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बांग्लादेश में अमेरिका का नया दांव- जमात-ए-इस्लामी से बढ़ाई नजदीकियां
25 Jan, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। बांग्लादेश के बदलते राजनीतिक परिदृश्य के बीच अमेरिका की एक कथित नई रणनीति ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। कट्टरपंथ के खिलाफ वैश्विक स्तर पर सख्त रुख अपनाने वाला अमेरिका अब बांग्लादेश की प्रमुख इस्लामी पार्टी, जमात-ए-इस्लामी को साधने की कोशिश करता नजर आ रहा है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ढाका में तैनात एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक की कुछ महिला पत्रकारों के साथ बंद कमरे में हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने आई है, जिसमें जमात-ए-इस्लामी के प्रति अमेरिका के बदलते रुख के संकेत मिलते हैं। इस बातचीत में राजनयिक ने स्वीकार किया कि बांग्लादेश धीरे-धीरे इस्लामिक शिफ्ट की ओर बढ़ रहा है और आगामी 12 फरवरी को होने वाले चुनावों में जमात-ए-इस्लामी अपने अब तक के सबसे शानदार प्रदर्शन की ओर अग्रसर हो सकती है। अमेरिकी राजनयिक ने यहाँ तक कहा कि अमेरिका चाहता है कि जमात उसके दोस्त बने और उन्होंने पत्रकारों को सुझाव दिया कि पार्टी की प्रभावशाली छात्र इकाई, इस्लामी छात्र शिबिर को मीडिया में उचित स्थान दिया जाना चाहिए।
जमात-ए-इस्लामी का इतिहास बांग्लादेश में काफी विवादास्पद रहा है। यह वही संगठन है जिसने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का पुरजोर विरोध किया था और लंबे समय तक इस पर प्रतिबंध लगा रहा। पार्टी शरिया आधारित शासन की कट्टर समर्थक रही है और उस पर अक्सर पाकिस्तान समर्थक रुख अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में जमात ने अपनी छवि बदलने की कोशिश की है और खुद को भ्रष्टाचार विरोधी व सुधार केंद्रित दल के रूप में पेश कर रही है ताकि मुख्यधारा के मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ा सके। अमेरिकी राजनयिक ने बैठक में यह भी स्पष्ट किया कि यदि जमात सत्ता में आने के बाद महिलाओं पर पाबंदियां लगाने या शरिया कानून थोपने जैसे चरम कदम उठाती है, तो अमेरिका मूकदर्शक नहीं बना रहेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे किसी भी प्रयास की स्थिति में अमेरिका अपने आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल करेगा और बांग्लादेश पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लगा सकता है, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।
हालांकि, इस विवाद के तूल पकड़ने के बाद ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि यह एक सामान्य और अनौपचारिक चर्चा थी और अमेरिका किसी विशेष राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करता। दूसरी ओर, जमात के प्रवक्ताओं ने भी इसे एक व्यक्तिगत अवलोकन मात्र बताकर खारिज करने की कोशिश की है। लेकिन अमेरिका की इस कथित गुप्त कूटनीति ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत लंबे समय से जमात-ए-इस्लामी को क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में देखता रहा है, विशेषकर उसके पाकिस्तान के साथ कथित संबंधों और कट्टरपंथी विचारधारा के कारण। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध पहले से ही तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में अमेरिका का जमात के साथ सहयोग बढ़ाना भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंधों में एक नई दरार पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि अटलांटिक काउंसिल जैसे संस्थानों की राय में बांग्लादेश को लेकर भारत की सबसे बड़ी चिंता हमेशा से जमात रही है। यदि वाशिंगटन अपनी नीति में बदलाव करते हुए जमात-ए-इस्लामी को राजनीतिक मुख्यधारा में वैधता दिलाने में मदद करता है, तो इसका असर केवल बांग्लादेश की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। यह दक्षिण एशिया के पूरे भू-राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करेगा और भारत के लिए अपनी सीमाओं पर सुरक्षा चुनौतियों को और अधिक जटिल बना सकता है। कुल मिलाकर, अमेरिका की यह नई पहल एक ऐसे मोड़ पर आई है जहाँ बांग्लादेश अपनी लोकतांत्रिक पहचान और बढ़ते धार्मिक प्रभाव के बीच संघर्ष कर रहा है।
मैक्रों ने नहीं मानी बात, ट्रंप ने वाइन-शैंपेन पर 200 फीसदी टैरिफ लगाने की दी धमकी
25 Jan, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लंदन,। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में फ्रांस की वाइन और शैंपेन पर 200 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी दी है। यह धमकी तब सामने आई जब फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों गाजा को लेकर बनाए गए बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने से इनकार कर दिया। हालांकि, इससे पहले भी मार्च 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस और यूरोपीय संघ के अन्य देशों से आने वाली वाइन, शैम्पेन और दूसरी शराब पर 200 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी दी थी। उस समय ट्रंप ने दावा किया था कि यूरोपीय संघ दुनिया की सबसे मनमानी टैक्स और टैरिफ लगाने वाली संस्थाओं में से एक है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस का अल्कोहलिक ड्रिंक्स मार्केट करीब 69 बिलियन डॉलर का है और 2032 तक यह 73 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। 2025 में बिक्री की मात्रा घटी, लेकिन महंगाई और कीमत बढ़ने से इसकी वैल्यू बढ़ी। हालांकि, एक नया ट्रेंड सामने आया है जिसके मुताबिक अब लोग ज्यादा मात्रा की बजाय अच्छी क्वालिटी की शराब पीना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। पेरिस ओलंपिक और बढ़ते पर्यटन से होटल, बार और रेस्टोरेंट में भी बिक्री को बढ़ावा मिला है। साथ ही सुपरमार्केट, दुकानों का दबदबा है, कुल बिक्री का करीब 70फीसदी यहीं से होता है। बार, क्लब, रेस्टोरेंट की बिक्री भी धीरे-धीरे बढ़ रही है, साथ ही लोग अब छोटे पैक और सस्ती शराब ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक नो और लो-अल्कोहल ड्रिंक्स की मांग तेजी से बढ़ रही है। साथ ही सबसे ज्यादा वाइन की मांग बढ़ी है। 45 फीसदी मांग वाइन की ही है। महंगी शैम्पेन और कॉन्यैक की बिक्री घटी, लेकिन सस्ती वाइन और बैग-इन-बॉक्स पैक लोकप्रिय हुए। फ्रांस के अल्कोहल बाजार में बड़े खिलाड़ी हैं। बता दें फ्रांस की शराब सैकड़ों साल पुरानी परंपरा से बनती है। यहां शराब सिर्फ ड्रिंक नहीं, बल्कि कला मानी जाती है। अंगूर कहां उगे, मिट्टी कैसी है, मौसम क्या है- सब कुछ स्वाद तय करता है। इसे टेरॉईर कहा जाता है, जो फ्रांस की सबसे बड़ी पहचान है।
बता दें फ्रेंच शराब को दुनिया में लग्जरी प्रोडक्ट माना जाता है। अमेरिकी और यूरोपीय अमीर वर्ग में फ्रेंच शराब स्टेटस सिंबल है। यही वजह है कि इनकी कीमत और मुनाफा बहुत ज्यादा होता है। फ्रांस में शराब बनाने के सख्त कानून हैं। कौन-सा अंगूर, किस इलाके में, कैसे उगेगा सब तय है। अमेरिका समेत कई देश वैसी क्वालिटी बनाना चाहते हैं, लेकिन वही स्वाद और पहचान नहीं बना पाते हैं। अमेरिका फ्रेंच शराब का सबसे बड़ा खरीदार है, साथ ही अमेरिका बड़ी तादाद में फ्रांस से वाइन भी खरीदता है।
ईरान नहीं बनाएगा परमाणु हथियार, ट्रंप की धमकी पर बोला – हम हर चीज के लिए तैयार
24 Jan, 2026 12:56 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Iran News : अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच ईरान के सुप्रीम लीडर के भारतीय प्रतिनिधि डॉक्टर अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार बनाने का इरादा नहीं रखता, क्योंकि इस्लाम में इसे ‘हराम’ माना जाता है।
एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि ईरान परमाणु ऊर्जा का उपयोग केवल मानवीय जरूरतों और शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए करना चाहता है। उनका दावा है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम मानव कल्याण से जुड़ा है और हथियार बनाने से उसका कोई संबंध नहीं है।
हकीम इलाही ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगातार कड़ी निगरानी और प्रतिबंध लगाए गए हैं, जबकि अन्य देशों पर समान नियम लागू नहीं किए जाते।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकी पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के बयान नए नहीं हैं और ईरान पहले भी ऐसी बातें सुन चुका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान हर स्थिति के लिए तैयार है।
इसके अलावा, ईरान में इंटरनेट बंद किए जाने को लेकर भी उन्होंने सफाई दी। उन्होंने कहा कि हिंसा के दौरान शांति बहाल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट अस्थायी रूप से बंद किया गया था, जबकि देश के भीतर लोकल इंटरनेट सेवाएं चालू रखी गईं।
खुदाई में मिले 6000 साल पुराने विशाल समुद्री शंख
24 Jan, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मैड्रिड । स्पेन के कैटेलोनिया क्षेत्र में की गई खुदाई के दौरान 6000 साल पुराने विशाल समुद्री शंख मिले हैं, जिनका इस्तेमाल उस दौर में लंबी दूरी तक संदेश पहुंचाने के लिए किया जाता था। स्पेन के पुरातत्वविदों की इस खोज ने आधुनिक विज्ञान को भी हैरान कर दिया है। ये शंख केवल सजावटी वस्तुएं नहीं थे, बल्कि प्राचीन खेती करने वाले समुदायों की एक प्रभावशाली और संगठित संचार प्रणाली का अहम हिस्सा थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन शंखों से निकली आवाज आज भी इतनी तेज और स्पष्ट है कि वह पूरी घाटी में गूंज सकती है और जमीन के नीचे बनी गहरी खानों तक आसानी से पहुंच सकती है। रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने इन प्राचीन शंखों को फिर से बजाकर उनकी ध्वनि क्षमता का परीक्षण किया। अध्ययन में सामने आया कि ‘कैरोनिया लैम्पस’ नामक बड़े समुद्री घोंघों के शंखों से बनाए गए ये हॉर्न 100 डेसीबल से भी ज्यादा तेज आवाज पैदा कर सकते हैं। पांच अलग-अलग पुरातात्विक स्थलों से मिले 12 शंखों में से आठ आज भी पूरी तरह काम कर रहे हैं। सबसे अच्छी स्थिति में पाए गए एक शंख से 111.5 डेसीबल तक की आवाज दर्ज की गई, जो लगभग एक कार के हॉर्न के बराबर मानी जाती है। खुले मैदानों और पहाड़ी इलाकों में ऐसी आवाज को कई किलोमीटर दूर तक सुना जा सकता था। ये शंख केवल एक ही तरह की जगहों से नहीं मिले हैं। वैज्ञानिकों को ये खेतों, गुफाओं और जमीन के नीचे बनी खानों में भी मिले हैं, जो लगभग 10 किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हुए थे।
इससे यह संकेत मिलता है कि यह किसी एक स्थान की सीमित परंपरा नहीं थी, बल्कि पूरे इलाके में अपनाई गई एक साझा सांस्कृतिक और व्यावहारिक प्रणाली थी। पहाड़ी और गुफाओं वाले क्षेत्रों में, जहां दूर तक देख पाना मुश्किल होता था, वहां ये शंख सूचना भेजने का सबसे भरोसेमंद माध्यम रहे होंगे। गहरी खानों में इनकी गूंज से सुरक्षा संकेत या चेतावनी देने का काम भी लिया जाता रहा होगा। शोध में यह भी सामने आया है कि प्राचीन कारीगरों ने इन शंखों को बेहद सोच-समझकर तैयार किया था। शंख के ऊपरी हिस्से को हटाकर लगभग 20 मिलीमीटर चौड़ा एक विशेष माउथपीस बनाया गया था, जिससे निकलने वाली आवाज स्थिर और नियंत्रित रहती थी। कुछ शंखों में छोटे छेद भी मिले हैं, जिनसे लगता है कि इन्हें डोरी के सहारे लटकाकर या साथ ले जाकर इस्तेमाल किया जाता था। इन पर समुद्री जीवों द्वारा किए गए प्राकृतिक छेद और निशान भी मिले हैं, जो यह साबित करते हैं कि इन्हें भोजन के लिए नहीं, बल्कि ध्वनि उत्पन्न करने के उद्देश्य से चुना गया था।
परीक्षणों में यह भी स्पष्ट हुआ कि ये शंख केवल एक ही तरह की आवाज तक सीमित नहीं थे। कुछ शंखों से तीन अलग-अलग सुर निकाले जा सकते थे, जो संगीत की दृष्टि से सटीक और बार-बार दोहराए जा सकने योग्य थे। एक पेशेवर ट्रम्पेट वादक की मदद से इन शंखों की ध्वनिक क्षमता को मापा गया, जिससे यह साबित हुआ कि पाषाण काल के लोग केवल रस्मों तक सीमित नहीं थे, बल्कि व्यावहारिक जरूरतों के लिए भी अत्यंत उन्नत उपकरणों का उपयोग करते थे। हालांकि इस खोज के साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ा है। ईसा पूर्व 3600 के आसपास इस संचार तकनीक का इस्तेमाल अचानक बंद हो गया। कांस्य युग के बाद के स्तरों में इन शंखों के कोई प्रमाण नहीं मिलते।
चंद्रमा पर परमाणु फिशन रिएक्टर तैनात करेगा अमेरिका
24 Jan, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन । अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने मिलकर चंद्रमा पर परमाणु फिशन आधारित पावर सिस्टम स्थापित करने की प्रक्रिया को औपचारिक रूप से आगे बढ़ा दिया है। इस योजना का उद्देश्य 2030 तक चांद की सतह पर एक ऐसा रिएक्टर तैनात करना है, जो वहां स्थायी मानव और रोबोटिक मिशनों को लगातार बिजली उपलब्ध करा सके। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब चीन और रूस भी संयुक्त रूप से चंद्रमा पर परमाणु रिएक्टर विकसित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जिससे अंतरिक्ष में वैश्विक प्रतिस्पर्धा और तीखी हो गई है। यह परियोजना नासा के महत्वाकांक्षी आर्टेमिस अभियान और भविष्य के मंगल मिशनों की आधारशिला मानी जा रही है। नासा और ऊर्जा विभाग के बीच इस सहयोग को एक औपचारिक समझौते के जरिए मजबूत किया गया है, जिसका मकसद अंतरिक्ष विज्ञान में अमेरिका के नेतृत्व को बनाए रखना और चंद्रमा पर लंबे समय तक टिकाऊ मौजूदगी के लिए भरोसेमंद ऊर्जा ढांचा तैयार करना है। अधिकारियों का मानना है कि बिना स्थिर और शक्तिशाली ऊर्जा स्रोत के चंद्रमा पर स्थायी बेस बनाना और वहां निरंतर मिशन चलाना संभव नहीं होगा।
इस योजना के तहत फिशन सरफेस पावर सिस्टम विकसित किया जा रहा है, जो चंद्रमा की कठोर परिस्थितियों में भी लगातार बिजली देने में सक्षम होगा। चांद पर लंबे समय तक अंधकार, अत्यधिक ठंड और तापमान में भारी उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियां रहती हैं, जहां सौर ऊर्जा हमेशा भरोसेमंद विकल्प नहीं बन पाती। ऐसे में परमाणु फिशन आधारित सिस्टम वर्षों तक बिना रिफ्यूलिंग के काम कर सकता है और 24 घंटे बिजली उपलब्ध करा सकता है। यही कारण है कि इसे भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। नासा प्रशासक जेरेड आइज़ैकमैन ने साफ कहा है कि अमेरिका अब केवल चांद पर लौटने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वहां टिके रहने और आगे मंगल तक पहुंचने की ठोस तैयारी कर रहा है। उनके अनुसार, राष्ट्रीय अंतरिक्ष नीति के तहत परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल अनिवार्य हो गया है, क्योंकि यही तकनीक गहरे अंतरिक्ष अभियानों को व्यवहारिक और टिकाऊ बना सकती है।
नासा और ऊर्जा विभाग के बीच यह सहयोग अंतरिक्ष अन्वेषण के एक नए युग की शुरुआत करेगा। अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने भी इस समझौते को अमेरिका की वैज्ञानिक विरासत से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि जब-जब अमेरिकी विज्ञान और नवाचार ने एकजुट होकर काम किया है, तब-तब देश ने असंभव माने जाने वाले लक्ष्य हासिल किए हैं। मैनहैटन प्रोजेक्ट से लेकर अपोलो मिशन तक इसका इतिहास गवाह है। उनके मुताबिक, मौजूदा ‘अमेरिका फर्स्ट स्पेस पॉलिसी’ के तहत यह पहल उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है।
किसान को खेत में मिला 17वीं सदी का चांदी का खजाना
24 Jan, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वारसॉवारसॉ। पोलैंड के उत्तरी हिस्से में स्थित गांव बुकोविएत्स विएल्की के खेत में जुताई के दौरान ऐतिहासिक रहस्य सामने आया है, जिसे देखकर वैज्ञानिक चौक गए हैं। सामने आए इस रहस्य ने सदियों पुराने अतीत की परतें खोल दीं। अपने खेत से पत्थर हटाने के लिए एक किसान दंपती जब फावड़ा चला रहे थे, तभी मिट्टी के नीचे से चमकती चांदी ने उन्हें चौंका दिया। थोड़ी ही देर में यह साफ हो गया कि यह कोई साधारण खोज नहीं, बल्कि 17वीं सदी का एक पूरा खजाना है। यह खोज पोलैंड के वार्मियन-मसूरियन क्षेत्र में हुई, जहां पहले कभी किसी बड़े ऐतिहासिक स्थल के संकेत नहीं मिले थे। जमीन के नीचे करीब 350 साल पुराना 162 चांदी के सिक्कों का खजाना दबा हुआ था। सिक्कों को देखकर विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया कि यह खजाना 1660 से 1679 के बीच का है, यानी उस दौर का जब पोलैंड-लिथुआनिया राष्ट्रमंडल राजनीतिक अस्थिरता, युद्धों और सामाजिक उथल-पुथल से गुजर रहा था। यही वजह मानी जा रही है कि किसी ने अपनी दौलत को जमीन में छिपाने का फैसला किया होगा।
खजाने में अलग-अलग मूल्य और प्रकार के सिक्के मिले हैं, जिनमें थैलर, टिम्फ, ऑर्ट और शोस्ताक शामिल हैं। सभी सिक्के चांदी के बने हुए हैं और कई पर आज भी टकसाल के निशान साफ दिखाई देते हैं। पुरातत्वविदों के मुताबिक सिक्के किसी मिट्टी के बर्तन में रखे गए थे, जिसके टूटे हुए अवशेष भी खुदाई स्थल से मिले हैं। सिक्कों का ज्यादा गहराई में न दबा होना इस बात की ओर इशारा करता है कि इन्हें जल्दबाजी में छिपाया गया होगा। सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इसे किसने दफनाया और वह व्यक्ति या परिवार दोबारा इसे लेने क्यों नहीं लौटा। इतिहासकारों का मानना है कि यह खजाना किसी अमीर परिवार, स्थानीय जमींदार या व्यापारी का हो सकता है, जिसने युद्ध, लूटपाट या असुरक्षा के डर से अपनी संपत्ति जमीन में छिपा दी हो। उस समय क्षेत्र में संघर्ष आम बात थी और ऐसे में अपनी जमा-पूंजी को सुरक्षित रखने का यह तरीका अक्सर अपनाया जाता था।
दुर्भाग्यवश, संभव है कि खजाने का मालिक किसी युद्ध, बीमारी या पलायन का शिकार हो गया हो। खुदाई के दौरान सिर्फ सिक्के ही नहीं मिले, बल्कि मस्कट की गोलियां, पुराने बटन, बेल्ट की बकल, अंगूठियां और धार्मिक पदक भी बरामद किए गए हैं। इनमें एक पदक पर ब्लैक मैडोना ऑफ चेंस्टोहोवा और एक संरक्षक देवदूत की आकृति उकेरी गई है, जो उस समय की धार्मिक आस्था को दर्शाती है। इसके अलावा पत्थर से बनी एक पुरानी इमारत के अवशेष भी मिले हैं, जो किसी जमींदारी हवेली या बड़े कृषि परिसर की ओर इशारा करते हैं। इससे यह अनुमान और मजबूत होता है कि खजाना उसी घराने से जुड़ा था। पोलैंड के कानून के अनुसार, इस तरह की ऐतिहासिक खोज सरकार की संपत्ति मानी जाती है। इसलिए पूरा खजाना अब म्यूजियम ऑफ द बॉर्डरलैंड इन ड्जियाल्दोवो को सौंप दिया गया है।
अब चीन अमेरिका के गेराल्ड आर फोर्ड से भी बड़ा न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट बनाएगा?
24 Jan, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
बीजिंग। चीन का नई एयरक्राफ्ट कैरियर फुजियान नवंबर 2025 में आधिकारिक रूप से सेवा में शामिल हो गई है और इसे बीजिंग की तेजी से बढ़ती समुद्री ताकत का प्रतीक माना जा रहा है। करीब 80 हजार टन वजनी यह पोत चीन का पहला पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन वाला विमानवाहक पोत है, जिसमें आधुनिक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट सिस्टम लगे हैं। इसे दुनिया का सबसे बड़ा पारंपरिक ईंधन से संचालित युद्धपोत भी बताया गया, लेकिन हालिया तकनीकी आकलनों में इसके डिजाइन से जुड़ी खामियां सामने आई हैं। इन्हीं कमियों ने अब चीन को इससे कहीं बड़े और न्यूक्लियर एनर्जी पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर के विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर दिया है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सैन्य विशेषज्ञों और स्वतंत्र विश्लेषकों के मुताबिक फुजियान की सबसे बड़ी समस्या इसके फ्लाइट डेक लेआउट से जुड़ी है। अमेरिकी सुपरकैरियर्स के विपरीत, फुजियान का ‘आइलैंड सुपरस्टक्चर’ फ्लाइट डेक के बीचों-बीच स्थित है, जबकि अमेरिकी जहाजों में इसे पीछे की ओर रखा जाता है। इस डिजाइन के कारण विमानों की पार्किंग और आवाजाही के लिए उपलब्ध जगह सीमित हो जाती है, जिससे तेज गति से उड़ान संचालन में बाधा आती है। नतीजतन, फाइटर जेट के टेक-ऑफ और डेक पर मूवमेंट के दौरान दिक्कतें सामने आ रही हैं।
कैटापल्ट सिस्टम की स्थिति ने इन समस्याओं को और बढ़ा दिया है। फुजियान में मौजूद इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम भले ही अत्याधुनिक हो, लेकिन इनमें से एक कैटापल्ट लैंडिंग जोन में हस्तक्षेप करता है, जिससे लैंडिंग के समय उसका उपयोग संभव नहीं हो पाता। वहीं एक अन्य कैटापल्ट विमान लिफ्ट के बेहद पास स्थित है, जो एक ‘चोक पॉइंट’ बनाता है। माना जा रहा है कि निर्माण में भाप चालित कैटापल्ट से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिस्टम में बदलाव के कारण ये समझौते किए गए, जिनका सीधा असर पूरे फ्लाइट डेक ऑपरेशन पर पड़ा। इसके एंगल्ड फ्लाइट डेक की चौड़ाई और गहराई भी अमेरिकी डिजाइनों से कम बताई जा रही है, जिससे खराब मौसम और उबड़-खाबड़ समुद्री हालात में विमान उतारना और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
रिपोर्टों के मुताबिक इन समस्याओं की जड़ पारंपरिक ईंधन से चलने वाला प्रोपल्शन सिस्टम है। बड़े एग्जॉस्ट फनल और इंजन रूम के कारण आइलैंड और लिफ्ट की स्थिति सीमित हो जाती है, जिससे फ्लाइट डेक का प्रवाह बाधित होता है। इसके उलट न्यूक्लियर एनर्जी पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर में ऐसे भारी प्रोपल्शन सिस्टम की जरूरत नहीं होती। इससे डिजाइनरों को आइलैंड को पीछे खिसकाने, कैटापल्ट को बेहतर ढंग से लगाने और डेक को ज्यादा खुला बनाने की आजादी मिलती है। अब चीन अमेरिका के गेराल्ड आर फोर्ड क्लास से भी बड़ा न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है। माना जा रहा है कि फुजियान की कमियों से मिले अनुभव के आधार पर चीन अपनी अगली पीढ़ी के विमानवाहक पोत को ज्यादा सक्षम, तेज और रणनीतिक रूप से प्रभावी बनाने की कोशिश करेगा।
पाकिस्तान में 6 लाख फर्जी डॉक्टर कर रहे मरीजों का इलाज; रिपोर्ट
24 Jan, 2026 08:07 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लाहोर। आर्थिक तंगी की मार झेल रहे पाकिस्तान (Pakistan) की हालत इन दिनों बेहद खराब हो गई है। शहबाज शरीफ की सरकार बढ़ती महंगाई को कंट्रोल करने में तो नाकाम है ही, लोग यहां बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरस रहे हैं। हाल ही में यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। एएफपी की एक रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में फर्जी और झोला छाप डॉक्टरों की भरमार हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक हालात ऐसे हैं कि देश भर में लाखों लोग बिना किसी कानूनी इजाजत के मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
रिपोर्ट में पाकिस्तानी मेडिकल एसोसिएशन और सिंध हेल्थकेयर कमीशन के आंकड़ों का हवाला दिया गया है। मेडिकल एसोसिएशन के महासचिव अब्दुल गफ्फार शोरो ने बताया है कि पूरे पाकिस्तान में 6 लाख से ज्यादा फर्जी डॉक्टर काम कर रहे हैं। उनके मुताबिक ऐसे लोग पहले किसी डॉक्टर के साथ काम करते हैं, थोड़ा बहुत सीखते भी नहीं हैं और अपनी क्लिनिक खोल लेते हैं।
महामारी करार
शोरो के मुताबिक फर्जी डॉक्टरों को दवाओं की सही खुराक और साइड इफेक्ट्स की जानकारी नहीं होती। गलत इलाज से मरीजों की हालत और बिगड़ जाती है। उन्होंने कहा कि ये लोग उपकरणों को ठीक से स्टरलाइज नहीं करते, सिर्फ पानी से धोकर दोबारा इस्तेमाल करते हैं। कई जगह सिरिंज भी दोबारा इस्तेमाल की जाती हैं, जिससे हेपेटाइटिस और एड्स जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। उन्होंने इसे पब्लिक हेल्थ के क्षेत्र में महामारी करार दिया है।
मरीजों की और बिगड़ जाती है हालत
गांव के एक निवासी अली अहमद ने बताया कि इलाके में कई ऐसी क्लिनिक हैं, जहां कोई भी योग्य डॉक्टर नहीं है। वहीं लोगों में शिक्षा की कमी है इसलिए वे असली और नकली डॉक्टर में फर्क नहीं कर पाते। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या का सीधा असर पाकिस्तान की पहले से कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ रहा है। कराची के सिविल अस्पताल के प्रमुख खालिद बुखारी ने बताया कि उनके अस्पताल में देश भर से ऐसे मरीज पहुंचते हैं, जिनकी हालत फर्जी डॉक्टरों के गलत इलाज से खराब हो चुकी होती है। उन्होंने कहा कि अस्पताल पहले से ही मरीजों से भरा हुआ है और ज्यादातर गंभीर मामले इन्हीं गलत इलाज का नतीजा होते हैं।
समाधान भी मुश्किल
सिंध हेल्थकेयर कमीशन के प्रमुख अहसन कवी सिद्दीकी ने माना कि इस समस्या को काबू में करना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि संसाधन सीमित हैं। अगर 25 क्लिनिक बंद की जाती हैं तो अगले ही दिन 25 नई खुल जाती हैं। हाल ही में कराची में एक ऐसा बंगला सील किया गया, जो बिना रजिस्ट्रेशन के पूरे अस्पताल की तरह चल रहा था, जिसमें बच्चों और बड़ों के लिए आईसीयू तक थे। सिद्दीकी ने बताया कि देश का कानून कमजोर है। केस दर्ज होते हैं, लेकिन आरोपी अगले दिन जमानत पर छूट जाते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जांच टीमों को कई बार गंभीर सुरक्षा खतरे झेलने पड़ते हैं। कई इलाकों में टीमों को बंधक बना लिया जाता है और फायरिंग तक होती है।
वेनेजुएला ऑपरेशन में सीक्रेट सोनिक वेपन के उपयोग से रूस और चीन का बढ़ा टेंशन
24 Jan, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक सनसनीखेज खुलासा करते हुए पहली बार सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के लिए किए गए सैन्य ऑपरेशन में अमेरिकी सेना ने एक अत्यंत गुप्त सोनिक हथियार (ध्वनि हथियार) का इस्तेमाल किया था। एक टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने इस हथियार के विवरण को गोपनीय रखते हुए इसके प्रभाव को ‘अद्भुत’ और ‘अकल्पनीय’ बताया। ट्रंप के इस बयान ने न केवल वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों को चौंका दिया है, बल्कि रूस और चीन जैसे देशों को भी गहरे तनाव और अलर्ट मोड पर ला खड़ा किया है। राष्ट्रपति ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका के पास आज ऐसी सैन्य तकनीक और हथियार मौजूद हैं, जिनके बारे में बाकी दुनिया कल्पना तक नहीं कर सकती।
इस रहस्यमय हथियार को लेकर अटकलें उसी समय से लगाई जा रही थीं, जब व्हाइट हाउस की ओर से मादुरो के ठिकाने पर हुए हमले के विवरण साझा किए गए थे। बताया गया था कि ऑपरेशन के दौरान वेनेजुएलाई सैनिकों को अचानक ऐसी शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ा जो सामान्य युद्ध में नहीं देखी जातीं। चश्मदीदों के अनुसार, जैसे ही वह गुप्त डिवाइस सक्रिय की गई, हवा में एक तेज लहर जैसी आवाज गूंजी, जिसने सैनिकों के मानसिक और शारीरिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया। हमले की चपेट में आए कई सैनिकों की नाक और मुंह से खून बहने लगा, उन्हें भीषण उल्टियां होने लगीं और ऐसा महसूस हुआ मानो उनका सिर अंदर से फट रहा हो। गवाहों के मुताबिक, सैनिक खड़े रहने की स्थिति में भी नहीं थे और बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़े।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोनिक वेपन बेहद उच्च तीव्रता वाली ध्वनि तरंगों का उपयोग करते हैं। ये तरंगें मानव शरीर के आंतरिक अंगों, विशेषकर कानों और मस्तिष्क के संतुलन केंद्र पर सीधा प्रहार करती हैं। इससे व्यक्ति को भारी भ्रम, संतुलन बिगड़ना, असहनीय सिरदर्द और कभी-कभी अंगों के फटने जैसी गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानूनों में इन हथियारों पर कोई सीधा प्रतिबंध नहीं है, लेकिन इनके दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई है। वेनेजुएला के आंतरिक मंत्री के दावों के अनुसार, इस ऑपरेशन में लगभग सौ लोगों की मौत हुई है, और अब जांच इस बात पर केंद्रित है कि इनमें से कितनी मौतें सीधे तौर पर इस ध्वनि हथियार के कारण हुईं।
ट्रंप के इस कबूलनामे के बाद क्रेमलिन (रूस) ने अपनी विशेष एजेंसियों को सक्रिय कर दिया है। रूस अब इस नई तकनीक की वास्तविकता और इसकी काट खोजने की कोशिश में जुटा है। दूसरी ओर, ट्रंप ने इस पूरे सैन्य ऑपरेशन को जायज ठहराते हुए कहा कि निकोलस मादुरो अमेरिका की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस सैन्य कार्रवाई के बाद अब अमेरिका वेनेजुएला के विशाल तेल क्षेत्रों के पुनर्निर्माण और विकास में सक्रिय भूमिका निभाएगा। ट्रंप ने नए वेनेजुएला का विजन पेश करते हुए कहा कि इस बदलाव से न केवल दक्षिण अमेरिका में स्थिरता आएगी, बल्कि अमेरिका को भी इसका बड़ा आर्थिक लाभ मिलेगा। फिलहाल, दुनिया भर की सैन्य एजेंसियां अब उस गुप्त गूंज के पीछे के विज्ञान को समझने की कोशिश कर रही हैं जिसने एक सत्ता का तख्तापलट कर दिया।
क्रोएशिया में भारतीय दूतावास पर खालिस्तानी समर्थकों का हमला: भारत ने दर्ज कराया कड़ा विरोध
23 Jan, 2026 07:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जाग्रेब। कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के बाद अब खालिस्तानी कट्टरपंथियों ने पूर्वी यूरोप में अपनी हिंसक गतिविधियों का विस्तार करना शुरू कर दिया है। एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाली घटना में, क्रोएशिया की राजधानी जाग्रेब स्थित भारतीय दूतावास को खालिस्तानी समर्थकों ने अपना निशाना बनाया है। गणतंत्र दिवस से ठीक पहले हुई इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। भारत सरकार ने इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए क्रोएशियाई प्रशासन के समक्ष अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
जानकारी के अनुसार, प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिख्स फॉर जस्टिस (एसएफजे) से जुड़े कुछ असामाजिक तत्वों ने जाग्रेब में भारतीय दूतावास की सुरक्षा का उल्लंघन किया। इन उपद्रवियों ने न केवल दूतावास परिसर में जबरन घुसने का प्रयास किया, बल्कि वहां जमकर तोड़फोड़ भी की। प्रत्यक्षदर्शियों और अधिकारियों के मुताबिक, इन खालिस्तानी समर्थकों ने दूतावास की दीवारों पर भारत विरोधी नारे लिखे और वहां गर्व से लहरा रहे भारतीय तिरंगे को उतारकर उसकी जगह खालिस्तानी झंडा लगाने की कोशिश की। यह घटना उस समय हुई है जब भारत अपने गणतंत्र दिवस समारोह की तैयारियों में जुटा है और यूरोपीय संघ के कई प्रमुख नेता भारत के दौरे पर आने वाले हैं।
भारत ने इस अनधिकृत प्रवेश और तोड़फोड़ की घटना की बृहस्पतिवार को तीखी निंदा की। विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि नई दिल्ली और जाग्रेब दोनों ही स्तरों पर क्रोएशियाई अधिकारियों के समक्ष यह मामला मजबूती से उठाया गया है। भारत ने स्पष्ट शब्दों में मांग की है कि इस निंदनीय और अवैध कृत्य के लिए जिम्मेदार दोषियों को तुरंत पहचान कर उन्हें कानून के कटघरे में खड़ा किया जाए। मंत्रालय ने विएना संधि का हवाला देते हुए याद दिलाया कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत किसी भी राजनयिक परिसर की सुरक्षा सुनिश्चित करना मेजबान देश की प्राथमिक जिम्मेदारी है और बिना अनुमति के वहां प्रवेश वर्जित है।
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में आगे कहा कि इस तरह की घटनाएं उन लोगों के हिंसक चरित्र और नापाक इरादों को उजागर करती हैं जो भारत की संप्रभुता के खिलाफ साजिश रच रहे हैं। भारत ने वैश्विक स्तर पर कानून प्रवर्तन अधिकारियों से ऐसी घटनाओं का संज्ञान लेने की अपील की है। यह हमला इसलिए भी अधिक चिंताजनक माना जा रहा है क्योंकि अब तक ऐसी गतिविधियां मुख्य रूप से फाइव आईज समूह के देशों तक ही सीमित थीं। क्रोएशिया जैसे यूरोपीय संघ के सदस्य देश में इस तरह का हमला यह संकेत देता है कि ये आतंकी समूह अब नए ठिकानों पर अपना नेटवर्क फैला रहे हैं। खुफिया एजेंसियों के अनुसार, आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर अशांति फैलाने के लिए अपने गुर्गों को उकसाया है, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं।
ट्रंप बोले- ईरान की तरफ सेना भेजी है, उधर से जवाब आया होश में रहें श्रीमान… उंगलियां ट्रिगर पर हैं
23 Jan, 2026 06:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आए दिन किसी न किसी देश को धमका रहे हैं। उनकी नीतियों ने पूरी दुनिया में उथल-पुथल मचा दी। ईरान को धमकाते हुए कह दिया कि बड़ी सेना ईरान की तरफ भेजी। ट्रंप का इतना कहना ही था कि उधर से जवाब आया कि होश में रहे श्रीमान… इधर उंगलियां ट्रिगर पर हैं। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर ने अमेरिका को चेतावनी दी कि उनकी उंगलियां ट्रिगर पर ही हैं। ईरानी गार्ड्स कमांडर जनरल मोहम्मद पाकपुर ने इजरायल और अमेरिका को चेतावनी दी कि ऐतिहासिक अनुभवों और पिछले साल हुए युद्ध से उन्हें सीख लेनी चाहिए ताकि उन्हें कोई भी गलतफहमी ना हो और उससे भी अधिक दर्दनाक और हश्र का सामना न करना पड़े। उन्होंने लिखित बयान में कहा, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स और डियर ईरान की उंगली ट्रिगर पर ही है। वे पहले से कहीं अधिक तैयार है।
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहकर हलचल मचा दी है कि एक बहुत बड़ी सेना ईरान की ओर बढ़ रही है। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम से लौटते समय, ट्रंप ने एयर फॉर्स वन पर पत्रकारों से कहा कि अमेरिका सिर्फ एहतियात के तौर पर ईरान की ओर एक विशाल बेड़ा भेज रहा है। उन्होंने कहा, मैं नहीं चाहता कि कुछ भी हो लेकिन हम उन पर बहुत करीब से नजर रख रहे हैं। इससे पहले दोनों देशों के बीच धमकियों का दौर जारी है। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की धमकी के बाद बीते मंगलवार को कहा है कि अगर ईरान ने उनकी हत्या कराई तो अमेरिका ईरान का नामोनिशान मिटा देगा। ट्रंप ने एक इंटरव्यू में कहा, मेरे बहुत सख्त निर्देश हैं कि अगर कुछ होता है तो वे उन्हें नक्शे से मिटा देंगे। इससे पहले ईरान ने ट्रंप को देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई करने पर चेतावनी दी थी। ईरान के सशस्त्र बलों के प्रवक्ता जनरल अबुलफजल शेकारची ने कहा, ट्रंप जानते हैं कि अगर हमारे नेता की ओर हाथ भी बढ़ाया गया तो हम न केवल उस हाथ को काट देंगे बल्कि उनकी दुनिया में आग लगा देंगे। बता दें कि ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका सहित कई देशों ने एक आतंकवादी संगठन के रूप में चिन्हित किया है और इस पर प्रतिबंधित भी लगाए गए हैं। ईरान में जारी हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान भी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स द्वारा क्रूरता की खबरें सामने आई हैं। इस बीच एक अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, जनरल अली अब्दुल्लाही अलीबादी, जो ईरानी संयुक्त कमान मुख्यालय का नेतृत्व करते हैं, ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने हमला किया, तो अमेरिका के सभी ठिकाने ईरान के सशस्त्र बलों के लिए वैध लक्ष्य होंगे।
स्कूल से लौट रहे 5 साल के बच्चे को, अमेरिकी इमिग्रेशन एजेंटों ने हिरासत में लिया, बवाल
23 Jan, 2026 05:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मिनेसोटा। अमेरिका के मिनेसोटा राज्य में 5 वर्षीय बच्चे को अमेरिकी इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एन्फोर्समेंट (आईसीई) एजेंट्स ने उसके पिता के साथ हिरासत में ले लिया। यह घटना मंगलवार दोपहर को हुई, जब बच्चा प्रीस्कूल से घर लौट रहा था। चलती कार से एजेंट्स ने दोनों को पकड़ा। एजेंट्स ने बच्चे को घर का दरवाजा खटखटाने के लिए कहा ताकि यह पता लगाया जा सके कि घर में कोई और है या नहीं। स्कूल ने इसे बच्चे को चारा के रूप में इस्तेमाल करना बताया है। यह परिवार 2024 में अमेरिका आया था और उन पर एसाइलम का केस चल रहा है, कोई निर्वासन आदेश नहीं था। पिता एड्रियन अलेक्जेंडर कोनेजो आरियास इक्वाडोर से हैं। बच्चे का नाम लियाम कोनेजो रामोस है जो कोलंबिया हाइट्स पब्लिक स्कूल्स का छात्र है।
स्कूल अधिकारियों ने इस कृत्य की कड़ी निंदा करते हुए इसे अनैतिक बताया है। वर्तमान में लियाम और उसके पिता को टेक्सास के डिली स्थित एक इमिग्रेशन लॉकअप में रखा गया है। यह परिवार वर्ष 2024 में अमेरिका आया था और वर्तमान में उनका एसाइलम (शरण) का मामला अदालत में लंबित है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि उनके खिलाफ निर्वासन का कोई आदेश नहीं था, फिर भी यह कार्रवाई की गई। हालांकि पड़ोसियों और स्कूल स्टाफ ने बच्चे को अपनी देखरेख में रखने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन अधिकारियों ने उसे भी ठुकरा दिया।इस घटना के बाद से पूरे इलाके में भय का माहौल है। कोलंबिया हाइट्स जिले में पिछले कुछ हफ्तों में यह किसी छात्र की हिरासत का चौथा मामला है। इससे पहले दो 17 वर्षीय और एक 10 वर्षीय छात्र को भी पकड़ा जा चुका है। मिनेसोटा में बढ़ती सख्ती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले छह हफ्तों में यहाँ करीब 3,000 गिरफ्तारियां की गई हैं।
दहशत का आलम यह है कि स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति एक-तिहाई तक गिर गई है। स्कूल प्रबंधन के अनुसार, बसों के पीछे और रिहायशी इलाकों में घूमते एजेंट्स की वजह से बच्चों में मानसिक आघात देखा जा रहा है। लियाम की शिक्षिका ने उसे एक अत्यंत मिलनसार और प्यारा बच्चा बताते हुए घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया है।दूसरी ओर, डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी ने सफाई देते हुए कहा कि उनका मुख्य लक्ष्य पिता की गिरफ्तारी था और बच्चे की सुरक्षा के लिए एक अधिकारी तैनात किया गया था। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी इस पर टिप्पणी की है, लेकिन स्कूल द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। परिवार के वकील मार्क प्रोकोश अब इस मामले में कानूनी लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं।
कहीं यह जंग का काउंटडाउन तो नहीं, ट्रंप ने कहा- ईरान को दुनिया के नक्शे से मिटा देंगे
23 Jan, 2026 04:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। ईरान में जारी हिंसक प्रदर्शनों और राजनीतिक अस्थिरता के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर बेहद सख्त और आक्रामक बयान देकर अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ा दिया है। एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि हालात इसी तरह बने रहे या किसी भी तरह की उकसावे वाली कार्रवाई हुई, तो ईरान को इसके गंभीर नतीजे भुगतने होंगे। ट्रंप के इस बयान को दोनों देशों के बीच संभावित टकराव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
ट्रंप ने इंटरव्यू में कहा, मैं पहले ही चेतावनी दे चुका हूं। अगर कुछ भी हुआ, तो पूरा देश तबाह हो सकता है। उन्होंने सीधे तौर पर यह संकेत दिया कि अमेरिका किसी भी स्थिति में कड़ा जवाब देने से पीछे नहीं हटेगा। राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय आया है, जब ईरान में आर्थिक संकट, महंगाई और राजनीतिक असंतोष के चलते देशभर में प्रदर्शन जारी हैं।
ईरान की ओर से हाल ही में अमेरिका को ‘ऑल-आउट वॉर’ यानी पूरी जंग की चेतावनी दिए जाने के सवाल पर ट्रंप और ज्यादा तीखे नजर आए। उन्होंने कहा, अगर कुछ भी हुआ, तो हम उन्हें दुनिया के नक्शे से मिटा देंगे। ट्रंप के इस बयान ने कूटनीतिक भाषा की सभी सीमाओं को पार कर दिया है और इसे युद्ध की खुली धमकी के रूप में देखा जा रहा है। गौरतलब है कि इससे पहले भी ट्रंप ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात कर चुके हैं। उनके बयानों से यह साफ झलकता है कि अमेरिका ईरान के मौजूदा हालात पर करीबी नजर बनाए हुए है और किसी भी अप्रत्याशित घटना को अपने राष्ट्रीय हितों से जोड़कर देख रहा है।
ट्रंप के ताजा बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की बयानबाजी से मध्य पूर्व में हालात और बिगड़ सकते हैं। पहले से ही इजरायल-हमास संघर्ष, लाल सागर में तनाव और रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते वैश्विक स्थिति नाजुक बनी हुई है। ईरान की ओर से अभी ट्रंप के इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि तेहरान इसे अमेरिकी दबाव और धमकी की राजनीति के तौर पर पेश कर सकता है। कुल मिलाकर, ट्रंप के बयान ने अमेरिका-ईरान संबंधों में तनाव को एक बार फिर चरम पर पहुंचा दिया है और दुनिया की निगाहें अब आने वाले दिनों पर टिकी हैं।
IMD का अलर्ट: ठंड बढ़ेगी, तेज हवाओं के साथ बारिश के आसार
23 Jan, 2026 02:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हरियाणा|कड़ाके की ठंड के बीच उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों समेत भारत के कई राज्य बारिश का भी सामना करेंगे। IMD यानी भारत मौसम विज्ञान विभाग ने शुक्रवार को अलर्ट जारी किया है। वहीं, इस सप्ताह उत्तर पश्चिम के राज्य न्यूनतम तापमान में गिरावट का सामना कर सकते हैं, जिसके चलते ठंड बढ़ने के आसार हैं। वहीं, राजधानी दिल्ली में भी ठंड की संभावनाएं हैं। इधर, जम्मू और कश्मीर में बर्फबारी फिर से शुरू हो गई है। जानें आज का मौसम कैसा है।
इस हफ्ते कैसा रहेगा मौसम
IMD ने बताया है कि उत्तर पश्चिम भारत में न्यूनतम तापमान दो दिनों के दौरान 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है। वहीं, इसके बाद चार दिनों में 2 से 4 डिग्री सेल्सियस बढ़ने के आसार हैं।उत्तर-पश्चिम में मुख्य रूप से राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख गिने जाते हैं।
बारिश की मार
मौसम विभाग ने बताया है कि 23 जनवरी को हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, दिल्ली, पश्चिम उत्तर प्रदेश और राजस्थान में हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है। ऐसा ही मौसम जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में देखा जा सकता है। वहीं, 23 और 24 जनवरी को पूर्वी उत्तर प्रदेश में बारिश की संभावनाएं हैं।23 जनवरी को हरियाणा, उत्तराखंड, चंडीगढ़, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में तेज हवाएं और गरज चल सकती हैं। साथ ही इस दौरान ओलावृष्टि भी दर्ज की जा सकती है। दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु, पुडुचेरी, करईकल में 25 और 26 जनवरी, केरल और माहे में 26 जनवरी को बारिश के आसार हैं।
कोहरे की चादर
25 और 26 जनवरी को पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में सुबह और रात के समय घने से बहुत घना कोहरा छा सकता है। राजस्थान में 24 से 26 जनवरी तक, उप हिमालयी पश्चिम बंगाल, सिक्किम में 24 जनवरी तक घना कोहरा बने रहने के आसार हैं। 23 जनवरी को हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में शीत दिवस हो सकता है।
माता वैष्णो देवी मंदिर में बर्फबारी
गुरुवार को वैष्णो देवी मंदिर क्षेत्र में मौसम की पहली बर्फबारी दर्ज की गई। इसके चलते त्रिकुटा पहाड़ी बर्फ की सफेद चादर से सजी थी।कश्मीर घाटी के प्रसिद्ध स्की रिसॉर्ट गुलमर्ग और कुछ अन्य क्षेत्रों में गुरुवार को बर्फबारी हुई, वहीं श्रीनगर और अन्य मैदानी इलाकों में तेज हवाएं चलीं। अधिकारियों के मुताबिक, उत्तरी कश्मीर के बारामूला जिले के गुलमर्ग में गुरुवार देर शाम से बर्फबारी शुरू हो गई। जम्मू-कश्मीर में एक शक्तिशाली पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव के परिणामस्वरूप यह बर्फबारी हुई।गुलमर्ग में कुछ इंच ताजा बर्फ जमा हो गई है, लेकिन आखिरी रिपोर्ट आने तक मध्यम बर्फबारी जारी थी। मौसम विभाग ने कहा था कि घाटी के मैदानी इलाकों समेत व्यापक रूप से हल्की से मध्यम बारिश/बर्फबारी होने की संभावना है, जबकि कुछ स्थानों पर भारी बारिश भी हो सकती है।
शिमला में बर्फबारी
शिमला में करीब तीन महीने बाद शुक्रवार को मौसम की पहली बर्फबारी हुई। हिमाचल प्रदेश के ऊपरी इलाकों में भी बर्फबारी हो रही है, जिनमें राज्य का एक अन्य लोकप्रिय पर्यटन स्थल मनाली भी शामिल है। स्थानीय मौसम केंद्र ने भारी बर्फबारी और बारिश का पूर्वानुमान जताया है। शिमला प्रशासन ने एक परामर्श जारी कर लोगों से मौसम साफ होने तक वाहन नहीं चलाने को कहा है। प्रशासन ने कहा कि चौपाल समेत जिले के ऊपरी इलाकों में भी बर्फबारी हो रही है, जिसके कारण चौपाल-देहा सड़क अवरुद्ध हो गई है।
रूस को कोई लेना देना नहीं, अमेरिका-नाटो ग्रीनलैंड मामले को आपस में सुलझा लेंगे
23 Jan, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मास्को। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने के लिए बेताब हैं। ट्रंप बार बार कहा रहे हैं कि वह ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। हालांकि ट्रंप की इस योजना से अमेरिका के साथी भी नाराज हो गए हैं। नाटो के कई देशों ने ग्रीनलैंड पर कब्जे के खिलाफ चेतावनी दी है। नाटो देशों ने यह तक कहा है कि हमले की स्थिति में वे ग्रीनलैंड की रक्षा करेंगे और अगर अमेरिका हमला करता है तो यह नाटो के अंत जैसा होगा।
अब इन सब के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का एक दिलचस्प बयान सामने आया है। इस बयान से झलक रही है कि पुतिन को अमेरिका बनाम यूरोप की यह जुबानी जंग रास आ रही है। पुतिन ने हाल ही में रूस को ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर महत्वाकांक्षाओं से दूर कर लिया है। पुतिन ने कहा है कि रूस को इस सबसे कोई लेना देना नहीं है और अमेरिका और उसके नाटो सहयोगी इस मामले को आपस में सुलझा लेंगे। एक तरफ पुतिन ने ग्रीनलैंड के लोगों के प्रति सहानुभूति जताने का दिखावा भी किया लेकिन दूसरी तरफ उनके शब्दों में आलोचना दूर दूर तक नजर नहीं आई।
यह इसीलिए भी आश्चर्यजनक है क्योंकि ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जा करने को सही ठहराने के लिए कई बार रूसी आक्रमण की आशंका को जिम्मेदार ठहराया है। ट्रंप का कहना है कि रूस या चीन कभी भी ग्रीनलैंड पर हमला कर देंगे। इसीलिए वे पहले ही इसे अमेरिकी संरक्षण में लाना चाहते हैं। पुतिन ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में दिए गए बयान में कहा कि ग्रीनलैंड का क्या होगा इससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है। वैसे डेनमार्क ने हमेशा ग्रीनलैंड को एक उपनिवेश के रूप में माना है और उसके प्रति काफी कठोर रहा है, लेकिन यह पूरी तरह से एक अलग मामला है और मुझे शक है कि अभी इसमें किसी की दिलचस्पी है। निश्चित रूप से यह हमसे संबंधित नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि मुझे लगता है कि वे इसे आपस में सुलझा लेंगे।
रिपोर्ट के मुताबिक क्रेमलिन ने ग्रीनलैंड मुद्दे पर ना तो ट्रंप की आलोचना की है और ना ही उनका समर्थन किया। ट्रंप की योजनाओं के प्रति रूस की अप्रत्यक्ष सहमति एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। रिपोर्ट्स की मानें तो ऐसे समय में जब अमेरिका का ध्यान कहीं और लगा हो, रूस के पास पश्चिमी देशों की एकता को कमजोर करने का अच्छा मौका है। यह रणनीति कुछ हद तक काम करती हुई भी दिख रही है। वहीं अमेरिका और पश्चिमी देशों का पूरा ध्यान ग्रीनलैंड पर होने से यूक्रेन युद्ध में अपने लक्ष्यों को हासिल करने का रूस को अहम समय मिल गया है।
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