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सीमा सुरक्षा को मिलेगा नया हथियार, 20 किमी ऊपर से होगी निगरानी
15 Jul, 2026 10:51 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। अपनी सैन्य क्षमताओं को और अधिक आधुनिक बनाने की दिशा में भारत एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। भारतीय रक्षा मंत्रालय ने देश की सीमाओं की अभेद्य निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने के लिए 15,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से एक महत्त्वाकांक्षी स्वदेशी स्ट्रैटोस्फेरिक एयरशिप प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है। 'एयरशिप-बेस्ड हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट' (AS-HAPS) नाम की इस परियोजना को रक्षा मंत्रालय की 'मेक फर्स्ट' नीति के तहत विकसित किया जा रहा है, जिसमें शोध और विकास (R&D) की कुल लागत का 70 प्रतिशत हिस्सा सरकार द्वारा वहन किया जाएगा।
वायुसेना की देखरेख में निजी क्षेत्र की कंपनियां लगाएंगी दांव
इस अत्याधुनिक रक्षा तकनीक को तैयार करने की जिम्मेदारी भारतीय वायुसेना के डायरेक्टरेट ऑफ ऑपरेशन्स (रिमोट) को सौंपी गई है। इस परियोजना के तहत सरकार द्वारा चयनित निजी साझीदारों को एक प्रोटोटाइप एयरशिप का निर्माण करने के लिए वित्तीय सहायता दी जाएगी, जिसके लिए रक्षा क्षेत्र की कई दिग्गज निजी कंपनियां इस होड़ में शामिल हो चुकी हैं। फरवरी में ही रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) से हरी झंडी पा चुके इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य एक ऐसा प्लेटफॉर्म विकसित करना है जो समतामंडल (स्ट्रैटोस्फीयर) में 20 किलोमीटर से अधिक की ऊंचाई पर रहकर लगातार जासूसी करने और लंबी दूरी तक बेधड़क संचार स्थापित करने में पूरी तरह सक्षम हो।
ड्रोन और सैटेलाइट के बीच के बड़े अंतर को पाटेगी यह तकनीक
यह स्वदेशी एयरशिप देश की सुरक्षा प्रणालियों में एक क्रांतिकारी बदलाव लाएगा, क्योंकि इसे 12 किलोमीटर पर उड़ने वाले पारंपरिक ड्रोन और 500 से 2000 किलोमीटर की ऊंचाई पर चक्कर काटने वाले लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) उपग्रहों के बीच के खाली स्थान को भरने के लिए डिजाइन किया गया है। यह हाई-टेक एयरशिप बिना रुके महीनों तक किसी एक निश्चित संवेदनशील क्षेत्र के ऊपर आसमान में तैनात रह सकता है। दुश्मन की हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखने के लिए इसमें बेहद आधुनिक ऑप्टिकल सेंसर, रडार और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस प्रणालियां (ELINT) फिट की जाएंगी।
ग्रुप C कर्मियों की सेवाएं रहेंगी जारी, सुप्रीम कोर्ट से मिली बड़ी राहत
15 Jul, 2026 10:43 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने हरियाणा में ग्रुप-20 सहित कुल 24 विभिन्न ग्रुपों की भर्ती प्रक्रिया के पक्ष में एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के बीते 27 मार्च के फैसले को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) को सिरे से खारिज कर दिया है। इस महत्वपूर्ण फैसले से विभिन्न विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे 10,458 सरकारी कर्मचारियों की नौकरी पर मंडरा रहा खतरा पूरी तरह टल गया है और उनके सेवा में बने रहने का रास्ता साफ हो गया है।
हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने माना सही
इससे पहले पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि इन 24 ग्रुपों की भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह संपन्न हो चुकी है और चयनित उम्मीदवार लंबे समय से विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ऐसे में उन्हें बिना पक्षकार बनाए या उनका पक्ष सुने बिना उनके चयन को प्रभावित करना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं है। इसी निर्णय को चुनौती देते हुए कुछ अभ्यर्थियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर हाईकोर्ट के आदेश को पूरी तरह यथावत रखा है।
सामाजिक-आर्थिक अंकों के विवाद पर न्यायालय का रुख
उच्च न्यायालय ने अपने पूर्व के आदेश में यह भी साफ कर दिया था कि सामाजिक-आर्थिक आधार पर मिलने वाले अंकों का सीईटी-2 परीक्षा के लिए अभ्यर्थियों को बुलाने की मेरिट सूची पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा था। अदालत के अनुसार, पूर्व में भर्ती प्रक्रिया और सीईटी परिणामों को निरस्त करने संबंधी आदेशों में तकनीकी कमियां थीं। न्यायालय ने यह भी साफ किया कि भर्ती आयोग को भविष्य के लिए दिए गए दिशा-निर्देश केवल आगामी नई भर्तियों पर ही लागू होंगे और वर्तमान में नियुक्त सभी 10,458 कर्मी कानूनन अपनी सेवा में बने रहेंगे।
न्याय, सत्य और प्रदेश के युवाओं के धैर्य की जीत
इस बड़े फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग के अध्यक्ष हिम्मत सिंह ने कहा कि यह निर्णय हजारों अभ्यर्थियों के हित में आया है। उन्होंने इसे न्याय, सत्य और संघर्ष के साथ-साथ प्रदेश के युवाओं की मेहनत और धैर्य की बड़ी जीत बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूरा आयोग हर कदम पर अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूती से खड़ा रहा और न्यायालय के समक्ष सभी तथ्यों व विधिक नियमों को बेहद प्रभावी ढंग से रखा, जिस पर देश की सर्वोच्च अदालत ने भी अपनी मुहर लगा दी है।
रैली में भीड़ और व्यवस्था पर फोकस, सिर्फ दो मंत्री मंच साझा करेंगे
15 Jul, 2026 09:48 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जींद। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी 17 जुलाई को होने वाली रैली को पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल (इको फ्रेंडली) बनाने के लिए बड़े पैमाने पर अनूठी पहल की जा रही है। प्रदूषण पर अंकुश लगाने और पेट्रोल-डीजल की खपत को सीमित करने के उद्देश्य से इस बार रैली स्थल पर भीड़ को काफी नियंत्रित रखा गया है। इस ऐतिहासिक आयोजन के दौरान मुख्य मंच पर प्रधानमंत्री के साथ हरियाणा सरकार के केवल दो कैबिनेट मंत्री ही मौजूद रहेंगे, जबकि मंत्रिमंडल के बाकी सदस्य और अन्य जिलों के लोग तकनीक के माध्यम से अपने-अपने मुख्यालयों से वर्चुअली इस कार्यक्रम का हिस्सा बनेंगे।
भीड़ को सीमित रखने और ईंधन बचाने का अनूठा मॉडल
इस विशेष आयोजन को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए सिर्फ 26 विधानसभा क्षेत्रों के लोगों को ही रैली स्थल पर आमंत्रित किया गया है, जबकि शेष जिलों के नागरिकों के लिए जिला मुख्यालयों पर बड़ी स्क्रीन लगाकर सीधे प्रसारण की व्यवस्था की गई है। पश्चिम एशिया के संकट के चलते उपजे हालातों के बीच प्रधानमंत्री की ईंधन बचत की अपील को अमलीजामा पहनाते हुए भाजपा ने कार्यकर्ताओं से पेट्रोल-डीजल वाहनों के बजाय साइकिल, पैदल या फिर साझा इलेक्ट्रिक और सीएनजी बसों से आने का आह्वान किया है। रैली स्थल पर सहकारिता मंत्री अरविंद शर्मा और समाज कल्याण मंत्री कृष्ण कुमार बेदी उपस्थित रहेंगे, जबकि अन्य सभी मंत्री अपने आवंटित जिलों में रहकर कार्यक्रम की कमान संभालेंगे।
वीआईपी डोम में हाई-टेक सुविधाएं और विशाल मंच तैयार
जींद में आयोजित होने वाली इस जनसभा के लिए एक विशाल और भव्य मुख्य मंच का निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया है, जिसकी चौड़ाई 36 फीट, लंबाई 96 फीट और ऊंचाई आठ फीट रखी गई है। पूरे रैली परिसर को वीआईपी, जनप्रतिनिधियों, मीडिया और आम जनता के लिए अलग-अलग गैलरियों में बांटा गया है, जहां लोगों की सहूलियत के लिए 22 बड़ी एलईडी स्क्रीन लगाई गई हैं। इसके अलावा, खास तौर पर तैयार किए गए वीआईपी क्षेत्र में लगभग 4000 लोगों के बैठने के लिए सोफे और भीषण गर्मी से राहत दिलाने के लिए शक्तिशाली एयर कंडीशनर भी स्थापित किए गए हैं।
यातायात प्रबंधन और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चार्जिंग हब
तैयारियों का जायजा लेने पहुंचे कैबिनेट मंत्री डॉ. अरविंद शर्मा और प्रधान मुख्य सचिव राजेश खुल्लर ने व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देते हुए नए बस स्टैंड के पास अतिरिक्त पार्किंग स्थल विकसित करने की योजना बनाई है। पर्यावरण अनुकूल परिवहन को सुचारू बनाने के लिए जींद और गोहाना बस स्टैंड पर हाई-पावर ई-व्हीकल चार्जिंग हब स्थापित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों पर 250-250 केवी की दो हाई-पावर चार्जिंग यूनिट लगाई जाएंगी, ताकि बाहर से आने वाली पर्यावरण अनुकूल इलेक्ट्रिक बसों को चार्जिंग में किसी भी प्रकार की असुविधा न हो।
देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन उद्घाटन के लिए तैयार
इस ऐतिहासिक रैली का सबसे बड़ा आकर्षण देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन बनने जा रही है, जो नई दिल्ली के शकूरबस्ती रेलवे वर्कशॉप से सफलतापूर्वक तकनीकी परीक्षण पूरा करने के बाद जींद जंक्शन पहुंच चुकी है। आगामी 17 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस अत्याधुनिक और पूरी तरह प्रदूषण मुक्त ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर देश को समर्पित करेंगे। इस खास अवसर के लिए ट्रेन को बेहद खूबसूरत और रंग-बिरंगे फूलों से सजाने की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और रेलवे के तकनीकी विशेषज्ञों की देखरेख में इसके सभी प्रणालियों का अंतिम राउंड का परीक्षण भी पूरा कर लिया गया है।
ईरान-अमेरिका तनाव के बीच खर्ग द्वीप चर्चा में, ट्रंप ने बताया पूरा प्लान
15 Jul, 2026 09:32 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुलासा किया है कि उन्होंने अमेरिकी सेना को विशेष रूप से निर्देश दिया था कि ईरान के रणनीतिक महत्व वाले खर्ग द्वीप पर स्थित तेल ठिकानों को निशाना न बनाया जाए। ट्रंप के अनुसार, तेल प्रतिष्ठानों पर किसी भी तरह का हमला वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से संकट में डाल सकता है। फॉक्स न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी सेना ने खर्ग द्वीप पर दो से तीन बार कार्रवाइयां की हैं, लेकिन वहां मौजूद तेल रिफाइनरियों और बुनियादी ढांचे को जानबूझकर सुरक्षित छोड़ दिया गया।
सीमित जमीनी सैन्य अभियान और द्वीप पर कब्जे की संभावना बरकरार
अमेरिकी राष्ट्रपति ने तेल ठिकानों को फिलहाल न छूने की बात तो कही, लेकिन उन्होंने भविष्य में इस द्वीप पर नियंत्रण करने या ईरान में सीमित जमीनी सैन्य कार्रवाई की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया। जब उनसे 1988 के उनके एक पुराने बयान के संदर्भ में खर्ग द्वीप पर कब्जे को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वे इस पर रणनीतिक कारणों से अभी कोई अंतिम टिप्पणी नहीं करेंगे। हालांकि, उन्होंने यह जरूर संकेत दिया कि यदि ईरानी सेना को और कमजोर किया गया, तो इस विकल्प पर विचार हो सकता है। जमीनी सेना उतारने के सवाल पर उन्होंने कहा कि कभी-कभी ऐसे अभियानों की आवश्यकता होती है, और अमेरिका के पास ऐसे सहयोगी या बल मौजूद हैं जो उनकी तरफ से मोर्चा संभाल सकते हैं।
ईरान में मची भारी तबाही और तेहरान की समझौता करने की इच्छा
ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों के कारण ईरान को इतना व्यापक नुकसान पहुंचा है कि उसे इस तबाही से उबरने में कम से कम 20 वर्ष का समय लग जाएगा। इसी बीच उन्होंने एक बड़ा दावा करते हुए कहा कि उनके इस साक्षात्कार से महज एक घंटे पहले ही ईरानी प्रतिनिधियों ने अमेरिकी अधिकारियों से संपर्क साधा था और वे अब समझौता करने के इच्छुक हैं। राष्ट्रपति ने तेहरान को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अमेरिकी सैन्य दबाव के आगे ईरान के पास बातचीत की मेज पर आने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है, और यदि वे अब भी मुकम्मल समझौता नहीं करते हैं, तो उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।
रूस से तेल खरीद पर ट्रंप नरम पड़े, 500% की जगह 100% शुल्क पर विचार
15 Jul, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन। अमेरिकी सीनेटरों ने मंगलवार को रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने वाले एक संशोधित विधेयक को सदन पटल पर रखा है। यह विधेयक पूर्व में दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम द्वारा समर्थित मूल प्रस्ताव का ही एक बदला हुआ रूप है, जिसमें वैश्विक आर्थिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए कुछ बड़े बदलाव किए गए हैं।
भारत और चीन को बड़ी राहत
इस नए संशोधित विधेयक के आने से भारत और चीन जैसे बड़े देशों को एक बड़ी कूटनीतिक राहत मिली है। मूल प्रस्ताव में रूसी तेल और गैस का आयात करने वाले देशों पर बेहद भारी टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने का प्रावधान था, जिसे इस नए संस्करण में काफी हद तक घटा दिया गया है।
वैश्विक तेल आयातकों पर घटेगा दबाव
विधेयक में किए गए इन सुधारों के बाद अब उन तमाम देशों पर से आर्थिक कार्रवाई का खतरा काफी कम हो गया है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से ईंधन खरीद रहे हैं। अमेरिकी सीनेटरों द्वारा उठाए गए इस कदम को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और आपूर्ति को संतुलित रखने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
PoK में हिंसा भड़की, पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी में 6 लोगों की मौत
14 Jul, 2026 05:25 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
रावलकोट: पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoK) के रावलकोट शहर से मानवाधिकारों के हनन और भारी नागरिक हिंसा की एक बेहद ही खौफनाक और बड़ी खबर सामने आ रही है। रावलकोट में पिछले कई दिनों से चल रहा आंतरिक गतिरोध और तनाव मंगलवार को उस समय चरम पर पहुंच गया, जब पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे आम नागरिकों पर बल प्रयोग करते हुए सीधी कार्रवाई शुरू कर दी।
प्रशासनिक दमन के विरोध में स्थानीय नागरिकों और सुरक्षा बलों के बीच शहर के नए बस टर्मिनल के समीप एक बार फिर हिंसक झड़पें शुरू हो गईं। इस दौरान स्थिति को नियंत्रित करने के नाम पर पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा बलों ने निहत्थे नागरिकों पर अंधाधुंध फायरिंग (गोलीबारी) कर दी। सेना की इस बर्बर कार्रवाई में 6 स्थानीय नागरिकों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई, जबकि दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। इस खूनी संघर्ष के बाद से पूरे रावलकोट और आसपास के जिलों में इस्लामाबाद प्रशासन के खिलाफ जनआक्रोश और नाराजगी सातवें आसमान पर पहुंच गई है।
मृतकों की हुई पहचान; बस टर्मिनल पर वाजिद हयात समेत चार युवाओं ने मौके पर ही तोड़ा दम
रावलकोट: स्थानीय सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों से मिली जानकारी के अनुसार, सुरक्षा बलों की सीधी गोलीबारी का शिकार हुए निर्दोष नागरिकों की शिनाख्त कर ली गई है:
मारे गए नागरिकों के नाम: इस हिंसक झड़प में जान गंवाने वाले प्रमुख लोगों में जाहिद मुगल, जफर मुगल, अर्सलान अकबर और वाजिद हयात शामिल हैं।
बस टर्मिनल पर बिछी लाशें: प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि वाजिद हयात को रावलकोट के मटियाल मीरा बस टर्मिनल के पास बेहद करीब से गोली मारी गई, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। इस ताजा और भयावह हिंसा ने पूरे क्षेत्र के सुरक्षा परिदृश्य को हिलाकर रख दिया है। स्थानीय लोग अपने परिजनों के शवों को सड़क पर रखकर पाकिस्तानी हुकूमत और सेना के जनविरोधी रवैये के खिलाफ उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं।
व्हाइट हाउस के बाहर गूंजी PoK के नागरिकों की आवाज; वाशिंगटन में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की मांग
रावलकोट: इस क्षेत्र में जारी दमन चक्र की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई देने लगी है। रावलकोट में हुई इस ताजा हिंसा से ठीक एक दिन पहले अमेरिका की राजधानी में एक बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला था:
अमेरिका में प्रदर्शन: अमेरिका में रह रहे पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) समुदाय के प्रवासी लोग बड़ी संख्या में वाशिंगटन डीसी स्थित 'व्हाइट हाउस' (अमेरिकी राष्ट्रपति आवास) के बाहर एकत्रित हुए।
मानवीय संकट पर ध्यान खींचने का प्रयास: इस विरोध प्रदर्शन में महिलाओं, बुजुर्गों, बच्चों और समुदाय के शीर्ष नेताओं समेत लगभग 100 से अधिक लोग शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने हाथों में बैनर और तख्तियां लेकर PoK में पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जा रहे अत्याचारों और वहां तेजी से बिगड़ते गंभीर मानवीय संकट (Humanitarian Crisis) की ओर वैश्विक महाशक्तियों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का ध्यान आकर्षित करने की पुरजोर मांग की।
नागरिक इलाकों से पाकिस्तानी सेना को हटाने की मांग; 40 लाख लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क कटा
रावलकोट: वाशिंगटन में प्रदर्शन कर रहे कश्मीरियों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों से पाकिस्तान सरकार पर कड़ा दबाव बनाने की मांग की है:
सेना की वापसी की मांग: प्रदर्शनकारियों ने संयुक्त राष्ट्र (UN) से अपील की है कि वे दखल देकर पाकिस्तानी सेना को तत्काल प्रभाव से PoK के सभी नागरिक और रिहायशी इलाकों से पूरी तरह बाहर खदेड़ें। उन्होंने निहत्थे और बेकसूर नागरिकों पर घातक हथियारों और सेना के बल प्रयोग के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की है।
डिजिटल ब्लैकआउट का मुद्दा: इसके साथ ही प्रदर्शनकारियों ने पिछले लंबे समय से इलाके में लागू इंटरनेट शटडाउन (डिजिटल ब्लैकआउट) का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। उनका दावा है कि इंटरनेट और संचार माध्यम पूरी तरह ठप होने के कारण PoK की लगभग 40 लाख की आबादी पूरी तरह से बाहरी दुनिया से कट गई है, जिससे वहां की वास्तविक स्थिति दुनिया के सामने नहीं आ पा रही है।
स्थानीय नागरिकों ने भारत सरकार से लगाई गुहार; कहा—जान बचाने और मानवीय मदद के लिए आगे आए नई दिल्ली
रावलकोट: इस चरमपंथ और सैन्य दमन के बीच PoK के स्थानीय नागरिकों का धैर्य पूरी तरह से टूट चुका है, जिसके बाद उन्होंने एक बेहद ही ऐतिहासिक और अनोखी अपील जारी की है:
भारत से दखल की उम्मीद: रावलकोट और आसपास के पीड़ित स्थानीय नागरिकों ने सीधे तौर पर भारत सरकार से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप (दखल) करने की भावुक गुहार लगाई है।
मांगी मानवीय सहायता: स्थानीय नेताओं और नागरिकों का कहना है कि पाकिस्तानी सेना उनके वजूद को मिटाने पर तुली है, ऐसे में केवल भारत ही उनकी जान बचा सकता है। उन्होंने नई दिल्ली से मांग की है कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के जरिए उनके पास जीवन रक्षक दवाएं, खाद्य सामग्री और मानवीय राहत पहुंचाई जाए ताकि उन्हें इस नरसंहार से बचाया जा सके। इस अपील के बाद से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है।
अमेरिकी C-ड्रोन बना ईरान के लिए नई चुनौती, हमलों से बढ़ी हलचल
14 Jul, 2026 04:52 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन: समुद्र की लहरों को चीरती हुई एक ऐसी खामोश आफत, जो पानी की सतह से सटकर बेहद तेजी से आगे बढ़ती है और जब तक दुश्मन के रडार को इसका अहसास होता है, तब तक तबाही मच चुकी होती है। अमेरिकी नौसेना ने रक्षा इतिहास में पहली बार युद्ध के मैदान में अपने जिस 'कोर्सेर सी-ड्रोन' को उतारा है, उसने आधुनिक नौसैनिक जंग की पूरी परिभाषा ही बदल दी है। लगभग 1,850 किलोमीटर की अचूक मारक क्षमता और 75 किलोमीटर प्रति घंटे की तूफानी रफ्तार से दौड़ने वाला यह मानवरहित आत्मघाती युद्धपोत समंदर में रोंगटे खड़े कर देने वाला हथियार है। ईरान के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले बंदर अब्बास नेवल बेस पर भीषण हमला कर इस सी-ड्रोन ने यह साबित कर दिया है कि अब विरोधी सेना का कोई भी बड़ा युद्धपोत या पनडुब्बी इससे सुरक्षित नहीं है।
रडार की पहुंच से दूर और एआई से लैस
यह ड्रोन आकार में बेहद छोटा है और इसका ढांचा पानी की सतह से बिल्कुल चिपककर आगे बढ़ता है, जिसकी वजह से दुश्मन के पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम और तटीय रडार इसे पकड़ने में पूरी तरह नाकाम रहते हैं। यह कोई साधारण जासूसी ड्रोन नहीं, बल्कि एक खतरनाक आत्मघाती हथियार है। इसके अगले हिस्से में 453 किलोग्राम तक के अत्यंत विनाशकारी विस्फोटक लोड किए जा सकते हैं, और यह सीधे दुश्मन के ठिकाने या युद्धपोत से टकराकर खुद को उड़ा लेता है। कोर्सेर ड्रोन में एडवांस्ड जीपीएस एंटी-जैमिंग तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल किया गया है। इसका फायदा यह है कि अगर दुश्मन इसके सिग्नल को ब्लॉक करने की कोशिश भी करे, तो भी यह अपने एआई कैमरों की मदद से लक्ष्य को ढूंढकर सटीक निशाना लगाने में सक्षम है।
यूक्रेन युद्ध से सीखकर बदली रणनीति
अमेरिकी नौसेना की 'टास्क फोर्स 59' द्वारा संचालित इस सी-ड्रोन का ईरान के सबमरीन बेस पर हमला करना वैश्विक सैन्य इतिहास में एक बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। अब तक समुद्री जंग में करोड़ों डॉलर के गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर या लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल होता था, जिसमें पायलटों की जान का जोखिम भी रहता था। लेकिन अमेरिका ने यूक्रेन युद्ध के अनुभवों से सीख लेते हुए अपनी रणनीति को पूरी तरह बदल दिया है। महज 35 से 50 हजार डॉलर की लागत वाले इस सी-ड्रोन ने बिना किसी अमेरिकी सैनिक की जान खतरे में डाले ईरान की करोड़ों डॉलर की पनडुब्बी मरम्मत सुविधा (सबमरीन मेंटेनेंस फैसिलिटी) को पूरी तरह तबाह कर दिया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में नया काल
होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) जैसे बेहद संकरे और संवेदनशील समुद्री रास्तों में, जहां बड़े युद्धपोतों को मोड़ना और बचाना बेहद मुश्किल होता है, वहां यह ड्रोन विरोधी नौसेना के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है। इसकी बिल्कुल शांत गति और अचूक मारक क्षमता इसे ऐसे सामरिक महत्व वाले क्षेत्रों में सबसे प्रभावी और घातक हथियार बनाती है।
कतर का रणनीतिक एयरबेस बना टकराव का केंद्र, ईरान ने साधा अमेरिकी ठिकाने पर निशाना
14 Jul, 2026 03:48 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दोहा: पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीदों को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। कुछ समय पहले तक ईरान और अमेरिका के बीच हुए युद्धविराम समझौतों से ऐसा लग रहा था कि इस अशांत क्षेत्र में परिस्थितियां सुधर रही हैं। वैश्विक व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से मालवाहक जहाजों का आवागमन भी सुचारू रूप से शुरू हो चुका था, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों ने राहत की सांस ली थी। लेकिन हाल ही में होर्मुज क्षेत्र में जहाजों को निशाना बनाकर किए गए हमलों ने पूरे परिदृश्य को अचानक पलट दिया है। इन हमलों का शिकार होने वाले जहाजों में कतर का एक जहाज भी शामिल है, जिसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव और तीखी बयानबाजी का नया दौर शुरू हो गया है। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों को हैरान कर दिया है कि जो कतर दोनों महाशक्तियों के बीच सुलह कराने में जुटा था, वह अचानक इस विवाद के केंद्र में कैसे आ गया?
तनाव के केंद्र में अल-उदैद एयरबेस
सामरिक और रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि कतर के निशाने पर आने की सबसे बड़ी वजह वहां स्थित अल-उदैद एयरबेस है। यह सैन्य अड्डा पश्चिम एशिया में अमेरिकी सेना का सबसे विशाल और रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण ठिकाना है। अल-उदैद में ही अमेरिकी सेंट्रल कमांड का फॉरवर्ड हेडक्वार्टर और कंबाइंड एयर ऑपरेशन सेंटर (CAOC) काम करता है, जहां से पूरे खाड़ी और मध्य-पूर्व क्षेत्र की हवाई गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जाती है। इस एयरबेस पर हर समय हजारों अमेरिकी सैनिक मुस्तैद रहते हैं और यहां से दुनिया के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान, टोही ड्रोन और हवाई ईंधन भरने वाले टैंकर विमान उड़ान भरते हैं।
अमेरिका का अभेद्य सामरिक गढ़
कतर की राजधानी दोहा से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह सैन्य ठिकाना वाशिंगटन के लिए पूरे क्षेत्र की रीढ़ की हड्डी माना जाता है। इराक, सीरिया, जॉर्डन, मिस्र और समूचे खाड़ी देशों में अमेरिकी सेना जो भी ऑपरेशन्स चलाती है, उसकी कमान और तालमेल इसी केंद्र से नियंत्रित होता है। इतना ही नहीं, पूर्वी अफ्रीका से लेकर दक्षिण एशिया तक फैले एक व्यापक भूभाग में अमेरिकी हवाई ताकत का संचालन यहीं से किया जाता है। यही कारण है कि ईरान इस ठिकाने को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। 1996 में खाड़ी युद्ध के बाद बने इस एयरबेस ने 2003 के इराक युद्ध, अफगानिस्तान मिशन और आईएसआईएस के खिलाफ लड़ाइयों में बेहद निर्णायक भूमिका निभाई है। आज यह बेस अत्याधुनिक पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम और आधुनिक रडार प्रणालियों से लैस एक अभेद्य किला बन चुका है।
कूटनीति पर भारी पड़ता सैन्य ढांचा
हालांकि, कतर ने हमेशा एक निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का रास्ता खुला रखने की पुरजोर कोशिश की है। उसने क्षेत्रीय स्थिरता के लिए दोनों देशों को कई बार चर्चा के मंच पर लाया और युद्धविराम को अमली जामा पहनाने में भी मदद की। लेकिन इन कूटनीतिक प्रयासों के बाद भी ईरान की चिंताएं कम नहीं हुई हैं। तेहरान का मानना है कि उसके खिलाफ किसी भी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का मुख्य जरिया कतर की धरती पर बना यही एयरबेस बनेगा। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान का विरोध कतर से नहीं, बल्कि उसकी जमीन पर मौजूद उस अमेरिकी सैन्य तंत्र से है जो ईरान की सुरक्षा के लिए एक सीधी चुनौती बना हुआ है।
भीषण हीटवेव से यूरोप बेहाल, हजारों लोगों की गई जान
14 Jul, 2026 01:10 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लंदन/पेरिस: यूरोप में जून के आखिरी हफ्ते में पड़ी ऐतिहासिक और रिकॉर्ड-तोड़ गर्मी (हीटवेव) के विनाशकारी परिणाम अब इंसानी मौतों के भयावह आंकड़ों के रूप में सामने आ रहे हैं। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 22 से 28 जून के बीच कुल 27 यूरोपीय देशों में सामान्य से 10,650 अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि साल के इस समय इतनी बड़ी तादाद में मौतों का बढ़ना बिल्कुल असामान्य है, जिसका सीधा संबंध वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी और भीषण हीटवेव से है।
बुजुर्ग आबादी पर टूटा गर्मी का सबसे बड़ा कहर
साइंटिफिक डेटा और मेडिकल रिपोर्टों से साफ हुआ है कि इस भीषण गर्मी ने समाज के सबसे कमजोर वर्ग, यानी बुजुर्गों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया है।
कुल 10,650 अतिरिक्त मौतों में से 9,000 से अधिक मौतें 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के बुजुर्गों की हुईं।
चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक, अधिक उम्र में शरीर अत्यधिक तापमान को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं होता।
यदि बुजुर्ग पहले से ही हृदय रोग (दिल की बीमारी) या सांस संबंधी समस्याओं (अस्थमा आदि) से पीड़ित हैं, तो जानलेवा गर्मी उनके स्वास्थ्य जोखिम को कई गुना बढ़ा देती है। इन आंकड़ों में सीधे लू लगने (हीट स्ट्रोक) के साथ-साथ गर्मी के कारण पैदा हुईं अन्य शारीरिक जटिलताओं से हुई मौतें भी शामिल हैं।
जलवायु परिवर्तन और अभूतपूर्व तापमान बने वजह
वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण अब हीटवेव न सिर्फ समय से पहले आ रही हैं, बल्कि उनकी तीव्रता और मारक क्षमता भी खतरनाक स्तर तक बढ़ गई है। जून के अंतिम सप्ताह में फ्रांस, स्पेन, ब्रिटेन (यूके) और बेल्जियम सहित कई यूरोपीय देशों में पारा ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया था। इस दौरान कई देशों में बिजली ग्रिड फेल हो गए, स्कूलों को एहतियातन बंद करना पड़ा और सरकारों को नागरिकों के लिए 'रेड अलर्ट' जारी कर घरों में रहने की सख्त हिदायत देनी पड़ी थी।
आठ हफ्तों की राहत के बाद अचानक आया 'डेथ स्पाइक'
इस हीटवेव के आने से ठीक पहले तक के आंकड़े काफी सामान्य थे। लगातार आठ हफ्तों से इन 27 यूरोपीय देशों में मृत्यु दर का औसत सामान्य से करीब 500 मौतें प्रति सप्ताह कम चल रहा था। लेकिन जून के आखिरी हफ्ते में आए इस अचानक और नाटकीय बदलाव (डेथ स्पाइक) के पीछे हीटवेव के अलावा दूसरा कोई बड़ा कारण मौजूद नहीं था।
फ्रांस, बेल्जियम और ब्रिटेन में सबसे ज्यादा नुकसान
फ्रांस और बेल्जियम: जून के अंतिम दिनों में सबसे ज्यादा अतिरिक्त मौतें फ्रांस और बेल्जियम में देखी गईं। बेल्जियम के सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान के आधिकारिक बयान के मुताबिक, साल 2000 के बाद किसी हीटवेव के दौरान वहां पहली बार इतनी बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है।
इंग्लैंड और वेल्स: एक अन्य वैज्ञानिक अध्ययन के अनुमान के अनुसार, मई और जून की संयुक्त हीटवेव के दौरान केवल इंग्लैंड और वेल्स में ही करीब 2,700 लोगों की गर्मी जनित कारणों से मौत हुई। शोधकर्ताओं का दावा है कि इनमें से लगभग 42 प्रतिशत मौतों के लिए सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग के कारण बढ़ी अतिरिक्त तपिश जिम्मेदार थी।
फतेहाबाद बना हरियाणा का टॉपर, SIR डिजिटलाइजेशन में हासिल किया पहला स्थान
14 Jul, 2026 01:06 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कुरुक्षेत्र। हरियाणा में चुनाव आयोग की ओर से चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कार्य के अंतर्गत एन्यूमरेशन फॉर्मों के डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई है। इस बेहद महत्वपूर्ण चुनावी अभियान को पूरा करने का मंगलवार को आखिरी दिन है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में पूरे प्रदेश के भीतर कुल दो करोड़ छह लाख ५५ हजार ९२९ पंजीकृत मतदाता मौजूद हैं। हरियाणा चुनाव आयोग ने तत्परता दिखाते हुए अब तक इनमें से ८०.८७ प्रतिशत यानी कुल एक करोड़ ६७ लाख तीन हजार ९४४ मतदाताओं के डेटा का डिजिटाइजेशन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है, जबकि शेष १९.१३ प्रतिशत का कार्य अभी भी प्रक्रियाधीन है।
फतेहाबाद जिला अव्वल और साइबर सिटी गुरुग्राम प्रदर्शन में सबसे फिसड्डी
मतदाताओं के डेटा को डिजिटल रूप देने के इस महाअभियान में प्रदेश के अलग-अलग जिलों से बेहद मिश्रित परिणाम देखने को मिले हैं। इस पूरी प्रक्रिया में फतेहाबाद जिला पूरे प्रदेश में शीर्ष स्थान पर काबिज हुआ है, जहां की प्रशासनिक टीम ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए ९२.५४ प्रतिशत डिजिटाइजेशन का कार्य समय से पहले ही निपटा लिया है। इसके ठीक विपरीत, प्रदेश की आर्थिक राजधानी और सबसे हाईटेक माना जाने वाला गुरुग्राम जिला इस सूची में सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है, जहां कार्य की गति बेहद धीमी दर्ज की गई।
केवल दो ही जिले छू पाए नब्बे प्रतिशत कार्य का महत्वपूर्ण जादुई आंकड़ा
निर्वाचन विभाग से प्राप्त ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पूरे हरियाणा राज्य में केवल दो ही ऐसे जिले सामने आए हैं जहां का प्रशासनिक अमला ९० प्रतिशत से अधिक डिजिटाइजेशन के लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब हो सका है। बाकी के तमाम जिलों में काम की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं रही और वे इस आंकड़े से काफी पीछे रह गए। अंतिम दिन होने के कारण चुनाव आयोग के अधिकारियों ने उन क्षेत्रों में अतिरिक्त कर्मचारियों को तैनात किया है जहां का बैकलॉग बहुत ज्यादा है, ताकि समय सीमा के भीतर इस बड़े डेटाबेस को अपडेट किया जा सके।
अंतिम दिन बची हुई फाइलों को डिजिटल करने के लिए युद्ध स्तर पर काम शुरू
अंतिम तिथि की गंभीरता को देखते हुए राज्य चुनाव आयोग ने सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को कड़े निर्देश जारी किए हैं। बचे हुए करीब १९ फीसदी एन्यूमरेशन फॉर्मों को कंप्यूटर सिस्टम में फीड करने के लिए ब्लॉक और तहसील स्तर पर तकनीकी टीमों को युद्ध स्तर पर काम में लगा दिया गया है। अधिकारियों का मुख्य फोकस इस बात पर है कि डेटा एंट्री में किसी भी प्रकार की मानवीय भूल या तकनीकी खामी न रहे, क्योंकि इसी डिजिटल डेटा के आधार पर आगामी चुनावों की मुख्य वोटर लिस्ट को पूरी तरह से पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाया जाएगा।
त्रुटिहीन मतदाता सूची तैयार करने और फर्जीवाड़े को रोकने में मिलेगी मदद
चुनाव आयोग के वरिष्ठ विशेषज्ञों का मानना है कि इस विशेष गहन पुनरीक्षण कार्य और बड़े पैमाने पर किए जा रहे डिजिटाइजेशन से चुनावी प्रक्रिया में बहुत बड़ा सुधार आएगा। सभी फॉर्मों के डिजिटल हो जाने से मतदाता सूची में नाम दोहराए जाने, मृत व्यक्तियों के नाम शामिल रहने या फर्जी वोटरों जैसी तमाम गड़बड़ियों पर पूरी तरह से लगाम कसी जा सकेगी। इसके साथ ही, भविष्य में आम जनता के लिए अपनी वोटर आईडी में किसी भी प्रकार का ऑनलाइन संशोधन कराना या नया नाम जुड़वाना बेहद आसान और सुरक्षित हो जाएगा।
जिस युवा ताकत ने बालेन शाह को सत्ता दिलाई, वही अब बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ आंदोलन में उतरी
14 Jul, 2026 12:57 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
काठमांडू: नेपाल में राजनीतिक बदलाव के महज कुछ ही महीनों के भीतर प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार के सामने एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया है। सत्ता संभाले हुए अभी केवल 104 दिन ही हुए हैं कि वह युवा पीढ़ी (जेन-जेड), जिसने बालेन शाह को इस शीर्ष पद तक पहुँचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, अब उनके ही खिलाफ सड़कों पर उतर आई है। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार को गिराने में इसी युवा शक्ति का हाथ था, लेकिन अब बालेन सरकार के एक विवादास्पद फैसले ने इन युवाओं को आक्रोशित कर दिया है।
नदी किनारे की अवैध बस्तियों पर चला बुलडोजर
इस पूरे विवाद और जन-आक्रोश की मुख्य वजह काठमांडू में नदी के किनारों पर बसी अवैध बस्तियों को हटाने का सरकार का कड़ा अभियान है। दरअसल, बालेन शाह जब काठमांडू के मेयर थे, तभी से यह योजना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल थी। अब प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने पुलिस और सेना की तैनाती कर इन बस्तियों को तोड़ने की कार्रवाई शुरू कर दी है, जिसके तहत हजारों मकान ध्वस्त कर दिए गए हैं।
वैकल्पिक व्यवस्था न होने का आरोप: आंदोलनकारी जनता और युवाओं का सबसे बड़ा आरोप यह है कि सरकार ने इन बेघर हुए लोगों को पुनर्वासित करने (बसाने) के लिए कोई वैकल्पिक योजना नहीं बनाई।
बढ़ता आत्मदाह का सिलसिला: सरकार के इस बेरहम फैसले के विरोध में कई लोग आत्मदाह जैसा आत्मघाती कदम उठा रहे हैं। हाल ही में एक व्यक्ति ने इस अभियान के विरोध में खुद को आग लगा ली जिससे उसकी मौत हो गई। इसके अलावा अश्विन राउत और विवेक मंडल नाम के व्यक्तियों ने भी आत्मदाह का प्रयास किया है, जिससे जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है।
माइतीघर में प्रदर्शन और प्रमुख युवा नेताओं की गिरफ्तारी
नदी किनारे रहने वाले इन भूमिहीन लोगों (जिन्हें नेपाल में स्थानीय तौर पर 'कब्जेदार' कहा जाता है) के समर्थन में रविवार को काठमांडू के माइतीघर में एक विशाल विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था। इस आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने सख्त रुख अख्तियार किया है:
हिरासत में लिए गए आंदोलन के मुख्य चेहरे: पुलिस ने इस जेन-जेड आंदोलन की अगुआई कर रहे और बालेन शाह को सत्ता में लाने वाले प्रमुख युवा नेताओं, माजिद अंसारी और सरिश्मा थापा को हिरासत में ले लिया है।
पुलिस प्रताड़ना के आरोप: प्रदर्शनकारी युवाओं का आरोप है कि उन्हें न केवल गैर-कानूनी ढंग से गिरफ्तार किया जा रहा है, बल्कि पुलिस हिरासत में उनके साथ बर्बरता और मारपीट भी की जा रही है। इस कार्रवाई के दौरान युवा नेता माजिद अंसारी गंभीर रूप से चोटिल हो गए हैं और फिलहाल अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है।
नई सरकार के सामने अस्तित्व की बड़ी चुनौती
एक अनुमान के मुताबिक, काठमांडू घाटी में करीब 3,500 लोग ऐसी बस्तियों में सालों से गुजर-बसर कर रहे हैं। बिना किसी पूर्व इंतजाम के इतनी बड़ी आबादी को उजाड़े जाने से पैदा हुआ यह मानवीय संकट अब सीधे एक राजनीतिक संकट में बदल चुका है। बालेन शाह सरकार के लिए सबसे बड़ी विडंबना और चुनौती यही है कि आज उन्हें उसी युवा वर्ग के तीखे विरोध और नारेबाजी का सामना करना पड़ रहा है, जो कभी उनकी सबसे बड़ी ताकत हुआ करता था।
रसोई में धमाके से दहला इलाका, गैस सिलिंडर फटने पर ढही घर की दीवार
14 Jul, 2026 11:58 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अंबाला। रेलवे स्टेशन केसरी के समीप स्थित एक रिहायशी इलाके में मंगलवार को उस समय हड़कंप मच गया, जब एक मकान की रसोई में खाना गर्म करने के दौरान अचानक गैस सिलिंडर का पाइप फट गया। धमाका इतना जोरदार था कि रसोईघर समेत मकान की पक्की कंक्रीट की दीवार ताश के पत्तों की तरह भरभराकर ढह गई। इस बेहद दर्दनाक हादसे में घर में मौजूद एक युवक बुरी तरह आग की लपटों में घिर गया और गंभीर रूप से झुलस गया। हादसे के तुरंत बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
गैस रिसाव के कारण हुआ भीषण धमाका
प्रत्यक्षदर्शियों और परिजनों के अनुसार, रेलवे स्टेशन केसरी का निवासी दीपक कुमार दोपहर के समय काम से लौटकर खाना खाने के लिए अपने घर आया था। बंद रसोई घर में पहले से ही गैस लीक होने की वजह से भारी दबाव बना हुआ था, जिससे पूरा परिवार अनजान था। जैसे ही दीपक ने खाना गर्म करने के उद्देश्य से चूल्हा जलाने के लिए आग जलाई, वैसे ही हवा में फैली गैस ने पलक झपकते ही भीषण आग पकड़ ली। चंद ही सेकंड में सिलिंडर का पाइप एक भयंकर आवाज के साथ फट गया और देखते ही देखते कंक्रीट की मजबूत दीवारें और दरवाजे टूटकर दूर जा गिरे।
ग्रामीणों की मुस्तैदी से मलबे से निकाला गया बाहर
धमाके की गूंज इतनी तेज थी कि आसपास के लोग सहम गए और तुरंत घटनास्थल की तरफ भागे। ग्रामीणों ने अपनी जान जोखिम में डालकर मलबे और चारों तरफ फैले गहरे धुएं के बीच से झुलसी हुई हालत में तड़प रहे दीपक को कड़ी मशक्कत के बाद बाहर निकाला। स्थानीय लोगों ने बिना वक्त गंवाए घायल युवक को नजदीकी नागरिक अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने उसकी अत्यंत नाजुक हालत को देखते हुए प्राथमिक उपचार के बाद तुरंत चंडीगढ़ सेक्टर-32 अस्पताल के लिए रेफर कर दिया।
मां के बाहर जाते ही घट गई बड़ी अनहोनी
मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके आशियाने को देखकर घायल युवक के पिता पवन सिंह पूरी तरह टूट गए। उन्होंने रुंधे गले और नम आंखों से बताया कि हादसे के वक्त घर पर केवल वह और उनका बेटा दीपक ही मौजूद थे। दीपक की मां कुछ ही समय पहले अपनी नियमित दवाई लेने के लिए पास के एक डॉक्टर के पास गई थीं और उनके जाते ही यह भयानक हादसा घट गया। पीड़ित पिता ने बताया कि इस हादसे ने उनके हंसते-खेलते परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है।
प्रशासनिक मुस्तैदी और मामले की गहन जांच
हादसे की सूचना मिलते ही स्थानीय थाना पुलिस की टीम तुरंत मौके पर पहुंची और घटनास्थल का मुआयना किया। पुलिस ने सुरक्षा के लिहाज से प्रभावित हिस्से को अपने घेरे में ले लिया है ताकि कोई और अप्रिय घटना न हो। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती जांच में मामला रसोई गैस लीक होने और पाइप फटने का ही नजर आ रहा है, फिर भी घटना के तकनीकी कारणों का पता लगाने के लिए मामले की गहन तफ्तीश शुरू कर दी गई है।
डोनाल्ड ट्रंप बोले- सुरक्षा चाहिए तो देना होगा शुल्क
14 Jul, 2026 10:23 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच खाड़ी क्षेत्र में जारी सैन्य और कूटनीतिक गतिरोध एक नए मुकाम पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) की सुरक्षा के बदले आर्थिक भुगतान की मांग की है, तो वहीं ईरान ने अमेरिका को इस रणनीतिक जलमार्ग में किसी भी हस्तक्षेप के खिलाफ गंभीर अंजाम भुगतने की कड़ी चेतावनी दी है।
ट्रंप का बड़ा बयान: सुरक्षा के बदले चाहिए भुगतान
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक हालिया साक्षात्कार में साफ किया है कि अमेरिका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार है, लेकिन इसके बदले उसे उचित भुगतान (पेमेंट) मिलना चाहिए। ट्रंप ने दावा किया कि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर वर्तमान में पूरी तरह अमेरिका का नियंत्रण है और व्यापारिक आवाजाही जारी है। लंबे समय से इस क्षेत्र की सुरक्षा में अमेरिकी भूमिका का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इसकी लागत की भरपाई होनी चाहिए। इसके साथ ही ट्रंप ने ईरान को 'बुरे लोग' बताते हुए आरोप लगाया कि दोनों देशों के बीच हुआ पिछला समझौता ईरान ने ही तोड़ा था।
ईरान की जवाबी चेतावनी: अमेरिकी हस्तक्षेप पर होगा कड़ा प्रहार
अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान पर ईरान की शीर्ष संयुक्त सैन्य कमान ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया है। ईरानी सैन्य कमान ने स्पष्ट किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रबंधन में अमेरिका का कोई भी दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ईरान ने चेतावनी दी है कि उसकी अनुमति के बिना इस क्षेत्र में अमेरिका की किसी भी सैन्य गतिविधि का बेहद कड़ा जवाब दिया जाएगा। इसके साथ ही, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों को भी आगाह किया है कि यदि किसी ने भी इस मुद्दे पर अमेरिका का साथ दिया, तो उसे ईरान के खिलाफ सीधे युद्ध में शामिल माना जाएगा।
अमेरिकी ठिकानों पर रातभर बरसीं ईरानी मिसाइलें और ड्रोन
इस जुबानी जंग के बीच जमीन पर भी सैन्य टकराव तेज हो गया है। ईरान की 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) ने रविवार रात दक्षिणी ईरान पर हुए अमेरिकी हवाई हमलों का बदला लेने के लिए सोमवार तड़के एक बड़ा जवाबी हमला किया। आईआरजीसी ने जॉर्डन, बहरीन और कुवैत में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाते हुए ताबड़तोड़ मिसाइलें और ड्रोन दागे। ईरानी सेना का कहना है कि अमेरिका ने होर्मुज जलमार्ग में जहाजों पर हुए कथित हमलों का बहाना बनाकर दक्षिणी ईरान पर बमबारी की थी, जिसके जवाब में यह प्रतिशोधी कार्रवाई की गई है।
ब्रिटेन ने IRGC को घोषित किया आतंकी संगठन
इस बढ़ते सैन्य तनाव के बीच पश्चिमी देशों ने भी ईरान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ा दिया है। ब्रिटिश सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए ईरान की सबसे शक्तिशाली और विशिष्ट सैन्य शाखा 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) को आधिकारिक तौर पर एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है। ब्रिटेन के इस फैसले के बाद लंदन और तेहरान के बीच कूटनीतिक संबंध बेहद नाजुक मोड़ पर पहुंच गए हैं, जिससे पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में अस्थिरता और ज्यादा गहराने की आशंका है।
टाइफून से चीन बेहाल, उड़ीं गाड़ियां और जनजीवन ठप
14 Jul, 2026 09:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
बीजिंग/नई दिल्ली: चीन इस समय प्रकृति के भीषण प्रकोप का सामना कर रहा है। बेहद शक्तिशाली चक्रवाती तूफान 'बावी' ने देश के कई हिस्सों में ऐसी तबाही मचाई है कि प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं। मूसलाधार बारिश और बाढ़ के कारण लाखों लोगों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर शरण लेनी पड़ी है। सोशल मीडिया पर सामने आ रहे वीडियो में सड़कें नदियों में तब्दील नजर आ रही हैं और सड़कों पर खड़ी गाड़ियां खिलौनों की तरह पानी के तेज बहाव में बहती दिख रही हैं।
झेजियांग प्रांत में भारी तबाही, 20 लाख लोग बेघर
टाइफून बावी को इस साल चीन से टकराने वाला सबसे विनाशकारी तूफान माना जा रहा है। इसके चलते चीन के पूर्वी और तटीय इलाकों में भयंकर तबाही हुई है। अकेले झेजियांग प्रांत में सुरक्षा के लिहाज से 20 लाख से अधिक लोगों को उनके घरों से निकालकर सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट किया गया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि कई इलाकों में सड़कें दो मीटर से अधिक पानी में डूब चुकी हैं। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में लोग आवागमन के लिए तैरने या पैडल बोर्ड का सहारा लेने को मजबूर हैं।
सैकड़ों पेड़ उखड़े, जनजीवन पूरी तरह ठप
तूफान के साथ आई तेज हवाओं के कारण भारी नुकसान हुआ है। झेजियांग के युएकिंग तटीय शहर में ही लगभग 1300 से अधिक पेड़ धराशायी हो गए, जिनमें से 700 से ज्यादा पेड़ पूरी तरह से जड़ से उखड़ गए हैं। बाढ़ के खतरे को देखते हुए प्रभावित इलाकों में स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए हैं और सैकड़ों उड़ानों व ट्रेनों को रद्द करना पड़ा है। चीन की करीब 46 नदियां इस समय खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं, जिससे बाढ़ का संकट और गहरा गया है।
13 दिनों का सफर और कोरियाई प्रायद्वीप की ओर बढ़ता तूफान
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, टाइफून बावी की उत्पत्ति करीब 13 दिन पहले प्रशांत महासागर में हुई थी। यह इस साल एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे लंबे समय तक सक्रिय रहने वाला उष्णकटिबंधीय चक्रवात (ट्रॉपिकल साइक्लोन) बन गया है। हालांकि, राहत की बात यह है कि बावी अब थोड़ा कमजोर होकर एक सामान्य ट्रॉपिकल तूफान में बदल गया है। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि अब यह तूफान कोरियाई प्रायद्वीप की तरफ बढ़ रहा है, जिससे आगे के इलाकों में अपनी बची हुई नमी छोड़ने के कारण अभी और भीषण बारिश होने की आशंका बनी हुई है।
अमेरिकी कार्रवाई के बाद ब्रेंट क्रूड 84 डॉलर प्रति बैरल पहुंचा
14 Jul, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तेहरान/दुबई: मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ा सैन्य टकराव अब बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी हवाई हमलों के जवाब में ईरान ने बहरीन स्थित अमेरिकी नौसैनिक अड्डे और होर्मुज जलडमरूमध्य में दो तेल टैंकरों को निशाना बनाया है। इस भीषण संघर्ष में एक भारतीय नाविक की मौत हो गई है, जबकि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अचानक आसमान छूने लगी हैं।
अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर ईरान का बड़ा हमला
ईरान के विशिष्ट सैन्य संगठन 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) ने दावा किया है कि उसने बहरीन में तैनात अमेरिकी नौसेना की फिफ्थ फ्लीट के मुख्यालय को मिसाइलों और ड्रोनों से निशाना बनाया है। ईरानी सेना के अनुसार, इस हमले में अमेरिकी सैन्य अड्डे के ईंधन डिपो में भीषण आग लग गई। इसके अलावा, पैट्रियट वायु रक्षा प्रणाली के रडार, एयर कंट्रोल रडार, सी-रैम (C-RAM) अर्ली वार्निंग सिस्टम और मानव रहित जहाजों के नियंत्रण केंद्र को भारी नुकसान पहुंचा है। ईरान ने इसे अमेरिका के हमलों का करारा जवाब बताया है, हालांकि अमेरिकी प्रशासन और बहरीन ने अभी तक इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
होर्मुज जलमार्ग में तेल टैंकरों पर हमला, भारतीय नाविक की मौत
इस तनाव के बीच ईरान ने होर्मुज जलमार्ग से गुजर रहे संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के दो बड़े तेल टैंकरों 'मोम्बासा' और 'बहिया' पर क्रूज मिसाइलें दाग दीं। हमले के बाद दोनों जहाजों में भयंकर आग लग गई। संयुक्त अरब अमीरात के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस हमले में मोम्बासा जहाज पर तैनात एक भारतीय चालक दल के सदस्य की मौत हो गई, जबकि चार भारतीयों और दो यूक्रेनियनों सहित आठ अन्य नाविक गंभीर रूप से घायल हो गए। यूएई ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन बताया है और आत्मरक्षा में ईरान को उचित जवाब देने की चेतावनी दी है।
अमेरिकी कार्रवाई और नाकेबंदी से भड़का विवाद
इस संघर्ष की शुरुआत मंगलवार तड़के तब हुई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी वायुसेना ने ईरान के सैन्य ठिकानों पर ताबड़तोड़ हवाई हमले किए। वाशिंगटन ने स्पष्ट किया कि वे होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के लिए दोबारा नाकेबंदी लागू कर रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अमेरिका बेहद आक्रामक रुख अपनाए हुए है और समुद्री सुरक्षा का खर्च अब इसका लाभ उठाने वाले अन्य देशों से वसूला जाएगा। अमेरिका की इस आक्रामक नाकेबंदी के तुरंत बाद ईरान ने पलटवार करते हुए यूएई और बहरीन की दिशा में हमले तेज कर दिए।
वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप, कीमतों में भारी उछाल
खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बनने से दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों में हड़कंप मच गया है। दुनिया के कुल कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के करीब 20 प्रतिशत हिस्से की आपूर्ति करने वाले इस समुद्री रास्ते में तनाव बढ़ने से ब्रेंट क्रूड की कीमतें दो प्रतिशत से अधिक बढ़कर 84 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जो एक महीने का उच्चतम स्तर है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है या होर्मुज जलमार्ग पूरी तरह बाधित होता है, तो वैश्विक स्तर पर ईंधन और माल ढुलाई महंगी होने से दुनिया भर में महंगाई का नया संकट खड़ा हो सकता है।
हादसे के बाद प्रशासन सख्त, सुपरवाइजर पर गिरी गाज और कंपनी हुई ब्लैकलिस्ट
