राजनीति
जंतर-मंतर से वांगचुक को हटाने पर भड़के राहुल गांधी, मोदी सरकार पर लगाए गंभीर आरोप
18 Jul, 2026 04:23 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने मोदी सरकार के मूल सिद्धांतों को "असत्य और हिंसा" पर आधारित करार देते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। हालिया घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर लिखा कि पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और उनके समर्थकों को जंतर-मंतर से उस समय हटाया जाना पूरी तरह गलत है, जब वे अहिंसक भूख हड़ताल पर बैठे थे।
शिक्षा प्रणाली और छात्रों के भविष्य पर उठाए सवाल
राहुल गांधी ने सरकार को घेरते हुए कहा कि पेपर लीक की बढ़ती घटनाएं, शिक्षा की आसमान छूती लागत और छात्रों द्वारा आत्महत्या जैसे मामले केवल आकड़े नहीं हैं, बल्कि यह भारत के भविष्य से जुड़े बेहद गंभीर विषय हैं। उन्होंने कहा, "कितना भी बल प्रयोग कर लिया जाए, भारत के छात्रों और उन लोगों को, जो उनसे प्रेम करते हैं और उन पर विश्वास रखते हैं, इन ज्वलंत मुद्दों को उठाने से नहीं रोका जा सकता।"
सोनम वांगचुक का आंदोलन और सरकारी कार्रवाई
लद्दाख के हितों और पर्यावरण संरक्षण की मांग को लेकर सोनम वांगचुक और उनके साथी पिछले कुछ समय से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्हें जंतर-मंतर से हटाए जाने के बाद विपक्ष ने सरकार की 'दमनकारी नीति' का आरोप लगाया है। राहुल गांधी ने इस कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जन-आंदोलनों की आवाज को दबाने का प्रयास कर रही है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
विपक्ष का एकजुट रुख
राहुल गांधी का यह बयान ऐसे समय आया है जब विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' सरकार के खिलाफ शिक्षा और रोजगार के मुद्दे पर लामबंद हो रहा है। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने स्पष्ट किया है कि वे पेपर लीक और लद्दाख के मुद्दों को आगामी संसद सत्रों में प्रमुखता से उठाएंगे। विपक्ष का तर्क है कि सरकार अपने अहंकार के कारण छात्रों की मांगों को अनसुना कर रही है, जिसके परिणाम आने वाले समय में गंभीर होंगे।
सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार
हालांकि, सत्ता पक्ष ने राहुल गांधी के इन आरोपों को 'आधारहीन' और 'राजनीति से प्रेरित' बताया है। सरकार का कहना है कि प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए थे। फिलहाल, इस मामले पर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं और यह देखना बाकी है कि आने वाले दिनों में सरकार छात्रों और आंदोलकारियों की इन मांगों पर क्या ठोस पहल करती है।
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ओवैसी की एंट्री से गरमाई UP की सियासत, सपा-कांग्रेस के वोट बैंक पर नजर
18 Jul, 2026 04:17 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। राज्य में आगामी चुनाव में अभी करीब सात महीने का समय शेष है, लेकिन एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी राजनीतिक सक्रियता को काफी पहले ही धार दे दी है। ओवैसी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अपना मुख्य रणनीतिक केंद्र बनाते हुए ताबड़तोड़ रैलियों का सिलसिला शुरू कर दिया है। 15 जून को बहराइच से 'मिशन यूपी 2027' का आगाज करने के बाद से ओवैसी लगातार सहारनपुर और मुरादाबाद जैसे क्षेत्रों में जनसभाएं कर पार्टी के जनाधार को विस्तार देने में जुटे हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का राजनीतिक समीकरण
ओवैसी की रणनीति के केंद्र में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रोहिलखंड का क्षेत्र है, जहां मुस्लिम और दलित आबादी का प्रभाव चुनाव परिणामों को बदलने की क्षमता रखता है। उदाहरण के तौर पर, बहराइच और सहारनपुर जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी हिस्सेदारी है, जो यहां की कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ओवैसी का मुख्य लक्ष्य इसी 'मुस्लिम-दलित' गठजोड़ को अपने पक्ष में करने का है। इसके लिए पार्टी ने स्थानीय स्तर पर चेहरों को आगे लाकर संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करना शुरू कर दिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, करीब 200 विधानसभा सीटों पर संगठन को सक्रिय रूप से खड़ा करने की योजना है।
गठबंधन की संभावनाएं और पिछले अनुभव
गठबंधन को लेकर ओवैसी का रुख स्पष्ट है; वे भाजपा को चुनौती देने के लिए साथ आने को तैयार तो हैं, लेकिन 'सम्मान और बराबरी की हिस्सेदारी' की शर्त के साथ। इससे पहले 2022 में 'भागीदारी परिवर्तन मोर्चा' और 2024 के लोकसभा चुनाव में 'पीडीएम' (पिछड़ा-दलित-मुस्लिम) के प्रयोग से उन्होंने गठबंधन की राजनीति को आजमाया है। हालांकि, पूर्व के इन प्रयासों को चुनावी सफलता नहीं मिली, फिर भी एआईएमआईएम इस बार फिर से नए समीकरण तलाश रही है। ओवैसी का प्रयास यह है कि चुनाव से पहले सांगठनिक ताकत इतनी बढ़ा ली जाए कि किसी भी गठबंधन में पार्टी सौदेबाजी की मजबूत स्थिति में रहे।
विपक्षी दलों के लिए ओवैसी की चुनौती
उत्तर प्रदेश में अब तक एआईएमआईएम का चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड बहुत प्रभावशाली नहीं रहा है, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनकी उपस्थिति सपा-कांग्रेस के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकती है। यदि ओवैसी अकेले भी चुनाव लड़ते हैं, तो पश्चिमी यूपी में उनका प्रभाव विपक्षी गठबंधन के समीकरणों को बिगाड़ने के लिए पर्याप्त है। ओवैसी का यह प्रयास सपा और कांग्रेस जैसे बड़े विपक्षी दलों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ओवैसी की यह सांगठनिक मेहनत और गठबंधन की रणनीतियां 2027 के महासमर में राजनीतिक दिशा को किस हद तक बदल पाती हैं।
कांग्रेस के इतिहास पर अरशद मदनी की टिप्पणी, हिंदू-मुस्लिम एकता को बताया स्थापना का उद्देश्य
18 Jul, 2026 03:57 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने कांग्रेस के गठन और देश की आजादी में उलेमाओं की भूमिका को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस की स्थापना का मूल उद्देश्य देश की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि उस समय बढ़ रही हिंदू-मुस्लिम दरार को पाटना था। मदनी के अनुसार, 1857 की क्रांति और आजादी की अन्य लड़ाइयों के दौरान शहीद हुए स्वतंत्रता सेनानियों के व्यापक दबाव के बाद ही कांग्रेस ने अपने एजेंडे में आजादी को शामिल किया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब देश में कोई राजनीतिक दल अस्तित्व में नहीं था, तब देवबंद के उलेमाओं ने ही अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा संभाला था।
देश की एकता और फिरकापरस्ती पर प्रहार
अरशद मदनी ने देश में बढ़ती सांप्रदायिक सौहार्द की कमी पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हम पिछले 1300 वर्षों से इस देश में रह रहे हैं, लेकिन वर्तमान के माहौल ने हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदायों के बीच के रिश्तों को कमजोर कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका संगठन न तो चुनाव लड़ता है और न ही किसी को चुनाव लड़ाता है, लेकिन देश की तरक्की के लिए सभी समुदायों का एकजुट होना अनिवार्य है। उन्होंने उम्मीद जताई कि नफरत का यह दौर जल्द ही समाप्त होगा और देश पुनः एकता के पथ पर अग्रसर होगा।
बुलडोजर कार्रवाई और नफरत की राजनीति
मदनी ने हालिया समय में मस्जिदों और मदरसों के खिलाफ की गई 'बुलडोजर कार्रवाई' की कड़ी आलोचना की। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई भी देश लंबे समय तक घृणा और भय के आधार पर नहीं चल सकता; राष्ट्र का संचालन केवल प्रेम, करुणा और न्याय के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने सरकार को आगाह किया कि सत्ताएं आती-जाती रहती हैं, लेकिन न्याय और मानवता की विरासत सर्वोपरि है। मदनी ने कहा कि आज हमारे बुजुर्गों द्वारा आजादी के लिए किए गए बलिदानों और उनसे जुड़ी निशानियों को मिटाने का प्रयास किया जा रहा है, जो कि अत्यंत खेदजनक है।
आजादी के आंदोलन में उलेमाओं का बलिदान
जमीयत उलेमा-ए-हिंद को आजादी के आंदोलन का एक 'सुनहरा अध्याय' बताते हुए अरशद मदनी ने कहा कि कई धार्मिक विद्वानों ने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों को सहा, लंबी जेल की सजाएं काटीं और फांसी के फंदों को चूमा, लेकिन कभी झुककर माफी नहीं मांगी। उन्होंने शेखुल हिंद मौलाना महमूदुल हसन का विशेष उल्लेख किया, जिन्होंने ब्रिटिश गुलामी को गैर-कानूनी घोषित करते हुए उनकी अधीनता स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया था। मदनी का मानना है कि इन बलिदानों को इतिहास में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे, और आज की पीढ़ी को इनसे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।
सोनम वांगचुक विवाद पर प्रियंका चतुर्वेदी का बड़ा बयान, सरकार को घेरा
18 Jul, 2026 03:32 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को भूख हड़ताल के दौरान अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद से केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के खिलाफ विपक्षी दलों ने तीखे हमले शुरू कर दिए हैं। शिवसेना (यूबीटी) की पूर्व सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा है कि सरकार को प्रदर्शनकारी का अनशन समाप्त करने के लिए किसी केंद्रीय मंत्री को वार्ता के लिए भेजना चाहिए था, न कि पुलिस का सहारा लेना चाहिए था। इस घटनाक्रम ने राजधानी की राजनीति में हलचल मचा दी है और वांगचुक के स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं भी बढ़ गई हैं।
प्रियंका चतुर्वेदी ने जताया विरोध
प्रियंका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि जनता सरकार के इस दमनकारी रवैये को याद रखेगी। उन्होंने सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य के प्रति अपनी चिंता जताते हुए उनके संघर्ष को देश के लिए महत्वपूर्ण बताया। इसके साथ ही उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) पर भी निशाना साधा और कहा कि वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए वांगचुक को 'बलि का बकरा' नहीं बना सकते। चतुर्वेदी की इस टिप्पणी ने आंदोलन के भीतर और बाहर नई बहस छेड़ दी है।
अभिजीत दीपके का जंतर-मंतर पर अनशन
सीजेपी प्रमुख अभिजीत दीपके ने दिल्ली पुलिस पर हिरासत के दौरान मारपीट और दुर्व्यवहार करने का गंभीर आरोप लगाया है। इस विवादित कार्रवाई के विरोध में दीपके ने जंतर-मंतर पर ही अपना आमरण अनशन शुरू कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि पुलिस की दमनकारी नीतियों के बावजूद उनका आंदोलन जारी रहेगा। दीपके ने यह भी घोषणा की है कि वे 20 जुलाई को प्रस्तावित अपने 'संसद मार्च' के कार्यक्रम पर अडिग हैं, जिसके लिए उन्होंने पूर्व में देशवासियों से समर्थन की अपील भी की थी।
प्रशासनिक तर्क बनाम आंदोलन की राह
सोनम वांगचुक बीते 28 जून से अपनी मांगों को लेकर भूख हड़ताल पर थे, जिसके बाद उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था। दिल्ली पुलिस का तर्क है कि उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करते हुए ही वांगचुक को चिकित्सा सहायता के लिए सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया है। हालांकि, दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस का मुख्य उद्देश्य आंदोलन को कुचलना था। अब जबकि वांगचुक अस्पताल में भर्ती हैं, आंदोलनकारियों ने अपने आगामी कार्यक्रमों को जारी रखने का संकल्प लिया है, जिससे स्थिति और भी तनावपूर्ण बनी हुई है।
अखिलेश यादव का बड़ा बयान, बोले- BJP की दमनकारी राजनीति से लोकतंत्र कमजोर हुआ
18 Jul, 2026 03:32 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लखनऊ। जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के अनशन स्थल से हटाए जाने और उनके अस्पताल में भर्ती होने के घटनाक्रम ने सियासी पारा बढ़ा दिया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस कार्रवाई को लेकर भाजपा सरकार पर कड़ा प्रहार किया है। सपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि भाजपा की दमनकारी राजनीति ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की लोकतांत्रिक छवि को नुकसान पहुँचाया है। उन्होंने इस कार्रवाई को भाजपा की संवादहीनता और नकारात्मक विचारधारा का परिणाम बताया है।
अखिलेश यादव की मांग और तीखी टिप्पणी
सपा अध्यक्ष ने घटनाक्रम पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि भाजपा का गांधीवादी तरीकों और शांतिपूर्ण संवाद में कोई विश्वास नहीं है। उन्होंने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि अनशन स्थल पर सादी वर्दी में पहुँचकर कार्रवाई करने वालों की पहचान सार्वजनिक की जानी चाहिए। सपा प्रमुख ने मांग की है कि सोनम वांगचुक का उपचार किसी सरकारी तंत्र के बजाय 'न्यायिक निगरानी' में होना चाहिए, ताकि उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर किसी प्रकार का संदेह न रहे। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा सरकार का यह कदम देश और विदेश में संदेह के घेरे में है।
डिंपल यादव का भाजपा पर कड़ा प्रहार
सपा सांसद डिंपल यादव ने भी इस मुद्दे पर भाजपा को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि भाजपा सरकार शांतिपूर्ण आवाजों को दबाकर संविधान और लोकतंत्र को आहत कर रही है। उन्होंने भाजपा की नीतियों पर कटाक्ष करते हुए इसे 'देश के लिए सफेद चादर का कफन' जैसा घातक करार दिया है। उनके अनुसार, लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन को कुचलने का प्रयास करना देश के मूल्यों के विरुद्ध है।
डिजिटल एकता और भाजपा का भय
अखिलेश यादव ने अपनी टिप्पणी में आगे कहा कि भाजपा की सोच हमेशा से 'दरारवादी' रही है। उन्होंने दावा किया कि जहाँ कहीं भी एकता, सौहार्द और एकजुटता दिखाई देती है, भाजपा घबराकर प्रतिक्रियावादी कदम उठाती है और आंदोलनों को तितर-बितर करने का प्रयास करती है। सपा अध्यक्ष ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि भाजपा इस वास्तविकता को नजरअंदाज कर रही है कि आज की नई पीढ़ी 'डिजिटल यूनिटी' के माध्यम से वैचारिक क्रांति लाने में पूरी तरह सक्षम है और भाजपा की ये दमनकारी नीतियां इस क्रांति को रोकने में विफल रहेंगी।
यूपी फतह के मिशन पर BJP, अमित शाह ने संभाली चुनावी कमान
18 Jul, 2026 03:27 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। राज्य में जीत की हैट्रिक लगाने के उद्देश्य से गृहमंत्री अमित शाह ने कमान संभाल ली है। वे शीघ्र ही प्रदेश के सभी छह संगठनात्मक क्षेत्रों का दौरा कर चुनावी तैयारियों की समीक्षा करेंगे और पार्टी कार्यकर्ताओं को जीत का संकल्प दिलाएंगे। भाजपा की रणनीति में इस बार उन सीटों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है, जहाँ पार्टी को पिछले चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था। शाह के इस दौरे की शुरुआत ब्रज क्षेत्र से होने की संभावना है।
हारी हुई सीटों पर जीत की नई रणनीति
भाजपा का मुख्य फोकस वर्ष 2012, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में लगातार हारी हुई 61 सीटों पर है। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2022 के चुनाव में 5000 से कम मतों के अंतर से हारी हुई 49 सीटों का भी सूक्ष्म विश्लेषण किया जा रहा है। पार्टी इन सीटों पर जातिगत समीकरणों, बूथ प्रबंधन और संभावित उम्मीदवारों का नए सिरे से सर्वे करा रही है। मिशन 2027 को सफल बनाने के लिए बूथ स्तर से लेकर लाभार्थी संपर्क तक, हर स्तर पर संगठन को मजबूत किया जा रहा है। गृहमंत्री अमित शाह, जिन्हें उत्तर प्रदेश में भाजपा की पिछली जीतों का 'चाणक्य' माना जाता है, के मार्गदर्शन में पार्टी तीसरी बार सत्ता में वापसी को लेकर आश्वस्त है।
टिकट वितरण में जीत की संभावना को प्राथमिकता
पार्टी ने टिकट वितरण को लेकर भी सख्त मानदंड तय कर दिए हैं। अब केवल वरिष्ठता या अनुभवी चेहरा होना ही उम्मीदवारी की गारंटी नहीं होगी। सूत्रों के अनुसार, तीन या उससे अधिक बार चुनाव लड़ चुके नेताओं के चुनावी प्रदर्शन, जीत-हार के अंतर और बूथ स्तर पर उनकी सक्रियता का बारीकी से आकलन किया जा रहा है। यदि किसी नेता की जीत की संभावना कमजोर पाई जाती है, तो उनके टिकट पर कैंची चल सकती है। भाजपा इस बार पूरी तरह 'विनिबिलिटी फैक्टर' (जीतने की क्षमता) को टिकट का आधार बना रही है।
वैचारिक चुनौतियां और विपक्ष की सक्रियता
भाजपा के सामने 2027 की राह उतनी आसान नहीं है। राम मंदिर चढ़ावे में कथित चोरी का विवाद पार्टी के लिए भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर एक चुनौती बनकर उभरा है, क्योंकि राम मंदिर भाजपा की सबसे प्रमुख वैचारिक पहचान का केंद्र है। साथ ही, विपक्ष भी अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है और अखिलेश यादव जल्द ही रथ यात्रा के माध्यम से जनता के बीच अपनी पैठ बनाने की तैयारी में हैं। इन चुनौतियों के बीच भाजपा का लक्ष्य न केवल अपनी वर्तमान सीटों को सुरक्षित रखना है, बल्कि हारी हुई सीटों को जीतकर 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए अपनी राह को और अधिक सुगम बनाना है।
झारखंड की राजनीति में हलचल, सीएम बदलने की अटकलों के बीच बेसरा की चेतावनी
18 Jul, 2026 02:02 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जमशेदपुर। झारखंड पीपुल्स पार्टी के संस्थापक और पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा ने शनिवार को जमशेदपुर परिसदन में एक महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने राज्य की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों और सामाजिक मुद्दों पर बेबाक टिप्पणी की। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सलाह दी कि वे आगामी 29 जुलाई को एमपी-एमएलए कोर्ट में होने वाली चार्जशीट की कार्यवाही को देखते हुए भविष्य की रणनीति तय करें।
मुख्यमंत्री के सामने संवैधानिक संकट की आशंका
सूर्य सिंह बेसरा ने दावा किया कि 29 जुलाई को चार्जशीट दाखिल होने के बाद मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, जिससे राज्य में गंभीर राजनीतिक और संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का उदाहरण देते हुए कहा कि चार्जशीट दाखिल होते ही नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देना ही एकमात्र विकल्प होता है। बेसरा ने मुख्यमंत्री को आगाह किया कि वे स्थिति के बिगड़ने से पहले ही अपनी उपस्थिति में पार्टी का नया नेता चुन लें ताकि सत्ता का हस्तांतरण सुचारू रूप से हो सके।
मतांतरण और आरक्षण पर नई नीति की मांग
पूर्व विधायक ने मतांतरण के संवेदनशील मुद्दे पर अपने विचार रखते हुए कहा कि इसे केवल अनुसूचित जनजाति (एसटी) तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि मतांतरण को लेकर एक समान कड़ा नियम लागू हो जो अनुसूचित जाति (एससी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अन्य सभी समुदायों पर प्रभावी हो। बेसरा का स्पष्ट मत है कि मतांतरण करने वाले व्यक्तियों को उसके बाद आरक्षण का लाभ मिलना बंद हो जाना चाहिए, ताकि आरक्षण की मूल व्यवस्था की शुचिता बनी रहे।
सोनम वांगचुक के अनशन पर राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की अपील
प्रेस वार्ता के अंत में सूर्य सिंह बेसरा ने जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर 20 दिनों से आमरण अनशन कर रहे सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को त्राहिमाम संदेश भेजकर इस मामले में त्वरित हस्तक्षेप की अपील की है ताकि आंदोलनकारी का जीवन बचाया जा सके। बेसरा ने यह स्पष्ट किया कि यह आंदोलन सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं बल्कि शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल बदलाव के लिए है। साथ ही, उन्होंने झारखंड के युवाओं से इस अनशन को समर्थन देने का आह्वान भी किया है।
बुलडोजर एक्शन से मचा सियासी बवाल, अभिषेक बनर्जी के कथित ऑफिस पर कार्रवाई
18 Jul, 2026 02:02 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दक्षिण 24 परगना। पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में शनिवार को उस समय भारी तनाव फैल गया, जब स्थानीय प्रशासन ने डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी के कार्यालय को अवैध निर्माण बताकर ध्वस्त कर दिया। अमताला-बारुईपुर रोड पर स्थित इस कार्यालय को ढहाने के लिए प्रशासन ने बुलडोजर का उपयोग किया। कार्रवाई के दौरान किसी भी प्रकार के अप्रिय घटनाक्रम को रोकने के लिए इलाके में भारी पुलिस बल और केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात किया गया था। पूरा क्षेत्र पुलिस छावनी में तब्दील हो गया था और प्रशासन ने भारी घेराबंदी के बीच पूरी इमारत को जमींदोज कर दिया।
अवैध निर्माण और प्रशासन का नोटिस
जिला प्रशासन के अनुसार, यह कार्यालय बिना किसी स्वीकृत बिल्डिंग प्लान के अवैध तरीके से निर्मित किया गया था। इस मामले में पूर्व में सांसद को दो बार नोटिस भेजकर सुनवाई के लिए बुलाया गया था, लेकिन कोई प्रतिनिधि उपस्थित नहीं हुआ। प्रशासन का दावा है कि नियमों के उल्लंघन और तय समय सीमा के भीतर जवाब न मिलने के बाद यह विध्वंस की कार्यवाही की गई है। चुनाव परिणामों के बाद से ही यह कार्यालय बंद पड़ा था, जिसका लाभ उठाते हुए प्रशासनिक अधिकारियों ने बीएलआरओ और बीडीओ की उपस्थिति में कार्रवाई को अंजाम दिया।
बढ़ती राजनीतिक सरगर्मी और कानूनी पेच
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब कोलकाता नगर निगम ने अभिषेक बनर्जी, उनके परिवार और उनसे जुड़ी कंपनी 'लीप्स एंड बाउंड्स' की 17 अन्य संपत्तियों को लेकर नोटिस जारी किया है। हाल ही में भाजपा द्वारा सांसद से जुड़ी 43 संपत्तियों की सूची सार्वजनिक किए जाने के बाद से यह विवाद और गहरा गया है। इन संपत्तियों में बनर्जी का निजी आवास 'शांतिनिकेतन' भी शामिल है। राजनीतिक विश्लेषक इसे राज्य में सत्ताधारी दल के नेताओं पर बढ़ रहे प्रशासनिक दबाव और संपत्ति संबंधी जांचों की कड़ी के रूप में देख रहे हैं।
लगातार हो रही अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई
दक्षिण 24 परगना में हाल के दिनों में अतिक्रमण के खिलाफ यह दूसरी बड़ी कार्रवाई है। इससे पहले टीएमसी नेता सौकत मोल्ला के बेटे से जुड़े एक कैफे को भी अवैध कब्जे के आरोप में ध्वस्त किया गया था। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी के कई नेताओं की संपत्तियों की जांच की जा रही है, जिस पर तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। हालांकि, इस ताज़ा ध्वस्तीकरण की घटना पर अभिषेक बनर्जी या उनकी पार्टी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
वांगचुक पर कार्रवाई को लेकर कांग्रेस ने सरकार को घेरा, लगाए गंभीर आरोप
18 Jul, 2026 01:45 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। पार्टी ने इस कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करार देते हुए कहा कि सरकार शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर उन्हें कुचलने की मानसिकता अपना रही है। कांग्रेस का आरोप है कि मौजूदा शासन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अलोकतांत्रिक तरीके से चला रहा है, जहां असहमति की आवाज को दबाया जा रहा है।
लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सरकार का नजरिया
कांग्रेस ने इस पूरी घटना को संविधान की अवमानना का एक और उदाहरण बताया है। पार्टी का मानना है कि असहमति व्यक्त करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, लेकिन गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाली दिल्ली पुलिस इसे स्वीकार करने के बजाय दमनकारी नीति अपना रही है। पार्टी के अनुसार, महिला पहलवानों और पूर्व सैनिकों के साथ हुए दुर्व्यवहार के बाद अब वांगचुक के साथ हुई कार्रवाई यह साबित करती है कि यह सरकार जन-आंदोलनों के प्रति कितनी असंवेदनशील हो गई है।
अस्पताल में भर्ती और आंदोलन का संघर्ष
सोनम वांगचुक नीट परीक्षा में हुई कथित धांधलियों और छात्रों की मौतों के विरोध में 28 जून से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर थे। अनशन के 21वें दिन स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि पुलिस का कहना है कि यह कदम चिकित्सा सलाह और उच्च न्यायालय के निर्देशों के पालन में उठाया गया है। वहीं, आंदोलन से जुड़े अन्य लोगों ने भी पुलिस पर मारपीट और हिरासत में लेने का आरोप लगाया है, जिससे पूरे मामले में आक्रोश और बढ़ गया है।
छात्रों की मांगों और सरकार की चुप्पी
यह आंदोलन नीट परीक्षा की अनियमितताओं के खिलाफ न्याय की मांग को लेकर चलाया जा रहा है, जिसमें वांगचुक के अलावा कई छात्र संगठन भी शामिल हैं। पिछले तीन हफ्तों से भूख हड़ताल के चलते आंदोलनकारियों का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है, लेकिन सरकार की ओर से अभी तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है। कांग्रेस ने इस पूरे मामले में सरकार से जवाबदेही की मांग करते हुए कहा है कि युवाओं की आवाज को अनसुना करना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
शिवपाल यादव के बयान से गरमाई सियासत, ओपी राजभर ने दिया तीखा जवाब
18 Jul, 2026 01:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सियासी सरगर्मियां अपने चरम पर हैं। राज्य में संभावित गठबंधन और नेतृत्व की भूमिका को लेकर राजनीतिक दलों के बीच वाकयुद्ध तेज हो गया है। हाल ही में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और महासचिव शिवपाल यादव ने गठबंधन में सपा की 'बड़े भाई' की भूमिका सुनिश्चित होने का दावा किया, जिससे विपक्षी एकता की चर्चाओं को नई दिशा मिली है। शिवपाल यादव ने जोर देकर कहा कि गठबंधन को लेकर निर्णय राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर पर लिया जाएगा और सभी सहयोगी दल एक साझा चुनावी रणनीति के साथ आगे बढ़ेंगे।
गठबंधन की राजनीति और सपा का दांव
शिवपाल यादव के इस बयान को उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के बढ़ते वर्चस्व और विपक्षी मोर्चे में उसकी अहम भूमिका के तौर पर देखा जा रहा है। सपा कांग्रेस समेत अन्य सहयोगी दलों के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ एक मजबूत चक्रव्यूह तैयार करने की दिशा में कार्यरत है। हालांकि, गठबंधन की शर्तें और सीट बंटवारे का अंतिम स्वरूप क्या होगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। सपा नेतृत्व का मानना है कि यदि विपक्ष एकजुट होकर चुनाव लड़ता है, तो सत्ताधारी दल को कड़ी चुनौती दी जा सकती है।
ओम प्रकाश राजभर का पलटवार
शिवपाल यादव के दावों पर सत्ताधारी गठबंधन के सहयोगी और मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कड़ा प्रहार किया है। राजभर ने शिवपाल यादव पर तंज कसते हुए उन्हें नसीहत दी और उनके पुराने बयानों की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति ने कभी सपा पर माफियाओं को संरक्षण देने और गरीबों की जमीन लूटने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे, आज वही पार्टी को 'बड़े भाई' के रूप में पेश कर रहे हैं। राजभर ने इस पूरे घटनाक्रम को विपक्षी गठबंधन की वैचारिक अस्थिरता और विरोधाभासों का प्रतीक बताया है।
चुनावी रणनीति और आरोप-प्रत्यारोप
आगामी विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश के राजनीतिक भविष्य के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं। जहां एक ओर विपक्ष साझा रणनीति बनाने की कवायद में जुटा है, वहीं सत्तापक्ष विपक्षी गठबंधन की कमियों और उनके नेताओं के पुराने बयानों को ढाल बनाकर जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है। आने वाले दिनों में गठबंधन की तस्वीर और अधिक साफ होने की संभावना है, लेकिन अभी से ही आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर राज्य की सियासत को पूरी तरह से गरमाए हुए है।
NDA को लेकर अटकलों पर अनिल पाटिल का बड़ा बयान, विकास के मुद्दों पर हुई थी मुलाकात
18 Jul, 2026 11:19 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई। महाराष्ट्र की सियासत में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के एनडीए में शामिल होने की चल रही अटकलों पर पार्टी विधायक अनिल पाटिल ने पूर्णविराम लगा दिया है। उन्होंने इन चर्चाओं को पूरी तरह निराधार और केवल अफवाह करार दिया है। पाटिल ने स्पष्ट किया है कि पार्टी की ओर से गठबंधन में शामिल होने का कोई प्रस्ताव नहीं है और ऐसी खबरें वास्तविकता से कोसों दूर हैं।
प्रशासनिक मुलाकातों का राजनीतिक अर्थ निकालना गलत
अनिल पाटिल ने वरिष्ठ नेताओं की मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री से हालिया मुलाकातों पर सफाई देते हुए कहा कि ये बैठकें पूरी तरह से अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों के विकास कार्यों और लंबित प्रशासनिक मुद्दों तक ही सीमित थीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जयंत पाटिल ने शहरी विकास विभाग से जुड़े स्थानीय नगर पालिका मामले पर चर्चा की थी। इसी तरह, पार्थ पवार और अन्य नेताओं की मुलाकातें भी क्षेत्रीय विकास परियोजनाओं से संबंधित थीं, जिन्हें राजनीतिक चश्मे से देखना गलत है।
विधायकों का समर्थन और पार्टी का रुख
एनडीए में शामिल होने की अफवाहों को खारिज करते हुए पाटिल ने कहा कि किसी सरकारी विधेयक का समर्थन करने को सरकार या गठबंधन के साथ जोड़ना तार्किक नहीं है। जनप्रतिनिधि अक्सर जनहित और मुद्दों के आधार पर सदन में अपना रुख तय करते हैं, जो उनके दायित्व का हिस्सा है। उन्होंने सुप्रिया सुले के बयानों का समर्थन करते हुए दोहराया कि पार्टी नेतृत्व का रुख पूरी तरह स्पष्ट है और इसमें किसी भी तरह के बदलाव की कोई योजना नहीं है।
नेतृत्व परिवर्तन की खबरों को बताया भ्रामक
स्वयं के प्रदेश अध्यक्ष बनने की चर्चाओं पर भी अनिल पाटिल ने प्रतिक्रिया दी और इसे कोरी अफवाह बताया। उन्होंने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष के पद पर नियुक्ति की एक तय संगठनात्मक प्रक्रिया है और फिलहाल पार्टी में इस तरह का कोई बदलाव विचाराधीन नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा अध्यक्ष संगठन को मजबूती से आगे बढ़ा रहे हैं और ऐसी खबरें केवल मीडिया द्वारा फैलाई गई भ्रामक जानकारी हैं, जिसका पार्टी की कार्यप्रणाली से कोई लेना-देना नहीं है।
क्या बदलने वाली है महाराष्ट्र की राजनीति? NCP के विलय पर BJP ने दिया बड़ा संकेत
18 Jul, 2026 10:02 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई। महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में एक बार फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के दोनों धड़ों के विलय और एनडीए में शामिल होने को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का मानना है कि यदि शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी-एसपी एनडीए का हिस्सा बनना चाहती है, तो इसके लिए पार्टी के दोनों गुटों का एक होना अनिवार्य है। पिछले कुछ दिनों में सत्तारूढ़ गठबंधन के प्रमुख नेताओं और एनसीपी के विभिन्न खेमों के बीच हुई मुलाकात ने इन अटकलों को और अधिक हवा दे दी है।
विलय की शर्त और भाजपा का स्पष्ट रुख
जुलाई 2023 में एनसीपी में आए विभाजन के बाद से अजित पवार का गुट राज्य सरकार में शामिल है, जबकि शरद पवार की एनसीपी (एसपी) विपक्ष में सक्रिय है। भाजपा का रुख एकदम साफ है कि वे शरद पवार या उनके किसी नेता को व्यक्तिगत रूप से अपने गठबंधन में शामिल करने के इच्छुक नहीं हैं। पार्टी का मानना है कि यदि पूरी एनसीपी को एनडीए में जगह चाहिए, तो पहले दोनों धड़ों को आपसी मतभेद मिटाकर एकजुट होना होगा। भाजपा फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम पर सतर्क रुख अपनाए हुए है और किसी भी प्रकार की जल्दबाजी से बच रही है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व और राजनीतिक समीकरण
महाराष्ट्र सरकार में शामिल एनसीपी ने अब केंद्र की राजनीति में भी अपनी भूमिका बढ़ाने की इच्छा जताई है। पार्टी के भीतर से यह मांग उठी है कि मंत्रिमंडल के आगामी विस्तार में पार्थ पवार को केंद्र में मंत्री पद मिलना चाहिए। हालांकि, एनसीपी के वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के भीतर किसी भी तरह के मतभेद की खबरों को सिरे से खारिज किया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि संसद के मानसून सत्र में प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक को देखते हुए सरकार के लिए एनसीपी (एसपी) का समर्थन या सकारात्मक रुख बेहद महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाने जैसे मुद्दों पर विपक्ष का रुख सरकार की राह आसान या कठिन बना सकता है।
मुलाकातों का सिलसिला और स्पष्टीकरण
हाल के दिनों में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ एनसीपी (एसपी) के वरिष्ठ नेताओं जैसे जयंत पाटिल और सुप्रिया सुले की बैठकों ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा की है। हालांकि, इन नेताओं ने इन मुलाकातों को पूरी तरह प्रशासनिक और स्थानीय मुद्दों तक सीमित बताया है। सुप्रिया सुले ने एनडीए में शामिल होने की तमाम चर्चाओं को खारिज करते हुए कहा कि उनकी पार्टी का रुख इंडिया गठबंधन के साथ मिलकर तय होगा। वहीं, जयंत पाटिल ने भी स्पष्ट किया है कि राजनीतिक पुनर्गठन जैसी कोई बात नहीं है और प्रशासनिक कार्यों के लिए सरकारी प्रतिनिधियों से मिलना सामान्य प्रक्रिया है।
वंदे भारत में BJP-कांग्रेस अध्यक्ष की मुलाकात ने बढ़ाई सियासी हलचल, तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल
17 Jul, 2026 04:57 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दतिया: दतिया विधानसभा उपचुनाव की सरगर्मियों के बीच हाल ही में वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन में एक बेहद दिलचस्प और सुखद राजनीतिक नजारा देखने को मिला। सियासी मैदान में एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाने वाले भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी सफर के दौरान आमने-सामने की सीटों पर बैठे नजर आए। इस यात्रा में उनके साथ राज्य मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल और भाजपा युवा मोर्चा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वैभव पवार भी मौजूद थे। चुनावी कड़वाहट से इतर, दोनों प्रमुख दलों के शीर्ष नेताओं की यह सहज मुलाकात और आपस में हुई बातचीत यात्रियों के साथ-साथ राजनीतिक हलकों में भी खूब सुर्खियां बटोर रही है।
ट्रेन के सफर में हुई चुनावी चर्चा
सफर के दौरान दोनों दिग्गजों के बीच दतिया उपचुनाव और राज्य के वर्तमान राजनैतिक हालात को लेकर लंबी गुफ्तगू हुई। इस अनौपचारिक बातचीत के बीच भी दोनों नेताओं ने अपनी-अपनी पार्टी की सफलता को लेकर पूरा दम भरा। कांग्रेस के प्रदेश मुखिया जीतू पटवारी ने दावा किया कि क्षेत्र की जनता कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह के साथ खड़ी है और उनकी जीत तय है। दूसरी तरफ, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने भी अपनी पार्टी की जीत पर पक्का भरोसा जताते हुए कहा कि भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी ही इस चुनाव में बाजी मारेंगे। भले ही दोनों के बीच कड़ा मुकाबला हो, लेकिन इस यात्रा के दौरान दिखी उनकी आपसी सहजता ने लोकतांत्रिक मर्यादा की एक बेहतरीन मिसाल पेश की है।
भाजपा का हाईटेक चुनाव प्रचार और नया मीडिया सेंटर
चुनावी समर को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तैयारियों की रफ्तार काफी बढ़ा दी है। इसी कड़ी में भाजपा शुक्रवार शाम चार बजे दतिया के प्राची होटल में अपने नए मीडिया सेंटर की शुरुआत करने जा रही है। पार्टी की रणनीति के अनुसार, इसी केंद्र से चुनाव प्रचार की कमान संभाली जाएगी और सोशल मीडिया के साथ-साथ मीडिया समन्वय की तमाम गतिविधियों को यहीं से संचालित किया जाएगा। इस उद्घाटन के मौके पर भाजपा के कई वरिष्ठ नेता पत्रकारों से रूबरू होकर पार्टी की आगामी चुनावी रणनीति का खुलासा भी कर सकते हैं।
बसई में कांग्रेस की बड़ी जनसभा की तैयारी
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी इस उपचुनाव को जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रही है। मतदाताओं को साधने के लिए कांग्रेस ने दतिया के बसई इलाके में एक विशाल जनसभा आयोजित करने का खाका तैयार किया है। इस बड़े राजनैतिक कार्यक्रम में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह समेत कई कद्दावर नेता और स्थानीय पदाधिकारी मंच साझा करेंगे। कांग्रेस इस बड़ी रैली के माध्यम से न केवल अपने जमीनी कार्यकर्ताओं में नया जोश भरना चाहती है, बल्कि क्षेत्र के वोटरों तक अपनी बात और मुद्दों को मजबूती से पहुंचाने की कोशिश में भी है।
बांकीपुर में प्रतिष्ठा का महासंग्राम, BJP नेतृत्व के लिए अहम मुकाबला
17 Jul, 2026 04:30 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पटना। बिहार की राजधानी की सबसे चर्चित सीटों में से एक, बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव को लेकर सियासी पारा बेहद चढ़ चुका है। इस उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के बीच सीधा और बेहद कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुकाबला महज एक विधानसभा सीट को जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके चुनावी नतीजे आने वाले समय में बिहार की पूरी राजनीतिक दिशा और दशा तय कर सकते हैं। यही वजह है कि दोनों ही खेमे अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुके हैं। बीजेपी जहां एक तरफ अपने पारंपरिक सवर्ण मतदाताओं को लामबंद करने में जुटी है, वहीं पार्टी ने इस एक सीट की प्रतिष्ठा बचाने के लिए 40 दिग्गज स्टार प्रचारकों की भारी-भरकम फौज को प्रचार अभियान में उतार दिया है।
बांकीपुर में आर-पार की सियासी जंग
चुनावी सभाओं और प्रचार के दौरान जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर लगातार सत्ताधारी गठबंधन पर हमलावर हैं। उनका दावा है कि वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के नेतृत्व को जनादेश दिया था, लेकिन बीजेपी ने बीच में ही बड़ा सियासी दांव खेलकर और सत्ता परिवर्तन कर मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने नाम कर ली। इसके साथ ही वे वर्तमान सम्राट चौधरी सरकार पर भ्रष्टाचार और लचर कार्यप्रणाली के गंभीर आरोप लगाते हुए बांकीपुर के प्रबुद्ध मतदाताओं से व्यवस्था परिवर्तन के लिए वोट करने की अपील कर रहे हैं। दूसरी ओर, भाजपा भी जन सुराज के दावों पर पलटवार करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। पार्टी समर्थकों द्वारा सोशल मीडिया और पटना की सड़कों पर लगाए गए विभिन्न पोस्टरों के जरिए प्रशांत किशोर को घेरा जा रहा है। हालांकि, सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कुछ पोस्टरों को लेकर इंटरनेट यूजर्स उल्टे भाजपा से ही सवाल पूछ रहे हैं, जिससे यह डिजिटल जंग भी काफी रोचक हो गई है।
शुरुआत से ही इस उपचुनाव में बीजेपी की रणनीति काफी चर्चा का विषय बनी रही है। पार्टी ने पहले घोषित उम्मीदवार अभिषेक कुमार (बंटी) को बदलकर सभी को हैरान कर दिया, जिसके बाद नए प्रत्याशी के बयानों को लेकर भी सोशल मीडिया पर खूब चर्चाएं और राजनीतिक बहस देखने को मिली।
40 स्टार प्रचारक बनाम 'वन मैन आर्मी' प्रशांत किशोर
इस चुनावी जंग में खुद को मजबूत साबित करने के लिए भाजपा ने अपनी पूरी संगठनात्मक मशीनरी झोंक दी है। पार्टी की ओर से जारी 40 स्टार प्रचारकों की इस सूची में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष, और राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े जैसे कद्दावर नेताओं के नाम शामिल हैं। आमतौर पर इतनी बड़ी और दिग्गजों से सजी प्रचारकों की सूची आम विधानसभा चुनावों में ही देखने को मिलती है। लेकिन सिर्फ एक सीट के उपचुनाव के लिए इतने बड़े स्तर पर संसाधनों और नेताओं को झोंकना साफ दर्शाता है कि भाजपा के लिए यह सीट कितनी बड़ी साख का सवाल बन चुकी है।
वहीं, भाजपा के इस विशाल संगठनात्मक ढांचे और स्टार प्रचारकों की भारी भीड़ के सामने जन सुराज के मुखिया प्रशांत किशोर अकेले ही कमान संभाले हुए हैं। उनके साथ चुनावी मैदान में बीजेपी जैसी कोई बड़ी स्टार प्रचारक टीम नहीं है, बल्कि वे एक 'वन मैन आर्मी' की तरह खुद लगातार जनसंपर्क कर रहे हैं। अब राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा है कि क्या प्रशांत किशोर अपने अकेले के दम पर भाजपा की इस विशाल चुनावी मशीनरी और उसके दिग्गजों के चक्रव्यूह को भेद पाएंगे? यही सवाल इस उपचुनाव की लड़ाई को बिहार की अब तक की सबसे दिलचस्प राजनीतिक भिड़ंत बना रहा है।
जन सुराज का BJP पर बड़ा आरोप, बांकीपुर उपचुनाव में चुनाव आयोग से की शिकायत
17 Jul, 2026 04:21 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पटना। बिहार की राजधानी की सबसे चर्चित सीटों में से एक, बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव को लेकर सियासी पारा बेहद चढ़ चुका है। इस उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के बीच सीधा और बेहद कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुकाबला महज एक विधानसभा सीट को जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके चुनावी नतीजे आने वाले समय में बिहार की पूरी राजनीतिक दिशा और दशा तय कर सकते हैं। यही वजह है कि दोनों ही खेमे अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुके हैं। बीजेपी जहां एक तरफ अपने पारंपरिक सवर्ण मतदाताओं को लामबंद करने में जुटी है, वहीं पार्टी ने इस एक सीट की प्रतिष्ठा बचाने के लिए 40 दिग्गज स्टार प्रचारकों की भारी-भरकम फौज को प्रचार अभियान में उतार दिया है।
बांकीपुर में आर-पार की सियासी जंग
चुनावी सभाओं और प्रचार के दौरान जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर लगातार सत्ताधारी गठबंधन पर हमलावर हैं। उनका दावा है कि वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के नेतृत्व को जनादेश दिया था, लेकिन बीजेपी ने बीच में ही बड़ा सियासी दांव खेलकर और सत्ता परिवर्तन कर मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने नाम कर ली। इसके साथ ही वे वर्तमान सम्राट चौधरी सरकार पर भ्रष्टाचार और लचर कार्यप्रणाली के गंभीर आरोप लगाते हुए बांकीपुर के प्रबुद्ध मतदाताओं से व्यवस्था परिवर्तन के लिए वोट करने की अपील कर रहे हैं। दूसरी ओर, भाजपा भी जन सुराज के दावों पर पलटवार करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। पार्टी समर्थकों द्वारा सोशल मीडिया और पटना की सड़कों पर लगाए गए विभिन्न पोस्टरों के जरिए प्रशांत किशोर को घेरा जा रहा है। हालांकि, सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कुछ पोस्टरों को लेकर इंटरनेट यूजर्स उल्टे भाजपा से ही सवाल पूछ रहे हैं, जिससे यह डिजिटल जंग भी काफी रोचक हो गई है।
शुरुआत से ही इस उपचुनाव में बीजेपी की रणनीति काफी चर्चा का विषय बनी रही है। पार्टी ने पहले घोषित उम्मीदवार अभिषेक कुमार (बंटी) को बदलकर सभी को हैरान कर दिया, जिसके बाद नए प्रत्याशी के बयानों को लेकर भी सोशल मीडिया पर खूब चर्चाएं और राजनीतिक बहस देखने को मिली।
40 स्टार प्रचारक बनाम 'वन मैन आर्मी' प्रशांत किशोर
इस चुनावी जंग में खुद को मजबूत साबित करने के लिए भाजपा ने अपनी पूरी संगठनात्मक मशीनरी झोंक दी है। पार्टी की ओर से जारी 40 स्टार प्रचारकों की इस सूची में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष, और राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े जैसे कद्दावर नेताओं के नाम शामिल हैं। आमतौर पर इतनी बड़ी और दिग्गजों से सजी प्रचारकों की सूची आम विधानसभा चुनावों में ही देखने को मिलती है। लेकिन सिर्फ एक सीट के उपचुनाव के लिए इतने बड़े स्तर पर संसाधनों और नेताओं को झोंकना साफ दर्शाता है कि भाजपा के लिए यह सीट कितनी बड़ी साख का सवाल बन चुकी है।
वहीं, भाजपा के इस विशाल संगठनात्मक ढांचे और स्टार प्रचारकों की भारी भीड़ के सामने जन सुराज के मुखिया प्रशांत किशोर अकेले ही कमान संभाले हुए हैं। उनके साथ चुनावी मैदान में बीजेपी जैसी कोई बड़ी स्टार प्रचारक टीम नहीं है, बल्कि वे एक 'वन मैन आर्मी' की तरह खुद लगातार जनसंपर्क कर रहे हैं। अब राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा है कि क्या प्रशांत किशोर अपने अकेले के दम पर भाजपा की इस विशाल चुनावी मशीनरी और उसके दिग्गजों के चक्रव्यूह को भेद पाएंगे? यही सवाल इस उपचुनाव की लड़ाई को बिहार की अब तक की सबसे दिलचस्प राजनीतिक भिड़ंत बना रहा है।
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