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अमेरिकी हमले की आशंका के चलते खामेनेई अंडरग्राउंड, बेटे ने संभाली ईरान की कमान
26 Jan, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तेहरान। ईरान और अमेरिका के बीच टकराव की आशंका बढ़ती जा रही है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई को तेहरान में एक विशेष अंडरग्राउंड शेल्टर में शिफ्ट किया गया है। रिपोर्ट में सरकार के करीबी सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि वरिष्ठ सैन्य और सुरक्षा अधिकारियों ने संभावित अमेरिकी हमले की आशंका को गंभीर खतरे के रूप में आंका है, जिसके बाद यह फैसला लिया गया। इस बीच खामेनेई ने अपने बेटे को कार्यकारी रुप से कमान सौंप दी है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यह अंडरग्राउंड सुविधा एक अत्यधिक सुरक्षित और मजबूत ठिकाना है, जिसमें आपस में जुड़े कई सुरंगनुमा रास्ते मौजूद हैं। सूत्रों ने दावा किया कि खामेनेई के तीसरे बेटे मसूद खामेनेई फिलहाल सुप्रीम लीडर के कार्यालय के जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और वही सरकार की कार्यकारी शाखाओं के साथ मुख्य संपर्क का जरिया बने हुए हैं। इसी बीच अमेरिका ने मिडिल ईस्ट की ओर अपनी सैन्य तैनाती और तेज कर दी है। अमेरिकी नौसेना का अब्राहम लिंकन जहाज फिलहाल हिंद महासागर में मौजूद है और इसके आने वाले दिनों में अरब सागर या फारस की खाड़ी तक पहुंचने की संभावना है।
इस कैरियर स्ट्राइक ग्रुप में एफ-35सी स्टील्थ फाइटर जेट्स और एफ/ए-18ई सुपर हॉर्नेट विमानों को तैनात किया गया है। इसके अलावा अमेरिका ने एफ-15ई स्ट्राइक ईग्लस और ब्रिटेन ने टाइफून फाइटर जेट्स भी क्षेत्र में भेजे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और वरिष्ठ अधिकारियों ने इस तैनाती को एहतियाती कदम और शक्ति प्रदर्शन बताया है। उनका कहना है कि यह कदम ईरान को आगे किसी भी तरह के उकसावे से रोकने के लिए उठाया गया है, खासतौर पर प्रदर्शनों पर कार्रवाई और परमाणु कार्यक्रम को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच।
वहीं ईरान ने कड़ा रुख अपनाया हुआ है। ईरानी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि किसी भी तरह का सैन्य हमला, चाहे वह सीमित ही क्यों न हो, उसे ऑल-आउट वॉर माना जाएगा। इसके साथ ही ईरान ने अपनी सेनाओं को हाई अलर्ट कर दिया है। खामेनेई के अंडरग्राउंड शेल्टर में जाने की खबर को इसी बढ़ते खतरे के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
आज तक किसी भी विदेशी ताकत का गुलाम नहीं बना भूटान
25 Jan, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
थिम्फू । क्या आप जानते हैं कि दुनिया में एक ऐसा देश भी है, जो आज तक किसी भी विदेशी ताकत का गुलाम नहीं बना और माना जाता है कि भविष्य के बड़े युद्धों का असर भी उस पर बेहद सीमित रहेगा? यह देश है भूटान। हिमालय की गोद में बसा यह छोटा-सा राष्ट्र, जिसे “थंडर ड्रैगन का देश” कहा जाता है, इस बात का जीवंत उदाहरण है कि आकार में छोटा होना कमजोरी नहीं होता। भूटान उन गिने-चुने देशों में शामिल है, जिसे न तो ब्रिटिश साम्राज्य गुलाम बना सका, न मुगल और न ही कोई अन्य विदेशी शक्ति। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह इसकी भौगोलिक स्थिति है। चारों ओर ऊंचे-ऊंचे हिमालयी पर्वत, दुर्गम पहाड़ियां और घने जंगल इसे एक प्राकृतिक किले की तरह सुरक्षा प्रदान करते हैं। सदियों तक भूटान ने बाहरी दुनिया से दूरी बनाए रखी और इसी अलग-थलग नीति ने उसे बड़े युद्धों और आक्रमणों से दूर रखा। भूटान की ताकत सिर्फ उसकी भौगोलिक बनावट तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी राजनीतिक सोच भी उतनी ही अहम है। यह देश हमेशा से तटस्थता की नीति पर चलता आया है। वह किसी बड़े सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है और न ही अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में दखल देता है। भारत और चीन जैसे दो बड़े देशों के बीच स्थित होने के बावजूद, भूटान ने दोनों के साथ संतुलित और शांतिपूर्ण रिश्ते बनाए रखे हैं। यही कारण है कि किसी भी वैश्विक युद्ध की स्थिति में भूटान एक कम आकर्षक और गैर-रणनीतिक लक्ष्य माना जाता है। भूटान की एक और अनोखी पहचान उसका विकास मॉडल है। यहां सकल घरेलू उत्पाद से ज्यादा महत्व सकल राष्ट्रीय खुशी, यानी ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस को दिया जाता है।
1970 के दशक में भूटान के चौथे राजा जिग्मे सिंगये वांगचुक ने यह विचार दिया कि किसी देश की प्रगति सिर्फ धन से नहीं, बल्कि लोगों की खुशी, पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक शांति से मापी जानी चाहिए। इसी सोच का नतीजा है कि भूटान आज दुनिया का पहला कार्बन नेगेटिव देश है। यहां 70 प्रतिशत से अधिक भूमि जंगलों से ढकी है और संविधान में यह प्रावधान है कि कम से कम 60 प्रतिशत क्षेत्र हमेशा वन क्षेत्र ही रहेगा। यदि तीसरा विश्व युद्ध होता भी है, तो भूटान के अपेक्षाकृत सुरक्षित रहने की कई वजहें हैं। यहां न तो बड़े सैन्य अड्डे हैं, न तेल या गैस जैसे रणनीतिक संसाधन। देश काफी हद तक आत्मनिर्भर है—हाइड्रोपावर से ऊर्जा और जैविक खेती से भोजन की जरूरतें पूरी होती हैं। सबसे अहम बात यह है कि भूटान के पास लूटने या कब्जा करने लायक कुछ नहीं, सिवाय शांति, प्रकृति और खुशहाली के। यही कारण है कि युद्ध और हिंसा से भरी दुनिया में भूटान आज भी एक शांत, सुरक्षित और अनोखा उदाहरण बना हुआ है।
ज्ञात हो कि आज की दुनिया युद्ध, संघर्ष और अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर मध्य-पूर्व और अमेरिका की सैन्य कार्रवाइयों तक, वैश्विक तनाव लगातार बढ़ रहा है। इतिहास गवाह है कि अब तक दुनिया दो विश्व युद्ध देख चुकी है और मौजूदा हालात को देखकर तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाएं भी जताई जा रही हैं। बीते समय में शक्तिशाली देशों ने कमजोर राष्ट्रों पर कब्जा किया, उन्हें गुलाम बनाया और अपने साम्राज्य का विस्तार किया। भारत खुद सैकड़ों वर्षों तक ब्रिटिश गुलामी झेल चुका है।
दो विशाल ब्लैक होल लगा रहे एक-दूसरे के चारों ओर परिक्रमा
25 Jan, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन । इवेंट होराइजन टेलीस्कोप (ईएचटी) ने ब्रम्हांड में पहली बार दो सुपरमैसिव ब्लैक होल के बीच हो रहे एक हिंसक और जटिल ‘डांस’ को रिकॉर्ड किया है। खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार, यह अद्भुत खगोलीय घटना पृथ्वी से लगभग 1.6 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित ओजे287 नामक क्वासर के केंद्र में घटित हो रही है।
इस खोज ने न सिर्फ खगोल विज्ञान की दुनिया में हलचल मचा दी है, बल्कि ब्लैक होल से जुड़ी हमारी अब तक की समझ को भी चुनौती दे दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार ओजे287 क्वासर के केंद्र में दो बेहद विशाल ब्लैक होल एक-दूसरे के चारों ओर परिक्रमा कर रहे हैं। इस खतरनाक गुरुत्वाकर्षणीय खेल के दौरान उनसे अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा की किरणें, जिन्हें जेट कहा जाता है, बाहर की ओर फूट रही हैं। ईएचटी द्वारा दर्ज की गई तस्वीरों और आंकड़ों में इन जेट्स के भीतर एक असामान्य घुमावदार संरचना देखी गई है। ऊर्जा की ये किरणें किसी सीधे रास्ते पर न जाकर सर्पिल या कुंडली की तरह मुड़ती हुई दिखाई दीं, जिसे वैज्ञानिक अब तक कभी इतनी स्पष्टता से नहीं देख पाए थे। इस शोध की सबसे बड़ी उपलब्धि ब्लैक होल जेट के भीतर ‘हेलिकल’ यानी सर्पिल चुंबकीय क्षेत्र की पुष्टि है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि जेट्स के भीतर ऊर्जा की लहरें अलग-अलग गति से आगे बढ़ रही हैं। जब ये लहरें एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र से टकराती हैं, तो उनके बीच अस्थिरता पैदा होती है। इस प्रक्रिया को भौतिकी में ‘केल्विन-हेल्महोल्ट्ज़ अस्थिरता’ कहा जाता है, जो ठीक उसी तरह काम करती है जैसे तेज हवा पानी की सतह पर लहरें बना देती है। इसी कारण ब्लैक होल से निकलने वाली ऊर्जा और रोशनी हमें मुड़ी हुई और घूमती हुई नजर आती है। इवेंट होराइजन टेलीस्कोप की अभूतपूर्व क्षमता ने इस खोज को संभव बनाया। वैज्ञानिकों के मुताबिक ईएचटी इतनी बारीकी से देख सकता है कि मानो चंद्रमा पर रखी एक टेनिस बॉल को पहचान ले। अप्रैल 2017 में केवल पांच दिनों के अंतराल पर ली गई दो तस्वीरों में जेट की संरचना और उसके ध्रुवीकरण में बड़े बदलाव दर्ज किए गए। इतनी कम अवधि में ब्लैक होल के व्यवहार में आए इन परिवर्तनों को पकड़ पाना अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है।
यह खोज पुराने सिद्धांतों पर भी सवाल खड़े करती है। अब तक माना जाता था कि ब्लैक होल जेट्स का घूमना ‘प्रेसेशन मॉडल’ यानी उनकी डगमगाहट के कारण होता है। लेकिन नए अवलोकनों से संकेत मिलता है कि यह घुमाव ब्लैक होल के भीतर चल रही जटिल भौतिक प्रक्रियाओं और चुंबकीय शक्तियों का नतीजा है। जेट के भीतर मौजूद कणों की ऊर्जा चुंबकीय बल से कहीं अधिक शक्तिशाली पाई गई, जिससे इस तरह की अस्थिरता जन्म लेती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में ब्लैक होल की संरचना, उनके विकास और ब्रह्मांड पर उनके प्रभाव को समझने में एक नई दिशा देगी।
आम चुनावों में 51 दलों में से 30 ने एक भी महिला को नहीं बनाया उम्मीदवार
25 Jan, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ढाका,। बांग्लादेश में राजनीति से महिलाओं की भागीदारी खत्म होती जा रही है। बांग्लादेश के सियासी इतिहास के पन्नों पर दो ऐसे नाम दर्ज हैं, जिन्होंने देश को एक नई दिशा दी। बांग्लादेश की सियासत का इतिहास खालिदा जिया और शेख हसीना के नाम के बिना अधूरा है। इसके बावजूद आज यहां पर महिलाओं की भागीदारी खत्म होती जा रही है। बांग्लादेश में इस साल 12 फरवरी को होने वाले चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या ना के बराबर है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और उन्हें सशक्त करने के वादे दशकों से किए जा रहे हैं, लेकिन फिर भी आगामी चुनाव में उनकी भूमिका की अलग तस्वीर नजर आ रही है। बांग्लादेशी मीडिया के मुताबिक जमात-ए-इस्लामी समेत 30 से ज्यादा पंजीकृत राजनीतिक दलों ने कोई भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा है। 13वें संसदीय चुनाव में सभी उम्मीदवारों में महिलाओं की संख्या 4.5फीसदी से भी कम है। यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है।
चुनाव के लिए जमा किए गए 2,568 नामांकन में सिर्फ 109 महिलाओं ने अपना नॉमिनेशन दाखिल किया है। आंकड़ों के मुताबिक 2,568 नामांकन में महिलाओं की संख्या सिर्फ 4.24 फीसदी है। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि आने वाले आम चुनाव में हिस्सा ले रही 51 राजनीतिक दलों में से 30 ने एक भी महिला उम्मीदवार को प्रतिनिधि नहीं बनाया है। स्क्रूटनी के दौरान कई महिला उम्मीदवारों ने अपनी उम्मीदवारी खो दी। 37 निर्दलीय महिला उम्मीदवारों में से, सिर्फ छह के नॉमिनेशन वैद्य घोषित किए गए।
रिपोर्ट के मुताबिक जमात-ए-इस्लामी से 276 उम्मीदवार, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश से 268, जातीय पार्टी से 224, गण अधिकार परिषद से 104, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस से 94, और दूसरी छोटी पार्टियों में जिनमें से हर एक में 40 से कम उम्मीदवार हैं, लेकिन इनमें कोई महिला उम्मीदवार नहीं है। महिलाओं, मानवाधिकार और विकास के मुद्दों पर काम करने वाले 71 संगठनों के एक प्लेटफॉर्म, सोशल रेजिस्टेंस कमेटी, ने आने वाले चुनाव में महिला उम्मीदवारों की कम संख्या पर चिंता जताते हुए कहा कि समाज में मौजूद औरतों से नफरत करने वाली संस्कृति को देखते हुए, महिलाएं निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने में हिचकिचा रही हैं। महिलाओं की सियासत में भागीदारी कम होने की वजह वहां पर पुरुष-प्रधान राजनीतिक कल्चर की झलक और पुरुषों के दबदबे वाली राजनीति, पुरुष-प्रधान समाज वाली विचारधारा को बनाए रखने की नीति है।
बांग्लादेश में अमेरिका का नया दांव- जमात-ए-इस्लामी से बढ़ाई नजदीकियां
25 Jan, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। बांग्लादेश के बदलते राजनीतिक परिदृश्य के बीच अमेरिका की एक कथित नई रणनीति ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। कट्टरपंथ के खिलाफ वैश्विक स्तर पर सख्त रुख अपनाने वाला अमेरिका अब बांग्लादेश की प्रमुख इस्लामी पार्टी, जमात-ए-इस्लामी को साधने की कोशिश करता नजर आ रहा है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ढाका में तैनात एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक की कुछ महिला पत्रकारों के साथ बंद कमरे में हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने आई है, जिसमें जमात-ए-इस्लामी के प्रति अमेरिका के बदलते रुख के संकेत मिलते हैं। इस बातचीत में राजनयिक ने स्वीकार किया कि बांग्लादेश धीरे-धीरे इस्लामिक शिफ्ट की ओर बढ़ रहा है और आगामी 12 फरवरी को होने वाले चुनावों में जमात-ए-इस्लामी अपने अब तक के सबसे शानदार प्रदर्शन की ओर अग्रसर हो सकती है। अमेरिकी राजनयिक ने यहाँ तक कहा कि अमेरिका चाहता है कि जमात उसके दोस्त बने और उन्होंने पत्रकारों को सुझाव दिया कि पार्टी की प्रभावशाली छात्र इकाई, इस्लामी छात्र शिबिर को मीडिया में उचित स्थान दिया जाना चाहिए।
जमात-ए-इस्लामी का इतिहास बांग्लादेश में काफी विवादास्पद रहा है। यह वही संगठन है जिसने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का पुरजोर विरोध किया था और लंबे समय तक इस पर प्रतिबंध लगा रहा। पार्टी शरिया आधारित शासन की कट्टर समर्थक रही है और उस पर अक्सर पाकिस्तान समर्थक रुख अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में जमात ने अपनी छवि बदलने की कोशिश की है और खुद को भ्रष्टाचार विरोधी व सुधार केंद्रित दल के रूप में पेश कर रही है ताकि मुख्यधारा के मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ा सके। अमेरिकी राजनयिक ने बैठक में यह भी स्पष्ट किया कि यदि जमात सत्ता में आने के बाद महिलाओं पर पाबंदियां लगाने या शरिया कानून थोपने जैसे चरम कदम उठाती है, तो अमेरिका मूकदर्शक नहीं बना रहेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे किसी भी प्रयास की स्थिति में अमेरिका अपने आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल करेगा और बांग्लादेश पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लगा सकता है, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।
हालांकि, इस विवाद के तूल पकड़ने के बाद ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि यह एक सामान्य और अनौपचारिक चर्चा थी और अमेरिका किसी विशेष राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करता। दूसरी ओर, जमात के प्रवक्ताओं ने भी इसे एक व्यक्तिगत अवलोकन मात्र बताकर खारिज करने की कोशिश की है। लेकिन अमेरिका की इस कथित गुप्त कूटनीति ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत लंबे समय से जमात-ए-इस्लामी को क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में देखता रहा है, विशेषकर उसके पाकिस्तान के साथ कथित संबंधों और कट्टरपंथी विचारधारा के कारण। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध पहले से ही तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में अमेरिका का जमात के साथ सहयोग बढ़ाना भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंधों में एक नई दरार पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि अटलांटिक काउंसिल जैसे संस्थानों की राय में बांग्लादेश को लेकर भारत की सबसे बड़ी चिंता हमेशा से जमात रही है। यदि वाशिंगटन अपनी नीति में बदलाव करते हुए जमात-ए-इस्लामी को राजनीतिक मुख्यधारा में वैधता दिलाने में मदद करता है, तो इसका असर केवल बांग्लादेश की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। यह दक्षिण एशिया के पूरे भू-राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करेगा और भारत के लिए अपनी सीमाओं पर सुरक्षा चुनौतियों को और अधिक जटिल बना सकता है। कुल मिलाकर, अमेरिका की यह नई पहल एक ऐसे मोड़ पर आई है जहाँ बांग्लादेश अपनी लोकतांत्रिक पहचान और बढ़ते धार्मिक प्रभाव के बीच संघर्ष कर रहा है।
मैक्रों ने नहीं मानी बात, ट्रंप ने वाइन-शैंपेन पर 200 फीसदी टैरिफ लगाने की दी धमकी
25 Jan, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लंदन,। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में फ्रांस की वाइन और शैंपेन पर 200 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी दी है। यह धमकी तब सामने आई जब फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों गाजा को लेकर बनाए गए बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने से इनकार कर दिया। हालांकि, इससे पहले भी मार्च 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस और यूरोपीय संघ के अन्य देशों से आने वाली वाइन, शैम्पेन और दूसरी शराब पर 200 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी दी थी। उस समय ट्रंप ने दावा किया था कि यूरोपीय संघ दुनिया की सबसे मनमानी टैक्स और टैरिफ लगाने वाली संस्थाओं में से एक है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस का अल्कोहलिक ड्रिंक्स मार्केट करीब 69 बिलियन डॉलर का है और 2032 तक यह 73 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। 2025 में बिक्री की मात्रा घटी, लेकिन महंगाई और कीमत बढ़ने से इसकी वैल्यू बढ़ी। हालांकि, एक नया ट्रेंड सामने आया है जिसके मुताबिक अब लोग ज्यादा मात्रा की बजाय अच्छी क्वालिटी की शराब पीना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। पेरिस ओलंपिक और बढ़ते पर्यटन से होटल, बार और रेस्टोरेंट में भी बिक्री को बढ़ावा मिला है। साथ ही सुपरमार्केट, दुकानों का दबदबा है, कुल बिक्री का करीब 70फीसदी यहीं से होता है। बार, क्लब, रेस्टोरेंट की बिक्री भी धीरे-धीरे बढ़ रही है, साथ ही लोग अब छोटे पैक और सस्ती शराब ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक नो और लो-अल्कोहल ड्रिंक्स की मांग तेजी से बढ़ रही है। साथ ही सबसे ज्यादा वाइन की मांग बढ़ी है। 45 फीसदी मांग वाइन की ही है। महंगी शैम्पेन और कॉन्यैक की बिक्री घटी, लेकिन सस्ती वाइन और बैग-इन-बॉक्स पैक लोकप्रिय हुए। फ्रांस के अल्कोहल बाजार में बड़े खिलाड़ी हैं। बता दें फ्रांस की शराब सैकड़ों साल पुरानी परंपरा से बनती है। यहां शराब सिर्फ ड्रिंक नहीं, बल्कि कला मानी जाती है। अंगूर कहां उगे, मिट्टी कैसी है, मौसम क्या है- सब कुछ स्वाद तय करता है। इसे टेरॉईर कहा जाता है, जो फ्रांस की सबसे बड़ी पहचान है।
बता दें फ्रेंच शराब को दुनिया में लग्जरी प्रोडक्ट माना जाता है। अमेरिकी और यूरोपीय अमीर वर्ग में फ्रेंच शराब स्टेटस सिंबल है। यही वजह है कि इनकी कीमत और मुनाफा बहुत ज्यादा होता है। फ्रांस में शराब बनाने के सख्त कानून हैं। कौन-सा अंगूर, किस इलाके में, कैसे उगेगा सब तय है। अमेरिका समेत कई देश वैसी क्वालिटी बनाना चाहते हैं, लेकिन वही स्वाद और पहचान नहीं बना पाते हैं। अमेरिका फ्रेंच शराब का सबसे बड़ा खरीदार है, साथ ही अमेरिका बड़ी तादाद में फ्रांस से वाइन भी खरीदता है।
ईरान नहीं बनाएगा परमाणु हथियार, ट्रंप की धमकी पर बोला – हम हर चीज के लिए तैयार
24 Jan, 2026 12:56 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Iran News : अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच ईरान के सुप्रीम लीडर के भारतीय प्रतिनिधि डॉक्टर अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार बनाने का इरादा नहीं रखता, क्योंकि इस्लाम में इसे ‘हराम’ माना जाता है।
एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि ईरान परमाणु ऊर्जा का उपयोग केवल मानवीय जरूरतों और शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए करना चाहता है। उनका दावा है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम मानव कल्याण से जुड़ा है और हथियार बनाने से उसका कोई संबंध नहीं है।
हकीम इलाही ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगातार कड़ी निगरानी और प्रतिबंध लगाए गए हैं, जबकि अन्य देशों पर समान नियम लागू नहीं किए जाते।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकी पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के बयान नए नहीं हैं और ईरान पहले भी ऐसी बातें सुन चुका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान हर स्थिति के लिए तैयार है।
इसके अलावा, ईरान में इंटरनेट बंद किए जाने को लेकर भी उन्होंने सफाई दी। उन्होंने कहा कि हिंसा के दौरान शांति बहाल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट अस्थायी रूप से बंद किया गया था, जबकि देश के भीतर लोकल इंटरनेट सेवाएं चालू रखी गईं।
खुदाई में मिले 6000 साल पुराने विशाल समुद्री शंख
24 Jan, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मैड्रिड । स्पेन के कैटेलोनिया क्षेत्र में की गई खुदाई के दौरान 6000 साल पुराने विशाल समुद्री शंख मिले हैं, जिनका इस्तेमाल उस दौर में लंबी दूरी तक संदेश पहुंचाने के लिए किया जाता था। स्पेन के पुरातत्वविदों की इस खोज ने आधुनिक विज्ञान को भी हैरान कर दिया है। ये शंख केवल सजावटी वस्तुएं नहीं थे, बल्कि प्राचीन खेती करने वाले समुदायों की एक प्रभावशाली और संगठित संचार प्रणाली का अहम हिस्सा थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन शंखों से निकली आवाज आज भी इतनी तेज और स्पष्ट है कि वह पूरी घाटी में गूंज सकती है और जमीन के नीचे बनी गहरी खानों तक आसानी से पहुंच सकती है। रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने इन प्राचीन शंखों को फिर से बजाकर उनकी ध्वनि क्षमता का परीक्षण किया। अध्ययन में सामने आया कि ‘कैरोनिया लैम्पस’ नामक बड़े समुद्री घोंघों के शंखों से बनाए गए ये हॉर्न 100 डेसीबल से भी ज्यादा तेज आवाज पैदा कर सकते हैं। पांच अलग-अलग पुरातात्विक स्थलों से मिले 12 शंखों में से आठ आज भी पूरी तरह काम कर रहे हैं। सबसे अच्छी स्थिति में पाए गए एक शंख से 111.5 डेसीबल तक की आवाज दर्ज की गई, जो लगभग एक कार के हॉर्न के बराबर मानी जाती है। खुले मैदानों और पहाड़ी इलाकों में ऐसी आवाज को कई किलोमीटर दूर तक सुना जा सकता था। ये शंख केवल एक ही तरह की जगहों से नहीं मिले हैं। वैज्ञानिकों को ये खेतों, गुफाओं और जमीन के नीचे बनी खानों में भी मिले हैं, जो लगभग 10 किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हुए थे।
इससे यह संकेत मिलता है कि यह किसी एक स्थान की सीमित परंपरा नहीं थी, बल्कि पूरे इलाके में अपनाई गई एक साझा सांस्कृतिक और व्यावहारिक प्रणाली थी। पहाड़ी और गुफाओं वाले क्षेत्रों में, जहां दूर तक देख पाना मुश्किल होता था, वहां ये शंख सूचना भेजने का सबसे भरोसेमंद माध्यम रहे होंगे। गहरी खानों में इनकी गूंज से सुरक्षा संकेत या चेतावनी देने का काम भी लिया जाता रहा होगा। शोध में यह भी सामने आया है कि प्राचीन कारीगरों ने इन शंखों को बेहद सोच-समझकर तैयार किया था। शंख के ऊपरी हिस्से को हटाकर लगभग 20 मिलीमीटर चौड़ा एक विशेष माउथपीस बनाया गया था, जिससे निकलने वाली आवाज स्थिर और नियंत्रित रहती थी। कुछ शंखों में छोटे छेद भी मिले हैं, जिनसे लगता है कि इन्हें डोरी के सहारे लटकाकर या साथ ले जाकर इस्तेमाल किया जाता था। इन पर समुद्री जीवों द्वारा किए गए प्राकृतिक छेद और निशान भी मिले हैं, जो यह साबित करते हैं कि इन्हें भोजन के लिए नहीं, बल्कि ध्वनि उत्पन्न करने के उद्देश्य से चुना गया था।
परीक्षणों में यह भी स्पष्ट हुआ कि ये शंख केवल एक ही तरह की आवाज तक सीमित नहीं थे। कुछ शंखों से तीन अलग-अलग सुर निकाले जा सकते थे, जो संगीत की दृष्टि से सटीक और बार-बार दोहराए जा सकने योग्य थे। एक पेशेवर ट्रम्पेट वादक की मदद से इन शंखों की ध्वनिक क्षमता को मापा गया, जिससे यह साबित हुआ कि पाषाण काल के लोग केवल रस्मों तक सीमित नहीं थे, बल्कि व्यावहारिक जरूरतों के लिए भी अत्यंत उन्नत उपकरणों का उपयोग करते थे। हालांकि इस खोज के साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ा है। ईसा पूर्व 3600 के आसपास इस संचार तकनीक का इस्तेमाल अचानक बंद हो गया। कांस्य युग के बाद के स्तरों में इन शंखों के कोई प्रमाण नहीं मिलते।
चंद्रमा पर परमाणु फिशन रिएक्टर तैनात करेगा अमेरिका
24 Jan, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन । अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने मिलकर चंद्रमा पर परमाणु फिशन आधारित पावर सिस्टम स्थापित करने की प्रक्रिया को औपचारिक रूप से आगे बढ़ा दिया है। इस योजना का उद्देश्य 2030 तक चांद की सतह पर एक ऐसा रिएक्टर तैनात करना है, जो वहां स्थायी मानव और रोबोटिक मिशनों को लगातार बिजली उपलब्ध करा सके। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब चीन और रूस भी संयुक्त रूप से चंद्रमा पर परमाणु रिएक्टर विकसित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जिससे अंतरिक्ष में वैश्विक प्रतिस्पर्धा और तीखी हो गई है। यह परियोजना नासा के महत्वाकांक्षी आर्टेमिस अभियान और भविष्य के मंगल मिशनों की आधारशिला मानी जा रही है। नासा और ऊर्जा विभाग के बीच इस सहयोग को एक औपचारिक समझौते के जरिए मजबूत किया गया है, जिसका मकसद अंतरिक्ष विज्ञान में अमेरिका के नेतृत्व को बनाए रखना और चंद्रमा पर लंबे समय तक टिकाऊ मौजूदगी के लिए भरोसेमंद ऊर्जा ढांचा तैयार करना है। अधिकारियों का मानना है कि बिना स्थिर और शक्तिशाली ऊर्जा स्रोत के चंद्रमा पर स्थायी बेस बनाना और वहां निरंतर मिशन चलाना संभव नहीं होगा।
इस योजना के तहत फिशन सरफेस पावर सिस्टम विकसित किया जा रहा है, जो चंद्रमा की कठोर परिस्थितियों में भी लगातार बिजली देने में सक्षम होगा। चांद पर लंबे समय तक अंधकार, अत्यधिक ठंड और तापमान में भारी उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियां रहती हैं, जहां सौर ऊर्जा हमेशा भरोसेमंद विकल्प नहीं बन पाती। ऐसे में परमाणु फिशन आधारित सिस्टम वर्षों तक बिना रिफ्यूलिंग के काम कर सकता है और 24 घंटे बिजली उपलब्ध करा सकता है। यही कारण है कि इसे भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। नासा प्रशासक जेरेड आइज़ैकमैन ने साफ कहा है कि अमेरिका अब केवल चांद पर लौटने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वहां टिके रहने और आगे मंगल तक पहुंचने की ठोस तैयारी कर रहा है। उनके अनुसार, राष्ट्रीय अंतरिक्ष नीति के तहत परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल अनिवार्य हो गया है, क्योंकि यही तकनीक गहरे अंतरिक्ष अभियानों को व्यवहारिक और टिकाऊ बना सकती है।
नासा और ऊर्जा विभाग के बीच यह सहयोग अंतरिक्ष अन्वेषण के एक नए युग की शुरुआत करेगा। अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने भी इस समझौते को अमेरिका की वैज्ञानिक विरासत से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि जब-जब अमेरिकी विज्ञान और नवाचार ने एकजुट होकर काम किया है, तब-तब देश ने असंभव माने जाने वाले लक्ष्य हासिल किए हैं। मैनहैटन प्रोजेक्ट से लेकर अपोलो मिशन तक इसका इतिहास गवाह है। उनके मुताबिक, मौजूदा ‘अमेरिका फर्स्ट स्पेस पॉलिसी’ के तहत यह पहल उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है।
किसान को खेत में मिला 17वीं सदी का चांदी का खजाना
24 Jan, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वारसॉवारसॉ। पोलैंड के उत्तरी हिस्से में स्थित गांव बुकोविएत्स विएल्की के खेत में जुताई के दौरान ऐतिहासिक रहस्य सामने आया है, जिसे देखकर वैज्ञानिक चौक गए हैं। सामने आए इस रहस्य ने सदियों पुराने अतीत की परतें खोल दीं। अपने खेत से पत्थर हटाने के लिए एक किसान दंपती जब फावड़ा चला रहे थे, तभी मिट्टी के नीचे से चमकती चांदी ने उन्हें चौंका दिया। थोड़ी ही देर में यह साफ हो गया कि यह कोई साधारण खोज नहीं, बल्कि 17वीं सदी का एक पूरा खजाना है। यह खोज पोलैंड के वार्मियन-मसूरियन क्षेत्र में हुई, जहां पहले कभी किसी बड़े ऐतिहासिक स्थल के संकेत नहीं मिले थे। जमीन के नीचे करीब 350 साल पुराना 162 चांदी के सिक्कों का खजाना दबा हुआ था। सिक्कों को देखकर विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया कि यह खजाना 1660 से 1679 के बीच का है, यानी उस दौर का जब पोलैंड-लिथुआनिया राष्ट्रमंडल राजनीतिक अस्थिरता, युद्धों और सामाजिक उथल-पुथल से गुजर रहा था। यही वजह मानी जा रही है कि किसी ने अपनी दौलत को जमीन में छिपाने का फैसला किया होगा।
खजाने में अलग-अलग मूल्य और प्रकार के सिक्के मिले हैं, जिनमें थैलर, टिम्फ, ऑर्ट और शोस्ताक शामिल हैं। सभी सिक्के चांदी के बने हुए हैं और कई पर आज भी टकसाल के निशान साफ दिखाई देते हैं। पुरातत्वविदों के मुताबिक सिक्के किसी मिट्टी के बर्तन में रखे गए थे, जिसके टूटे हुए अवशेष भी खुदाई स्थल से मिले हैं। सिक्कों का ज्यादा गहराई में न दबा होना इस बात की ओर इशारा करता है कि इन्हें जल्दबाजी में छिपाया गया होगा। सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इसे किसने दफनाया और वह व्यक्ति या परिवार दोबारा इसे लेने क्यों नहीं लौटा। इतिहासकारों का मानना है कि यह खजाना किसी अमीर परिवार, स्थानीय जमींदार या व्यापारी का हो सकता है, जिसने युद्ध, लूटपाट या असुरक्षा के डर से अपनी संपत्ति जमीन में छिपा दी हो। उस समय क्षेत्र में संघर्ष आम बात थी और ऐसे में अपनी जमा-पूंजी को सुरक्षित रखने का यह तरीका अक्सर अपनाया जाता था।
दुर्भाग्यवश, संभव है कि खजाने का मालिक किसी युद्ध, बीमारी या पलायन का शिकार हो गया हो। खुदाई के दौरान सिर्फ सिक्के ही नहीं मिले, बल्कि मस्कट की गोलियां, पुराने बटन, बेल्ट की बकल, अंगूठियां और धार्मिक पदक भी बरामद किए गए हैं। इनमें एक पदक पर ब्लैक मैडोना ऑफ चेंस्टोहोवा और एक संरक्षक देवदूत की आकृति उकेरी गई है, जो उस समय की धार्मिक आस्था को दर्शाती है। इसके अलावा पत्थर से बनी एक पुरानी इमारत के अवशेष भी मिले हैं, जो किसी जमींदारी हवेली या बड़े कृषि परिसर की ओर इशारा करते हैं। इससे यह अनुमान और मजबूत होता है कि खजाना उसी घराने से जुड़ा था। पोलैंड के कानून के अनुसार, इस तरह की ऐतिहासिक खोज सरकार की संपत्ति मानी जाती है। इसलिए पूरा खजाना अब म्यूजियम ऑफ द बॉर्डरलैंड इन ड्जियाल्दोवो को सौंप दिया गया है।
अब चीन अमेरिका के गेराल्ड आर फोर्ड से भी बड़ा न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट बनाएगा?
24 Jan, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
बीजिंग। चीन का नई एयरक्राफ्ट कैरियर फुजियान नवंबर 2025 में आधिकारिक रूप से सेवा में शामिल हो गई है और इसे बीजिंग की तेजी से बढ़ती समुद्री ताकत का प्रतीक माना जा रहा है। करीब 80 हजार टन वजनी यह पोत चीन का पहला पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन वाला विमानवाहक पोत है, जिसमें आधुनिक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट सिस्टम लगे हैं। इसे दुनिया का सबसे बड़ा पारंपरिक ईंधन से संचालित युद्धपोत भी बताया गया, लेकिन हालिया तकनीकी आकलनों में इसके डिजाइन से जुड़ी खामियां सामने आई हैं। इन्हीं कमियों ने अब चीन को इससे कहीं बड़े और न्यूक्लियर एनर्जी पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर के विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर दिया है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सैन्य विशेषज्ञों और स्वतंत्र विश्लेषकों के मुताबिक फुजियान की सबसे बड़ी समस्या इसके फ्लाइट डेक लेआउट से जुड़ी है। अमेरिकी सुपरकैरियर्स के विपरीत, फुजियान का ‘आइलैंड सुपरस्टक्चर’ फ्लाइट डेक के बीचों-बीच स्थित है, जबकि अमेरिकी जहाजों में इसे पीछे की ओर रखा जाता है। इस डिजाइन के कारण विमानों की पार्किंग और आवाजाही के लिए उपलब्ध जगह सीमित हो जाती है, जिससे तेज गति से उड़ान संचालन में बाधा आती है। नतीजतन, फाइटर जेट के टेक-ऑफ और डेक पर मूवमेंट के दौरान दिक्कतें सामने आ रही हैं।
कैटापल्ट सिस्टम की स्थिति ने इन समस्याओं को और बढ़ा दिया है। फुजियान में मौजूद इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम भले ही अत्याधुनिक हो, लेकिन इनमें से एक कैटापल्ट लैंडिंग जोन में हस्तक्षेप करता है, जिससे लैंडिंग के समय उसका उपयोग संभव नहीं हो पाता। वहीं एक अन्य कैटापल्ट विमान लिफ्ट के बेहद पास स्थित है, जो एक ‘चोक पॉइंट’ बनाता है। माना जा रहा है कि निर्माण में भाप चालित कैटापल्ट से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिस्टम में बदलाव के कारण ये समझौते किए गए, जिनका सीधा असर पूरे फ्लाइट डेक ऑपरेशन पर पड़ा। इसके एंगल्ड फ्लाइट डेक की चौड़ाई और गहराई भी अमेरिकी डिजाइनों से कम बताई जा रही है, जिससे खराब मौसम और उबड़-खाबड़ समुद्री हालात में विमान उतारना और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
रिपोर्टों के मुताबिक इन समस्याओं की जड़ पारंपरिक ईंधन से चलने वाला प्रोपल्शन सिस्टम है। बड़े एग्जॉस्ट फनल और इंजन रूम के कारण आइलैंड और लिफ्ट की स्थिति सीमित हो जाती है, जिससे फ्लाइट डेक का प्रवाह बाधित होता है। इसके उलट न्यूक्लियर एनर्जी पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर में ऐसे भारी प्रोपल्शन सिस्टम की जरूरत नहीं होती। इससे डिजाइनरों को आइलैंड को पीछे खिसकाने, कैटापल्ट को बेहतर ढंग से लगाने और डेक को ज्यादा खुला बनाने की आजादी मिलती है। अब चीन अमेरिका के गेराल्ड आर फोर्ड क्लास से भी बड़ा न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है। माना जा रहा है कि फुजियान की कमियों से मिले अनुभव के आधार पर चीन अपनी अगली पीढ़ी के विमानवाहक पोत को ज्यादा सक्षम, तेज और रणनीतिक रूप से प्रभावी बनाने की कोशिश करेगा।
पाकिस्तान में 6 लाख फर्जी डॉक्टर कर रहे मरीजों का इलाज; रिपोर्ट
24 Jan, 2026 08:07 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लाहोर। आर्थिक तंगी की मार झेल रहे पाकिस्तान (Pakistan) की हालत इन दिनों बेहद खराब हो गई है। शहबाज शरीफ की सरकार बढ़ती महंगाई को कंट्रोल करने में तो नाकाम है ही, लोग यहां बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरस रहे हैं। हाल ही में यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। एएफपी की एक रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में फर्जी और झोला छाप डॉक्टरों की भरमार हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक हालात ऐसे हैं कि देश भर में लाखों लोग बिना किसी कानूनी इजाजत के मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
रिपोर्ट में पाकिस्तानी मेडिकल एसोसिएशन और सिंध हेल्थकेयर कमीशन के आंकड़ों का हवाला दिया गया है। मेडिकल एसोसिएशन के महासचिव अब्दुल गफ्फार शोरो ने बताया है कि पूरे पाकिस्तान में 6 लाख से ज्यादा फर्जी डॉक्टर काम कर रहे हैं। उनके मुताबिक ऐसे लोग पहले किसी डॉक्टर के साथ काम करते हैं, थोड़ा बहुत सीखते भी नहीं हैं और अपनी क्लिनिक खोल लेते हैं।
महामारी करार
शोरो के मुताबिक फर्जी डॉक्टरों को दवाओं की सही खुराक और साइड इफेक्ट्स की जानकारी नहीं होती। गलत इलाज से मरीजों की हालत और बिगड़ जाती है। उन्होंने कहा कि ये लोग उपकरणों को ठीक से स्टरलाइज नहीं करते, सिर्फ पानी से धोकर दोबारा इस्तेमाल करते हैं। कई जगह सिरिंज भी दोबारा इस्तेमाल की जाती हैं, जिससे हेपेटाइटिस और एड्स जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। उन्होंने इसे पब्लिक हेल्थ के क्षेत्र में महामारी करार दिया है।
मरीजों की और बिगड़ जाती है हालत
गांव के एक निवासी अली अहमद ने बताया कि इलाके में कई ऐसी क्लिनिक हैं, जहां कोई भी योग्य डॉक्टर नहीं है। वहीं लोगों में शिक्षा की कमी है इसलिए वे असली और नकली डॉक्टर में फर्क नहीं कर पाते। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या का सीधा असर पाकिस्तान की पहले से कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ रहा है। कराची के सिविल अस्पताल के प्रमुख खालिद बुखारी ने बताया कि उनके अस्पताल में देश भर से ऐसे मरीज पहुंचते हैं, जिनकी हालत फर्जी डॉक्टरों के गलत इलाज से खराब हो चुकी होती है। उन्होंने कहा कि अस्पताल पहले से ही मरीजों से भरा हुआ है और ज्यादातर गंभीर मामले इन्हीं गलत इलाज का नतीजा होते हैं।
समाधान भी मुश्किल
सिंध हेल्थकेयर कमीशन के प्रमुख अहसन कवी सिद्दीकी ने माना कि इस समस्या को काबू में करना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि संसाधन सीमित हैं। अगर 25 क्लिनिक बंद की जाती हैं तो अगले ही दिन 25 नई खुल जाती हैं। हाल ही में कराची में एक ऐसा बंगला सील किया गया, जो बिना रजिस्ट्रेशन के पूरे अस्पताल की तरह चल रहा था, जिसमें बच्चों और बड़ों के लिए आईसीयू तक थे। सिद्दीकी ने बताया कि देश का कानून कमजोर है। केस दर्ज होते हैं, लेकिन आरोपी अगले दिन जमानत पर छूट जाते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जांच टीमों को कई बार गंभीर सुरक्षा खतरे झेलने पड़ते हैं। कई इलाकों में टीमों को बंधक बना लिया जाता है और फायरिंग तक होती है।
वेनेजुएला ऑपरेशन में सीक्रेट सोनिक वेपन के उपयोग से रूस और चीन का बढ़ा टेंशन
24 Jan, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक सनसनीखेज खुलासा करते हुए पहली बार सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के लिए किए गए सैन्य ऑपरेशन में अमेरिकी सेना ने एक अत्यंत गुप्त सोनिक हथियार (ध्वनि हथियार) का इस्तेमाल किया था। एक टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने इस हथियार के विवरण को गोपनीय रखते हुए इसके प्रभाव को ‘अद्भुत’ और ‘अकल्पनीय’ बताया। ट्रंप के इस बयान ने न केवल वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों को चौंका दिया है, बल्कि रूस और चीन जैसे देशों को भी गहरे तनाव और अलर्ट मोड पर ला खड़ा किया है। राष्ट्रपति ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका के पास आज ऐसी सैन्य तकनीक और हथियार मौजूद हैं, जिनके बारे में बाकी दुनिया कल्पना तक नहीं कर सकती।
इस रहस्यमय हथियार को लेकर अटकलें उसी समय से लगाई जा रही थीं, जब व्हाइट हाउस की ओर से मादुरो के ठिकाने पर हुए हमले के विवरण साझा किए गए थे। बताया गया था कि ऑपरेशन के दौरान वेनेजुएलाई सैनिकों को अचानक ऐसी शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ा जो सामान्य युद्ध में नहीं देखी जातीं। चश्मदीदों के अनुसार, जैसे ही वह गुप्त डिवाइस सक्रिय की गई, हवा में एक तेज लहर जैसी आवाज गूंजी, जिसने सैनिकों के मानसिक और शारीरिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया। हमले की चपेट में आए कई सैनिकों की नाक और मुंह से खून बहने लगा, उन्हें भीषण उल्टियां होने लगीं और ऐसा महसूस हुआ मानो उनका सिर अंदर से फट रहा हो। गवाहों के मुताबिक, सैनिक खड़े रहने की स्थिति में भी नहीं थे और बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़े।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोनिक वेपन बेहद उच्च तीव्रता वाली ध्वनि तरंगों का उपयोग करते हैं। ये तरंगें मानव शरीर के आंतरिक अंगों, विशेषकर कानों और मस्तिष्क के संतुलन केंद्र पर सीधा प्रहार करती हैं। इससे व्यक्ति को भारी भ्रम, संतुलन बिगड़ना, असहनीय सिरदर्द और कभी-कभी अंगों के फटने जैसी गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानूनों में इन हथियारों पर कोई सीधा प्रतिबंध नहीं है, लेकिन इनके दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई है। वेनेजुएला के आंतरिक मंत्री के दावों के अनुसार, इस ऑपरेशन में लगभग सौ लोगों की मौत हुई है, और अब जांच इस बात पर केंद्रित है कि इनमें से कितनी मौतें सीधे तौर पर इस ध्वनि हथियार के कारण हुईं।
ट्रंप के इस कबूलनामे के बाद क्रेमलिन (रूस) ने अपनी विशेष एजेंसियों को सक्रिय कर दिया है। रूस अब इस नई तकनीक की वास्तविकता और इसकी काट खोजने की कोशिश में जुटा है। दूसरी ओर, ट्रंप ने इस पूरे सैन्य ऑपरेशन को जायज ठहराते हुए कहा कि निकोलस मादुरो अमेरिका की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस सैन्य कार्रवाई के बाद अब अमेरिका वेनेजुएला के विशाल तेल क्षेत्रों के पुनर्निर्माण और विकास में सक्रिय भूमिका निभाएगा। ट्रंप ने नए वेनेजुएला का विजन पेश करते हुए कहा कि इस बदलाव से न केवल दक्षिण अमेरिका में स्थिरता आएगी, बल्कि अमेरिका को भी इसका बड़ा आर्थिक लाभ मिलेगा। फिलहाल, दुनिया भर की सैन्य एजेंसियां अब उस गुप्त गूंज के पीछे के विज्ञान को समझने की कोशिश कर रही हैं जिसने एक सत्ता का तख्तापलट कर दिया।
क्रोएशिया में भारतीय दूतावास पर खालिस्तानी समर्थकों का हमला: भारत ने दर्ज कराया कड़ा विरोध
23 Jan, 2026 07:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जाग्रेब। कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के बाद अब खालिस्तानी कट्टरपंथियों ने पूर्वी यूरोप में अपनी हिंसक गतिविधियों का विस्तार करना शुरू कर दिया है। एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाली घटना में, क्रोएशिया की राजधानी जाग्रेब स्थित भारतीय दूतावास को खालिस्तानी समर्थकों ने अपना निशाना बनाया है। गणतंत्र दिवस से ठीक पहले हुई इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। भारत सरकार ने इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए क्रोएशियाई प्रशासन के समक्ष अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
जानकारी के अनुसार, प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिख्स फॉर जस्टिस (एसएफजे) से जुड़े कुछ असामाजिक तत्वों ने जाग्रेब में भारतीय दूतावास की सुरक्षा का उल्लंघन किया। इन उपद्रवियों ने न केवल दूतावास परिसर में जबरन घुसने का प्रयास किया, बल्कि वहां जमकर तोड़फोड़ भी की। प्रत्यक्षदर्शियों और अधिकारियों के मुताबिक, इन खालिस्तानी समर्थकों ने दूतावास की दीवारों पर भारत विरोधी नारे लिखे और वहां गर्व से लहरा रहे भारतीय तिरंगे को उतारकर उसकी जगह खालिस्तानी झंडा लगाने की कोशिश की। यह घटना उस समय हुई है जब भारत अपने गणतंत्र दिवस समारोह की तैयारियों में जुटा है और यूरोपीय संघ के कई प्रमुख नेता भारत के दौरे पर आने वाले हैं।
भारत ने इस अनधिकृत प्रवेश और तोड़फोड़ की घटना की बृहस्पतिवार को तीखी निंदा की। विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि नई दिल्ली और जाग्रेब दोनों ही स्तरों पर क्रोएशियाई अधिकारियों के समक्ष यह मामला मजबूती से उठाया गया है। भारत ने स्पष्ट शब्दों में मांग की है कि इस निंदनीय और अवैध कृत्य के लिए जिम्मेदार दोषियों को तुरंत पहचान कर उन्हें कानून के कटघरे में खड़ा किया जाए। मंत्रालय ने विएना संधि का हवाला देते हुए याद दिलाया कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत किसी भी राजनयिक परिसर की सुरक्षा सुनिश्चित करना मेजबान देश की प्राथमिक जिम्मेदारी है और बिना अनुमति के वहां प्रवेश वर्जित है।
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में आगे कहा कि इस तरह की घटनाएं उन लोगों के हिंसक चरित्र और नापाक इरादों को उजागर करती हैं जो भारत की संप्रभुता के खिलाफ साजिश रच रहे हैं। भारत ने वैश्विक स्तर पर कानून प्रवर्तन अधिकारियों से ऐसी घटनाओं का संज्ञान लेने की अपील की है। यह हमला इसलिए भी अधिक चिंताजनक माना जा रहा है क्योंकि अब तक ऐसी गतिविधियां मुख्य रूप से फाइव आईज समूह के देशों तक ही सीमित थीं। क्रोएशिया जैसे यूरोपीय संघ के सदस्य देश में इस तरह का हमला यह संकेत देता है कि ये आतंकी समूह अब नए ठिकानों पर अपना नेटवर्क फैला रहे हैं। खुफिया एजेंसियों के अनुसार, आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर अशांति फैलाने के लिए अपने गुर्गों को उकसाया है, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं।
ट्रंप बोले- ईरान की तरफ सेना भेजी है, उधर से जवाब आया होश में रहें श्रीमान… उंगलियां ट्रिगर पर हैं
23 Jan, 2026 06:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आए दिन किसी न किसी देश को धमका रहे हैं। उनकी नीतियों ने पूरी दुनिया में उथल-पुथल मचा दी। ईरान को धमकाते हुए कह दिया कि बड़ी सेना ईरान की तरफ भेजी। ट्रंप का इतना कहना ही था कि उधर से जवाब आया कि होश में रहे श्रीमान… इधर उंगलियां ट्रिगर पर हैं। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर ने अमेरिका को चेतावनी दी कि उनकी उंगलियां ट्रिगर पर ही हैं। ईरानी गार्ड्स कमांडर जनरल मोहम्मद पाकपुर ने इजरायल और अमेरिका को चेतावनी दी कि ऐतिहासिक अनुभवों और पिछले साल हुए युद्ध से उन्हें सीख लेनी चाहिए ताकि उन्हें कोई भी गलतफहमी ना हो और उससे भी अधिक दर्दनाक और हश्र का सामना न करना पड़े। उन्होंने लिखित बयान में कहा, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स और डियर ईरान की उंगली ट्रिगर पर ही है। वे पहले से कहीं अधिक तैयार है।
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहकर हलचल मचा दी है कि एक बहुत बड़ी सेना ईरान की ओर बढ़ रही है। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम से लौटते समय, ट्रंप ने एयर फॉर्स वन पर पत्रकारों से कहा कि अमेरिका सिर्फ एहतियात के तौर पर ईरान की ओर एक विशाल बेड़ा भेज रहा है। उन्होंने कहा, मैं नहीं चाहता कि कुछ भी हो लेकिन हम उन पर बहुत करीब से नजर रख रहे हैं। इससे पहले दोनों देशों के बीच धमकियों का दौर जारी है। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की धमकी के बाद बीते मंगलवार को कहा है कि अगर ईरान ने उनकी हत्या कराई तो अमेरिका ईरान का नामोनिशान मिटा देगा। ट्रंप ने एक इंटरव्यू में कहा, मेरे बहुत सख्त निर्देश हैं कि अगर कुछ होता है तो वे उन्हें नक्शे से मिटा देंगे। इससे पहले ईरान ने ट्रंप को देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई करने पर चेतावनी दी थी। ईरान के सशस्त्र बलों के प्रवक्ता जनरल अबुलफजल शेकारची ने कहा, ट्रंप जानते हैं कि अगर हमारे नेता की ओर हाथ भी बढ़ाया गया तो हम न केवल उस हाथ को काट देंगे बल्कि उनकी दुनिया में आग लगा देंगे। बता दें कि ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका सहित कई देशों ने एक आतंकवादी संगठन के रूप में चिन्हित किया है और इस पर प्रतिबंधित भी लगाए गए हैं। ईरान में जारी हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान भी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स द्वारा क्रूरता की खबरें सामने आई हैं। इस बीच एक अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, जनरल अली अब्दुल्लाही अलीबादी, जो ईरानी संयुक्त कमान मुख्यालय का नेतृत्व करते हैं, ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने हमला किया, तो अमेरिका के सभी ठिकाने ईरान के सशस्त्र बलों के लिए वैध लक्ष्य होंगे।
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