धर्म एवं ज्योतिष
14 हजार 'राम' नाम वाली ईंटें, 13 स्वर्ण कलश और 108 मयूर; ऐसा होगा जयपुर का भव्य गुप्त वृंदावन धाम मंदिर
13 Jun, 2026 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जयपुर के जगतपुरा में बन रहा गुप्त वृंदावन धाम मंदिर राजस्थान के सबसे भव्य धार्मिक परिसरों में शामिल होगा. करीब 6 एकड़ क्षेत्र में विकसित हो रहा यह 17 मंजिला मंदिर जयपुर स्थापना की 300वीं वर्षगांठ तक तैयार होने का लक्ष्य रखता है. यहां कृष्ण-बलराम, राधा-श्यामसुंदर और गौरा-निताई की विशाल प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी. मंदिर में 108 फीट चौड़ी और 180 फीट लंबी भव्य कमान छतरी, 70 फीट ऊंचा मयूर द्वार, कृष्ण लीला एक्सपो, हरिनाम मंडप, गीता प्रदर्शनी और आधुनिक सुविधाएं विकसित की जा रही हैं. एक समय में 4 हजार श्रद्धालु यहां दर्शन कर सकेंगे. परिसर में थिएटर, पुस्तकालय, कन्वेंशन सेंटर, प्रसादम हॉल और 700 कारों की मल्टी-लेवल पार्किंग जैसी सुविधाएं भी होंगी. यह परियोजना धार्मिक पर्यटन को नई पहचान देगी.
जयपुर अपने प्राचीन मंदिरों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है. यहां ऐसे कई मंदिर हैं, जो हजारों वर्ष पुराने हैं. अब जयपुर में एक और भव्य मंदिर आकार ले रहा है. यह अनोखा मंदिर जगतपुरा स्थित महला रोड, कृष्णा मार्ग पर बन रहा है, जिसे कृष्ण लीला गुप्त वृंदावन धाम मंदिर के नाम से जाना जाएगा. यह मंदिर राजस्थान के सबसे बड़े और भव्य मंदिरों में शामिल होगा. मंदिर का निर्माण विशाल एक्सपो जैसी आधुनिक और भव्य शैली में किया जा रहा है. यह केवल जयपुर ही नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान के लिए एक प्रमुख धार्मिक और पर्यटन आकर्षण बनने की ओर अग्रसर है. वर्तमान में मंदिर का लगभग 60 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और शेष कार्य तेजी से जारी है.
आपको बता दें जयपुर के जगतपुरा स्थित कृष्ण लीला गुप्त वृंदावन धाम मंदिर का निर्माण तेजी से जारी है. यह भव्य मंदिर जयपुर स्थापना की 300वीं वर्षगांठ तक बनकर तैयार होगा. करीब 6 एकड़ क्षेत्र में विकसित हो रहा यह मंदिर 17 मंजिला संरचना के रूप में बनाया जा रहा है. वर्तमान में मंदिर का अधिकांश निर्माण कार्य पूरा हो चुका है. मंदिर के पूर्ण होने पर यहां भगवान कृष्ण-बलराम, राधा-श्यामसुंदर और गौरा-निताई की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी. मंदिर का उद्घाटन 12 मई 2027 को प्रस्तावित है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है.
जगतपुरा महला रोड पर बन रहा यह मंदिर राजस्थान का सबसे भव्य मंदिर होगा. मंदिर के 16 फीट ऊंचे स्वर्णाभा युक्त गर्भगृह की नींव में 'राम' नाम लिखी 14 हजार ईंटें लगाई जाएंगी. इसके अलावा मंदिर में 108 फीट चौड़ी और 180 फीट लंबी कमान छतरी का निर्माण किया जाएगा, जो रात के समय प्रोजेक्शन मैपिंग के जरिए आकर्षक रोशनी से जगमगाएगी. मंदिर का 70 फीट ऊंचा मुख्य द्वार जयपुर के सिटी पैलेस स्थित मयूर द्वार की तर्ज पर बनाया जा रहा है. साथ ही राजस्थानी शिल्पकला को प्रदर्शित करती 108 मयूर प्रतिमाएं भी मंदिर परिसर में स्थापित की जाएंगी. मंदिर में श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए कृष्ण लीला एक्सपो, हरिनाम मंडप, गीता प्रदर्शनी, प्रसादम हॉल, एजुकेशन हॉल, थिएटर, अंडरग्राउंड पार्किंग, बुक स्टोर, आरओ प्लांट, मेंटेनेंस स्टोर, ग्राउंड फ्लोर कन्वेंशन सेंटर, डाइनिंग हॉल और अन्नदान हॉल जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध होंगी. यह मंदिर धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में तैयार किया जा रहा है.
गुप्त वृंदावन धाम मंदिर को राजस्थानी संस्कृति और आधुनिक वास्तुकला की थीम पर तैयार किया जा रहा है. मंदिर की दीवारों पर विशेष कांच का उपयोग किया जाएगा, जिससे इसकी भव्यता और आकर्षण और बढ़ेगा. इस मंदिर का डिजाइन प्रसिद्ध आर्किटेक्ट मधु पंडित दास ने तैयार किया है, जो इससे पहले विश्व के सबसे बड़े प्रस्तावित वृंदावन चंद्रोदय मंदिर की डिजाइन भी कर चुके हैं. मंदिर में श्रद्धालुओं के प्रवेश के लिए 6 भव्य द्वार बनाए जाएंगे, जिनमें सिंह द्वार, व्याघ्र द्वार, हस्ति द्वार और अश्व द्वार प्रमुख होंगे, जबकि मयूर द्वार मुख्य प्रवेश द्वार के रूप में विकसित किया जाएगा. मंदिर में आधुनिक तकनीक का भी व्यापक उपयोग होगा. यहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और 3D एनीमेशन तकनीक के माध्यम से धार्मिक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दिखाई जाएंगी. गुजरात के सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर गुप्त वृंदावन धाम मंदिर में भी श्रद्धालु श्रीराम और श्रीकृष्ण से जुड़े विभिन्न उत्सवों और लीलाओं का अनुभव AI आधारित तकनीक के माध्यम से कर सकेंगे. इससे भक्तों को आध्यात्मिकता और आधुनिक तकनीक का अनूठा संगम देखने को मिलेगा.
गुप्त वृंदावन धाम मंदिर केवल एक भव्य मंदिर ही नहीं होगा, बल्कि इसके साथ एक विशाल सांस्कृतिक केंद्र भी विकसित किया जाएगा, जहां श्रद्धालुओं और आगंतुकों के लिए अनेक आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होंगी. मंदिर परिसर में विश्व शांति के लिए हरिनाम जप मंडप बनाया जाएगा, जहां आगंतुक और तीर्थयात्री बड़ी संख्या में बैठकर 108 बार हरिनाम जप कर सकेंगे. इसके अलावा यहां कृष्ण लीला एक्सपो, 800 लोगों की बैठने की क्षमता वाला थिएटर ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स, एक समृद्ध पुस्तकालय, श्रीमद्भागवत और भगवद्गीता एक्सपो हॉल जैसी विशेष सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी. साथ ही श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मल्टी-लेवल कार पार्किंग की व्यवस्था होगी, जहां एक समय में लगभग 700 कारें पार्क की जा सकेंगी. धार्मिक, सांस्कृतिक और आधुनिक सुविधाओं से युक्त यह परिसर भविष्य में राजस्थान के प्रमुख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों में अपनी अलग पहचान बनाएगा.
जयपुर में गुप्त वृंदावन धाम मंदिर के निर्माण से शहर अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर एक नए केंद्र के रूप में स्थापित होगा. अभी तक जयपुर को मुख्य रूप से किलों, महलों और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए जाना जाता है, लेकिन यह भव्य मंदिर राजस्थान में आध्यात्मिक और धार्मिक पर्यटन को नई गति प्रदान करेगा. मंदिर परिसर में विकसित किए जा रहे विशाल कन्वेंशन हॉल और 'टेस्ट ऑफ इंडिया' प्रसादम केंद्र से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे. साथ ही पर्यटन गतिविधियों में वृद्धि होने से क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को भी बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा. यह परियोजना न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बनेगी, बल्कि जयपुर की पर्यटन और आर्थिक पहचान को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
राजस्थान की राजधानी जयपुर में हरे कृष्ण मूवमेंट द्वारा निर्माणाधीन गुप्त वृंदावन धाम देश के सबसे भव्य धार्मिक और सांस्कृतिक परिसरों में शामिल होने जा रहा है. इस मंदिर में कृष्ण-बलराम, राधा-श्यामसुंदर और गौरा-निताई की विशाल एवं आकर्षक प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी. मंदिर का डिजाइन इस प्रकार तैयार किया जा रहा है कि एक समय में करीब 4,000 श्रद्धालु एक साथ दर्शन कर सकेंगे. राजस्थानी संस्कृति, पारंपरिक शिल्पकला और आधुनिक वास्तुकला के अनूठे संगम के रूप में विकसित हो रहा यह मंदिर विश्वस्तरीय सुविधाओं से सुसज्जित होगा. भव्य संरचना, अत्याधुनिक तकनीक और आध्यात्मिक वातावरण के साथ गुप्त वृंदावन धाम जयपुर को वैश्विक धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर नई पहचान दिलाने के साथ वास्तुकला का भी अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करेगा.
गुप्त वृंदावन धाम की सबसे खास विशेषताओं में से एक मंदिर के केंद्र में बनने वाली भव्य कमान छतरी होगी, जो जमीन से लगभग 170 फीट ऊंची होगी. यह छतरी चार से पांच परतों में दिखाई देगी और इसके शीर्ष पर 13 स्वर्ण कलश स्थापित किए जाएंगे. इनमें मध्य का मुख्य कलश लगभग 12 से 15 फीट ऊंचा होगा, जबकि अन्य कलशों की ऊंचाई 10 से 12 फीट के बीच होगी. करीब 30 मीटर लंबी और 108 फीट चौड़ी यह छतरी विश्व के मंदिरों में बनने वाली सबसे बड़ी छतरियों में शामिल होगी. इसकी भव्यता इतनी अद्भुत होगी कि जयपुर एयरपोर्ट से उड़ान भरते या उतरते समय विमान यात्रियों को भी यह स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकेगी. इस छतरी को अत्याधुनिक प्रोजेक्शन मैपिंग तकनीक से सुसज्जित किया जा रहा है. रात के समय इस पर भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराम की विभिन्न लीलाओं का जीवंत प्रदर्शन दिखाई देगा. नई पीढ़ी को धर्म और संस्कृति से जोड़ने के उद्देश्य से यहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और 3D एनीमेशन तकनीक का भी उपयोग किया जा रहा है, जिससे श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभव के साथ आधुनिक तकनीक का अनूठा संगम देखने को मिलेगा.
क्या आप जानते हैं अंजनी पुत्र बजरंगबली का असली नाम? जानें कैसे पड़ा उनका नाम 'हनुमान
13 Jun, 2026 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अंजनी पुत्र बजरंगबली को हम सब प्यार से हनुमानजी के नाम से जानते हैं, लेकिन क्या आप उनके असली नाम और उसके पीछे की रोचक कहानी जानते हैं? प्राचीन ग्रंथों में उनके नाम, स्वरूप और पराक्रम से जुड़ी कई कथाएं मिलती हैं. यहां जानिए कैसे उन्हें हनुमान नाम मिला और इस नाम के पीछे क्या विशेष अर्थ छिपा है...
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस रामभक्त हनुमान का नाम को आप सालों से जपते आ रहे हैं, वह उनका असली नाम नहीं है? यह सुनकर आपको हैरानी हो सकती है, यकीन करना भी मुश्किल लगे. लेकिन यह पूरी तरह सच है. प्राचीन परंपराओं में देवी-देवताओं के नाम कभी भी यूं ही नहीं रखे जाते थे, ये घटनाओं, अनुभवों और बदलावों से बनते थे. हर नाम के पीछे एक कहानी होती थी. जैसे मां दुर्गा ने महिषासुर का अंत किया था तो मां का एक नाम महिषासुरमर्दिनी पड़ गया. भगवान कृष्ण बंसी बजाते थे तो उनको बंसीवाला कहा गया. वैसे ही एक घटना से प्रेरित होकर वीर बजरंगबली को हनुमान कहा गया. आइए जानते हैं आखिर अंजनी पुत्र केसरी नंदन का असली नाम क्या है और हनुमान का नाम कैसे पड़ गया.
हनुमान नाम में छुपा अर्थ - हनुमान नाम संस्कृत के शब्द हनु से आया है, जिसका अर्थ है ठोड़ी या जबड़ा. यह नाम उनके बचपन की एक खास घटना से जुड़ा हुआ है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार बाल हनुमान ने सूर्य को फल समझकर खाने के लिए छलांग लगा दी थी. इस पर देवराज इंद्र ने उन पर वज्र से प्रहार कर दिया, जिससे अंजनी पुत्र का जबड़ा घायल हो गया. यही घटना उनकी कहानी का अहम मोड़ बन गई और तभी से अंजनी पुत्र को हनुमान यानी 'चिन्हित जबड़े वाला' कहा जाने लगा.
बचपन की घटना जिसने सब कुछ बदल दिया - बचपन में हनुमानजी की जिज्ञासा की कोई सीमा नहीं थी. चमकते सूर्य को देखकर उन्होंने उसे पका हुआ फल समझा और उसकी ओर छलांग लगा दी. यह सिर्फ एक खेल नहीं था, बल्कि उनकी अपार शक्ति को भी दिखाता था. लेकिन जब इंद्र ने हस्तक्षेप किया, तो उनके प्रहार से हनुमानजी बेहोश हो गए. इस घटना से सभी देवता चौंक गए, आखिर इंद्र के प्रहार से कोई बालक केवल बेहोश कैसे हो सकता है, इस घटना के बाद सभी ने अंजनी पुत्र की दिव्य क्षमता को पहचाना.
चोट से अपार शक्ति तक - इस घटना के बाद देवताओं ने हनुमानजी को अद्भुत वरदान दिए. उन्होंने सुनिश्चित किया कि हनुमानजी को भविष्य में किसी भी अस्त्र-शस्त्र से कोई नुकसान ना हो और वे अपार शक्ति से भर जाएं. इसी वजह से हनुमानजी को बजरंगबली भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है वज्र के समान शरीर वाला.
यह है हनुमानजी का असली नाम - हनुमानजी के कई नाम हैं, जो उनकी अलग-अलग पहचान को दर्शाते हैं. अंजनी के पुत्र होने के कारण उन्हें अंजनेय कहा जाता है, पवनदेव के पुत्र होने की वजह से उनको पवनपुत्र भी कहा जाता है. बजरंगबली के रूप में वे शक्ति के प्रतीक हैं. लेकिन एक नाम सबसे खास है और वह है सुंदर. पौराणिक कथाओं के अनुसार, हनुमानजी का बचपन का वास्तविक नाम सुंदर था, जिसे उनकी माता अंजना ने दिया था. हनुमानजी को बचपन में पवन के देवता मरुत के पुत्र होने के कारण मारुति भी कहा जाता था.
रामायण का महत्वपूर्ण हिस्सा सुंदरकांड - सुंदर कांड रामायण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. इसमें हनुमानजी की यात्रा, साहस और भक्ति को दर्शाया गया है. सुंदर शब्द का अर्थ सिर्फ दिखने में सुंदर नहीं, बल्कि कर्म और भावना में भी सुंदरता है. वह हर काम में सुंदर ही थे, उनके जैसा भक्त दुनिया में कोई नहीं, उनके जैसे वीर दुनिया में कोई नहीं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मंगलवार और शनिवार के दिन सुंदरकांड का पाठ करने से जीवन में कभी कोई कष्ट नहीं होता है और सभी ग्रह दोष, बुरी नजर समेत सभी नकारात्मक चीजों से केवल इस पाठ को करने से मुक्ति मिलती है.
जन्मतिथि से जानिए आपके लिए कौन सा पौधा रहेगा लकी, धीरे-धीरे दूर होंगी सभी टेंशन और महसूस करेंगे सुख-शांति
13 Jun, 2026 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हम सभी अपने जीवन में सकारात्मक ऊर्जा चाहते हैं और यह समझना जरूरी है कि छोटी-छोटी चीजें करके हम अपने आसपास की पूरी ऊर्जा और माहौल बदल सकते हैं. अगर आप अपने जीवन में सकारात्मकता लाना चाहते हैं तो नीचे दिए गए पौधों को अपनी जन्मतिथि के अनुसार घर लाएं ताकि आपके आसपास सकारात्मकता फैले. आइए जानते हैं कौन से पौधे आपको घर लाने चाहिए:
आज के दौर में हम बस चलते जा रहे हैं, चलते जा रहे हैं और चलते ही जा रहे हैं. इस दौरान हमको ऐसे बहुत ही कम मौके देखने को मिलते हैं, जब सुख और शांति हो, जब लगे कि सबकुछ सही है. ऐसे में आप अपने आसपास कुछ ऐसे पौधे रख सकते हैं, जो आपकी जन्मतिथि से मेल खाते हों. क्योंकि जन्मतिथि के माध्यम से आपके मूलांक के बारे में जानकारी मिलेगी और उसी मूलांक के आधार पर आप जान सकते हैं कि कौन सा पेड़ पौधा आपके लिए उत्तम रहेगा. इन पेड़-पौधों को अपने आसपास रखने से ना केवल सुख-शांति महसूस करेंगे बल्कि सकारात्मक ऊर्जा भी महसूस होगी. आइए जानते हैं जन्मतिथि के अनुसार कौन सा पौधा आपके लिए लकी रहेगा...
किसी भी महीने की 1, 10, 19 और 28 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 1 होता है और इस मूलांक के स्वामी सूर्य ग्रह हैं. सूर्य ग्रह से प्रभावित लोग जन्मजात लीडर होते हैं और उनकी पर्सनैलिटी बहुत आकर्षक होती है. ऐसे लोगों को घर या ऑफिस में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने के लिए सूरजमुखी का पौधा घर लाना चाहिए. इससे उनके जीवन में खुशी और सकारात्मकता आएगी.
किसी भी महीने की 2, 11, 20 और 29 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 2 होता है और इस मूलांक के स्वामी चंद्र ग्रह हैं. चंद्र ग्रह से प्रभावित मूलांक 2 के लोग भावुक और संवेदनशील होते हैं. इन्हें अपनी भावनाओं को संतुलित रखने की जरूरत होती है. ऐसे लोगों को घर या ऑफिस में जेड प्लांट का पौधा लगाना चाहिए, इससे उनके मन को शांति मिलेगी.
किसी भी महीने की 3, 12, 21 और 30 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 3 होता है और इस अंक के स्वामी देवताओं के गुरु बृहस्पति देव हैं. गुरु ग्रह से प्रभावित मूलांक 3 वाले ज्ञानवान और अच्छे मार्गदर्शक होते हैं. कभी-कभी इन्हें भी आशीर्वाद की जरूरत होती है. ऐसे लोग तुलसी का पौधा घर लाएं और रोज देसी घी का दीपक जलाकर पूजा करें. इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि आएगी.
किसी भी महीने की 4, 13, 22 और 31 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 4 होता है और इस अंक के स्वामी छाया ग्रह राहु हैं. राहु ग्रह से प्रभावित लोग विद्रोही स्वभाव के होते हैं और जीवन को व्यावहारिक तरीके से जीते हैं. इन्हें लिली का पौधा घर या ऑफिस लाना चाहिए क्योंकि ये लोग जल्दी फैसले लेते हैं और बाद में पछताते हैं. जल्दी फैसले लेने से बचने के लिए इस पौधे की देखभाल करें, इससे शांति और सुकून मिलेगा.
किसी भी महीने की 5, 14 और 23 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 5 होता है और इस मूलांक के स्वामी बुध ग्रह हैं. बुध ग्रह से प्रभावित लोग अच्छे श्रोता और बुद्धिमान होते हैं. इन्हें अपने घर या ऑफिस में मनी प्लांट रखना चाहिए. इससे उनकी संवाद क्षमता बढ़ेगी और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आएगी. मनी प्लांट का पौधा आपके लिए लकी रहेगा.
किसी भी महीने की 6, 15 और 24 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 6 होता है और इस मूलांक के स्वामी शुक्र ग्रह हैं. शुक्र ग्रह से प्रभावित लोग बहुत केयरिंग और प्यार करने वाले होते हैं, लेकिन कभी-कभी आत्मविश्वास की कमी हो जाती है क्योंकि लोग उनकी अच्छाई की आलोचना करते हैं. ऐसे लोगों को चमेली का पौधा ऑफिस या घर पर लाना चाहिए क्योंकि इसके फूलों की खुशबू उन्हें अंदर से खुश महसूस कराएगी.
किसी भी महीने की 7, 16 और 25 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 7 होता है और इस मूलांक के स्वामी छाया ग्रह केतु हैं. केतु ग्रह से प्रभावित लोग अपनी ही दुनिया में रहते हैं. ये अकेले रहना पसंद करते हैं और नए लोगों से मिलना कम पसंद करते हैं. इनके लिए गेंदा का पौधा अपने आसपास रखना चाहिए. यह पौधा उनके जीवन में उजाला लाएगा और उन्हें जीवंत महसूस कराएगा.
किसी भी महीने की 8, 17 और 26 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 8 होता है और इस मूलांक के स्वामी शनिदेव हैं. शनि ग्रह से प्रभावित मूलांक 8 वाले बहुत जिम्मेदार और दूसरों की मदद करने वाले होते हैं. ये सही कर्म में विश्वास रखते हैं और दूसरों को खुश करते-करते अपनी खुशी भूल जाते हैं. कभी-कभी शनि के बुरे प्रभाव से भी प्रभावित हो जाते हैं. ऐसे लोगों को शमी का पौधा घर लाना चाहिए, इससे उनके जीवन से सारी नकारात्मकता दूर हो जाएगी.
किसी भी महीने की 9, 18 और 27 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 9 होता है और इस मूलांक के स्वामी मंगल देव हैं. मंगल ग्रह से प्रभावित लोग ऊर्जा और जुनून के लिए जाने जाते हैं. इन्हें समझना चाहिए कि कभी-कभी जीवन में धीमा चलना भी जरूरी है. अपने आसपास का माहौल बेहतर बनाने के लिए इन्हें गुड़हल का पौधा घर लाना चाहिए. इसके फूल उन्हें खुशी का एहसास देंगे और गुस्से की समस्या कम करने में मदद करेंगे.
ज्येष्ठ माह के प्रदोष व्रत पर दुर्लभ संयोग! जरूर करें ये अचूक उपाय, खुल जाएगी किस्मत, कर्ज बाधा से मिलेगी मुक्ति
13 Jun, 2026 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मौसम विभाग नहीं था तब कैसे लगता था बारिश का पता, चींटी, गौरैया और पक्षियों के संकेतों से हिंदू पंचांग के अनुसार प्रदोष व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए बेहद शुभ माना जाता है। वर्षभर में कई प्रदोष व्रत आते हैं, लेकिन जून माह का पहला प्रदोष विशेष फलदायी माना जा रहा है. क्युकी इस दिन कई शुभ सयोंग का निर्माण भी हो रहा है. इस पावन दिन शिव भक्त उपवास रखकर शिवलिंग का जल, दूध और पंचामृत से अभिषेक करते हैं तथा विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं.
मान्यता है कि प्रदोष काल में की गई सच्ची भक्ति से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और भक्तों के दुख-दर्द दूर करते हैं. यह व्रत सुख, शांति, समृद्धि और जीवन में नई सफलता के द्वार खोलने वाला माना जाता है. आइए जानते है उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य आनंद भारद्वाज से इस बार यह प्रदोष कब आ रहा है और इस दिन किन उपायों को करने से भगवान शिव की कृपा बरसेंगी.
कब रखा जायगा जून का पहला प्रदोष व्रत?
वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ अधिकमास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 12 जून 2026 को शाम 07 बजकर 36 मिनिट के लगभग से शुरू होकर 13 जून 2026 को शाम 04 बजकर 07 मिनिट के लगभग पर समाप्त होगी. प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व होता है, इसलिए इस बार प्रदोष व्रत 12 जून 2026 को रखा जाएगा. इसी दिन श्रद्धालु विधि-विधान से महादेव की पूजा-अर्चना करेंगे. चूंकि यह व्रत शुक्रवार के दिन पड़ रहा है, इसलिए इसे शुक्र प्रदोष व्रत कहा जाएगा.
शुक्र प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
शुक्रवार के दिन पड़ने की वजह से इसे शुक्र प्रदोष व्रत कहते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, शुक्र प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति के जीवन खुशहाली आती है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है. इसके साथ ही जीवन के सभी संकटों से छुटकारा मिलता है. वहीं खासतौर पर इस व्रत को विवाहित महिलाएं पति की लंबी आयु और सुख-सौभाग्य में वृद्धि के लिए रखती हैं.
प्रदोष व्रत पर जरूर करें ये उपाय
जून माह के पहले प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की विशेष पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है. इस पावन दिन शिवलिंग पर तिल अर्पित करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन माना जाता है. शिवजी को लाल चंदन चढ़ाने से सूर्य ग्रह मजबूत होता है, जिससे मान-सम्मान और सफलता में वृद्धि होती है. यदि धन टिक नहीं रहा हो तो शिवलिंग पर कच्चे चावल अर्पित करना शुभ माना गया है, इससे आर्थिक स्थिति मजबूत होने के साथ कर्ज की परेशानी भी दूर होंगी. वहीं गेहूं और धतूरे से अभिषेक कर सुख-शांति तथा संतान सुख की कामना करने पर महादेव की विशेष कृपा प्राप्त होती है.
राशिफल 13 जून 2026: जानिए आज का दिन आपके लिए कैसा रहेगा
13 Jun, 2026 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- इष्ट मित्र सुख वर्धक होंगे, प्रयत्नशीलता तथा सफलता से लाभ होगा।
वृष राशि :- समय पर सोचे कार्य बनेंगे, कार्य तत्परता से लाभ अवश्य ही होगा।
मिथुन राशि :- मनोबल उत्साह वर्धक होगा, व्यावसायिक क्षमता में वृद्धि अवश्य होगी।
कर्क राशि :- परिश्रम में सफलता सम्भव है, सोच-समझ कर कार्य करें।
सिंह राशि :- कार्य वृत्ति में सुधार, चिन्ताऐं कम हों, सफलता के साधन अवश्य बनेंगे।
कन्या राशि :- परिश्रम करने पर भी सफलता दिखायी न देवे, कार्य स्थगित रखना ठीक होगा।
तुला राशि :- कुछ लोगों से मेल-मिलाप सम्भव, कार्य क्षमता अनुकूल अवश्य होगी।
वृश्चिक राशि :- स्वास्थ नरम, चोटादि का भय होगा, मनोबल उत्साहवर्धक होगा।
धनु राशि :- कार्य कुशलता से संतोष, दैनिक कार्यवृत्ति में सुधार होगा, ध्यान रखें।
मकर राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक हो, इष्ट मित्रों से परेशानी, धोखे से बचें।
कुंभ राशि :- कार्य-व्यावसाय गति मंद होते हुए भी साधन सम्पन्नता बनकर कार्य होगा।
मीन राशि :- विघटनकारी तत्व परेशान करें, अनायास कुछ बाधायें बन जायेंगी।
अधिक मास का प्रदोष व्रत होगा खास, इन स्थानों पर करें भोलेनाथ का विशेष अभिषेक, शिव धाम के खुलेंगे द्वार
12 Jun, 2026 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भोलेनाथ की पूजा-आराधना नित्य प्रति के करने पर जीवन सुखमय और सरल हो जाता है. भोलेनाथ की आराधना, पूजा पाठ और उनका अभिषेक आदि करने के लिए धर्म नगरी हरिद्वार में कई प्राचीन सिद्ध पीठ स्थल है. पंचांग के अनुसार, एक संवत में भोलेनाथ को प्रिय और उनकी विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए 24 प्रदोष तिथि का आगमन होता है, लेकिन तीन संवत बाद पुरुषोत्तम मास यानी अधिक मास के दौरान दो प्रदोष तिथि के आगमन का विशेष महत्व में बताया गया है.
संयोग से साल 2026 में चल रहे संवत 2083 के अधिक मास में आखिरी प्रदोष व्रत का बेहद ही शुभ घड़ी में आगमन हो रहा है. इस दिन भोलेनाथ के सिद्ध पीठ मंदिर में जाकर श्रद्धा भक्ति भाव से भोलेनाथ का विशेष पद्धति से अभिषेक करने पर शिव धाम के द्वार खुल जाएंगे.
आखिरी प्रदोष व्रत बेहद खास
संवत 2083 के आखिरी प्रदोष व्रत के महत्व पर प्रकाश डालते हुए हरिद्वार के तीर्थ पुरोहित पंडित कन्हैया बताते हैं कि पुरुषोत्तम मास यानी अधिक मास पूजा पाठ, व्रत आदि के लिए सबसे शुभ समय होता है. संवत 2083 के अधिक मास का आखिरी प्रदोष व्रत बेहद ही खास होने वाला है. हरिद्वार में भोलेनाथ के अनेक शिवालय हैं. हरिद्वार के कुछ शिवालियों का वर्णन धार्मिक ग्रंथो वेदों, पुराणों आदि में किया गया है.
हरिद्वार की उप नगरी कनखल में स्थित भगवान शिव की ससुराल में दक्षेश्वर महादेव मंदिर, बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर, गौरी शंकर महादेव मंदिर, नीलेश्वर महादेव मंदिर, कनखल में गंगा किनारे तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर और दरिद्र भंजन महादेव आदि मंदिर में 12 जून शुक्रवार को भोलेनाथ की विशेष पद्धति से पूजा आराधना करने पर भोलेनाथ की कृपा सदैव बनी रहेगी.
शिव धाम जाने का खुल जाएगा मार्ग
वह आगे बताते हैं कि 12 जून शुक्रवार को अधिक मास का आखिरी प्रदोष व्रत होगा. इस दिन भोलेनाथ के इन सिद्ध पीठ स्थलों में जाकर श्रद्धा भक्ति भाव से समर्पित होकर भोलेनाथ का बेलपत्र, दूध, दही, शहद, जौ और गंगाजल आदि से रुद्राभिषेक करने पर मन की मनोकामनाएं बिन मांगे ही पूरी हो जाती है. इस दिन भोलेनाथ से केवल आपके लिए मंगलमय होने वाली वस्तुएं मांगने पर भोलेनाथ वह सभी वस्तुएं प्रदान करेंगे, जिससे आने वाली कई पीढ़ियां भी सुख-शांति और समृद्धि से अपना जीवन व्यतीत कर पाएंगी. साथ ही शिव धाम जाने का मार्ग भी खुल जाएगा.
क्या आप भी बैठते हैं घर की दहलीज पर? जानिए क्यों इसे माना गया है अशुभ और वर्जित, वजह जान कर चौंक जाएंगे आप?
12 Jun, 2026 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
घर की दहलीज यानी चौखट को भारतीय ज्योतिष, वास्तु और धार्मिक मान्यताओं में बेहद खास स्थान दिया गया है. अक्सर बड़े-बुजुर्ग घर के बच्चों को चौखट पर बैठने से मना करते हैं. कई लोग इसे सिर्फ पुरानी परंपरा मानते हैं, लेकिन ज्योतिष और धर्मग्रंथों में इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक संकेत बताए गए हैं. प्रसिद्ध कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने भी चौखट से जुड़ी ऐसी मान्यताओं का उल्लेख किया है, जो आज भी लाखों लोगों की आस्था का हिस्सा हैं, अगर आपने कभी सोचा है कि आखिर घर की दहलीज पर बैठना या देर तक खड़े रहना अशुभ क्यों माना जाता है, तो इसके पीछे सिर्फ सामाजिक नियम नहीं बल्कि धार्मिक और वास्तु शास्त्र से जुड़े कई कारण बताए जाते हैं.
मान्यता है कि चौखट वह स्थान है जहां घर की ऊर्जा, देवी-देवताओं का आशीर्वाद और सकारात्मक कंपन प्रवेश करते हैं. यही वजह है कि इसे साधारण जगह नहीं बल्कि एक पवित्र सीमा रेखा माना गया है. आइए जानते हैं कि ज्योतिष, पौराणिक कथाओं और वास्तु शास्त्र के अनुसार चौखट का महत्व क्या है और क्यों इस स्थान का विशेष सम्मान करने की सलाह दी जाती है.
चौखट को क्यों माना जाता है पवित्र स्थान?
ज्योतिष और सनातन परंपरा के अनुसार घर की चौखट केवल लकड़ी या पत्थर का हिस्सा नहीं होती. इसे घर के भीतर और बाहर की ऊर्जाओं के बीच का द्वार माना जाता है. यही वह स्थान है जहां से शुभ ऊर्जा, सुख-समृद्धि और सकारात्मकता का प्रवेश होता है. मान्यता है कि जिस घर की दहलीज साफ-सुथरी और सम्मानित रहती है, वहां देवी लक्ष्मी की कृपा लंबे समय तक बनी रहती है. इसी वजह से कई घरों में सुबह-शाम चौखट पर दीपक जलाने और रंगोली बनाने की परंपरा भी देखने को मिलती है.
देवकीनंदन ठाकुर ने क्या बताया?
प्रसिद्ध कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर के अनुसार घर की चौखट भगवान नरसिंह से जुड़ी हुई मानी जाती है. उनका कहना है कि दहलीज पर बैठना उचित नहीं माना गया है क्योंकि यह स्थान दिव्य शक्तियों का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक मान्यता के मुताबिक जिस स्थान का संबंध भगवान के अवतार और किसी महत्वपूर्ण दिव्य घटना से हो, वहां अनादर या असावधानी से बचना चाहिए. इसी कारण चौखट पर बैठने की मनाही की जाती है.
भगवान नरसिंह और चौखट का संबंध
हिरण्यकशिपु के अंत की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार असुर राजा हिरण्यकशिपु ने ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसका वध न घर के अंदर हो सकता था और न बाहर. न दिन में और न रात में, न किसी मनुष्य द्वारा और न किसी पशु द्वारा. तब भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण किया. उन्होंने गोधूलि बेला में हिरण्यकशिपु को घर की चौखट पर बैठाकर अपने नाखूनों से उसका वध किया. चौखट न पूरी तरह घर के अंदर थी और न बाहर, इसलिए वरदान की सभी शर्तें निष्फल हो गईं. इसी घटना के बाद से दहलीज को एक दिव्य और पवित्र स्थान माना जाने लगा. ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि चौखट पर बैठना इस पवित्रता के सम्मान के विपरीत माना जाता है.
ज्योतिष में क्या है चौखट का महत्व?
ज्योतिष शास्त्र में घर के मुख्य द्वार और चौखट को राहु, केतु और ग्रहों से आने वाले नकारात्मक प्रभावों को रोकने वाला क्षेत्र माना जाता है. कई ज्योतिष विशेषज्ञों का कहना है कि घर का प्रवेश द्वार ऊर्जा का मुख्य केंद्र होता है. यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक दहलीज पर बैठता है या उसे अव्यवस्थित रखता है, तो इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह प्रभावित हो सकता है. हालांकि यह मान्यता आस्था पर आधारित है, लेकिन कई लोग इसे आज भी गंभीरता से मानते हैं.
शाम के समय क्यों बढ़ जाता है महत्व?
धार्मिक मान्यता के अनुसार सूर्यास्त के बाद का समय बेहद संवेदनशील माना जाता है. कहा जाता है कि इसी समय माता लक्ष्मी घरों में भ्रमण करती हैं. ऐसे में चौखट पर बैठना उनके मार्ग में रुकावट माना जाता है. इसी कारण कई परिवारों में शाम के समय दहलीज पर बैठने, झाड़ू रखने या गंदगी जमा होने से बचने की सलाह दी जाती है. माना जाता है कि इससे घर में सुख, शांति और धन का प्रवाह बना रहता है.
वास्तु शास्त्र क्या कहता है?
वास्तु शास्त्र के अनुसार मुख्य द्वार घर का मुख होता है. जिस प्रकार व्यक्ति के चेहरे का महत्व होता है, उसी तरह घर की चौखट भी उसकी पहचान मानी जाती है. वास्तु विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि चौखट को हमेशा साफ रखें, उस पर अनावश्यक सामान न रखें और उस स्थान का सम्मान करें. ऐसा करने से सकारात्मक वातावरण बना रहता है और घर में खुशहाली का माहौल देखने को मिलता है.
चौखट पर न बैठने की परंपरा सिर्फ एक पुरानी मान्यता नहीं बल्कि धर्म, ज्योतिष और वास्तु शास्त्र से जुड़ा विश्वास है. भगवान नरसिंह की कथा, माता लक्ष्मी के आगमन की मान्यता और सकारात्मक ऊर्जा के सिद्धांत इस परंपरा को और भी महत्वपूर्ण बना देते हैं. चाहे कोई इसे आस्था के रूप में माने या सांस्कृतिक विरासत के रूप में, भारतीय परंपरा में चौखट का सम्मान आज भी विशेष स्थान रखता है.
पूजा के बाद प्रसाद बांटते समय कहीं आप भी तो नहीं करते ये गलतियां? आज ही नोट करें सही नियम और तरीका
12 Jun, 2026 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में पूजा के बाद प्रसाद बांटने की परंपरा का खास महत्व है. प्रसाद सिर्फ़ खाने की चीज़ नहीं है इसे ईश्वर के आशीर्वाद और कृपा का प्रतीक माना जाता है. माना जाता है कि पूजा के बाद श्रद्धा और सम्मान के साथ प्रसाद ग्रहण करने से सकारात्मक ऊर्जा, खुशी, समृद्धि और मानसिक शांति मिलती है. हालांकि, प्रसाद बांटते समय लोग अक्सर अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिन्हें धार्मिक नज़रिए से सही नहीं माना जाता. इसलिए, प्रसाद बांटने के सही नियमों और तरीकों को समझना ज़रूरी है…
प्रसाद बांटने से पहले हाथों को साफ करें
प्रसाद को ईश्वरीय भेंट माना जाता है इसलिए, इसे बांटने वाले व्यक्ति के हाथ साफ होने चाहिए. गंदे हाथों से प्रसाद बांटना उचित नहीं माना जाता है. पूजा-पाठ के बाद, पहले अपने हाथ धोएं और फिर श्रद्धा के साथ प्रसाद बांटें.
प्रसाद को ज़मीन पर न रखें
अक्सर लोग प्रसाद वाले बर्तन या थाली को सीधे ज़मीन पर रख देते हैं. धार्मिक नज़रिए से इसे सही नहीं माना जाता है. प्रसाद को हमेशा किसी साफ चौकी (लकड़ी के छोटे आसन), मेज़ या किसी अन्य साफ जगह पर रखें.
गुस्से या जल्दबाज़ी में प्रसाद न बांटें
प्रसाद बांटना एक पवित्र काम है. इसे शांत मन और सम्मान के साथ किया जाना चाहिए. जल्दबाज़ी में, नाराज़गी या गुस्से में इसे बांटने से इसका महत्व कम हो सकता है. इसलिए, प्रसाद देते समय उदारता और सकारात्मकता की भावना रखें.
सभी को समान रूप से प्रसाद दें
धार्मिक परंपरा कहती है कि प्रसाद बांटते समय कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. चाहे परिवार के सदस्य हों, दोस्त, पड़ोसी या मेहमान, सभी को समान सम्मान के साथ प्रसाद दिया जाना चाहिए. ऐसा करने से मेल-जोल और समानता का संदेश मिलता है.
प्रसाद का अनादर न होने दें
कई लोग प्रसाद को अलग रख देते हैं या बाद में फेंक देते हैं. इसे गलत माना जाता है. प्रसाद को श्रद्धा के साथ स्वीकार करना चाहिए और उतना ही लेना चाहिए जितना खाया जा सके, ताकि इसका अनादर न हो.
प्रसाद बाटने का सही तरीका
दोनों हाथों से या दाहिने हाथ से प्रसाद लेना शुभ माना जाता है. इसे सम्मानपूर्वक स्वीकार करें और मन में ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव रखें. अगर प्रसाद ज़्यादा मात्रा में है, तो इसे परिवार के सदस्यों और दूसरों के साथ बांटा जा सकता है.
बेटे के लिए ढूंढ रहे हैं खास नाम? भगवान शिव के ये 14 नाम देंगे अलग पहचान और सुंदर अर्थ
12 Jun, 2026 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई जिंदगी की शुरुआत हमेशा खुशियों के साथ होती है. जब किसी घर में बेटे का जन्म होता है, तो पूरा परिवार उत्साह और उम्मीदों से भर जाता है. बच्चे की पहली मुस्कान से लेकर उसके पहले कदम तक हर पल खास बन जाता है, लेकिन इन सबके बीच एक और अहम जिम्मेदारी होती है, और वह है बच्चे के लिए सही नाम चुनना. भारतीय परिवारों में नाम सिर्फ पहचान नहीं होता, बल्कि उससे भावनाएं, संस्कार और भविष्य की शुभकामनाएं भी जुड़ी होती हैं. कई माता-पिता अपने बच्चे का नाम किसी देवी-देवता से प्रेरित रखना पसंद करते हैं ताकि बच्चे के जीवन में सकारात्मकता और शुभ ऊर्जा बनी रहे.
खासकर भगवान शिव से जुड़े नामों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. शिव को सृष्टि के रक्षक, संहारक और कल्याणकारी देव माना जाता है. ऐसे में अगर आपके घर भी नन्हा शहजादा आया है और आप उसके लिए एक सुंदर, अर्थपूर्ण और अलग नाम तलाश रहे हैं, तो भगवान शिव के ये 14 नाम आपके लिए बेहतरीन विकल्प साबित हो सकते हैं.
क्यों पसंद किए जाते हैं भगवान शिव से जुड़े नाम?
भारतीय संस्कृति में भगवान शिव को करुणा, शक्ति, ज्ञान और संतुलन का प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि उनसे जुड़े नाम सिर्फ धार्मिक महत्व ही नहीं रखते, बल्कि उनके अर्थ भी जीवन को प्रेरित करने वाले होते हैं. आजकल माता-पिता ऐसे नाम चुनना चाहते हैं जो छोटे हों, सुनने में आकर्षक लगें और जिनका अर्थ भी गहरा हो. शिव से जुड़े कई नाम इन सभी बातों पर खरे उतरते हैं.
भगवान शिव के 14 शक्तिशाली नाम और उनके अर्थ
1. रुद्र
रुद्र नाम का अर्थ है सबसे शक्तिशाली. यह नाम उस स्वरूप को दर्शाता है जो बुराइयों का नाश करता है और दुखों को दूर करता है. यह नाम आज भी काफी लोकप्रिय है.
2. शंभू
शंभू का मतलब होता है आनंद और सुख का स्रोत. यह नाम बच्चे के जीवन में खुशहाली और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है.
3. भावेश
भावेश का अर्थ है संसार के स्वामी. यह नाम नेतृत्व क्षमता और जिम्मेदारी की भावना को दर्शाता है.
4. ईशान
ईशान भगवान शिव का बेहद लोकप्रिय नाम है. इसका अर्थ है ज्ञान का स्वामी और उत्तर-पूर्व दिशा के अधिपति. आधुनिक दौर में यह नाम काफी पसंद किया जा रहा है.
5. त्रिशूलिन
जिसके हाथ में त्रिशूल हो उसे त्रिशूलिन कहा जाता है. यह नाम शक्ति, साहस और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है.
6. अनिकेत
अनिकेत का अर्थ है जिसका कोई स्थायी निवास न हो. भगवान शिव पूरे ब्रह्मांड के स्वामी हैं, इसलिए यह नाम उनके विराट स्वरूप को दर्शाता है.
7. नंदीश
नंदीश का मतलब है नंदी के स्वामी. यह नाम श्रद्धा, विश्वास और समर्पण की भावना से जुड़ा हुआ माना जाता है.
आज के समय में क्यों बढ़ रहा है इन नामों का चलन?
बीते कुछ वर्षों में धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाले नामों की मांग बढ़ी है. कई माता-पिता ऐसे नाम चाहते हैं जो आधुनिक भी लगें और परंपरा से भी जुड़े हों. उदाहरण के तौर पर ईशान, रुद्र और अनिकेत जैसे नाम स्कूल, कॉलेज और प्रोफेशनल दुनिया में भी आकर्षक लगते हैं. इसके अलावा सोशल मीडिया और इंटरनेट पर भी यूनिक नामों की तलाश लगातार बढ़ रही है. ऐसे में शिव से जुड़े नामों को लोग खास प्राथमिकता दे रहे हैं क्योंकि ये नाम समय के साथ पुराने नहीं पड़ते.
8. शर्व
शर्व का अर्थ है कष्टों को दूर करने वाला. यह नाम धैर्य और सहनशीलता का प्रतीक माना जाता है.
9. व्योमकेश
व्योमकेश का मतलब है जिनके केश आकाश की तरह विशाल और अनंत हों. यह नाम काफी अलग और आकर्षक माना जाता है.
10. महादेव
महादेव का अर्थ है देवताओं के भी देवता. यह नाम शक्ति और महानता का प्रतीक है.
11.शिव
शिव नाम अपने आप में सबसे सरल और प्रभावशाली नामों में गिना जाता है. इसका अर्थ है कल्याणकारी और शुभ.
12. त्रिनेत्र
तीन नेत्रों वाले भगवान शिव को त्रिनेत्र कहा जाता है. यह नाम दूरदृष्टि और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है.
13. मृत्युंजय
मृत्युंजय का अर्थ है मृत्यु पर विजय पाने वाला. यह नाम साहस और अटूट आत्मविश्वास को दर्शाता है.
14. चंद्रशेखर
जिसने अपने मस्तक पर चंद्रमा धारण किया हो, उसे चंद्रशेखर कहा जाता है. यह नाम शांति, संतुलन और सौम्यता का प्रतीक माना जाता है.
नाम चुनते समय किन बातों का रखें ध्यान?
विशेषज्ञों का मानना है कि नाम चुनते समय सिर्फ उसका उच्चारण ही नहीं, बल्कि उसका अर्थ भी देखना चाहिए. ऐसा नाम चुनें जो बच्चे के व्यक्तित्व को सकारात्मक दिशा दे और परिवार की भावनाओं से भी जुड़ा हो. छोटे और अर्थपूर्ण नाम आज के समय में ज्यादा पसंद किए जाते हैं क्योंकि उन्हें याद रखना और बोलना आसान होता है.
राशिफल 12 जून 2026: जानिए आज का दिन आपके लिए कैसा रहेगा
12 Jun, 2026 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- स्वभाव में आकस्मिक परिवर्तन ही सफलता है, व्यवसाय में उन्नति होगी।
वृष राशि :- कार्य में सफलता मिलेगी, मान-सम्मान की प्राप्ति होगी, शत्रु वर्ग का जोर होगा।
मिथुन राशि :- यह सप्ताह उत्तम फलकारक है, अधिकारियों का पूर्ण सहयोग अवश्य मिलेगा।
कर्क राशि :- नौकरी में व्यावधान हो सकता है, व्यवसाय ठीक नहीं है, भवुकता से हानि होगी।
सिंह राशि :- आनंद का अनुभव करेंगे, केतु गृह पीड़ा कारक है, काफी मतभेद अवश्य होंगे।
कन्या राशि :- मनोरंजन में अति हर्ष होगा, व्यवसाय में लाभ होगा तथा कार्य अवश्य होगा।
तुला राशि :- पारिवारिक उत्तर दायित्व की वृद्धि होगी, आमोद-प्रमोद में विरोध अवश्य होगा।
वृश्चिक राशि :- मानसिक तनाव अनावश्यक बढ़ेगा, स्वजनों की सहायता अनुभूति अवश्य होगी।
धनु राशि :- व्यवसाय की उन्नति में आर्थिक स्थिति में विशेष सुधार अवश्य होगा, ध्यान दें।
मकर राशि :- विलास सामग्री का संचय होगा, अधिकारियों की कृपा का लाभ मिलेगा।
कुंभ राशि :- इष्ट मित्रों से अच्छा सहयोग मिले तथा उत्तम लाभ के योग अवश्य बनेंगे।
मीन राशि :- गृह-कलह, हीन मनोवृत्ति, शरीर पीड़ा, परेशानी अवश्य ही बनेगी, व्यापार में व्यावधान होगा।
हथेली के आकार से पता चलता है कैसा होगा जीवन
11 Jun, 2026 07:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हर व्यक्ति के मन में अपना भविष्य जानने की इच्छा रहती है। हस्तरेखा शास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जो व्यक्ति के भूत, भविष्य व वर्तमान की जानकारी देता है। हर व्यक्ति के हाथ की हथेली की बनावट व आकार अलग-अलग होता है। इसके साथ ही हाथ की रेखाएं भी अलग-अलग होती हैं। हस्तरेखा शास्त्र के जानकारों के अनुसार, व्यक्ति की हाथ की रेखाएं और हथेली के आकार को देखकर उसका भविष्य व स्वभाव का पता लगाया जा सकता है।
कठोर हथेली के जातक- हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की हथेली कठोर होती है, उन्हें जीवन में ज्यादा मेहनत व संघर्षों का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को दिन-रात एक करने के बाद ही भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। लेकिन ये लोग हमेशा अपनी ईमानदारी का परिचय देते हैं।
छोटी हथेली के जातक- हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की हथेली छोटी होती है, ऐसे लोग दिल के साफ होते हैं। ऐसे लोग क्रिएटिव कार्यों में रूचि रखते हैं। ये चीजों को जानने की इच्छा रखते हैं। कहते हैं कि इन लोगों का जीवन सुखमय बीतता है।
बड़ी हथेली के जातक- हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की हथेली का आकार बड़ा होता है, वे अपनी जिम्मेदारियों को अच्छी तरह से निभाते हैं। ये धर्म-कर्म के कार्यों में रुचि रखते है। इन्हें जीवन में मनचाही सफलता प्राप्त होती है।
कोमल हथेली के लोग- हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की हथेलियां कोमल होती हैं, वे भाग्यशाली माने गए हैं। इन लोगों को जीवन में अपार सफलता प्राप्त होती है। कहते हैं कि इन लोगों को धन संबंधी परेशानियों का कम सामना करना पड़ता है।
समस्याओं का समाधान बताते हैं यंत्र
11 Jun, 2026 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिन्दू धर्म के अनेक ग्रंथों में कई तरह के चक्रों और यंत्रों के बारे में विस्तार से उल्लेख किया गया है। जिनमें राम शलाका प्रश्नावली, हनुमान प्रश्नावली चक्र, नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र, श्रीगणेश प्रश्नावली चक्र आदि प्रमुख हैं। कहते हैं इन चक्रों और यंत्रों की सहायता से लोग अपने मन में उठ रहे सवालों, जीवन में आने वाली कठिनाइयों आदि का समाधान पा सकते हैं। इन चक्रों और यंत्रों की सहायता लेकर केवल आम आदमी ही नहीं बल्कि ज्योतिष और पुरोहित लोग भी सटीक भविष्यवाणियां तक कर देते हैं।
श्री राम शलाका प्रश्नावली
श्री राम शलाका प्रश्नावली का उल्लेख गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में प्राप्त होता है। यह राम भक्ति पर आधारित है। इस प्रश्नावली का प्रयोग से लोग जीवन के अनेक प्रश्नों का जवाब पाते हैं। इस प्रश्नावली का प्रयोग के बारे कहा जाता है कि सबसे पहले भगवान श्रीराम का स्मरण करते हुए किसी सवाल को मन में अच्छी तरह सोच लिया जाता है।फिर शलाका चार्ट पर दिए गए किसी भी अक्षर पर आंख बंद कर उंगली रख दी जाती है। जिस अक्षर पर उंगली रखी जाती है, उसके अक्षर से प्रत्येक 9वें नम्बर के अक्षर को जोड़ कर एक चौपाई बनती है, जो प्रश्नकर्ता के प्रश्न का उत्तर होती है।
हनुमान प्रश्नावली चक्र
यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि हनुमानजी एक उच्च कोटि के ज्योतिषी भी थे। इसका कारण शायद यह हो सकता है कि वे शिव के ग्यारहवें अंशावतार थे, जिनसे ज्योतिष विद्या की उत्पत्ति हुई मानी जाती है। कहते हैं, हनुमानजी ने ज्योतिष प्रश्नावली के 40 चक्र बनाए हैं। यहां भी प्रश्नकर्ता आंख मूंद कर चक्र के नाम पर उंगली रखता है। अगर उंगली किसी लाइन पर रखी गई होती है, तो दोबारा उंगली रखी जाती है। फिर नाम के अनुसार शुभ-अशुभ फल का निराकरण किया जाता है। कहते हैं। रामायण काल के परम दुर्लभ यंत्रों में हनुमान चक्र श्रेष्ठ यंत्रों का सिरमौर है।
नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र
अनेक लोग, विशेष देवी दुर्गा के परम भक्त, यह मानते हैं कि नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र एक चमत्कारिक चक्र है, जिसे के माध्यम से कोई भी अपने जीवन की समस्त परेशानियों और मन के सवालों का संतोषजनक हल आसानी से पा सकते हैं। इस चक्र के उपयोग की विधि के लिए पहले पांच बार ऊँ ऐं ह्लीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे मंत्र का जप करना पड़ता फिर एक बार या देवी सर्वभूतेषु मातृरुपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: मंत्र का जप कर, आंखें बंद करके सवाल पूछा जाता है और देवी दुर्गा का स्मरण करते हुए प्रश्नावली चक्र पर उंगली घुमाते हुए रोक दिया जाता है, जिस कोष्ठक उंगली होती है। उस कोष्ठक में लिखे अंक के अनुसार फलादेश को जाना जाता है।
श्रीगणेश प्रश्नावली चक्र
हिंदू मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश प्रथमपूज्य हैं। वे सभी मांगलिक कार्यों में सबसे पहले पूजे जाते हैं। उनकी पूजा के बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र के माध्यम से भी लोग अपने जीवन की सभी परेशानियों और सवालों के हल जानने की कोशिश करते हैं। जिसे भी अपने सवालों का जवाब या परेशानियों का हल जानना होता है, वे पहले पांच बार ऊँ नम: शिवाय: और फिर 11 बार ऊँ गं गणपतयै नम: मंत्र का जप करते हैं और फिर आंखें बंद करके अपना सवाल मन में रख भगवान गणेश का स्मरण करते हुए प्रश्नावली चक्र प्रश्नावली चक्र पर उंगली घुमाते हुए रोक देते हैं, जिस कोष्ठक उंगली होती है। उस कोष्ठक में लिखे अंक के अनुसार फलादेश को जाना जाता है।
शिव प्रश्नावली यंत्र
इस यंत्र में भगवान शिव के एक चित्र पर 1 से 7 तक अंक दिए गए होते हैं। श्रद्धालु अपनी आंख बंद करके पूरी आस्था और भक्ति के साथ शिवजी का ध्यान करते हैं और और मन ही मन ऊं नम: शिवाय: मंत्र का जाप कर उंगली को शिव यंत्र पर घुमाते हैं और फिर उंगली घुमाते हुए रोक देते हैं, जिस कोष्ठक उंगली होती है। उस कोष्ठक में लिखे अंक के अनुसार फलादेश को जाना जाता है। इन प्रश्नावलियों और यंत्रों के अलावा अनेक लोग साईं प्रश्नावली का उपयोग भी अपने मन में उठ रहे सवालों का जवाब पाने के लिए करते हैं।
तुलसी पूजन और गो सेवा से रहेंगे रोग दूर
11 Jun, 2026 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, बहुत सारे ऐसे उपाय बताए गए हैं, जिन्हें अपनाकर व्यक्ति सरल एवं सुलभ जीवन व्यतित कर सकता है। उन्हीं में से तुलसी पूजन और गो सेवा दो ऐसे शुभ कर्म हैं, जिस घर में प्रतिदिन होते हैं, वहां का द्वार रोग कभी नहीं खटखटाते और मिलते हैं ढेरों लाभ।
‘स्कंद पुराण’ के अनुसार जिस घर में तुलसी का बगीचा होता है (एवं प्रतिदिन पूजन होता है), उसमें यमदूत प्रवेश नहीं करते।’
‘पद्म पुराण’ में आता है कि ‘कलियुग में तुलसी का पूजन, कीर्तन, ध्यान, रोपण और धारण करने से वह पाप को जलाती है और स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करती है।’
‘पद्म पुराण’ के उत्तर खंड में आता है कि कैसा भी पापी, अपराधी व्यक्ति हो, तुलसी की सूखी लकडिय़ां उसके शव के ऊपर, पेट पर, मुंह पर थोड़ी-सी बिछा दें और तुलसी की लकड़ी से अग्नि शुरू करें तो उसकी दुर्गति से रक्षा होती है। यमदूत उसे नहीं ले जा सकते।
‘गरुड़ पुराण’ (धर्म कांड-प्रेत कल्प : 38.99) में आता है कि ‘तुलसी का पौधा लगाने, पालन करने, सींचने तथा ध्यान, स्पर्श और गुणगान करने से मनुष्यों के पूर्व जन्मार्जित पाप जल कर विनष्ट हो जाते हैं।’
‘मृत्यु के समय जो तुलसी-पत्ते सहित जल का पान करता है वह सपूर्ण पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक में जाता है।’ (ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खंड : 21.43)
‘जो दारिद्रय मिटाना व सुख-सपदा पाना चाहता है उसे शुद्ध भाव व भक्ति से तुलसी के पौधे की 108 परिक्रमा करनी चाहिए।’
ईशान कोण में तुलसी का पौधा लगाने से बरकत होती है।
पंच केदार में होती है तुंगनाथ मंदिर की गिनती
11 Jun, 2026 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है तुंगनाथ मंदिर है। इसकी गिनती पंच केदार यात्रा में की जाती है, जोकि उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय क्षेत्र में स्थित पांच पवित्र जगहों में से एक है, हालांकि यह चार धाम यात्रा से अलग है। पौराणिक कथा के मुताबिक कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद पांडवों में भगवान शिव से क्षमा मांगनी पड़ी थी। ऐसे में भगवान शिव ने लुका-छुपी का एक खेल खेला। जिसके तहत पांच अलग-अलग स्थानों पर पांच मंदिरों की स्थापना हुई। जिसमें केदारनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मध्यमहेश्वर और कल्पेशर शामिल हैं। इनमें से तुंगनाथ मंदिर तीसरा और सबसे अहम शिव मंदिर है।
तुंगनाथ मंदिर न सिर्फ पंच केदार मंदिरों में सबसे ऊंचा है, बल्कि यह विश्व का भी सबसे ऊंचा शिव मंदिर है। यह मंदिर 3,680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। तुंगनाथ मंदिर का इतिहास महाभारत काल के पांडवों से जुड़ा है। यहां के स्थानीय लोगों की मानें, तो 8वीं शताब्दी के दार्शनिक और संत आदि शंकराचार्य ने मंदिर की खोज की थी। वहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कत्यूरी शासकों ने 8वीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण किया गया था।
बद्री केदार मंदिर समिति द्वारा उत्तराखंड में स्थित तुंगनाथ मंदिर के खुलने की तारीख तय की जाती है। उत्तराखंड में चार धामों की शुरुआत के साथ तीसरे केदार तुंगनाथ का उद्घाटन होता है। आमतौर पर अप्रैल या मई में वैशाख पंचमी पर यह मंदिर भक्तों के लिए खुल जाता है।
तुंगनाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको उत्तराखंड के चोपता आना होगा। चोपता से तुंगनाथ तक का ट्रेक करीब 3.5 किमी का है। हालांकि यह ट्रैक ज्यादा मुश्किल नहीं है, लेकिन इसको आसान भी नहीं कहा जा सकता है। इस ट्रैक के दौरान आपको घास के मैदान और बर्फ से ढके पहाड़ों को देखकर आपका दिल खुश हो जाएगा। चोपता से तुंगनाथ पहुंचने में करीब 2 से 3 घंटे तक का समय लगता है।
उत्तराखंड के चोपता से तुंगनाथ ट्रेक की शुरुआत होती है। ऐसे में आपको सबसे पहले हरिद्वार या ऋषिकेश पहुंचना होगा, फिर वहां से चोपता के लिए बस या टैक्सी करें। या फिर आप उखीमठ से बस ले सकते हैं। उखीमठ से आप लोकल टैक्सी ले सकते हैं। चोपता उत्तराखंड का बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन है और इसको भारत का मिनी स्विटजरलैंड भी कहा जाता है।
बता दें कि तुंगनाथ मंदिर पहुंचने के बाद आप केदारनाथ, नंदा देवी, त्रिशूल और चौखंबा की राजसी चोटियों को भी देख सकते हैं। मंदिर तक जाने के बाद अगर आप चंद्रशिला शिखर तक जाना चाहते हैं, तो आपको तुंगनाथ मंदिर से आगे 1.5 किमी जाना होगा। पौराणिक कथाओं के मुताबिक इस शिखर पर भगवान श्रीराम ने ध्यान किया था।
धार्मिक अनुष्ठानों में पत्नी इस कारण बैठती है बाईं ओर
11 Jun, 2026 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में विवाह के समय पत्नी को पति के वाम अंग यानी बाईं ओर बैठने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। धार्मिक अनुष्ठानों में भी इसी परंपरा का पालन किया जाता है। हालांकि, इसे केवल धार्मिक नियम मानना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि इसके पीछे गहरी वैज्ञानिक और ज्योतिषीय अवधारणाएं भी छिपी हैं। पत्नी को वामंगी कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है—बाईं ओर स्थित होने वाली। यही नियम पति-पत्नी के शयन के समय भी लागू होता है, जहां पत्नी को पति के बाईं ओर सोने की सलाह दी जाती है।
ज्योतिष और वास्तु शास्त्र के अनुसार, हमारे शरीर में दो प्रमुख नाड़ियां होती हैं—सूर्य नाड़ी और चंद्र नाड़ी। सूर्य नाड़ी, जिसे पिंगला नाड़ी भी कहा जाता है, शरीर के दाहिनी ओर स्थित होती है और यह ऊर्जा, उत्साह, और निर्णय लेने की क्षमता को नियंत्रित करती है। वहीं, चंद्र नाड़ी, जिसे ईड़ा नाड़ी कहते हैं, शरीर के बाईं ओर होती है और यह शीतलता, सौम्यता तथा मानसिक शांति प्रदान करती है।
जब पति-पत्नी एक साथ सोते हैं और पत्नी पति के बाईं ओर होती है, तो यह दोनों की ऊर्जा संतुलित करता है। पति की सूर्य नाड़ी उसकी निर्णय क्षमता और आत्मविश्वास को बढ़ाती है, जबकि पत्नी की चंद्र नाड़ी से शीतलता और मानसिक शांति बनी रहती है। इससे रिश्ते में मधुरता आती है और नकारात्मक ऊर्जा कम होती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, इस स्थिति से पारिवारिक जीवन में सामंजस्य बना रहता है, तनाव कम होता है और आपसी समझ बढ़ती है।
चंद्र नाड़ी की सक्रियता शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी मानी जाती है। यह मन को शांत रखती है, तनाव को कम करती है, पाचन तंत्र को सुधारती है और हृदय की गति को संतुलित रखती है। यदि पति-पत्नी सोने की सही दिशा का पालन नहीं करते हैं, तो ऊर्जा असंतुलित हो सकती है, जिससे अनावश्यक तनाव और मानसिक अस्थिरता उत्पन्न होने की संभावना रहती है।
इस प्रकार, सनातन धर्म में स्थापित यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है। पति-पत्नी के बीच प्रेम, सामंजस्य और सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने के लिए वास्तु और ज्योतिष शास्त्र में सुझाई गई यह सोने की स्थिति अत्यंत लाभकारी मानी गई है।
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