धर्म एवं ज्योतिष
नवरात्र पर जानें देवी के इन 2 जाग्रत शक्तिपीठों की कहानी, यहां दिन भर होती रहती हैं तंत्र साधनाएं
29 Sep, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
शारदीय नवरात्रि अब अपने समापन की तरफ बढ़ रहे हैं, यह पर्व देवी दुर्गा की उपासना और शक्ति की आराधना का प्रतीक है. इस अवसर पर देश भर के देवी मंदिरों में लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं. इन मंदिरों में विशेष रूप से त्रिपुर सुंदरी और कामाख्या देवी के शक्तिपीठ का महत्व अद्वितीय है. ये दोनों मंदिर माता सती के 51 शक्तिपीठों में गिने जाते हैं और अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक महत्ता के कारण दूर-दूर से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं. शक्तिपीठ वे दिव्य स्थान हैं जहां माता सती के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे थे. इन्हें मां शक्ति के जीवंत केंद्र माना जाता है. पुराणों में 51 या 108 शक्तिपीठों का उल्लेख मिलता है.
त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ (Tripurasundari Shaktipeeth)
त्रिपुरा राज्य के उदयपुर नगर में स्थित त्रिपुर सुंदरी मंदिर, जिसे माताबाड़ी के नाम से भी जाना जाता है, पूर्वोत्तर भारत के सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है. इसे त्रिपुरा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर का प्रतीक भी कहा जाता है. मान्यता है कि भगवान शिव के तांडव नृत्य के समय जब सती माता का शरीर खंडित हो रहा था, तब उनका दाहिना पैर यहीं आकर गिरा था. तभी से यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजित है और यहां माता को त्रिपुर सुंदरी के रूप में श्रद्धा दी जाती है.
इस मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि इसका आधार कछुए के कूबड़ के आकार का है, इस कारण इसे कूर्म पीठ भी कहा जाता है. हिंदू परंपरा में कछुआ स्थिरता और सहनशीलता का प्रतीक है. मंदिर के पास स्थित कल्याण सागर झील श्रद्धालुओं की आस्था को और गहरा करती है. यहां कछुओं को पवित्रता और शक्ति के जीवित प्रतीक के रूप में पूजने की परंपरा है.
इसी प्रकार, असम की राजधानी गुवाहाटी के नीलांचल पर्वत पर स्थित कामाख्या देवी मंदिर भी शक्तिपीठों में प्रमुख है. मान्यता है कि यहां माता सती की योनि गिरी थी. यह मंदिर कामदेव द्वारा विश्वकर्मा की सहायता से निर्मित बताया जाता है. प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि यह मंदिर कभी बहुत भव्य और विशाल था, जिसकी सुंदरता की तुलना नहीं की जा सकती थी. हालांकि, इसका इतिहास कई किंवदंतियों और रहस्यों से भरा हुआ है. माना जाता है कि इसका निर्माण आर्य सभ्यता से भी पूर्व हुआ था.
कामाख्या मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं है. गर्भगृह में एक प्राकृतिक योनिकुंड है, जिसे निरंतर जलधारा से सिंचित किया जाता है. श्रद्धालु इसी को शक्ति स्वरूपा कामाख्या देवी मानकर पूजते हैं. यह मंदिर तांत्रिक साधनाओं का भी प्रमुख केंद्र है और इसे तंत्र विद्याओं की जननी कहा जाता है. नवरात्र जैसे अवसरों पर इन मंदिरों का महत्व और भी बढ़ जाता है, जब लाखों श्रद्धालु यहां शक्ति स्वरूपा देवी की आराधना के लिए आते हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (29 सितम्बर 2025)
29 Sep, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष- दूर की यात्रा सफलता पूर्वक होगी, शत्रु पक्ष कमजोर होगा, कार्य अवरोध होगा।
वृष- अच्छे गुणों की हानि, स्त्री संतान के कार्य पर विशेष ध्यान अवश्य ही दें।
मिथुन- आर्थिक कमी के कारण मानसिक क्लेश होगा, संतान पक्ष से कष्ट होगा।
कर्क- प्रियजनों से मेल मिलाप, स्थिति में सुधार होगा, साधनों की प्राप्ति होगी।
सिंह- संतान के स्वास्थ पर ध्यान देना होगा, सभी कार्य में प्रगति होगी, रुके कार्य बनेगें।
कन्या- राजकीय तथा नौकरी व्यावसाय में सफलता अवश्य ही मिलेगी, ध्यान दें।
तुला- यात्रा देश हित का अवसर मिलेगा, विचारों का आदान प्रदान होगा।
वृश्चिक- स्वजनों का साथ मिलेगा, प्रयत्न से विभाग, वाहन की प्राप्ति होगी।
धनु- साहसिक कार्यो में रुचि बढ़ेगी, भाग्योदय से पत्नी व बच्चों के दायित्व की पूर्ति होगी।
मकर- व्यवसाय में कोई परिवर्तन नहीं होगा, बाधायें अवश्य बनेगी।
कुंभ- उद्योग में बाधायें बनेगी, किन्तु यात्रा अवश्य करे, रुकें कार्य पूर्ण होंगे।
मीन- अध्यन में रुचि, मानसिक व शारीरिक भ्रम बाधा, कार्य अधिक करना होगा।
रुस्तमपुर में 108 चेहरों व 121 हाथों वाली मां दुर्गा की अद्भुत प्रतिमा स्थापित
27 Sep, 2025 07:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
गोरखपुर। शारदीय नवरात्र के अवसर पर शहर के विभिन्न इलाकों में भव्य पंडालों के साथ माता दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित की जा रही हैं। इसी क्रम में रुस्तमपुर इस बार विशेष आकर्षण का केंद्र बनने जा रहा है। यहां 108 चेहरों और 121 हाथों वाली अद्वितीय मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई है, जो श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह का केंद्र बनी हुई है। महाकाल समिति, रुस्तमपुर के तत्वावधान में बृहस्पतिवार को गुलरिहा से माता की प्रतिमा जयघोष और भजन-कीर्तन के साथ पंडाल तक लाई गई। श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ माता का स्वागत किया। समिति के अध्यक्ष अनूप निषाद ने बताया कि वर्ष 1998 से यहां प्रतिमा स्थापित की जा रही है। बीते वर्ष से अलग हटकर प्रतिमाएं मंगाने का निर्णय लिया गया है, ताकि श्रद्धालुओं को कुछ विशेष अनुभव मिल सके। इस वर्ष की प्रतिमा लगभग 15 फीट ऊंची है और अन्य पारंपरिक प्रतिमाओं से भिन्न है। इसके अनेक चेहरे और हाथ इसे अद्वितीय बनाते हैं। नवरात्र के दौरान यहां प्रतिदिन भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (27 सितम्बर 2025)
27 Sep, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष- विघटनकारी तत्वों से क्षतिग्रस्त होने से बचियें, समस्याएं बनी ही रहेगी।
वृष- कार्य सफलता से संतोष, स्त्रीवर्ग से उल्लास, आपकी चिन्ताएं कम अवश्य होंगी।
मिथुन- आशानुकूल सफलता मिलेगी, व्यावसायिक क्षमता अनुकूल बनेगी, समय का ध्यान दें।
कर्क- अशुद्ध गोचर रहने से विशेष कार्य स्थिगित रखे, अधिकारियों से तनाव बन सकता हैं।
सिंह- आर्थिक योजना फलीभूत होगी, विरोधी परेशान करेंगे, कार्य की अवश्य चिन्ता बनेगी।
कन्या- स्वभाव में अशान्ति, मानसिक बेचैनी, कार्यतीव्रता के कुछ प्रयास अवश्य सफल होगें।
तुला- अर्थव्यवस्था कुछ अनुकूल होगी, आशानुकूल सफलता का हर्ष अवश्य ही होगा।
वृश्चिक- इष्ट मित्र सहायक रहेंगे, बड़े-बड़े लोगों से मेल मिलाप अवश्य ही होगा, कार्य बनेगा।
धनु- मान प्रतिष्ठा बाल-बाल बचे, कार्य वृत्ति में सुधार होगा, रुके कार्य शीघ्र निपटा ले।
मकर- व्यवसाय में व्यग्रता, तनाव व क्लेश से हानि, कार्य को स्थगित कर देवें, समय का ध्यान रखे।
कुंभ- सफलता के साधन जुटायें, धन लाभ, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, ध्यान रखे।
मीन- बिगड़े कार्य बनेंगे, योजना फलीभूत होगी, इष्टमित्र सुख वर्धक अवश्य होंगे।
October 2025 Ekadashi Dates: अक्टूबर में पापाकुंशी और रमा एकादशी का व्रत, जानें तिथि और व्रत कथा का महत्व
26 Sep, 2025 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हर माह में दो एकादशी तिथि आती हैं। उसी तरह अक्टूबर माह में भी दो एकादशी आएगी। पापांकुशा एकादशी और रमा एकादशी का व्रत इस महीने किया जाएगा। एकादशी का व्रत करने वालों को भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दौरान पूजा पाठ करने से जीवन में सुख समृद्धि और मां लक्ष्मी की विशेष कृपा मिलती है। आइए जानते हैं अक्टूबर माह में कब कब रखा जाएगा एकादशी का व्रत।
कब है पापांकुशा एकादशी व्रत ?
पंचांग के अनुसार, आश्विन माह में आने वाली एकादशी तिथि को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। इस साल आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 2 अक्टूबर को रात में 7 बजकर 9 मिनट पर होगा और 3 अक्टूबर की शाम 6 बजकर 32 मिनट पर एकादशी तिथि समाप्त होगी। उदय तिथि के अनुसार, पापाकुंशी एकादशी तिथि का व्रत 3 अक्टूबर को ही रखा जाएगा। पापांकुशा एकादशी व्रत का पारण 4 अक्टूबर को किया जाएगा।
कब है रमा एकादशी का व्रत ?
पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह में आने वाली एकादशी तिथि को रमा एकादशी कहा जाता है। कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 16 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 35 मिनट पर आरंभ होगा और 17 अक्टूबर को शाम में 11 बजकर 12 मिनट पर एकादशी तिथि समाप्त हो जाएगी। ऐसे में रमा एकादशी का व्रत 16 अक्टूबर को उदय तिथि के हिसाब से किया जाएगा।
पापाकुंशी एकादशी का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार,पापांकुशा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही व्यक्ति के जीवन में सुख शांति भी बनी रहती है। इसी के साथ व्रत करने वालों को नरम से मुक्ति मिलती है।
रमा एकादशी का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रमा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को आर्थिक बाधाओं से मुक्ति मिलती है। साथ ही व्रत करने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और धन धान्य से जुड़ी सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं।
व्रत कथा का फल पाने के लिए दुर्गा सप्तशती पाठ के नियमों का पालन जरूरी, आम गलतियों से बचें और सही विधि अपनाएं
26 Sep, 2025 07:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Durga Saptashati Path : शारदीय नवरात्रि 22 अक्टूबर से शुरू हो चुकी है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है और भक्तों द्वारा व्रत किया जाता है। जिसमें दुर्गा सप्तशती का पाठ करने का बेहद खास महत्व होता है। ऐसा करने से जातक को जीवन के हर प्रकार के दुखों से छुटकारा मिल सकता है और सुखों में वृद्धि होती है। लेकिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय कुछ विशेष नियमों का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है। इसके 13 अध्याय को प्रत्येक दिन एक-एक करने नहीं पढ़ना चाहिए। अगर व्रत कथा पाठ करते समय ऐसी ही कुछ गलतियां हो जाए तो इसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। ऐसे में आइए विस्तार से जानें दुर्गा सप्तशती पाठ के नियम...
दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के नियम
दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से पहले स्नानादि करके साधक को लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। इन रंगों को नवरात्रि में पूजा के दौरान पहनना बहुत शुभ माना जाता है। इसके बाद, गंगाजल छिड़कर देवी का ध्यान करें।
देवी का ध्यान करने के साथ-साथ व्रत कथा का पाठ कभी भी सीधा शुरू नहीं करना चाहिए। इससे पहले पवित्र मंत्र का जाप करना आवश्यक माना गया है। ऐसे में दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले 'ओम अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः' मंत्र का जाप जरूर करें।
मान्यता है कि किसी भी अध्याय की शुरुआत करने से पहले कवच, कीलक और अर्गला का पाठ जरूर करना चाहिए। सीधा दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से इसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। इनका पाठ करने के बाद ही साधक को 13 अध्यायों का पाठ करना चाहिए।
दुर्गा सप्तशती के पाठ में 13 अध्याय एक ही बार में पढ़ने का विधान होता है। अगर आप नियमित इसी प्रकार दुर्गा सप्तशती पाठ करते हैं तो इससे अत्यंत शुभ फल की प्राप्ति होती है। लेकिन अगर आपके लिए ऐसा कर पाना संभव न हो तो इसका 3 भाग में पाठ कर सकते हैं। प्रथम चरित्र में पहला अध्याय का पाठ, दूसरे चरित्र में 2 से लेकर चौथा अध्याय और तीसरे चरित्र में पंचम से लेकर 13वें अध्याय का पाठ करना चाहिए।
अगर साधक तीन चरित्रों में दुर्गा सप्तशती का पाठ न कर पाए, तो देवी के सामने पहले इस बात का संकल्प लेना चाहिए कि आप नवरात्रि के 9 दिनों में दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों का पाठ करेंगे। इस प्रकार नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से साधक के सुखों में वृद्धि होती है और व्रत कथा के पाठ का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों का पाठ करने के बाद अंत में क्षमा प्रार्थना जरूर करें और रात्रि सूक्तम का पाठ करना भी आवश्यक होता है। नवरात्रि के नौ दिनों में 13 अध्यायों का विधिपूर्वक पाठ करने से आपको जीवन के हर प्रकार के दुखों से छुटकारा मिल सकता है और मनवांछित फल प्राप्त होता है।
छठ पूजा 2025 का विस्तृत पंचांग: नहाय-खाय, खरना और सूर्योदय अर्घ्य सहित पूजा की पूरी जानकारी
26 Sep, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Chhath Puja 2025: छठ पूजा का त्योहार बेहद खास होता है, जिसे महापर्व भी कहते हैं। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश में इसका बहुत विशेष महत्व होता है। दीवाली के अगले दिन से ही छठ की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। यह त्योहार पूरे 4 दिनों का होता है जिसकी शुरुआत नहाय खाय से होती है। छठ महापर्व का व्रत बहुत कठिन होता है। इसे करने से व्रती को अत्यंत शुभ फल की प्राप्ति होती है। आइए विस्तार से जानें इस साल नहाय-खाय, खरना और छठ पूजा किस तारीख को पड़ रही है।
छठ पूजा 2025 नहाय खाय की तिथि
इस साल छठ महापर्व में नहाय खाय की शुरुआत 25 अक्टूबर, शनिवार के दिन से होगी। इस दिन का बहुत खास महत्व होता है। नहाय खाय के दिन महिलाएं नदी में स्नान करती हैं और सात्विक भोजन करती हैं। इससे तीन दिन तक चलने वाले व्रत और पूजा के लिए मानसिक व शारीरिक रूप से मजबूती मिलती है। साथ ही, महिलाएं 36 घंटे तक चलने वाले कठिन व्रत के लिए तैयार हो जाती हैं।
छठ पूजा 2025 खरना की तारीख
नहाय-खाय के अगले दिन खरना होता है, जो इस बार 26 अक्टूबर, रविवार के दिन पड़ेगा। इस दिन शाम के समय रोटी, गुड़ की खीर और फल का भोग लगाया जाता है। भोग लगाने के बाद व्रत रखने वाली महिलाएं प्रसाद को खुद ग्रहण करती हैं और फिर, सभी को देती हैं। इसी के बाद से निर्जला व्रत का आरंभ हो जाता है जो उगते हुए सूर्य को देने के बाद समाप्त होता है।
छठ पूजा 2025 सूर्य षष्ठी की तिथि
दीवाली के बाद षष्ठी तिथि के दिन छठ पूजा की शुरुआत हो जाती है। खरना के बाद यानी तीसरे दिन छठ के महापर्व की शुरुआत होती है, जिसमें डूबते हुए सूर्य को घाट पर जाकर अर्घ्य दिया जाता है और छठ मईया की पूजा की जाती है। इस साल 27 अक्टूबर, सोमवार के दिन छठ पूजा मनाई जाती है। व्रती महिलाएं शाम के समय घाट पर जाकर नदी में खड़े होकर डूबते हुए सूरज को अर्घ्य देती हैं, छठी मईया के गीत गाती हैं और विधि-विधान से पूजा करती हैं।
छठ पूजा 2025 सूर्योदय अर्घ्य तिथि
डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रती महिलाएं पूरे परिवार के साथ अगले दिन सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने जाती हैं। यह तिथि इस बार 28 अक्टूबर आमतौर पर महिलाएं नंगे पांव घाट तक जाती हैं और वहां सूर्य को अर्घ्य देते हुए जीवन में सुख-समृद्धि और अपने संतान की लंबी आयु की कामना करती हैं। इसी दिन महिलाओं का 36 घंटे तक चलने वाला व्रत समाप्त हो जाता है। छठ पूजा में विशेष रूप से सूर्य देवता और छठ मईया की पूजा की जाती है।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (26 सितम्बर 2025)
26 Sep, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- मानप्रतिष्ठा बाल बाल बचे, कार्य व्यवसाय गति उत्तम, स्त्री वर्ग से क्लेश होगा।
वृष राशि :- धन प्राप्ति के योग बनेंगे, नवीन मैत्री व मंत्रणा प्राप्त होगी, ध्यान अवश्य रखें।
मिथुन राशि :- इष्ट मित्र वर्ग सहायक रहे, व्यवसायिक क्षमता में वृद्धि होवे तथा कार्य बनेंगे।
कर्क राशि :- सामाजिक मान प्रतिष्ठा, कार्य कुशलता, संतोषजनक रहे, कार्य बनने लगेगे।
सिंह राशि :- परिश्रम से समय पर सोचे कार्य पूर्ण होंगे तथा व्यवसाय गति उत्तम होगी।
कन्या राशि :- अधिकारियों का समर्थन फलप्रद रहे, कार्यकुशलता से संतोष होगा, कार्य बनें।
तुला राशि :- दैनिक व्यवसाय गति उत्तम तथा व्यवसायिक चिन्ताएं कम अवश्य होगी।
वृश्चिक राशि :- कार्य वृत्ति में सुधार होगा, असमंजस तथा सफलता न मिलें कार्य अवरोध होगा।
धनु राशि :- स्थिति अनियंत्रित रहे तथा नियंत्रण करना आवश्यक होगा, कलह से बचें।
मकर राशि :- मानसिक खिन्नता एवं स्वभाव में मानसिक उद्विघ्नता रहे।
कुंभ राशि :- योजनाएं फलीभूत हो, विघटनकारी तत्व आय को परेशान अवश्य करेगा।
मीन राशि :- मनोबल उत्साह वर्धक हो, कार्य कुशलता से संतोष हो।
मिट्टी के कलश से इसलिए की जाती है घट स्थापना
25 Sep, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मिट्टी के कलश से घट स्थापना इसलिए की जाती है क्योंकि अन्य धातु के कलश को स्थापित करने पर कोई लाभ नहीं होता है। घट स्थापना के दौरान मिट्टी के कलश में जल भरकर उसमें आम के पत्ते और ऊपर नारियल रखा जाता है।
प्राचीन समय से ही घट स्थापना मिट्टी के कलश से की जाती है लेकिन समय बदलने के साथ मिट्टी के कलश की जगह स्टील या अन्य धातु के कलश प्रयोग किए जाते हैं। नवरात्रि में मिट्टी का कलश स्थापित करने पर देवी मां प्रसन्न होती है और सुख समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। पहले दिन शुभ मुहूर्त में कलश को स्थापित किया जाता है। धार्मिक मान्यताएं
प्राचीन समय से ही नवरात्रि में मिट्टी का कलश स्थापित करने की धार्मिक मान्यता है. धार्मिक ग्रंथो में मिट्टी पवित्र होती है जिस कारण नवरात्रि की शुरुआत में घट स्थापना करने से देवी मां संपूर्ण फल प्रदान करती हैं। जब घट स्थापना की जाती है तो मिट्टी के घड़े (कलश) में शुद्ध जल भरकर उसके ऊपर 9 आम के पत्ते रखकर उसके ऊपर पानी वाले नारियल पर कलावा बांधकर रखा जाता है।
मिट्टी का कलश है जरूरी
मान्यताओं के अनुसार सृष्टि का निर्माण वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश से मिलकर हुआ है और मिट्टी के घड़े में पानी भरकर आम के पत्ते, पानी वाला नारियल रखने को अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश यानी सृष्टि के निर्माण का प्रतीक माना गया है। यदि नवरात्रि के दिनों में स्टील या अन्य धातु के कलश को स्थापित किया जाता है तो उसे नवरात्रि का कोई फल नहीं मिलता है.
इस बार नवरात्रि में माता रानी हाथी पर सवार होकर आ रहीं
25 Sep, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में नवरात्रि में माता की सवारी और उनके आगमन का विशेष महत्व होता है। इस बार नवरात्रि में माता रानी हाथी पर सवार होकर आएंगी। यदि नवरात्रि रविवार और सोमवार को शुरू होती है, तो ऐसी स्थिति में माता की सवारी गज होती है, जिसे बेहद शुभ माना जाता है। इसका मानव जीवन पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
दूसरी तरफ, माता दुर्गा का प्रस्थान भी देवी पुराण के अनुसार गुरुवार के दिन होगा। इस दिन भक्तों के कंधों पर सवार होकर मां दुर्गा का प्रस्थान माना जाता है, जिसे बेहद उत्तम माना जाता है। यह संकेत जीवन में सुख और सौभाग्य में वृद्धि करने वाला है। मां दुर्गा की विशेष कृपा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं भी पूरी होंगी और सुख-शांति बनी रहेगी।
नवरात्रि के नौ दिनों तक माता रानी की विधि-विधानपूर्वक पूजा और आराधना की जाती है। ऐसा करने से सभी प्रकार के दुख और संकट दूर होते हैं. देवी की प्रसन्नता के लिए कई तरह के उपाय भी किए जाते हैं। इस बार के नवरात्रि 10 दिनों तक है।
इस बार इस कारण से 10 दिनों के होंगे नवरात्र
25 Sep, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इस साल 2025 की शारदीय नवरात्र 9 की बजाय 10 दिनों की है। इसकी वजह खगोलीय यानी पंचांग में तिथियों की व्यवस्था है, न कि सिर्फ धार्मिक परंपरा। इस बार नवरात्र को 22 सितंबर से 1 अक्टूबर मनाया जाएगा। इसकी वजह इस साल एक विशेष संयोग का बनना, जिसमें चतुर्थी तिथि दो दिन रहेगी यानि 25 और 26 सितंबर दोनों दिन चतुर्थी मानी जाएगी। इसी कारण दसवां दिन भी नवरात्रि में शामिल हो गया। नवमी 1 अक्टूबर होगी और विजयादशमी 2 अक्टूबर को होगी।
ऐसे संयोग बहुत कम बनते हैं। यह पूरी तरह से चंद्रमा की कलाओं और पंचांग की गिनती पर निर्भर करता है। जिससे तिथियां दो दिन तक खिंच जाती हैं, इसलिए कुल दिनों की संख्या बढ़ जाती है.
खगोलीय स्थितियों के कारण ऐसा
धार्मिक दृष्टि से तिथियों में वृद्धि को शुभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार देवी की पूजा इतने दिनों तक करना अधिक फलदायी होता है। परंतु दस दिन होने का फैसला मुख्य तौर पर खगोलीय और पंचांग आधारित है; धार्मिक रूप से इसे हर्ष और आध्यात्मिक लाभ से जोड़ते हैं। वैसे खगोलीय आधार पर इसे दुर्लभ संयोग माना जा रहा है जबकि एक ही दिन में दो तिथियां आ रही हैं। इसे दुर्लभ संयोग कहा जा रहा है. अगर इसको खगोल शास्त्र और विज्ञान के आधार पर समझना हो तो ये मान सकते हैं कि ये बदलाव प्राकृतिक घटनाओं, पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर परिक्रमा और उससे जुड़ी ऋतु संधियों पर आधारित हैं।
पंचांग में तिथियों की गणना चंद्रमा के घूमने पर आधारित होती है, लिहाजा कई बार चंद्र तिथि दो दिन तक खिंच सकती है या कोई तिथि क्रम में दो बार आ सकती है, जिससे नवरात्र का कुल दिन बढ़ जाता है. हालांकि कभी कभी ये एक दिन घट भी जाता है।
धर्माचार्य और वैज्ञानिक भी मानते हैं कि ये विस्तारण पंचांग के खगोलीय समायोजन की वजह से होते हैं, न कि केवल किसी धार्मिक रूप से।
नवरात्रि की अवधि बढ़ जाने पर उपवास, साधना और जीवनशैली में बदलाव करना और भी लाभदायक माना जाता है।
नवरात्र का इतिहास प्राचीन ग्रंथों, देवी पुराण और रामायण से जुड़ा
25 Sep, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नवरात्र का इतिहास प्राचीन ग्रंथों, देवी पुराण और रामायण से जुड़ा है। इसकी परंपराएं भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरह से मनाई जाती हैं। इसमें देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का प्रावधान होता है!
रामायण के अनुसार, भगवान श्रीराम ने रावण-वध से पूर्व अश्विन शुक्ल पक्ष की नवरात्र में देवी दुर्गा की आराधना की थी! उनकी भक्ति से माता प्रसन्न हुईं और विजय का आशीर्वाद दिया!
नवरात्र तो साल में चार बार लेकिन मनाते दो ही
साल में नवरात्र कुल चार बार होती है, लेकिन केवल दो बार ही महत्त्वपूर्ण रूप में मनाई जाती है – चैत्र यानि वसंत ऋतु में और शारदीय नवरात्र यानि शरद ऋतु में आने वाली नवरात्र! बाकी दो नवरात्र को गुप्त नवरात्र कहा जाता है, जो तुलनात्मक रूप से कम जानी जाती हैं।
गुप्त नवरात्र क्या होते हैं
सालभर में दो गुप्त नवरात्र आते हैं – आषाढ़ नवरात्र और माघ नवरात्र. आषाण गुप्त नवरात्रि साधना और ध्यान के लिए होता है। वहीं माघ गुप्त नवरात्रि में साधना की जाती है.
आमतौर गुप्त नवरात्र को तंत्र मंत्र साधना के उपयुक्त माना जाता है। इस समय भक्त उपवास, योग साधना, ध्यान और मंत्र जाप के द्वारा अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्तियों को बढ़ाने का प्रयास करते हैं। यह साधना गुप्त रूप से यानी गोपनीय तरीके से की जाती है, इसलिए इसे गुप्त नवरात्र कहा जाता है.
इसमें 10 महाविद्याओं की पूजा की जाती है, जिनमें मां काली, तारा देवी, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी शामिल हैं. इनकी साधना से साधक को दुर्लभ और विशेष शक्तियां प्राप्त होने की मान्यता है।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 25 सितम्बर 2025)
25 Sep, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष- कुटुम्ब सुख, दायक कार्य, सामाजिक जिम्मेदारियाँ बढ़ेगी, समय पर कार्य बना लें।
वृष- शत्रु बाधा डालेगा, विजय मिले, स्त्री संतान आदि का सुख मिलेगा, दामपत्य जीवन सुखी होगा।
मिथुन - पारिवारिक सुख, आंनद की प्राप्ति होगी, धार्मिक कार्य का पुण्य लाभ मिलेगा।
कर्क- उच्च वर्ग का सान्ध्यि प्राप्त होगा, राजनेता का सहयोग प्राप्त होगा, रुके कार्य बनेंगे।
सिंह- बिना कारण दुख झंझट का योग हैं, घर से हानि भी है, समय लाभ होगा।
कन्या- अध्ययन कार्य में सफलता, शारीरिक कष्ट से दुर्घटना बढ़ सकती हैं, ध्यान रखे।
तुला- सामाजिक कार्यों में रुचि, वायु उदर विकार नेत्र पीड़ा, कष्ट प्रतिष्ठा में कुछ हानि होगी।
वृश्चिक- नवीन पद की प्राप्ति, बेरोजगारी से छुटकारा मिलेगा, पति या पत्नी को सुख मिलेगा।
धनु- शत्रु वृद्धि, स्त्री संतान से सुखी रहेंगे, शान शौकत में व्यय अवश्य होगा।
मकर- मानसिक उद्विघ्नता, निर्णय का अभाव, शारीरिक अशांति, विरोध होगा।
कुंभ- विभिन्न रोगों से शारीरिक पीड़ा बनी रहेगी, पत्नी से संबंध अच्छे नहीं रहेंगे।
मीन- सामान्य धन का लाभ होगा, खर्च की अधिकता रहेगी, पारिवारिक प्रगति के कार्य अवश्य ही होंगे।
नवरात्रि में भूलकर भी न करें ये काम, वरना भोगना पड़ेगा पाप.. देवी मां होंगी क्रोधित
24 Sep, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
साल में चार बार होने वाले नवरात्रि के दिनों में वर्जित कार्यों के बारे में जानना चाहते हैं, तो यह खबर आपके लिए है. नवरात्रि (Navratri) यानी 9 दिन और 9 रात्रि तक किया जाने वाला अनुष्ठान होता है. वैदिक पंचांग के अनुसार साल में चार बार नवरात्रि के दिनों का आगमन मानव कल्याण के लिए होता है. इन नौ दिनों में शक्ति की देवी दुर्गा की पूजा अर्चना, आराधना, व्रत आदि किए जाते हैं. नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा अर्चना, आराधना की जाती है और देवी मां प्रसन्न होकर सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर देती हैं.
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार नवरात्रि के दिनों में कुछ कार्य करने पर देवी दुर्गा क्रोधित होती हैं और श्रद्धालु को जन्मों जन्म तक पाप भोगना पड़ता है. चलिए विस्तार से जानते हैं कि नवरात्रि के दिनों में कौनसे कार्य वर्जित होते हैं…
नवरात्रि का महत्व
इसकी ज्यादा जानकारी देते हुए धार्मिक ग्रंथों के जानकारी पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि हिंदू धर्म में नवरात्रि के दिन पवित्र और विशेष फल प्रदान करने वाले होते हैं. इन दिनों में देवी दुर्गा और उनके नौ रूपों की पूजा अर्चना, आराधना और नवरात्रि के व्रत करने का विधान है. 9 रात्रि और 9 दिन तक केवल फलाहार ही लिया जाता है. वह बताते हैं कि नवरात्रि (Shardiya Navratri) के सभी 9 दिनों में कुछ नियमों का पालन किया जाना बेहद जरूरी होता है. यदि इनका पालन नहीं किया जाए, तो जीवन नर्क के समान हो जाता है. नवरात्रि के दिन पवित्र होते हैं इसीलिए इन दिनों में भक्ति में बाधा बनाने वाले कार्य वर्जित होते है.
नवरात्रि के दिनों में आलस्य नहीं करना चाहिए, तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए, प्याज, लहसुन, शलजम, मसूर की दाल, बैंगन, मांस, मदिरा पूर्ण रूप से वर्जित, किसी का अपमान नहीं करना, बाल नहीं कटवाना, सेविंग नहीं करना, नाखून नहीं काटना, मन में नकारात्मक भाव का नहीं होना आदि सभी कार्य वर्जित होते हैं. यदि यह कार्य नवरात्रि के दिनों में किए जाते हैं, तो व्यक्ति को दोष लगता है जिसका निवारण जन्मों जन्म तक नहीं होता है. नवरात्रि के दिनों में मन में सकारात्मक भाव का होना बेहद जरूरी होता है और शक्ति की देवी मन की सभी इच्छाएं बिन मांगे ही पूरी कर देती हैं.
तुलसी पौधे के पास गलती से भी इन 6 चीजों को न रखें, घर में कभी नहीं होगी तरक्की, भाग्य होगा खराब
24 Sep, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू परंपरा और वास्तु का मानना है कि तुलसी के पौधे को साफ और शुद्ध रखने से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और घर में शांति, स्वास्थ्य और धन आता है.
हिंदू परंपरा में तुलसी के पौधे का विशेष महत्व है. इसे देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा का प्रतीक माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि घर में तुलसी रखने से पाप नष्ट होते हैं और सौभाग्य, स्वास्थ्य और धन की प्राप्ति होती है. हर हिंदू घर में तुलसी का पौधा लगाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है.
सबसे पहले, कूड़ा-कचरा. तुलसी के पास कूड़ा-कचरा छोड़ना बहुत अशुभ होता है. इससे पवित्र वातावरण खराब होता है. ऐसा माना जाता है कि इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा फैलती है और आर्थिक नुकसान होता है.
तुलसी के पास जूते-चप्पल भी नहीं रखने चाहिए. चप्पल-जूते अशुद्ध माने जाते हैं. इससे तुलसी की पवित्रता नष्ट होती है और देवी लक्ष्मी की कृपा भी जाती रहती है.
शास्त्रों में कहा गया है कि तुलसी के पास लोहे की वस्तुएं रखने से सकारात्मक ऊर्जा कम होती है. ये घर की समृद्धि को कम करती हैं. अगर आप तुलसी के पास खराब लोहे के बर्तनों को रख रहे हैं तो ऐसा करने से बचना चाहिए.
तुलसी के पास मांसाहारी भोजन रखना महापाप माना जाता है. यह एक बड़ी धार्मिक भूल है. वास्तु के अनुसार इससे घर में अशुभ प्रभाव पड़ता है
ऐसा माना जाता है कि तुलसी के पास शराब और तंबाकू जैसी नशीली चीजें रखने से देवी लक्ष्मी का अपमान होता है, जिसके परिणामस्वरूप गरीबी और संघर्ष होता है.
इसके अलावा, तुलसी के पास टूटी हुई पूजा सामग्री (मूर्तियां, दीपक, बर्तन) नहीं रखनी चाहिए. ये अशुभता को आकर्षित करती हैं और समृद्धि को कम करती हैं.
तुलसी के पौधे को पवित्र रखना सिर्फ एक परंपरा ही नहीं, बल्कि वास्तु के अनुसार घर में शांति, स्वास्थ्य और धन-संपत्ति लाने का एक तरीका भी है. तुलसी के पौधे को साफ-सुथरा रखना, उसे जल देना और प्रतिदिन उसकी पूजा करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है. यह परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और मानसिक शांति में भी योगदान देता है. इसलिए, अगर आप जानते हैं कि तुलसी के पास कौन सी चीजें नहीं रखनी चाहिए और उसकी पवित्रता बनाए रखते हैं, तो घर का वातावरण हमेशा शुभ रहेगा.
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