धर्म एवं ज्योतिष
ग्रहों का जीवन के साथ ही व्यवहार पर भी पड़ता है प्रभाव
14 Nov, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ग्रहों का व्यक्ति के जीवन के साथ-साथ व्यवहार पर भी सीधा प्रभाव पड़ता है। हमारा व्यवहार हमारे ग्रहों की स्थितियों से संबंध रखता है या हमारे व्यवहार से हमारे ग्रहों की स्थितियां प्रभावित होती हैं। अच्छा या बुरा व्यवहार सीधा हमारे ग्रहों को प्रभावित करता है। ग्रहों के कारण हमारे भाग्य पर भी इसका असर पड़ता है। कभी-कभी हमारे व्यवहार से हमारी किस्मत पूरी बदल सकती है।
वाणी-
वाणी का संबंध हमारे पारिवारिक जीवन और आर्थिक समृद्धि से होता है।
ख़राब वाणी से हमें जीवन में आर्थिक नुक्सान उठाना पड़ता है।
कभी-कभी आकस्मिक दुर्घटनाएं घट जाती हैं।
कभी-कभी कम उम्र में ही बड़ी बीमारी हो जाती है।
वाणी को अच्छा रखने के लिए सूर्य को जल देना लाभकारी होता है।
गायत्री मंत्र के जाप से भी शीघ्र फायदा होता है।
आचरण-कर्म
हमारे आचरण और कर्मों का संबंध हमारे रोजगार से है।
अगर कर्म और आचरण शुद्ध न हों तो रोजगार में समस्या होती है।
व्यक्ति जीवन भर भटकता रहता है।
साथ ही कभी भी स्थिर नहीं हो पाता।
आचरण जैसे-जैसे सुधरने लगता है, वैसे-वैसे रोजगार की समस्या दूर होती जाती है।
आचरण की शुद्धि के लिए प्रातः और सायंकाल ध्यान करें।
इसमें भी शिव जी की उपासना से अद्भुत लाभ होता है।
जिम्मेदारियों की अवहेलना
जिम्मेदारियों से हमारे जीवन की बाधाओं का संबंध होता है।
जो लोग अपनी जिम्मेदारियां ठीक से नहीं उठाते हैं उन्हें जीवन में बड़े संकटों, जैसे मुक़दमे और कर्ज का सामना करना पड़ता है।
व्यक्ति फिर अपनी समस्याओं में ही उलझ कर रह जाता है।
अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में कोताही न करें।
एकादशी का व्रत रखने से यह भाव बेहतर होता है।
साथ ही पौधों में जल देने से भी लाभ होता है।
सहायता न करना-
अगर सक्षम होने के बावजूद आप किसी की सहायता नहीं करते हैं तो आपको जीवन में मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
कभी न कभी आप जीवन में अकेलेपन के शिकार हो सकते हैं।
जितना लोगों की सहायता करेंगे, उतना ही आपको ईश्वर की कृपा का अनुभव होगा।
आप कभी भी मन से कमजोर नहीं होंगे।
दिन भर में कुछ समय ईमानदारी से ईश्वर के लिए जरूर निकालें।
इससे करुणा भाव प्रबल होगा, भाग्य चमक उठेगा।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (14 नवंबर 2025)
14 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- व्यर्थ परिश्रम, विभ्रम, धन का व्यय, कुछ आरोप, वातावरण से मन में बेचैनी होगी।
वृष राशि :- थकावट व स्थिरता का वातावरण मन संदिग्ध रखे, धन प्राप्त होकर जाता रहेगा।
मिथुन राशि :- धन का लाभ, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, कार्यगति में सुधार होगा।
कर्क राशि :- मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि, कहीं तनाव होने से हानि भी संभव है, धैर्य से काम लें।
सिंह राशि :- आनंदवर्धक योजना बनेगी, परिश्रम से सफलता, कार्य-योजना अनुकूल होगी।
कन्या राशि :- दूसरों के कार्यों में हस्ताक्षेप से तनाव होगा, मनोबल उत्साहवर्धक होगा।
तुला राशि :- मानसिक बेचैनी, शारीरिक स्थिरता तथा कार्य-व्यवसाय में बाधा होगी।
वृश्चिक राशि :- आशानुकूल सफलता, कार्यगति में सुधार, योजना फलीभूत होगी।
धनु राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति, मानसिक बेचैनी, असमर्थता का वातारण होगा।
मकर राशि :- आकस्मिक स्त्री-वर्ग का समर्थन मिले, साधन सम्पन्नता के योग बन जायेंगे।
कुंभ राशि :- अधिकारी वर्ग का समर्थन, चिन्ता व व्यग्रता असमंजस में रखेगी, धैर्य रखें।
मीन राशि :- योजनायें फलीभूत हों, परिश्रम से सफलता अवश्य ही मिलेगी, ध्यान रखें।
विवाह पंचमी 2025 : कब है विवाह पंचमी 24 या 25 नवंबर? जानिए पूजा विधि और शुभ मुहूर्त
13 Nov, 2025 04:09 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Vivah Panchami 2025: हर साल लोग विवाह के शुभ मुहूर्त के लिए विवाह पंचमी का बेसब्री से इंतजार करते हैं. हिंदू धर्म में यह तिथि बेहद खास मानी जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन भगवान श्रीराम ने माता सीता से विवाह किया था. तभी से इस तिथि को श्रीराम विवाहोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा है. कुछ लोग इसे विवाह पंचमी के नाम से भी जानते हैं. यह तिथि भगवान श्रीराम और मां सीता के दिव्य प्रेम और अटूट बंधन की प्रतीक मानी जाती है. मान्यता है कि इस दिन विवाह करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है. कई मंदिरों और घरों में इस दिन भगवान श्रीराम और माता सीता का प्रतीकात्मक विवाह भी संपन्न कराया जाता है.
कब है विवाह पंचमी की सही तिथि
हिंदू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष माह की पंचमी तिथि का प्रारंभ 24 नवंबर को रात 9 बजकर 22 मिनट से होगा और इसका समापन 25 नवंबर की रात 10 बजकर 56 मिनट पर होगा. हिंदू धर्म में उदयातिथि को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है. इसी कारण विवाह पंचमी का पावन पर्व 25 नवंबर को बड़े ही धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा.
ऐसे करें श्रीराम और मां सीता का विवाह
विवाह पंचमी के दिन प्रातः स्नान करने के बाद भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह का संकल्प लें. स्नान के उपरांत विवाह का कार्यक्रम प्रारंभ करें. भगवान श्रीराम और मां सीता की मूर्ति या छायाचित्र स्थापित करें. श्रीराम को पीले वस्त्र और मां सीता को लाल वस्त्र अर्पित करें. इसके बाद बालकांड का पाठ करें या “ॐ जानकीवल्लभाय नमः” मंत्र का जाप करते रहें. जाप पूर्ण होने के बाद माता सीता और प्रभु श्रीराम का गठबंधन करें. अंत में आरती करें और विवाह के दौरान जो वस्त्र गांठ में बांधे गए हों, उन्हें सुरक्षित अपने पास रख लें.
विवाह पंचमी के दिन करें ये शुभ कार्य
यदि किसी के विवाह में बार-बार बाधा आ रही हो तो विवाह पंचमी के दिन श्रद्धा और भक्ति से भगवान श्रीराम और मां सीता की पूजा अवश्य करें. ऐसा करने से विवाह में आ रही अड़चनें दूर होती हैं और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति आती है. इस दिन बालकांड का पाठ और मंत्र जाप विशेष रूप से शुभ माना गया है. श्रद्धा भाव से पूजा और पाठ करने से न केवल मनचाहा वरदान प्राप्त होता है बल्कि पारिवारिक जीवन भी सुखमय बनता है. विवाह पंचमी का यह पर्व भगवान श्रीराम और मां सीता के आदर्श दांपत्य प्रेम का उत्सव है, जो हर घर में खुशहाली और सौहार्द का संदेश देता है.
अगर बुध चला गलत दिशा में तो करियर हो जाएगा बर्बाद! जानिए कैसे बचें इस विनाशकारी असर से
13 Nov, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जब कोई इंसान अपनी कुंडली में बुध ग्रह को दसवें भाव में देखता है, तो अक्सर यह सवाल मन में आता है- “क्या यह मुझे करियर में ऊंचाई देगा या दिमागी उलझनें बढ़ाएगा?” दरअसल, बुध ऐसा ग्रह है जो बुद्धि, तर्क, बात करने की कला, व्यापार, सोचने की क्षमता और प्लानिंग को दिखाता है. वहीं दसवां भाव कर्म, नौकरी, करियर, समाज में इज्जत और उपलब्धियों से जुड़ा होता है. जब बुध यहां आता है, तो व्यक्ति की काम करने की शैली, उसकी सोच, और दूसरों के साथ तालमेल बनाने का तरीका बिल्कुल अलग हो जाता है, अगर बुध मजबूत हो तो व्यक्ति का दिमाग तेज़ चलता है, फैसले सही समय पर लेता है और अपने दिमाग से बड़ा नाम बना सकता है, लेकिन अगर यह कमजोर या अशुभ ग्रहों से पीड़ित हो, तो वही बुध व्यक्ति को हद से ज़्यादा सोचने वाला, संदेह करने वाला या बोलने में गलती करने वाला बना सकता है. दसवां भाव कर्म का घर है, और बुध वहां बैठकर इंसान को कर्म के प्रति समझदार तो बनाता है, पर कभी-कभी अधिक चतुराई भी नुकसान दे सकती है. तो आइए जानते हैं बुध के दसवें भाव में होने के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव, और ऐसे कौन से उपाय हैं जिनसे इसका गलत असर दूर किया जा सकता है.
बुध के दसवें भाव में सकारात्मक प्रभाव
जब बुध मजबूत होता है और शुभ ग्रहों के साथ बैठता है, तो यह व्यक्ति के करियर को ऊंचाई तक ले जा सकता है. ऐसे लोग दिमाग से बहुत तेज़ होते हैं और बातों से किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं, ये लोग खासतौर पर उन क्षेत्रों में सफलता पाते हैं जहां दिमाग और कम्युनिकेशन दोनों की ज़रूरत होती है जैसे मीडिया, पब्लिक रिलेशन, मार्केटिंग, टीचिंग, एडवाइजिंग, फाइनेंस, या बिजनेस कंसल्टेंसी.
बुध के इस स्थान पर होने से व्यक्ति की सोच साफ़ रहती है, वह प्लान बनाकर काम करता है और दूसरों को समझाने की कला उसमें होती है, ये लोग छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखते हैं, इसलिए टीम में इनकी वैल्यू ज़्यादा होती है.
कई बार ऐसे लोग बहुत कम उम्र में ही बड़ा नाम कमा लेते हैं क्योंकि इन्हें लोगों की मनोवृत्ति समझने की क्षमता होती है.
अगर कुंडली में सूर्य या बृहस्पति का साथ मिल जाए, तो यह व्यक्ति को सरकारी या उच्च पद दिला सकता है.
बुध यहां व्यक्ति को कर्म के प्रति जागरूक, समाज में प्रतिष्ठित और व्यवहारिक बनाता है. ऐसे लोग अपनी समझदारी से मुसीबत से भी निकल जाते हैं.
बुध के दसवें भाव में नकारात्मक प्रभाव
अगर बुध अशुभ ग्रहों के प्रभाव में आ जाए या नीच का हो जाए, तो इसका असर व्यक्ति की सोच और व्यवहार दोनों पर पड़ता है. ऐसे लोग ज़रूरत से ज़्यादा सोचते हैं, जल्दी-जल्दी राय बदल लेते हैं और अपने फैसलों में स्थिरता नहीं रख पाते.
कई बार ये अपनी बातों से खुद ही उलझ जाते हैं, जिससे लोगों में उनकी बात का भरोसा कम हो जाता है.
नकारात्मक बुध व्यक्ति को बहुत चालाक या लालची भी बना सकता है, जिससे वो अपने फायदे के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचा सकता है.
कई बार ऐसा व्यक्ति अपने काम या करियर में बार-बार बदलाव करता है, क्योंकि उसका मन एक जगह टिकता नहीं.
बुध के दोष दूर करने के उपाय
अगर दसवें भाव में बुध कमजोर हो और शनि या राहु की दृष्टि हो, तो व्यक्ति अपनी बुद्धि का गलत इस्तेमाल करने लगता है जैसे दूसरों को बेवकूफ बनाना या गलत रास्तों से पैसा कमाना.
इस स्थिति में दिमाग तो तेज़ होता है, लेकिन दिशा गलत हो जाती है.
ऐसे लोगों को अपने बोल और फैसलों पर काबू रखना ज़रूरी होता है, वरना अच्छी सोच भी गलत रास्ते पर चली जाती है.
बुध के दोषों से बचने के उपाय
1. हर बुधवार को हरी चीज़ें दान करें- जैसे हरी मूंग, हरी सब्जियां या पन्ना रत्न पहनने से बुध को मज़बूती मिलती है.
2. गाय को हरा चारा खिलाएं- यह उपाय बुध के क्रोध को शांत करता है.
3. “ॐ बुं बुधाय नमः” मंत्र का जाप करें- रोज़ कम से कम 108 बार जाप करने से बुध के बुरे असर कम होते हैं.
4. बोलने से पहले सोचें- बुध की खराब स्थिति का असर ज़्यादातर शब्दों और निर्णयों पर पड़ता है, इसलिए सोच-समझकर बोलना शुभ होता है.
5. हरे कपड़े पहनें या हरे रंग की चीज़ें अपने पास रखें- यह बुध को सकारात्मक ऊर्जा देता है.
6. गणेश जी की पूजा करें, क्योंकि वे बुध के स्वामी माने जाते हैं. बुधवार को गणेश जी को दूर्वा और मोदक अर्पित करने से बुध मजबूत होता है.
आपके हाथ में है यह निशान, तो रातों रात रोडपति से बन जाएंगे करोड़पति, यह शर्त टूटी तो हो जाएगा एक्सीडेंट
13 Nov, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हस्तरेखा शास्त्र में हाथ पर बने निशान आपकी उन्नति, सफलता और असफलता को दिखाते हैं. हथेली में कुछ शुभ और अशुभ निशान होते हैं. यदि शुभ निशान हैं तो आपकी किस्मत चमकाने में मददगार होंगे, वहीं अशुभ निशान आपकी बदकिस्मती के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं. हस्तरेखा शास्त्र में स्टार का चिह्न शुभ होता है. यदि आपके हाथ में स्टार का चिह्न है तो आप रातोंरात रोडपति से करोड़पति बन सकते हैं. शर्त यह है कि स्टार चिह्न शुभ स्थान पर होना चाहिए. हस्तरेखा शास्त्र के विशेषज्ञ दर्शन पाठक बताते हैं कि स्टार का शुभ चिह्न आपकी हथेली के किसी पर्वत पर है, यह महत्वपूर्ण है. जिस पर्वत पर स्टार होगा, उसका मतलब उसके अनुसार होगा.
बुध पर्वत पर स्टार का निशान
हस्तरेखा विशेषज्ञ दर्शन पाठक का कहना है कि यदि स्टार का निशान बुध पर्वत पर है तो यह उस व्यक्ति को रिसर्च की दुनिया में लेकर जाता है. बुध पर्वत हाथ में सबसे छोटी अंगुली के ठीक नीचे होता है. बुध पर्वत का स्टार व्यक्ति को उसके फील्ड में शोध कराता है. इससे आपके लिए आगे बढ़ने के अवसर बनते हैं.
सूर्य पर्वत का स्टार दिलाता है नाम और शोहरत
यदि किसी व्यक्ति के हाथ में सूर्य पर्वत पर स्टार का निशान हो तो उस व्यक्ति का नाम और शोहरत होता है. वो जो कार्य करता है, उससे उसके यश और कीर्ति में बढ़ोत्तरी होती है. सूर्य पर्वत अनामिका अंगुली यानि रिंग फिंगर के ठीक नीचे स्थित होता है. यह किसी में उठा हुआ, धंसा या चपटा हो सकता है. इसके भी अलग मतलब होते हैं.
शनि पर्वत का स्टार अचानक बनाता है करोड़पति
इसी तरह से किसी व्यक्ति के हाथ में शनि पर्वत के नीचे स्टार का निशान होता है, तो वह आदमी रातोंरात रोडपति से करोड़पति हो सकता है. शनि का स्टार व्यक्ति को सीधे रंक से राजा बना देता है. उस व्यक्ति का अचानक से भाग्योदय होता है. उसके पास धन, दौलत, शोहरत की कोई कमी नहीं रहती है.गलत काम से हो सकती है दुर्घटना
दर्शन पाठक बताते हैं कि शनि पर्वत का स्टार रातोंरात राजा बना तो देता है लेकिन शर्त यह है कि उस व्यक्ति को पैसों का गलत जगह पर उपयोग नहीं करना चाहिए. यदि आप उस पैसे का अच्छे कार्यों में उपयोग करेंगे तो वह आपके लिए शुभ होगा. यदि उस पैसे का गलत उपयोग करेंगे तो 2 साल के अंदर उसका एक्सीडेंट हो सकता है. शनि पर्वत मध्यमा अंगुली यानि बीच वाली अंगुली के ठीक नीचे होता है.
1000 साल पुराना धेनुपुरीश्वरर मंदिर, जहां गाय बने कपिल मुनि ने की थी शिव आराधना, बड़ी रोचक है श्राप मुक्ति की कथा
13 Nov, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म और हमारे शास्त्रों में हमेशा मनुष्य जीवन को मोक्ष से जोड़ा गया है. मोक्ष प्राप्ति के लिए दान, पूजा-पाठ और अनुष्ठान करने के लिए कहा जाता है. चेन्नई शहर के पास एक ऐसा मंदिर है, जहां दुखों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति के लिए भक्त दूर-दूर से आते हैं. ये मंदिर सिर्फ धर्म की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भारतीय पुरातत्व के लिए भी खास है.
1000 साल अधिक पुराना है धेनुपुरीश्वरर मंदिर
चेन्नई के मदंबक्कम और तांबरम के पास प्राचीन धेनुपुरीश्वरर मंदिर है, जिसे 1000 साल से भी ज्यादा पुराना बताया जाता है. यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, जिन्हें यहां मोक्ष के देवता के रूप में पूजा जाता है.
गर्भगृह में 6 इंच का शिवलिंग
मंदिर के गर्भगृह में 6 इंच के शिवलिंग विराजमान है, जिन्हें धेनुपुरीश्वर कहा गया है. मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव मां पार्वती के अन्य रूप ‘धेनुकंबल’ के साथ विराजमान हैं. भक्तों के बीच मान्यता है कि मंदिर में आकर धेनुपुरीश्वर और ‘धेनुकंबल’ की पूजा करने से सारे पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है.
मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा की मानें तो महान ऋषि कपिल मुनि भगवान शिव के भक्त थे. उन्होंने बाएं हाथ से भगवान की आराधना की थी, जिसकी वजह से उन्हें अगले जन्म में गाय का जन्म लेने का श्राप मिला. गाय होकर भी कपिल मुनि ने लगातार भगवान शिव की आराधना की और मिट्टी में दबे शिवलिंग की पूजा की.
एक बार ग्वाले ने गाय को दूध अर्पित करने के लिए दंडित किया और इतना मारा कि उसके खुर से निकलने वाला रक्त शिवलिंग पर अर्पित हो गया. गाय की पीड़ा को कम करने के लिए भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और कपिल मुनि को श्राप से मुक्त किया. इसी वजह से मंदिर का नाम धेनुपुरीश्वरर पड़ा. यहां धेनु से तात्पर्य गाय से है.
शिवलिंग पर आज भी गाय के खुर का निशान
मंदिर में विराजमान छोटे से शिवलिंग पर आज भी गाय के खुर का निशान है और शिवलिंग को स्वयं प्रभु माना जाता है. शिवलिंग के पास एक गड्डा भी है. मंदिर में भगवान विष्णु भी विराजमान हैं, लेकिन वे मुख्य गर्भगृह के पीछे की तरफ स्थापित हैं.
धेनुपुरीश्वरर मंदिर की सुंदर वास्तुकला
मंदिर की वास्तुकला देखने लायक है, क्योंकि मंदिर के हर खंभे पर चोल राजा सुंदर चोल के समय की नक्काशी है. मंदिर के प्रवेश द्वार पर ही भगवान गणेश और कार्तिकेय की प्रतिमा बनी है, जो हाथों में बाण लिए खड़े हैं. इसके अलावा मंदिर में एक नक्काशी ऐसी भी है जिसमें ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और भगवान गणेश की प्रतिमा एक साथ विराजमान है. इस नक्काशी को वहां के लोग शक्ति का प्रतीक मानते हैं.
इसके अलावा एक खंभे पर कपिल मुनि को अपनी बाईं भुजा में शिवलिंग और दाईं भुजा में माला धारण करते हुए दिखाया गया है. धेनुपुरीश्वरर मंदिर के पास ही 18 सिद्धों का मंदिर है और थोड़ी ही दूरी पर शुद्धानंद आश्रम भी देखने को मिल जाएगा.
भैरव बाबा की पूजा न करने वालों का क्यों जाग जाता है दुर्भाग्य?
13 Nov, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में भगवान शिव के अनेक रूपों में से एक सबसे शक्तिशाली और भयावह रूप माने जाते हैं काल भैरव बाबा. कहा जाता है कि जब अन्य देवता भी नकारात्मक ऊर्जा या बुरी आत्माओं के सामने असहाय हो जाते हैं, तब भैरव बाबा ही रक्षा करते हैं. हर साल मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को काल भैरव जयंती मनाई जाती है. यह दिन इस मायने में खास होता है क्योंकि इसी दिन बाबा काल भैरव का प्राकट्य हुआ था. भैरव बाबा को “समय का स्वामी” कहा गया है, यानी वे हर अच्छे-बुरे समय के मालिक हैं. जो व्यक्ति ईमानदारी और श्रद्धा से भैरव बाबा की पूजा करता है, उसके जीवन से डर, शत्रु, नकारात्मक ऊर्जा और आर्थिक रुकावटें दूर हो जाती हैं. इस साल काल भैरव जयंती 12 नवंबर 2025 (बुधवार) को यानी आज मनाई जा रही है. इस दिन भक्त विशेष रूप से काल भैरव मंदिर में जाकर दीप जलाते हैं, कुत्तों को भोजन कराते हैं और बाबा का नाम लेकर कष्टों से मुक्ति की कामना करते हैं. तो आइए जानते हैं कि भैरव बाबा की पूजा करने से क्या लाभ होते हैं और क्यों इस दिन का इतना महत्व माना गया है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
बाबा काल भैरव कौन हैं? (Kaal Bhairav Kon Hai)
बाबा काल भैरव को भगवान शिव का उग्र और रक्षक रूप माना जाता है. कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच इस बात पर विवाद हुआ कि सबसे बड़ा देवता कौन है. जब ब्रह्मा जी ने अहंकारवश अपनी श्रेष्ठता जताई, तब भगवान शिव ने अपने क्रोध से भैरव का रूप धारण किया और ब्रह्मा जी का पांचवां सिर काट दिया. इस कर्म के कारण भैरव बाबा को “ब्रह्महत्या” का पाप लगा, लेकिन जब वे काशी पहुंचे, तो वहां वह पाप समाप्त हो गया. तभी से बाबा काल भैरव को काशी का कोतवाल माना जाता है. भैरव बाबा को तंत्र साधना, सुरक्षा, और न्याय के देवता कहा गया है. उनका वाहन काला कुत्ता है, जिसे उनका सबसे प्रिय माना जाता है. इसलिए उनके भक्त इस दिन कुत्तों को भोजन कराकर पुण्य कमाते हैं.
भैरव बाबा की पूजा करने से क्या होता है? (Kaal Bhairav Puja Ke Fayde)
1. भय और अवसाद से मुक्ति
कहा जाता है कि जो व्यक्ति मानसिक तनाव, डर या अवसाद से गुजर रहा हो, वह अगर श्रद्धा से भैरव बाबा की पूजा करे, तो उसे अद्भुत शांति और आत्मविश्वास मिलता है.
2. नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा
भैरव बाबा की आराधना करने से जीवन में मौजूद नकारात्मक शक्तियां, काला जादू या किसी की बुरी नजर का असर खत्म हो जाता है.
3. शत्रुओं पर विजय
भैरव बाबा को न्याय का रक्षक कहा गया है. इसलिए जो लोग अपने जीवन में दुश्मनों या विरोधियों से परेशान हैं, उन्हें भैरव पूजा से सुरक्षा और जीत मिलती है.
4. ग्रह दोष और बाधाओं से राहत
भैरव बाबा की कृपा से शनि, राहु और केतु जैसे ग्रहों के बुरे प्रभाव शांत होते हैं. ज्योतिष में कहा गया है कि जिन लोगों की कुंडली में ग्रह बाधा हो, उन्हें काल भैरव की उपासना करनी चाहिए.
5. कानूनी मामलों में सफलता
अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगा रहा है, तो भैरव पूजा से उसे न्याय और राहत मिल सकती है.
6. बीमारियों से बचाव और स्वास्थ्य लाभ
भैरव बाबा की पूजा से शारीरिक और मानसिक बीमारियों से छुटकारा मिलता है. माना जाता है कि बाबा अपने भक्तों को दीर्घायु का वरदान देते हैं.
7. करियर और व्यापार में सफलता
जो व्यक्ति अपने करियर या बिजनेस में रुकावट महसूस करता है, उसे भैरव बाबा की पूजा से तरक्की और नई राहें मिलने लगती हैं.
8. आर्थिक तंगी से राहत
कई लोग आर्थिक संकट से परेशान रहते हैं. भैरव पूजा करने से धन का प्रवाह बढ़ता है और जीवन में स्थिरता आती है.
9. घर में सकारात्मक ऊर्जा
भैरव बाबा के नाम का दीपक जलाने और उनके मंत्र का जाप करने से घर और कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है.
10. समय पर नियंत्रण और निर्णय क्षमता में सुधार
क्योंकि भैरव “समय के स्वामी” हैं, इसलिए उनकी आराधना करने से व्यक्ति के जीवन में सही निर्णय लेने की क्षमता और अनुशासन बढ़ता है.
काल भैरव जयंती पर क्या करें
-इस दिन सुबह स्नान के बाद काले तिल, सरसों के तेल और लाल फूलों से भैरव बाबा की पूजा करें.
-मंदिर जाकर दीपक जलाएं और “ॐ कालभैरवाय नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें.
-काले कुत्ते को रोटी, दूध या मीठा खिलाएं.
-इस दिन झूठ, शराब और मांस से परहेज़ करें.
-रात के समय “भैरव चालीसा” या “काल भैरव स्तोत्र” का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (13 नवंबर 2025)
13 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- व्यवसायिक स्थिति में सुधार, किसी शुभ समाचार से हर्ष अवश्य ही होगा।
वृष राशि :- व्यवसायिक गति अनुकूल हो, कुटुम्ब के कार्यों में समय बीतेगा, परेशानी से बचें।
मिथुन राशि :- दैनिक समृद्धि के साधन जुटायें, अधिकारियों का समर्थन फलप्रद अवश्य होगा।
कर्क राशि :- सफलता के साधन जुटायें, अधिकारियों का समर्थन फलप्रद अवश्य ही होगा।
सिंह राशि :- आर्थिक समस्यायें सुलझें, भोग-ऐश्वर्य में समय बीतेगा, ध्यान दें।
कन्या राशि :- समय और सामर्थ विफल होगा, अर्थ-व्यवस्था में बाधा अवश्य ही होगी।
तुला राशि :- क्रोध से हानि की संभावना तथा व्यवसायिक क्षमता अनुकूल होगी।
वृश्चिक राशि :- लोगों से मेल-मिलाप, स्त्री-वर्ग से ऐश्वर्य की प्राप्ति, मित्रों से सुख होगा।
धनु राशि :- दैनिक कार्यगति में सुधार, इष्ट-मित्र सुखवर्धक होंगे तथा हर्ष होगा।
मकर राशि :- समृद्धि के साधन फलप्रद होंगे तथा धन का व्यर्थ व्यय होगा ध्यान रखें।
कुंभ राशि :- अनावश्यक विवाद से बचिये, समय पर अपना कार्य निपटा लें, ध्यान दें।
मीन राशि :- कुटुम्ब की समस्यायें सुलझेंगी, दैनिक कार्य में अनुकूलता अवश्य ही बनेगी।
गाड़ी पर भगवान के मंत्र लिखना सही या गलत? प्रेमानंद महाराज का चौंकाने वाला जवाब, जानिए पूरी बात
12 Nov, 2025 03:44 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Premananda Maharaj: आजकल के समय में एक आम चलन देखने को मिल रहा है कि लोग अपनी गाड़ियों पर भगवान के नाम या पवित्र मंत्र लिखवाने लगे हैं, जैसे – ‘ऊं नमः शिवाय’, ‘जय श्रीराम’, ‘श्रीकृष्ण’ या ‘जय माता दी’. बहुतों को यह भक्ति का प्रतीक लगता है, लेकिन वास्तव में ऐसा करना सही नहीं माना गया है. इसी विषय पर वृंदावन मथुरा के लोकप्रिय संत प्रेमानंद महाराज से एक भक्त ने सवाल पूछा कि क्या वाहन पर मंत्र लिखवाना उचित है? इस पर महाराज जी ने बड़ा सुंदर सा संदेश लोगों को दिया है.
गाड़ियों पर नहीं लिखवाना चाहिए मंत्र
गाड़ियों पर मंत्र लिखवाने पर प्रेमानंद महाराज ने स्पष्ट कहा कि गाड़ियों या घरों के बाहर मंत्र लिखवाना नरक का मार्ग खोलने जैसा है, क्योंकि यह पवित्र शब्दों का अपमान है. उन्होंने कहा कि मंत्र बाहरी प्रदर्शन की चीज नहीं, बल्कि हृदय में बसाने योग्य होते हैं. शिवपुराण में ‘ऊं नमः शिवाय’ जैसे पंचाक्षरी मंत्र का उल्लेख बहुत गंभीरता से किया गया है. गुरु जब अपने शिष्य को यह मंत्र देता है, तभी उसका जप प्रारंभ होता है, और इसे सार्वजनिक रूप से बोलना या दिखाना उचित नहीं है. आजकल लोग फिल्मों और मंचों पर इन पवित्र मंत्रों का उच्चारण कर रहे हैं, जो कि सही परंपरा नहीं है.
महाराज ने आगे कहा कि जब तक मंत्र भीतर से जपा न जाए, मन में निरंतर न गूंजे, तब तक वह सिद्ध नहीं होता. जो साधना दिखावे के लिए की जाती है, वह केवल दिखावा है, तप नहीं. मंत्र जपने के लिए पहले गुरु से दीक्षा लेना आवश्यक है और फिर शुद्ध स्थान, पवित्र आसन और वस्त्र धारण कर ही जप करना चाहिए. क्योंकि, मंत्र कीर्तन नहीं होता, बल्कि जप होता है, जबकि भगवान के नाम का कीर्तन खुलकर किया जा सकता है.
प्रेमानंद महाराज ने बताए मंत्रों के प्रकार
महाराज जी ने बताया कि उपांशु और मानसिक दो प्रकार के मंत्र होते हैं. वहीं नाम तीन तरीकों से जपा जाता है. ‘वाचिक, उपांशु और मानसिक’ जब तक इन शास्त्रीय विधियों का पालन नहीं होगा, तब तक साधना से वास्तविक कल्याण नहीं हो सकता. बिना नियमों के किया गया आचरण केवल विकार बढ़ाता है. महाराज ने कहा कि जब मन और हृदय पवित्र होते हैं, तभी ईश्वर के साक्षात्कार की योग्यता प्राप्त होती है.
दक्षिण भारत से ही क्यों होते हैं बद्रीनाथ के मुख्य पुजारी? शंकराचार्य से सीधा रिश्ता, इनका काम सिर्फ घंटा बजाना नहीं
12 Nov, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
देवभूमि उत्तराखंड में ऐसे तो कई प्राचीन मंदिर हैं, लेकिन यहां स्थित चार धाम के दर्शन के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु बड़ी संख्या में हर साल पहुंचते हैं. अटूट आस्था के प्रतीक बाबा केदार के दर्शन हो या बाबा बद्री से जुड़ा विश्वास हो, उनके दर्शन मात्र से जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं. लोग भीड़भाड़ में भी इनके दर्शन के लिए कतारों में कठिन सफर को तय करके इन धामों में पहुंचते हैं. केदारनाथ धाम के कपाट बंद हो चुके हैं और इस साल 25 नवंबर को बद्रीनाथ धाम के कपाट को बंद हो जाएंगे. इन दिनों ठिठुरन भरे मौसम में भी इस पवित्र धाम के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे हैं. जितना यह धाम पवित्र है उतने ही विशेष इस धाम के मुख्य पुजारी भी हैं. मुख्य पुजारी को रावल कहा जाता है. यह उत्तराखंड नहीं बल्कि दक्षिण भारत से होते हैं. नम्बूदरी पाद परिवार से ही रावल बनाएं जाते हैं. यह शंकराचार्य के वंशज माने जाते हैं जिन्होंने राज्य के चार धामों और क़ई मंदिरों को स्थापित करने का काम किया था. यहां स्थानीय डिमरी समुदाय के ब्राह्मण रावल के सहायक होते हैं जो कभी मूल रूप से दक्षिण भारत के ही रहे हैं. बद्रीनाथ धाम के मुख्य पुजारी रावल को पहाड़ में पूजनीय माना जाता है.
देहरादून के वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप राणा बताते हैं कि भगवान बद्रीविशाल धाम में मुख्य पुजारी को रावल कहा जाता है. आदि गुरु शंकराचार्य के द्वारा ही रावल बनाने की व्यवस्था स्थापित की गई थी. रावल का चयन दक्षिण भारत यानी केरल राज्य के नम्बूदरी पाद ब्राह्मण से किया जाता है. यह भगवान विष्णु को मानने वाले यानी वैष्णव होते हैं जिनका चयन उन्हीं की वंशावली से होता है. हालांकि आधिकारिक व्यवस्था के अनुसार, साल 1948 में एक व्यवस्था बनाई गई जिसमें बद्री केदार मंदिर समिति ही आधिकारिक रूप से रावल चयनित करती है. इसमें उपरावल की भी व्यवस्थाएं बनाई गई हैं.
बहुत सख़्त हैं नियम
कुलदीप राणा बताते हैं कि बद्रीनाथ धाम के मुख्य पुजारी यानी रावल के सख्त नियम होते हैं, उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है, मंदिर की व्यवस्थाएं देखनी होती है. सुबह कुंड में स्नान करके बिना किसी को स्पर्श किये भगवान का शृंगार करना होता है, पूजन,प्रातः काल, सायं काल आरती करवाना होता है. सारी व्यवस्था और पूजन वही करते हैं, जो गर्भ गृह में भगवान बद्री विशाल को स्पर्श कर सकते हैं. लोक मान्यता यह भी हैं कि रावल की आदिकालिक व्यवस्था में एक ऐसे बालक का जन्म होता था जिसमें प्राकृतिक रूप से ही उसके शरीर पर जन्मजात मांस की जनेऊ आकृति होती थी. ऐसे बालक को बद्रीनाथ धाम को समर्पित कर दिया जाता था. उत्तर भारत के केदारनाथ धाम और बद्रीनाथ धाम में दक्षिण भारत से ही पुजारी बनाये जाते हैं.
कहीं आपकी कुंडली में बुध नौवें भाव में तो नहीं? जानिए क्यों अचानक बिगड़ सकता है भाग्य! क्या हैं खतरनाक संकेत!
12 Nov, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जन्म कुंडली में हर ग्रह का एक खास रोल होता है और जब बात आती है बुध ग्रह की तो यह ग्रह बुद्धि, बात करने का तरीका, सीखने की क्षमता, गणित, व्यापार और तार्किक सोच से जुड़ा होता है, अगर बुध मजबूत हो तो व्यक्ति बेहद समझदार, बातों में निपुण और हर स्थिति में अपनी बुद्धिमानी से रास्ता निकालने वाला बन जाता है. अब अगर यह बुध नौवें भाव में बैठ जाए, तो इसके प्रभाव और भी दिलचस्प हो जाते हैं. नौवां भाव धर्म, भाग्य, यात्रा, उच्च शिक्षा और अध्यात्म से जुड़ा होता है. यह भाव बताता है कि इंसान कितना भाग्यशाली है, उसकी सोच कितनी ऊँची है और उसे जीवन में किस तरह के मौके मिल सकते हैं. जब बुध यहां बैठता है, तो यह व्यक्ति को ज्ञान की खोज में आगे बढ़ाता है. ऐसा इंसान अक्सर दुनिया को समझने, नई चीज़ें सीखने और दूसरों को सिखाने में दिलचस्पी रखता है, लेकिन अगर बुध कमजोर हो जाए, तो यही गुण उलटे असर डाल सकते हैं व्यक्ति भ्रमित सोच रख सकता है या जीवन में दिशा तय नहीं कर पाता. चलिए, अब जानते हैं कि बुध के नौवें भाव में आने से व्यक्ति के जीवन पर कौन-कौन से सकारात्मक और नकारात्मक असर पड़ते हैं और किन उपायों से इसे बेहतर बनाया जा सकता है.
बुध नौवें भाव में सकारात्मक प्रभाव
1. तेज़ दिमाग और तार्किक सोच:
इस स्थिति में जन्मा व्यक्ति बहुत समझदार होता है. वह हर बात को तर्क के साथ देखता है और किसी भी चीज़ को आंख मूंदकर नहीं मानता. पढ़ाई, लेखन, रिसर्च और जर्नलिज़्म जैसे क्षेत्रों में ऐसे लोग बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं.
2. धर्म और ज्ञान में रुचि:
बुध अगर नौवें भाव में मजबूत हो, तो व्यक्ति को धर्म, दर्शन और अध्यात्म की गहरी समझ होती है. वह अपने जीवन में सही और गलत के बीच फर्क समझकर चलता है. ऐसे लोग अपने ज्ञान से दूसरों को भी प्रेरित करते हैं.
3. विदेश यात्रा के योग:
बुध नौवें भाव में बैठकर व्यक्ति को विदेश यात्रा या उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाने के मौके देता है. कई बार ऐसे लोग भाषाओं के विशेषज्ञ बन जाते हैं या विदेशी भाषाएँ सीखने में तेज़ होते हैं.
4. कर्म में विश्वास:
यह स्थिति व्यक्ति को कर्मशील बनाती है. वह भाग्य पर भरोसा तो रखता है, लेकिन मेहनत करना नहीं छोड़ता. ऐसे लोग भाग्य से ज़्यादा अपनी मेहनत पर विश्वास करते हैं.
5. संवाद और शिक्षा का वरदान:
ये लोग अच्छे शिक्षक, लेखक या सलाहकार बन सकते हैं. उनकी बातों में वजन होता है, और लोग उनकी राय को गंभीरता से लेते हैं.
बुध नौवें भाव में नकारात्मक प्रभाव
1. अति-तर्कशीलता:
अगर बुध नीच या पाप ग्रहों से पीड़ित हो, तो व्यक्ति हर बात में तर्क ढूंढता है. इससे रिश्तों में दूरी आ सकती है, क्योंकि सामने वाला उसकी हर बात को ‘बहस’ समझने लगता है.
2. विश्वास की कमी:
कमजोर बुध व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से असंतुलित कर सकता है. ऐसा इंसान किसी भी धर्म या आस्था पर भरोसा नहीं रख पाता और ज़िंदगी में भ्रम की स्थिति में रहता है.
3. अत्यधिक जिज्ञासा से भ्रम:
कभी-कभी बुध नौवें भाव में व्यक्ति को इतना जिज्ञासु बना देता है कि वह हर चीज़ जानना चाहता है. इस वजह से उसका ध्यान एक दिशा में टिक नहीं पाता।
4. विदेश में परेशानियाँ:
अगर बुध के साथ राहु या केतु का मेल हो, तो विदेश यात्रा या शिक्षा में बाधाएँ आती हैं. व्यक्ति नए माहौल में एडजस्ट करने में मुश्किल महसूस कर सकता है.
बुध नौवें भाव के उपाय
1. बुधवार को हरा रंग पहनें:
यह बुध को खुश करने का आसान तरीका है. हरा कपड़ा, रुमाल या रिंग पहनने से बुध की ऊर्जा बढ़ती है.
2. गणेश जी की पूजा करें:
बुध ग्रह का संबंध भगवान गणेश से है. गणेश जी की आराधना से बुध के दोष कम होते हैं.
3. तुलसी का पौधा लगाएँ:
रोज़ तुलसी को जल चढ़ाना बुध को मजबूत करता है और मन को शांति देता है.
4. एमराल्ड (पन्ना) पहनें:
यदि ज्योतिषी सलाह दे तो बुध की मजबूती के लिए पन्ना धारण किया जा सकता है. ध्यान रहे, यह केवल योग्य सलाह के बाद ही पहनें।
5. बुध मंत्र का जाप करें:
“ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः”- इस मंत्र का 108 बार जाप बुधवार के दिन करना शुभ फल देता है.
मुकदमों से चाहिए छुटकारा या दुश्मनों से मुक्ति...हरिद्वार में यहां करें इस रौद्र रूप की पूजा
12 Nov, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में समय की गणना संवत के अनुसार होती है. वैदिक पंचांग के हिसाब से हिंदू धर्म में त्योहारों का आगमन होता रहता है. कार्तिक मास के बाद मार्गशीर्ष मास पड़ता है जो बेहद फलदायक होता है. इस मास में विशेष पर्वों का आगमन सभी समस्याओं और दुखों से छुटकारा दिला देता है. 12 नवंबर को काल भैरव अष्टमी आ रही है. इस दिन यदि हरिद्वार में कुछ विशेष कार्य किया जाए तो शत्रु बाधा, भय, मुकदमें आदि से मुक्ति मिल जाती है. चलिए विस्तार से जानते हैं काल भैरव अष्टमी का महत्त्व और शुभ मुहूर्त. हरिद्वार के विद्वान धर्म आचार्य पंडित श्रीधर शास्त्री लोकल 18 से बताते हैं कि काल भैरव भगवान शिव के रौद्र रूप हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काल भैरव काशी के कोतवाल हैं.
इस मंत्र का जाप
हरिद्वार में भी काल भैरव अष्टमी के दिन भगवान शिव के मंदिर या भैरव मंदिर जाकर भैरवाष्टक या महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जाए तो अदालत में चल रहे मुकदमें से मुक्ति मिलती है और शत्रुओं का डर खत्म हो जाता है. श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि हरिद्वार सप्त नगरी में है. काल भैरव भोलेनाथ के रौद्र रूप हैं और हरिद्वार की अप नगरी में भोलेनाथ की ससुराल दक्षेश्वर महादेव मंदिर है. यदि काल भैरव अष्टमी के दिन भोलेनाथ के सिद्ध पीठ स्थल दक्षेश्वर महादेव, नीलेश्वर महादेव, तिलभांडेश्वर महादेव, दरिद्र भंजन महादेव, गौरी शंकर महादेव आदि मंदिरों में जलाभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र का पाठ किया जाए तो सभी कार्यों में सफलता मिल जाएगी.
कब से कब तक
1 नवंबर को मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि रात 11:09 से शुरू हो जाएगी जो 12 नवंबर की रात 10:58 तक रहेगी. सुबह 5:07 मिनट से 6:11 तक इसका शुभ मुहूर्त है. इस मुहूर्त में पूजा पाठ करना बेहद ही शुभ रहेगा.
गर घर में नहीं है तुलसी का पौधा, तो नौ ग्रहों का कोप कभी भी मचा सकता है जीवन में तूफान जानें कैसे!
12 Nov, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारतीय संस्कृति में तुलसी को सबसे पवित्र पौधों में गिना जाता है. यह न केवल एक औषधीय वनस्पति है, बल्कि इसे घर-आंगन की देवी भी कहा गया है. हर सुबह और शाम तुलसी के पौधे के सामने दीपक जलाना, जल अर्पित करना और उसके चारों ओर परिक्रमा करना एक पारंपरिक साधना है. तुलसी के बिना कोई पूजा अधूरी मानी जाती है. अगर हम ज्योतिष की दृष्टि से देखें, तो तुलसी केवल एक पौधा नहीं बल्कि नौ ग्रहों की ऊर्जा को संतुलित करने वाला माध्यम है. इसके पत्ते, सुगंध और वातावरण में फैलने वाली तरंगें हमारे मन, शरीर और विचारों पर सकारात्मक प्रभाव डालती हैं. ज्योतिष शास्त्र कहता है कि तुलसी सूर्य की तेजस्विता, चंद्र की शीतलता और गुरु की पवित्रता का संगम है. यही कारण है कि तुलसी के पौधे के पास बैठकर ध्यान करने से मानसिक शांति, आत्म-विश्वास और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है. तुलसी को राहु-केतु के नकारात्मक प्रभावों से बचाने वाला पौधा भी माना गया है. आइए अब जानते हैं कि तुलसी का ग्रहों से क्या संबंध है और यह किस तरह हमारे जीवन को संतुलित करती है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
1. तुलसी और ग्रहों का संबंध
ग्रह तुलसी का प्रभाव दूर होने वाले दोष
1. सूर्य – शरीर में ऊर्जा और आत्म-बल बढ़ाती है आलस्य, थकान, आत्मविश्वास की कमी
2. चंद्र – मन को शांत और स्थिर बनाती है बेचैनी, चिंता, भय
3. गुरु – ज्ञान और विवेक को प्रबल करती है भ्रम, निर्णय में त्रुटि
4. शुक्र – प्रेम और आकर्षण को शुद्ध करती है वासनात्मक विचार, संबंधों में तनाव
5. बुध – संवाद और अभिव्यक्ति शक्ति को बढ़ाती है बोलचाल में कठिनाई, अध्ययन में कमी
6. मंगल – क्रोध और आवेग को नियंत्रित करती है रक्त विकार, वैवाहिक तनाव
7. शनि – नकारात्मक ऊर्जा को घटाती है विलंब, उदासी, कर्मजाल
8. राहु – भय, भ्रम और मोह से मुक्ति दिलाती है नशे की प्रवृत्ति, मानसिक अस्थिरता
9. केतु – ध्यान और आत्म-ज्ञान को जागृत करती है एकांतप्रियता, अस्थिर विचार
1. तुलसी के ऊर्जात्मक और आध्यात्मिक गुण
तुलसी सूर्य की किरणों को खींचकर उन्हें सकारात्मक ऊर्जा में बदल देती है. इसके आस-पास का वातावरण शुद्ध और जीवंत हो जाता है. घर के उत्तर-पूर्व दिशा में तुलसी लगाने से वास्तु दोष और ग्रह दोष दोनों का प्रभाव घटता है.
तुलसी का पौधा हवा में मौजूद हानिकारक तत्वों को सोखकर घर में सुख-शांति फैलाता है. जो लोग ध्यान या साधना करते हैं, उन्हें तुलसी के समीप बैठकर ध्यान करने से गहरी एकाग्रता मिलती है.
राहु और शुक्र दोष निवारण में तुलसी का योगदान
2. राहु दोष में लाभ
राहु व्यक्ति को भ्रम, भय और मोह में डाल देता है. तुलसी इस नकारात्मकता को कम करती है.
प्रतिदिन तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाकर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करने से राहु के प्रभाव शांत होते हैं.
3. शुक्र दोष में लाभ
शुक्र दोष से प्रेम-जीवन में तनाव और शारीरिक असंतुलन होता है. तुलसी इन प्रभावों को संतुलित करती है.
शुक्रवार को तुलसी पर जल चढ़ाकर “ॐ शुं शुक्राय नमः” मंत्र का जाप करने से मानसिक शुद्धि और दांपत्य सुख बढ़ता है.
4. तुलसी पूजन के लाभ
1. पुण्य की प्राप्ति – तुलसी पूजन से आत्मिक शुद्धि और मोक्ष मार्ग की ओर प्रवृत्ति बढ़ती है.
2. गृह-कलह का अंत – तुलसी घर की नकारात्मक तरंगों को सोखकर शांति स्थापित करती है.
3. समृद्धि में वृद्धि – तुलसी मां लक्ष्मी का प्रतीक मानी जाती है, जिससे धन-प्रवाह बढ़ता है.
4. स्वास्थ्य लाभ – तुलसी का सेवन शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है.
5. संतान सुख – तुलसी आराधना से संतान-सुख की प्राप्ति मानी गई है.
5. तुलसी का धार्मिक और व्यावहारिक महत्व
तुलसी विवाह, तुलसी पूजन और कार्तिक माह के अनुष्ठान हिंदू परंपरा में विशेष माने जाते हैं. तुलसी को जल अर्पित करने से घर में लक्ष्मी का वास बना रहता है. तुलसी का पत्ता प्रसाद में मिलने से नकारात्मक विचार दूर होते हैं.
आधुनिक समय में वैज्ञानिकों ने भी माना है कि तुलसी हवा में मौजूद जीवाणुओं को नष्ट करती है और वातावरण को शुद्ध रखती है. इस प्रकार यह पौधा केवल आस्था का नहीं बल्कि स्वास्थ्य और संतुलन का प्रतीक है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (12 नवंबर 2025)
12 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- स्थिति पर नियंत्रण बनाये रखने के लिये संयम से कार्य निपटा लें, धैर्य रखें।
वृष राशि :- समय की गति अनुकूल, परिश्रम सफल होगा, क्षमता में अनुकूल वृद्धि होगी।
मिथुन राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति, मानसिक बेचैनी, स्वभाव में उद्विघ्नता से बचें।
कर्क राशि :- आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, कार्यगति में सुधार होगा, सोचे हुये कार्य बन जायेंगे।
सिंह राशि :- चिन्ता निवृत्ति, योजनायें फलीभूत होंगी, सतर्कता से कार्य करने पर लाभ होगा।
कन्या राशि :- भाग्य का सितारा प्रबल रहेगा, बिगड़े हुये कार्य बनेंगे, मित्रों से सुख होगा।
तुला राशि :- असमंजस की स्थिति बनी रहेगी, तर्क-वितर्क में विजय, सफलता के साधन बनेंगे।
वृश्चिक राशि :- सफलता के साधन जुटायें, विशेष कार्य स्थितिग रखें, कार्य अवरोध होगा।
धनु राशि :- वातावरण असमंजस में रखे, अनेक प्रकार की बाधायें सामने आयेंगी धैर्य से काम लें।
मकर राशि :- कुटुम्ब में सुखवर्धक योजनायें बनेंगी, किसी का कार्य लाभ होने से आपको संतोष अवश्य होगा।
कुंभ राशि :- स्वभाव में बेचैनी, मानसिक खिन्नता, अनावश्यक भटकना पड़ेगा, कार्य बनेंगे।
मीन राशि :- परिश्रम करने पर भी सफलता दूर दिखायी देगी, कुछ तनाव व परेशानी का अनुभव होगा।
पांवधोई नदी! बाबा लालदास की भक्ति से फूटी सहारनपुर में गंगा की धारा,
11 Nov, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
गंगा-यमुना के दोआब और शिवालिक पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसे सहारनपुर जनपद के भू-मानचित्र पर कई नदियां प्रवाहित होती नजर आती हैं, लेकिन इनमें से छोटी सी दिखने वाली पांवधोई नदी अपने भीतर एक गहरी ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और सामाजिक महत्ता समेटे हुए है. आज यह नदी सहारनपुर शहर को दो हिस्सों में बांटती हुई बहती है. पांवधोई से जुड़ी अनेक किवदंतियां और लोककथाएं प्रचलित हैं, जो इसे और भी रहस्यमय बनाती हैं. जिला मुख्यालय से करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित शंकरापुरी (वर्तमान शकलापुरी) गांव के बाहरी क्षेत्र को इस नदी का उद्गम स्थल माना जाता है. कहा जाता है कि इसका उद्गम बाबा लालदास की गंगा माता के प्रति गहरी भक्ति और उनकी साधना शक्ति से जुड़ा है.
शकलापुरी गांव के खेतों में धरती की गोद से स्वाभाविक रूप से फूटने वाली कई जलधाराएं आपस में मिलकर धीरे-धीरे एक नदी का रूप ले लेती हैं. सर्पीली लहरों के साथ बहती यह धारा जब गांव से बाहर स्थित प्राचीन सिद्धपीठ भगवान शकलेश्वर महादेव मंदिर के चरणों को स्पर्श करती हुई आगे बढ़ती है, तो सहारनपुर शहर के उत्तरी छोर पर बाबा लालदास बाड़े तक पहुंचते-पहुंचते इसका स्वरूप भव्य हो उठता है. कहा जाता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व यहां एक निर्मल और शीतल जल से भरा जलाशय था, जिसके किनारे हरे-भरे वृक्षों की छाया, पक्षियों का कलरव और वातावरण की शांति मन को मोह लेती थी. बाबा लालदास ने इसी शांत, सुंदर और आध्यात्मिक स्थल को अपनी साधना भूमि के रूप में चुना. प्रातःकाल की पहली किरणों से चमकती जलतरंगें, संध्या के समय लौटते पक्षियों की आवाजें और चांदनी रात में झिलमिल करता जल यह दृश्य किसी को भी मोह लेने वाला था. माना जाता है कि बाबा लालदास की भक्ति और साधना शक्ति से प्रेरित होकर ही यह जलधारा आगे बढ़ी और गंगा की पवित्र धारा का स्वरूप लेकर पांवधोई नदी के रूप में प्रसिद्ध हुई.
शहर के बीचोंबीच बहती है पांवधोई नदी
पांवधोई नदी सहारनपुर शहर के बीचोंबीच बहती हुई शहर को दो हिस्सों में बाँटती है. यह नदी धोबीघाट, पुल खुमरान, पुल दालमंडी, पुल सब्जी मंडी और पुल जोगियान जैसे क्षेत्रों से गुजरती हुई ढमोला नदी में मिलती है, जो आगे चलकर हिंडन नदी में समाहित हो जाती है. हिंडन, यमुना नदी की सहायक नदी है. अपने प्रवाह के दौरान यह नदी अनेक धार्मिक स्थलों और विशेष रूप से भगवान शिव के सानिध्य में बहती है, जिससे इसका आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है.
बाबा लालदास से जुड़ी है कहानी
साहित्यकार डॉ. वीरेंद्र आज़म ने बताया कि सहारनपुर की यह पांवधोई नदी ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. सैकड़ों वर्षों से यह नदी यहां बह रही है और इसकी उत्पत्ति की कथा बाबा लालदास की भक्ति से जुड़ी हुई है. कहा जाता है कि 16वीं सदी में जब बाबा लालदास अपने शिष्यों के साथ सहारनपुर पहुंचे, तब उन्होंने यहां के एक सुंदर जलाशय को अपनी साधना भूमि बनाया.
क्या है पांवधोई नदी की मान्यता?
एक दिन बाबा लालदास के मित्र हाजी शाह कमाल ने उनसे कहा कि आप गंगा जी के इतने बड़े भक्त हैं, तो क्यों न गंगा जी को यहीं बुला लें? बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा कि क्यों नहीं और अगले दिन जब वे हरिद्वार गंगा स्नान के लिए गए, तो अपनी लुटिया और डंडा गंगा में प्रवाहित कर दिए. चमत्कारिक रूप से अगली सुबह वही लुटिया और डंडा सहारनपुर के बाबा लालदास घाट पर जलाशय में तैरते मिले. तब से ही माना जाता है कि गंगा की यह धारा सहारनपुर में प्रवाहित होने लगी और यही आज की पांवधोई नदी बनी. वैज्ञानिक परीक्षणों से यह भी स्पष्ट हुआ कि इसके जल में ऐसे खनिज तत्व पाए गए जो पहाड़ी जल स्रोतों में मिलते हैं जिससे यह विश्वास और मजबूत होता है कि यह धारा सचमुच गंगा माता की कृपा से उत्पन्न हुई है.
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