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जनता को बड़ी राहत, हरियाणा में 33 गृह सेवाएं अब समयबद्ध तरीके से मिलेंगी
18 Jun, 2026 12:16 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
चंडीगढ़। हरियाणा सरकार के गृह विभाग ने जनता को बड़ी राहत देते हुए अपनी 33 महत्वपूर्ण नागरिक सेवाओं को 'हरियाणा सेवा का अधिकार अधिनियम (राइट टू सर्विस एक्ट), 2014' के अंतर्गत शामिल कर लिया है। इस बड़े प्रशासनिक सुधार के बाद अब विभिन्न प्रकार के सरकारी लाइसेंस, पुलिस वेरिफिकेशन, अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) और प्रशासनिक अनुमतियों के लिए एक निश्चित समयावधि निर्धारित कर दी गई है। राज्य के मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी द्वारा इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी गई है, जिसके तहत तय समय-सीमा के भीतर संबंधित अधिकारियों को अनिवार्य रूप से काम पूरा करना होगा और ऐसा न होने पर नागरिकों को उच्चाधिकारियों के समक्ष शिकायत व अपील करने का कानूनी अधिकार होगा।
हथियार लाइसेंस और सार्वजनिक आयोजनों के लिए कड़े नियम
इस नई अधिसूचना के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के हथियार लाइसेंस की वैध अवधि समाप्त नहीं हुई है और उसने उसी गृह जिले में रिन्यूअल (नवीनीकरण) के लिए आवेदन किया है, तो प्रशासन को 15 दिनों के भीतर प्रक्रिया पूरी करनी होगी। वहीं, जिन मामलों में विस्तृत पुलिस वेरिफिकेशन या छानबीन की आवश्यकता होगी, वहां 22 दिनों का समय तय किया गया है। इसके अलावा लाइसेंस में नया हथियार दर्ज कराने या हटाने, शस्त्र खरीदने की स्वीकृत अवधि को आगे बढ़वाने तथा सार्वजनिक स्थानों पर धरना, प्रदर्शन, जुलूस अथवा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन की प्रशासनिक अनुमति देने जैसी आवश्यक सेवाएं मात्र 7 कार्यदिवसों के भीतर आवेदकों को उपलब्ध करानी होंगी।
विदेशी नागरिकों का पंजीकरण तत्काल और सत्यापन के लिए 5 से 21 दिन तय
पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से विदेशी नागरिकों के भारत आगमन तथा यहां से प्रस्थान की पंजीकरण प्रक्रिया को तत्काल (ऑन द स्पॉट) करने के निर्देश दिए गए हैं, साथ ही किसी भी प्राथमिकी (एफआईआर) या डीडीआर की प्रतिलिपि भी आवेदकों को तुरंत अथवा ऑनलाइन माध्यम से मुहैया कराई जाएगी। लाउडस्पीकर बजाने की मंजूरी, किसी भी मेले, प्रदर्शनी या खेल प्रतियोगिताओं के लिए एनओसी, अजनबियों के क्रेडेंशियल वेरिफिकेशन, विदेशी नागरिकों के आवासीय परमिट को विस्तार देने तथा पुराने वाहनों की एनओसी के लिए 5 दिनों की डेडलाइन तय की गई है। इसके उलट, घरेलू सहायकों, किरायेदारों, निजी कर्मचारियों के चरित्र सत्यापन, पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट (पीसीसी) और गुमशुदा संपत्तियों के कानूनी निपटारे से जुड़े मामलों को अधिकतम 21 दिनों में निष्पादित करना होगा।
व्यावसायिक एनओसी, सिनेमा लाइसेंस और ऑनलाइन शिकायतों की समय-सीमा
औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियों को सुगम बनाने के लिए पेट्रोल पंप तथा सिनेमा हॉल की स्थापना से जुड़ी एनओसी अब 15 दिनों में जारी की जाएगी, जबकि नया सिनेमा लाइसेंस देने के लिए 30 दिन और उसके नवीनीकरण के लिए 25 दिनों की अवधि तय हुई है। पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सामग्री नियमों के अंतर्गत मिलने वाली विभिन्न स्वीकृतियां, आतिशबाजी के भंडारण व क्रय-विक्रय की अनुमति तथा उनके लाइसेंस रिन्यूअल के लिए 30 दिनों की समय-सीमा निर्धारित की गई है। सबसे अंत में, विभिन्न ऑनलाइन शिकायतों के निवारण तथा निजी सुरक्षा एजेंसियों (प्राइवेट सिक्योरिटी फर्म) के आधिकारिक सत्यापन के लिए अधिकतम 60 दिनों का समय दिया गया है। सरकार ने इस पूरी व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए हर सेवा हेतु 'नामित अधिकारी' और 'शिकायत निवारण अधिकारी' नियुक्त कर दिए हैं ताकि जवाबदेही तय की जा सके।
फसल मुआवजे के लिए मांगी घूस, भिवानी में पटवारी ACB के जाल में फंसा
18 Jun, 2026 12:10 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भिवानी। हरियाणा के भिवानी जिले में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई को अंजाम देते हुए एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की टीम ने एक राजस्व पटवारी को 10 हजार रुपये की अवैध घूस लेते हुए रंगे हाथों दबोच लिया है। आरोपी राजस्व कर्मी एक पीड़ित किसान को उसकी नष्ट हुई फसल का सरकारी मुआवजा जारी करवाने के बदले में इस राशि की मांग कर रहा था। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की विशेष टीम ने नियुक्त ड्यूटी मजिस्ट्रेट की प्रत्यक्ष निगरानी में सुनियोजित तरीके से जाल बिछाकर आरोपी को रिश्वत की रकम के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार करने में सफलता पाई।
मुआवजा पास करने के लिए मोलभाव और सौदा
मामले के विवरण के अनुसार, भिवानी के गुजरानी क्षेत्र में पदस्थ पटवारी हर्ष छाबड़ा ने स्थानीय किसान मंजीत की फसल खराबे का मुआवजा स्वीकृत करने के एवज में शुरुआती तौर पर 15 हजार रुपये बतौर रिश्वत मांगे थे। पीड़ित किसान ने इस अवैध मांग के आगे घुटने टेकने के बजाय सतर्कता दिखाई और आरोपी से बातचीत कर मोलभाव किया, जिसके बाद अंततः यह सौदा 10 हजार रुपये में तय हो गया। इसके तुरंत बाद सजग किसान ने पूरे मामले की गोपनीय सूचना और शिकायत एंटी करप्शन ब्यूरो के अधिकारियों को दे दी।
भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज
शिकायत की सत्यता जांचने के बाद एसीबी की टीम ने योजनाबद्ध तरीके से रासायनिक पाउडर लगे नोट देकर किसान को पटवारी के पास भेजा। जैसे ही पटवारी ने रिश्वत के रुपये हाथ में लिए, पहले से घात लगाए बैठी विजिलेंस टीम ने उसे दबोच लिया और हाथ धुलवाने पर रासायनिक रंग के आधार पर अपराध प्रमाणित हो गया। ब्यूरो की टीम ने आरोपी पटवारी हर्ष छाबड़ा के विरुद्ध भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की विभिन्न संगीन धाराओं के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज कर लिया है।
अग्रिम कानूनी कार्रवाई और पूछताछ जारी
इस बड़ी धरपकड़ के बाद राजस्व विभाग के अन्य कर्मचारियों में हड़कंप मच गया है। एंटी करप्शन ब्यूरो और स्थानीय पुलिस की संयुक्त टीमें अब आरोपी को हिरासत में लेकर गहन पूछताछ कर रही हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या वह पूर्व में भी इस तरह के मामलों में संलिप्त रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, मामले में सभी आवश्यक दस्तावेजी साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं और जल्द ही आरोपी को सक्षम न्यायालय के समक्ष पेश कर आगामी रिमांड और विधिक प्रक्रिया अमल में लाई जाएगी।
चानौत जल विवाद: ग्रामीणों का विरोध तेज, पुलिस को बैरंग लौटना पड़ा
18 Jun, 2026 11:13 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हांसी। जिले के चानौत गांव में पेयजल संकट को लेकर चल रहा जन आंदोलन अब और तेज हो गया है। बुधवार की देर रात करीब ढाई बजे पुलिस प्रशासन ने एम्बुलेंस के साथ धरना स्थल पर पहुंचकर भूख हड़ताल पर बैठे बुजुर्गों को जबरन उठाने का प्रयास किया, लेकिन मुस्तैद ग्रामीणों के कड़े विरोध के चलते पुलिस टीम को खाली हाथ पीछे हटना पड़ा। इस प्रशासनिक कार्रवाई से नाराज ग्रामीणों ने विरोध स्वरूप आज ट्रैक्टर मार्च निकालकर जिला सचिवालय का घेराव करने का निर्णय लिया है, जिसकी तैयारियां गांव में युद्ध स्तर पर शुरू हो गई हैं।
अनशनकारी बुजुर्ग की हालत नाजुक और वार्ता विफल
गांव में स्वच्छ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए पिछले आठ दिनों से पांच बुजुर्ग आमरण अनशन पर डटे हुए हैं। इनमें से एक प्रदर्शनकारी टेकराम दुहन की सेहत लगातार गिर रही है और उनका शुगर लेवल चिंताजनक रूप से 36 तक पहुंच गया है, जिससे आंदोलनकारियों में प्रशासन के प्रति भारी रोष है। इस बीच बुधवार शाम को स्थानीय पीडब्ल्यूडी विश्राम गृह में कैबिनेट मंत्री रणबीर गंगवा और संघर्ष समिति के बीच करीब डेढ़ घंटे तक चली मैराथन बैठक बेनतीजा रही, क्योंकि दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े रहे और गतिरोध दूर नहीं हो सका।
भाखड़ा पाइपलाइन से कनेक्शन देने की मांग पर अड़े ग्रामीण
बैठक के दौरान आंदोलनकारी प्रतिनिधियों ने साफ किया कि वे गांव को शहर के लिए बिछाई जा रही भाखड़ा पेयजल पाइपलाइन से ही जोड़ने की अपनी पुरानी मांग पर कायम हैं। ग्रामीणों का तर्क है कि इस मुख्य लाइन में पानी का दबाव बेहतर रहेगा, जिससे बिना बिजली के भी जलघर को आसानी से भरा जा सकेगा और अतिरिक्त पानी आगे शहर की तरफ चला जाएगा। हालांकि, सरकार की ओर से गांव के लिए अलग से 8 इंच की नई पाइपलाइन डालने का जो प्रस्ताव दिया गया, उसे ग्रामीणों ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि केवल वर्तमान पाइपलाइन का व्यास (साइज) बढ़ाकर ही समस्या का त्वरित समाधान संभव है।
सरकार का आश्वासन और मुख्यमंत्री स्तर पर चर्चा का भरोसा
कैबिनेट मंत्री ने ग्रामीणों को समझाने का प्रयास करते हुए मामले को सुलझाने के लिए दो महीने का समय मांगा है और इस गंभीर विषय पर मुख्यमंत्री से बातचीत करने का भरोसा दिलाया है। सरकार का कहना है कि वे गांव में चौबीस घंटे जलापूर्ति का कनेक्शन देने, खारे पानी की समस्या से निजात के लिए नया वाटर टैंक बनाने और उसका टेंडर जल्द खोलने के लिए तैयार हैं। मंत्री ने अनशन पर बैठे बुजुर्गों के स्वास्थ्य का हवाला देते हुए उनसे आंदोलन समाप्त करने की भावुक अपील की है, लेकिन संघर्ष समिति ने मांग पूरी होने तक धरना स्थल से हटने से साफ मना कर दिया है।
ट्रंप-पेजेशकियन मुलाकात के बाद समझौते के दावे से मचा हड़कंप
18 Jun, 2026 11:05 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पेरिस: पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी सैन्य तनाव को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और बड़ा कदम उठाया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका-ईरान शांति समझौते के अंतरिम मसौदे (MoU) को अपनी मंजूरी देते हुए इस पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। एक अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारी के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने बुधवार शाम फ्रांस के ऐतिहासिक वर्साय पैलेस में आयोजित एक रात्रिभोज के दौरान इस दस्तावेज पर आधिकारिक रूप से दस्तखत किए।
इससे पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी पक्ष की ओर से मोहम्मद बाकेर गालिबाफ भी इस कूटनीतिक दस्तावेज पर अपनी सहमति दे चुके थे। दोनों शीर्ष राष्ट्रपतियों के हस्ताक्षरों के बाद अब यह शांति समझौता तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है। हालांकि, ईरान ने साफ किया है कि इस अंतरिम समझौते के बाद भी स्विट्जरलैंड के जेनेवा में दोनों देशों के बीच होने वाली आगामी बैठक अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ही आयोजित की जाएगी।
समझौते की वो 14 प्रमुख शर्तें जिन पर बनी सहमति
गोपनीयता के लंबे दौर के बाद अब इस महत्वपूर्ण समझौते का 14 सूत्रीय मसौदा सबके सामने आ चुका है, जिसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
युद्ध की तत्काल समाप्ति: अमेरिका, ईरान और इस जंग में शामिल उनके सभी सहयोगी देश लेबनान सहित तमाम मोर्चों पर अपने सैन्य अभियानों को तुरंत और स्थायी रूप से रोक देंगे।
संप्रभुता का सम्मान: दोनों देश अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का पूरा सम्मान करेंगे और आंतरिक मामलों में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
60 दिनों की समय-सीमा: दोनों देश इस अंतरिम समझौते के लागू होने के अधिकतम 60 दिनों के भीतर एक अंतिम और स्थायी समझौते पर पहुंचने के लिए बातचीत पूरी करेंगे। आपसी सहमति से इस अवधि को बढ़ाया भी जा सकेगा।
अमेरिकी नाकेबंदी का खात्मा: इस MoU पर दस्तखत होते ही अमेरिका ईरान पर लगाई गई अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगा और 30 दिनों के भीतर इसे पूरी तरह खत्म कर जहाजों की आवाजाही को युद्ध-पूर्व के स्तर पर बहाल कर देगा। अंतिम समझौते के 30 दिनों के भीतर अमेरिका आसपास के क्षेत्रों से अपनी सैन्य मौजूदगी भी हटाएगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य का संचालन: ईरान अगले 60 दिनों तक फारस की खाड़ी और ओमान सागर के बीच वाणिज्यिक (व्यापारिक) जहाजों को बिना किसी शुल्क के सुरक्षित मार्ग देगा। तकनीकी बाधाओं और समुद्री बारूदी सुरंगों को हटाकर 30 दिनों में यातायात सामान्य किया जाएगा। इसके भविष्य के प्रशासन को लेकर ईरान ओमान व अन्य तटीय देशों से बातचीत करेगा।
300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण फंड: अमेरिका अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के आर्थिक विकास और पुनर्निर्माण के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर का एक व्यापक प्लान तैयार करेगा। इसके लिए जरूरी वित्तीय लेनदेन, लाइसेंस और छूट अमेरिका द्वारा उपलब्ध कराई जाएगी।
प्रतिबंधों की पूरी तरह समाप्ति: अमेरिका अंतिम समझौते के तहत तय समय सारणी के अनुसार ईरान पर लगे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, आईएईए (IAEA) और अपने सभी एकतरफा प्राथमिक व द्वितीयक प्रतिबंधों को पूरी तरह समाप्त करने का वचन देता है।
परमाणु कार्यक्रम पर रोक: ईरान ने एक बार फिर दोहराया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। ईरान के पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम को आईएईए की देखरेख में वहीं नष्ट किया जाएगा और अंतिम फैसला होने तक वह अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे नहीं बढ़ाएगा।
यथास्थिति बनाए रखना: अंतिम और स्थायी समझौता होने तक दोनों देश मौजूदा स्थिति (स्टेटस को) बनाए रखेंगे; यानी ईरान परमाणु कार्यक्रम में बदलाव नहीं करेगा और अमेरिका कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा और न ही क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिक तैनात करेगा।
तेल निर्यात के लिए तत्काल छूट: जब तक प्रतिबंध पूरी तरह नहीं हट जाते, तब तक अमेरिकी वित्त मंत्रालय ईरानी कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात, बैंकिंग, बीमा और परिवहन सेवाओं के लिए तत्काल आवश्यक छूट (वेवर्स) जारी करेगा।
जब्त फंड की वापसी: अमेरिका द्वारा रोकी गई या जब्त की गई ईरान की संपत्तियों और फंड को वापस लौटाया जाएगा, जिसका उपयोग ईरान का केंद्रीय बैंक अपनी जरूरत के भुगतानों के लिए कर सकेगा।
कार्यकारी तंत्र की स्थापना: इस अंतरिम समझौते के सफल क्रियान्वयन और भविष्य के अंतिम समझौते की कड़ी निगरानी के लिए दोनों देश मिलकर एक संयुक्त कार्यकारी तंत्र का गठन करेंगे।
शेष मुद्दों पर विशेष वार्ता: युद्ध विराम, नाकेबंदी हटाने, तेल निर्यात और फंड जारी होने से जुड़े मुख्य नियमों के लागू होने के साथ ही दोनों देश बाकी बचे अन्य प्रावधानों पर अपनी विशेष वार्ता को जारी रखेंगे।
यूएन सुरक्षा परिषद की मुहर: इस पूरे शांति समझौते को और अधिक कानूनी व बाध्यकारी बनाने के लिए अंत में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के एक विशेष प्रस्ताव के माध्यम से वैश्विक समर्थन दिया जाएगा।
यूएई और जापान नेतृत्व से मुलाकात, भारत की रणनीतिक साझेदारी पर चर्चा
18 Jun, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
एवियन (फ्रांस): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस के एवियन शहर में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत कूटनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई है। सम्मेलन से इतर उन्होंने दुनिया के कई महत्वपूर्ण देशों के प्रमुखों के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय मुलाकातें कीं। इस दौरान पीएम मोदी ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर कीर स्टार्मर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ विशेष बैठकें कीं।
इसके अलावा, उन्होंने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग, जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची, केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी से भी मुलाकात कर आपसी और वैश्विक हितों से जुड़े गंभीर मुद्दों पर चर्चा की।
भारत और ब्रिटेन के बीच 'विजन 2035' पर प्रगति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर कीर स्टार्मर ने पिछले एक साल में दोनों देशों के बीच हुए उच्च स्तरीय दौरों के बाद आपसी संबंधों में आई तेजी की समीक्षा की। दोनों नेताओं ने रणनीतिक साझेदारी के रोडमैप यानी ‘विजन 2035’ के प्रमुख स्तंभों पर हुई प्रगति का स्वागत किया। इस विजन के तहत व्यापार, आर्थिक विकास, रक्षा और सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन पर कदम, हरित ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना शामिल है। दोनों नेताओं ने उम्मीद जताई कि भारत-ब्रिटेन के बीच व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते को जल्द ही लागू कर दिया जाएगा।
बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच शिक्षा क्षेत्र में हो रही प्रगति पर भी संतोष जताया गया। इसके तहत बेंगलुरु में यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल द्वारा अपना कैंपस स्थापित करने और मुंबई में यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क व यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के कैंपस खोलने की दिशा में हाल ही में हुए कदमों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया। इसके अतिरिक्त, दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया और यूक्रेन के हालातों सहित विभिन्न वैश्विक घटनाक्रमों पर भी अपनी राय साझा की।
भारत और यूएई के बीच रणनीतिक रिश्तों की समीक्षा
प्रधानमंत्री मोदी और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच इस साल यह तीसरी मुलाकात थी, जो दोनों देशों के गहरे और जीवंत संबंधों को दर्शाती है। दोनों नेताओं ने इस साल जनवरी में राष्ट्रपति अल नाहयान की भारत यात्रा और मई में प्रधानमंत्री मोदी की यूएई यात्रा के बाद डिफेंस, निवेश, टेक्नोलॉजी, ट्रेड और एनर्जी सेक्टर में हुए सकारात्मक द्विपक्षीय विकास की समीक्षा की।
इस चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम एशिया में लंबे समय तक शांति, सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए बातचीत, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन पर विशेष जोर दिया। इसके साथ ही दोनों देशों ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से वैश्विक व्यापार और समुद्री जहाजों की निर्बाध और सुरक्षित आवाजाही को निरंतर जारी रखने की वकालत की।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ मोदी और ट्रंप का खास पल
इस जी-7 समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक वीडियो इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में देखा जा सकता है कि जब समिट में हिस्सा ले रहे सभी वैश्विक नेता ग्रुप फोटो के लिए मंच की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, तब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने काफी गर्मजोशी के साथ पीएम मोदी की कलाई को हल्के से थाम लिया। काफी लंबे समय के बाद आमने-सामने मिले दोनों शीर्ष नेताओं के बीच की यह सहजता और करीबी कूटनीतिक गलियारों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी खूब सुर्खियां बटोर रही है।
G7 मीटिंग में खुलासा: मेलोनी बोलीं– सिगरेट से दूरी बनाए एक महीना पूरा
18 Jun, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पेरिस: युद्ध, व्यापार और वैश्विक सुरक्षा जैसे बड़े मुद्दों पर चर्चा के बीच जी7 समिट के दौरान एक बहुत ही हल्का-फुल्का और दिलचस्प पल देखने को मिला। फ्रांस के एवियन में विश्व के शीर्ष नेताओं की औपचारिक बैठकों से अलग जब कॉफी पर बातचीत चल रही थी, तब इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने एक निजी और मजेदार खुलासा किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने एक महीने पहले ही सिगरेट पीना छोड़ दिया है।
इस अनौपचारिक बातचीत के दौरान मेलोनी के साथ जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर मौजूद थे। सभी नेता एक घेरा बनाकर खड़े थे और इसी बीच यह मजेदार वाकया हुआ।
चाय-कॉफी की चर्चा और मेलोनी का संकल्प
काफी गंभीर मुद्दों पर मंथन के बीच जब सभी नेता आपस में बातचीत कर रहे थे, तब जॉर्जिया मेलोनी ने कहा कि उन्हें कॉफी की जरूरत है। इस पर चुटकी लेते हुए जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने मुस्कुराकर पूछा, ‘और सिगरेट?’ मेलोनी ने तुरंत जवाब दिया, ‘मैंने छोड़ दी।’ यह सुनते ही वहां खड़े सभी वैश्विक नेताओं ने उनके इस फैसले की सराहना की और 'बहुत बढ़िया' कहकर उनका हौसला बढ़ाया। इसके बाद जब नेताओं ने मजाकिया लहजे में पूछा कि क्या उन्होंने कल ही सिगरेट छोड़ी है, तो मेलोनी ने हंसते हुए साफ किया कि उन्हें सिगरेट छोड़े पूरा एक महीना हो चुका है।
बाकी नेताओं ने भी साझा किए अपने पुराने अनुभव
मेलोनी की बात सुनकर वहां मौजूद अन्य नेताओं ने भी धूम्रपान छोड़ने के अपने पुराने अनुभव साझा करने शुरू कर दिए। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा से कौतूहलवश पूछा कि उन्होंने सिगरेट पीना कब बंद किया था। इस पर कोस्टा ने बताया कि उन्होंने साल 2005 में ही इसे अलविदा कह दिया था। जब स्टार्मर ने दोबारा पूछा कि क्या उसके बाद उन्होंने कभी सिगरेट को हाथ भी नहीं लगाया, तो कोस्टा ने गर्व से जवाब दिया कि पिछले 21 सालों से उन्होंने कभी दोबारा सिगरेट नहीं पी। नेताओं के बीच हुई यह मजेदार और अनौपचारिक बातचीत वहां लगे माइक्रोफोन में रिकॉर्ड हो गई, जो अब हर तरफ चर्चा का विषय बनी हुई है।
ईरान के राष्ट्रपति पजशकियान ने डिजिटल दस्तखत से समझौता किया
18 Jun, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पेरिस: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे सैन्य टकराव को समाप्त करने के लिए एक अंतरिम समझौते (MoU) पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ ऐतिहासिक वर्साय पैलेस में मुलाकात के दौरान इस अहम दस्तावेज पर दस्तखत किए। इसके तुरंत बाद, ईरान के राष्ट्रपति पजशकियान ने भी डिजिटल (इलेक्ट्रॉनिक) माध्यम से इस समझौते को अपनी मंजूरी दे दी। भारतीय समयानुसार गुरुवार सुबह 5 बजे इस फैसले की घोषणा होते ही यह शांति समझौता प्रभावी हो गया है।
इस ऐतिहासिक समझौते के तहत ईरान और लेबनान में जारी युद्ध को पूरी तरह रोका जाएगा। साथ ही, रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा यातायात के लिए खोलने और ईरान पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को हटाने पर भी सहमति बनी है। पहले यह हस्ताक्षर 19 जून को जेनेवा के लूसर्न शहर में होने थे, लेकिन इसे तय समय से एक दिन पहले ही फ्रांस में अंजाम दे दिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम से जुड़ी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
समझौते की प्रमुख शर्तें और वैश्विक प्रतिक्रियाएं
अंतरिम समझौते के लीक हुए मसौदे के मुताबिक, दोनों देशों के बीच कुल 14 बिंदुओं पर सहमति बनी है। इनमें युद्ध विराम, तेल निर्यात को फिर से शुरू करना, प्रतिबंधों में ढील और ईरान के फ्रीज किए गए फंड को जारी करना शामिल है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने इस कदम का स्वागत करते हुए सभी पक्षों से युद्धविराम का पूरी तरह पालन करने की अपील की है, साथ ही चीन ने ईरान और लेबनान को मानवीय मदद देने की घोषणा भी की है।
दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका ने अपने सभी लक्ष्य पूरे कर लिए हैं, जिसमें ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना और होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाना शामिल था। हालांकि, उन्होंने कड़ी चेतावनी भी दी कि अगर ईरान ने शर्तों का उल्लंघन किया, तो उस पर दोबारा बमबारी की जा सकती है। वहीं, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ईरान को कोई सीधी आर्थिक मदद या पैकेज नहीं दे रहा है, बल्कि शर्तें मानने पर अन्य देशों को वहां निवेश की अनुमति दी जाएगी।
ऐतिहासिक वर्साय पैलेस का महत्व
जिस वर्साय पैलेस में इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं, वह फ्रांस की राजधानी पेरिस के पास स्थित है और दुनिया के सबसे भव्य महलों में गिना जाता है। 1623 में किंग लुई 13वें के एक छोटे से शिकार लॉज के रूप में शुरू हुए इस स्थान को उनके बेटे लुई 14वें ने एक विशाल और आलीशान महल का रूप दे दिया। साल 1682 से लेकर 1789 की फ्रांसीसी क्रांति तक यह महल फ्रांस की सत्ता का मुख्य केंद्र रहा।
यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल इस महल में करीब 2,300 कमरे हैं, जिनमें से 357 शीशों से बना 'हॉल ऑफ मिरर्स' सबसे प्रसिद्ध है। इतिहास में भी इस महल का बड़ा महत्व रहा है; 1919 में प्रथम विश्व युद्ध को समाप्त करने वाली प्रसिद्ध 'वर्साय की संधि' पर भी यहीं हस्ताक्षर किए गए थे। आज यह महल एक म्यूजियम और बेहद लोकप्रिय टूरिस्ट स्पॉट है।
बाजार पर असर और ईरान के भीतर उठते सवाल
शांति समझौते की खबर आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। होर्मुज स्ट्रेट के खुलने से वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति बढ़ने की संभावना मजबूत हुई है, जिससे ब्रेंट क्रूड गिरकर 78.66 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी तेल (WTI) 75.81 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है, जो पिछले महीने 125 डॉलर के पार चल रहा था।
इस बीच, इस समझौते को लेकर ईरान के भीतर से विरोध के सुर भी उठने लगे हैं। ईरानी सांसद मालेक शरियती ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दावों पर अविश्वास जताते हुए कहा कि अमेरिका के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए केवल हस्ताक्षरों को गारंटी नहीं माना जा सकता। उन्होंने सोशल मीडिया पर समझौते तोड़ने वालों से जुड़ी एक धार्मिक आयत भी साझा की, जिससे साफ है कि ईरान का एक राजनीतिक वर्ग इस समझौते को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है।
“मोदी कूल और स्ट्रॉन्ग लीडर हैं”— Donald Trump का बयान वायरल
18 Jun, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
एवियन (फ्रांस): फ्रांस के एवियन शहर में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान कई बड़े वैश्विक मुद्दों पर बातचीत हुई, लेकिन इस बैठक का एक बेहद दिलचस्प पहलू अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर की गई तारीफ रहा। सम्मेलन के कार्यकारी लंच के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने पीएम मोदी को एक शांत, संतुलित और बेहद दमदार ('काल्म, कूल और टोटल किलर') नेता बताया। अपने खास अंदाज में चुटकी लेते हुए ट्रंप ने यह भी कहा कि वे खुद पीएम मोदी की तरह शांत स्वभाव के नहीं हैं, जिसे सुनकर वहां मौजूद सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष मुस्कुरा उठे। इस हल्के-फुल्की बातचीत की चर्चा अब सोशल मीडिया पर भी खूब सुर्खियां बटोर रही है।
लंबे समय बाद दोनों दिग्गजों की सीधी मुलाकात
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बुधवार, 17 जून 2026 को जी-7 समिट से अलग एक विशेष द्विपक्षीय बैठक हुई। दोनों वैश्विक नेताओं के बीच आमने-सामने की यह मुलाकात पूरे 16 महीनों के लंबे अंतराल के बाद हुई है, जिसके चलते इसे कूटनीतिक रूप से बेहद खास माना जा रहा है। इस अहम बैठक में भारत और अमेरिका के आपसी रिश्तों को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए दोनों नेताओं ने काफी विस्तार से बातचीत की।
इन बड़े मुद्दों पर केंद्रित रही बातचीत
इस महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने के लिए कई गंभीर और जरूरी विषयों पर चर्चा की गई। इसमें दोनों देशों की आर्थिक प्रगति की रफ्तार तेज करने, रक्षा क्षेत्र में आपसी तालमेल को और मजबूत बनाने और व्यापारिक रिश्तों को बेहतर करने पर जोर दिया गया। इसके साथ ही सुरक्षित वैश्विक सप्लाई चेन के निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में साझेदारी बढ़ाने और आपसी निवेश को बढ़ावा देने जैसे भविष्य के मुद्दों पर भी सहमति बनाने की कोशिश की गई। वर्तमान वैश्विक हालातों को देखते हुए पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियों पर भी दोनों नेताओं ने गहराई से अपने विचार साझा किए।
बैठक के दौरान दिखी दोनों नेताओं की करीबी
इससे पहले मंगलवार, 16 जून 2026 को जी-7 समिट के आउटरीच सेशन के दौरान भी दोनों नेताओं की गर्मजोशी देखने को मिली थी। वर्किंग सेशन की शुरुआत होने से ठीक पहले पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप ने बड़े उत्साह के साथ एक-दूसरे से हाथ मिलाया और उनके बीच कुछ देर तक अनौपचारिक बातचीत भी हुई। सम्मेलन के मुख्य सत्र के दौरान भी दोनों नेता एक-दूसरे के बिल्कुल बगल वाली सीट पर बैठे नजर आए, जो भारत और अमेरिका के बीच के मजबूत रिश्तों और दोनों नेताओं की आपसी समझ को साफ तौर पर बयां करता है।
‘समझौता पक्का नहीं’—US-Iran डील पर ट्रंप की चेतावनी से बढ़ा तनाव
17 Jun, 2026 07:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के मध्य हाल ही में संपन्न हुए कूटनीतिक समझौते पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए ईरान को बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी है। राष्ट्रपति ट्रंप ने दो टूक कहा कि दोनों पक्षों के बीच हुआ यह समझौता अभी अंतिम या स्थायी नहीं है, और यदि तेहरान ने तय की गई शर्तों का उल्लंघन किया तो वाशिंगटन दोबारा सैन्य बल का प्रयोग करने से कतई पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप के इस तल्ख बयान ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि दोनों शक्तिशाली देशों के बीच पनपा भू-राजनीतिक तनाव अभी पूरी तरह से शांत नहीं हुआ है।
सैन्य कार्रवाई की खुली चेतावनी और समझौते के स्वरूप पर संशय
जब व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति ट्रंप से यह सवाल पूछा गया कि क्या इस कूटनीतिक सहमति को अंतिम माना जाए, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में इनकार करते हुए कहा कि यह अंतिम निर्णय नहीं है। उन्होंने तकनीकी रूप से साफ किया कि वर्तमान दस्तावेज महज एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) के रूप में है। ट्रंप ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि यदि आगामी दिनों में उन्हें ईरान का रवैया या इस समझौते की स्थितियां पसंद नहीं आईं, तो अमेरिकी सेना फिर से उन पर गोलाबारी शुरू कर देगी और उनके ठिकानों पर बम बरसाए जाएंगे। उन्होंने बार-बार इस बात को दोहराया कि शर्तों के पालन में जरा सी भी कोताही होने पर अमेरिका सैन्य कार्रवाई का विकल्प दोबारा चुन सकता है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ ईरान के लिए एक सीधी सैन्य धमकी मान रहे हैं।
वैश्विक तेल बाजारों को राहत और होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने दावों में इस समझौते को वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से बेहद मजबूत और असरदार बताया। उन्होंने कहा कि भले ही इस समझौते के आंतरिक तकनीकी पहलुओं की पूरी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं है, लेकिन यह एक बेहद कड़ा सौदा है। ट्रंप के अनुसार, इस कूटनीतिक प्रगति से सबसे ज्यादा राहत वैश्विक व्यापारिक बाजारों को मिली है। उन्होंने घोषणा की कि व्यापार के लिहाज से दुनिया के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शुमार 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) अगले एक-दो दिनों के भीतर वाणिज्यिक जहाजों के लिए पूरी तरह से बहाल हो जाएगा। इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर सामान्य स्थिति लौटने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला और कच्चे तेल के बाजारों को बहुत बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
पुनर्निर्माण के लिए वित्तीय सहायता से इनकार और पूर्व ओबामा प्रशासन पर प्रहार
वैश्विक मीडिया में चल रही उन खबरों को राष्ट्रपति ट्रंप ने सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें दावा किया जा रहा था कि इस शांति समझौते के एवज में ईरान को देश के पुनर्निर्माण के लिए करीब 300 अरब डॉलर की भारी-भरकम आर्थिक मदद दी जा सकती है। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ईरान को 10 सेंट की वित्तीय सहायता भी नहीं देने जा रहा है और न ही वहां कोई अमेरिकी निवेश किया जाएगा। खाड़ी देशों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वे अन्य अरब देशों पर ईरान में निवेश के लिए कोई दबाव नहीं बना रहे हैं, लेकिन यदि वे अपनी मर्जी से ऐसा करना चाहें तो अमेरिका को कोई आपत्ति नहीं होगी। इसी दौरान, फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के मंच से ट्रंप ने वर्ष 2015 के ऐतिहासिक ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) को लेकर पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा पर बेहद तीखा हमला बोला। उन्होंने आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करते हुए आरोप लगाया कि ओबामा प्रशासन ने तब एक समझौते को जबरन थोपने के लिए ईरान को बोइंग 757 विमान से 1.7 अरब डॉलर की नकद राशि भेजकर एक तरह से रिश्वत दी थी, जबकि वर्तमान प्रशासन ने बिना कोई पैसा दिए ईरान को कड़े समझौते की मेज पर आने के लिए मजबूर किया है।
G7 Summit में पीएम मोदी का स्पष्ट संदेश, विकास की परिभाषा बदलने की जरूरत पर जोर
17 Jun, 2026 06:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
एवियन। फ्रांस के सुरम्य शहर एवियन में आयोजित प्रतिष्ठित जी7 शिखर सम्मेलन के विशेष आउटरीच सत्र के मंच से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर समावेशी और टिकाऊ आर्थिक तरक्की का मुद्दा बेहद पुरजोर तरीके से उठाया। ‘सभी के लिए संतुलित, साझा और सतत आर्थिक विकास’ के मुख्य विषय पर अंतरराष्ट्रीय राष्ट्राध्यक्षों को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया कि आधुनिक दौर में तरक्की की परिभाषा को केवल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर या विदेशी व्यापार के शुष्क आंकड़ों के तराजू में नहीं तोला जा सकता। उन्होंने वैश्विक नेताओं के समक्ष यक्ष प्रश्न रखते हुए कहा कि आज असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि आर्थिक विकास की गति कितनी तेज है, बल्कि व्यापक विमर्श इस बात पर होना चाहिए कि यह विकास समाज के किस तबके के लिए, किसके सहयोग से और किस कल्याणकारी दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री ने वैश्विक मंच पर भारत के स्वदेशी प्रोग्रेस मॉडल का उदाहरण देते हुए उसे पूरी तरह समावेशी, लोकतांत्रिक और जनभागीदारी की अटूट शक्ति पर आधारित बताया, जो 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास' के मूल राष्ट्रीय मंत्र से निर्देशित है।
वैश्विक गलियारों से साझा विकास का दृष्टिकोण और पश्चिम एशिया संकट की चिंताएं
प्रधानमंत्री ने अपने व्याख्यान में कहा कि भारत ने अपनी जी20 अध्यक्षता के ऐतिहासिक कार्यकाल और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) जैसी दूरगामी रणनीतिक पहलों के माध्यम से हमेशा साझा वैश्विक प्रगति के अनूठे दृष्टिकोण को दुनिया के सामने अमलीजामा पहनाया है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि सामूहिक और साझा प्रयास ही आम जनमानस की आकांक्षाओं को धरातल पर हकीकत में तब्दील कर सकते हैं। इसके साथ ही, उन्होंने पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में उपजे गंभीर भू-राजनीतिक संकट और युद्ध के हालातों पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। पीएम मोदी ने सचेत किया कि इस तनाव के चलते वैश्विक ईंधन, कृषि उर्वरक और खाद्य सामग्री की आपूर्ति श्रृंखलाओं (सप्लाई चेन) में जो बड़ी बाधाएं आई हैं, उनका सबसे घातक और दीर्घकालिक दुष्प्रभाव 'ग्लोबल साउथ' के विकासशील और गरीब देशों पर पड़ेगा। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से आह्वान किया कि इन वैश्विक संकटों का सबसे ज्यादा आर्थिक बोझ दुनिया के सबसे कमजोर और लाचार मुल्कों के कंधों पर अकेले नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सुधारों की वकालत और 'इम्पैक्ट' कनेक्टिविटी परियोजना का बड़ा प्रस्ताव
दुनिया की आर्थिक नीतियों को नई दिशा देने की मांग करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री ने वैश्विक वित्तीय संस्थाओं और बैंकों से विशेष अपील की कि वे तत्काल प्रभाव से ऐसे सुरक्षात्मक और सहयोगी तंत्र का निर्माण करें, जिससे विकासशील अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक मंदी या अचानक लगने वाले आर्थिक झटकों का दृढ़ता से सामना कर सकें और अपनी आंतरिक वित्तीय मजबूती को बरकरार रख सकें। इसी कड़ी में, उन्होंने ऐतिहासिक आईएमईसी (IMEC) परियोजना की तर्ज पर ही अफ्रीका महाद्वीप, लैटिन अमेरिका और प्रशांत महासागरीय द्वीपीय देशों के विकास को गति देने के लिए एक नई और महात्वाकांक्षी कनेक्टिविटी परियोजना का खाका पेश किया। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि यदि जी7 देशों की अकूत पूंजी (इन्वेस्टमेंट), भारत की अद्वितीय तकनीकी प्रतिभा और ग्लोबल साउथ के देशों के प्रचुर संसाधनों व रणनीतिक भागीदारी को एक साथ मिला दिया जाए, तो "इंटरनेशनल मोबिलाइजेशन पार्टनरशिप फॉर एक्सेलेरेटिंग कनेक्टिविटी एंड ट्रेड" यानी 'इम्पैक्ट' (IMPACT) जैसी एक अभूतपूर्व और क्रांतिकारी वैश्विक पहल की शुरुआत की जा सकती है।
'ग्लोबल स्किल्स पार्टनरशिप' का दूरदर्शी विजन और युवा जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ
अपने ऐतिहासिक संबोधन के समापन सत्र में प्रधानमंत्री ने दुनिया के सामने एक अत्यंत महत्वपूर्ण 'ग्लोबल स्किल्स पार्टनरशिप' (वैश्विक कौशल साझेदारी) स्थापित करने का एक अनूठा और व्यावहारिक विजन प्रस्तुत किया। उन्होंने वैश्विक जनसांख्यिकीय असंतुलन की हकीकत को बयां करते हुए कहा कि आज जहां दुनिया के अधिकांश विकसित देश अपनी कार्यशील आबादी के बूढ़े होने और कार्यबल (वर्कफोर्स) की भारी कमी की गंभीर चुनौती से जूझ रहे हैं, वहीं इसके ठीक विपरीत भारत और ग्लोबल साउथ के अन्य सहयोगी देशों के पास ऊर्जावान युवा प्रतिभाओं, तकनीकी कौशल और उद्यमशीलता (आंत्रप्रेन्योरशिप) का एक विशाल और अटूट महासागर मौजूद है। उन्होंने विश्व बिरादरी को प्रेरित किया कि इस प्रचुर युवा जनसांख्यिकीय क्षमता का सही दिशा में तालमेल बिठाकर वैश्विक अर्थव्यवस्था के सतत विकास और मानव कल्याण के लिए सामूहिक रूप से बेहतरीन उपयोग किया जा सकता है।
चीन की बड़ी जल परियोजना से दक्षिण एशिया में हलचल, ब्रह्मपुत्र पर संकट
17 Jun, 2026 03:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तिब्बत। तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन द्वारा दुनिया के सबसे बड़े जलविद्युत बांध का निर्माण शुरू करने से भारत की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। यह विशाल परियोजना भारतीय सीमा के बेहद करीब स्थित है, जिसका सीधा असर भारत में बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी के जल प्रवाह पर पड़ सकता है। भू-राजनीतिक और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस बांध का पूरा नियंत्रण चीन के हाथों में रहा, तो निचले इलाकों में पानी के प्रबंधन, पर्यावरण और खेतीबाड़ी के सामने बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
क्यों अहम है यह नदी और भारत पर क्या होगा असर?
यारलुंग त्सांगपो नदी तिब्बत के पहाड़ों से निकलकर भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, जहां इसे 'सियांग नदी' कहा जाता है। इसके बाद यही नदी असम में पहुंचकर 'ब्रह्मपुत्र' का विशाल रूप ले लेती है। पूर्वोत्तर भारत के करोड़ों लोगों की आजीविका, खेती, मछली पालन और पीने का पानी इसी नदी पर निर्भर है। ऐसे में अगर चीन नदी के ऊपरी हिस्से में कोई भी बड़ा बदलाव करता है, तो उसका सीधा नुकसान भारत के इन राज्यों को भुगतना पड़ेगा।
चीन के दावे और विशेषज्ञों की चिंता
इस परियोजना को लेकर चीन का दावा है कि इसका मुख्य उद्देश्य सिर्फ स्वच्छ ऊर्जा (बिजली) का उत्पादन करना और क्षेत्र का विकास करना है। बीजिंग का कहना है कि वे इस बात का पूरा ध्यान रखेंगे कि पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे। हालांकि, भारतीय नीति विश्लेषक और विशेषज्ञ इस दावे को शक की नजर से देख रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े बांध से नदी का प्राकृतिक बहाव पूरी तरह प्रभावित होगा। सबसे बड़ा डर यह है कि चीन जब चाहेगा पानी को रोक सकेगा या अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ सकेगा, जिससे अरुणाचल और असम में सूखे या अचानक भयानक बाढ़ आने का खतरा हमेशा बना रहेगा।
भारत सरकार का रुख और कूटनीतिक प्रयास
भारत सरकार इस पूरे घटनाक्रम और सीमा पार हो रही चीनी गतिविधियों पर लगातार नजर रखे हुए है। सरकार ने संसद में भी साफ किया है कि भारत की सुरक्षा और हितों से समझौता नहीं किया जाएगा। भारत ने विभिन्न कूटनीतिक मंचों के जरिए चीन के सामने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया है। नई दिल्ली ने चीन पर दबाव बनाया है कि वह सीमा पार नदी परियोजनाओं में पूरी पारदर्शिता बरते, समय पर पानी से जुड़ा डेटा साझा करे और किसी भी बड़े निर्माण से पहले भारत को इसकी पूर्व सूचना दे ताकि भविष्य के किसी भी खतरे से निपटा जा सके।
अंतरराष्ट्रीय एयर एक्सरसाइज में दिखेगी संयुक्त सैन्य ताकत
17 Jun, 2026 01:07 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
डार्विन (ऑस्ट्रेलिया): अगले महीने 20 जुलाई से 7 अगस्त 2026 के बीच ऑस्ट्रेलिया के नॉर्दर्न टेरिटरी में बड़े पैमाने पर बहुराष्ट्रीय वायुसेना अभ्यास ‘एक्सरसाइज पिच ब्लैक’ का आयोजन किया जाएगा। रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स (आरएएएफ) की मेजबानी में होने वाला यह अभ्यास वैश्विक सैन्य सहयोग और संयुक्त सैन्य संचालन क्षमताओं को और अधिक मजबूत बनाने के उद्देश्य से किया जा रहा है। तीन सप्ताह तक चलने वाले इस खास युद्धाभ्यास में इस साल 19 मित्र और साझेदार देशों के 100 से अधिक आधुनिक लड़ाकू विमान और हजारों वायु सैनिक हिस्सा लेंगे।
वैश्विक सुरक्षा और आपसी तालमेल पर जोर
‘पिच ब्लैक 2026’ का मुख्य उद्देश्य हिस्सा ले रहे सभी देशों की वायुसेनाओं के बीच आपसी तालमेल को बढ़ाना, रणनीतिक सहयोग को मजबूत करना और जटिल बहुराष्ट्रीय सैन्य अभियानों में प्रभावी समन्वय स्थापित करना है। अभ्यास कमांडर एयर कमोडोर मैट मैककॉर्मैक के अनुसार, यह अभ्यास चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में संयुक्त हवाई अभियानों के संचालन की क्षमता को बेहतर बनाने का एक बेहतरीन अवसर देता है। यह न केवल ऑस्ट्रेलिया बल्कि पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और तैयारियों के लिहाज से बेहद अहम है। इस युद्धाभ्यास में भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर सहित कुल 19 देश शामिल हो रहे हैं।
वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में ट्रेनिंग
यह प्रतिष्ठित हवाई अभ्यास हर दो साल में एक बार आयोजित किया जाता है, जिसे आरएएएफ की सबसे महत्वपूर्ण प्रशिक्षण गतिविधियों में गिना जाता है। इसका आयोजन दुनिया के सबसे बड़े सैन्य प्रशिक्षण क्षेत्रों में से एक में होता है, जिससे भागीदार देशों को वास्तविक युद्ध जैसी बेहद जटिल परिस्थितियों में अभ्यास करने का मौका मिलता है। इस दौरान बड़े पैमाने पर हवाई अभियानों की रणनीतिक योजना तैयार करने और आपातकालीन स्थितियों में तुरंत व सटीक निर्णय लेने की क्षमता पर विशेष ध्यान दिया जाता है, ताकि जरूरत पड़ने पर सभी साझेदार देश किसी भी वैश्विक संकट का मिलकर मुकाबला कर सकें।
ऐतिहासिक सफर और बढ़ता महत्व
‘पिच ब्लैक’ अभ्यास का इतिहास काफी समृद्ध और पुराना है, जिसकी शुरुआत 1960 और 1970 के दशक में ऑस्ट्रेलियाई वायुसेना द्वारा आयोजित कुछ बड़े अभ्यासों से हुई थी। पहली बार ‘पिच ब्लैक’ नाम का इस्तेमाल साल 1981 में किया गया था, जब इसे महज तीन दिवसीय हवाई रक्षा अभ्यास के रूप में शुरू किया गया था। साल 1983 में यह अभ्यास पहली बार डार्विन में बड़े पैमाने पर आयोजित हुआ, जिसमें अमेरिकी वायुसेना ने भी हिस्सा लिया था। 1974 में आए विनाशकारी चक्रवात 'ट्रेसी' के बाद डार्विन में आयोजित होने वाला यह पहला बड़ा सैन्य आयोजन था। तब से लेकर आज तक यह अभ्यास धीरे-धीरे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सैन्य मंच के रूप में विकसित हो चुका है।
रूसी तेल पर प्रतिबंधों को लेकर अमेरिका में नई बहस
17 Jun, 2026 01:07 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन: अमेरिका के दो शीर्ष डेमोक्रेटिक सीनेटरों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से रूसी तेल खरीद पर लगी पाबंदियों में दी जा रही छूट को आगे न बढ़ाने की पुरजोर अपील की है। सीनेटर जीन शाहीन और एलिजाबेथ वॉरेन ने एक साझा बयान जारी कर कहा है कि अब इस रियायत को जारी रखने का कोई तार्किक आधार नहीं है, क्योंकि ईरान के साथ युद्ध पूरी तरह समाप्त हो चुका है। उनका मानना है कि इस छूट की वजह से रूस को भारी वित्तीय फायदा हुआ है, जिसका इस्तेमाल वह यूक्रेन के खिलाफ अपनी अवैध जंग को जारी रखने के लिए कर रहा है।
मार्च में भारत को मिली थी विशेष छूट
गौरतलब है कि मार्च महीने में अमेरिका ने वैश्विक तेल बाजार को स्थिर करने के उद्देश्य से भारत को रूसी तेल खरीदने की विशेष अनुमति दी थी। यह फैसला 28 फरवरी को शुरू हुए ईरान युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए लिया गया था, जिसे बाद में कुछ अन्य देशों के लिए भी लागू किया गया। एक-एक महीने के लिए दी गई इस राहत अवधि को अब तक दो बार बढ़ाया जा चुका है, और इसकी अंतिम समय-सीमा 17 जून निर्धारित है। दोनों सीनेटर इसी समय-सीमा को आगे बढ़ाए जाने का कड़ा विरोध कर रहे हैं।
पुतिन को वित्तीय लाभ मिलने का विरोध
सीनेटरों ने अपने साझा बयान में स्पष्ट किया कि यदि इस लाइसेंस की अवधि को एक बार फिर बढ़ाया जाता है, तो यह रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को भारी मुनाफा कमाने का एक और मौका देने जैसा होगा, जबकि वह यूक्रेन के खिलाफ क्रूर और अमानवीय युद्ध लगातार जारी रखे हुए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इस छूट को आगे बढ़ाना ट्रंप के उस एलान के भी खिलाफ होगा जिसमें उन्होंने ईरान युद्ध के खत्म होने की बात कही थी। इसके साथ ही उन्होंने निशाना साधा कि तेल बाजार को स्थिर करने के ट्रंप के प्रयास पूरी तरह विफल रहे हैं, क्योंकि अमेरिकी जनता पहले से ही महंगाई का भारी बोझ झेल रही है।
ट्रंप प्रशासन को सख्त चेतावनी
सीनेट की विदेश संबंध समिति की वरिष्ठ सदस्य जीन शाहीन (न्यू हैम्पशायर) और बैंकिंग मामलों की समिति में वरिष्ठ पद पर तैनात एलिजाबेथ वॉरेन (मैसाचुसेट्स) ने ट्रंप प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि अब इस लाइसेंस को रिन्यू किया जाता है, तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत होगा कि राष्ट्रपति को खुद अपनी ही डील पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि यह कदम पिछले चार साल से जारी जंग और मासूमों की मौत के बावजूद रूसी राष्ट्रपति पुतिन के सामने घुटने टेकने जैसा माना जाएगा।
स्थायी शांति के लिए दबाव बनाने की नसीहत
बयान के अंत में सीनेटरों ने साफ तौर पर कहा कि इस छूट से सिर्फ हमलावर देश रूस को फायदा पहुंचा है। आज यूक्रेन अपनी आजादी के लिए पूरी ताकत से लड़ रहा है, जबकि रूस इस व्यापार से होने वाली कमाई का इस्तेमाल उसी के खिलाफ युद्ध में कर रहा है। उन्होंने राष्ट्रपति को नसीहत देते हुए कहा कि यदि अमेरिकी प्रशासन वास्तव में एक स्थायी शांति समझौता चाहता है, तो उसे पुतिन पर दबाव बनाना चाहिए, न कि प्रतिबंधों में ढील देकर उन्हें वित्तीय मजबूती देनी चाहिए। इस तरह कमजोरी दिखाने से पुतिन का हौसला और बढ़ेगा और युद्ध कभी खत्म नहीं हो पाएगा।
डोनाल्ड ट्रम्प की मौजूदगी में PM मोदी ने जताई चिंता
17 Jun, 2026 01:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
एवियन (फ्रांस): फ्रांस के एवियन शहर में आयोजित हो रहे जी7 शिखर सम्मेलन (G7 Summit 2026) के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक सुरक्षा और व्यापार से जुड़े बेहद संवेदनशील मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया है। हाई-लेवल वर्किंग सेशन को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने होर्मुज स्ट्रेट में संघर्ष के दौरान जान गंवाने वाले भारतीय नागरिकों का मुद्दा प्रमुखता से रखा। इस खास सत्र के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी मौजूद रहे और वह प्रधानमंत्री मोदी के ठीक बगल वाली सीट पर बैठे नजर आए।
समुद्री सुरक्षा और वैश्विक व्यापार पर चिंता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में साफ किया कि पश्चिम एशिया में हाल के दिनों में हुए संघर्षों का असर सिर्फ उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसने पूरी दुनिया के व्यापार और अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि इस तनाव की वजह से कई देशों के निर्दोष नागरिकों के साथ-साथ भारतीय नाविकों ने भी अपनी जान गंवाई है। पीएम मोदी ने जोर देकर कहा कि समुद्री व्यापार के जरिए दुनिया को जोड़ने वाले इन नाविकों की सुरक्षा करना हम सभी देशों की एक साझा जिम्मेदारी है। आज के समय में समुद्री मार्गों की सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करना दुनिया की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक होना चाहिए।
वैश्विक नेताओं के साथ महत्वपूर्ण बैठकें
शिखर सम्मेलन के पहले दिन प्रधानमंत्री मोदी काफी व्यस्त रहे और उन्होंने दुनिया के कई प्रभावशाली नेताओं के साथ द्विपक्षीय बातचीत की। पीएम मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE), केन्या, मिस्र, जापान और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रप्रमुखों के साथ अलग-अलग मुलाकातें कीं। इन बैठकों का मुख्य एजेंडा व्यापार, निवेश, अत्याधुनिक तकनीक और रणनीतिक सहयोग को बढ़ावा देना रहा। विशेष रूप से यूएई के राष्ट्रपति के साथ हुई मुलाकात में दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाने पर चर्चा हुई, जहां पीएम मोदी ने वहां रह रहे भारतीय समुदाय की देखभाल के लिए यूएई सरकार का आभार भी जताया। इसके अलावा जापान, दक्षिण कोरिया, केन्या और मिस्र के नेताओं के साथ भी आर्थिक और ऐतिहासिक साझेदारी को मजबूत करने पर सहमति बनी।
भरोसे की कमी और ग्लोबल साउथ की आवाज
इस सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई मुलाकात और बातचीत भी दुनिया भर की मीडिया में चर्चा का विषय बनी रही, जिसके बाद दोनों नेताओं के बीच एक द्विपक्षीय बैठक भी तय की गई है। अपने मुख्य संबोधन में पीएम मोदी ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर एक बड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आज दुनिया में संसाधनों की कोई कमी नहीं है, बल्कि 'भरोसे' की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी विकास तभी सार्थक है जब वह सीधे आम लोगों की जरूरतों और उनकी उम्मीदों से जुड़ा हो। इसके साथ ही उन्होंने 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील और गरीब देशों) की वकालत करते हुए कहा कि इन देशों को अब सिर्फ बाहरी मदद या समर्थन नहीं, बल्कि वैश्विक फैसलों में बराबरी की साझेदारी चाहिए।
अमेरिका की मांगों पर ईरान की असहमति, बातचीत में अड़चन
17 Jun, 2026 12:53 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध टालने के लिए एक समझौता तो हो गया है, लेकिन इस डील को लेकर अमेरिकी सरकार के भीतर ही पूरी तरह सहमति नहीं बन पाई है। खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) के डायरेक्टर जॉन रैटक्लिफ ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके वरिष्ठ अधिकारियों को इस समझौते पर कड़ी चेतावनी दी है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी एजेंसियों ने पाया है कि ईरानी अधिकारी आपस में इस डील को लेकर जो बातें कर रहे हैं, वह उस तस्वीर से बिल्कुल अलग है जो वे मध्यस्थ देशों और अमेरिका के सामने दिखा रहे हैं। इसी दोहरे रवैये के कारण ईरान की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
अमेरिकी प्रशासन में अंदरूनी मतभेद
सीआईए प्रमुख जॉन रैटक्लिफ ने राष्ट्रपति ट्रंप को साफ शब्दों में कहा है कि खुफिया जानकारी के मुताबिक, ईरान उन कड़े परमाणु प्रतिबंधों को मानने के मूड में नहीं है जिनकी मांग अमेरिका कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि ईरान के असली इरादे और समझौते के दौरान किए गए वादों में भारी अंतर दिखाई दे रहा है। इसी वजह से सीआईए के अलावा विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी बंद कमरे में हुई बैठकों में इस डील को लेकर अपनी गंभीर चिंता जताई है। इसके उलट, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ और जारेड कुशनर इस समझौते के समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं।
व्हाइट हाउस का रुख और अमेरिकी शर्तें
इस समझौते के आधिकारिक एलान से पहले राष्ट्रपति ट्रंप और उनके शीर्ष सलाहकारों के बीच कई दौर की उच्च स्तरीय बैठकें हुईं, जिनमें इस विवादित मुद्दे पर लंबी बहस हुई। हालांकि व्हाइट हाउस ने अधिकारियों द्वारा उठाई गई चिंताओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया है, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया है कि आखिरी फैसला सिर्फ राष्ट्रपति ट्रंप का ही होगा। सरकार के समर्थकों का दावा है कि यह डील अमेरिका की सभी मुख्य शर्तों (रेड लाइन्स) को पूरा करती है। इसके जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि ईरान कभी परमाणु हथियार न बना सके, अपने पास अत्यधिक संवर्धित (हाईली एनरिच्ड) यूरेनियम न रख पाए और दुनिया की ऊर्जा सप्लाई चेन को प्रभावित न कर सके।
फंड और जब्त संपत्ति पर फंसा पेंच
इस पूरे समझौते में सबसे विवादित हिस्सा ईरान की उन संपत्तियों का है जिन्हें अमेरिका ने फ्रीज (जब्त) कर रखा है। डील के तहत अमेरिका ईरान के इस पैसे को दोबारा इस्तेमाल के लिए जारी करने की दिशा में कदम बढ़ाएगा, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने यह शर्त रखी है कि यह पैसा ईरान को तभी मिलेगा जब वह जमीन पर अपने वादों को पूरा करके दिखाएगा। इसके अलावा, दस्तावेज में ईरान के आर्थिक विकास और पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर के एक बड़े फंड का भी प्रावधान रखा गया है, लेकिन इसके लिए शर्त यह होगी कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक व्यापक और अंतिम समझौते के लिए पूरी तरह तैयार हो।
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