धर्म एवं ज्योतिष
पितृपक्ष की दशमी तिथि का श्राद्ध और हनुमानजी की पूजा, इन कार्यों से पितर और पवनपुत्र करेंगे कल्याण
16 Sep, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि मंगलवार, 16 सितंबर को पड़ रही है. इस दिन पितृपक्ष की दशमी तिथि का श्राद्ध भी किया जाएगा और मंगलवार है तो रामभक्त हनुमानजी के लिए व्रत और पूजन भी किया जाएगा. पितृपक्ष की दशमी तिथि का श्राद्ध विशेष महत्व रखता है. इस कारण दशमी तिथि पर किया गया श्राद्ध पितरों को शांति देने के साथ-साथ घर-परिवार में मानसिक शांति और चित्त की स्थिरता प्रदान करता है. मान्यता है कि इस दिन हनुमानजी की पूजा और पितरों का श्राद्ध करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है और जीवन में कभी किसी चीज की कमी नहीं रहती.
मंगलवार को आडल और विडाल योग
दृक पंचांग के अनुसार, सूर्य देव सिंह राशि में और चंद्रमा मिथुन राशि में विराजमान रहेंगे. अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 12 बजकर 40 मिनट तक रहेगा और राहुकाल का समय दोपहर के 3 बजकर 20 मिनट से शुरू होकर 4 बजकर 53 मिनट तक रहेगा. इस दिन आडल और विडाल योग का निर्माण हो रहा है, जो धार्मिक कार्यों के लिए अशुभ माना जाता है.
मंगल ग्रह की स्थिति होगी शुभ
मंगलवार का यह दिन रामभक्त हनुमान और मंगल ग्रह को समर्पित है. स्कंद पुराण के अनुसार, बजरंगबली का जन्म मंगलवार के दिन हुआ था. बजरंगबली को संकटमोचन और मंगल ग्रह के नियंत्रक के रूप में पूजा जाता है. मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और हनुमान जी की विधि-विधान से पूजा करने से जीवन के कष्ट, भय और चिंताएं दूर होती हैं. साथ ही, मंगल ग्रह से संबंधित ज्योतिषीय बाधाएं भी समाप्त होती हैं. बजरंगबली के भक्तों के लिए यह दिन विशेष महत्व रखता है. इस दिन लाल रंग के वस्त्र पहनना, हनुमान चालीसा का पाठ करना और हनुमान जी को लाल सिंदूर व चमेली का तेल चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है.
हनुमानजी की पूजा विधि
इस दिन पूजा करने के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य कर्म-स्नान आदि करने के बाद पूजा स्थल को साफ करें. फिर एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और पूजा की सामग्री रखें और उस पर अंजनी पुत्र की प्रतिमा स्थापित करें. इसके बाद, हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ कर सिंदूर, चमेली का तेल, लाल फूल और प्रसाद चढ़ाएं और बजरंग बली की आरती करें. इसके बाद आरती का आचमन कर आसन को प्रणाम करके प्रसाद ग्रहण करें. साथ ही इस दिन शाम को भी हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए.
मंगलवार के दिन जरूर करें यह काम
व्रत में केवल एक बार भोजन करें और नमक का सेवन न करें. मंगलवार के दिन हनुमान जी की पूजा करने से शक्ति और साहस में वृद्धि होती है. इसके साथ ही जीवन में सुख-समृद्धि आती है. मान्यता है कि लाल रंग मंगल ग्रह का प्रतीक है. इस दिन लाल कपड़े पहनना और लाल रंग के फल, फूल और मिठाइयां अर्पित करना शुभ माना जाता है. ज्योतिषियों का कहना है कि इस दिन हनुमान मंदिर में दर्शन और पूजा से विशेष फल की प्राप्ति होती है. हनुमान जी की कृपा से भक्तों को साहस, शक्ति और आत्मविश्वास मिलता है. इस पावन दिन पर हनुमान जी की आराधना कर जीवन में सुख-समृद्धि और शांति की कामना करें.
पितृपक्ष की दशमी तिथि का श्राद्ध
पितृपक्ष की दशमी तिथि को धर्म, सदाचार और शांति की प्रतीक तिथि माना गया है. इस दिन किया गया श्राद्ध उन पितरों के लिए विशेष फलदायी होता है जिनकी मृत्यु दशमी तिथि को हुई हो. शास्त्रीय नियम के अनुसार, श्राद्ध उसी तिथि को करना श्रेष्ठ माना गया है जिस तिथि को पितृ का देहावसान हुआ हो. दशमी के श्राद्ध से घर में सद्भाव, शांति और संतानों की उन्नति होती है. साथ ही मानसिक विकार, चित्त की अशांति तथा परिवार के भीतर होने वाले मतभेद शांत होते हैं.
सोने की अंगूठी गलत उगलियों में पहनेंगे, तो नसीब होगा खराब, भाग्य खोलने के लिए इस उंगली में पहनें, संवर जाएंगे रिश्ते और सेहत
16 Sep, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सोना सिर्फ एक गहना नहीं, बल्कि हमारी जिंदगी में खुशियों और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी माना जाता है. कई लोग इसे केवल सुंदरता बढ़ाने के लिए पहनते हैं, लेकिन ज्योतिष और वास्तु शास्त्र के अनुसार, सोना पहनने के सही तरीके और अंग का चुनाव आपके जीवन में खुशहाली, स्वास्थ्य और सफलता ला सकता है. सही उंगली और सही अंग में सोना पहनना आपके भाग्य को बदल सकता है, अगर आप जानते हैं कि कौन सी उंगली में सोना पहनना आपके लिए लाभकारी होगा, तो न केवल आपके जीवन की परेशानियां कम होंगी बल्कि आपका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य भी बेहतर होगा.
सोने के पहनने के फायदे और सही उंगली
1. गले में सोना पहनना
गले में सोने की चेन पहनने से ना सिर्फ आपकी सुंदरता बढ़ती है, बल्कि यह वैवाहिक जीवन में संतुलन और सुख भी लाता है. कई बार रिश्तों में छोटी-छोटी बातें खटास पैदा करती हैं, लेकिन गले में सोना पहनने से संबंधों में मिठास और समझदारी बढ़ती है. साथ ही, हार्ट पेशेंट्स के लिए भी यह लाभकारी माना जाता है.
2. अनामिका उंगली में सोना
अनामिका उंगली में सोना पहनने से संतान सुख की संभावना बढ़ती है. यह उंगली आपके भविष्य और परिवार की खुशहाली से जुड़ी होती है, अगर आप संतान सुख की कामना कर रहे हैं, तो अनामिका में सोने की अंगूठी पहनना फायदेमंद रहेगा.
3. रुद्राक्ष में सोना
अगर आप रुद्राक्ष के साथ सोना पहनते हैं, तो यह दिल के मरीजों के लिए विशेष रूप से लाभकारी होता है. दिल की कमजोरी या अन्य संबंधित समस्याओं से राहत पाने के लिए यह उपाय सरल और असरदार माना गया है.
4. तर्जनी उंगली में सोना
करियर और नौकरी में सफलता पाने के लिए तर्जनी उंगली में सोने की अंगूठी पहनना लाभकारी होता है. यह उंगली आपकी महत्वाकांक्षा और पेशेवर निर्णयों को सकारात्मक ऊर्जा देती है, अगर आप नई नौकरी या प्रमोशन के लिए प्रयासरत हैं, तो यह उपाय मददगार साबित हो सकता है.
5. कनिष्ठिका उंगली में सोना
कनिष्ठिका उंगली में सोना पहनने से सर्दी-जुकाम और मानसिक बेचैनी में राहत मिलती है. यह उंगली आपके मानसिक संतुलन और स्वास्थ्य से जुड़ी होती है. तनाव या नींद की कमी से परेशान लोग इसे पहनकर आराम महसूस कर सकते हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 16 सितम्बर 2025)
16 Sep, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- इष्ट मित्रों से लाभ, स्त्री वर्ग से भोग-ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी, रुके कार्य बनेंगे।
वृष राशि :- आपके प्रत्येक कार्य में बाधा होगी, लाभकारी कार्य हाथ से निकल सकते हैं, सावधानी से आगे बढ़ें।
मिथुन राशि :- धन लाभ, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, कार्यगति में सुधार अवश्य होगा।
कर्क राशि :- योजनायें फलीभूत होंगी, दैनिक सफलता के साधन जुटायेंगे, प्रलोभन से बचें।
सिंह राशि :- प्रतिष्ठा बाल-बाल बचे, अनेक समस्याओं से मन असमंजस में रहेगा, कार्य बाधित होंगे।
कन्या राशि :- स्त्री वर्ग से तनाव के बाद शांति तथा भाग्य का सितारा साथ देगा, मानसिक प्रसन्नता रहेगी।
तुला राशि :- भाग्य का सितारा साथ देगा, समय अनुकूल है, कार्य कुशलता से संतोष होगा।
वृश्चिक राशि :- आर्थिक योजना फलीभूत होगी, सोचे कार्य समय पर बनेंगे, कार्य योजना पर विचार होगा।
धनु राशि :- अर्थ लाभ, कार्य कुशलता में बाधा, स्वास्थ्य नरम रहेगा, पराक्रम उत्साहवर्धक होगा।
मकर राशि :- मानसिक उद्विघ्नता रहेगी, उत्तम समाचार प्राप्ति से हर्ष होगा, प्रसन्नता का वातावरण रहेगा।
कुंभ राशि :- विरोधियों से परेशानी होगी, चिन्ता व व्यग्रता का वातावरण रहेगा, विपरीत परिस्थितियों बनी रहेंगी।
मीन राशि :- आय-व्यय सामान्य रहेगा, शारीरिक कष्ट, कार्य क्षमता मंद रहेगी, कार्य में रुकावट बनेगी।
मथुरा के इस गांव से है श्री कृष्ण का अजीब नाता, यहां कान्हा ने गोपियों से मांगा था दान..
15 Sep, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
उत्तर प्रदेश के मथुरा के गोवर्धन विधानसभा के अडिंग गांव की यादें भगवान कृष्ण से जुड़ी हुई हैं. मान्यता के अनुसार, यहां भगवान श्रीकृष्ण ने अड़कर दान गोपियों से मांगा था, जिससे इस गाँव का नाम अडिंग पड़ गया. आज भी भगवान कृष्ण की यादें अडिंग गाँव से जुड़ी हैं. यह गाँव द्वापर युग का है. भगवान श्रीकृष्ण ने इसी गांव में एक दैत्य का वध किया था, जो एक सांड के रूप में घूमता था. आइए जानते हैं इस गांव का नाम अडिंग कैसे पड़ा और क्या है इसकी मान्यता.
अहिष्टासुर वध की पावन कथा से जुड़ा है
भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से समृद्ध मथुरा जनपद में स्थित अडिंग गांव, न केवल अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसके नामकरण के पीछे भी एक अद्भुत पौराणिक कथा जुड़ी हुई है. कहा जाता है कि यह वही भूमि है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अहिष्टासुर नामक राक्षस का वध किया था. इस दैत्य के अंत के बाद श्रीकृष्ण ने यहीं पर अड़कर दान मांगा था और इसी विशेष घटना के कारण इस स्थान का नाम पड़ा “अडिंग”.
श्री कृष्ण से जुड़ी हैं मान्यताएं
यह स्थान धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र है. उनके अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की यह लीला न केवल दान की महत्ता को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि किस प्रकार भगवान ने अन्याय के विरुद्ध अड़कर धर्म की स्थापना की.
यहां धूमधाम से मनता है जन्माष्टमी
गांव के बुजुर्गों और स्थानीय जनों का मानना है कि अडिंग गांव में आज भी श्रीकृष्ण की इस पौराणिक घटना की झलक मिलती है. यहां स्थित पुरातन स्थल और मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र हैं. धार्मिक महत्त्व के साथ-साथ यह गांव ब्रज संस्कृति की जीवंत पहचान है, जहां हर वर्ष जन्माष्टमी, गोवर्धन पूजा और अन्य धार्मिक पर्व धूमधाम से मनाए जाते हैं.
सरकार और पुरातत्व विभाग से मांग की जा रही है कि इस ऐतिहासिक स्थल को विशेष धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए, जिससे श्रीकृष्णभक्तों को यहां की लीला भूमि को देखने और जानने का अवसर मिल सके.
नवरात्रि में इन 4 राशियों की बदल जाएगी किस्मत, जानिए कहीं आपकी राशि भी तो नहीं!
15 Sep, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व माना जाता है. नवरात्रि के दौरान मां भगवती की विधि-विधान से पूजा की जाती है और पूरे नौ दिनों तक भक्ति का माहौल बना रहता है. इस बार ज्योतिष गणना के अनुसार शारदीय नवरात्रि में कुछ राशि के जातकों की किस्मत बदल सकती है. तो आइए, इस रिपोर्ट में जानते हैं कि किन राशियों पर माता रानी की विशेष कृपा बरस सकती है.
नवरात्रि के दौरान माता रानी की विधि-विधान पूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दौरान कई राशि के जातकों पर माता दुर्गा की विशेष कृपा बनी रहेगी और आर्थिक स्थिति मजबूत होगी. तो चलिए जानते हैं कौन-कौन सी राशियाँ लाभ पाएंगी.
अयोध्या के ज्योतिष पंडित कल्कि राम बताते हैं कि इस वर्ष शारदीय नवरात्रि में ज्योतिष गणना के अनुसार कई अद्भुत संयोग बन रहे हैं. इसकी वजह से कुछ राशि के जातकों पर माता रानी की विशेष कृपा बनी रहेगी. इनमें वृषभ, तुला, सिंह और धनु राशि के जातक शामिल हैं.
वृषभ राशि: शारदीय नवरात्रि के दौरान वृषभ राशि के जातकों पर माता दुर्गा की विशेष कृपा रहेगी. सभी प्रकार की मनोकामनाएँ पूरी होंगी और विभिन्न माध्यमों से धन की प्राप्ति होगी. समाज में मान-सम्मान बढ़ेगा तथा धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी. साथ ही कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है.
तुला राशि: तुला राशि के जातकों के लिए यह समय अच्छा रहेगा. सभी प्रकार की मनोकामनाएँ पूरी होंगी और पैतृक संपत्ति मिलने के योग बनेंगे. सामाजिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी और धन आगमन के मार्ग प्रशस्त होंगे. प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता मिल सकती है और माता रानी का आशीर्वाद बना रहेगा.
सिंह राशि: सिंह राशि के जातकों के लिए जीवन में कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे. व्यापार में वृद्धि होगी और कार्यक्षेत्र में जिम्मेदारियाँ बढ़ सकती हैं. सफलता के नए मुकाम हासिल करेंगे और शादीशुदा जीवन खुशहाल रहेगा. माता रानी की कृपा से हर क्षेत्र में प्रगति के योग बनेंगे.
धनु राशि: धनु राशि के जातकों के लिए शारदीय नवरात्रि बेहद शुभ रहने वाला है. आर्थिक क्षेत्र में लाभ के योग बनेंगे और करियर में उन्नति होगी. मेहनत के अनुसार तरक्की के नए अवसर प्राप्त होंगे. साथ ही धार्मिकता और आध्यात्मिकता में भी वृद्धि होगी, जिससे जीवन में संतुलन और सुख बढ़ेगा. माता रानी का आशीर्वाद हर कदम पर साथ रहेगा.
सपने में सांप का दिखना शुभ या अशुभ? भविष्य से जुड़े होते हैं संकेत! जानिए क्या कहता है स्वप्न शास्त्र
15 Sep, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कई बार लोग सपने में सांप देखकर परेशान हो जाते हैं, लोगों को सपने में सांप द्वारा अलग-अलग हरकत करते हुए देखा है
हिंदू धर्म में प्राचीन काल से ही सांप की पूजा की जाती रही है. जब भी लोग अपने आसपास सांप देखते हैं, तो डर जाते हैं. स्वप्न शास्त्र के अनुसार सांप का दिखना भी महत्वपूर्ण संकेत देता है, जिसे समझने की जरूरत है.
लेकिन क्या आप जानते हैं कि सपने में सांप का दिखना शुभ माना जाता है या अशुभ? सपने में सांप का दिखना किस बात का संकेत देता है.
अक्सर बहुत सारे लोग को सपने मे बार-बार सांप दिखते हैं, तो उन्हें यह समझना चाहिए कि आपकी कुंडली में पितृ दोष या कालसर्प दोष बना हुआ है. बार-बार सपने में सांप को देखना शुभ नहीं माना जाता है. इसके उपाय के लिए दोषों की शांति कराना चाहिए. स्वप्न शास्त्र के अनुसार अगर सपने मे किसी को ढेर सारे सांप दिखे, तो इसको शास्त्रों में शुभ नहीं माना जाता है. यह सपना यह बताता है कि जल्द ही आप पर मुसीबत आने वाली है. कहीं वाद-विवाद होने वाला है.
जैसा कि सभी जानते है सांप और नेवले एक दूसरे के जानी दुश्मन माने जाते है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार अगर व्यक्ति सपने में सांप और नेवले की लड़ाई देखता है, तो समझ जाइए असल जिंदगी में आप किसी विवाद में फंसने वाले हैं. कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाना पड़ सकता है.
स्वप्न शस्त्र के अनुसार अगर सपने में सांप आपके पीछे पड़ा हुआ है, तो यह जानना चाहिए कि आपके ऊपर जल्द ही कोई मुसीबत आने वाली है. यह सपना अशुभ घटना का संकेत देता है.
अक्सर देखा जाता है कि इंसान सांप को देख कर भागने लगता है कि सांप उन्हें काट नहीं ले, लेकिन सपने में अगर आपको सांप काट लेता है. तो बहुत कम लोगों को पता होगा कि यह शुभ संकेत है. इसका मतलब आपको कोई शुभ समाचार मिलने वाला है.
स्वप्न शस्त्र के अनुसार अगर किसी व्यक्ति को सपने में काला सांप फन उठाएं दिख रहा है, तो यह शुभ संकेत माना गया है. उन्हें समझना चाहिए. कि जल्द ही जीवन में खुशहाली आने वाली है.
पितृपक्ष में श्राद्ध की कैसे हुई थी शुरुआत? दानवीर कर्ण से क्या है कनेक्शन
15 Sep, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में पितृपक्ष का बहुत महत्व है. आज यानी 14 सितंबर को पितृपक्ष का 9वां श्राद्ध है. इसकी 7 सितंबर से शुरुआत और समापन 21 सितंबर 2025 को होगा. पितृपक्ष 16 दिन चलता है और इन महत्वपूर्ण दिनों में पूर्वजों को याद किया जाता है. इन दिनों में मृतात्माओं के नाम पर श्रद्धा पूर्वक जो अन्न-जल, वस्त्र ब्राह्मणों को दान दिया जाता है. वह सूक्ष्म रूप से उन्हें प्राप्त हो जाता है और पितृ लोग संतुष्ट होकर पूरे वर्ष आशीष की वर्षा करते रहते हैं. मान्यता है कि पितृ पक्ष में श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं. ज्योतिष आचार्यों की मानें तो, पितृपक्ष का श्राद्ध महाभारत काल के दानवीर कर्ण से जुड़ा है. कहा जाता है कि सबसे पहले कर्ण ने ही श्राद्ध किया था. तो आइए पितृपक्ष के श्राद्ध पर पढ़ते हैं कर्ण की रोचक कहानी-
कर्ण ने मरने के बाद पितरों का तर्पण कैसे किया
महाभारत कथा के अनुसार, दानवीर कर्ण जब अपनी मृत्यु के बाद स्वर्गलोक में पहुंचे, तो उन्हें अन्न की जगह केवल सोना ही मिला. यह सब देखकर दानवीर कर्ण हैरान हो गए. तब उनकी आत्मा ने देवराज इंद्र से पूछा कि उन्हें खाने में सोने की चीजें क्यों दी जा रही है? इस पर स्वर्गलोक के देवता देवराज इंद्र ने कर्ण को बताया कि उन्होंने अपने जीवन के समय एक ऐसी बड़ी भूल कर दी है, जिसके कारण तुम्हें भी सोना ही खाने को दिया गया. असल में कर्ण ने अपने पितरों का कभी भी तर्पण या श्राद्ध नहीं किया था.
स्वर्गलोक से तर्पण के लिए कर्ण को धरती पर भेजा
देवराज इंद्र का उत्तर सुन कर्ण ने हाथ जोड़कर कहा कि उन्हें नहीं पता था कि, उनके पूर्वज कौन हैं और वे किस कुल से संबंध रखते हैं. वास्तविक पितरों के भ्रम में वे कुछ दान नहीं कर पाए. उन्होंने कहा, कि मृत्यु होने से कुछ समय पहले ही उन्हें यह रहस्य पता चला था कि वे वास्तव में कुंती पुत्र हैं. कर्ण की व्यथा सुनकर देवराज इंद्र ने सही मानी. इसके बाद स्वर्ग से कर्ण को अपनी गलती सुधारने के लिए मौका दिया गया और उन्हें दोबारा 16 दिनों के लिए वापस पृथ्वी पर भेजा गया. इसके बाद 16 दिनों तक कर्ण ने अपने पूर्वजों को याद करते हुए उन्हें भोजन अर्पित किया. तब से लेकर इसी 16 दिनों को पितृ पक्ष कहा जाने लगा.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 15 सितम्बर 2025)
15 Sep, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- इष्ट मित्रों से लाभ होगा, भोग-ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी, रुके कार्य बनेंगे।
वृष राशि :- अपनों से तनाव, प्रत्येक कार्य में बाधा होगी, लाभकारी कार्य सावधानी से करें, कार्य पर ध्यान दें।
मिथुन राशि :- धन लाभ, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, कार्यगति में सुधार अवश्य होगा।
कर्क राशि :- कार्य योजना फलीभूत होगी, दैनिक सफलता के कार्य संभव होंगे, तनाव से बचें।
सिंह राशि :- इष्ट मित्रों से सुख होगा, मनोबल उत्साहवर्धक होगा, कार्यगति में सुधार होगा।
कन्या राशि :- आशानुकूल सफलता से हर्ष होगा, दैनिक व्यवसाय में सुधार होगा, चिन्ता मुक्त रहेंगे।
तुला राशि :- आर्थिक योजना फलीभूत होंगी, सोचे कार्य समय पर पूर्ण होंगे, किसी के धोखे से बचें।
वृश्चिक राशि :- दूसरों के कार्य में भटकना पड़ेगा, समय बचाकर चलने से लाभ होगा, समय का ध्यान रखें।
धनु राशि :- दैनिक कार्यगति में सुधार होगा, योजना फलीभूत होगी, कार्य का ध्यान अवश्य रखें।
मकर राशि :- किसी का कार्य बनने से संतोष होगा, चिन्ता निवृत्ति होगी, व्यवसायिक क्षमता में सुधार होगा।
कुंभ राशि :- स्त्री शरीर कष्ट, मानसिक बेचैनी रहेगी, उद्विघ्नता व विद्या बाधा, कार्य बाधा बनेगी।
मीन राशि :- भाग्य का सितारा साथ देगा, बिगड़े कार्य अवश्य ही बनेंगे, मित्रों का सहयोग मिलेगा।
इस नवरात्रि गज पर होगा मां दुर्गा का आगमन, पालकी में प्रस्थान, जानें आपकी लाइफ पर क्या पड़ेगा प्रभाव
14 Sep, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ 22 सितंबर दिन सोमवार से होने वाला है. इस बार की शारदीय नवरात्रि 10 दिनों की है. इस नवरात्रि में चतुर्थी तिथि 2 दिनों की है. शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन मां दुर्गा का आगमन गज पर यानि हाथी पर हो रहा है, जबकि मां दुर्गा का प्रस्थान मनुष्य की सवारी यानि पालकी पर होगा. शारदीय नवरात्रि के समय में मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान की सवारी के शुभ और अशुभ संकेत होते हैं. आइए काशी के ज्योतिषाचार्य चक्रपाणि भट्ट से जानते हैं कि शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा की सवारी के क्या संकेत हैं?
हाथी पर होगा मां दुर्गा का आगमन
ज्योतिषाचार्य भट्ट बताते हैं कि जिस नवरात्रि का प्रारंभ सोमवार के दिन होता है, तो ऐसे में मां दुर्गा के आगमन की सवारी गज यानि हाथी होता है. मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर कैलाश पर्वत से धरती पर आती हैं.
मां दुर्गा की हाथी की सवारी के संकेत
ज्योतिषाचार्य भट्ट के अनुसार, मां दुर्गा के आगमन की सवारी हाथी के शुभ संकेत माने गए हैं. इसका तात्पर्य यह है शारदीय नवरात्रि लोगों के लिए सुख, समृद्धि, धन और धान्य प्रदान करने वाली है. इस समय में अच्छी वर्षा होने की संभावना है.
नर वाहन पर होगा प्रस्थान
इस बार शारदीय नवरात्रि का समापन यानि विजयदशमी या दुर्गा विसर्जन 2 अक्टूबर गुरुवार को है. ऐसे में जब मां दुर्गा का प्रस्थान गुरुवार को होता है तो उनका वाहन मनुष्य की सवारी यानि पालकी होती है. इस सवारी का भी संकेत शुभ फलदायी है. मां दुर्गा प्रस्थान करते समय भी लोगों को सुख और समृद्धि प्रदान करेंगी.
कैसे तय होती है माता की सवारी
नवरात्रि के समय में माता की सवारी क्या होगी, इसका निर्धारण नवरात्रि के प्रारंभ और समापन वाले दिन के आधार पर होता है.
माता के आगमन की सवारी
1. रविवार या सोमवार: जब इस दिन नवरात्रि शुरू होती है तो मातारानी के आगमन की सवारी हाथी होता है.
2. मंगलवार या शनिवार: जब नवरात्रि इन दो में से किसी एक दिन शुरू होती है तो माता की सवारी अश्व यानि घोड़ा होता है.
3. गुरुवार या शुक्रवार: इन दो दिनों में नवरात्रि शुरू होती है तो मां दुर्गा डोली में सवार होकर धरती पर आती हैं.
4. बुधवार: इस दिन नवरात्रि का प्रारंभ होता है तो मां दुर्गा का वाहन नौका होती है.
माता के प्रस्थान की सवारी
1. रविवार या सोमवार: जब विजयदशमी या दुर्गा विसर्जन रविवार या सोमवार को होता है तो मातारानी का प्रस्थान का वाहन भैंसा होता है.
2. मंगलवार या शनिवार: यदि दुर्गा विसर्जन मंगलवार या शनिवार को होता है तो मां दुर्गा के प्रस्थान का वाहन मूर्गा होता है.
3. बुधवार या शुक्रवार: जब मां दुर्गा बुधवार या शुक्रवार के दिन धरती से विदा होती हैं तो उनका वाहन हाथी होता है.
4. गुरुवार: जब दुर्गा विसर्जन गुरुवार को होता है तो मातारानी का प्रस्थान मनुष्य की सवारी यानि पालकी या डोली में होता है.
पितृपक्ष में आटे का दीपक जलाना क्यों माना जाता है सबसे शुभ, जानिए इसके पीछे की मान्यता
14 Sep, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जहां दीपक जलता है, वहां अंधेरा टिक नहीं पाता.. कुछ ऐसा ही महत्व है पितृपक्ष में आटे के दीपक का. मान्यता है कि इस समय अपने पूर्वजों को याद करना, उनके लिए श्राद्ध, तर्पण और दान करना बेहद शुभ होता है. माना जाता है कि पितृपक्ष में छोटा सा दीपक भी बड़ी खुशियां ला सकता है.
घर के मुख्य द्वार पर आटे का दीपक जलाने से न सिर्फ पितरों की आत्मा तृप्त होती है, बल्कि घर में सुख-शांति और समृद्धि का भी वास होता है. कहा जाता है कि इस दीपक की लौ से नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और सकारात्मकता का संचार होता है.
क्या है महत्व
जब मनुष्य इस संसार से चला जाता है तो उसका पंचभौतिक शरीर यानी मांस और हड्डी का शरीर अग्नि को समर्पित कर दिया जाता है, लेकिन उसके बाद जो सूक्ष्म शरीर होता है, जिसे प्रेत शरीर भी कहा जाता है, उसकी तृप्ति के लिए आटे के अंदर पिंड बनाकर विशेष प्रक्रिया की जाती है. इसी कारण से आटे के दीपक को पितृपक्ष में खास महत्व दिया गया है.
आटे के दीपक से पितृ होते हैं प्रसन्न
स्वामी जी का कहना है कि भादो पूर्णिमा से लेकर अश्विन अमावस्या तक के 16 दिनों को पितृपक्ष कहा जाता है. मान्यता है कि इन दिनों हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं और अपने वंशजों से मिलने उनके घर-आंगन तक आते हैं. ऐसे में यदि उनके स्वागत में आटे का दीपक जलाया जाए, तो पितर बेहद प्रसन्न होते हैं.
महंत स्वामी कामेश्वरानंद का कहना है कि दीपक हमेशा घर के मुख्य द्वार पर जलाना चाहिए. सबसे शुभ माना जाता है अगर दीपक पूरब या उत्तर दिशा की ओर मुख करके जलाया जाए लेकिन अगर घर का गेट किसी और दिशा में है तो वहीं दीपक रखा जा सकता है. यह दीपक शाम के समय जलाना उत्तम होता है. उनका कहना है कि मिट्टी के दीपक की तुलना में पितर आटे के दीपक से ज्यादा खुश होते हैं, क्योंकि आटे को ही पिंड का रूप माना गया है. नरम आटे से बना दीपक उनके सूक्ष्म शरीर को अधिक भाता है.
क्या होता है फायदा
आटे के दीपक की लौ सिर्फ रोशनी ही नहीं फैलाती बल्कि यह मान्यता भी है कि इससे घर में लड़ाई-झगड़े दूर होते हैं. पति-पत्नी के रिश्ते मधुर होते हैं और वंश की वृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है. यानी छोटा सा दीपक पूर्वजों की आत्मा को तृप्त कर देता है और परिवार के लिए खुशहाली का संदेश लेकर आता है. यही कारण है कि पितृपक्ष में आटे का दीपक जलाने की परंपरा आज भी उतनी ही आस्था और श्रद्धा से निभाई जाती है.
जीवित्पुत्रिका व्रत के साथ मासिक जन्माष्टमी का शुभ संयोग, कृष्णजी को जरूर अर्पित करें यह चीज, फिर देखें चमत्कार
14 Sep, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक कृष्ण जन्माष्टमी और जीवित्पुत्रिका व्रत है. जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व संतान-सुरक्षा से जुड़ा है. यह विशेषकर माताएं अपने बच्चों की दीर्घायु और कल्याण के लिए करती हैं. शास्त्रों में कहा गया है कि संतान पर आने वाले आयु संकट, रोग या अकाल मृत्यु के योग माता के उपवास और तप से टल सकते हैं. इस दिन माताएं निर्जला उपवास रखती हैं और भगवान शिव-पार्वती की पूजा करती हैं. आइए जानते हैं जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व, कथा और पूजा विधि…
जीवित्पुत्रिका व्रत 2025 शुभ योग
दृक पंचांग के अनुसार, अभिजीत मुहूर्त सुबह के 11 बजकर 52 मिनट से शुरू होकर दोपहर के 12 बजकर 41 मिनट तक रहेगा और राहुकाल का समय शाम के 4 बजकर 55 मिनट से शुरू होकर 6 बजकर 27 मिनट तक रहेगा. इस दिन सूर्य सिंह राशि में रहेगा और चंद्रमा रात के 8 बजकर 3 मिनट तक वृषभ राशि में रहेंगे, इसके बाद मिथुन राशि में संचार कर जाएंगे, जहां गुरु ग्रह के साथ युति बनेगी. साथ ही इस दिन रवि योग, सिद्धि योग और गजकेसरी योग भी बन रहा है, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है.
जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व
जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व संतान-सुरक्षा से जुड़ा है. यह विशेषकर माताएं अपने बच्चों की दीर्घायु और कल्याण के लिए करती हैं. जीवित्पुत्रिका व्रत में माताएं निर्जला उपवास रखती हैं और भगवान शिव-पार्वती की पूजा करती हैं. संतान की कुशलता के लिए जप, कथा और संकल्प किए जाते हैं. इसका सीधा संबंध संतान को मृत्यु-दोष से बचाने और दीर्घायु प्रदान करने से है. इस प्रकार जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व केवल धार्मिक आस्था नहीं बल्कि शास्त्रसम्मत संतान-सुरक्षा साधन माना गया है.
जीवित्पुत्रिका व्रत कथा
पुराणों के अनुसार, जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है. एक कथा के अनुसार, इसका संबंध महाभारत काल से है. गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन ने खुद को गरुड़ को सौंपकर एक नागिन के बेटे की जान बचाई थी, जिसके बाद से संतान की लंबी आयु के लिए इस व्रत को करने का प्रचलन शुरू हुआ. माताएं इस दिन निर्जला उपवास रखती हैं और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं, जिससे उनकी संतानों को कष्टों से मुक्ति मिलती है और उनकी दीर्घायु, सुख-समृद्धि व कल्याण होता है. यह व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है. नेपाल में इसे जितिया उपवास के रूप में जाना जाता है.
जीवित्पुत्रिका व्रत के साथ मासिक कृष्ण जन्माष्टमी
इसी के साथ ही, इस दिन मासिक कृष्ण जन्माष्टमी भी है. हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है. इस दिन भगवान कृष्ण की पूजा करने से यश, कीर्ति, धन, ऐश्वर्य और संतान सुख की प्राप्ति होती है. माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से पूजा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है.
कृष्णजी पर अर्पित करें मोर पंख
भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर भगवान श्री कृष्ण का अवतरण हुआ था. इसलिए हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पर्व मनाया जाता है. मासिक कृष्ण जन्माष्टमी रविवार की सुबह 5 बजकर 4 मिनट से शुरू होकर सोमवार की सुबह 3 बजकर 6 मिनट तक रहेगी. मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पूजा के दौरान भगवान कृष्ण को मोर पंख चढ़ाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है, जो परिवार के सदस्यों को बुरी नजर और सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं से बचाती है.
प्रभु राम ने कहां किया था अपने पिता का श्राद्ध? भागे आते हैं लोग, तर जाते हैं पितर
14 Sep, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सप्तपुरियों में राम नगरी अयोध्या मठ मंदिरों और सरयू के घाटों की वजह से विश्व विख्यात है. समस्त पापों से मुक्ति पाने के लिए लोग यहां सरयू में स्नान करते हैं. दूसरी तरफ, पितृपक्ष के दौरान लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पवित्र नदियों में पिंडदान तर्पण क्रिया करते हैं. क्या आप जानते हैं कि प्रभु राम ने अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध कर्म कहां किया था? आइये उसके बारे में विस्तार से जानते हैं. अयोध्या राम मंदिर से करीब 16 किलोमीटर दूर नंदीग्राम स्थित है, जहां भगवान राम के अनुज भरत की तपोभूमि भरतकुंड भी है. यही वो स्थल है जहां वनवास से लौटने के बाद भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध किया था.
तीर्थ के समान पुण्य
धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष के दिनों में दूर-दूर से लोग यहां आते हैं और अपने पितरों का श्राद्ध तर्पण और पिंडदान करते हैं. इसके अलावा, यह भी मान्यता है कि भगवान विष्णु के दाहिने पैर का चिन्ह भरत कुंड स्थित गया वेदी पर है और बाय पांव का गया जी बिहार में है. यही वजह है कि भरत कुंड में पिंडदान करने से गया तीर्थ के समान पुण्य की प्राप्ति भी होती है. पितृ पक्ष के दौरान भरत कुंड में प्रतिदिन हजारों की संख्या में लोग आते हैं और अपने पितरों का श्राद्ध करते हैं. भगवान राम ने भी यहीं पर राजा दशरथ का श्राद्ध किया था. शायद यही वजह है कि भरत कुंड को मिनी गया की उपाधि से भी नवाजा गया है. धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक, भगवान राम जब वनवास जा रहे थे तो उनका खड़ाऊ भरत जी ने सिर पर रखकर इसी स्थल पर 14 वर्ष तक तपस्या की थी. यही वजह है कि इस स्थल को भरत की तपोस्थली के नाम से भी जाना जाता है.
आते हैं हजारों
कि पितृ पक्ष के दौरान भरत कुंड में पितरों के निमित्त लोग श्राद्ध करने आते हैं. प्रतिदिन आसपास के जिलों के हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. मान्यता है कि प्रभु राम अपने चारों भाइयों के साथ यहीं पर राजा दशरथ का श्रद्धा किया था. अयोध्या पहुंचे एक श्रद्धालु ने बताया कि यहां हम लोग अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध तर्पण और पिंडदान करने आए हैं. हम लोग गोंडा से आए हैं. यह बहुत धार्मिक जगह है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 14 सितम्बर 2025)
14 Sep, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- धन का व्यर्थ व्यय होगा, मानसिक अशांति एवं कष्ट, मन विक्षुब्ध रहेगा, विलम्ब से कार्य बनेंगे।
वृष राशि :- चिन्ताग्रस्त होने से बचें, व्यवसायिक क्षमता अनुकूल बनेगी, समय का ध्यान अवश्य रखें।
मिथुन राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति, असमर्थता का वातावरण कष्टप्रद रहेगा, कार्य पर ध्यान दें।
कर्क राशि :- किसी प्रलोभन से बचें अन्यथा परेशानी में फंस सकते हैं, समय का ध्यान अवश्य रखें।
सिंह राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति के कारण असमर्थता का वातावरण रहेगा, कष्टप्रद स्थिति रहेगी, विचारकर चलें।
कन्या राशि :- विवादग्रस्त होने की संभावना, सोचे कार्य समय पर बनेंगे, सुख प्राप्त होगा।
तुला राशि :- कुटुम्ब की समस्यायें सुलझेंगी, कार्यगति में सुधार होगा, कार्ययोजना फलीभूत होगी।
वृश्चिक राशि :- कार्य कुशलता से संतोष होगा, दैनिक समृद्धि के साधन बनेंगे, व्यवसायिक वृद्धि होगी।
धनु राशि :- अधिकारियों से तनाव, मित्र वर्ग की उपेक्षा से मन अशांत रहेगा, कार्य बाधा रहेगी।
मकर राशि :- मान-प्रतिष्ठा पर आंच आने की संभावना है, कार्यगति में बाधा बनेगी, धैर्य अवश्य रखें।
कुंभ राशि :- किसी घटना का शिकार होने से बचें, चोटादि का भय अवश्य ही बनेगा, सावधान रहें।
मीन राशि :- स्त्री-वर्ग से सुख व हर्ष मिलेगा, बिगड़े कार्य बनेंगे, समय का लाभ लें, कार्य बनेंगे।
तुलसी में कब और कैसे चढ़ाएं जल? जानें सही समय, नियम और इसके चमत्कारी फायदे
13 Sep, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारतीय संस्कृति में तुलसी के पौधे का महत्व बेहद खास माना गया है. घर के आंगन में तुलसी का पौधा होने से सकारात्मक ऊर्जा आती है और परिवार के लोग हर समय सुरक्षित व खुश रहते हैं. ज्योतिष और धर्मग्रंथों के अनुसार तुलसी को माता लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है और भगवान विष्णु को भी यह अत्यंत प्रिय है. इसलिए इसके पूजन और देखभाल में खास नियम बताए गए हैं. खासकर तुलसी में जल चढ़ाने का समय और तरीका बहुत मायने रखता है, अगर सही समय पर तुलसी में जल चढ़ाया जाए तो व्यक्ति को धन, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है. वहीं अगर नियमों का पालन न किया जाए तो इसका उल्टा असर भी हो सकता है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
तुलसी में जल चढ़ाने का सही समय
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तुलसी में जल चढ़ाने का सबसे शुभ समय सूर्योदय से पहले का माना गया है. इस समय किया गया पूजन सबसे ज्यादा फलदायी होता है. मान्यता है कि अगर सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनकर तुलसी को जल चढ़ाया जाए तो घर में लक्ष्मी जी की कृपा बनी रहती है और जीवन में आर्थिक प्रगति होती है. साथ ही तुलसी में जल चढ़ाने से पहले अन्न ग्रहण न करना भी शुभ माना गया है.
तुलसी में जल चढ़ाने के नियम
1. सुबह स्नान करके ही तुलसी को जल अर्पित करें.
2. जल हमेशा तांबे के लोटे या पात्र से चढ़ाना शुभ माना गया है.
3. जल चढ़ाते समय आपका मुख पूर्व दिशा या ईशान कोण की ओर होना चाहिए.
4. तुलसी के पौधे में जल हमेशा जड़ की तरफ से ही चढ़ाना चाहिए ताकि पूरा पौधा इसका लाभ पा सके.
5. जल चढ़ाने के साथ अगर दीपक भी जलाया जाए तो और भी शुभ फल मिलता है.
इस समय भूलकर भी न चढ़ाएं जल
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तुलसी में जल चढ़ाने का कुछ समय वर्जित है.
1. दोपहर 12 बजे के बाद तुलसी में जल नहीं चढ़ाना चाहिए.
2. संध्याकाल और रात के समय तुलसी का स्पर्श भी वर्जित माना गया है.
3. रविवार और एकादशी तिथि पर तुलसी में जल अर्पित करना मना है.
4. तुलसी में बहुत अधिक मात्रा में जल एक साथ नहीं चढ़ाना चाहिए.
तुलसी में जल चढ़ाने के फायदे
1. घर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और सकारात्मक वातावरण बनता है.
2. परिवार में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है.
3. भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है.
4. धन हानि से बचाव होता है और आर्थिक प्रगति के रास्ते खुलते हैं.
5. स्वास्थ्य पर भी अच्छा असर पड़ता है क्योंकि तुलसी का पौधा वायु को शुद्ध करता है.
पुष्कर में आत्माओं को मिलती है मुक्ति, होता है 5 पीढ़ियों का उद्धार, जानें भगवान राम का यहां से संबंध
13 Sep, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पितरों की पूजा का पर्व पितृ पक्ष चल रहा है. पितृ पक्ष के समय में पितरों की मुक्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान आदि किया जाता है. पितृ पक्ष के समय में लोग गया, प्रयागराज, काशी, उज्जैन आदि धार्मिक जगहों पर जाकर अपने पितरों के लिए श्राद्ध करते हैं, ताकि उनका उद्धार हो जाए. पितृ पक्ष के समय में राजस्थान का पुष्कर भी पितरों के श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण है. पुष्कर में आत्माओं को मुक्ति मिलती है. इस जगह का भगवान श्रीराम से भी संबंध है. आइए जानते हैं पुष्कर के महत्व के बारे में.
राजस्थान का पुष्कर एक प्राचीन और अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थस्थल के रूप में पूरे भारत में प्रसिद्ध है. यह न केवल अपनी धार्मिक महत्ता के लिए जाना जाता है, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत विशिष्ट स्थान रखता है.
ब्रह्माजी का एकमात्र मंदिर
पुष्कर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान ब्रह्मा का विश्व में एकमात्र मंदिर स्थित है. हिंदू धर्म में ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता माना गया है. पुष्कर में स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के बीच आकर्षण का मुख्य केंद्र है.
श्राद्ध कर्म के लिए भी प्रसिद्ध है पुष्कर
पुष्कर की धार्मिक महत्ता केवल ब्रह्मा मंदिर तक ही सीमित नहीं है. यह स्थान पितरों के तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए भी विशेष रूप से प्रसिद्ध है. यहां पर व्यक्ति अपने सात कुलों और पांच पीढ़ियों तक के पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए श्राद्ध कर्म कर सकता है.
पितरों को मिलता है मोक्ष
मान्यता है कि पुष्कर में श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उनकी आत्मा को शांति मिलती है. इसलिए हर वर्ष पितृ पक्ष के दौरान हजारों श्रद्धालु यहां एकत्र होते हैं और अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पूजा-पाठ और तर्पण करते हैं.
प्रभु श्रीराम ने पुष्कर में किया था पिता का श्राद्ध
कहा जाता है कि भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ पुष्कर आए थे और अपने पिता महाराज दशरथ का श्राद्ध किया था, जिसके बाद राजा दशरथ ने उन्हें आशीर्वाद भी दिया. यही कारण है कि यह स्थान श्राद्ध कर्म के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है.
यहां धुल जाते हैं सब पाप
पुष्कर सरोवर, जो कि 52 घाटों से घिरा हुआ है, श्रद्धालुओं के स्नान और पूजा का मुख्य स्थल है. मान्यता है कि इस सरोवर में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं और व्यक्ति को आध्यात्मिक शुद्धता प्राप्त होती है. पुष्कर का धार्मिक वातावरण, यहां की शांत वायु, मंत्रोच्चार की गूंज और पुरोहितों द्वारा करवाए जाने वाले वैदिक कर्मकांड इसे एक अद्भुत तीर्थ स्थल बनाते हैं.
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