धर्म एवं ज्योतिष
4 शुभ योग में पापा कल्प कुशा, धन और सुख-समृद्धि के लिए जरूर करें ये 3 काम, श्रीहरि की कृपा
3 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकदाशी तिथि को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है और इस बार यह शुभ तिथि 3 अक्टूबर दिन शुक्रवार को पड़ रही है. इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है, जो साधकों को धन, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद देती है. पापांकुशा एकादशी के दिन एक या दो नहीं बल्कि चार शुभ योग बन रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है. ज्योतिष शास्त्र में पापांकुशा एकादशी का महत्व बताते हुए कुछ विशेष उपाय भी बताए गए हैं. इन उपायों के करने से श्रीहरि की हमेशा कृपा रहेगी और धन व सुख-समृद्धि की कृपा रहेगी. आइए जानते हैं पापांकुशा एकादशी के दिन कौन से 3 काम करें…
पापांकुशा एकादशी 2025 पंचांग
द्रिक पंचांग के अनुसार, अभिजीत मुहूर्त सुबह के 11 बजकर 46 मिनट से शुरू होकर 12 बजकर 34 मिनट तक रहेगा. राहुकाल का समय सुबह 10 बजकर 41 मिनट से शुरू होकर 12 बजकर 10 मिनट तक रहेगा. एकादशी का समय 2 अक्टूबर को शाम के 7 बजकर 10 मिनट से शुरू होकर शाम के 6 बजकर 32 मिनट तक रहेगा, इसके बाद द्वादशी तिथि लग जाएगी. इस तिथि को ग्रहों के राजा सूर्य कन्या राशि में रहने वाले हैं. चंद्रमा रात के 9 बजकर 27 मिनट तक मकर राशि में रहेंगे, इसके बाद कुंभ राशि गोचर करेंगे.
पापांकुशा एकादशी 2025 शुभ योग
पापांकुशा एकादशी पर कई शुभ योग बन रहे हैं और इस दिन बुध ग्रह तुला राशि में गोचर करने वाले हैं. पापांकुशा एकादशी पर सभी कार्यों को सिद्ध करने वाला सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है और सभी प्रकार के दोष दूर करने वाला रवि योग बन रहा है. साथ ही इस दिन चंद्रमा के दूसरे भाव में बुध और द्वादश भाव में शुक्र ग्रह होने से उभयचरी योग का निर्माण हो रहा है. उभयचरी योग के साथ इस दिन धन योग बन रहा है, जो चंद्रमा पर मंगल की दृष्टि से बन रहा है.
पापांकुशा एकादशी का महत्व
शास्त्रों में पापांकुशा एकादशी को हजारों अश्वमेध यज्ञ के समान फल देने वाला बताया गया है. इस दिन उपवास रखने से जाने-अनजाने पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं. भगवान विष्णु की कृपा से विवाह, करियर, नौकरी, परीक्षा और व्यापार की बाधाएं भी दूर होती हैं. इस व्रत में रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और दान-पुण्य का विशेष महत्व है. पद्मपुराण में कहा गया है कि पापांकुशा एकादशी के व्रत से मनुष्य को अनगिनत पापों से मुक्ति मिलती है और वह विष्णुधाम को प्राप्त करता है. एकादशी व्रत का सबसे बड़ा फल मोक्ष है. पापांकुशा एकादशी विशेष रूप से अपराधों व बंधनों से मुक्ति देकर विष्णुलोक में स्थान दिलाती है.पापांकुशा एकादशी 2025 शुभ योग
पापांकुशा एकादशी पर कई शुभ योग बन रहे हैं और इस दिन बुध ग्रह तुला राशि में गोचर करने वाले हैं. पापांकुशा एकादशी पर सभी कार्यों को सिद्ध करने वाला सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है और सभी प्रकार के दोष दूर करने वाला रवि योग बन रहा है. साथ ही इस दिन चंद्रमा के दूसरे भाव में बुध और द्वादश भाव में शुक्र ग्रह होने से उभयचरी योग का निर्माण हो रहा है. उभयचरी योग के साथ इस दिन धन योग बन रहा है, जो चंद्रमा पर मंगल की दृष्टि से बन रहा है.
पापांकुशा एकादशी का महत्व
शास्त्रों में पापांकुशा एकादशी को हजारों अश्वमेध यज्ञ के समान फल देने वाला बताया गया है. इस दिन उपवास रखने से जाने-अनजाने पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं. भगवान विष्णु की कृपा से विवाह, करियर, नौकरी, परीक्षा और व्यापार की बाधाएं भी दूर होती हैं. इस व्रत में रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और दान-पुण्य का विशेष महत्व है. पद्मपुराण में कहा गया है कि पापांकुशा एकादशी के व्रत से मनुष्य को अनगिनत पापों से मुक्ति मिलती है और वह विष्णुधाम को प्राप्त करता है. एकादशी व्रत का सबसे बड़ा फल मोक्ष है. पापांकुशा एकादशी विशेष रूप से अपराधों व बंधनों से मुक्ति देकर विष्णुलोक में स्थान दिलाती है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (03 अक्टूबर 2025)
3 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मिथुन राशि :- सफलता का साधन हाथ से निकलेगा, मित्रों से संतोष होगा, अधिकारियों का समर्थन फलप्रद होगा।
कर्क राशि :- योजना फलीभूत होगी, सफलता के साधन जुटायेंगे, रुके कार्य ध्यान देने से अवश्य ही बनेंगे।
सिंह राशि :- दैनिक कार्यगति अनुकूल रहेगी, प्रभुत्व वृद्धि होगी, कार्य कुशलता से कार्य बनने से हर्ष होगा।
कन्या राशि :- मान-प्रतिष्ठा व प्रभुत्व वृद्धि होगी, किसी के रुके कार्य बनने से हर्ष होगा, समय का ध्यान रखें।
तुला राशि :- कार्य योजना पूर्ण होगी, मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी, रुके कार्य बनेंगे, कार्य-व्यवसाय बढ़ेगा ध्यान दें।
वृश्चिक राशि :- स्थिति अनुकूल नहीं विशेष कार्य स्थगित रखें, हानि होने की संभावना है, सावधान रहकर कार्य करें।
धनु राशि :- कार्य विफल होगा, दूसरों के कार्यों में समय व धन नष्ट होगा, कार्य-व्यवसाय पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
मकर राशि :- अधिकारियों के मेल-मिलाप से कार्य अवश्य होगा, समय का लाभ अवश्य होगा, लाभ से हर्ष होगा।
कुंभ राशि :- परिश्रम करने पर भी सफलता न मिले तथा अनेक प्रकार से असुविधा अवश्य बनेगी, धैर्य अवश्य रखें।
मीन राशि :- दैनिक कार्यगति अनुकूल रहेगी, प्रभुत्व वृद्धि होगी, रुके कार्य बनने से हर्ष होगा, कार्य विशेष पर ध्यान दें।
दशहरे पर इस प्रकार करें शस्त्र पूजन
2 Oct, 2025 07:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अश्विन माह के शुक्ल पक्ष में दशमी तिथि को दशहरा मनाया जाता है। दशहरे पर शस्त्र पूजन भी किया जाता है। रावण पर भगवान राम की जीत को याद करते हुए, शस्त्रों की पूजा की जाती है। यह अनुष्ठान युद्ध और संघर्ष में विजय प्राप्त करने के लिए भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करने का एक तरीका है।
शस्त्र पूजन के लिए, सुबह स्नान ध्यान आदि करके शस्त्रों की गंगाजल से सफाई कर लें और पूजा मुहूर्त में साफ वस्त्र बिछाकर सभी शस्त्रों को उसपर रख लें। उनके ऊपर दशहरा पूजा सामिग्री अक्षत, पुष्प, रोली, अक्षत, चंदन इत्यादि छिड़क कर धूप दीप से विधि विधान से पूजन करें।
दशहरे का पूजन दोपहर के समय किया जाता है। अपने पूजा स्थल में भगवान राम की प्रतिमा के साथ ही साथ मां दुर्गा की प्रतिमा को भी स्थापित करें।
उनके मंत्रों के साथ साथ विजय (अपराजिता ) का मंत्र भी लेना चाहिए। इससे स्वयं के भी विजय भाव में वृद्धि होती है।
कैसे हुई शुरुआत
दशहरे पर शस्त्र पूजन की शुरुआत के विषय में विद्वानों के बीच अलग-अलग मत हैं, लेकिन यह माना जाता है कि यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। यह पूजा विशेष रूप से योद्धाओं के बीच लोकप्रिय रही है, जो युद्ध में जाने से पहले अपने शस्त्रों का पूजन करते थे।
महत्व
शस्त्र पूजन करने से कई आध्यात्मिक और मानसिक लाभ होते हैं। यह अनुष्ठान हमें सुरक्षा और शक्ति प्रदान करता है, साथ ही जीवन में आने वाले कठिन संघर्षों में विजय प्राप्त करने की शक्ति भी मिलती है। शस्त्र पूजन से आत्मविश्वास बढ़ता है, परिवार की सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित होती है, और हमारे भीतर साहस और संकल्प शक्ति का विकास होता है. यह पूजा हमारी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा का प्रतीक है, जिससे हम हर संकट का सामना कर सकते हैं.
अक्टूबर माह में पड़ रहे व्रत और त्यौहार
2 Oct, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में व्रत-त्याहारों के लिहाज से इस बार अक्टूबर में काफी व्रत और त्यौहार पड़ रहे हैं। इसी माह दशहरा, दिवाली और करवा चौथ से लेकर छठ महापर्व तक कई प्रमुख त्यौहार और व्रत मनाए जाते हैं। इस महीने में अश्विन माह का समापन होता है और कार्तिक मास की शुरुआत हो जाती है। गुरुवर 2 अक्टूबर को असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक दशहरा मनाया जाएगा। अक्टूबर में कौन-कौन से पड़ने वाले व्रत और त्योहार
2 अक्टूबर 2025- दशहरा, विजयादशमी
3 अक्टूबर 2025- पापांकुशा एकादशी
4 अक्टूबर 2025- शनि प्रदोष व्रत
6 अक्टूबर 2025- कोजागर पूजा, शरद पूर्णिमा
7 अक्टूबर 2025- वाल्मीकि जयंती, मीराबाई जयंती
8 अक्टूबर 2025- कार्तिक माह शुरू
10 अक्टूबर 2025- करवा चौथ, संकष्टी चतुर्थी
13 अक्टूबर 2025- अहोई अष्टमी
17 अक्टूबर 2025- रमा एकादशी, तुला संक्रांति
18 अक्टूबर 2025- शनि प्रदोष व्रत, धनतेरस, यम दीपम
20 अक्टूबर 2025- नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजा, दिवाली
21 अक्टूबर 2025- कार्तिक अमावस्या
22 अक्टूबर 2025- गोवर्धन पूजा
23 अक्टूबर 2025- भाई दूज
25 अक्टूबर 2025- विनायक चतुर्थी
27 अक्टूबर 2025- छठ पूजा
31 अक्टूबर 2025- अक्षय नवमी
मंदिरों में नहीं इस तरह के भक्तों के पास रहते हैं भगवान
2 Oct, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
किसी भी वस्तु की चेतनता की पहचान इच्छा, क्रिया अथवा अनुभूति के होने से होती है। अगर किसी वस्तु में ये तीनों नहीं होते हैं, तो उसे जड़ वस्तु कहते हैं और इन तीनों के होने से उसे चेतन वस्तु कहते हैं। मनुष्य में इन तीनों गुणओं के होने से उसे चेतन कहते हैं। मनुष्य के मृत शरीर में इनके न होने से उसे अचेतन अथवा जड़ कहते हैं।
प्रश्न यह उठता है कि जो मनुष्य अभी-अभी इच्छा, क्रिया अथवा अनुभूति कर रहा था और चेतन कहला रहा था, वही मनुष्य इनके न रहने से मृत क्यों घोषित कर दिया गया जबकि वह सशरीर हमारे सामने पड़ा हुआ है? आमतौर पर एक डॉक्टर बोलेगा कि इस शरीर में प्राण नहीं हैं। शास्त्रीय भाषा में, जब तक मानव शरीर में आत्मा रहती है, उसमें चेतनता रहती है। उसमें इच्छा, क्रिया व अनुभूति रहती है। आत्मा के चले जाने से वही मानव शरीर इच्छा, क्रिया व अनुभूति रहित हो जाता है, जिसे आमतौर पर मृत कहा जाता है।
शास्त्रों के अनुसार स्वरूप से आत्मा सच्चिदानन्दमय होती है। सच्चिदानन्द अर्थात सत्+चित्+आनंद। संस्कृत में सत् का अर्थ होता है नित्य जीवन अर्थात् वह जीवन जिसमें मृत्यु नहीं है, चित् का अर्थ होता है ज्ञान जिसमें कुछ भी अज्ञान नहीं है और आनंद का अर्थ होता है नित्य सुख जिसमें दुःख का आभास मात्र नहीं है। यही कारण है कि कोई मनुष्य मरना नहीं चाहता, कोई मूर्ख नहीं कहलवाना चाहता और कोई भी किसी भी प्रकार का दुःख नहीं चाहता।
अब नित्य जीवन, नित्य आनंद, नित्य ज्ञान कहां से मिलेगा? जैसे सोना पाने के लिए सुनार के पास जाना पड़ता है, लोहा पाने के लिए लोहार के पास, इसी प्रकार नित्य जीवन-ज्ञान-आनंद पाने के लिए भगवान के पास जाना पड़ेगा क्योंकि एकमात्र वही हैं जिनके पास ये तीनों वस्तुएं असीम मात्रा में हैं। प्रश्न हो सकता है कि बताओ भगवान मिलेंगे कहां? ये भी एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। कोई कहता है भगवान कण-कण में हैं, कोई कहता है कि भगवान मंदिर में हैं, कोई कहता है कि भगवान तो हृदय में हैं, कोई कहता है कि भगवान तो पर्वत की गुफा में, नदी में, प्रकृति में वगैरह।
वैसे जिस व्यक्ति के बारे में पता करना हो कि वह कहां रहता है, अगर वह स्वयं ही अपना पता बताए तो उससे बेहतर उत्तर कोई नहीं हो सकता। उक्त प्रश्न के उत्तर में भगवान कहते हैं कि मैं वहीं रहता हूं, जहां मेरा शुद्ध भक्त होता है। चूंकि हम सब के मूल में जो तीन इच्छाएं- नित्य जीवन, नित्य ज्ञान व नित्य आनंद हैं, वे केवल भगवान ही पूरी कर सकते हैं, कोई और नहीं। इसलिए हमें उन तक पहुंचने की चेष्टा तो करनी ही चाहिए।
भगवान स्वयं बता रहे हैं कि वह अपने शुद्ध भक्त के पास रहते हैं। अतः हमें ज्यादा नहीं सोचना चाहिए और तुरंत ऐसे भक्त की खोज करनी चाहिए जिसके पास जाने से, जिसकी बात मानने से हमें भगवद्प्राप्ति का मार्ग मिल जाए। साथ ही हमें यह सावधानी भी बरतनी चाहिए कि कहीं वह भगवद्-भक्त के वेश में ढोंगी न हो। स्कंद पुराण के अनुसार भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि कलियुग में ऐसे गुरु बहुत मिलेंगे जो शिष्य का सब कुछ हर लेते हैं, परंतु शिष्य का संताप हर कर उसे सद्मार्ग पर ले आए ऐसा गुरु विरला ही मिलेगा।
भगवान शिव से सीखें आत्म नियंत्रण
2 Oct, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भगवान शिव की जिंदगी के हर पहलू से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है लेकिन यहां हम कुछ उनसे जुड़ी कुछ ऐसी बातों का जिक्र कर रहे हैं। जिन्हें, कोई व्यक्ति अपनी जिंदगी में आत्मसात करते है तो उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है।रखें आत्म नियंत्रण : भगवान शिव शांत भी रहते हैं और विनाशकारी भी, लेकिन वह अपने ऊपर पूरा आत्मनियंत्रण रखते हैं। यदि कोई मनुष्य उनकी इस बात को आत्मसात करे तो जीवन में काफी आगे तक जा सकता है।
शांत रहें और अपना कार्य करते रहें : शिव को महायोगी कहा जाता है। वह घंटों और युगों तक ध्यान अवस्था में रहते हैं। और ध्यान में मानव कल्याण के लिए कार्य करते हैं। यदि कोई मनुष्य उनकी इसी सीख से शांत रहकर अपने कार्य को करते रहें तो सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है।
ध्यान रखें भौतिक सुख लंबे समय का साथी नहीं : शिव का स्वरूप भभूतधारी है। वह बाघ की खाल पहने हुए हैं। उनके हाथों में त्रिशूल है। वह भौतिक वस्तुओं से दूर रहते हैं। यदि कोई मनुष्य भौतिक जीवन की लालसा को त्याग कर अपने कर्म पर ध्यान दे तो वो न केवल सफल होगा बल्कि उसकी प्रशंसा चारो तरफ की जाती है।
नकारात्मकता से रहें दूर : भगवान शिव ने दुनिया बचाने के लिए समुद्र मंथन से निकले जहर को अपने कंठ में सुशोभित किया। इससे तमाम तरह की नकारात्मकता का अंत हुआ और दुनिया का सर्वनाश होने से बच गया। कहने का आशय यह है कि यदि हम भी अपने आस-पास मौजूद नकारात्मकता यानी बुराई का अंत करें तो सकारात्मक माहौल हमारे आस-पास हमेशा रहेगा।
इच्छाएं सीमित रखें : कहते हैं इच्छाओं का कभी अंत नहीं होता। यानी जो आपके पास है। उसमें ही हंसी-खुशी जिंदगी जीएं तो जीवन स्वर्ग की तरह हो जाएगा। भगवान शिव संन्यासियों की तरह जीवन जीते हैं। वह इच्छाओं से परे हैं। यदि कोई उनकी इन बातों को आत्मसात करे। तो सफलता उनके कदमों तले होगी।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (02 अक्टूबर 2025)
2 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- कार्य कुशलता से संतोष होगा, व्यवसायिक गति में सुधार होगा, कार्य योजना बनेगी ध्यान अवश्य दें।
वृष राशि :- इष्ट मित्रों से लाभ होगा, स्त्री वर्ग से मन प्रसन्न रहेगा, मन संवेदनशील रहेगा, हर्ष पूर्ण वातावरण रहेगा।
मिथुन राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक रहेगा, कार्य कुशलता से संतोष होगा, व्यवसाय गति उत्तम रहेगी, कार्य पर ध्यान दें।
कर्क राशि :- प्रयत्नशीलता विफल होगी, परिश्रम करने पर भी कुछ लाभ न होगा, कार्य पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
सिंह राशि :- बनते कार्य बिगड़ेंगे, परिश्रम विफल होगा, कार्य व्यवसाय में लाभ की संभावन कम है, कार्य में अड़चन आयेगी।
कन्या राशि :- यात्रा के प्रसंग से बचें, मानसिक बेचैनी रहेगी, मित्रों के साथ यात्रा से लाभ अवश्य होगा, कार्य पर ध्यान दें।
तुला राशि :- समय अनुकूल नहीं विशेष कार्य स्थगित रखें, लेन-देन के मामले में विवाद होने की संभावना है, धैर्य रखें।
वृश्चिक राशि :- अर्थ लाभ होगा, कार्य में सफलता के योग बनेंगे, समय स्थिति का लाभ अवश्य लें, कार्य में सतर्कता बरतें।
धनु राशि :- समय की अनुकूलता से लाभांवित होंगे, दैनिक कार्यगति में सुधार होगा, काम को समय पर पूर्ण करने का प्रयास करें।
मकर राशि :- कुटुम्ब की चिन्तायें जटिल होंगी, रुके कार्यों को समय पर निपटा लें, बिगड़े कार्य परिश्रम से बनेंगे ध्यान अवश्य दें।
कुंभ राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक होगा, इष्ट मित्रों से लाभ होगा, स्त्री वर्ग से मन प्रसन्न रहेगा, वातावरण हर्षपूर्ण रहेगा।
मीन राशि :- प्रत्येक कार्य में लाभ होगा, किसी के द्वारा धोका हो सकता है, समय सीमा का ध्यान अवश्य रखें।
नवरात्रि: शक्ति से जुड़ने का पावन उत्सव
1 Oct, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
एक शिशु माँ को जानने और समझने का प्रयास नहीं करता, वह सहज रूप से माँ पर विश्वास करता है. इसी तरह जब हम भोले भाव से दैवी शक्ति में श्रद्धा रखते हैं, तो यह हमारे जीवन में असीम बल का स्रोत बन जाती है. सर्वव्यापी ब्रह्मांडीय ऊर्जा ही संपूर्ण जगत की जननी है, जल में मछली के समान, हम सब चेतना के इस अनंत सागर में विद्यमान है. समस्त प्रपंच उस एक परम शक्ति का ही विलास है, जो स्वयं को असंख्य रूपों में व्यक्त करती हैं. संपूर्ण ब्रह्माण्ड इसी शक्ति द्वारा संचालित होता है. नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान किये जाने वाले अनुष्ठान और उपासना शक्तिस्वरूपा मां को अपने जीवन में जाग्रत करने के माध्यम हैं.
नवरात्रि एक आंतरिक यात्रा है, स्थूल से सूक्ष्म जगत की ओर, अव्यक्त दिव्यता को व्यक्त करने का पर्व, जहाँ से सृष्टि की उत्पत्ति हुई है, उस स्रोत से हमारे संबंध को पुनः स्थापित करने का उत्सव, .नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है नौ रातें. यहाँ ‘नव’ के दो अर्थ हैं: ‘नया’ और ‘नौ’ ! रात्रि वह है जो तुम्हें विश्रांति देती है. जीवन में तीन तरह के ताप होते हैं – आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक . जो तुम्हें इन तीनों प्रकार के तापो से शांति देती है, वह ‘रात्रि’ है . जैसे शिशु नौ महीने गर्भ में विश्राम करता है, नवरात्रि के नौ दिन हमें अपने स्रोत से जोड़ते हैं. यह एक ऐसा पवित्र काल है जब ब्रह्मांड की सारी विविधताएँ उस एक दिव्य शक्ति को प्रकट करने के लिए एकत्रित होती हैं, जो तुम्हें माँ से भी बढ़ कर असीम प्यार करती है, तुम्हारा उत्थान करती है, और तुम्हारी रक्षा करती है.
समस्त ब्रह्माण्ड की रचना प्रकृति के मौलिक गुणों – सत्त्व, रजस और तमस – से हुई है. देवी त्रिगुणात्मिका है – तीनों गुणों की स्वामिनी. हर प्राणी इन तीन गुणों के अधीन है. नवरात्रि के पहले तीन दिन तमो गुण(अवसाद, भय और भावनात्मक अस्थिरता) के प्रतीक हैं. इन दिनों में देवी को महादुर्गा के रूप में पूजा जाता है. अगले तीन दिन रजो गुण (व्यग्रता और आवेग) से संबंधित हैं, और देवी की आराधना महालक्ष्मी के रूप में की जाती है. अंतिम तीन दिन सत्त्व गुण (शांति, स्थिरता और उत्साह) के माने जाते हैं, जहाँ देवी का महासरस्वती के रूप में पूजन किया जाता है. इस प्रकार हमारी चेतना तमस और रजस से गुजर कर, सत्त्व गुण में खिलती है. जब सत्त्व गुण की वृद्धि होती है तब जीवन में विजय की प्राप्ति होती है. मौन और आनंद के साथ बाह्य जगत से अपने अंतकरण तक की इस सुखद यात्रा में नकारात्मक भावों का नाश होता है. प्राण ऊर्जा का आरोहण ही महिषासुर (जड़ता), शुंभ-निशुंभ (स्वयं व दूसरों पर संदेह) और मधु-कैटभ (राग-द्वेष के चरम रूप) जैसे आसुरी प्रवत्तियों को मिटा सकता है. गहरी जड़ें जमाए हुए दुर्गुण और उन्माद (रक्तबीजासुर), कुतर्क (चंड-मुंड) और धूमिल दृष्टि (धूम्रलोचन ) को जीवन-शक्ति के स्तर को बढ़ाकर ही पराजित किया जा सकता है. दुर्गासप्तशती में देवी माँ द्वारा निरंतर आकार बदलने वाले राक्षस महिषासुर का वध करने की वीर गाथा का वर्णन है. वह असुर कभी भैंसे के रुप में, कभी शेर के रूप में, कभी आदमी के रूप में विशाल सैन्य सहित अपना रूप बदलता रहा परन्तु अंत में देवी ने उसका संहार किया.
अब वेदांत की दृष्टि से प्रश्न उठता है कि यदि सब कुछ एक ही ऊर्जा का विस्तार है, तो युद्ध के लिए दो कहाँ से आये ? क्वांटम के सूक्ष्म स्तर पर, यह जगत तरंगों या ऊर्जा के आपसी जुड़ाव का जाल प्रतीत होता है. किंतु स्थूल आयाम की वास्तविकता में विविधता और पृथकता स्पष्ट होती है. उदाहरण के लिए, जबकि एक स्तर पर दरवाजा, मेज और कुर्सी सभी मूलभूत रूप में लकड़ी ही हैं, अन्य स्तर पर वे विशिष्ट गुणों से युक्त विशिष्ट वस्तुएँ बन जाती हैं. आप किसी दरवाजे के ऊपर नहीं बैठते, और प्रायः किसी प्रवेश द्वार पर कुर्सी का उपयोग नहीं करते. द्वैत में सत्य और असत्य, अच्छाई और बुराई का द्वंद्र प्रतीत होता है. ये विरोधात्मक लगते हैं, पर वास्तव में एक-दूसरे के पूरक होते हैं. इसी कारण प्राचीन ऋषियों ने जीवन को ‘लीला’ कहा, जिसका अर्थ है ‘क्रीड़ा’. उन्होंने श्री राम के जीवन को संघर्ष नहीं, बल्कि ‘रामलीला’ के रूप में वर्णन किया. जब तुम जीवन को खेल के रूप में देखते हो, तो आनंदित हो जाते हो.
देवताओं और असुरों का संग्राम और गुणों का आपसी खेल किसी विशेष समय या स्थान तक सीमित नहीं है. यह निरन्तर घटित हो रहा है और जीवन को रोचक बनाता है. जब सत्त्व (उत्साह व आनंद) की वृद्धि होती है, तो जीवन स्वतः उत्सव बन जाता है. हालांकि नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व माना जाता है, वास्तविकता में यह परम सत्य की दृश्यमान भिन्नता पर जीत का प्रतीक है.हमारी चेतना प्राचीन और नवीन दोनों है. प्रकृति में तुम्हे पुराने और नए का समावेश सदा मिलेगा. सूरज पुराना भी है और नया भी. एक नदी में हर क्षण ताजा जल बहता रहता है, परंतु फिर भी नदी बहुत पुरातन है .
देवी शक्ति के 64 स्पंदन सूक्ष्म जगत का संचालन करते हैं. ये स्पंदन सजग चेतना के ही अंग है, और हमे भौतिक और परमार्थिक वरदान प्रदान करते हैं. नवरात्रि उत्सव है, इन दैवी स्पंदनों को पुनर्जीवित करने और हमारे अंतरतम स्वरूप का सत्कार करने का. प्रकृति का हर रूप और हर पहलू माता रानी का ही है. देवी माहात्म्य में दी गई देवी स्तुति – या देवी सर्व भूतेषु…., इस सत्य को सुन्दर रूप में प्रस्तुत करती है.
नवरात्रि में देवी की आराधना द्वारा हम तीनों गुणों को संतुलित करते हैं, सत्त्व की वृद्धि करते हैं और उस शुद्ध और अनंत चेतना में स्थापित होते हैं. यही यात्रा मन की नकारात्मक प्रवृत्तियों का अंत करती है और आत्मा के गहनतम स्रोत से जोड़ देती है. जब हम भीतर की नकारात्मकता पर विजय पाते हैं, तब जीवन सहज ही उत्सव बन जाता है. यही असली विजयदशमी है.
क्या आप जानते हैं रावण के 10 सिरों का मतलब? जानिए हर सिर से जुड़ी बुराई और इसके संकेत
1 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हर साल जब दशहरा आता है, तो पूरे देश में रावण के पुतलों का दहन किया जाता है. यह परंपरा केवल राम की जीत का उत्सव नहीं है, बल्कि रावण की उन बुराइयों को मिटाने का प्रतीक है जो समाज और व्यक्ति दोनों के लिए हानिकारक हैं. इस बार दशहरा 2 अक्तूबर 2025 को मनाया जाएगा. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रावण के 10 सिरों का मतलब क्या है? क्या वे सिर्फ ताकत का संकेत हैं या उनके पीछे कोई गहरा अर्थ छिपा है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रावण कोई साधारण राक्षस नहीं था. वह विद्वान था, उसे वेद-पुराणों का ज्ञान था, लेकिन उसका अंत हुआ क्योंकि वह अपने अंदर की बुराइयों को नहीं छोड़ पाया. उसके 10 सिर सिर्फ उसके ज्ञान या बल के प्रतीक नहीं थे, बल्कि वे उन 10 कमजोरियों का संकेत थे जो हर इंसान के अंदर भी पाई जाती हैं. आइए जानते हैं,
1. काम (वासनात्मक इच्छा)
रावण का पहला सिर अनियंत्रित इच्छाओं का प्रतीक है. उसने सीता का अपहरण किया क्योंकि वह अपनी इच्छा को रोक नहीं पाया. यही उसकी सबसे बड़ी भूल बनी.
2. क्रोध (गुस्सा)
दूसरा सिर क्रोध का प्रतीक है. रावण अक्सर बिना सोचे-समझे क्रोधित हो जाता था और उसी गुस्से में फैसले लेता था, जो अंत में उसके खिलाफ गए.
3. लोभ (लालच)
तीसरा सिर लालच का प्रतीक है. उसे हर चीज़ चाहिए थी – सत्ता, शक्ति, सम्मान – और वो किसी भी हद तक जाने को तैयार था.
4. मोह (आसक्ति)
रावण अपने वैभव, परिवार और लंका से इतना जुड़ गया था कि उसे सही-गलत की समझ नहीं रह गई थी.
5. अहंकार (घमंड)
उसका पांचवां सिर उसके अहंकार का संकेत देता है. उसे लगता था कि उससे बड़ा कोई नहीं है, और यही घमंड उसकी हार का कारण बना.
6. मद (शान पर घमंड)
मद यानी अपनी उपलब्धियों और शोहरत पर जरूरत से ज़्यादा घमंड. रावण को अपने ज्ञान और शक्ति पर गर्व था, जो अंत में उसके पतन में बदल गया.
7. ईर्ष्या (जलन)
रावण दूसरों की अच्छाइयों और सफलता से जलता था. यही ईर्ष्या उसे कई बार गलत रास्ते पर ले गई.
8. भय (डर)
आठवां सिर डर का प्रतीक है – खोने का डर, हार जाने का डर. रावण बाहर से शक्तिशाली दिखता था लेकिन अंदर से डरा हुआ था.
9. द्वेष (नफरत)
रावण दूसरों से बदला लेने की भावना रखता था. वह क्षमा करने की बजाय नफरत पालता था.
10. असत्य (झूठ और भ्रम)
आखिरी सिर असत्य का प्रतीक है. रावण ने कई बार सच को नज़रअंदाज़ किया और झूठ का साथ दिया.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (01 अक्टूबर 2025)
1 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- धन का व्यर्थ व्यय होगा, मानसिक अशांति एवं कष्ट से मन विक्षुब्ध रहेगा, कार्य में विलम्ब होगा।
वृष राशि :- चिन्ताग्रस्त होने से बचें, व्यवसायिक क्षमता अवश्य ही अनुकूल रहेगी, कार्य पर ध्यान देने से लाभ होगा।
मिथुन राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति से असमर्थता का वातावरण कष्टप्रद हेगा, शांत मन से धैर्य पूर्वक कार्य करें।
कर्क राशि :- किसी प्रयोजन से बचें अन्यथा परेशानी में फंस सकते हें, समय का ध्यान अवश्य रखें, कार्य पर ध्यान दें।
सिंह राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति के कारण कष्ट होगा, मन उद्विघ्न रहेगा, सोच-विचार कर आगे बढ़ें।
कन्या राशि :- विवादग्रस्त होने से बचें, वाद-विवाद की संभावना है, सोचे कार्य अवश्य पूर्ण होंगे, आलस्य से हानि होगी।
तुला राशि :- कुटुम्ब की समस्यायें सुलझेंगी, कार्यगति में सुधार होगा, कार्यगति पर ध्यान दें, समय पर कार्य करने से लाभ होगा।
वृश्चिक राशि :- कार्य कुशलता से संतोष होगा, दैनिक सृद्धि के साधन बनेंगे, आय-व्यय की स्थिति समान रहेगी।
धनु राशि :- अधिकारियों से संतोष, दैनिक समृद्धि के साधन जुटायेंगे, व्यय की अधिकता रहेगी, धन के व्यर्थ व्यय से बचें।
मकर राशि :- मान-प्रतिष्ठा पर आंच आने का भय, समय व्यर्थ नष्ट होगा, रुके कार्य बनेंगे, परिश्रम से धन लाभ की संभावना।
कुंभ राशि :- किसी घटना का शिकार होने से बचें, चोट-कष्टादि का भय, सावधानी से कार्य करें, बातचीत में सतर्कता रखें।
मीन राशि :- स्त्री वर्ग से सुख व हर्ष मिलेगा, बिगड़े कार्य बनेंगे, समय स्थिति का लाभ लें, समय का ध्यान अवश्य रखें।
दशहरे के दिन करें इस पक्षी के दर्शन, सफलता से भरा होगा पूरा साल...हाथ की कलाई पर यह फूल बांधना भी शुभ!
30 Sep, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में नवरात्र का बहुत खास महत्व होता है. पूरे 9 दिनों तक मां दुर्गा की पूजा-आराधना करने से घर में सुख-समृद्धि आती है. वहीं सदियों से इस त्योहार के दौरान कई शुभ संकेतों पर ध्यान दिया जाता है, जिनमें से एक है पक्षियों का दिखना. मान्यता है कि कुछ विशेष पक्षियों का दिखना दुर्गा पूजा के दौरान शुभ संकेत देता है. बता दें कि हिंदू धर्म में पक्षियों को देवी-देवताओं का दूत माना गया है. साथ ही ये प्रकृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी हैं.
उनमें से एक पक्षी ऐसा है, अगर विजयादशमी के दिन देख लें तो सालों भर आपके घर में सुख-समृद्धि की वृद्धि होगी और हमेशा घर में खुशहाली बनी रहेगी. कौन सा है वह पक्षी, जानते हैं देवघर के ज्योतिषाचार्य से?
क्या कहते हैं देवघर के ज्योतिषाचार्य
नवरात्रि के दिनों में विजयादशमी की तिथि बेहद खास होती है. क्योंकि इसी दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था और इसी दिन रावण दहन भी होता है. इस साल 2 अक्टूबर को विजयादशमी तिथि पड़ रही है. दशमी की तिथि का महत्व इसमें है कि इस दिन मां दुर्गा ने असुरी शक्ति को नीचे दबाया और उन्होंने भगवान शिव का साथ दिया. यह दिन शक्ति और शिव के साथ एकत्र आने का प्रतीक है.
विजयादशमी के दिन जरूर करें इस पक्षी का दर्शन
ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि नीलकंठ भगवान शिव का ही रूप माना जाता है. इसके दर्शन से मानव आत्मा को शांति और मनवांछित फल की प्राप्ति की आशा होती है. नीलकंठ का दर्शन मात्र करने से भक्तों को पापों से मुक्ति मिलती है और उन्हें दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होता है. अगर नीलकंठ पक्षी का दर्शन कहीं नहीं हो पाता तो फोटो में भी दर्शन कर सकते हैं.
अपराजिता फूल का करें पूजन
विजयादशमी के दिन अपराजिता फूल का पूजन जरूर करना चाहिए. यह मां दुर्गा का सबसे प्रिय फूल होता है. इस दिन अपराजिता फूल का पूजन कर अगर अपने हाथ की कलाई पर बांधते हैं तो किसी भी प्रकार की बाधा आपको छू नहीं सकती और जीवन में हमेशा तरक्की ही प्राप्त होगी.
सिर्फ किन्नर कर सकते हैं बोचार माता की पूजा, देवी का रहस्यमयी मंदिर और अनसुनी रीतियां
30 Sep, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारत विविधताओं का देश है. यहां हर परंपरा, हर मान्यता अपने भीतर कोई अनूठा रहस्य समेटे होती है. आज हम आपको लेकर चलेंगे एक ऐसे मंदिर में लेकर, जहां देवी की पूजा सिर्फ किन्नर समुदाय द्वारा की जाती है. इस अनोखी परंपरा से जुड़ी कहानियां और रीतियों को जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे. गुजरात के अहमदाबाद में बोचार माता का मंदिर स्थित है. यह कोई साधारण मंदिर नहीं है. यहां की पूजा-पद्धति, रीति-रिवाज और परंपराएं बिल्कुल अलग हैं. इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां पूजा करने का अधिकार सिर्फ किन्नर समुदाय को है.
किन्नर समाज इस मंदिर को आस्था का केंद्र मानता है. मान्यता है कि बोचार माता खुद इस समुदाय की रक्षक और मार्गदर्शक देवी हैं. जब कोई किन्नर गुरु पद को स्वीकार करता है, तो सबसे पहले वह बोचार माता के मंदिर में आकर आशीर्वाद लेता है.
‘बोचार माता हमारी माता हैं’
कि बोचार माता हमारी माता हैं. जब कोई किन्नर जन्म लेता है, तो हम मानते हैं कि माता ने उसे खुद चुना है. हमारी हर पूजा, हर संस्कार में सबसे पहले बोचार माता का नाम लिया जाता है. यह परंपरा सदियों पुरानी है. बोचार माता के मंदिर में साल में एक बार विशेष पूजा होती है, जिसे केवल किन्नर ही कर सकते हैं. इस अवसर पर देशभर से किन्नर यहां इकट्ठा होते हैं. पूजा में नाच-गान, मंत्रोच्चार और विशेष अनुष्ठानों द्वारा माता को प्रसन्न किया जाता है. यह पूजा केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक एकता और पहचान का प्रतीक भी है.
नई पहचान और अपनापन
किन्नर अक्सर समाज से अलग-थलग रहते हैं. वे मंदिर आकर एक नई पहचान और अपनापन महसूस करते हैं. कई लोगों ने देखा है कि किन्नर बड़ी श्रद्धा से माता की सेवा करते हैं. उनकी भक्ति में सच्चाई है. यहां आने के बाद महसूस होता है कि भक्ति में कोई भेद नहीं होता. किन्नर समाज के लोग बताते हैं कि मंदिर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय होता है. मान्यता है कि बोचार माता से सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है. यही वजह है कि अब आम लोग भी इस मंदिर में आकर माता के दर्शन करते हैं लेकिन पूजा का विशेषाधिकार आज भी केवल किन्नरों को ही है.
समाज को संदेश देता मंदिर
बोचार माता का यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है बल्कि यह समाज को यह संदेश भी देता है कि हर किसी की भक्ति समान होती है, चाहें वो किसी भी लिंग, जाति या वर्ग का क्यों न हो. किन्नरों की यह अनोखी परंपरा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा समाज की रूढ़िवादी परंपराओं से परे होती है.
विजयदशमी पर अपनाएं 5 अच्छी बातें और बचें इन 5 गलतियों से, तभी बनेगा त्योहार खास, जानें क्या करें क्या नहीं
30 Sep, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दशहरा या विजयदशमी भारत के सबसे प्रमुख त्योहारों में से एक है. यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है. इस दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था और देवी दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस को हराया था. इस त्योहार को देशभर में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है, लेकिन इसका मूल संदेश एक ही है-सच्चाई और अच्छाई की जीत. दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. इस दिन साफ-सफाई, मदद और अच्छे व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए, जबकि पटाखों, गंदगी और उग्र व्यवहार से बचना ज़रूरी है. त्योहार को खुशियों और समझदारी के साथ मनाएं. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
हालांकि, त्योहार की खुशी में कई बार हम कुछ ऐसी बातें कर जाते हैं जो गलत हो सकती हैं या दूसरों को परेशानी दे सकती हैं. इसलिए यह ज़रूरी है कि हम त्योहार को उत्साह के साथ मनाएं, लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखते हुए.
दशहरा पर क्या करें?
1. साफ-सफाई रखें: अपने घर और आस-पास के इलाके को साफ रखें. यह ना सिर्फ त्योहार के माहौल को अच्छा बनाएगा, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर रहेगा.
2. सीख लें अच्छाई की अहमियत: दशहरा केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन में सच्चाई, धैर्य और संयम की अहमियत सिखाता है. इस दिन अपने व्यवहार में भी इन बातों को शामिल करें.
3. बड़ों का आशीर्वाद लें: यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भी अहम है. बड़ों से आशीर्वाद लेना रिश्तों में मिठास बढ़ाता है.
4. जरूरतमंदों की मदद करें: इस दिन यदि आप किसी गरीब या ज़रूरतमंद की मदद करते हैं, तो उसका पुण्य कई गुना बढ़ जाता है.
5. पर्यावरण का ध्यान रखें: रावण दहन के समय कोशिश करें कि प्रदूषण कम हो. इको-फ्रेंडली तरीके अपनाना इस समय की ज़रूरत है.
दशहरा पर क्या न करें?
1. अत्यधिक पटाखे न जलाएं: पटाखों से ध्वनि और वायु प्रदूषण होता है, जिससे बुजुर्गों, बच्चों और पशुओं को परेशानी होती है.
2. धार्मिक भावनाओं का मजाक न बनाएं: सोशल मीडिया या किसी और माध्यम से ऐसे संदेश या मज़ाक न करें जो किसी की आस्था को चोट पहुंचा सकते हैं.
3. सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी न फैलाएं: कई लोग रावण दहन या मेले में खाने-पीने के बाद कचरा फैला देते हैं. ऐसा करने से त्योहार का पूरा माहौल खराब हो जाता है.
4. उग्र व्यवहार से बचें: त्योहार के उत्साह में कभी-कभी झगड़े या बहसबाज़ी हो जाती है. ऐसे मौके पर संयम रखना ज़्यादा बेहतर होता है.
5. अंधविश्वास से दूर रहें: किसी भी तरह के टोने-टोटके या झूठी मान्यताओं के पीछे न भागें. दशहरा अच्छाई की जीत का पर्व है, न कि डर फैलाने का.
क्या दशहरा में खा सकते हैं नॉनवेज? इन जगहों पर खाने से कोई रोक-टोक नहीं, जानें क्यों
29 Sep, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दशहरा, जिसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है, भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है. यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, जिसमें भगवान राम ने रावण पर और मां दुर्गा ने महिषासुर पर विजय प्राप्त की. हर घर में दशहरे को मनाने का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन खाने-पीने की परंपराएं इसे खास बनाती हैं. ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता है – क्या दशहरे के दिन नॉन-वेज खाना उचित है या नहीं?
परंपरागत रूप से दशहरा को शुद्धता और भक्ति का दिन माना जाता है. इस दिन कई हिंदू परिवार शाकाहारी भोजन को प्राथमिकता देते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि शाकाहारी भोजन को सात्विक माना जाता है, जो शरीर और मन को शुद्ध करता है. मांसाहार से परहेज करने को आत्म-नियंत्रण और जीवन के प्रति सम्मान जताने का तरीका माना जाता है. मंदिरों और सामुदायिक आयोजनों में अक्सर शाकाहारी व्यंजन परोसे जाते हैं, ताकि त्योहार का आध्यात्मिक महत्व बना रहे. भारत में भोजन की परंपराएं क्षेत्र और परिवार के अनुसार भिन्न होती हैं. उत्तर और पश्चिम भारत में दशहरा पर शाकाहारी भोजन आम है, लेकिन कुछ पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में कुछ परिवार नॉन-वेज का सेवन करते हैं. बंगाल में पूजा और अनुष्ठानों के बाद कुछ घरों में मछली या चिकन खाया जाता है. केरल और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में स्थानीय परंपरा के अनुसार नॉनवेज व्यंजन भी शामिल हो सकते हैं.
कुछ सब्जियों को चिकन स्टाइल में खा सकते हैं
अगर आपका नवरात्रि के दिनों में नॉनवेज खाने का मन है, तो आप कुछ सब्जियों को चिकन स्टाइल में तैयार करके स्वाद का मजा ले सकते हैं. इसके लिए आप पनीर, सोया चंक्स, मशरूम या कॉलिफ्लावर जैसी सब्जियों का इस्तेमाल कर सकते हैं. इन्हें मसालेदार मैरिनेशन में डालकर तड़के के साथ भूनें या ग्रिल करें, जैसे चिकन पकाया जाता है. इससे सब्जियों में नॉनवेज जैसा स्वाद आएगा, लेकिन आप धार्मिक रूप से शुद्ध रहेंगे. यह तरीका न केवल हेल्दी है, बल्कि त्योहार के दौरान आपके खाने को रोचक और स्वादिष्ट भी बना देता है.
कलश स्थापना पर बोए गए जौ के अंकुर बताते हैं शुभ और अशुभ के संकेत, यहां जानें कौन सा रंग क्या है बताता
29 Sep, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नवरात्रि में बोए गए जौ के अंकुर शुभ-अशुभ संकेत बताते हैं. हरे और सफेद अंकुर समृद्धि व सफलता का संकेत हैं.
नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना के साथ जौ बोए जाते हैं. माना जाता है कि मां दुर्गा की पूजा के दौरान ये अंकुरित होकर आने वाले समय के शुभ-अशुभ संकेत बताते हैं और साधना की सफलता का भी आभास कराते हैं.
अगर जौ धुएं जैसे रंग में अंकुरित होते हैं, तो इसे परिवार में कलह और मतभेद का संकेत माना जाता है. इस शकुन से घर-परिवार में मनमुटाव बढ़ने और रिश्तों में तनाव की स्थिति बन सकती है.
जौ के काले अंकुर शुभ नहीं माने जाते. यह संकेत देते हैं कि पूरे वर्ष निर्धनता, आर्थिक संकट और अभाव का समय रहने वाला है. ऐसे समय में परिवार को धैर्य और सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए.
अगर जौ बिल्कुल नहीं उगते, तो इसे बड़ा अशुभ माना जाता है. यह कार्यों में लगातार बाधाएं आने और परिवार में किसी आकस्मिक संकट या मृत्यु की संभावना का संकेत माना जाता है.
यदि जौ के अंकुर लाल या रक्त वर्ण के दिखाई दें तो यह रोग, व्याधि और शत्रु भय का संकेत माना जाता है. ऐसे समय में साधक को मां दुर्गा से विशेष आराधना कर सुरक्षा और स्वास्थ्य की कामना करनी चाहिए.
हरे अंकुर सबसे शुभ माने जाते हैं. यह धन अन्न, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक हैं. हरे अंकुर का उगना मां दुर्गा की कृपा का स्पष्ट संकेत है और यह बताता है कि साधना पूर्ण रूप से सफल हुई है.
सफेद अंकुरित जौ अत्यंत शुभकारी माने जाते हैं. यह साधक की अभिष्ट सिद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और ईश्वर की विशेष कृपा का संकेत देते हैं. सफेद अंकुर आने वाले वर्ष में शांति, सुख और समृद्धि का प्रतीक माने जाते हैं.
अगर अंकुर आधे हरे और आधे पीले होते हैं तो यह मिश्रित संकेत है. पहले कार्यों में सफलता मिलेगी लेकिन बाद में हानि की स्थिति बन सकती है. इसलिए ऐसे समय में सावधानी और धैर्यपूर्वक निर्णय लेना जरूरी है.
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