धर्म एवं ज्योतिष
25 या फिर 26 मार्च...कब है पापमोचनी एकादशी?
25 Mar, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में प्रत्येक महीने दो बार एकादशी तिथि आती है और एकादशी तिथि के दिन भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित व्रत रखा जाता है. एकादशी तिथि के दिन व्रत करने से सभी तरह के पापों से मुक्ति भी मिलती है और भगवान श्री हरि विष्णु की विधि विधान पूर्वक पूजा आराधना की जाती है. वैदिक पंचांग के अनुसार प्रत्येक महीने कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में एकादशी तिथि का व्रत रखा जाता है. चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को पाप मोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. धार्मिक मान्यता भी है कि एकादशी का व्रत करने से सभी मनोकामना पूरी होती है. ऐसी स्थिति में चलिए इस रिपोर्ट में जानते हैं कब है पापमोचनी एकादशी? क्या है शुभ मुहूर्त और शुभ संयोग?
अयोध्या के ज्योतिषी पंडित कल्कि राम बताते हैं कि इस वर्ष पापमोचनी एकादशी को लेकर कई तरह का कंफ्यूजन है. सामान्य लोग 25 मार्च को पापमोचनी एकादशी व्रत रखने की बात कर रहे हैं. जबकि वैष्णव समाज के लोग 26 मार्च को. ऐसी स्थिति में पापमोचनी एकादशी का शुभ मूहूर्त पंचांग के अनुसार कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 25 मार्च को सुबह 5:04 से शुरू होकर 26 मार्च को दोपहर 3:45 पर समाप्त होगा. उदया तिथि के मुताबिक पापमोचनी एकादशी का व्रत 26 मार्च को रखा जाएगा.
पापमोचनी एकादशी व्रत के दिन पारण का समय 26 मार्च को दोपहर 1:58 से लेकर दोपहर 4:26 तक रहेगा. एकादशी तिथि के दिन भगवान श्री हरि विष्णु को ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर विधि विधान पूर्वक पूजा आराधना करनी चाहिए. एकादशी तिथि के व्रत का संकल्प लेना चाहिए. भगवान विष्णु के अमोघ मंत्र का जाप करना चाहिए. ऐसा करने से श्री हरि विष्णु की विशेष कृपा भी प्राप्त होती है और जीवन में समस्त पाप से मुक्ति भी मिलती है.
आटा गूंथने के बाद क्यों बनाते हैं उस पर उंगलियों के निशान? क्या है इसके पीछे की वजह? कैसे शुरू हुई परंपरा?
25 Mar, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
घर के बड़े बुजुर्गों की बताई हुई बातें अक्सर हमारे लिए समझना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, खासकर जब हम इन्हें सिर्फ एक पुरानी परंपरा या मान्यता के रूप में देखते हैं. लेकिन जब हम इनकी गहराई में जाकर समझते हैं, तो पाते हैं कि इन बातों में कुछ खास वजहें और तर्क छिपे होते हैं. एक ऐसी ही बात जो अक्सर हमारे घर के बड़े बुजुर्ग हमें बताते हैं, वह है – “आटा गूंथने के बाद उसमें उंगलियों के निशान जरूर बनाओ.” क्या आप जानते हैं कि इसके पीछे का कारण क्या है और शास्त्रों में इसके बारे में क्या कहा गया है?
आटा गूंथने का महत्व
हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी में आटा गूंथना एक सामान्य काम लगता है, लेकिन इस सामान्य से काम का भी कुछ खास महत्व है. विशेष रूप से घर की महिलाएं दिन में कई बार आटा गूंथती हैं, जिससे रोटियां, परांठे और अन्य खाद्य पदार्थ तैयार होते हैं. लेकिन शास्त्रों में इस कार्य को लेकर कुछ खास निर्देश दिए गए हैं, क्योंकि ये कार्य न सिर्फ भोजन तैयार करने से जुड़ा है, बल्कि हमारी मानसिकता और भक्ति से भी संबंधित है. हिंदू धर्म में भोजन को सिर्फ एक आहार नहीं, बल्कि एक प्रकार का प्रसाद माना जाता है, और इसी कारण रसोई में हर कदम को ध्यान से उठाना जरूरी होता है.
उंगलियों के निशान बनाने की परंपरा
अब हम आते हैं उस खास परंपरा पर, जिसमें दादी-नानी हमें आटा गूंथने के बाद उंगलियों के निशान बनाने की सलाह देती हैं. क्या यह सिर्फ एक रिवाज है या इसके पीछे कोई गहरी वजह है? दरअसल, इसका कारण शास्त्रों और पुरानी मान्यताओं में छिपा हुआ है.
हमारे पूर्वजों के अनुसार, पिंडदान का कार्य पितरों की आत्मा की शांति के लिए किया जाता है. पिंड को चावल के आटे से बनाया जाता है, और वह गोल आकार में होता है. आटा गूंथने के बाद जो गोल आकार बनता है, उसे पिंड से जोड़कर देखा जाता है. इस वजह से आटे को पितरों का भोजन माना जाता है.
लेकिन एक महत्वपूर्ण बात यह है कि आटे के गोले से रोटी बनाना शुभ नहीं माना जाता. इसे पितरों का आहार मानते हुए, यह आवश्यक है कि आटे में उंगलियों के निशान लगाए जाएं, ताकि वह पिंड के रूप में न लगे. यही कारण है कि दादी-नानी हमसे यह कहती हैं कि आटा गूंथते समय उंगलियों के निशान जरूर बनाएं. यह एक प्रकार से आटे को खाने योग्य और शुभ बनाता है.
गोल आकार वाले अन्य पकवानों में भी यह परंपरा है
आटे के अलावा, कई अन्य पकवानों जैसे बाटी, बाफले, वड़ा आदि में भी गोल आकार बनाए जाते हैं. इन पकवानों में भी उंगलियों के निशान लगाकर गड्ढे बनाए जाते हैं. इसका उद्देश्य यह होता है कि ये पकवान पिंड के आकार से भिन्न दिखें और शास्त्रों के अनुसार शुभ माने जाएं.
राशिफल: कैसा रहेगा आपका आज का दिन
25 Mar, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- तनाव व उदर रोग, मित्र लाभ, राजभय होगा, विवेक से कार्य का ध्यान रखेंं।
वृष राशि :- मनोवृत्ति संवेदनशील रहेगी, कार्यगति अनुकूल, चिन्ता कम अवश्य ही होगी।
मिथुन राशि :- किसी प्रयोजन से हानि, मनोवृत्ति संवेदनशील रहेगी, कार्यगति उत्तम होगी।
कर्क राशि :- सामर्थ्य एवं शक्ति व्यर्थ जाए, मानसिक बेचैनी, क्लेश व अशांति अवश्य होगी।
सिंह राशि :- कार्य-व्यवसाय में संतोष, स्त्री से तनाव, मानसिक अशांति बनी ही रहेगी।
कन्या राशि :- समय अनुकूल नहीं, विशेष कार्य स्थगित रखें, लेनदेन से हानि अवश्य होगी।
तुला राशि :- समृद्धि के साधन बनें, कार्य-कुशलता से संतोष होगा तथा कार्य अवश्य बनेंगे।
वृश्चिक राशि :- प्रबलता, प्रभुत्व वृद्धि, कार्य-कुशलता से संतोष होगा तथा कार्य अवश्य बनेंगे।
धनु राशि :- व्यर्थ भ्रमण, धन का व्यय, असमंजस एवं असमर्थता का वातावरण बना ही रहेगा।
मकर राशि :- अचानक यात्रा के प्रबल योग बनें, योजनाएं फलीभूत हों, कार्य से संतोष होगा।
कुंभ राशि :- बिगड़े कार्य बनें, कार्य-कुशलता से संतोष तथा सम्पन्नता के कार्य अवश्य बन जायेंगे।
मीन राशि :- असमर्थता का वातावरण कष्टप्रद हो, स्त्री वर्ग से हर्ष-उल्लास होगा, वातावरण सुखद होगा।
29 मार्च 2025 चैत्र अमावस्या को लगने वाले सूर्य ग्रहण के अशुभ प्रभावों से बचने के उपाय
24 Mar, 2025 01:52 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सूर्य ग्रहण 2025: ज्योतिष शास्त्र में ग्रहण को एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना माना जाता है, जिसका मानव जीवन पर भी प्रभाव पड़ता है। वर्ष 2025 में पहला सूर्य ग्रहण 29 मार्च को लगेगा, जो चैत्र अमावस्या के दिन पड़ेगा।
सूर्य ग्रहण 2025: विवरण
तिथि: 29 मार्च, 2025
समय: दोपहर 2:20 बजे से शाम 6:16 बजे तक
दृश्यता: यह सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा।
सूर्य ग्रहण का महत्व
हालांकि यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, लेकिन फिर भी इसका ज्योतिषीय महत्व है। ज्योतिषियों का मानना है कि ग्रहण के दौरान नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, इसलिए कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए।
ग्रहण के बाद क्या करें
स्नान और दान: ग्रहण के बाद स्नान और दान करना शुभ माना जाता है।
मंदिर की सफाई: ग्रहण के बाद मंदिर की सफाई और पूजा करनी चाहिए।
दान: जरूरतमंद लोगों को चना, गेहूं, गुड़ और दालें दान करें।
अन्य दान: केला, बेसन के लड्डू और पेड़े का दान भी शुभ माना जाता है।
सूर्य ग्रहण का प्रभाव
सूर्य ग्रहण का प्रभाव मुख्य रूप से मानसिक स्वास्थ्य, रिश्तों और रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ग्रहण के दौरान कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए।
ग्रहण के दौरान सावधानियां
ग्रहण के दौरान कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य नहीं करना चाहिए।
ग्रहण के दौरान खाने-पीने से बचना चाहिए।
ग्रहण के दौरान यात्रा करने से बचना चाहिए।
ग्रहण के दौरान उपाय
ग्रहण के दौरान भगवान का ध्यान करना चाहिए।
ग्रहण के दौरान मंत्रों का जाप करना चाहिए।
ग्रहण के दौरान दान करना चाहिए।
यह जानकारी सामान्य मान्यताओं पर आधारित है। अधिक जानकारी के लिए आप किसी ज्योतिषी से सलाह ले सकते हैं।
साल 2025 में कब है रक्षा बंधन का पर्व, जानें तिथि, महत्व, शुभ योग और राखी बांधने का मुहूर्त
24 Mar, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भाई-बहन के विश्वास और प्रेम का प्रतीक रक्षा बंधन का पर्व हर वर्ष सावन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. बहनें साल भर इस पर्व का इंतजार करती हैं और इस दिन भाई की कलाई पर राखी बांधकर लंबी आयु की कामना करती हैं. यह त्योहार भाई-बहन को स्नेह की डोर में बांधता है. भाई बदले में बहनों को रक्षा कवच का वचन देते हैं और गिफ्ट भी देते हैं. साल 2025 के रक्षा बंधन की खास बात यह है कि इस बार भद्रा का साया नहीं रहने वाला है क्योंकि भद्राकाल में राखी बांधना अशुभ माना जाता है. आइए जानते हैं साल 2025 में रक्षा बंधन कब मनाया जाता है…
रक्षा बंधन का महत्व
रक्षा बंधन के दिन बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और भाई अपनी बहनों को रक्षा का वचन देते हैं और गिफ्ट भी देते हैं. यह पर्व सावन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है इसलिए इसे राखी पूर्णिमा भी कहते हैं. रक्षा बंधन का पर्व एक लोकप्रिय त्यौहार है, जिसका भाई और बहन दोनों साल भर इंतजार करते हैं. यह पर्व ना केवल भाई-बहन को आपस में जोड़ता है बल्कि इस पर्व का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है. रक्षा बंधन का पर्व हमेशा शुभ मुहूर्त में मनाया जाना चाहिए, इस पर्व में किए जाने वाले रीति-रिवाज दोपहर के समय करना बहुत शुभ माना जाता है. साथ ही इस पर्व में भद्रा का भी विशेष ध्यान रखता है क्योंकि भद्राकाल में कोई भी शुभ कार्य करना शुभ नहीं माना जाता है.
कब है रक्षा बंधन 2025 का पर्व?
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ – 8 अगस्त, दोपहर 02 बजकर 12 मिनट से
पूर्णिमा तिथि समापन – 9 अगस्त, दोपहर 01 बजकर 24 मिनट तक
उदिया तिथि को मानते हुए रक्षा बंधन का पर्व 9 अगस्त दिन शनिवार को मनाया जाएगा. इस दिन भद्रा सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगी, तो पूरे दिन राखी बांधने के लिए कोई समस्या नहीं होगी.
राखी बांधने का शुभ मुहूर्त
राखी बांधना का शुभ मुहूर्त – 9 अगस्त, सुबह 5 बजकर 48 मिनट से दोपहर 1 बजकर 24 मिनट तक
पूजा की अवधि – 7 घंटे 36 मिनट
रक्षा बंधन 2025 का शुभ योग
रक्षा बंधन 2025 के दिन कई शुभ योग बन रहे हैं. इस दिन सौभाग्य योग और शोभन जैसे शुभ योग बन रहे हैं. साथ ही सर्व कार्य सिद्ध करने वाला सर्वार्थ सिद्धि नामक योग बन रहा है. इस शुभ योग रक्षा बंधन के धार्मिक कार्य करना बेहद शुभ माना गया है और ऐसा करने से जीवन में सुख-शांति और संपन्नता आती है.
राजनांदगांव के दो प्रमुख तालाबों के बीच स्थापित है यह मंदिर, शक्ति उपासना के महापर्व पर जरूर करें यहां दर्शन
24 Mar, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
राजनांदगांव शहर में प्राचीन शीतला मंदिर स्थित है. रानी सागर बूढ़ा सागर तालाब के पास यह मंदिर स्थापित है. जहां माता शीतला की पूजा अर्चना की जाती है. राजाओं के जमाने से यह मंदिर स्थापित है. तालाबों के बीच में यह मंदिर विद्यमान है. जहां बैरागी वैष्णव राजाओं द्वारा पूजा अर्चना की जाती थी. माता की पूजा अर्चना करने दूर-दूर से भक्त आते हैं. यहां नवरात्र पर्व पर विशेष पूजा अर्चना कि जाती है ज्योति कलश की स्थापना होती है नौ दिनों तक भजन कीर्तन का आयोजन होता है. दूर दूर से भक्त यहां पहुंचते है.
माता शीतला राजनांदगांव की आराध्य देवी है और कुलदेवी है. जहां विभिन्न शुभ अवसर शादी, छठी ,मांगलिक कार्यक्रमों में प्रथम निमंत्रण मां शीतला को दिया जाता है और बड़ी संख्या में लोग पूजा अर्चना करने यहां पहुंचते हैं. बैरागी राजाओं के द्वारा इस मंदिर की स्थापना की गई थी. इसके बाद से ही यहां विधि विधान से पूजार्चना की जाती है. हर पर्व पर माता शीतला की दर्शन के लिए बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं. माता हर मनोकामना पूर्ण करती है. दूर-दूर से भक्त माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं और विधि विधान से पूजा अर्चना कर आशीर्वाद लेते हैं. राजाओं के समय से यह मंदिर स्थित है. इसके साथ ही शहर के दो प्रमुख तालाबों के बीच यह मंदिर स्थापित है.
शहर का प्राचीन मां शीतला मंदिर
राजनांदगांव शहर का प्राचीन शीतला माता मंदिर अपने आप में खास है. यह मंदिर दो तालाबों के बीच स्थित है. बैरागी राजाओं के समय से यह मंदिर स्थापित है. जहां विधि विधान से पूजा अर्चना करने से हर मनोकामना पूर्ण होती है. बड़ी संख्या में भक्त यहां आते हैं और माता से मन्नत करते हैं. यहां एक ही मंदिर परिसर में माता शीतला मां काली,बाबा भोलेनाथ,हनुमानजी और साईं बाबा के दर्शन एक साथ होते हैं.
मंदिर की अपनी एक अलग मान्यता
शीतला माता राजनांदगांव की आराध्य कुलदेवी माता हैं. हर मांगलिक कार्यक्रम के दौरान माता की पूजा अर्चना की जाती है और प्रथम निमंत्रण माता शीतला को दिया जाता है. इसके साथ ही दोनों नवरात्र पर्व पर ज्योति कलश की स्थापना भी की जाती है और 9 दिनों तक विधि विधान से पूजा अर्चना मंदिर में की जाती है. इसके साथ ही दीपावली के दिन भी विशेष पूजा अर्चना होती है और भक्तों को मंदिर में पहुंचकर माता के विशेष पूजा अर्चना करने का लाभ मिलता है.
मधेश्वर महादेव धाम, शिव महापुराण कलश यात्रा में 15 हजार से अधिक महिलाएं हुई शामिल, लाखों श्रद्धालु आ रहे कथा सुनने
24 Mar, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जिले के मयाली स्थित प्रसिद्ध प्राकृतिक विश्व का सबसे बड़ा शिवलिंग मधेश्वर महादेव के पास भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ा है, महाशिवपुराण कथा के आयोजन ने इस पवित्र स्थल को और अधिक दिव्यता से भर दिया है, श्रद्धा का रंग इस कदर चढ़ चुका है कि लोग इसे अब शिवलोक कहने लगे हैं. कथा के प्रारंभ से पहले कुनकुरी के बेलजोरा नदी से लेकर मयाली कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई.
वहीं आयोजन समिति के सदस्य विष्णु सोनी ने बताया कि इस कलश यात्रा में 11 हजार लक्ष्य रखा गया था, लेकिन यहां 15 हजार से भी अधिक महिलाएं सिर पर कलश रखकर हर-हर महादेव और श्री शिवाय नमस्तुभ्यं के जयकारों के साथ आगे बढ़ी, पूरा वातावरण शिवमय हो गया. इस पवित्र यात्रा में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की धर्मपत्नी कौशल्या साय भी शामिल हुईं. कलश यात्रा के बाद महाशिवपुराण कथा वाचक श्री प्रदीप मिश्रा जी महाराज का आगमन हुआ. वहीं 21 मार्च से 27 मार्च तक दोपहर 01 बजे से शाम 05 बजे तक प्रसिद्ध कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्रा द्वारा महाशिवपुराण कथा का वाचन किया जाएगा.
यह स्थान शिव भक्तों के लिए एक दिव्य तीर्थ बनता जा रहा है
आयोजक समिति के प्रमुख राजीव रंजन नंदे ने कहा कि मयाली में स्थित विश्व का सबसे बड़ा प्राकृतिक शिवलिंग आस्था का केंद्र बन चुका है, यहां आने वाले श्रद्धालु इसे किसी शिवलोक से कम नहीं मानते. कहते हैं कि इस प्राकृतिक शिवलिंग के दर्शन मात्र से जीवन धन्य हो जाता है. प्रख्यात कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्रा जी जब यहां पहुंचे तो हेलीकॉप्टर से मधेश्वर महादेव शिवलिंग पर जलाभिषेक व दुग्धाभिषेक किया और बताया कि महाशिवपुराण कथा सुनने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंच रहे हैं. यहां प्रतिदिन डेढ़ लाख से अधिक श्रद्धालु शिव की भक्ति में लीन होकर शिव महापुराण सुनेंगे और कथा के दौरान रोज पार्थिव शिवलिंग का निर्माण होगा और 27 मार्च को विधि विधान से विसर्जित किया जाएगा. मयाली की पावन भूमि शिवधाम जैसी अनुभूति करा रही है. इस ऐतिहासिक आयोजन के साथ, मधेश्वर महादेव शिवलिंग पर आस्था का रंग पूरी तरह चढ़ चुका है और यह स्थान शिव भक्तों के लिए एक दिव्य तीर्थ बनता जा रहा है.
पापमोचनी एकादशी पर पति-पत्नी करें तुलसी की खास पूजा, शादीशुदा जीवन में नहीं होगी खटपट, बढ़ेगा प्रेम!
24 Mar, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कई जातक ऐसे होते हैं, जिनके वैवाहिक जीवन में लगातार खटपट चलती रहती है. जीवनसाथी के साथ वाद-विवाद होते ही रहता है. अगर आपकी भी शादीशुदा जिंदगी में ऐसे हालात हैं तो चैत्र माह की पहली एकादशी, जिसे पापमोचनी एकादशी भी कहा जाता है, उस दिन ये उपाय अवश्य करें.
हिंदू धर्म में पापमोचनी एकादशी का बेहद खास माना गया है. मान्यता है कि पापमोचनी एकादशी पर जातक अगर विधि विधान से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करे और कुछ उपाय करे तो वैवाहिक जीवन में जो भी खटपट चल रही है, वह समाप्त हो जाएगी. इस संबंध में देवघर के आचार्य से जानिए सब..
एकादशी पर तुलसी पूजा का महत्व
देवघर बैद्यनाथ धाम के पंडित गुलशन मिश्रा ने लोकल 18 को बताया कि चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी कहते हैं. इस बार 25 मार्च को पापमोचनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा. पापमोचनी एकादशी के दिन तुलसी पूजा का खास महत्व है. एकादशी के दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु और तुलसी की विशेष पूजा करें तो मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. घर में सुख समृद्धि की वृद्धि होती है.
पापमोचनी एकादशी उपाय
जिनके वैवाहिक जीवन में खटपट चल रही है, वैसे जातक पापमोचनी एकादशी पर तुलसी के ऊपर जल अर्पण अवश्य करें. जल में थोड़ा सा दूध मिला लें. साथ ही उस दिन तुलसी विवाह अवश्य कराएं. अगर तुलसी का विवाह नहीं करा पाते तो उस दिन तुलसी में श्रृंगार की वस्तुएं अर्पण कर माता को एक चुनरी अवश्य चढ़ाएं. अपनी मनोकामनाएं माता तुलसी से कहें. अगर ऐसा करते हैं तो जो भी वैवाहिक जीवन में खटपट है, वह समाप्त हो जाएगी.
राशिफल: कैसा रहेगा आपका आज का दिन
24 Mar, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- तनाव, कष्ट योग, मित्र लाभ, राजभय तथा पारिवारिक समस्या अवश्य उलझेगी, ध्यान दें।
वृष राशि :- अनुभव का सुख, मंगल कार्य, विरोध मामले, मुकदमें पर प्राय: जीत की सम्भावना अवश्य बनेगी।
मिथुन राशि :- कुसंगत हानि, विरोध, भय, यात्रा, सामाजिक कार्य में व्यवधान अवश्य ही बनेगा।
कर्क राशि :- भूमि लाभ, स्त्री सुख, हर्ष, प्रगति, स्थिति में सुधार, कार्य लाभ अवश्य ही बनेगा।
सिंह राशि :- तनाव व विवाद से बचें, विरोधियों की चिन्ता, राजकार्य से प्रतिष्ठा अवश्य मिले।
कन्या राशि :- भूमि लाभ, स्त्री सुख, हर्ष, प्रगति, स्थति में सुधार, लाभ तथा कार्य उत्तम होगा।
तुला राशि :-कार्य प्रगति, वाहन का भय, भूमि लाभ, कलह, कुछ अच्छे कार्य कर सकेंगे, ध्यान रखें।
वृश्चिक राशि :- कार्य सिद्ध, विरोध, लाभ, हर्ष, कष्ट, व्यय होगा, व्यापार में सुधार किन्तु खर्च होगा।
धनु राशि :- यात्रा में हानि, मित्र कष्ट, व्यय की कमी किन्तु कुछ कार्य व्यवस्था का अनुभव होगा।
मकर राशि :- शुभ कार्य, वाहन भय, रोग, धार्मिक कार्य, कुछ अच्छे कार्य हो सकते हैं, ध्यान रखें।
कुंभ राशि :- अभिष्ठ सिद्ध, राजभय, कार्य बाधा, राज कार्यों में रुकावट का अनुभव होगा।
मीन राशि :- अल्प हानि, रोग भय, संपर्क लाभ, राजकार्य विलम्ब तथा परेशानी अवश्य होगी।
व्यक्ति ही नहीं घर को भी लग जाती है बुरी नजर!
23 Mar, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नजर दोष एक ऐसी चीज है, सुनने में तो यह छोटी सी बात लगती है लेकिन इसका प्रभाव बेहद प्रभावशाली होता है. यह जीवन में कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न कर सकता है. अगर आपको लगता है कि आपके घर को किसी की बुरी नजर लग गई है, लोग जलन की भावना रखते हैं या बार-बार समस्याएं आ रही हैं, तो यह उपाय आपके लिए बहुत लाभकारी साबित हो सकता है.
उपाय
यह एक साधारण तरीका है, जिसे आप आसानी से कर सकते हैं. इसके लिए आपको उपला (गोबर के उपले) की जरूरत होगी, जो आपको बाजार में आसानी से मिल जाएगा. इसे गैस पर गर्म कर लें या फिर किसी अन्य सुविधाजनक तरीके से जला लें. अब नजर उतारने के लिए आपको कुछ सामग्री चाहिए- गुग्गुल, पीली सरसों, काली मिर्च (5-7 दाने), 5-7 लौंग, और एकछोटा टुकड़ा कपूर.
उपाय करने का सही समय
इस उपाय को आप सुबह या शाम किसी भी समय कर सकते हैं, लेकिन हल्का अंधेरा होने के समय करना अधिक प्रभावी माना जाता है. अगर आप रोजाना हवन कर सकते हैं, तो यह और भी लाभदायक होगा. जब उपला अच्छे से जल जाए, तो इसमें थोड़ा सा घी डालें. अगर गाय का घी हो तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन अगर न हो तो जो भी शुद्ध घी आप पूजा में उपयोग करते हैं, वही इस्तेमाल करें.
अब इसमें एक-एक करके सामग्री डालें
गुग्गुल: यह वातावरण को शुद्ध करता है.
पीली सरसों: बुरी नजर और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है.
काली मिर्च (5-7 दाने): शत्रुओं की नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करने में सहायक होती है.
लौंग (5-7 दाने): घर में सुख-समृद्धि बनाए रखती है.
कपूर: तुरंत प्रभावी होता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा लाता है.
इस उपाय का प्रभाव
जब आप इस धूनी को घर में देंगे, तो यह बुरी नजर और नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर देगी. अगर आपके घर में कोई अनचाही नकारात्मक शक्ति मौजूद है, तो वह भी समाप्त हो जाएगी. अगर किसी व्यक्ति को बार-बार नजर लगती है, तो उसके चारों ओर इस धूनी को घुमा सकते हैं.
इस उपाय को कम से कम सवा महीने तक नियमित रूप से करने से स्थायी लाभ मिलेगा. अगर समस्या बहुत गंभीर नहीं है, तो एक-दो बार में ही असर दिखने लगेगा. लेकिन गहरी नकारात्मक ऊर्जा को पूरी तरह से खत्म करने के लिए इसे लगातार करना जरूरी है.
चैत्र अमावस्या पर साल का पहला सूर्य ग्रहण, पितृ दोष से मुक्ति और आशीर्वाद के लिए करें ये उपाय
23 Mar, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
चैत्र मास के कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन अमावस्या का पर्व मनाया जाता है और इस बार यह शुभ तिथि 29 मार्च है. इस बार चैत्र अमावस्या पर साल 2025 का पहला सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है, हालांकि यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा इसलिए इस ग्रहण का सूतक काल मान्य नहीं होगा. अमावस्या तिथि पितरों को समर्पित है और यही इस तिथि के स्वामी भी हैं इसलिए ग्रहण की वजह से कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं रुकेंगे. अमावस्या के दिन पवित्र नदियों में स्नान, तर्पण और पिंडदान करने का महत्व है. मान्यता है कि ऐसा करने से पितर प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद भी देते हैं. ज्योतिष शास्त्र में इस दिन का महत्व बताते हुए कुछ विशेष उपाय भी बताए गए हैं. इन उपायों के करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और पितर आशीर्वाद भी देते हैं.
इस उपाय से पितर होंगे प्रसन्न
चैत्र अमावस्या के दिन सुबह पवित्र नदि में स्नान व ध्यान करें और पितरों के नाम का तर्पण भी करें. साथ ही पितरों के नाम का गरीब व जरूरतमंद लोगों को भोजन करवाएं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा भी दें. ऐसा करने से पितर प्रसन्न होते हैं और कुंडली में मौजूद पितृ दोष भी खत्म हो जाता है.
इस उपाय से परिवार में रहेगी सुख-शांति
चैत्र अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ पर जल और दूध अर्पित करके अक्षत, फल, फूल और काले तिल अवश्य चढ़ाएं. इसके बाद घी का दीपक जलाएं और हाथ जोड़कर 11 परिक्रमा भी करें. साथ ही नियमित रूप से 11 दिन तक गौ माता को आटे की लोइयां खिलाएं और उनकी सेवा व पूजा करें. ऐसा करने से पितृ दोष से राहत मिलती है और पितरों के आशीर्वाद से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है.
इस उपाय से आत्मा को मिलती है शांति
चैत्र अमावस्या के दिन एक साफ बर्तन लें और उसमें जल, काले तिल और कुशा मिलाकर पितरों का ध्यान करते हुए अर्पित कर दें. इसके बाद पितरों का ध्यान करें और हर अमावस्या तिथि पर पितरों के नाम का दान भी करें. ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और पितृ दोष से राहत मिलती है. साथ ही ध्यान रखें कि कोई भी शुभ काम करने से पहले पितरों का ध्यान अवश्य किया करें.
इस उपाय से नौकरी व कारोबार में होती है उन्नति
चैत्र अमावस्या को परिवार के सभी सदस्यों से एक एक सिक्का लें और उनको किसी मंदिर में जाकर दान कर दें. ऐसा आप हर गुरुवार को करते रहें. दरअसल अगर आपके पास 5 रुपए का सिक्का है तो घर के सभी सदस्यों से 5-5 रुपए के सिक्के लें और मंदिर में दान कर दें. ऐसा करने से पितर प्रसन्न होते हैं और नौकरी व कारोबार में अच्छी उन्नति होती है.
इस उपाय से पितरों की रहेगी कृपा
चैत्र अमावस्या के दिन गोबर का कंडा जला लें और उस पर गुड़, घी और दूध की खीर अर्पित करते पितरों का ध्यान करें. साथ ही हर दिन सुबह-शाम कपूर से घर के मंदिर में पूजा करें. कपूर को कभी घी में डूबोकर जलाएं तो कभी गुड़ के साथ मिलकर जलाएं. पूजा करने के बाद कौवा और कुत्ता को रोटी दें और गाय को हरा चारा भी खिलाएं. ऐसा करने से पितरों की कृपा बनी रहती है और पितृ दोष खत्म हो जाता है.
चैत्र के महीने में करें तुलसी का छोटा उपाय, बदल जाएगा भाग्य! वैवाहिक जीवन में आएंगी खुशियां
23 Mar, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
चैत्र का महीना हिंदू धर्म में बहुत विशेष महत्व रखता है. क्योंकि इस मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से हिंदू नववर्ष की शुरुआत होती है. इस माह में विशेष तौर पर मां दुर्गा की उपासना की जाती है साथ ही मां तुलसी का भी पूजन होता है. इसके साथ ही चैत्र के पवित्र महीने में तुलसी से जुड़े उपाय भी कर सकते हैं. तुलसी के इन उपायों से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है साथ ही घर में सुख-समृद्धि आती है, साथ ही आर्थिक तंगी से छुटकारा मिलता है.
तो आइए जानते हैं पंडित रमाकांत मिश्रा के अनुसार, तुलसी के उपायों के बारे में विस्तार से जानते हैं.
मां लक्ष्मी की करें उपासना
यदि आपके जीवन में लंबे समय से परेशानियां बनी हुई हैं तो चैत्र मास में इस उपाय को करने से आपको इससे छुटकारा मिल सकता है. चैत्र मास में गुरुवार के दिन सुबह स्नान करके मां लक्ष्मी का विधि विधान से पूजन करें. इस दिन शाम के समय तुलसी के पौधे के पास देसी घी का दीपक लगाना चाहिए. इन सरल उपायों को करने से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और आर्थिक तंगी दूर होती है.
प्रेम जीवन की परेशानियां होंगी दूर
अगर आपके जीवन में प्रेम संबंधी कोई परेशानी चल रही है और जीवन में उलझने आ रही हैं या विवाह संबंधी कार्यों में विघ्न आ रहें हैं तो चैत्र माह में तुलसी से जुड़ा ये उपाय आपके लिए कारगर साबित हो सकता है. इसके लिए आपको चैत्र मास में किसी शुभ तिथि पर मां तुलसी का विधि विधान से पूजन करें और उन्हें सोलह श्रृंगार अर्पित करें.
श्रृंगार सामग्री का प्रसाद महिलाओं में बांट दें. इस उपाय को करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी साथ ही पति-पत्नी के बीच प्यार बढ़ेगा व वैवाहिक जीवन में चल रही परेशानियां भी दूर होंगी.
मां तुलसी को प्रसन्न करने के मंत्र
अगर लंबे समय से आर्थिक तंगी आपको परेशान कर रही है तो चैत्र मास में मां तुलसी की उपासना आपके लिए बेहद शुभ साबित हो सकती है. इस मास में रोजाना तुलसी के पौधे में कच्चे दूध का अर्घ्य देने और कुछ मंत्रों का उच्चारण करने से आपकी आर्थिक तंगी दूर होगी और धन लाभ के योग भी बनने प्रारंभ हो जाएंगे.
तुलसी नामाष्टक मंत्र का करें पाठ –
वृंदा वृंदावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नंदनीय तुलसी कृष्ण जीवनी।।
एतभामांष्टक चैव स्त्रोतं नामर्थं संयुतम।
य: पठेत तां च सम्पूज्य सौश्रमेघ फलंलमेता।।
राशिफल: कैसा रहेगा आपका आज का दिन
23 Mar, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- यात्रा भय, कष्ट, व्यवसाय में बाधा, पारिवारिक समस्या, उलझन भरी रहेगी।
वृष राशि :- राजभय, रोग स्वजन सुख, श्क्षिा व लेखन कार्य में सफलता तथा प्रगति अवश्य होगी।
मिथुन राशि :- वाहन भय, यात्रा कष्ट, हानि तथा अशांति का वातावरण बना ही रहेगा, समय का ध्यान रखें।
कर्क राशि :- सफलता, उन्नति, शुभ कार्य, विवाद, राजकार्य मामले, मुकदमे में प्रगति, जीत होगी, ध्यान दें।
सिंह राशि :- शरीर कष्ट, कार्य व्यय, कार्य में सफलता, आर्थिक सुधार होने से कार्य बन जायेंगे।
कन्या राशि :- खर्च, विवाद, स्त्री कष्ट, विद्या लाभ, धीरे-धीरे कार्यों में सुधार होता जाएगा।
तुला राशि :- यात्रा से हर्ष, राज्य लाभ, शरीर कष्ट, खर्च की यात्रा बने, यात्रा में खर्च होगा।
वृश्चिक राशि :- कार्य वृत्ति में लाभ, यात्रा-सम्पत्ति लाभ, व्यापारिक गति में सुधार अवश्य होगा।
धनु राशि :- अल्प लाभ, चोट-अग्नि, शरीर भय, मानसिक बेचैनी, परेशानी अवश्य ही बनेगी ध्यान दें।
मकर राशि :- शत्रु से हानि, कार्य व्यय, शारीरिक सुख होगा, कभी-कभी कुछ कष्ट अवश्य ही होगा।
कुंभ राशि :- सुख, व्यय, संतान सुख, कार्य में सफलता, उत्साह की वृद्धि होगी, ध्यान अवश्य रखें।
मीन राशि :- पदोन्नति, राजभय, न्याय लाभ, हानि, अधिकारियों से मन-मुटाव अवश्य होगा।
यूपी में यहां स्वंय प्रकट हुई थी हनुमायूपी में यहां स्वंय प्रकट हुई थी हनुमान जी की प्रतिमा, दर्शन करने से भक्तों की हर मनोकामना होती है पूरी, जानें मान्यतान जी की प्रतिमा, दर्शन करने से भक्तों की हर मनोकामना होती है पूरी, जानें मान्यता
22 Mar, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारत में भगवान हनुमान के अनगिनत मंदिर हैं, लेकिन कुछ मंदिर अपनी दिव्यता और चमत्कारी मान्यता के कारण विशेष स्थान रखते हैं. ऐसा ही एक पावन स्थल चित्रकूट के कामतानाथ परिक्रमा मार्ग पर स्थित बरहा हनुमान मंदिर है. जहां स्वयं हनुमान जी प्रकट हुए थे.
हनुमान जी के दर्शन से पूरी होती है मनोकामना
यहां आने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि इस मंदिर में जो भी भक्त सच्चे मन से आता है, उसकी हर इच्छा बजरंगबली पूरी करते हैं. इस मंदिर में पूरे सप्ताह श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है, लेकिन मंगलवार और शनिवार को भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. इन दिनों विशेष रूप से हनुमान चालीसा और सुंदरकांड के पाठ का आयोजन किया जाता है, जिससे वातावरण भक्तिमय हो जाता है.
श्रीराम ने यहां बिताए थे 11 साल
मंदिर के पुजारी अमित तिवारी ने लोकल 18 से बताया कि भगवान श्रीराम ने अपने वनवास काल के दौरान 11 साल 6 महीने चित्रकूट में बिताए थे. इस दौरान उन्होंने कई स्थानों पर पूजा-अर्चना की, जिनमें बरहा हनुमान मंदिर भी शामिल है. यह स्थान कामतानाथ जी के चार प्रमुख द्वारों में से एक है. इसे तीसरा द्वार माना जाता है. बरहा हनुमान मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि इसे आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र भी माना जाता है. मान्यता है कि जितने भी सिद्ध साधु-संत इस स्थान पर आए, उन्होंने यहीं साधना करके सिद्धि प्राप्त की और फिर जनकल्याण के लिए विभिन्न स्थानों पर चले गए.
मंदिर की है अनोखी मान्यता
पुजारी ने बताया कि यहां विराजमान बजरंगबली की मूर्ति स्वयं प्रकट हुई है, जिससे इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है. हनुमान जी की कृपा से इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालु हर प्रकार के दुख और कष्टों से मुक्ति पाते हैं. कामतानाथ परिक्रमा मार्ग चित्रकूट के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है. इस परिक्रमा मार्ग पर कई छोटे-बड़े मंदिर स्थित हैं, जिनमें बरहा हनुमान मंदिर का विशेष स्थान है. यहां आने वाले श्रद्धालु परिक्रमा कर बजरंगबली से आशीर्वाद मांगते हैं, जिससे उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु को किस वरदान से हुई थी पुत्र की प्राप्ति, जानें इसके पीछे की दिलचस्प कथा
22 Mar, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारतीय पौराणिक कथाओं में अनेक देवी-देवताओं और उनके लीलाओं का वर्णन मिलता है. इन्हीं में से एक है भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी के पुत्र एकवीर की कथा. यह कथा जितनी रोचक है उतनी ही प्रेरणादायक भी है. भगवान विष्णु ने किसी कारणवश अपनी प्रिय पत्नी लक्ष्मी को घोड़ी होने का श्राप दे दिया था. श्राप के कारण मां लक्ष्मी को अश्व रूप में पृथ्वी पर रहना पड़ा. इस दौरान उन्होंने भगवान शिव की आराधना की. आइए जानते हैं इस कथा के बारे में…
श्राप और जन्म
देवी भागवत पुराण के अनुसार एक समय भगवान विष्णु ने किसी कारणवश अपनी प्रिय पत्नी लक्ष्मी को श्राप दे दिया था. श्राप के कारण मां लक्ष्मी को अश्व रूप में पृथ्वी पर रहना पड़ा. इस दौरान उन्होंने भगवान शिव की आराधना की. भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे फिर से भगवान विष्णु के पास लौटेंगी और उनसे पुत्र प्राप्त करेंगी.
समय आने पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का मिलन हुआ और उन्हें एक तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ, जिनका नाम एकवीर रखा गया. कुछ कथाओं में यह भी वर्णन है कि एकवीर का जन्म यमुना और तमसा नदी के संगम पर हुआ था.
राजा हरिवर्मा द्वारा पालन-पोषण
एक अन्य कथा के अनुसार जब एकवीर का जन्म हुआ तो भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी उन्हें जंगल में ही छोड़कर चले गए. उसी समय राजा हरिवर्मा नामक एक धर्मात्मा राजा जो संतान प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की तपस्या कर रहे थे. भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि वे एकवीर को अपना पुत्र मानकर ले. राजा हरिवर्मा जंगल गए और उन्होंने एकवीर को पाया. वे उन्हें अपनी राजधानी ले गए और उनका पालन-पोषण अपने पुत्र की तरह किया.
एकवीर का विवाह और राज्याभिषेक
राजा हरिवर्मा ने एकवीर को सभी प्रकार की शिक्षाएं दीं और जब वे बड़े हुए तो उनका विवाह राजा रैभ्य की पुत्री यशोमती से कराया गया. इसके बाद राजा हरिवर्मा, एकवीर को राजा बनाकर स्वयं वन में तपस्या करने चले गए.
यह कथा विभिन्न पुराणों और लोक कथाओं में भिन्न-भिन्न रूपों में पाई जाती है, लेकिन इसका मूल संदेश यही है कि भगवान की कृपा सदैव अपने भक्तों पर बनी रहती है.
माओवाद की समाप्ति के बाद अब बस्तर का सर्वांगीण विकास होगा: मंत्री राम विचार नेताम
अम्बिकापुर में विकास को नई रफ्तार
ड्रोन के साथ अपने हौसलों को उड़ान दे रही हैं सरूपी मीणा
अल्पविराम की अवधारणा जीवन और कार्य के संतुलन के लिये अत्यंत आवश्यक : अर्गल
चिन्हारी योजना से सशक्त हो रही छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति
जल जीवन मिशन से संवरी बुलगा की तस्वीर, जीवंती बाई के घर तक पहुँचा शुद्ध पेयजल
नगरीय निकायों के कायाकल्प और वित्तीय सुदृढ़ीकरण के लिये दो दिवसीय "शहरी सुधार कार्यशाला" का हुआ समापन
संकल्प से समाधान अभियान’ से त्वरित, प्रभावी और पारदर्शी निराकरण हुआ सुनिश्चित : मुख्यमंत्री डॉ. यादव
यूरिया का प्रभावी विकल्प बन रही हरी खाद, जशपुर में 600 हेक्टेयर में प्रदर्शन
