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चीन ने अमेरिका को दी सख्त नसीहत: ताइवान पर गलत कदम पड़ा भारी
14 May, 2026 11:19 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
बीजिंग: अमेरिका और चीन के बीच ताइवान को लेकर जारी तल्खी एक बार फिर विश्व पटल पर खुलकर सामने आ गई है। बीजिंग के 'ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल' में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई द्विपक्षीय वार्ता के दौरान सीधी चेतावनी दी है। जिनपिंग ने दोटूक शब्दों में कहा कि ताइवान का मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों में सबसे अहम और संवेदनशील कड़ी है; यदि इसे सही तरीके से नहीं संभाला गया, तो अमेरिका और चीन के बीच सीधा टकराव या युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। 2017 के बाद ट्रंप का यह पहला चीन दौरा है, जिसे वैश्विक राजनीति में 'हाई-स्टेक समिट' के तौर पर देखा जा रहा है।
बंद कमरे में हुई गंभीर चर्चा और 'चार लाल रेखाएं'
चीनी सरकारी मीडिया शिन्हुआ के अनुसार, दोनों नेताओं के बीच करीब दो घंटे तक चली गोपनीय बातचीत में जिनपिंग ने ताइवान को लेकर चीन की कड़ाई को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि ताइवान का सवाल ही वह आधार है जिस पर दोनों देशों के संबंधों की स्थिरता टिकी है। इससे पहले चीनी दूतावास ने सोशल मीडिया पर चीन की 'चार लाल रेखाओं' का जिक्र कर अमेरिका को पहले ही आगाह कर दिया था। इन रेखाओं में ताइवान का सवाल, चीन की राजनीतिक व्यवस्था, मानवाधिकार और विकास का अधिकार शामिल हैं। चीन ने साफ किया है कि इन मुद्दों पर किसी भी तरह का बाहरी हस्तक्षेप या दबाव स्वीकार्य नहीं होगा।
ट्रंप की कूटनीति और 'थुसीडाइड्स ट्रैप' का जिक्र
एक ओर जहां जिनपिंग का लहजा सख्त रहा, वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने व्यक्तिगत स्तर पर गर्मजोशी दिखाने की कोशिश की। ट्रंप ने जिनपिंग को 'एक महान नेता' और 'पुराना मित्र' बताते हुए कहा कि वे 2026 को दोनों देशों के संबंधों के लिए एक ऐतिहासिक साल बनाना चाहते हैं। हालांकि, जिनपिंग ने उन्हें 'थुसीडाइड्स ट्रैप' (Thucydides Trap) के खतरे से आगाह किया—यह एक ऐसा सिद्धांत है जो कहता है कि जब एक उभरती हुई शक्ति किसी स्थापित महाशक्ति को चुनौती देती है, तो युद्ध की संभावना प्रबल हो जाती है। जिनपिंग ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों को प्रतिद्वंद्वी के बजाय भागीदार बनना चाहिए।
गार्ड ऑफ ऑनर और प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी
ट्रंप के स्वागत के लिए बीजिंग में भव्य आयोजन किया गया, जहां पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की ऑनर गार्ड बटालियन ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया। इस अहम बैठक में ट्रंप के साथ अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ जैसे शीर्ष अधिकारी भी मौजूद रहे। वार्ता में केवल ताइवान ही नहीं, बल्कि ईरान युद्ध के कारण उपजे वैश्विक ऊर्जा संकट, व्यापार टैरिफ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे जटिल मुद्दों पर भी चर्चा हुई। हालांकि, ट्रंप की इस यात्रा को प्रतीकात्मक रूप से सफल माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ताइवान पर चीन की यह चेतावनी आने वाले दिनों में वाशिंगटन की विदेश नीति के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगी।
ट्रंप चीन दौरे पर, इधर वेंस ने खुद की तुलना फिल्मी किरदार केविन से की
14 May, 2026 09:16 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन / बीजिंग:अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन की महत्वपूर्ण आधिकारिक यात्रा के बीच वॉशिंगटन में सत्ता का केंद्र 'वाइट हाउस' एक दिलचस्प वजह से चर्चा में है। राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में कार्यवाहक जिम्मेदारी संभाल रहे उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एक मजाकिया बयान देकर सबको लोटपोट कर दिया। वेंस ने वाइट हाउस में अपनी स्थिति की तुलना 1990 की मशहूर हॉलीवुड फिल्म 'होम अलोन' के बाल कलाकार मैकाले कल्किन (केविन) से की। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि राष्ट्रपति के बिना वाइट हाउस में ऐसा सन्नाटा पसरा है कि उन्हें खुद को केविन की तरह अकेला महसूस हो रहा है।
सुरक्षा प्रोटोकॉल और 'होम अलोन' वाली स्थिति
उपराष्ट्रपति वेंस ने पत्रकारों से हल्के-फुल्के अंदाज में बातचीत करते हुए बताया कि सुरक्षा और सीक्रेट सर्विस के कड़े प्रोटोकॉल के कारण राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति कभी भी एक साथ विदेश यात्रा नहीं कर सकते। अमेरिकी नियमों के तहत 'लाइन ऑफ सक्सेशन' (सत्ता के उत्तराधिकार) को सुरक्षित रखने के लिए यह अनिवार्य है कि दोनों शीर्ष नेताओं में से एक हमेशा देश के भीतर मौजूद रहे। वेंस ने हंसते हुए कहा, "जब मैं अकेले वाइट हाउस में दाखिल होता हूं, तो मुझे यह समझने में एक पल लगता है कि आखिर चल क्या रहा है।"
धोखाधड़ी के खिलाफ सख्त तेवर और फंडिंग की चेतावनी
हंसी-मजाक के बीच उपराष्ट्रपति वेंस ने प्रशासनिक गंभीरता भी दिखाई। 'एंटी-फ्रॉड टास्कफोर्स' का नेतृत्व कर रहे वेंस ने उन राज्यों को कड़ी चेतावनी दी है जो संदिग्ध धोखाधड़ी की जांच में ट्रंप प्रशासन का सहयोग नहीं कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट लहजे में कहा कि जो राज्य जांच में बाधा डालेंगे या सहयोग से पीछे हटेंगे, उनकी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं (Medicaid आदि) के लिए मिलने वाली 'फेडरल फंडिंग' रोकी जा सकती है। यह बयान दर्शाता है कि राष्ट्रपति की गैर-मौजूदगी में भी प्रशासन अपने कड़े फैसलों पर मुस्तैद है।
बीजिंग में ट्रंप-जिनपिंग की महावार्ता
दूसरी ओर, चीन की राजधानी बीजिंग में राष्ट्रपति ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच उच्च स्तरीय बैठकों का दौर जारी है। 'ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल' में ट्रंप का औपचारिक स्वागत किया गया, जहां दोनों नेताओं ने सलामी गारद का निरीक्षण किया। इस तीन दिवसीय यात्रा के दौरान व्यापारिक मतभेदों, टैरिफ और ईरान युद्ध जैसे गंभीर वैश्विक मुद्दों पर गहन चर्चा हो रही है। राष्ट्रपति ट्रंप के शनिवार तक वापस लौटने की उम्मीद है, तब तक वाशिंगटन की कमान 'होम अलोन' मोड में जेडी वेंस के पास ही रहेगी।
दिलजीत दोसांझ मैनेजर के घर फायरिंग: AAP ने BJP पर निशाना साधा
13 May, 2026 05:51 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
करनाल। हरियाणा के गोंदर गांव में मशहूर गायक दिलजीत दोसांझ के मैनेजर गुरप्रताप कांग के आवास पर कथित गोलीबारी का मामला गरमा गया है, जिसकी जिम्मेदारी सोशल मीडिया पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़े सदस्यों द्वारा लिए जाने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, स्थानीय पुलिस प्रशासन ने इस तरह की किसी भी हिंसक वारदात से पूरी तरह इनकार किया है और इसे केवल अफवाह करार दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर टायसन बिश्नोई और आरजू बिश्नोई के नाम से संचालित पेजों पर एक पोस्ट साझा की गई है, जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि मैनेजर के घर पर ऑस्ट्रिया-निर्मित हथियारों का इस्तेमाल कर फायरिंग की गई। पुलिस के मुताबिक, परिजनों से संपर्क करने पर उन्होंने भी ऐसी किसी घटना के होने की पुष्टि नहीं की है, जिसके चलते फिलहाल इस मामले में आधिकारिक तौर पर संशय बना हुआ है।
सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी और गैंगस्टरों की चेतावनी
इंटरनेट पर प्रसारित पोस्ट में लॉरेंस बिश्नोई गैंग के कथित गुर्गों ने दावा किया है कि यह फायरिंग केवल एक चेतावनी है और इसके पीछे मुख्य कारण दिलजीत दोसांझ की टीम पर लगाए गए गंभीर आरोप हैं। पोस्ट में उल्लेख किया गया है कि सिंगर के मैनेजर और उनकी टीम के कुछ सदस्यों को पूर्व में भी संदेश भेजे गए थे, जिनमें महिला कर्मचारियों के शोषण और फर्जी कार्यक्रमों के नाम पर धोखाधड़ी करने की बातें कही गई थीं। गैंग की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान पंजाब की एक युवती के साथ अभद्र व्यवहार किया गया था और बार-बार आगाह करने के बावजूद टीम में कोई बदलाव नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप कथित तौर पर इस हमले को अंजाम दिया गया।
पुलिस प्रशासन का पक्ष और वारदात का खंडन
निसिंग थाना पुलिस और स्थानीय अधिकारियों ने गोंदर गांव में किसी भी प्रकार की गोलीबारी की सूचना को सिरे से खारिज कर दिया है। थाना प्रभारी कृष्ण कुमार के अनुसार, न तो पुलिस के पास इस संबंध में कोई शिकायत दर्ज कराई गई है और न ही गांव में ऐसी किसी हलचल की जानकारी मिली है। पुलिस टीम ने मैनेजर के परिवार से भी चर्चा की है, जिसमें परिजनों ने स्पष्ट किया है कि उनके घर पर किसी ने भी गोलियां नहीं चलाई हैं। प्रशासन का मानना है कि सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही यह जानकारी भ्रामक हो सकती है और वे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किए जा रहे इन दावों की सत्यता की जांच करने में जुटे हैं ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और तीखी बयानबाजी
इस घटनाक्रम के सामने आते ही सियासी गलियारों में भी चर्चाएं तेज हो गई हैं और विपक्षी दलों ने सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनुराग ढांडा ने इस मामले को लेकर सत्ताधारी दल पर तीखा हमला बोलते हुए इसे पंजाब विरोधी मानसिकता का हिस्सा बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ समय पहले सिंगर को एक राजनीतिक प्रस्ताव दिया गया था और उसे ठुकराने के बाद इस तरह की डराने-धमकाने वाली गतिविधियां की जा रही हैं। उन्होंने गैंगस्टर और सत्ता के बीच कथित सांठगांठ की ओर इशारा करते हुए कहा कि इस तरह की घटनाओं के जरिए पंजाब से ताल्लुक रखने वाली हस्तियों को भयभीत करने का प्रयास किया जा रहा है।
जुड़वा बहनों की पहचान पर सवाल, पिता अलग होने की पुष्टि से हड़कंप
13 May, 2026 04:28 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लंदन: ब्रिटेन से चिकित्सा विज्ञान को हैरान कर देने वाला एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने जुड़वा बच्चों के जन्म से जुड़ी पुरानी धारणाओं को झकझोर कर रख दिया है। यहाँ 49 वर्षीय दो जुड़वा बहनों ने जब अपनी पहचान जानने के लिए डीएनए टेस्ट कराया, तो नतीजों ने सबको स्तब्ध कर दिया। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि एक ही कोख से एक साथ जन्म लेने के बावजूद दोनों बहनों के जैविक पिता अलग-अलग हैं। मेडिकल हिस्ट्री में इस तरह की घटना को अविश्वसनीय रूप से दुर्लभ माना जाता है, जिसने अब वैश्विक स्तर पर विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है।
संदेह से शुरू हुआ सच्चाई की खोज का सफर
मिशेल और लवीनिया ऑस्बॉर्न नाम की इन बहनों के मन में अपने मूल को लेकर लंबे समय से कुछ सवाल थे। मिशेल को अक्सर लगता था कि उनकी शारीरिक बनावट उस व्यक्ति से नहीं मिलती, जिन्हें वे अपना पिता मानती आ रही थीं। अपने इसी संदेह को मिटाने के लिए उन्होंने डीएनए किट का सहारा लिया, जिससे पता चला कि जेम्स उनके असली पिता नहीं थे। इसके बाद जब लवीनिया ने अपनी जाँच कराई, तो रहस्य और गहरा गया क्योंकि दोनों बहनों के डीएनए प्रोफाइल एक-दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खा रहे थे। अंततः यह प्रमाणित हो गया कि दोनों के पिता दो अलग-अलग व्यक्ति हैं।
क्या है हेटेरोपैटरनल सुपरफेकंडेशन की दुर्लभ प्रक्रिया
चिकित्सा जगत में इस असाधारण स्थिति को ‘हेटेरोपैटरनल सुपरफेकंडेशन’ के नाम से जाना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रक्रिया तब घटित होती है जब किसी महिला के मासिक चक्र के दौरान शरीर से दो अंडे निकलते हैं और वे बहुत ही कम समय के अंतराल में दो अलग-अलग पुरुषों के शुक्राणुओं द्वारा निषेचित हो जाते हैं। दुनिया भर के चिकित्सा इतिहास में अब तक ऐसे 20 से भी कम मामले आधिकारिक रूप से दर्ज किए गए हैं, और ब्रिटेन में वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित यह अपनी तरह का पहला मामला माना जा रहा है।
भावुक कर देने वाला अंत और अटूट रिश्ता
सच्चाई सामने आने का यह सफर भावनात्मक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण रहा क्योंकि वर्ष 2022 में जब ये नतीजे आए, उसी दौरान उनकी माँ का निधन हो गया। माँ ने इस रहस्य को पूरी जिंदगी अपने सीने में दबा कर रखा था। बाद में कड़ी मशक्कत के बाद मिशेल ने अपने जैविक पिता एलेक्स और लवीनिया ने अपने पिता आर्थर की पहचान सुनिश्चित की। इस चौंकाने वाले खुलासे के बावजूद दोनों बहनों के आपसी प्रेम में कोई कमी नहीं आई है। उनका मानना है कि वे किसी चमत्कार का हिस्सा हैं और इस सच्चाई ने उनके बीच के जुड़ाव को पहले से कहीं अधिक मजबूत बना दिया है।
क्या पाकिस्तान ने ईरानी विमानों को सुरक्षा दी? रिपोर्ट में दावा
13 May, 2026 04:26 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इस्लामाबाद/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक नया उबाल ला दिया है। हालिया चर्चाओं ने इस कयास को हवा दी है कि क्या पाकिस्तान आज से 53 साल पुराने उस एहसान का बदला चुका रहा है, जो ईरान ने 1971 के युद्ध के दौरान उस पर किया था। दावा किया जा रहा है कि ईरान ने अमेरिकी जवाबी कार्रवाई के डर से अपने सैन्य विमानों के बेड़े को पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर सुरक्षित ठिकाना दिया है। हालाँकि, पाकिस्तानी प्रशासन ने इन खबरों को पूरी तरह निराधार बताते हुए स्पष्ट किया है कि आबादी के बीच स्थित इस बेस पर विमानों को छिपाना तकनीकी रूप से असंभव है।
1971 का वो दौर जब ईरान बना था पाकिस्तान का रक्षक
यह वर्तमान स्थिति इतिहास के उन पन्नों को पलटती है जब 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान ईरान ने पाकिस्तान की ढाल बनकर मदद की थी। उस समय ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने संकट की घड़ी में पाकिस्तान के लिए अपने एयरबेस के दरवाजे खोल दिए थे। जब भारतीय वायुसेना की बमबारी से पाकिस्तानी विमानों पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा था, तब ईरान ने न केवल उन्हें शरण दी, बल्कि गुप्त रूप से ईंधन, गोला-बारूद और सैन्य हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति भी जारी रखी थी। आज की हलचल को इसी ऐतिहासिक कर्ज की अदायगी के रूप में देखा जा रहा है।
महाशक्तियों के बीच पाकिस्तान का खतरनाक कूटनीतिक संतुलन
ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान की स्थिति एक दोधारी तलवार पर चलने जैसी हो गई है। एक ओर पाकिस्तान चीन के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को गहरा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह अमेरिका के साथ अपने पुराने और तनावपूर्ण सैन्य संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश में जुटा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरानी विमानों को पनाह देने की बात में थोड़ी भी सच्चाई निकलती है, तो यह पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। रिपब्लिकन सांसद लिंडसे ग्राहम जैसे अमेरिकी नेताओं ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि ऐसी स्थिति में अमेरिका को पाकिस्तान की मध्यस्थ की भूमिका पर पुनर्विचार करना पड़ेगा।
विश्वसनीयता का संकट और बदलती वैश्विक राजनीति
आधी सदी के बाद आज कूटनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी संदेह की दीवार अभी भी ऊँची है। ओसामा बिन लादेन के मामले और चरमपंथी समूहों के इतिहास के कारण अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठान पाकिस्तान की हर हरकत को शक की निगाह से देखता है। वर्तमान में ईरान अमेरिका का कट्टर दुश्मन है और ऐसे में पाकिस्तान का कथित तौर पर ईरान की मदद करना उसे वैश्विक राजनीति के केंद्र में ला खड़ा करता है। इन दावों ने न केवल दक्षिण एशिया बल्कि मध्य पूर्व की राजनीति में भी नई हलचल पैदा कर दी है, जिससे आने वाले दिनों में कूटनीतिक टकराव बढ़ने के आसार हैं।
सिंगापुर में पर्यावरण और सुरक्षा नियम इतने सख्त, आम पर भी बड़ा जुर्माना
13 May, 2026 03:36 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सिंगापुर सिटी: सिंगापुर अपने कड़े अनुशासन और सार्वजनिक नियमों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन हाल ही में भारतीय मूल की एक महिला की सोशल मीडिया पोस्ट ने इन नियमों की गंभीरता को एक नए स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है। महिला ने चेतावनी देते हुए साझा किया कि इस शहर में सड़क किनारे लगे सरकारी पेड़ों से गिरा हुआ एक आम उठाना भी आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है। इस खुलासे ने न केवल पर्यटकों बल्कि दूसरे देशों में रह रहे लोगों को भी हैरान कर दिया है, क्योंकि वहां प्राकृतिक रूप से गिरे हुए फलों पर भी सरकार का पूर्ण अधिकार होता है।
सरकारी संपत्ति और फलों से जुड़े सख्त कानून
सिंगापुर के कानूनों के मुताबिक, सार्वजनिक स्थानों, पार्कों और सड़कों के किनारे लगे सभी फलदार पेड़ राज्य की संपत्ति माने जाते हैं। महिला ने स्पष्ट किया कि इन पेड़ों से फल तोड़ना तो दूर, जमीन पर गिरे हुए फल को बिना अनुमति उठाना भी अवैध कृत्य की श्रेणी में आता है। नियमों का उल्लंघन करने पर व्यक्ति को भारी आर्थिक दंड का सामना करना पड़ता है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि सार्वजनिक संसाधनों का प्रबंधन केवल अधिकृत संस्थाओं द्वारा ही किया जाए और शहर की व्यवस्था में किसी भी प्रकार का मानवीय हस्तक्षेप न हो।
भारी जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान
नियमों की सख्ती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सामान्य सार्वजनिक उद्यानों में बिना अनुमति फल उठाने पर 5,000 सिंगापुर डॉलर (लगभग 3.12 लाख रुपये से अधिक) तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वहीं, यदि कोई व्यक्ति किसी संरक्षित वन क्षेत्र या राष्ट्रीय उद्यान में ऐसी गतिविधि करते हुए पकड़ा जाता है, तो यह दंड और भी कठोर हो जाता है। ऐसी स्थिति में 50,000 सिंगापुर डॉलर तक का जुर्माना और साथ ही 6 महीने तक की जेल की सजा भुगतनी पड़ सकती है। यह कड़े प्रावधान ही सिंगापुर को दुनिया के सबसे अनुशासित देशों की सूची में शीर्ष पर रखते हैं।
सोशल मीडिया पर छिड़ी तुलना और व्यवस्था की चर्चा
इस जानकारी के वायरल होते ही इंटरनेट पर बहस का दौर शुरू हो गया है। विशेषकर भारत में लोग इसकी तुलना अपने यहां की व्यवस्था से कर रहे हैं, जहाँ सड़क किनारे लगे पेड़ों से फल चुनना एक सामान्य और रोजमर्रा की बात मानी जाती है। कुछ यूजर्स ने जहाँ
सीमा पर सैन्य झड़पें जारी, पाक कार्रवाई में अफगान पक्ष को बड़ा नुकसान
13 May, 2026 03:25 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
काबुल/इस्लामाबाद: संयुक्त राष्ट्र की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि इस वर्ष की पहली तिमाही में पाकिस्तान और तालिबान के बीच जारी सैन्य गतिरोध ने आम अफगान नागरिकों के लिए नरक जैसी स्थिति पैदा कर दी है। वर्ष 2026 के शुरुआती तीन महीनों में सीमा पार से हुई भीषण गोलाबारी और हवाई हमलों में 372 निर्दोष नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। वर्ष 2011 के बाद से हताहतों का यह आंकड़ा सबसे भयावह स्तर पर पहुंच गया है, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। मानवीय आधार पर स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि कई शवों की पहचान करना तक मुश्किल हो रहा है।
नशा मुक्ति केंद्र पर पाकिस्तान का विनाशकारी हवाई हमला
इस पूरी हिंसा में सबसे हृदयविदारक घटना 16 मार्च को काबुल में घटित हुई, जब पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने एक नशा मुक्ति केंद्र को निशाना बनाया। इस केंद्र में केवल पुरुष रोगियों का उपचार चल रहा था, लेकिन हमले के बाद यह जगह मलबे और लाशों के ढेर में तब्दील हो गई। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पुष्टि करती है कि केवल इसी एक हमले में 269 लोगों की मौत हुई और सौ से अधिक लोग घायल हो गए। प्रत्यक्षदर्शियों और स्वतंत्र स्रोतों का मानना है कि मृतकों की वास्तविक संख्या रिपोर्ट किए गए आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि धमाके और आग की वजह से कई शरीर पूरी तरह झुलस चुके थे।
सैन्य अभियानों और आतंकी पनाहगाहों का अंतहीन विवाद
सीमा पर बढ़ते इस तनाव के पीछे दोनों देशों के अपने-अपने तर्क और आरोप हैं, जिसके कारण युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। पाकिस्तान का दावा है कि उसके सैन्य अभियान केवल 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' (TTP) के ठिकानों और आतंकी बुनियादी ढांचे को नष्ट करने के लिए चलाए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, तालिबान प्रशासन इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अफगानिस्तान की संप्रभुता का सीधा उल्लंघन मान रहा है। फरवरी के अंत में तो पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने इस तनाव को एक 'खुली जंग' तक करार दे दिया था, जिससे स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं।
युद्धविराम के बीच नागरिक और एनजीओ कार्यकर्ताओं पर अत्याचार
हिंसा का आलम यह है कि शांति समझौतों और युद्धविराम की घोषणाएं भी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रही हैं। रिपोर्ट में नूरिस्तान की एक दर्दनाक घटना का उल्लेख है, जहाँ एक महिला एनजीओ कार्यकर्ता की उस समय हत्या कर दी गई जब एक दिन पहले ही युद्धविराम पर सहमति बनी थी। उस महिला को गोली लगने के बाद वह अपने तीन साल के मासूम बच्चे के साथ पानी में डूब गई, जो इस युद्ध की संवेदनहीनता को दर्शाता है। संयुक्त राष्ट्र ने अब कड़े शब्दों में दोनों देशों से अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों का सम्मान करने और अस्पतालों तथा घनी आबादी वाले नागरिक क्षेत्रों को सैन्य कार्रवाई से दूर रखने की अपील की है।
कूटनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान अलग-थलग, मुस्लिम देशों ने नहीं दिया साथ
13 May, 2026 03:01 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता और तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) यात्रा अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है। पिछले दस वर्षों में दोनों देशों के बीच विकसित हुए प्रगाढ़ संबंधों ने न केवल भारत की विदेशी नीति को नई ऊँचाई दी है, बल्कि मुस्लिम जगत में पाकिस्तान के प्रभाव को भी काफी हद तक सीमित कर दिया है। आज यूएई खाड़ी देशों में भारत का सबसे विश्वसनीय मित्र बनकर उभरा है, जो ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंधों को आधुनिक सामरिक साझेदारी में बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
कूटनीतिक सफलता और पाकिस्तान की बढ़ती दूरियां
भारत की कूटनीतिक कुशलता का ही परिणाम है कि आज यूएई जैसा प्रभावशाली मुस्लिम राष्ट्र हर मंच पर भारत के साथ खड़ा दिखाई देता है। वर्ष 2019 में पाकिस्तान के पुरजोर विरोध को दरकिनार करते हुए यूएई द्वारा भारत को इस्लामिक सहयोग संगठन की बैठक में विशेष अतिथि के रूप में बुलाना एक युगांतकारी घटना थी। इसके विपरीत, पाकिस्तान और यूएई के रिश्तों में कड़वाहट साफ देखी जा सकती है, जहाँ यूएई ने न केवल पाकिस्तानियों के लिए वीजा नियमों को कड़ा किया है, बल्कि बकाया कर्ज की वापसी का दबाव भी बढ़ाया है। दोनों देशों के बीच 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे मौकों पर दिखा आपसी सहयोग यह स्पष्ट करता है कि अब यह रिश्ता केवल औपचारिकताओं तक सीमित नहीं है।
ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक लक्ष्यों का नया रोडमैप
प्रधानमंत्री की इस यात्रा के केंद्र में भारत की ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों को सुरक्षित करना सबसे ऊपर है। एचपीसीएल के साथ हुए महत्वपूर्ण एलएनजी समझौते के तहत आपूर्ति को निर्धारित समय 2028 से पहले शुरू करने पर गहन चर्चा होने की उम्मीद है। साल 2022 में हुए मुक्त व्यापार समझौते ने दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों को नई ऊर्जा दी है, जिससे द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है। अब दोनों देशों ने मिलकर वर्ष 2032 तक इस व्यापारिक आंकड़े को 200 अरब डॉलर तक ले जाने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है, जो आने वाले समय में दोनों अर्थव्यवस्थाओं की परस्पर निर्भरता को और बढ़ाएगा।
चार स्तंभों पर टिकी भविष्य की रणनीतिक साझेदारी
भारत और यूएई के बीच इस मज़बूत रिश्ते की नींव कूटनीति, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और वहां रह रहे 45 लाख भारतीय प्रवासियों पर टिकी है। ये प्रवासी भारतीय न केवल यूएई की विकास गाथा का अहम हिस्सा हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच एक जीवंत सांस्कृतिक सेतु का कार्य भी कर रहे हैं। वर्तमान में यह सहयोग पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर अब अंतरिक्ष अनुसंधान, हरित ऊर्जा, परमाणु शक्ति और उन्नत रक्षा तकनीकों तक पहुँच चुका है। यह रणनीतिक विस्तार इस बात का प्रमाण है कि भारत ने अपनी दूरदर्शी नीति के जरिए खाड़ी क्षेत्र में अपनी स्थिति को अत्यंत सुदृढ़ और निर्णायक बना लिया है।
अंबाला-सोनीपत में भाजपा की जीत, उकलाना में युवा चेहरे की सफलता
13 May, 2026 01:03 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
चंडीगढ़। हरियाणा में स्थानीय निकाय और नगर परिषद चुनाव 2026 के लिए मतों की गणना का कार्य बुधवार सुबह 8:00 बजे से कड़ी सुरक्षा के बीच प्रारंभ हो गया है। शुरुआती रुझानों और घोषित परिणामों ने प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है, जहाँ भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और निर्दलीय प्रत्याशियों के बीच कांटे का मुकाबला देखने को मिल रहा है। राज्य के विभिन्न जिलों से आ रहे परिणामों ने कहीं सत्ताधारी दल का उत्साह बढ़ाया है, तो कहीं निर्दलीय और विपक्षी उम्मीदवारों ने बड़े उलटफेर कर सत्ता के समीकरणों को चुनौती दी है।
उकलाना में युवा शक्ति का उदय और भाजपा को करारा झटका
उकलाना नगर पालिका के चुनाव परिणामों ने सभी को अचंभित कर दिया है, जहाँ मात्र 23 वर्षीय निर्दलीय उम्मीदवार रीमा सोनी ने इतिहास रचते हुए जीत का परचम लहराया है। कांग्रेस समर्थित रीमा सोनी ने भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी निकिता गोयल को कड़े मुकाबले में पराजित कर चेयरपर्सन की कुर्सी पर कब्जा किया है। यह परिणाम भाजपा के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि इस सीट पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के साथ-साथ पांच कैबिनेट मंत्रियों ने स्वयं मोर्चा संभालते हुए धुआंधार प्रचार किया था, इसके बावजूद युवा चेहरे ने बाजी मार ली।
रेवाड़ी और धारूहेड़ा में भारतीय जनता पार्टी का वर्चस्व
नगर परिषद रेवाड़ी के चुनावी रण में भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी है और 32 वार्डों में से 11 पर विजय हासिल कर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। हालाँकि यहाँ निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी अप्रत्याशित प्रदर्शन करते हुए प्रमुख दलों के लिए मुश्किलें खड़ी कीं और कई महत्वपूर्ण वार्डों पर अपनी जीत दर्ज कराई। वहीं धारूहेड़ा नगर पालिका से भाजपा के लिए सुखद खबर आई, जहाँ चेयरमैन पद के प्रत्याशी सत्यनारायण उर्फ अजय जांगड़ा ने जीत दर्ज की है, जिसकी घोषणा होते ही मतगणना केंद्रों के बाहर उत्साही कार्यकर्ताओं ने ढोल-नगाड़ों के साथ अपनी खुशी का इजहार किया।
पंचकूला और सोनीपत में खिला कमल जबकि अंबाला में कांग्रेस की सेंध
पंचकूला जिले के विभिन्न वार्डों में भाजपा का क्लीन स्वीप जैसा प्रदर्शन नजर आया है, जहाँ वार्ड नंबर 6 से पार्थ गुप्ता, वार्ड 8 से राज कुमार जैन और वार्ड 9 से हरेंद्र मलिक ने भारी मतों के अंतर से जीत दर्ज की है। वहीं सोनीपत के वार्ड 13 से भी भाजपा के महेश लूथरा ने अपनी जीत का लोहा मनवाया है। इसके विपरीत, अंबाला में कांग्रेस ने भाजपा के किले में सेंध लगाने में सफलता प्राप्त की है, जहाँ वार्ड नंबर 8 से कांग्रेस की गुरजीत कौर ने भाजपा उम्मीदवार को 721 मतों के अंतर से पटखनी देकर पार्टी का मनोबल ऊँचा किया है।
सत्ता के गलियारों में हलचल और आगे की राजनीतिक दिशा
निकाय चुनावों के इन परिणामों ने प्रदेश की भावी राजनीति के संकेत देने शुरू कर दिए हैं, जिसमें स्थानीय मुद्दों और व्यक्तिगत छवि का प्रभाव स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया है। जहाँ भाजपा ने शहरी केंद्रों में अपनी संगठनात्मक मजबूती का प्रदर्शन किया है, वहीं निर्दलीयों की भारी जीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जनता ने कई स्थानों पर पारंपरिक दलीय राजनीति से हटकर नए विकल्पों को प्राथमिकता दी है। आने वाले घंटों में बाकी बचे वार्डों और नगर पालिकाओं के परिणाम पूरी तरह स्पष्ट होने के बाद ही राज्य की स्थानीय सरकार का पूर्ण स्वरूप सामने आ पाएगा।
हंतावायरस संक्रमण के नए मामले मिलने से बढ़ी चिंता, 3 की जा चुकी जान
13 May, 2026 10:10 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मैड्रिड: स्पेन के कैनरी आइलैंड्स में रुके क्रूज शिप ‘MV होंडियस’ से लौटे यात्रियों में हंतावायरस का संक्रमण तेजी से फैल रहा है। ताजा जानकारी के अनुसार, तीन और यात्रियों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है, जिनमें एक अमेरिकी और एक फ्रांसीसी नागरिक शामिल हैं। ये दोनों यात्री संक्रमण की पुष्टि होने से पहले ही अपने स्वदेश लौट चुके थे। वहीं, मैड्रिड में क्वारैंटाइन किए गए एक स्पेनिश नागरिक की शुरुआती जांच रिपोर्ट भी पॉजिटिव पाई गई है, जिससे प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। जहाज पर मिले संक्रमण के मामलों ने अब एक अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य अलर्ट का रूप ले लिया है।
अब तक तीन यात्रियों ने गंवाई जान
इस वायरस की चपेट में आने से अब तक तीन विदेशी यात्रियों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। मौतों का सिलसिला 11 अप्रैल को शुरू हुआ था, जब जहाज पर सवार एक बुजुर्ग डच यात्री की मृत्यु हो गई थी। उनकी पत्नी, जो उनके साथ यात्रा कर रही थीं, बाद में दक्षिण अफ्रीका में मृत पाई गईं। इसके बाद 2 मई को एक जर्मन महिला यात्री ने भी दम तोड़ दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के मुताबिक, इस विशेष क्रूज शिप से जुड़े हंतावायरस के अब तक कुल 9 पुख्ता मामले सामने आ चुके हैं, जो इस यात्रा को बेहद जोखिम भरी श्रेणी में खड़ा करते हैं।
WHO और CDC की अलग-अलग राय
जहाज पर उपजे इस स्वास्थ्य संकट को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। WHO ने सिफारिश की है कि जो भी यात्री इस क्रूज शिप से लौटे हैं, उन्हें कम से कम 42 दिनों तक आइसोलेशन (पृथकवास) में रहना चाहिए। हालांकि, अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी CDC ने इस स्थिति पर थोड़ा अलग नजरिया पेश किया है। CDC का कहना है कि हंतावायरस का इंसान से इंसान में फैलना बेहद दुर्लभ मामला है। एजेंसी ने जनता को आश्वस्त करते हुए कहा है कि इसे कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इसका संक्रमण फैलने का तरीका काफी अलग है।
संक्रमण के स्रोत की जांच जारी
स्वास्थ्य विभाग की टीमें अब इस बात की जांच कर रही हैं कि जहाज पर वायरस का प्रवेश कैसे हुआ। आमतौर पर हंतावायरस चूहों और उनके मलमूत्र के संपर्क में आने से फैलता है, इसलिए जहाज के सफाई प्रबंधों और खाद्य भंडारण की भी बारीकी से जांच की जा रही है। कैनरी आइलैंड्स में जहाज के रुकने के दौरान हुई गतिविधियों को भी ट्रैक किया जा रहा है। अधिकारियों ने उन सभी यात्रियों से संपर्क साधने की कोशिश तेज कर दी है जो इस क्रूज पर सवार थे, ताकि समय रहते लक्षणों की पहचान कर इलाज शुरू किया जा सके और संक्रमण को आगे बढ़ने से रोका जा सके।
BJP का जोरदार प्रदर्शन, प्रवीण कोच सांपला नपा में विजयी
13 May, 2026 10:04 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
रोहतक। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के प्रभाव वाले क्षेत्र सांपला में भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज करते हुए नगर पालिका की सत्ता पर कब्जा कर लिया है। भाजपा प्रत्याशी प्रवीण कोच ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी निर्दलीय अंकित ओहल्याण को 687 मतों के अंतर से शिकस्त देकर चेयरमैन का पद अपने नाम किया। इस मुकाबले में मुख्य रूप से भाजपा विरोधी वोटों के बंटवारे ने प्रवीण कोच की राह आसान कर दी। जीत की औपचारिक घोषणा के साथ ही भाजपा खेमे में उत्साह की लहर दौड़ गई और कार्यकर्ताओं ने विजय जुलूस निकालकर जश्न मनाया।
सांपला के चुनावी रण में भाजपा की रणनीति सफल
सांपला नगर पालिका चुनाव में भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, जिसके परिणामस्वरूप उसे यह बड़ी कामयाबी मिली है:
पार्टी ने पूर्व कांग्रेसी नेता प्रवीण कोच पर दांव खेला, जो रणनीतिक रूप से सही साबित हुआ।
चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री नायब सैनी सहित प्रदेश सरकार के तीन मंत्रियों और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने व्यक्तिगत रूप से मोर्चा संभाला।
विपक्ष की अनुपस्थिति और कांग्रेस के चुनाव से दूर रहने का सीधा फायदा भाजपा को मिला।
प्रवीण कोच की जीत ने यह साबित कर दिया कि भाजपा अब विरोधियों के गढ़ में भी सेंध लगाने में सक्षम है।
निर्दलीय प्रत्याशियों ने दी कड़ी टक्कर पर बिखराव पड़ा भारी
चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों ने व्यक्तिगत स्तर पर काफी पसीना बहाया, लेकिन अंततः वोटों का बिखराव उनकी हार का कारण बना:
दूसरे स्थान पर रहे अंकित ओहल्याण ने निर्दलीय होने के बावजूद 3704 वोट हासिल कर भाजपा को कड़ी चुनौती दी।
सुधीर ओहल्याण 1984 वोटों के साथ तीसरे और टिकट न मिलने से नाराज होकर मैदान में उतरे पत्रकार अनिल शर्मा 1081 वोटों के साथ चौथे स्थान पर रहे।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच यह मत विभाजन न होता, तो चुनावी परिणाम बदल सकते थे।
प्रत्याशियों ने बिना किसी बड़े दलीय समर्थन के अपने दम पर प्रचार कर मतदाताओं को अपनी ओर खींचने का प्रयास किया।
मतदान के आंकड़े और चेयरमैन पद का विस्तृत परिणाम
10 मई को कड़ी सुरक्षा के बीच हुए मतदान में जनता ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिसके आंकड़े इस प्रकार रहे:
सांपला में कुल 15624 मतदाताओं में से 12372 लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया।
विजेता प्रवीण कोच को सर्वाधिक 4391 मत प्राप्त हुए, जिससे उनकी जीत का मार्ग प्रशस्त हुआ।
अन्य उम्मीदवारों में विकास को 482, राकेश कुमार को 335 और मंजीत को 222 वोट मिले।
चुनाव में नोटा (NOTA) का विकल्प चुनने वाले मतदाताओं की संख्या 35 रही, जबकि सबसे कम 17 वोट सुनील कुमार को मिले।
सांपला नगर पालिका का नया राजनीतिक समीकरण
इस जीत के बाद सांपला की स्थानीय राजनीति में नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं:
चेयरमैन बने प्रवीण कोच के सामने अब कस्बे के विकास कार्यों को गति देने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
हुड्डा के गढ़ में भाजपा की इस सेंधमारी ने आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भी भाजपा कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया है।
निर्दलीय उम्मीदवारों के प्रदर्शन ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर चेहरे की अपनी अहमियत होती है।
प्रशासन ने मतगणना के बाद शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं।
ट्रम्प का चीन दौरा शुरू, राष्ट्रपति जिनपिंग संग कई मुद्दों पर होगी चर्चा
13 May, 2026 09:58 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
बीजिंग: ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे बड़ी हलचल चीन की राजधानी बीजिंग में देखने को मिल रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प मंगलवार को अपने बहुप्रतीक्षित चीन दौरे पर रवाना हो गए हैं। 13 से 15 मई, 2026 तक चलने वाला यह दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक है, क्योंकि साल 2017 के बाद यह ट्रम्प की पहली बीजिंग यात्रा है। इस दौरे को लेकर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि दो महाशक्तियों के बीच होने वाली यह बातचीत वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा की नई दिशा तय कर सकती है।
दो दिनों में दो बार होगी महाशक्तियों के बीच मुलाकात
ट्रम्प अपने इस तीन दिवसीय प्रवास के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से दो बार आमने-सामने मुलाकात करेंगे। आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार, गुरुवार और शुक्रवार को दोनों नेताओं के बीच अलग-अलग चरणों में उच्च स्तरीय वार्ता होगी। इन बैठकों का एजेंडा काफी व्यापक है, जिसमें व्यापारिक संबंध, ताइवान का विवादित मुद्दा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की तकनीक और 'रेयर अर्थ मिनरल्स' पर नियंत्रण जैसे गंभीर विषय शामिल हैं। जानकारों का मानना है कि इस मुलाकात का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच बढ़ती कड़वाहट को कम करना और सहयोग के नए रास्ते तलाशना है।
ईरान युद्ध और होर्मुज संकट पर केंद्रित रहेगी चर्चा
चीन के लिए उड़ान भरने से पहले राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने इरादे साफ कर दिए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अमेरिका और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी सैन्य शक्तियां हैं, जिनमें अमेरिका पहले और चीन दूसरे स्थान पर है। ट्रम्प ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि वे राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ वर्तमान में चल रहे ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट में उपजे ऊर्जा संकट पर लंबी और विस्तृत चर्चा करेंगे। चूंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली तेल की आपूर्ति वैश्विक बाजार के लिए जीवन रेखा है, इसलिए इस संकट का समाधान खोजना दोनों नेताओं की प्राथमिकता होगी।
व्यापारिक युद्ध और रणनीतिक संतुलन की चुनौती
ट्रम्प का यह बीजिंग दौरा एक ऐसे समय में हो रहा है जब दोनों देशों के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक मतभेद अपने चरम पर हैं। व्यापार घाटे को कम करना और अमेरिकी कंपनियों के लिए चीनी बाजारों में सुलभता बनाना ट्रम्प के एजेंडे में सबसे ऊपर है। वहीं, चीन भी अपनी संप्रभुता और तकनीक पर पकड़ बनाए रखने के लिए सख्त रुख अपना सकता है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि दो दिन की इस गहन चर्चा के बाद क्या दोनों देश किसी बड़े समझौते पर पहुंच पाते हैं या फिर तनाव की लकीरें और गहरी होती हैं।
ट्रम्प बोले- ईरान के खिलाफ लड़ाई में पीछे नहीं हटेगा अमेरिका
13 May, 2026 09:08 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन: मध्य पूर्व में जारी भीषण संघर्ष के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को कड़ा संदेश दिया है। अपनी महत्वपूर्ण चीन यात्रा पर रवाना होने से ठीक पहले ट्रम्प ने हुंकार भरते हुए कहा कि अमेरिका इस जंग को हर हाल में जीतेगा और ईरान के पास अब केवल दो ही रास्ते बचे हैं—या तो वह बातचीत की मेज पर आकर समझौता करे या फिर पूरी तरह तबाही का सामना करने के लिए तैयार रहे। राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि अमेरिका की स्थिति बेहद मजबूत है और उनके पास स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सभी सैन्य और रणनीतिक विकल्प खुले हुए हैं।
चीन दौरे पर युद्ध और व्यापार दोनों रहेंगे केंद्र में
ट्रम्प ने जानकारी दी कि उनकी बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ होने वाली चर्चा में ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट में उपजे वैश्विक संकट पर विस्तार से बात होगी। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि द्विपक्षीय व्यापार वार्ता का सबसे अहम एजेंडा रहेगा, लेकिन वैश्विक सुरक्षा की दृष्टि से ईरान का मुद्दा टाला नहीं जा सकता। अमेरिका चाहता है कि चीन इस संकट के समाधान में अपनी भूमिका स्पष्ट करे, खासकर तब जब होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली तेल की आपूर्ति पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही है।
74 दिनों की जंग में अमेरिका ने खर्च किए 29 अरब डॉलर
एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के साथ चल रहे इस सैन्य संघर्ष के पिछले 74 दिनों में अमेरिका ने अब तक कम से कम 29 अरब डॉलर (करीब 2.4 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर दिए हैं। यह विशाल धनराशि केवल हथियारों, गोला-बारूद और सैन्य साजो-सामान पर व्यय हुई है। इसमें युद्ध के दौरान अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हुए ढांचागत नुकसान का हिसाब शामिल नहीं है। इसी भारी भरकम खर्च के बीच अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कांग्रेस से अतिरिक्त रक्षा बजट की गुहार लगाई है, ताकि अमेरिका अपनी वैश्विक सैन्य शक्ति को बरकरार रख सके।
तेल की बढ़ती कीमतें और होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ा खतरा
युद्ध का सीधा असर अब वैश्विक बाजार और रणनीतिक रास्तों पर दिखने लगा है। पिछले 24 घंटों में शांति वार्ता बेनतीजा रहने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में 3 प्रतिशत से ज्यादा का उछाल आया है, जिससे ब्रेंट क्रूड 107 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। वहीं, ईरान की रेवोल्यूशनरी गार्ड ने होर्मुज स्ट्रेट के 500 किलोमीटर के दायरे को 'ऑपरेशन जोन' घोषित कर दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खतरा बढ़ गया है। स्थिति से निपटने के लिए ट्रम्प प्रशासन ने अपने सुरक्षित तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) से 5.33 करोड़ बैरल तेल जारी करने का फैसला किया है ताकि आपूर्ति को सुचारू रखा जा सके।
हिजबुल्लाह के बढ़ते हमलों के बीच इजराइल का बड़ा सुरक्षा कदम
12 May, 2026 07:07 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इजराइली सेना (IDF) हिजबुल्लाह के घातक ड्रोन हमलों से बचने के लिए एक बहुत पुराना और दिलचस्प तरीका अपना रही है। लेबनान सीमा के पास इजराइली सैनिकों की जगह उनके पुतले (dummies) तैनात किए जा रहे हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें लेबनान के एक घर के अंदर सैनिकों जैसी दिखने वाली गुड़िया रखी थी। हिजबुल्लाह के समर्थक इसे इजराइली सैनिकों की मौजूदगी का सबूत मानकर शेयर कर रहे थे, जबकि असल में यह उन्हें गुमराह करने की एक चाल थी। यह तकनीक दूसरे विश्व युद्ध की याद दिलाती है, जब दुश्मन को धोखा देने के लिए नकली टैंकों का इस्तेमाल किया जाता था।
हिजबुल्लाह के ड्रोन और आयरन डोम पर खतरा
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हिजबुल्लाह के 'एफपीवी' (FPV) ड्रोन इजराइल के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। मार्च 2026 में गोलान हाइट्स के एयर डिफेंस पोस्ट पर बड़ा हमला हुआ और मई 2026 में इजराइल के अभेद्य माने जाने वाले 'आयरन डोम' सिस्टम पर भी दो ड्रोन हमलों की खबरें आईं। हिजबुल्लाह ने दावा किया कि उसने न केवल मशीनों को, बल्कि उनके रखरखाव में जुटी टीम को भी निशाना बनाया है। हालांकि, इजराइल ने रखरखाव दल पर हमले की पुष्टि नहीं की है, लेकिन हिजबुल्लाह ने वीडियो जारी कर अपनी बढ़ती ताकत का प्रदर्शन जरूर किया है।
हजारों रॉकेट और तनावपूर्ण संघर्ष का इतिहास
इजराइल के उत्तरी क्षेत्र में हिजबुल्लाह ने अब तक हजारों रॉकेट और ड्रोन दागे हैं, जिससे कई नागरिकों और सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। इस तनाव के जवाब में इजराइल ने सितंबर 2024 में भीषण हवाई हमले शुरू किए थे, जिसमें हिजबुल्लाह के सबसे बड़े नेता हसन नसरल्लाह को मार गिराया गया। इसके बाद अक्टूबर 2024 में इजराइल ने लेबनान के अंदर जमीनी कार्रवाई भी की। हालांकि, नवंबर 2024 में अमेरिका की कोशिशों से युद्धविराम (Ceasefire) हुआ, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दोनों ओर से आज भी भारी तनाव बना हुआ है।
आधुनिक युद्ध में पुरानी रणनीति का महत्व
आज के दौर में जहाँ मिसाइलें और रडार जैसे आधुनिक हथियार युद्ध का हिस्सा हैं, वहां पुतलों का इस्तेमाल यह दिखाता है कि युद्ध जीतने के लिए केवल ताकत नहीं, बल्कि 'दिमाग' और 'धोखा' भी जरूरी है। इजराइल इन डमी सैनिकों के जरिए हिजबुल्लाह के महंगे ड्रोनों को बेकार करना चाहता है, ताकि जब ड्रोन हमला करें, तो वे असली सैनिकों के बजाय केवल लकड़ी या प्लास्टिक के पुतलों को ही निशाना बना सकें। इससे इजराइली सेना को अपनी रणनीति बनाने और असली ठिकानों को सुरक्षित रखने का समय मिल जाता है।
US पब्लिक स्कूलों में नामांकन में बड़ी गिरावट दर्ज
12 May, 2026 06:37 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन: अमेरिका में लगातार गिरती जन्म दर का अब वहां की शिक्षा व्यवस्था पर गहरा असर पड़ रहा है। देशभर के सरकारी (पब्लिक) स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या में भारी कमी आई है, जिसके कारण प्रशासन को कई स्कूलों को स्थायी रूप से बंद करने का कठिन निर्णय लेना पड़ रहा है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, साल 2010 के बाद से ही किंडरगार्टन से लेकर 12वीं कक्षा तक के छात्रों के नामांकन में गिरावट देखी जा रही थी, लेकिन कोरोना महामारी के बाद यह स्थिति और भी गंभीर हो गई है।
बड़े शहरों में 20 प्रतिशत तक घटी छात्रों की संख्या
छात्रों की संख्या में कमी का सबसे ज्यादा असर अमेरिका के बड़े महानगरों में देखने को मिल रहा है। न्यूयॉर्क, शिकागो और लॉस एंजिलिस जैसे शहरों के कई स्कूल जिलों में छात्रों की संख्या में 10 से 20 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। स्कूलों में बच्चों की कमी का सीधा मतलब है कि अब उन स्कूलों को चलाने के लिए मिलने वाली सरकारी मदद और संसाधनों में भी कटौती की जाएगी। कई इलाकों में तो स्कूल की इमारतें खाली पड़ी हैं, क्योंकि वहां दाखिला लेने के लिए पर्याप्त बच्चे ही नहीं मिल रहे हैं।
महंगाई और कम जन्म दर हैं मुख्य कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं। पहला कारण अमेरिका में जन्म दर का लगातार कम होना है, जिससे स्कूलों में आने वाली नई पीढ़ी की संख्या घट गई है। इसके अलावा, बढ़ती महंगाई और रहने के खर्च (Cost of Living) की वजह से मध्यम वर्ग के परिवार अब कम बच्चे पैदा कर रहे हैं या फिर महंगे शहरों को छोड़कर दूसरे इलाकों में जा रहे हैं। साथ ही, इमिग्रेशन यानी आप्रवासन नीतियों में बदलाव को भी इसका एक बड़ा कारण माना जा रहा है, जिससे बाहर से आने वाले परिवारों की संख्या पर असर पड़ा है।
शिक्षा व्यवस्था के भविष्य पर मंडराता खतरा
राष्ट्रीय शिक्षा सांख्यिकी केंद्र (NCES) के अनुसार, आने वाले कुछ सालों तक छात्र संख्या में यह गिरावट इसी तरह जारी रह सकती है। इसका सीधा असर भविष्य की शिक्षा नीतियों और शिक्षकों की नौकरियों पर पड़ सकता है। जानकारों का कहना है कि अगर छात्रों की संख्या इसी रफ्तार से कम होती रही, तो सरकार को शिक्षा बजट में बड़े बदलाव करने पड़ेंगे और छोटे स्कूलों को आपस में मिलाना पड़ेगा। यह बदलाव न केवल अमेरिका की शिक्षा व्यवस्था बल्कि उसकी भविष्य की कार्यशक्ति (Workforce) के लिए भी एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
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