धर्म एवं ज्योतिष
मार्गशीर्ष मास का पहला सोम प्रदोष व्रत: 17 नवंबर को या 18 नवंबर को? जानिए सही तारीख और शुभ मुहूर्त!"
16 Nov, 2025 03:30 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Shiva Pradosh Vrat हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ माना जाता है। शिव पुराण के अनुसार प्रदोष तिथि भगवान महादेव की प्रिय तिथि है। श्रद्धा और पवित्र भाव से की गई शिव पूजा साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती है। इस बार मार्गशीर्ष माह का पहला प्रदोष सोमवार को पड़ रहा है, जिससे इसका महत्व कई गुना बढ़ गया है। जब सोमवार की पवित्रता प्रदोष तिथि से जुड़ जाती है, तो यह दुर्लभ और अत्यंत प्रभावी योग बनाता है, जिसे सोम प्रदोष व्रत कहा जाता है।
कब है सोम प्रदोष व्रत?
इस वर्ष Shiva Pradosh Vrat को और विशेष बनाने वाला एक महत्वपूर्ण संयोग भी बन रहा है—अभिजीत मुहूर्त का। माना जाता है कि अभिजीत मुहूर्त में किया गया जप, संकल्प या पूजा शीघ्र फल देती है। पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि
17 नवंबर सुबह 4:46 बजे से 18 नवंबर सुबह 7:11 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार व्रत 17 नवंबर 2025 को रखा जाएगा।
प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद लगभग डेढ़ घंटे तक माना जाता है और इसी समय शिव आराधना सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।
अभिजीत मुहूर्त इस बार सुबह 11:45 से 12:27 बजे तक रहेगा।
प्रदोष व्रत की पूजा विधि
सोम प्रदोष व्रत को चंद्र दोष शांत करने, संतान प्राप्ति, वैवाहिक सुख और अच्छे जीवनसाथी के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। माना जाता है कि प्रदोष व्रत साधक को अष्ट सिद्धि और नव निधियों का आशीर्वाद दिलाता है। इस साल का अंतिम सोम प्रदोष व्रत 17 नवंबर 2025 को पड़ रहा है, जो विशेष रूप से विवाह में बाधाओं को दूर करने वाला माना गया है।
इस दिन करें ये सरल और प्रभावी उपाय
फलाहार व्रत रखकर शिवलिंग पर अक्षत और शमी का पुष्प चढ़ाएं। इससे प्रेम विवाह के रास्ते सरल होते हैं।
108 बेलपत्रों पर चंदन से ‘श्रीराम’ लिखकर शिव को अर्पित करें। इससे विवाह में देरी दूर होती है।
माता पार्वती को सोलह श्रृंगार अर्पित करें और गरीबों को अन्न, फल या वस्त्र दान करें। इससे ग्रहों की अशुभता दूर होती है।
7वीं शताब्दी के इस मंदिर में बिना घंटी बजाए अधूरी मानी जाती है भगवान शिव की पूजा, यहां है 10 फीट ऊंचा शिवलिंग
16 Nov, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तमिलनाडु के कांचीपुरम को मंदिरों का शहर माना जाता है और इस शहर को दक्षिण भारत का काशी और मथुरा भी कहा जाता है. पवित्र जगहों में शामिल कांचीपुरम में बहुत सारे मंदिर हैं, लेकिन कैलाशनाथर मंदिर सबसे पुराना और प्रसिद्ध है, इसे कैलाशनाथ मंदिर भी कहा जाता है. मंदिर को शिल्पकारी और उसकी वास्तुकला के लिए जाना जाता है. मान्यता है कि इस मंदिर के दर्शन करने मात्र से ही सभी इच्छाएं पूरी हो जाती है और रोग व शोक दूर हो जाते हैं. बताया जाता है कि इस मंदिर को छोटे-छोटे पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है. आइए जानते हैं इस मंदिर की खास बातें…
कैलाशनाथर मंदिर भगवान शिव को समर्पित मंदिर है जिसके प्रांगण में 58 छोटे-छोटे अन्य मंदिरों का निर्माण किया गया है. मंदिर में ग्रेनाइट का 10 फीट ऊंचा शिवलिंग है. इसके अलावा भगवान विष्णु, देवी, सूर्य, गणेश जी और कार्तिकेय के मंदिर भी देखने को मिल जाएंगे. माना जाता है कि इस मंदिर में बिना घंटी बजाए भगवान शिव की पूजा अधूरी मानी जाती है. घंटी भगवान और अपने अंदर के चेतना को जागृत करने के लिए बजाई जाती है.
मंदिर को लेकर कोई पौराणिक कथा मौजूद नहीं है, लेकिन मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है. मंदिर का निर्माण 7वीं शताब्दी ईस्वी में पल्लव राजा राजसिंह ने कराया था और महेंद्र वर्मा पल्लव ने मंदिर के निर्माण को पूरा करवाया था. कैलाशनाथर मंदिर वेदवती नदी के तट पर बना है, जिससे इसकी अलौकिकता और बढ़ जाती है. मंदिर में शिवरात्रि के मौके पर विशेष पूजा अनुष्ठान होता है और भारी संख्या में भक्त मंदिर में दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं.
मंदिर के निर्माण और उसकी वास्तुकला में पल्लव राजवंश की झलक दिखती है. मंदिर की नींव ग्रेनाइट पत्थर पर रखी गई है और मंदिर को बनाने में बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया. मंदिर की दीवारों और मुख्य द्वार पर ज्यादातर सिंह की प्रतिमा लगी है. पल्लव राजवंश का प्रतीक सिंह हुआ करता था. इसके अलावा दीवारों पर देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी बनी हैं, जो अलग-अलग संस्कृति को दिखाती हैं.
मंदिर का रखरखाव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है, लेकिन आज भी मंदिर जर्जर हालत में है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का मानना है कि इस मंदिर का बनाव ही इसे बाकी मंदिरों से अलग बनाता है, क्योंकि इस मंदिर को छोटे-छोटे पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है. मंदिर को बनाने में किसी बड़े पत्थर का इस्तेमाल नहीं किया गया है. मंदिर को अध्यात्म के साथ-साथ पर्यटन की दृष्टि से देखा जाता है. पर्यटक सुबह 6:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक और शाम 4:00 बजे से 7:30 बजे मंदिर में दर्शन के लिए आ सकते हैं.
यहां एक या दो नहीं बल्कि नौ अलग-अलग रूपों में विराजमान हैं भगवान नरसिंह, उग्र नरसिंह रूप में प्रकट हुए थे यहां
16 Nov, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भगवान विष्णु के अवतार नरसिंह को शक्ति और शत्रुओं पर विजय का प्रतीक माना जाता है. कहा जाता है कि नरसिंह भगवान के दर्शन करने मात्र से ही भक्त भयमुक्त होता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिरण्यकश्यप को मारने के लिए भगवान नरसिंह जिस खंभे को फाड़कर प्रकट हुए थे, उसके अवशेष आज भी इस चमत्कारी मंदिर में मौजूद हैं? हम बात कर रहे हैं अहोबिलम मंदिर की. इस मंदिर में पहुंचते ही आप अपने आसपास एक अलग अनुभव महसूस करेंगे और कई चमत्कार होते दिखेंगे. इस मंदिर में भगवान नरसिंह एक या दो नहीं बल्कि नौ अलग-अलग रूपों में विराजमान हैं. आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में खास बातें…
पूरे विश्व में यह पहला मंदिर
अहोबिलम मंदिर आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले के पास अल्लागड्डा मंडल के नल्लामाला पहाड़ी जंगलों में बसा है. मंदिर ऊंची पहाड़ी पर बना है और ऐसे में भक्तों को मंदिर तक पहुंचने के लिए दुर्गम रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है. मान्यता है कि भगवान इस स्थान पर उग्र नरसिंह रूप में प्रकट हुए थे, जो नरसिंह का सबसे भयंकर रूप है. इस मंदिर की खास बात ये है कि यहां भगवान नरसिंह के नौ रूपों की पूजा होती है. पूरे विश्व में यह पहला मंदिर है, जहां नरसिंह भगवान के नौ रूपों का वर्णन किया गया है. ये सभी नौ मंदिर 5 किलोमीटर की परिधि में बने हैं और भक्तों को यहां आकर नौ मंदिरों के दर्शन कर परिक्रमा भी लगानी होती है.
नौ देवताओं में सबसे बड़े देवता
मंदिर की वास्तुकला बहुत प्राचीन है और नौ मंदिरों में से कुछ मंदिर गुफाओं के अंदर बने हैं, जो सुख और शांति प्रदान करते हैं. निचले अहोबिलम (पहाड़ पर बनी गुफा) में दो मंदिर और ऊपरी अहोबिलम में चार मंदिर हैं. दो अन्य मंदिर घने जंगल के अंदर हैं और एक बीच में है. इन नौ मंदिरों में से छत्रवता नरसिंह स्वामी का सबसे प्राचीन मंदिर है, जिन्हें नरसिंह के सभी नौ देवताओं में सबसे बड़े देवता के रूप में पूजा जाता है.
भगवान नरसिंह की आठ भुजाओं वाली मूर्ति
इस मंदिर में भगवान नरसिंह की आठ भुजाओं वाली मूर्ति है, जो हिरण्यकश्यप के वध के दृश्य को दर्शाती है. मंदिर में ही एक पुराने पत्थर के अवशेष हैं, जिसे उस खंभे से जोड़ा जाता है, जहां से भगवान प्रकट हुए थे. मंदिर में एक गाय भी आती है, जो भक्तों के लिए आस्था का प्रतीक है. भक्तों के मुताबिक गाय रोजाना एक निश्चित समय पर मंदिर में आती है और मंदिर में मौजूद पुजारी गाय की पूजा करते हैं और खाने के लिए प्रसाद भी देते हैं.
गाय भगवान नरसिंह की आस्था का प्रतीक
माना जाता है कि गाय में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है और ये गाय भगवान नरसिंह की आस्था का प्रतीक है. नौ मंदिरो में नरसिंह भगवान भार्गव नरसिंह स्वामी, योगानंद नरसिम्हा स्वामी, छत्रवता नरसिंह स्वामी, अहोबिला नरसिम्हा स्वामी क्रोडकारा (वराह) नरसिम्हा स्वामी, करंज नरसिंह स्वामी, मालोला नरसिम्हा स्वामी, ज्वाला नरसिम्हा स्वामी और पावना नरसिंह स्वामी के रूपों में विराजमान हैं. सभी नौ रूप अलग-अलग वंशों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
मां पार्वती के तप का प्रतीक है ये मंदिर, चमत्कारी पेड़ पर लगते हैं चार तरह के आम
16 Nov, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में भगवान शिव की महिमा का बखान सबसे ज्यादा किया है. जिनका ना कोई आदि और ना ही अंत है. पंचभूत तत्व जिनके अधीन हैं, वे भगवान शिव हैं. भगवान शिव का ऐसा ही चमत्कारी मंदिर तमिलनाडु में स्थित है, जो पांच तत्वों में से एक तत्व पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करता है. इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा और दर्शन करने मात्र से ही सभी संकट दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति भी होती है. साथ ही यहां पर एक चमत्कारी पेड़ भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां चार अलग अलग तरह के आम लगते हैं. आइए जानते हैं इस मंदिर और चमत्कारी पेड़ के बारे में…
मंदिर में भगवान शिव एकम्बरेश्वर शिवलिंग के रूप में
तमिलनाडु के कांचीपुरम में बना एकम्बरेश्वर मंदिर आस्था और चमत्कारों के लिए जाना जाता है. भक्त मंदिर में भगवान शिव की अराधना के लिए दूर-दूर से आते हैं. मंदिर में भगवान शिव एकम्बरेश्वर शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं और उनकी पत्नी यानी मां पार्वती एलावार्कुझाली के रूप में विराजमान हैं. एकम्बरेश्वर भारत के सात सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है और बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करता है.
दीवारों पर 1008 शिवलिंगों की शृंखला
यह कांचीपुरम के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है. मंदिर परिसर 40 एकड़ में फैला है. मंदिर में एक हजार स्तंभों वाला अयिरम काल मंडपम भी बना है, जिसकी दीवारों पर भगवान शिव की अलग-अलग प्रतिमाओं को उकेरा गया है. दीवारों पर 1008 शिवलिंगों की शृंखला बनी है, जो देखने में अद्भुत लगती है. इस मंडपम का निर्माण विजयनगर के राजा कृष्णदेवराय ने कराया था.
आम के पेड़ के नीचे कड़ी तपस्या
एकम्बरेश्वर मंदिर मां पार्वती के भगवान शिव के प्रति समर्पण और प्रेम का प्रतीक है. माना जाता है कि भगवान शिव को पाने के लिए उन्होंने आम के पेड़ के नीचे कड़ी तपस्या की थी. अब भगवान शिव ने मां पार्वती की परीक्षा लेने की सोची और आम के पेड़ को भस्म कर दिया, जिससे बचने के लिए मां पार्वती ने भगवान विष्णु से मदद मांगी.
मां पार्वती और मां गंगा बहनें
भगवान विष्णु ने मां पार्वती की मदद की और पेड़ को भी सुरक्षित बचा लिया, जिसके बाद भगवान शिव ने मां गंगा को उन्हें डुबोने के लिए भेजा, लेकिन मां पार्वती और मां गंगा बहनें हैं. ऐसे में मां पार्वती ने उन्हें भी वापस भेज दिया. भगवान शिव मां पार्वती के इतने दृढ़ निश्चय को देखकर प्रसन्न हुए और मानव रूप में अवतरित होकर उनसे विवाह किया था.
भक्त मानते हैं चमत्कारी पेड़
जिस पेड़ के नीचे मां पार्वती ने भगवान शिव के लिए तपस्या की थी, भक्त उसे चमत्कारी पेड़ मानते हैं. भक्तों का मानना है कि जो भी निसंतान दंपति इस आम के पेड़ की पूजा करते हैं. उन्हें गुणी संतान की प्राप्ति होती है. बताया जाता है कि आम का पेड़ 3500 साल से भी ज्यादा पुराना है और आज भी पेड़ पर चार प्रकार के आम लगते हैं. ऐसा कहा जाता है कि यह चारों वेदों का प्रतीक है.
बेहद पवित्र और शुभ है यह पौधा, घर में रखने से 1,2 या फिर 3 नहीं... होंगे ढेरों लाभ
16 Nov, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिन्दू धर्म में तुलसी समेत कुछ पौधों को बेहत पवित्र और शुभ माना गया है. तुलसी के बिना घर का आंगन अधूरा सा लगता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी में भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का वास होता है. इसीलिए इसको पूजनीय स्थान दिया गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि वास्तु में शमी के पौधे को भी बेहद खास माना गया है. इसके पूजन से शनिदोष का प्रभाव कम होता है. इसे घर में रखने से दरिद्रता का नाश होता है. कुछ लोग इसको कहीं और किसी भी तरह से लगा देते हैं, जिससे उनको वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता है. इसलिए जरूरी है कि पौधे को सही तरीके से अच्छी जगह का चयन करें. अब सवाल है कि आखिर शमी के पौधे का धार्मिक महत्व क्या है? इसे घर में लगाने की सही दिशा क्या है? घर में शमी का पौधा कैसे उगाएं? आइए जानते हैं इस बारे में-
शमी के पौधे का धार्मिक महत्व?
मान्यताओं के अनुसार, शमी के पौधे का पूजन करने से शनिदोष का प्रभाव कम होता है. साथ ही, घर से निगेटिविटी भी दूर होती है. यही नहीं, रामायण में भी शमी के पौधे का महत्व बताया गया है. इसके अनुसार, जब भगवान राम और रावण के बीच युद्ध हुआ था उस समय युद्ध शुरू होने से पहले भगवान राम ने शमी के पेड़ का पूजन किया था. इसके बाद उन्हें विजय हासिल हुई थी.
देवों के देव भगवान शिव होते प्रसन्न
शमी के पौधे के पत्तों का इस्तेमाल भगवान शिव की पूजा में भी किया जाता है. ऐसा करने से वे प्रसन्न होते हैं. इसके साथ ही भगवान गणेश और मां दुर्गा की पूजा में भी शमी के पत्तों का उपयोग करना शुभ माना गया है. जिस तरह घरों में सुबह-शाम तुलसी का पूजन किया जाता है उसी प्रकार शनिवार के दिन शमी के पेड़ का पूजन करना चाहिए. मान्यता है कि शमी के पेड़ के पास सरसों के तेल का दीपक जलाने से घर में आ रही बाधाएं दूर होती हैं.
किस दिशा में शमी प्लांट रखना शुभ
वास्तु के अनुसार, शमी का पौधा घर के अंदर नहीं लगाना चाहिए. आप इसे बालकनी या छत पर लगा सकते हैं. इसे लगाने के लिए दक्षिण दिशा बेहद ही शुभ मानी गई है. ध्यान रखें शमी का पौधा इस तरह रखें कि उस पर सीधी धूप न पड़े. घर से बाहर निकलने पर दाहिने ओर शमी का पौधा लगाना भी शुभ है. शमी का पौधा लगाने के लिए शनिवार का दिन सबसे अच्छा माना गया है क्योंकि इसका संबंध सीधा शनिदेव से है.
घर में शमी का पौधा कैसे लगाएं
होम गार्डन में शमी का पौधा लगाने के लिए आपको शमी के हाई जर्मिनेशन रेट वाले सीड की जरूरत होगी. अगर आप इसे कटिंग से उगाने जा रहे हैं, तो एक स्वस्थ पौधे की लगभग 6 इंच लम्बी कटिंग की आवश्यकता होगी. वहीं, गमले में शमी लगाने के लिए आपको कटिंग लेनी होगी. इसके लिए आपको किसी स्वस्थ्य पौधे की 6 से 8 सेमी लंबी कटिंग लेनी होगी. ध्यान रहे कि कटिंग से निचली पत्तियां हटा दें. इसके बाद इसे गमले में लगभग 3-4 इंच गहराई में सीधा लगाएं. इसके बाद इसको गर्म या फिल्टर्ड धूप वाले स्थान पर रख दें. ऐसा करने से कुछ समय बाद ही कटिंग में जड़ें आनी शुरू हो जाएंगी.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (16 नवंबर 2025)
16 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- चिन्ता, विभ्रम, अशांति से बचिये, दैनिक व्यवसाय गति अनुकूल बनेगी।
वृष राशि :- दूर-समीप की लाभदायक यात्रा होगी, मित्रों का सहयोग अवश्य प्राप्त होगा।
मिथुन राशि :- पड़ोसी से अनबन होगी और बाद में सुलह भी हो जायेगी, विचारे कार्य अवश्य बनेंगे।
कर्क राशि :- संतान के कार्य से प्रसन्नता होगी, प्रतिष्ठा एवं सम्पन्नता से आपको खुशी होगी।
सिंह राशि :- जमीन-जायजाद के झगड़े सुलझेंगे, व्यापारिक संबंध स्थापित होंगे ध्यान दें।
कन्या राशि :- नवीन कार्य-पद्धति से संतोष, तनाव से बचिये, आरोप से उद्विघ्नता बनेगी।
तुला राशि :- प्रयत्न सफल हो, मित्र-वर्ग से तनाव व अशांति, मानसिक विभ्रम बनेगा ध्यान दें।
वृश्चिक राशि :- सामाजिक कार्य में प्रभुत्व वृद्धि होगी, कार्य कुशलता से संतोष होगा।
धनु राशि :- चिन्ता निवृत्ति, अर्थ-लाभ, योजनायें फलीभूत होंगी तथा रुके कार्य बनेंगे।
मकर राशि :- मान-प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण रहेगी, सभी कार्यों को एक-एक करके निपटा लें।
कुंभ राशि :- आर्थिक लाभ की योजना का विस्तार होगा विचार-विमर्श कर अंतिम रूप दें।
मीन राशि :- स्वयं सफलतापूर्ण कार्य में स्थाई एवं अस्थाई स्त्रोतों पर विशेष ध्यान अवश्य दें।
भारतीय महिलाएं क्यों पहनती हैं अपने पैरों में बिछिया? जानिए इनका धार्मिक और वैज्ञानिक कारण
15 Nov, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारतीय महिलाएं पैरों में बिछिया (Toe Ring) पहनती हैं, इसके पीछे गहरे धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक कारण हैं. आइए विस्तार से समझते हैं.
धार्मिक और सांस्कृतिक कारण
विवाह का प्रतीक
बिछिया को सुहाग की निशानी माना जाता है. यह सोलह श्रृंगार का हिस्सा है और दर्शाता है कि महिला विवाहित है.
शुभता और देवी का आशीर्वाद
शास्त्रों के अनुसार, पैरों की दूसरी और तीसरी उंगली में बिछिया पहनने से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है और मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं. यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने का प्रतीक भी है.
चांदी का महत्व
बिछिया हमेशा चांदी की ही पहनी जाती है क्योंकि चांदी को चंद्रमा का कारक माना गया है. यह मन को शांत रखती है और ग्रहों की बाधा दूर करती है. सोने की बिछिया नहीं पहनी जाती क्योंकि सोना भगवान विष्णु से जुड़ा है और पैरों में पहनना अपमान माना जाता है.
रामायण से जुड़ा प्रसंग
जब रावण सीता का हरण कर रहा था, तब सीता ने अपने आभूषणों के साथ अपने बिछिया भी मार्ग में फेंक दिए थे ताकि श्रीराम उन्हें पहचान सकें. इससे इसका महत्व और बढ़ गया.
वैज्ञानिक और स्वास्थ्य कारण
एक्यूप्रेशर प्रभाव
पैरों की दूसरी और तीसरी उंगली की नसें गर्भाशय और हृदय से जुड़ी होती हैं. बिछिया पहनने से इन नसों पर हल्का दबाव पड़ता है, जिससे प्रजनन क्षमता बढ़ती है और गर्भधारण में मदद मिलती है.
हार्मोन संतुलन
यह दबाव महिलाओं के हार्मोन सिस्टम को संतुलित करता है, जिससे मासिक धर्म नियमित रहता है और थायराइड जैसी समस्याओं की संभावना कम होती है.
चांदी के गुण
चांदी ठंडी प्रकृति की धातु है, जो शरीर की गर्मी को नियंत्रित करती है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है. यह पृथ्वी की ध्रुवीय ऊर्जा को भी अवशोषित करती है.
बिछिया पहनना सिर्फ परंपरा नहीं है, बल्कि यह धार्मिक आस्था, ऊर्जा संतुलन, और महिला स्वास्थ्य से जुड़ा एक वैज्ञानिक रूप से लाभकारी अभ्यास है
शनि की ढैय्या ने कर दिया सब बर्बाद? ये टोटका बदल देगा आपकी तकदीर! साढ़ेसाती और महादशा में भी मिलेगी राहत!
15 Nov, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
शनि देव -कर्म और न्याय के देवता माने जाते हैं. कहा जाता है कि वे हर इंसान को उसके कर्मों के हिसाब से फल देते हैं, लेकिन जब किसी की कुंडली में साढ़ेसाती, ढैय्या या शनि की महादशा चल रही होती है, तब अक्सर ज़िंदगी में रुकावटें, परेशानी और आर्थिक नुकसान जैसे हालात बनने लगते हैं. नौकरी में अचानक उतार-चढ़ाव आ जाता है, व्यापार में नुकसान होता है, और मानसिक शांति जैसे गायब हो जाती है. ऐसे समय में कई लोग डर जाते हैं, पर सच ये है कि शनि किसी से दुश्मनी नहीं रखते -वे सिर्फ न्याय करते हैं, अगर आप ईमानदारी से कुछ छोटे-छोटे उपाय करें, तो शनि की कृपा दोबारा बरसने लगती है. आज जानेंगे एक ऐसा बेहद असरदार, आसान और बिना किसी तामझाम वाला उपाय जो शनि के प्रकोप को कम कर सकता है और आपके रुके हुए कामों को फिर से चला सकता है.
शनि का असर क्यों पड़ता है ज़्यादा भारी?
शनि देव धीमी चाल वाले ग्रह हैं, लेकिन उनका असर गहरा होता है. जब वे किसी की राशि में आते हैं तो जीवन के हर क्षेत्र की परीक्षा लेते हैं -करियर, रिश्ते, पैसा और मानसिक स्थिति सब पर असर पड़ता है. उनका उद्देश्य सज़ा देना नहीं बल्कि इंसान को उसकी गलती का एहसास कराना होता है ताकि वह सही रास्ते पर लौट सके. इसलिए अगर आपकी ज़िंदगी में शनि का प्रभाव बढ़ रहा है तो घबराने के बजाय खुद को सुधारने और सकारात्मक कदम उठाने की ज़रूरत है.
शनि को प्रसन्न करने का आसान और असरदार उपाय
अगर आप शनि के कारण जीवन में अड़चन, धन की कमी या मन की अशांति महसूस कर रहे हैं, तो ये उपाय करें –
-किसी शुक्रवार को बाजार से 1 जोड़ी चमड़े की चप्पल या जूता खरीदें.
-अगले दिन यानी शनिवार से उसे पहनना शुरू करें.
-लगातार सात दिन तक वही जूता या चप्पल पहनें.
-अगले शनिवार को जब सातवां दिन पूरा हो जाए, तो उसी जूते को पहनकर शनिदेव के मंदिर जाएं.
-मंदिर में पहुंचकर तेल चढ़ाएं, दीपक जलाएं और शनि देव से विनम्रता से प्रार्थना करें.
-पूजा के बाद नंगे पैर घर लौटें और उस जूते को दोबारा न पहनें.
ये उपाय दिखने में बहुत साधारण लगता है, लेकिन इसमें गहरा भाव जुड़ा है -यह दर्शाता है कि इंसान अपने अहंकार को त्यागकर, सादगी और भक्ति से शनि देव की शरण में जा रहा है.
इस उपाय से क्या असर होगा?
-रुके हुए कामों में तेजी आने लगती है.
-करियर और व्यापार में सुधार दिखने लगता है.
-अनावश्यक खर्च और धन की कमी कम होती है.
-मन शांत और आत्मविश्वास से भरा महसूस होता है.
-धीरे-धीरे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लौटने लगती है.
याद रखिए, शनि देव को प्रसन्न करने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है सच्ची नीयत और ईमानदारी, अगर आप कर्म में सच्चे हैं तो शनि हमेशा न्याय देंगे, चाहे वक्त कितना भी कठिन क्यों न हो.
पुत्रदा एकादशी पर 3 दुर्लभ संयोग... करें इस विधि से पूजा! पुत्र रत्न की होगी प्राप्ति
15 Nov, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इस बार पुत्रदा एकादशी पर रवि योग, सिद्ध योग, और भद्रावास योग जैसे दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहे हैं. इन योगों में लक्ष्मी-नारायण की पूजा करने से संतान की सुख-समृद्धि और वंश वृद्धि का वरदान मिलता है.
सनातन धर्म में पौष का महीना बेहद महत्वपूर्ण होता है. इस महीने कई प्रमुख व्रत और त्योहार भी मनाए जाते हैं .जिसमें से एक पुत्रदा एकादशी भी होता है. यह पर्व भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित होता है. इस शुभ अवसर पर भगवान विष्णु की विधि विधान पूर्वक पूजा आराधना का विधान है.
धार्मिक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि पुत्रदा एकादशी के दिन जगतपति भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की भक्ति भाव से पूजा आराधना करने से संतान प्राप्ति होती है. साथ ही जीवन में चल रही तमाम तरह की परेशानियों से मुक्ति भी मिलती है. तो चलिए जानते हैं कब है पुत्रदा एकादशी का व्रत क्या है शुभ मुहूर्त .
अयोध्या के ज्योतिषी पंडित कल्कि राम बताते हैं कि हिंदू पंचांग के अनुसार पौष महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 30 दिसंबर को सुबह 7:50 से शुरू होकर 31 दिसंबर को सुबह 5:00 बजे समाप्त होगी. ऐसी स्थिति में 30 दिसंबर को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाएगा. तो दूसरी तरफ वैष्णजन 31 दिसंबर को एकादशी का पर्व मनाएंगे.
ज्योतिष गणना के अनुसार पुत्रदा एकादशी पर कई शुभ योग का निर्माण भी हो रहा है. जिसमें रवि योग, भद्रवास योग, लक्ष्मी नारायण योग का संयोग बन रहा है. इस योग के दौरान लक्ष्मी नारायण की पूजा आराधना करने से सुख समृद्धि और खुशहाली की वृद्धि होगी.
ज्योतिष गणना के अनुसार पुत्रदा एकादशी पर कई शुभ योग का निर्माण भी हो रहा है. जिसमें रवि योग, भद्रवास योग, लक्ष्मी नारायण योग का संयोग बन रहा है. इस योग के दौरान लक्ष्मी नारायण की पूजा आराधना करने से सुख समृद्धि और खुशहाली की वृद्धि होगी.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (15 नवंबर 2025)
15 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- अधिकारियों का समर्थन फलप्रद होगा, कार्य कुशलता से संतोष होगा, समय का ध्यान रखें।
वृष राशि :- शारीरिक क्षमताओं में कमी, उदासीनता, विरोधी तत्वों से बचिये, रुके कार्य बनेंगे।
मिथुन राशि :- विशेष कार्य स्थिगित रखें, दूसरों के कार्यों में परेशानी, चिन्ता बनेगी, ध्यान से कार्य करें।
कर्क राशि :- तनाव, धन और समर्थ फलप्रद हो, महत्व के सभी कार्य एक-एक कर समय पर बना लें।
सिंह राशि :- चिन्ता, विभ्रम तथा अशांति से बचिये, विरोधी तत्व परेशान अवश्य करेंगे।
कन्या राशि :- व्यर्थ क्लेश व अशांति से बचिये, विरोधी तत्व आपको अवश्य परेशान करेंगे सावधान रहें।
तुला राशि :- प्रयत्न सफल हो, मित्र-वर्ग से तनाव व अशांति, मानसिक विभ्रम अवश्य बनेगा।
वृश्चिक राशि :- कार्य-कुशलता से संतोष, सामाजिक कार्यों में प्रभुत्व वृद्धि होगी, समय का ध्यान रखें।
धनु राशि :- चिन्ता निवृत्ति, अर्थ लाभ, योजनायें फलीभूत होंंगी, समय का ध्यान अवश्य रखें।
मकर राशि :- मान-प्रतिष्ठा बाल-बाल बचे, कार्य बनेंगे, घटना का शिकार होने से बचें।
कुंभ राशि :- किसी आरोप से बचिये, कार्यगति अनुकूल होगी, सावधानी से कार्य करें।
मीन राशि :- स्थिति नियंत्रण में रखें, स्त्री-वर्ग से तनाव, क्लेश व अशांति की स्थिति बनेगी।
एकादशी व्रत पर तुलसी की विशेष महिमा: इन गलतियों से रहें दूर, वरना रुष्ठ हो सकती हैं मां लक्ष्मी
14 Nov, 2025 08:12 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हर माह में कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत रखा जाता है. हर माह में दो एकादशी व्रत पड़ते हैं. मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी उत्पन्ना एकादशी कहलाती है, क्योंकि मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी पर ही जगपालक भगवान विष्णु के शरीर से एकादशी देवी उत्पन्न हुईं थीं. इसके बाद उन्होंने मुर नाम के दैत्य का सिर काट दिया था.
उत्पन्ना एकदशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के पूजन और व्रत का विधान है. इस दिन एकादशी देवी की भी पूजा होती है. इस दिन व्रत और पूजन से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. जीवन की सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं. इस दिन तुलसी से जुड़े नियमों का पालन का पालन भी अवश्य करना चाहिए. मान्यता है कि इस दिन अगर तुलसी से जुड़े इन नियमों का पालन नहीं किया जाता तो मां लक्ष्मी रूठ जाती हैं.
उत्पन्ना एकादशी कब है?
इस साल मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 15 नवंबर को सुबह 12 बजकर 49 मिनट पर शुरू हो रही है. इस तिथि का समापन अगले दिन 16 नवंबर को 02 बजकर 37 मिनट पर होगा. चूंकि 15 नवंबर को सूर्योदय के समय एकादशी तिथि की शुरुआत हो रही है, इसलिए उत्पन्ना एकादशी का व्रत इस बार 15 नवंबर यानी कल रखा जाएगा.
उत्पन्ना एकदशी पर तुलसी से जुड़ी इन बातों का रखें ध्यान
तुलसी को जल न दें
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ये कहा जाता है कि तुलसी माता एकादशी के दिन भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. धर्म शास्त्रों में इस दिन तुलसी माता को जल देना वर्जित है, क्योंकि इस दिन जल देने से तुलसी माता का व्रत खंडित होता है.
तुलसी के पत्ते न तोड़ें और सफाई का ध्यान दें
एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ने के लिए भी मना किया जाता है. साथ ही एकादशी के दिन तुलसी के पौधे के पास साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखाना चाहिए. मान्यता है कि तुलसी के पास गंदगी होने से घर में मां लक्ष्मी वास नहीं करतीं.
तुलसी को गंदे या जूठे हाथ से न छुएं
एकादशी के दिन भूलकर भी तुलसी को गंदे या जूठे हाथों से नहीं छूना चाहिए. माना जाता है कि गंदे या फिर जूठे हाथों से अगर तुलसी को छुआ जाता है, तो इससे अशुभ फलों की प्राप्ति होती है.
परेशानियों से घबराने की बजाए उनका सामना करना सीखें
14 Nov, 2025 08:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
समाज में कोई दुखी की भूमिका में है तो कोई सुखी की। कोई राजा की भूमिका में है और कोई प्रजा की भूमिका में काम कर रहा है। सभी अभिनय की भूमिकाएं हैं। कुछ भी स्थायी नहीं है। शाश्वत सत्य नहीं है। इसलिए मनुष्य याद रखे कि ईश्वर ने उसे जिस भूमिका में उतारा है, वह उसी भूमिका को यथोचित रूप में अभिव्यक्त करता जा रहा है, इससे अधिक कुछ नहीं। अगर कोई विपत्ति आती है, किसी भयावह परिस्थिति से ही गुजरना पड़े तो भी उसके मन में समानता का भाव नष्ट नहीं होना चाहिए। यदि वह समझेगा कि यह परमपुरुष के नाटक का खेल है तो इससे घबराएगा नहीं। मनुष्य घबराएगा नहीं तो वह अकेला पड़ने में दिक्कत महसूस नहीं करेगा। हमें नाटक का जो किरदार मिला है, वही सही ढंग से करते जाएंगे। इस मनोभाव को लेकर अगर मनुष्य चलता है तो वह मनुष्य सर्वजयी होगा। वह जीवन के किसी भी क्षेत्र में ठोकर नहीं खाएगा, वह आगे ही बढ़ता जाएगा।
मनुष्य कहां आगे बढ़ेगा? जहां से आया है, उसी ओर। आगे बढ़ने की यह क्रिया संघर्ष के माध्यम से ही होती है। जो मनुष्य संघर्ष विमुख है उसका स्थान समाज में नहीं है। कारण जीवन का धर्म, अस्तित्व का धर्म वह खो बैठा है। समाज में रहना अब उसके लिए उचित नहीं है। उसके विरुद्ध संग्राम करते हुए तुम लड़ते चल रहे हो, आगे बढ़ रहे हो। लेकिन यही काफी नहीं है। मानस भूमि में आगे बढ़ना चाहते हो। कितनी दुर्बलताएं, कितनी संकीर्णताएं, कितना मोह तुम्हें चारों ओर से घेरे हुए हैं। नागपाश की तरह वे तुमको मार देना चाहते हैं। तुम्हें इसके विरुद्ध संग्राम करते हुए आगे बढ़ना होगा। इस संग्राम से बचने की कोशिश व्यर्थ है।
असंख्य भाव-जड़ताएं तुम्हें जकड़ना चाहती हैं। पूर्वजों ने गलती की है। कभी-कभी हम उसी को जकड़कर पकड़ना चाहते हैं। इन बाधाओं के सम्मुख हार मान लेने से कार्य संभव नहीं हो जाएगा। उसे तोड़कर अपना पथ बनाते चलो, यही जीवन का धर्म है। इस प्रकार मनुष्य अग्रसर हो रहा है और होता रहेगा।
तुम्हें मानव शरीर मिला है। सर्वतोभाव से मानव की भूमिका निभाते चलो। यही तुम्हारा धर्म है। इस प्रकार मानसभूमि के विरुद्ध संग्राम करते हुए ही मनुष्य अग्रसर होता है। आगे चलते-चलते वह एक दिन मानसातीत लोक में प्रतिष्ठित हो पाएगा। वह मानसातीत सत्ता ही वास्तव में परमपुरुष है।
अब परमपुरुष की ओर अग्रसर होने के लिए उसे वास्तव जगत में इस प्रकार के समाज का निर्माण करना होगा जहां वह किसी प्रकार की बाधा या विपत्ति के सम्मुख हार न माने। जो मानव-मानव में कोई भेद नहीं मानेगा अथवा अब तक समाज में जिन भेदों को स्थापित किया गया है, उन्हें दूर फेंक देगा। मानसिक भूमि पर मन को इस प्रकार तैयार करना पड़ेगा कि भाव जड़ता को कोई स्थान न मिले। हम भाव जड़ता को सहन नहीं करेंगे। हमारे पूर्व पुरुषों ने यदि कोई भूल की है तो उसे ही अंधरूप से स्वीकार करूंगा, मैं ऐसा मूढ़ नहीं हूं। पूर्व पुरुष भूल कर सकते हैं, वर्तमान पुरुष भी भूल कर सकते हैं, उत्तर पुरुष भी भूल कर सकते हैं। पूर्व पुरुष हमारे लिए श्रद्धेय हैं, पर भूलों की पुनरावृत्ति हो ऐसी बात नहीं होनी चाहिए। धर्म सबके लिए ही है और यह आनंद का पथ है।
तुलसी के पास इसलिए जलाते हैं दीपक
14 Nov, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तुलसी के पास दीया जलाना बेहद शुभ माना जाता है।रोज तुलसी के सामने दीपक जलाने से जीवन में शांति और समृद्धि आती है। यह घर के वातावरण को शुद्ध करता है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाता है। साथ ही देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा से सुख, सौभाग्य और सफलता की प्राप्ति होती है।
भारतीय संस्कृति में तुलसी का पौधा शुद्धता, आस्था और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। शाम के समय तुलसी के पास दीया जलाना, घर में सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने का एक सरल और प्रभावी उपाय है। तुलसी के पौधे में देवी लक्ष्मी का निवास होता है और तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इसलिए इसके फायदे और भी बढ़ जाते हैं।
तुलसी का पौधा घर में सकारात्मक ऊर्जा लाता है। जब आप इसके पास रोज दीया जलाते हैं, तो यह घर के माहौल को शुद्ध और पवित्र बनाता है। धीरे-धीरे घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है.।कहा जाता है कि तुलसी के पास दीया जलाने से घर में शांति बढ़ती है। यह एक सरल उपाय है जो पूरे घर में खुशियां और सकारात्मकता फैलाता है।
देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु का आशीर्वाद
शास्त्रों में कहा गया है कि देवी लक्ष्मी तुलसी में निवास करती हैं और भगवान विष्णु को तुलसी बहुत प्रिय है. जब हम तुलसी की पूजा करते हैं और उसके पास दीया जलाते हैं, तो लक्ष्मी जी और विष्णु जी दोनों का आशीर्वाद मिलता है। उनकी कृपा से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और हमारे कामों में सफलता और स्थिरता आती है. इससे घर में धन, शांति और सुख-समृद्धि बनी रहती है.
मन की शांति और तनाव से राहत
हर शाम तुलसी के पास दीया जलाने से मन को शांति मिलती है। अगर आप ज्यादा सोचते हैं या परेशान रहते हैं, तो यह उपाय आपको आराम और सुकून देता है।
हस्तरेखा शास्त्र है एक विज्ञान
14 Nov, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हर व्यक्ति के मन में अपना भविष्य जानने की इच्छा रहती है। हस्तरेखा शास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जो व्यक्ति के भूत, भविष्य व वर्तमान की जानकारी देता है। हर व्यक्ति के हाथ की हथेली की बनावट व आकार अलग-अलग होता है। इसके साथ ही हाथ की रेखाएं भी अलग-अलग होती हैं। हस्तरेखा शास्त्र के जानकारों के अनुसार, व्यक्ति की हाथ की रेखाएं और हथेली के आकार को देखकर उसका भविष्य व स्वभाव का पता लगाया जा सकता है।
कठोर हथेली के जातक- हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की हथेली कठोर होती है, उन्हें जीवन में ज्यादा मेहनत व संघर्षों का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को दिन-रात एक करने के बाद ही भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। लेकिन ये लोग हमेशा अपनी ईमानदारी का परिचय देते हैं।
छोटी हथेली के जातक- हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की हथेली छोटी होती है, ऐसे लोग दिल के साफ होते हैं। ऐसे लोग क्रिएटिव कार्यों में रूचि रखते हैं। ये चीजों को जानने की इच्छा रखते हैं। कहते हैं कि इन लोगों का जीवन सुखमय बीतता है।
बड़ी हथेली के जातक- हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की हथेली का आकार बड़ा होता है, वे अपनी जिम्मेदारियों को अच्छी तरह से निभाते हैं। ये धर्म-कर्म के कार्यों में रुचि रखते है। इन्हें जीवन में मनचाही सफलता प्राप्त होती है।
कोमल हथेली के लोग- हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की हथेलियां कोमल होती हैं, वे भाग्यशाली माने गए हैं। इन लोगों को जीवन में अपार सफलता प्राप्त होती है। कहते हैं कि इन लोगों को धन संबंधी परेशानियों का कम सामना करना पड़ता है।
व्रत रखने से मिलता है फल
14 Nov, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में सप्ताह के सारे दिन किसी न किसी भगवान को समर्पित हैं। जिस तरह से सोमवार का दिन भगवान शिवजी का और मंगलवार का दिन हनुमान जी का है। उसी तरह से बुधवार को भगवान गणेश की पूजा की जाती है और उनके लिए व्रत रखा जाता है। ज्योतिषियों के मुताबिक व्रत रखने से भगवान खुश होते हैं। आज हम आपके लिए लाए हैं बुधवार के व्रत की कथा। व्रत रखने वाले लोगों को इस दिन यह कथा सुननी होती है।
प्राचीन काल की बात है एक व्यक्ति अपनी पत्नी को लेने के लिए ससुराल गया। कुछ दिन अपने ससुराल में रुकने के बाद व्यक्ति ने अपने सास-ससुर से अपनी पत्नी को विदा करने को कहा लेकिन सास-ससुर ने कहा कि आज बुधवार है और इस दिन हम गमन नहीं करते हैं। लेकिन व्यक्ति ने उनकी बात को मानने से साफ इनकार कर दिया। आखिरकार लड़की के माता-पिता को अपने दामाद की बात माननी पड़ी और अपनी बेटी को साथ भेज दिया। रास्ते में जंगल था, जहां उसकी पत्नी को प्यास लग गई। पति ने अपना रथ रोका और जंगल से पानी लाने के लिए चला गया। थोड़ी देर बाद जब वो वापस अपनी पत्नी के पास लौटा तो देखकर हैरान हो गया कि बिल्कुल उसी के जैसा व्यक्ति उसकी पत्नी के पास रथ में बैठा था।
ये देखकर उसे गुस्सा आ गया और कहा कि कौन है तू और मेरी पत्नी के पास क्यों बैठा है। लेकिन दूसरे व्यक्ति को जवाब सुनकर वो हैरान रह गया। व्यक्ति ने कहा कि मैं अपनी पत्नी के पास बैठा हूं। मैं इसे अभी अपने ससुराल से लेकर आया हूं। अब दोनों व्यक्ति झगड़ा करने लगे। इस झगड़े को देखकर राज्य के सिपाहियों ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया।
यह सब देखकर व्यक्ति बहुत निराश हुआ और कहा कि हे भगवान, ये कैसा इंसाफ है, जो सच्चा है वो झूठा बन गया है और जो झूठा है वो सच्चा बन गया है। ये कहते है कि फिर इसके बाद आकाशवाणी हुई कि ‘हे मूर्ख आज बुधवार है और इस दिन गमन नहीं करते हैं। तूने किसी की बात नहीं मानी और इस दिन पत्नी को ले आया।’ ये बात सुनकर उसे समझ में आया की उसने गलती कर दी। इसके बाद उसने बुधदेव से प्रार्थना की कि उसे क्षमा कर दे।
इसके बाद दोनों पति-पत्नि नियमानुसार भगवान बुध की पूजा करने लग गए। ज्योतिषियों के मुताबिक जो व्यक्ति इस कथा को याद रखता उसे बुधवार को किसी यात्रा का दोष नहीं लगता है और उसे सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। बुधवार के दिन अगर कोई व्यक्ति किसी नए काम की शुरुआत करता है तो उसे भी शुभ माना जाता है।
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