीय यात्रा और तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए नॉर्वे की राजधानी ओस्लो पहुंचे। लगभग चालीस साल से भी अधिक समय के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का यह पहला नॉर्वे दौरा है। इस ऐतिहासिक अवसर पर नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोरे ने पीएम मोदी का बेहद गर्मजोशी से स्वागत किया और इस यात्रा को दोनों देशों के बीच के रिश्तों के लिए एक मील का पत्थर बताया।
ग्रीन ट्रांजिशन और व्यापारिक साझेदारी पर रहेगा मुख्य जोर
नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोरे ने इस यात्रा को लेकर भारी उत्साह जताया है। उनका मानना है कि भारत के प्रधानमंत्री का यह दौरा न केवल नॉर्वे बल्कि पूरे नॉर्डिक क्षेत्र और भारत के बीच व्यापारिक संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा। इस यात्रा के दौरान पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों यानी ग्रीन ट्रांजिशन और मौजूदा वैश्विक चुनौतियों से मिलकर निपटने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर खास ध्यान दिया जाएगा। दोनों देशों के राष्ट्रप्रमुखों को उम्मीद है कि यह मुलाकात नई रणनीतिक साझेदारियों के रास्ते खोलेगी।
ओस्लो की सड़कों पर गूंजा भारत माता का जयकारा, प्रवासी भारतीयों में भारी उत्साह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ओस्लो पहुंचने पर वहां रह रहे प्रवासी भारतीयों का उत्साह सातवें आसमान पर दिखाई दिया। होटल के बाहर बड़ी संख्या में भारतीय समुदाय के लोग तिरंगा थामे और स्वागत के नारे लगाते हुए उनकी एक झलक पाने के लिए घंटों इंतजार करते रहे। जैसे ही प्रधानमंत्री मोदी वहां पहुंचे, उन्होंने बेहद आत्मीयता के साथ मुस्कुराते हुए हाथ हिलाकर सभी समर्थकों का अभिवादन स्वीकार किया और उनके इस जबरदस्त उत्साह के लिए आभार व्यक्त किया।
भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में वैश्विक मुद्दों पर होगी चर्चा
प्रधानमंत्री मोदी इस यात्रा के दौरान 19 मई को आयोजित होने वाले तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में मुख्य रूप से शामिल होंगे। इस उच्च स्तरीय बैठक में भारत और नॉर्डिक देशों के बीच कई महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर गहन विचार-विमर्श किया जाएगा, जिससे आने वाले समय में इन देशों के साथ भारत के रिश्ते और अधिक मजबूत और प्रगाढ़ होने की उम्मीद है।
ब्रिटेन में भारतीय समुदाय के लिए गर्व का पल, तुषार कुमार बने सबसे युवा मेयर
18 May, 2026 01:37 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लंदन/नई दिल्ली: भारतीय मूल के युवाओं ने वैश्विक पटल पर एक बार फिर अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवाते हुए एक अभूतपूर्व कीर्तिमान स्थापित किया है। भारतीय मूल के प्रतिभावान युवा तुषार कुमार ने यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) की स्थानीय राजनीति में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। मात्र 23 वर्ष की आयु में उन्हें आधिकारिक तौर पर ब्रिटेन के 'एल्सट्री और बोरेहामवुड' शहर का नया मेयर नियुक्त किया गया है। इस गौरवमयी नियुक्ति के साथ ही तुषार कुमार ब्रिटिश इतिहास में इस प्रतिष्ठित और जिम्मेदार नागरिक पद पर पहुंचने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय मूल के व्यक्ति बन गए हैं, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रवासी भारतीयों का मान बढ़ाया है।
फेयरवे हॉल में हुआ भव्य शपथ ग्रहण, किंग्स कॉलेज के छात्र से मेयर बनने तक का सफर
तुषार कुमार की इस ऐतिहासिक नियुक्ति की आधिकारिक पुष्टि 13 मई को बोरेहामवुड के 'फेयरवे हॉल' में आयोजित एक बेहद गरिमामयी और भव्य नागरिक समारोह के दौरान की गई। राजनीति और लोक नीति में गहरी रुचि रखने वाले तुषार कुमार ने दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों में शुमार 'लंदन के किंग्स कॉलेज' से राजनीति विज्ञान (पॉलिटिकल साइंस) में उच्च शिक्षा प्राप्त की है। अपनी पढ़ाई के दौरान और उसके बाद से ही वे बोरेहामवुड इलाके में स्थानीय नागरिक अधिकारों, सामाजिक कल्याण और सामुदायिक विकास के कार्यों में जमीनी स्तर पर बेहद सक्रिय रहे हैं। मेयर के रूप में इस सर्वोच्च पद की कमान संभालने से ठीक पहले तक वे इसी काउंसिल में डिप्टी मेयर के रूप में अपनी प्रशासनिक सेवाएं दे रहे थे।
सपने जैसा है यह पूरा सफर, निवर्तमान मेयर डैन ओजारो के प्रति व्यक्त किया आभार
इस बड़ी और ऐतिहासिक सफलता पर गहरी खुशी और संतोष जाहिर करते हुए नवनियुक्त मेयर तुषार कुमार ने इसे अपने और अपने पूरे परिवार के लिए एक बेहद गर्व का क्षण बताया है। उन्होंने एल्सट्री और बोरेहामवुड की जनता का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि किंग्स कॉलेज में राजनीति विज्ञान की थ्योरी पढ़ने से लेकर व्यावहारिक रूप से अपने सबसे पसंदीदा शहर का प्रथम नागरिक (मेयर) बनने तक का यह पूरा सफर उनके लिए किसी खूबसूरत सपने के सच होने जैसा है। उन्होंने अपने इस छोटे लेकिन बेहद प्रभावी राजनीतिक सफर में लगातार मिले जनसमर्थन के लिए सभी पार्षदों और नागरिकों का आभार जताया। इसी मंच से तुषार ने निवर्तमान मेयर डैन ओजारो को उनके उत्कृष्ट मार्गदर्शन के लिए विशेष धन्यवाद देते हुए कहा कि डिप्टी मेयर के कार्यकाल के दौरान उन्हें डैन की कार्यशैली से बहुत कुछ सीखने को मिला। इसके साथ ही, काउंसिल ने आगामी नागरिक वर्ष के लिए लिंडा स्मिथ को शहर का नया डिप्टी मेयर नियुक्त किया है।
युवाओं को सार्वजनिक सेवा में लाना और स्थानीय चैरिटी को मजबूत करना मुख्य लक्ष्य
एक युवा और ऊर्जावान मेयर के रूप में तुषार कुमार ने शहर के विकास और सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने के लिए अपना दृष्टिकोण पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। मेयर के रूप में उनका सबसे मुख्य और प्राथमिक लक्ष्य समाज के हर वर्ग के बीच अपनी व्यक्तिगत मौजूदगी को बढ़ाना और स्थानीय शासन को आम लोगों के लिए सुलभ बनाना है। वे अपने कार्यकाल के दौरान शहर की विभिन्न चैरिटी संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और एनजीओ (NGO) की आर्थिक व प्रशासनिक मदद करना चाहते हैं ताकि जमीनी स्तर पर जरूरतमंदों को तुरंत सहायता मिल सके। इसके अतिरिक्त, तुषार का विशेष जोर इस बात पर है कि देश के अधिक से अधिक युवाओं को आधुनिक सार्वजनिक सेवा, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और सामुदायिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाए, ताकि भविष्य के लिए एक जागरूक नेतृत्व तैयार हो सके।
हजारों साल पुरानी खोज ने बढ़ाई वैज्ञानिकों की दिलचस्पी, दांतों की सर्जरी पर नए संकेत
18 May, 2026 01:10 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
साइबेरिया: प्रागैतिहासिक मानव इतिहास और चिकित्सा विज्ञान की समझ को पूरी तरह झकझोर देने वाला एक बेहद क्रांतिकारी वैज्ञानिक खुलासा सामने आया है। शोधकर्ता वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने दावा किया है कि आज से करीब 60 हजार वर्ष पूर्व धरती पर रहने वाले निएंडरथल इंसान दांतों की सर्जरी (डेंटिस्ट्री) जैसी अत्यधिक जटिल और बारीक प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम देते थे। वैज्ञानिकों को साइबेरिया की सुदूर 'चगीरस्काया गुफा' में एक प्राचीनावशेष के रूप में निएंडरथल मानव का एक अनूठा दांत प्राप्त हुआ है, जिसमें बेहद सटीक और ज्यामितीय रूप से एक छेद (ड्रिलिंग) किया गया है। शोध टीम का मानना है कि यह समूची मानव सभ्यता के इतिहास में अब तक का सबसे पुराना मेडिकल इंटरवेंशन अथवा सफल सर्जिकल प्रक्रिया का जीवंत प्रमाण है, जिसने आधुनिक विज्ञान के पुराने सिद्धांतों को पूरी तरह बदल दिया है।
माइक्रोस्कोपिक जांच से खुला राज, रूट कैनाल जैसी प्राचीन तकनीक का हुआ था इस्तेमाल
उत्खनन के शुरुआती दौर में पुरातत्वविदों को लगा था कि दांत में दिखाई दे रहा यह गहरा गड्ढा शायद सामान्य सड़न या कैविटी के कारण प्राकृतिक रूप से बना होगा, परंतु जब प्रयोगशाला में इसकी हाई-टेक माइक्रोस्कोपिक जांच की गई तो परिणाम चौंकाने वाले थे। दांत की आंतरिक सतह पर विशिष्ट गोलाकार घिसाव के सूक्ष्म निशान पाए गए, जो केवल किसी बेहद नुकीले औजार को चारों तरफ तेजी से घुमाकर (ड्रिलिंग करके) ही बनाए जा सकते हैं। इस रहस्य को गहराई से समझने के लिए वैज्ञानिकों ने जैस्पर पत्थर से बने आदिम औजारों की मदद से आधुनिक इंसानी दांतों पर एक व्यावहारिक प्रयोग किया। इस परीक्षण के जो नतीजे आए, उससे यह साबित हो गया कि निएंडरथल मानव ने दांत के भीतर की सड़न और दर्द को दूर करने के लिए बिल्कुल वैसी ही तकनीक का इस्तेमाल किया था, जैसी आज का आधुनिक चिकित्सा विज्ञान 'रूट कैनाल ट्रीटमेंट' (RCT) के दौरान अपनाता है।
शिकार के पत्थरों से की डेंटिस्ट्री, 4.2 मिलीमीटर का सटीक सुराख
इस ऐतिहासिक खोज से यह साफ हो गया है कि निएंडरथल मानव पत्थर के बेहद बारीक, नुकीले और धारदार औजारों का निर्माण करने की कला में माहिर थे। हालांकि, चगीरस्काया गुफा से पूर्व में भी इस तरह के कई सूक्ष्म पत्थर के औजार बरामद हुए थे, लेकिन अब तक इतिहासकार उन्हें केवल जानवरों का शिकार करने या उनकी खाल उतारने के काम आने वाले साधारण हथियार मानते थे। नई खोज ने यह साबित कर दिया है कि वे इन उपकरणों का उपयोग अपनी जटिल मेडिकल और शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए भी बखूबी करते थे। निएंडरथल के उस दांत में किए गए छेद की चौड़ाई करीब 4.2 मिलीमीटर और गहराई 2.6 मिलीमीटर मापी गई है, जो उस प्रागैतिहासिक काल के सीमित संसाधनों के हिसाब से अविश्वसनीय रूप से बेहद सटीक और सुगठित सर्जिकल प्रक्रिया मानी जा रही है।
सफल रहा था दुनिया का पहला डांट का ऑपरेशन, सर्जरी के बाद सालों जिंदा रहा मरीज
इस पूरी रिसर्च में सबसे ज्यादा विस्मित कर देने वाला तथ्य यह सामने आया है कि जिस आदिम इंसान पर दांत की यह दर्दनाक और जटिल ड्रिलिंग प्रक्रिया आजमाई गई थी, वह इस इलाज के बाद न केवल पूरी तरह ठीक हुआ बल्कि कई वर्षों तक जीवित भी रहा। वैज्ञानिकों को उस छेद वाले दांत के ऊपरी हिस्से पर भोजन चबाने और घिसने के गहरे निशान मिले हैं, जो निश्चित रूप से ड्रिलिंग की प्रक्रिया पूरी होने के काफी सालों बाद सामान्य जीवन जीने के दौरान बने थे। यह ठोस साक्ष्य इस बात का अकाट्य संकेत है कि प्राचीन काल में किया गया वह दंत ऑपरेशन शत-प्रतिशत सफल रहा था और उपचार के बाद वह व्यक्ति बिना किसी तकलीफ के सामान्य रूप से कठोर भोजन का सेवन करता रहा था।
आदिम शिकारी नहीं, रचनात्मक और बुद्धिमान थे निएंडरथल: आधुनिक दावों पर लगा विराम
यह ऐतिहासिक खोज निएंडरथल इंसानों की उच्च बुद्धिमत्ता, उन्नत तकनीकी समझ और उनके समाज में मौजूद आपसी सहयोग व सेवा भावना को नए सिरे से रेखांकित करती है। अब तक के स्वीकृत इतिहास और वैज्ञानिक शोधों में यही माना जाता था कि आधुनिक मानव (होमो सेपियन्स) ने करीब 14 हजार साल पहले डेंटिस्ट्री अथवा दंत चिकित्सा की बुनियादी शुरुआत की थी। लेकिन साइबेरिया की इस गुफा से मिले साक्ष्यों ने इस दावे को खारिज करते हुए यह प्रमाणित कर दिया है कि निएंडरथल मानव आधुनिक इंसानों से भी हजारों साल पहले उन्नत चिकित्सा पद्धतियों का न सिर्फ ज्ञान रखते थे, बल्कि उसका व्यावहारिक इस्तेमाल भी कर रहे थे। इस खोज के बाद निएंडरथल की सदियों पुरानी छवि केवल एक बर्बर और आदिम शिकारी की न रहकर, बल्कि एक बेहद समझदार, संवेदनशील और रचनात्मक मानव समुदाय के रूप में विश्व के सामने आई है।
टक्कर में बुजुर्ग महिला की मौत, एक घायल गंभीर
18 May, 2026 12:56 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
झज्जर: हरियाणा के बेरी-कबूलपुर मार्ग पर सोमवार को एक दर्दनाक सड़क हादसा सामने आया है, जहाँ एक तेज रफ्तार बलेनो कार और मोटरसाइकिल के बीच जोरदार भिड़ंत हो गई। इस भीषण टक्कर में बाइक सवार एक बुजुर्ग महिला की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि उनका बेटा गंभीर रूप से घायल हो गया। मृतका की पहचान दुबलधन गांव की रहने वाली 63 वर्षीय केला देवी (पत्नी चेतराम) के रूप में हुई है।
दवाई लेने जा रहे थे मां-बेटा
प्राप्त जानकारी के अनुसार, दुबलधन निवासी अनिल अपनी बुजुर्ग मां केला देवी को दवाई दिलवाने के लिए मोटरसाइकिल से रोहतक जा रहे थे। सोमवार को जैसे ही उनकी बाइक बेरी-कबूलपुर मार्ग पर स्थित माता भीमेश्वरी देवी स्कूल के समीप पहुंची, तभी आगे चल रही एक बलेनो कार से उनकी जोरदार टक्कर हो गई।
हादसे में मां की मौत, बेटा गंभीर
कार की टक्कर इतनी भीषण थी कि मां-बेटा दोनों उछलकर सड़क पर दूर जा गिरे। सिर और शरीर पर गंभीर चोटें आने के कारण बुजुर्ग महिला केला देवी ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। वहीं इस हादसे में अनिल को भी काफी गंभीर चोटें आई हैं।
घायल बेटा रोहतक पीजीआई रेफर
हादसे के तुरंत बाद राहगीरों की मदद से घायल अनिल को नजदीकी अस्पताल पहुँचाया गया। डॉक्टरों ने उसकी नाज़ुक हालत को देखते हुए प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर इलाज के लिए पीजीआई रोहतक (PGI Rohtak) रेफर कर दिया है।
यूएस सेना का दावा, भविष्य के युद्ध में ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अहम
18 May, 2026 12:10 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन: अमेरिकी सेना ने दुनिया भर में चल रहे सैन्य संघर्षों का हवाला देते हुए अपने देश के नीति निर्माताओं (लॉमेकर्स) को आधुनिक युद्ध नीति में आ रहे अभूतपूर्व बदलावों के प्रति आगाह किया है। अमेरिकी कांग्रेस की हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के समक्ष पेश होते हुए सेना के शीर्ष अधिकारियों ने दो टूक शब्दों में कहा कि ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मानव रहित (अनमैन्ड) प्रणालियां वर्तमान में पारंपरिक युद्ध के तौर-तरीकों को बेहद तेज गति से बदल रही हैं। यूक्रेन और मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) के युद्ध मैदानों से निकले निष्कर्षों का विश्लेषण करते हुए अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि आने वाले समय की जंग महंगे और भारी-भरकम हथियारों के बजाय कम लागत वाले, अत्यधिक सटीक और भारी तादाद में इस्तेमाल किए जाने वाले तकनीकी हथियारों के दम पर जीती जाएगी। अमेरिकी सेना के सचिव डैनियल ड्रिस्कॉल ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि जो देश समय के अनुसार अपनी सैन्य तकनीक में सुधार नहीं करेंगे, वे वैश्विक रेस में पूरी तरह पिछड़ जाएंगे।
इंडो-पैसिफिक को ध्यान में रखकर रणनीति में बदलाव, 'ऑपरेशन जेलब्रेक' का आगाज
अमेरिकी सेना के वर्ष 2027 के रक्षा बजट पर आयोजित एक बेहद तीखी संसदीय सुनवाई के दौरान सैन्य रणनीतिकारों ने खुलासा किया कि अमेरिका अब चीन और इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) क्षेत्र में संभावित सैन्य चुनौतियों को केंद्र में रखकर अपनी युद्धक कला और प्रशिक्षण प्रणालियों को नए सिरे से डिजाइन कर रहा है। अमेरिकी सेना के जनरल क्रिस्टोफर लानेव ने इस संबंध में जानकारी साझा करते हुए बताया कि आधुनिक युद्ध क्षेत्रों से प्राप्त हो रहे लाइव इनपुट्स और अनुभवों को बिना किसी देरी के सीधे सैनिकों की ट्रेनिंग का हिस्सा बनाया जा रहा है। इसी व्यापक रणनीति के तहत अमेरिकी सेना ने 'फोर्ट कार्सन' सैन्य अड्डे पर 'ऑपरेशन जेलब्रेक' नामक एक बेहद महत्वाकांक्षी और गुप्त प्रोजेक्ट लॉन्च किया है। इस विशेष प्रोजेक्ट के अंतर्गत अग्रणी रक्षा कंपनियां और सैन्य इंजीनियर मिलकर उन जटिल सॉफ्टवेयर बाधाओं को हटाने पर काम कर रहे हैं, जो युद्ध के समय विभिन्न सैन्य इकाइयों और विंग्स के बीच खुफिया जानकारियों को रीयल-टाइम में साझा करने से रोकती हैं।
ड्रोन के भंडारण से बेहतर मजबूत औद्योगिक ढांचे के निर्माण पर अमेरिका का जोर
संसदीय सुनवाई के दौरान अमेरिकी सांसदों (लॉमेकर्स) ने लघु और छोटे आकार के टोही व हमलावर ड्रोन खरीदने के लिए प्रस्तावित बजट में की गई कटौती पर गहरी चिंता व्यक्त की। इस बजटीय चिंता का समाधान करते हुए सेना सचिव डैनियल ड्रिस्कॉल ने अमेरिका की दीर्घकालिक योजना को सदन के सामने रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वाशिंगटन की वर्तमान रणनीति शांति काल के दौरान लाखों की संख्या में ड्रोनों का स्टॉक जमा करके सरकारी खजाना भरने की बिल्कुल नहीं है, क्योंकि तकनीक बहुत तेजी से पुरानी हो जाती है। इसके विपरीत, अमेरिका एक ऐसा अचूक और मजबूत घरेलू औद्योगिक ढांचा तैयार करने पर निवेश कर रहा है जो किसी भी आपातकालीन युद्ध की स्थिति उत्पन्न होते ही बेहद कम समय के भीतर बड़े पैमाने पर अत्याधुनिक ड्रोनों का बड़े स्तर पर विनिर्माण शुरू करने में सक्षम हो।
दुश्मन के सामूहिक ड्रोन हमलों को नेस्तनाबूद करेगा सिर्फ एआई डिफेंस सिस्टम
अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने आधुनिक हवाई खतरों से निपटने के लिए मानव रहित रक्षा प्रणालियों के विकास को समय की सबसे बड़ी मांग बताया। उन्होंने लॉमेकर्स को चेतावनी भरे लहजे में सचेत किया कि भविष्य में होने वाले सामूहिक ड्रोन हमलों (ड्रोन स्वार्म्स) का सामना करने में अकेले इंसानी क्षमताएं और मैन्युअल रिस्पॉन्स पूरी तरह से नाकाफी और विफल साबित होंगे। जनरल लानेव के अनुसार, जब दुश्मन की सेना एक साथ सैकड़ों की तादाद में अलग-अलग दिशाओं से आत्मघाती ड्रोन दागकर हमला करेगी, तो मिलीसेकंड के भीतर जवाबी प्रतिक्रिया देने और उन्हें हवा में ही मार गिराने के लिए पूरी तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेटेड (स्वचालित) एंटी-ड्रोन एयर डिफेंस सिस्टम की मदद लेना अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य हो जाएगा।
शिकागो के पास बड़ा सड़क हादसा, भारतीय छात्रा की मौत से परिवार में मातम
18 May, 2026 11:29 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
शिकागो: अमेरिका से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है, जहाँ शिकागो के नजदीक हुए एक भीषण सड़क हादसे में 25 वर्षीय भारतीय छात्रा नव्या गडुसु की मौत हो गई। यह दर्दनाक दुर्घटना शनिवार देर रात इंडियाना राज्य के लेक काउंटी में इंटरस्टेट-65 हाईवे पर पेश आई। हादसे की तीव्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें नव्या के अलावा छह अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, दुर्घटना के तुरंत बाद राहत टीम ने नव्या को अस्पताल पहुंचाया, जहाँ रात करीब 12:16 बजे डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। लेक काउंटी कोरोनर कार्यालय ने इस बात की पुष्टि की है कि छात्रा की असमय मौत सड़क हादसे के दौरान शरीर में लगीं अत्यंत गंभीर चोटों के कारण हुई है।
भारतीय वाणिज्य दूतावास ने जताया गहरा शोक, परिजनों की मदद में जुटा प्रशासन
इस हृदयविदारक घटना की जानकारी मिलते ही अमेरिका में भारतीय राजनयिक मिशन भी सक्रिय हो गया है। शिकागो स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास (कांसुलेट) ने इस हादसे पर गहरा दुख प्रकट करते हुए पीड़ित परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (X) पर आधिकारिक बयान जारी करते हुए लिखा कि भारतीय छात्रा नव्या गडुसु की सड़क दुर्घटना में हुई असामयिक मृत्यु से वे बेहद आहत हैं। कांसुलेट इस बेहद कठिन और दुखद समय में नव्या के परिवार और उनके दोस्तों के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए है और मृतका के पार्थिव शरीर को भारत भेजने के लिए जरूरी कागजी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में हरसंभव सहायता प्रदान कर रहा है।
हाईवे पर दो वाहनों के बीच इस तरह हुई जोरदार भिड़ंत
इंडियाना स्टेट पुलिस द्वारा जारी की गई शुरुआती जांच रिपोर्ट के मुताबिक, यह भीषण हादसा शनिवार की रात करीब 11:15 बजे हुआ। घटना के वक्त एक लाल रंग की मिनीवैन, जिसमें नव्या समेत कुल सात लोग सवार थे, हाईवे पर आगे चल रहे एक खराब वाहन के कारण महज 10 से 15 मील प्रति घंटे की बेहद धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी। इसी दौरान पीछे से आ रही एक दूसरी तेज रफ्तार कार के चालक को मिनीवैन की इस धीमी गति का समय रहते सही अंदाजा नहीं मिल सका। दुर्घटना से बचने की आखिरी कोशिश में जब पीछे वाले ड्राइवर ने अपनी कार को अचानक मोड़ने का प्रयास किया, तो उसकी कार का संतुलन बिगड़ गया और वह मिनीवैन के बाईं ओर के हिस्से से बेहद ताकत के साथ जा टकराई।
सुरक्षा मानकों की अनदेखी: आम के डिब्बों पर बिना सीट बेल्ट बैठे थे यात्री
टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि अनियंत्रित हुई मिनीवैन सड़क से पूरी तरह उतर गई और पास ही बनी गहरी खाई में जा गिरी। पुलिस प्रशासन की जांच में इस हादसे के दौरान सुरक्षा मानकों की एक बड़ी और भयावह अनदेखी भी उजागर हुई है। जांच अधिकारियों ने बताया कि दुर्घटनाग्रस्त हुई मिनीवैन में केवल आगे की तरफ ही दो वैध सीटें मौजूद थीं, जबकि गाड़ी के पिछले हिस्से में कोई सीट नहीं थी। नव्या सहित वैन में सवार बाकी के पांच लोग पीछे रखे आम के डिब्बों (कार्टन्स) के ऊपर बिना किसी सीट बेल्ट के बैठे हुए थे। कार की सीधी टक्कर और सुरक्षा घेरे की इसी कमी के कारण छात्रा नव्या को सबसे अधिक गंभीर चोटें आईं, जो अंततः उनके लिए जानलेवा साबित हुईं।
तीन पीड़ितों के बैंक खाते खाली, साइबर क्राइम ने मचाई तबाही
18 May, 2026 11:27 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सोनीपत: जिले में साइबर अपराधियों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। ठगों ने चालाकी से जाल बुनकर एक महिला समेत तीन लोगों को अपना शिकार बनाया और उनके खातों से कुल 14.14 लाख रुपये उड़ा लिए। धोखेबाजों ने इस वारदात को अंजाम देने के लिए रिश्तों का फर्जीवाड़ा, झांसा और आधुनिक तकनीक का सहारा लिया।
रिश्तेदारों के नाम पर फर्जीवाड़ा
ठगी का पहला मामला बेहद चौंकाने वाला है, जहाँ अपराधियों ने रिश्तों के भरोसे का फायदा उठाया। एक पीड़ित के पास फोन आया, जिसमें कॉलर ने खुद को उनकी साली का बेटा (साढ़ू का लड़का) बताया। बातों के जाल में फंसाकर ठग ने पीड़ित के खाते से ₹3.5 लाख पार कर दिए।
मोटी कमाई और निवेश का झांसा
दूसरा मामला एक महिला से जुड़ा है। साइबर शातिरों ने उन्हें ऑनलाइन निवेश के जरिए घर बैठे तगड़ा मुनाफा कमाने का लालच दिया। महिला इस झांसे में आ गई और डिजिटल प्रक्रिया के नाम पर ठगों ने उनके बैंक अकाउंट से ₹5.15 लाख साफ कर दिए।
मोबाइल हैक कर उड़ाए लाखों
तीसरी वारदात में शातिरों ने तकनीक का सहारा लिया। ठगों ने एक व्यक्ति के मोबाइल फोन को रिमोट एक्सेस लेकर हैक कर लिया। इसके बाद बिना कोई भनक लगे पीड़ित के खाते से ₹5.49 लाख निकाल लिए गए।
मॉस्को पर बड़ा हमला, यूक्रेन ने अहम औद्योगिक ठिकानों को निशाना बनाया
18 May, 2026 10:31 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मॉस्को: रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने एक बेहद खौफनाक और विनाशकारी मोड़ ले लिया है। यूक्रेन की सेना ने शनिवार और रविवार की दरमियानी रात रूस के कई राज्यों को निशाना बनाते हुए 1000 से अधिक आत्मघाती (कामिकेज़) ड्रोनों से अब तक का सबसे बड़ा हवाई हमला किया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस भीषण बमबारी में कम से कम चार नागरिकों की मौत हो गई है, जिनमें रूस में काम करने वाला एक भारतीय मजदूर भी शामिल है। मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास ने आधिकारिक बयान जारी कर इस दुखद घटना की पुष्टि की है। दूतावास के अनुसार, इस हमले में तीन अन्य भारतीय नागरिक गंभीर रूप से घायल भी हुए हैं, जिन्हें नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घटना की जानकारी मिलते ही भारतीय राजनयिकों की एक उच्च स्तरीय टीम ने तुरंत प्रभावित इलाके का दौरा किया और अस्पताल पहुंचकर घायल भारतीयों से मुलाकात कर हरसंभव मदद का भरोसा दिया।
मॉस्को से लेकर यूक्रेनी सीमा तक बरपा कहर, सुरक्षा कारणों से पहचान गुप्त
रूसी रक्षा मंत्रालय और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस अभूतपूर्व ड्रोन हमले में राजधानी मॉस्को और उसके नजदीकी उपनगरों में तीन लोगों की जान गई है, जबकि यूक्रेन की सीमा से बिल्कुल सटे बेलगोरोद प्रांत में एक अन्य व्यक्ति ने दम तोड़ा है। अकेले मॉस्को क्षेत्र में ही करीब 12 से अधिक लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए हैं, जिनमें तेल रिफाइनरियों और औद्योगिक संयंत्रों में नाइट शिफ्ट में काम करने वाले मजदूर शामिल हैं। सुरक्षा और कूटनीतिक संवेदनशीलता को देखते हुए फिलहाल मारे गए भारतीय नागरिक और घायल हुए अन्य तीन लोगों के नामों व पहचान को अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। भारतीय दूतावास पीड़ित नागरिकों की कंपनी के प्रबंधन और स्थानीय रूसी अधिकारियों के साथ मिलकर कानूनी व चिकित्सीय प्रक्रियाओं को पूरा करने में जुटा है।
सेना को सेमीकंडक्टर देने वाले एंगस्ट्रेम प्लांट और तेल रिफाइनरियों पर सटीक निशाना
कीव इंडिपेंडेंट की खोजी रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेनी वायुसेना का मुख्य ध्येय मॉस्को और उसके आसपास स्थित रूस के सैन्य ढांचे और ईंधन से जुड़े अति-संवेदनशील ठिकानों को आर्थिक व सामरिक रूप से पंगु बनाना था। यूक्रेनी ड्रोनों ने रूस के विख्यात 'एंगस्ट्रेम प्लांट' को भारी नुकसान पहुंचाया है, जो रूसी सेना के आधुनिक हथियारों और मिसाइलों के लिए सेमीकंडक्टर व इलेक्ट्रॉनिक चिप्स बनाने वाला मुख्य केंद्र माना जाता है। इसके अतिरिक्त, मॉस्को की सबसे बड़ी ऑयल रिफाइनरी, सोलनेचनोगोर्स्क और वोलोडार्स्कोये स्थित विशाल ईंधन भंडारण स्टेशनों को भी ड्रोनों ने निशाना बनाया, जिससे वहां आसमान छूती आग की लपटें और धुएं का गुबार देखा गया।
राष्ट्रपति जेलेंस्की ने हमले को ठहराया जायज, हवाई अड्डों पर परिचालन ठप
इस भीषण तबाही के बाद यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर इस जवाबी कार्रवाई को पूरी तरह से न्यायसंगत और जायज ठहराया है। उन्होंने साफ कहा कि रूस द्वारा यूक्रेनी शहरों पर किए जा रहे लगातार हमलों और युद्ध को लंबा खींचने की सनक का यह सीधा जवाब है और रूसियों को यह समझना होगा कि उनका देश इस युद्ध को तुरंत बंद करे। इस बड़े हवाई हमले के कारण रविवार सुबह मॉस्को के चारों प्रमुख हवाई अड्डों पर विमानों की आवाजाही को पूरी तरह रोकना पड़ा, जिससे दर्जनों अंतरराष्ट्रीय और घरेलू उड़ानें रद्द या डाइवर्ट करनी पड़ीं। हालांकि, रूसी वायुसेना का दावा है कि उनके एयर डिफेंस सिस्टम ने मुस्तैदी दिखाते हुए मॉस्को की तरफ बढ़ रहे 120 से अधिक ड्रोनों को हवा में ही मार गिराया, लेकिन मलबे के गिरने से कई बहुमंजिला रिहायशी इमारतों को भारी नुकसान पहुंचा है।
जंग खत्म करने के बदले अमेरिका की शर्तें, ईरान को 25% प्रॉपर्टी लौटाने की बात
18 May, 2026 08:17 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन: पश्चिम एशिया में जारी भीषण तनाव के बीच वैश्विक कूटनीति के मोर्चे से एक बेहद बड़ी खबर सामने आ रही है। ईरान की आधिकारिक फार्स न्यूज एजेंसी ने सनसनीखेज दावा किया है कि अमेरिका ने ईरान के साथ शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए पांच बेहद सख्त और बड़ी शर्तें सामने रखी हैं। इस गुप्त रिपोर्ट के मुताबिक, वॉशिंगटन ने साफ कर दिया है कि वह पूर्व में हुई बमबारी से ईरान को हुए भारी नुकसान का कोई भी मुआवजा नहीं देगा। इसके साथ ही सबसे बड़ी शर्त के रूप में अमेरिका ने मांग की है कि ईरान अपना 400 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम (एनरिच्ड यूरेनियम) तुरंत अमेरिकी प्रशासन को सौंप दे, ताकि उसके परमाणु हथियारों की क्षमता को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सके।
एक परमाणु केंद्र की शर्त और फ्रीज संपत्ति पर अमेरिका का कड़ा रुख
अमेरिकी प्रस्तावों की कड़ियों को उजागर करते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि जो बाइडन प्रशासन चाहता है कि ईरान के भीतर भविष्य में केवल एक ही परमाणु अनुसंधान केंद्र को चालू रखने की अनुमति दी जाए, जबकि बाकी सभी केंद्रों को पूरी तरह से बंद करना होगा। इसके अलावा, आर्थिक मोर्चे पर भी ईरान को बड़ा झटका देते हुए अमेरिका उसकी अंतरराष्ट्रीय बैंकों में फ्रीज (जब्त) पड़ी विदेशी संपत्तियों में से महज 25 प्रतिशत से अधिक की राशि को जारी करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है। राजनीतिक मोर्चे पर वाशिंगटन की अंतिम शर्त यह है कि लेबनान सहित पश्चिम एशिया के तमाम मोर्चों पर जारी युद्ध को पूरी तरह खत्म करने का मसला केवल आपसी बातचीत के जरिए ही हल किया जाए। हालांकि, इन शर्तों को लेकर अभी तक अमेरिका या ईरान के विदेश मंत्रालयों की तरफ से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
ओमान सागर को अमेरिकी सेना की कब्रगाह बनाने की ईरानी धमकी और UAE पर ड्रोन हमला
इन शर्तों के बीच ईरान का रुख बेहद आक्रामक नजर आ रहा है और उसने अमेरिका को चेतावनी देते हुए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) की नाकाबंदी तुरंत खत्म करने की मांग की है। तेहरान ने साफ लफ्जों में धमकी दी है कि यदि यह नाकाबंदी नहीं हटाई गई, तो वे ओमान सागर को अमेरिकी नौसेना और सैनिकों की कब्रगाह में तब्दील कर देंगे। इस जुबानी जंग के बीच जमीन पर भी हालात तब बेहद विस्फोटक हो गए, जब संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के प्रतिष्ठित 'बराकाह परमाणु ऊर्जा संयंत्र' के ठीक बाहर एक रहस्यमयी ड्रोन हमला हुआ, जिससे वहां भीषण आग लग गई। सुरक्षा एजेंसियों की शुरुआती जांच की सुई सीधे तौर पर ईरान की तरफ घूम रही है, क्योंकि यह इतिहास में पहली बार है जब यूएई के किसी अति-संवेदनशील न्यूक्लियर प्लांट को सीधे निशाना बनाने का दुस्साहस किया गया है।
होर्मुज संकट पर भारत का कड़ा रुख, ट्रम्प का नया 20 साल वाला परमाणु फॉर्मूला
इस समुद्री तनाव के बीच वैश्विक व्यापार को सुचारू रखने के लिए भारत ने भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आवाज बुलंद की है। संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने दो टूक शब्दों में कहा है कि होर्मुज स्ट्रेट जैसे वैश्विक व्यापारिक मार्ग में वाणिज्यिक जहाजों (कॉमर्शियल शिपिंग) की आवाजाही को रोकना पूरी तरह से अस्वीकार्य और अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ है। भारत की यह चिंता इसलिए भी जायज है क्योंकि जंग के इस माहौल के बीच मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाला एलपीजी टैंकर 'सिमी' 20 हजार टन गैस लेकर सुरक्षित रूप से गुजरात के कांडला पोर्ट पहुंचा है और युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक ऐसे 15 एलपीजी जहाज अपनी जान जोखिम में डालकर भारत पहुंच चुके हैं। इस बीच, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी एक नया चौंकाने वाला प्रस्ताव देते हुए कहा है कि ईरान को स्थाई रोक के बजाय कम से कम 20 साल के लिए अपने पूरे परमाणु कार्यक्रम को सस्पेंड कर देना चाहिए, साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि तेहरान के पास सोचने का समय बहुत तेजी से खत्म हो रहा है।
नेतन्याहू और ट्रम्प के बीच सैन्य हमले पर गुप्त चर्चा, लेबनान में सीजफायर बेअसर
दूसरी तरफ, इजराइल और अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व ने ईरान को चारों तरफ से घेरने की अपनी सैन्य तैयारियों को और तेज कर दिया है। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रम्प ने रविवार को फोन पर एक बेहद गोपनीय और लंबी बातचीत की, जिसमें ईरान के खिलाफ आने वाले दिनों में किए जाने वाले संभावित बड़े सैन्य हमलों और युद्ध को दोबारा शुरू करने की रणनीतियों पर गहन मंथन हुआ। इस बातचीत के तुरंत बाद पीएम नेतन्याहू ने यरुशलम में अपने शीर्ष मंत्रियों—विदेश मंत्री गिदोन सार, रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज, वित्त मंत्री बेजालेल स्मोट्रिच और राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन ग्वीर—के साथ एक हाई-लेवल इमरजेंसी सुरक्षा बैठक बुलाई। अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों (एक्सिओस) की मानें तो ट्रम्प भी मंगलवार को अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के साथ सिचुएशन रूम में एक बड़ी बैठक करने जा रहे हैं जिसमें ईरान पर सीधे मिलिट्री एक्शन के विकल्पों को अंतिम रूप दिया जाएगा। इन तमाम बड़ी तैयारियों के बीच, संघर्ष विराम की तमाम अपीलों को दरकिनार करते हुए इजराइली सेना ने दक्षिणी लेबनान पर 30 से ज्यादा भीषण हवाई हमले किए हैं, जिसके कारण वहां हाहाकार मचा हुआ है और हजारों बेकसूर नागरिक अपनी जान बचाने के लिए सामूहिक पलायन को मजबूर हैं।
जहाजों पर हमले के खिलाफ भारत का कड़ा रुख, कहा- जवाब मिलेगा
17 May, 2026 04:52 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
न्यूयॉर्क: मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में जारी भीषण सैन्य संघर्ष के बीच भारत ने वैश्विक समुद्री व्यापार की लाइफलाइन माने जाने वाले 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (होर्मुज जलडमरूमध्य) में जहाजों की सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेहद कड़ा और आक्रामक रुख अपनाया है। संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पार्वथानेनी हरीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना, अंतरराष्ट्रीय चालक दल की जान खतरे में डालना और समुद्री जहाजों की निर्बाध आवाजाही को रोकना किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। भारतीय राजनयिक ने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का हर हाल में पूरी तरह सम्मान होना चाहिए। हाल ही में इस संवेदनशील क्षेत्र में दो बड़े वाणिज्यिक जहाजों के डूबने से वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
वैश्विक मंच पर भारत की चिंता और कड़ा रुख
भारतीय राजनयिक पार्वथानेनी हरीश ने यह महत्वपूर्ण बातें संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद की एक विशेष बैठक के दौरान कहीं। यह आपातकालीन बैठक विशेष रूप से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से बुलाई गई थी। भारत का यह तीखा बयान ऐसे समय में आया है, जब कुछ ही दिनों पहले ओमान के तट के पास भारतीय ध्वज वाले एक जहाज पर हमला किया गया था। इस बैठक में पश्चिम एशिया संकट के कारण पूरी दुनिया में उपजे ईंधन और उर्वरक संकट से निपटने के लिए भारत ने अपना दृष्टिकोण साझा किया। भारतीय प्रतिनिधि के अनुसार, इस गंभीर संकट से पार पाने के लिए मजबूत अंतरराष्ट्रीय सहयोग और तात्कालिक व दीर्घकालिक उपायों का तालमेल बेहद जरूरी है।
ओमान तट पर भारतीय जहाज को बनाया निशाना
रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले होर्मुज जलमार्ग के पास स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। इसी सिलसिले में 13 मई 2026 को सोमालिया से आ रहे भारतीय ध्वज वाले एक मालवाहक जहाज पर हमला किया गया। हालांकि ओमान के सुरक्षा अधिकारियों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इस जहाज पर मौजूद चालक दल के सभी 14 सदस्यों को सुरक्षित बचा लिया। इस हमले के पीछे किसका हाथ था, इसकी अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन भारत सरकार ने इस कायरतापूर्ण कृत्य को पूरी तरह से अनुचित बताया है। फरवरी 2026 में मिडिल ईस्ट में संघर्ष शुरू होने के बाद से अब तक भारतीय ध्वज वाले कम से कम तीन जहाजों को निशाना बनाया जा चुका है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का रणनीतिक महत्व और ईरान संकट
ओमान के तट के पास स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे संकरा और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जहां से वैश्विक अर्थव्यवस्था की लगभग 20 प्रतिशत (पांचवां हिस्सा) ऊर्जा और कच्चे तेल की आपूर्ति गुजरती है। पश्चिम एशिया में इस अशांति की शुरुआत 28 फरवरी 2026 को हुई थी, जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर संयुक्त सैन्य हमले किए थे। इसके बाद ईरान की ओर से की गई जवाबी कार्रवाई के कारण इस पूरे जलमार्ग में जहाजों का आवागमन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस टकराव ने भारत सहित पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ईंधन, खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति का एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।
लंबे समय के सहयोगी देशों में बढ़ी अनबन, अमेरिका-इजरायल रिश्ते चर्चा में
17 May, 2026 02:51 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तेलअवीव: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीतियों के कारण अब अमेरिका और उसके सबसे भरोसेमंद सहयोगी इजरायल के बीच भी मतभेद उभरने लगे हैं। ट्रंप की हालिया चीन यात्रा के तुरंत बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और वियतनाम की ओर से आए बयानों ने दोनों देशों के बीच बढ़ती कूटनीतिक दूरी की पुष्टि कर दी है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अमेरिका पर अपनी सैन्य निर्भरता को लेकर न केवल खुलकर बात की है, बल्कि भविष्य में इसे धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म करने का भी इरादा जताया है। उनके इस रुख ने वैश्विक राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
सैन्य आत्मनिर्भरता की ओर इजरायल का बड़ा कदम
दशकों से अमेरिका से अरबों डॉलर की सैन्य और आर्थिक मदद पाने वाला इजरायल अब इस बैसाखी को छोड़ने की तैयारी कर रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के हालिया बयानों ने इस चर्चा को तेज कर दिया है कि क्या इजरायल वास्तव में अमेरिकी रक्षा सहायता के बिना अपनी सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर सकता है। अमेरिकी मीडिया को दिए इंटरव्यू में नेतन्याहू ने साफ कहा कि अब वह समय आ चुका है जब इजरायल को अमेरिकी सैन्य सहायता के दायरे से बाहर निकलना चाहिए और अपनी रक्षा जरूरतों को खुद पूरा करने के लिए आत्मनिर्भर बनना चाहिए।
ऐतिहासिक रक्षा समझौता और अमेरिकी मदद के आंकड़े
नेतन्याहू का यह बयान इसलिए बेहद हैरान करने वाला है क्योंकि इजरायल की पूरी रक्षा प्रणाली काफी हद तक अमेरिकी फंडिंग पर टिकी है। वर्तमान में वर्ष 2016 में हुए एक 10 वर्षीय समझौते के तहत अमेरिका हर साल इजरायल को 3.8 अरब डॉलर की भारी-भरकम सैन्य सहायता देता है। इस समझौते की शर्त यह भी है कि इस रकम का एक बड़ा हिस्सा इजरायल को अमेरिकी हथियार और सैन्य उपकरण खरीदने पर ही खर्च करना होता है। आंकड़ों की बात करें तो 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद से अब तक अमेरिका उसे 300 अरब डॉलर से अधिक की आर्थिक और सैन्य मदद दे चुका है, जो इतिहास में किसी भी देश को मिली सबसे बड़ी सहायता है।
अमेरिकी जनमत में बदलाव और सप्लाई चेन का संकट
इजरायल द्वारा इस नीतिगत बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका के घरेलू राजनीतिक माहौल में आ रहा बदलाव है। हालिया वैश्विक सर्वे बताते हैं कि गाजा और क्षेत्र में हुए युद्ध के बाद अमेरिकी नागरिकों, विशेषकर युवाओं और वहां के विश्वविद्यालयों में इजरायल के प्रति नकारात्मक राय तेजी से बढ़ी है। सैन्य इतिहासकारों का मानना है कि नेतन्याहू इस बदलते राजनीतिक मिजाज को भांप चुके हैं और वह भविष्य में अमेरिकी सहायता बंद होने की स्थिति में किसी भी बड़े झटके से बचने के लिए इजरायल को पहले से तैयार करना चाहते हैं। इसके अलावा, हालिया युद्धों के दौरान हथियारों की अचानक बढ़ी मांग और सप्लाई चेन (आपूर्ति श्रृंखला) में आई दिक्कतों ने भी इजरायल को अपने स्थानीय हथियार उद्योग को मजबूत करने और कच्चे माल के भंडार तैयार करने पर मजबूर किया है।
कूटनीतिक विशेषज्ञों का आकलन और व्यावहारिक चुनौतियां
हालांकि, कूटनीतिक और रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में वॉशिंगटन से पूरी तरह नाता तोड़ लेना इजरायल के लिए व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। अमेरिका से पूरी तरह अलग होना भले ही अभी मुमकिन न हो, लेकिन बदलते वैश्विक और राजनीतिक समीकरणों ने तेल अवीव को नए विकल्पों पर सोचने के लिए मजबूर जरूर कर दिया है। इजरायल अब अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को बढ़ाने के लिए स्थानीय रक्षा उत्पादन पर करीब 110 अरब डॉलर खर्च करने की योजना बना रहा है, ताकि आने वाले दशक में अमेरिकी इमदाद को घटाकर 'शून्य' पर लाया जा सके।
अमेरिका पहुंचा ‘समंदर का सिकंदर’, ईरान बॉक्स ऑफिस पर नहीं चला जादू
17 May, 2026 11:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन: दुनिया का सबसे विशाल और अत्याधुनिक अमेरिकी युद्धपोत 'जेराल्ड आर. फोर्ड' करीब एक साल तक समुद्र में रहकर कई बड़े सैन्य अभियानों को अंजाम देने के बाद आखिरकार स्वदेश लौट आया है। शनिवार को इस महाकाय एयरक्राफ्ट कैरियर ने वर्जीनिया के नॉरफॉक पोर्ट पर लंगर डाला। वियतनाम युद्ध के बाद से किसी भी अमेरिकी युद्धपोत की यह अब तक की सबसे लंबी ऑपरेशनल तैनाती मानी जा रही है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक सैन्य रणनीतियों का मुख्य केंद्र रहा यह जहाज वेनेजुएला संकट और ईरान युद्ध जैसे बड़े मोर्चों पर तैनात था। हालांकि, इसकी अत्यधिक लंबी तैनाती अमेरिकी सैन्य क्षमता पर सवाल खड़े कर रही थी, जिसके बाद इसे वापस बुलाने का फैसला लिया गया।
अपनों की वापसी पर भावुक हुए परिवार और रक्षा मंत्री ने बढ़ाया हौसला
जैसे ही यह विशाल युद्धपोत नॉरफॉक पोर्ट पर पहुंचा, वहां का माहौल बेहद भावुक हो गया। अपने प्रियजनों के इंतजार में खड़े सैकड़ों परिवारों ने आंसुओं और स्वागत पोस्टरों के साथ नाविकों का जोरदार स्वागत किया। इस ऐतिहासिक और राहत भरे पल का गवाह बनने के लिए अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ भी खुद वहां मौजूद रहे। उन्होंने फोर्ड कैरियर स्ट्राइक ग्रुप के नाविकों की असाधारण बहादुरी और देश सेवा की जमकर सराहना की।
अत्यधिक तनाव, रसद की कमी और सैनिकों में बढ़ता असंतोष
आमतौर पर किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर को अधिकतम 7 महीनों के लिए ही समुद्र में तैनात किया जाता है, लेकिन बदलती वैश्विक परिस्थितियों के कारण यह मिशन 11 महीने तक खिंच गया। इतनी लंबी तैनाती की वजह से सैनिकों में भारी शारीरिक और मानसिक थकान देखी जा रही थी। उनके परिवारों ने शिकायत की थी कि कई दिनों तक सैनिकों से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा था और जहाज पर जरूरी रसद (सामान) की भी किल्लत होने लगी थी। अत्यधिक तनाव का आलम यह था कि कुछ नाविकों ने लौटते ही सेना की नौकरी तक छोड़ने की बात कह दी है। शीर्ष नौसैनिक अधिकारियों ने भी यह माना है कि भविष्य में सैनिकों को इतने लंबे समय तक तनाव में रखने से बचना चाहिए।
तकनीकी खामियां और ईरान युद्ध के दौरान लगी भीषण आग
इस ऐतिहासिक सफर के दौरान लगभग 13 अरब डॉलर (करीब 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक) की भारी-भरकम लागत से बने इस पोत के भीतर कई गंभीर तकनीकी कमियां भी सामने आईं। सफर के दौरान जहाज के टॉयलेट्स खराब हो गए थे। इसके अलावा, मार्च में ईरान युद्ध के दौरान इसके लॉन्ड्री एरिया में अचानक भीषण आग लग गई थी, जिसे बुझाने में नौसेना को करीब 30 घंटे की कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। उस दौरान स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि 600 से अधिक नाविकों को अपनी जान बचाने के लिए सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट होना पड़ा था।
अमेरिकी नौसेना की रीढ़ और इसकी आधुनिक तकनीक
तमाम चुनौतियों और विवादों के बावजूद यह युद्धपोत अमेरिकी रक्षा तंत्र की असली रीढ़ माना जाता है। वेनेजुएला और ईरान के खिलाफ चले ऑपरेशन्स के दौरान इसी जहाज से फाइटर जेट्स ने उड़ान भरी थी। इस जहाज की सबसे बड़ी खासियत इसका 'एडवांस इलेक्ट्रॉनिक कैटापल्ट सिस्टम' है, जो छोटे ड्रोनों से लेकर भारी लड़ाकू विमानों को भी बेहद आसानी से हवा में लॉन्च कर सकता है। यह आधुनिक तकनीक अमेरिका के बाकी पुराने 10 विमानवाहकों में भी मौजूद नहीं है। पिछले साल जून में वर्जीनिया से रवाना होने के बाद इस युद्धपोत ने अटलांटिक, भूमध्य सागर, नॉर्वे, कैरेबियन और मिडिल ईस्ट के अशांत समंदरों का सफर तय किया और अब यह आखिरकार अपने देश वापस आ चुका है।
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