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अपने मृत पति की अस्थियां चाटती थी सनकी महिला
23 Jan, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। अमेरिका के टेनेसी में रहने वाली एक महिला की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिसने अपने पति की मौत के बाद ऐसा कदम उठाया कि उसकी चर्चा आज भी लोगों को सिहरन में डाल देती है। यह मामला कैसि नाम की महिला से जुड़ा है, जो उस वक्त सुर्खियों में आई जब उसने खुलासा किया कि वह अपने मृत पति की अस्थियां चाटती थी। कैसि ने बताया कि यह सब गलती से शुरू हुआ। एक दिन उसके हाथ पर पति की अस्थियां गिर गईं। आमतौर पर कोई भी व्यक्ति ऐसी स्थिति में हाथ धो लेता, लेकिन कैसि ने उन्हें साफ करने के बजाय चाट लिया। उस पल के बाद उसकी जिंदगी ने एक अजीब मोड़ ले लिया। उसे ऐसा लगा कि इस तरह वह अपने पति के और करीब है। धीरे-धीरे यह हरकत उसकी आदत बन गई और उसने पूरे कलश की अस्थियां चाट-चाटकर खत्म कर दीं। उसके लिए यह अपने पति के प्रति प्यार जताने का तरीका था, भले ही दुनिया को यह बेहद अजीब और डरावना लगे। कैसि ने अपनी यह कहानी एक अमेरिकी टीवी चैनल के शो में साझा की थी। उसने बताया कि उसके पति की मौत अचानक अस्थमा अटैक के कारण हो गई थी। इस अप्रत्याशित घटना ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया। पति के जाने के बाद वह खुद को बेहद अकेला महसूस करने लगी और चुपचाप रहने लगी। उसी दौरान अस्थियों वाला हादसा हुआ, जिसने उसे इस अजीब लत की ओर धकेल दिया। इसके बाद कैसि हर जगह अपने पति की अस्थियां साथ रखने लगी।
चाहे शॉपिंग पर जाना हो या कहीं घूमने, वह कलश अपने साथ ले जाती थी। यहां तक कि वह अपने खाने में भी पति की अस्थियां छिड़कने लगी थी। इस मामले ने जब लोगों का ध्यान खींचा तो कैसि ने खुलकर बताया कि वह वास्तव में इन अस्थियों को खाती थी। उसने यह भी कहा कि इसका स्वाद उसे सड़े हुए अंडे जैसा लगता था, लेकिन फिर भी वह खुद को रोक नहीं पाती थी। वहीं, हेल्थ एक्सपर्ट्स ने इसे बेहद खतरनाक बताया। उनके अनुसार, इंसानी राख में कई तरह के टॉक्सिन्स और हानिकारक तत्व मौजूद हो सकते हैं, जिनका सेवन गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है।
60 हजार साल पुरानी खोज ने बदला मानव इतिहास देखने का नजरिया
23 Jan, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लंदन । वैज्ञानिकों को दक्षिण अफ्रीका में ऐसे प्रमाण मिले हैं, जो बताते हैं कि शुरुआती इंसान न सिर्फ शिकार करता था, बल्कि उसे पूरी योजना, धैर्य और वैज्ञानिक समझ के साथ अंजाम देता था। यह अहम खोज दक्षिण अफ्रीका के क्वाज़ुलू-नटाल प्रांत में स्थित उम्लत्तुजाना रॉक शेल्टर में हुई है। यहां खुदाई के दौरान वैज्ञानिकों को क्वार्ट्ज पत्थर से बने तीरों के सिरे मिले, जिन पर जहर के स्पष्ट निशान पाए गए। इस रिसर्च को स्वीडन और दक्षिण अफ्रीका के वैज्ञानिकों ने मिलकर अंजाम दिया।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन तीरों पर लगाया गया जहर शिकार को तुरंत नहीं मारता था, बल्कि उसे धीरे-धीरे कमजोर करता था। इससे जानवर ज्यादा दूर तक भाग नहीं पाता था और शिकारी उसे आसानी से पकड़ लेते थे। यह दर्शाता है कि उस दौर के इंसान केवल शारीरिक ताकत पर निर्भर नहीं थे, बल्कि वे रणनीति, धैर्य और व्यवहारिक ज्ञान का भी इस्तेमाल करते थे। यह शिकार करने का एक बेहद उन्नत तरीका माना जा रहा है। शोध में यह भी सामने आया कि तीरों पर इस्तेमाल किया गया जहर बूफोन डिस्टिचा नामक एक स्थानीय पौधे से तैयार किया जाता था। यह पौधा आज भी दक्षिण अफ्रीका में पाया जाता है और इसे अत्यंत विषैला माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह जहर चूहों को 20 से 30 मिनट में मार सकता है, जबकि इंसानों में इससे मतली, आंखों की रोशनी में परेशानी और मांसपेशियों में कमजोरी जैसे लक्षण हो सकते हैं।
हैरानी की बात यह है कि यही जहर बाद के ऐतिहासिक काल में इस्तेमाल किए गए तीरों पर भी पाया गया है। इस खोज से पहले वैज्ञानिकों का मानना था कि जहर लगे तीरों का इस्तेमाल करीब 4,000 से 8,000 साल पहले शुरू हुआ था, जिसके प्रमाण मिस्र और दक्षिण अफ्रीका में मिले थे। लेकिन 60,000 साल पुराने ये तीर इस धारणा को पूरी तरह बदल देते हैं और साबित करते हैं कि इंसान बहुत पहले ही उन्नत तकनीक और वैज्ञानिक सोच विकसित कर चुका था। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि हजारों साल बाद भी तीरों पर जहर के अवशेष सुरक्षित मिले। रासायनिक जांच से पता चला कि ये पदार्थ मिट्टी में लंबे समय तक स्थिर रह सकते हैं।
दूसरी महिलाओं की तस्वीरें लाइक करना बना तलाक की वजह
23 Jan, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कायसेरी । तुर्की के कायसेरी शहर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां पर एक महिला ने अपने पति के खिलाफ सिर्फ इस वजह से तलाक की अर्जी दाखिल कर दी क्योंकि वह सोशल मीडिया पर दूसरी महिलाओं की तस्वीरें लाइक करता था। महिला का आरोप था कि उसका पति न केवल उसे शब्दों से अपमानित करता और नीचा दिखाता था, बल्कि अपना अधिकतर समय सोशल मीडिया पर बिताता था। उसने अदालत को बताया कि पति की यह आदत उसे मानसिक रूप से आहत करती थी और इससे शादी में भरोसा कमजोर हुआ।
महिला के वकीलों ने दलील दी कि पति ने वैवाहिक निष्ठा का उल्लंघन किया है, इसलिए उसे आर्थिक मुआवजा दिया जाना चाहिए। वहीं पति ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए खुद को निर्दोष बताया और पलटकर तलाक की अर्जी दाखिल कर दी। उसने कहा कि उसकी पत्नी जरूरत से ज्यादा जलन करती थी, उसके पिता का अपमान करती थी और उसकी सामाजिक छवि को नुकसान पहुंचा रही थी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और सबूतों की जांच के बाद अदालत ने अहम फैसला सुनाया।
तुर्की की अदालत ने माना कि सोशल मीडिया पर दूसरी महिलाओं की भड़काऊ या आपत्तिजनक तस्वीरों को लाइक करना मामूली बात नहीं है। अदालत के अनुसार, इस तरह का व्यवहार शादीशुदा रिश्ते में भावनात्मक असुरक्षा पैदा करता है और निष्ठा के सिद्धांत को तोड़ता है। कोर्ट ने पति को ज्यादा दोषी ठहराते हुए उसे पत्नी को हर महीने 750 तुर्की लीरा गुजारा भत्ता देने और 80 हजार लीरा का मुआवजा चुकाने का आदेश दिया। फैसले से हैरान पति ने मुआवजा ज्यादा बताते हुए अपील की, लेकिन अदालत ने उसे खारिज कर दिया। जज ने साफ कहा कि सोशल मीडिया पर की गई गतिविधियां भी आज रिश्तों में भरोसे को प्रभावित करती हैं।
Board of Peace विवाद: ट्रंप ने कनाडा का निमंत्रण वापस लिया, नई बहस शुरू
23 Jan, 2026 08:56 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अमेरिकी : राष्ट्रपति Donald Trump ने गाजा के पुनर्निर्माण और वैश्विक शांति प्रयासों को लेकर एक नई पहल ‘Board of Peace’ की शुरुआत करने का दावा किया है। इस पहल के तहत उन्होंने दुनिया के कई देशों को इसमें शामिल होने के लिए निमंत्रण भेजा था। हालांकि, अब यह पहल विवादों में घिरती नजर आ रही है, क्योंकि ट्रंप ने कनाडा को भेजा गया निमंत्रण वापस ले लिया है।
गुरुवार को ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रूथ’ पर पोस्ट कर इस फैसले की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कुछ देशों के रुख और बयानों से असंतुष्ट होकर उन्होंने कनाडा को दिया गया आमंत्रण वापस लेने का निर्णय लिया है। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है, जब ट्रंप पहले ही कई देशों को व्यापार और टैरिफ को लेकर धमकी भरे बयान दे चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि Board of Peace जैसी पहल वैश्विक मंच पर सहयोग और कूटनीति को मजबूत करने का अवसर हो सकती थी, लेकिन इस तरह के अचानक फैसले इसे राजनीतिक विवाद का विषय बना सकते हैं। कनाडा के निमंत्रण को वापस लेना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका-कनाडा संबंधों पर भी असर डाल सकता है।
ट्रंप के इस कदम से यह भी संकेत मिलता है कि Board of Peace केवल एक कूटनीतिक मंच नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। कई देशों ने अभी तक इस पहल पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन वैश्विक राजनीति में इस फैसले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
रोबोटिक्स बनाम मानवीय संवेदना: लग्जरी होटल के अनुभव ने सिखाया ऑटोमेशन का नया सबक
23 Jan, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
टोक्यो। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में लगभग 4 करोड़ सर्विस रोबोट्स विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। फैक्ट्रियों से लेकर अस्पतालों, मॉल्स और रेस्टोरेंट्स तक, रोबोट्स इंसानों के कठिन कार्यों को सुगम बना रहे हैं। हालाँकि, जापान के एक लग्जरी होटल में रोबोट्स के उपयोग को लेकर हुए हालिया प्रयोग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऑटोमेशन की अपनी सीमाएं हैं और यह मानवीय भावनाओं व रचनात्मकता का स्थान नहीं ले सकता।
जापान के इस अनूठे होटल ने शुरुआत में रिसेप्शन पर डायनासोर जैसे रोबोट्स तैनात किए थे, जो मेहमानों का स्वागत करते थे। चेक-इन से लेकर सामान को कमरे तक पहुँचाने तक की पूरी प्रक्रिया रोबोटिक पोर्टर और सिस्टम के हवाले थी। शुरुआत में यह तकनीक पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी और होटल की बुकिंग में उछाल देखा गया। लेकिन कुछ ही समय बाद तकनीकी खामियां उभरने लगीं। रोबोट्स ग्राहकों की अलग-अलग भाषाओं और विशिष्ट मांगों को समझने में विफल रहे। सामान पहुँचाने के दौरान बाधाएं आईं और सामान्य कस्टमर सर्विस में रोबोट्स पूरी तरह असमर्थ साबित हुए। नतीजतन, नियमित रखरखाव की भारी लागत और तकनीकी विफलताओं के कारण होटल प्रबंधन को चार साल के भीतर लगभग 243 रोबोट्स को काम से हटाना पड़ा।
इस विफलता ने वैश्विक स्तर पर ऑटोमेशन को लेकर छह महत्वपूर्ण सबक दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पूरी तरह ऑटोमेशन पर निर्भर रहने के बजाय रोबोट्स का सीमित और चुनिंदा उपयोग ही बुद्धिमानी है। सर्विस रोबोट्स मनोरंजन और आकर्षण के लिए तो अच्छे हैं, लेकिन जटिल समस्याओं के समाधान में वे इंसानों के मुकाबले कमजोर हैं। दूसरा बड़ा सबक यह है कि कस्टमर सर्विस जैसे क्षेत्रों में सहानुभूति, रचनात्मकता और व्यक्तिगत संपर्क अनिवार्य है, जिसे एक मशीन कभी पूरा नहीं कर सकती। इसके अतिरिक्त, रोबोट्स का रखरखाव महंगा है और सुरक्षा के लिहाज से उन पर पूर्ण भरोसा करना जोखिम भरा हो सकता है।
आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में इस समय 40 लाख फैक्ट्री रोबोट्स और 3.6 करोड़ सर्विस रोबोट्स कार्यरत हैं। चीन, जापान, अमेरिका, कोरिया और जर्मनी इस बाजार के सबसे बड़े केंद्र बनकर उभरे हैं। जहाँ फैक्ट्री रोबोट्स खतरनाक और भारी कार्यों में सफल रहे हैं, वहीं सर्विस रोबोट्स का उपयोग कोविड संकट के बाद सफाई और सैनिटाइजेशन में बढ़ा है। चीन में रोबोट शेफ और डिलीवरी रोबोट्स का चलन है, तो जर्मनी में ये भारी प्लेटें उठाने का काम करते हैं ताकि मानव कर्मचारी ग्राहक सेवा पर ध्यान दे सकें। कुल मिलाकर, जापान के इस अनुभव ने दुनिया को यह समझा दिया है कि रोबोट्स इंसानों के सहायक तो बन सकते हैं, लेकिन वे इंसानों का विकल्प नहीं हैं। ऑटोमेशन का संतुलित और समझदारी भरा इस्तेमाल ही भविष्य की सबसे प्रभावी रणनीति होगी।
रूसी हमले के बाद दुनिया की सबसे खतरनाक न्यूक्लियर साइट की बिजली गुल होना चिंताजनक
22 Jan, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कीव। दुनिया की सबसे भीषण परमाणु त्रासदी का गवाह रहे यूक्रेन के चेरनोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट में मंगलवार को एक बार फिर गंभीर संकट की स्थिति पैदा हो गई। रूसी सेना द्वारा किए गए भीषण ड्रोन और मिसाइल हमलों के कारण यह प्लांट अचानक अपनी बाहरी बिजली आपूर्ति से पूरी तरह कट गया। संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने इस घटना की पुष्टि करते हुए परमाणु सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है।
मंगलवार सुबह रूस ने यूक्रेन के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाते हुए बड़े पैमाने पर हमले किए। इन हमलों में कई महत्वपूर्ण बिजली सबस्टेशन्स क्षतिग्रस्त हो गए, जो परमाणु संयंत्रों के सुरक्षित संचालन के लिए अनिवार्य माने जाते हैं। हमलों के कारण न केवल चेरनोबिल की बिजली आपूर्ति बाधित हुई, बल्कि यूक्रेन के अन्य परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से जुड़ी पावर लाइन्स पर भी बुरा असर पड़ा। इस सैन्य कार्रवाई ने राजधानी कीव सहित कई इलाकों को कड़ाके की ठंड के बीच अंधेरे में झोंक दिया, जिससे हजारों घरों में हीटिंग और पानी की सप्लाई ठप हो गई।
चेरनोबिल प्लांट हालांकि 1986 की दुर्घटना के बाद से डीकमीशन किया जा चुका है और वर्तमान में बंद है, लेकिन इसके बावजूद यहां बिजली की निरंतर आपूर्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्लांट में मौजूद खर्च हो चुके परमाणु ईंधन को ठंडा रखने और सुरक्षा प्रणालियों को चालू रखने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है। बाहरी ग्रिड से संपर्क टूटने के तुरंत बाद प्लांट के आपातकालीन बैकअप जनरेटर और आंतरिक सुरक्षा प्रणालियां सक्रिय हो गईं, जिससे एक बड़ा हादसा टल गया।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कहा कि वे परमाणु सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभावों का लगातार आकलन कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि सक्रिय युद्ध क्षेत्र में परमाणु केंद्रों के करीब इस तरह के हमले अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के लिए बड़ा जोखिम पैदा करते हैं। हालांकि, यूक्रेन के ऊर्जा मंत्रालय ने बाद में राहत की खबर देते हुए बताया कि चेरनोबिल की बिजली आपूर्ति बहाल कर दी गई है और संयंत्र को पुनः यूनाइटेड एनर्जी सिस्टम से जोड़ दिया गया है। राहत की बात यह है कि इस घटना से फिलहाल पर्यावरण या जनहानि का कोई सीधा खतरा पैदा नहीं हुआ है। लेकिन बार-बार हो रहे इन हमलों ने यूक्रेन को अंतरराष्ट्रीय मंच पर आवाज उठाने के लिए मजबूर कर दिया है। यूक्रेन ने इस मुद्दे पर चर्चा करने और रूसी हमलों के परमाणु सुरक्षा पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों का जायजा लेने के लिए बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की आपात बैठक बुलाने की मांग की है।
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री की किरकिरी: नकली पिज्जा आउटलेट का उद्घाटन कर घिरे ख्वाजा आसिफ
22 Jan, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इस्लामाबाद। पाकिस्तान में अक्सर ऐसी अतरंगी और हैरान करने वाली घटनाएं सामने आती रहती हैं, जो देखते ही देखते चर्चा का विषय बन जाती हैं। ताज़ा मामला पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ से जुड़ा है, जिन्होंने हाल ही में एक मशहूर अंतरराष्ट्रीय फास्ट फूड चेन पिज्जा हट के नए आउटलेट का बड़े धूमधाम से उद्घाटन किया। फीता काटा गया, तालियां बजीं और तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की गईं, लेकिन कुछ ही घंटों में यह जश्न रक्षा मंत्री के लिए भारी बेइज्जती का सबब बन गया।
दरअसल, जिस आउटलेट का उद्घाटन रक्षा मंत्री ने किया था, वह पूरी तरह से फर्जी निकला। जैसे ही उद्घाटन की तस्वीरें वायरल हुईं, असली पिज्जा हट कंपनी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से एक स्पष्टीकरण जारी कर दिया। कंपनी ने साफ तौर पर कहा कि सियालकोट में उनका कोई नया आउटलेट नहीं खुला है और जिस दुकान का उद्घाटन रक्षा मंत्री ने किया है, वह उनके ब्रांड नाम और लोगो का अवैध रूप से इस्तेमाल कर रही है। कंपनी ने यहाँ तक स्पष्ट किया कि इस फर्जी आउटलेट का उनकी अंतरराष्ट्रीय रेसिपी, गुणवत्ता मानकों और खाद्य सुरक्षा नियमों से कोई लेना-देना नहीं है। इस खुलासे के बाद पाकिस्तान के सोशल मीडिया पर ख्वाजा आसिफ और सरकार का जमकर मजाक उड़ाया जा रहा है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि एक देश का रक्षा मंत्री, जिस पर राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है, क्या इतना भी जागरूक नहीं है कि वह एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड और उसके फर्जी कॉपी के बीच अंतर कर सके? पाकिस्तानी नागरिकों ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब देश की अर्थव्यवस्था, कूटनीति और रक्षा व्यवस्था जैसे गंभीर मुद्दे संकट में हैं, तब मंत्री महोदय नकली पिज्जा दुकानों का फीता काटने में व्यस्त हैं।
सोशल मीडिया यूजर्स ने इस घटना को पाकिस्तान के वर्तमान हालातों का प्रतीक बताया है। एक यूजर ने तंज कसते हुए लिखा कि जब देश में कुछ भी असली नहीं बचा, तो मंत्री भी नकली दुकानों का ही उद्घाटन करेंगे। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कह दिया कि चूंकि देश की स्थिति नकली विकास पर टिकी है, इसलिए मंत्री को भी नकली ब्रांडिंग का शिकार होना पड़ा। इस घटना ने न केवल ख्वाजा आसिफ की व्यक्तिगत छवि को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तानी प्रशासन की कार्यप्रणाली और उसकी गंभीरता पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। फिलहाल, यह मामला पूरे देश में हंसी और आक्रोश का मिला-जुला केंद्र बना हुआ है।
आतंकी कारखाने पर दुआ मांगता दिखा हाफिज, मुल्तान में तैयार कर रहा लश्कर का नया शिविर
22 Jan, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इस्लामाबाद। पाकिस्तान के मुल्तान से आई कुछ हालिया तस्वीरों ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस्लामाबाद के दावों की पोल खोल दी है। इन तस्वीरों में प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक और मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड हाफिज सईद सरेआम एक नई इमारत के निर्माण कार्य की शुरुआत करता नजर आ रहा है। यह इमारत लश्कर का नया अड्डा बताई जा रही है, जिसकी नींव खोदने के दौरान हाफिज सईद न केवल वहां मौजूद रहा, बल्कि निर्माण कार्य की सफलता के लिए दुआ मांगते और औपचारिकताओं में शामिल होते हुए भी स्पष्ट रूप से देखा गया।
हाफिज सईद का इस तरह खुलेआम घूमना और आतंकी बुनियादी ढांचे के विस्तार में शामिल होना उन दावों पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है, जिनमें पाकिस्तान अक्सर उसे जेल में होने या उस पर कड़ी कार्रवाई करने की बात कहता रहा है। हाफिज सईद भारत की मोस्ट वांटेड सूची में शीर्ष पर है और 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों के साथ-साथ पुलवामा हमले का भी मुख्य साजिशकर्ता है। कश्मीर में आतंकी गतिविधियों के संचालन और टेरर फंडिंग के कई मामलों में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने उसे मुख्य आरोपी के रूप में नामित किया है। भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने भी उसे वैश्विक आतंकवादी घोषित कर रखा है। अमेरिकी सरकार के रिवॉर्ड्स फॉर जस्टिस कार्यक्रम के तहत हाफिज सईद पर 10 अरब अमेरिकी डॉलर का इनाम घोषित है। वह उस जमात-उद-दावा और लश्कर-ए-तैयबा का प्रमुख है, जो दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माने जाते हैं। विडंबना यह है कि एक तरफ पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कर्ज और आर्थिक मदद की गुहार लगाता है, वहीं दूसरी तरफ उसकी जमीन पर फिदायीनों की फौज तैयार करने वाले आतंकियों को सरकारी संरक्षण में नए ठिकाने बनाने की खुली छूट दी जा रही है।
मुल्तान से आई ये तस्वीरें पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी हैं कि पाकिस्तान में आतंक की फैक्ट्री आज भी बदस्तूर जारी है। रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे दुर्दांत आतंकियों की सार्वजनिक मौजूदगी और निर्माण कार्यों में उनकी भागीदारी यह दर्शाती है कि पाकिस्तान की नीति सेलेक्टिव जीरो टॉलरेंस की है, जहां वह अपनी सुविधा के अनुसार आतंकियों को पालने का काम करता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेषकर अमेरिका, जो आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात करता है, पाकिस्तान की इस खुली उकसावे वाली कार्रवाई पर क्या रुख अपनाता है।
जापान के पूर्व पीएम आबे की हत्या के आरोपी को उम्रकैद, चुनाव प्रचार में मारी थी गोली
22 Jan, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
टोक्यो। जापान की कोर्ट ने पूर्व पीएम शिंजो आबे के हत्यारे को उम्रकैद की सजा सुनाई है। मीडिया रिपोर्ट मुताबिक बुधवार को कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। इससे पहले 45 साल साल के आरोपी तेत्सुया यामागामी ने जुलाई 2022 में आबे की हत्या करने की बात कबूल की थी। बता दें शिंजो आबे तब पश्चिमी जापान के नारा शहर में चुनाव प्रचार के दौरान भाषण दे रहे थे। तभी उन पर गोली चलाई गई। इस घटना ने ना सिर्फ जापान बल्कि पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया था। यामागामी ने अक्टूबर में शुरू हुए ट्रायल में हत्या का जुर्म कबूल किया था। नारा जिला कोर्ट ने उसे दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। बचाव पक्ष ने सजा को 20 साल तक सीमित रखने की अपील की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।
इस मामले में जापान की सत्तारूढ़ पार्टी और एक विवादित दक्षिण कोरियाई चर्च के बीच पुराने रिश्तों का भी खुलासा हुआ है। यामागामी ने कोर्ट में कहा कि उसने आबे को एक वीडियो मैसेज के कारण निशाना बनाया था। आरोपी ने बताया कि उसका मकसद चर्च को नुकसान पहुंचाना और उसके साथ चर्च के राजनीतिक रिश्तों को उजागर करना था। उसने कहा कि आबे उस रिश्ते का सबसे बड़ा प्रतीक थे।
इस घटना के बाद सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी और चर्च के बीच नजदीकी रिश्तों पर कई सवाल खड़े हुए। इसके बाद पार्टी ने चर्च से दूरी बना ली। वहीं जांच के बाद कोर्ट ने चर्च की जापानी शाखा से टैक्स छूट का दर्जा भी छीन लिया और उसे भंग करने का आदेश दिया। 8 जुलाई 2022 को आबे नारा के एक रेलवे स्टेशन के बाहर भाषण दे रहे थे। तभी टीवी फुटेज में दो गोलियों की आवाज सुनाई दी। आबे जमीन पर गिर पड़े और उनकी शर्ट खून से लाल हो गई। उनकी मौत तुरंत हो गई थी। वहीं अधिकारियों ने रेवयामागामी को मौके से ही पकड़ लिया था। आरोपी ने आबे की पत्नी से कोर्ट में माफी भी मांगी और कहा कि उसका परिवार से कोई निजी विवाद नहीं था।
दावोस में आईएमएफ चीफ ने भारत को बताया सेकेंड टियर तो अश्विनी वैष्णव बोले—सेकेंड टियर नहीं, फर्स्ट ग्रुप में है भारत
22 Jan, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दावोस। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) दावोस 2026 में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर भारत की भूमिका पर उस समय तीखी बहस देखने को मिली, जब इंटरनेशनल मॉनेट्री फंड (आईएमएफ) की प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जिएवा ने भारत को “सेकेंड-टीयर एआई पावर” बताया। उनके इस बयान पर केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मंच से ही करारा जवाब देते हुए भारत को एआई के “फर्स्ट ग्रुप” में शामिल देश करार दिया।
एआई के वैश्विक प्रभाव पर आयोजित पैनल डिस्कशन में आईएमएफ चीफ ने कहा था कि अमेरिका, डेनमार्क और सिंगापुर जैसे देश एआई में टॉप ग्रुप में हैं, जबकि भारत को उन्होंने दूसरे स्तर यानी सेकंड-टीयर में रखा। हालांकि उन्होंने भारत के लंबे समय से आईटी में निवेश की सराहना भी की, लेकिन कहा कि एआई के मामले में भारत अभी आगे नहीं है।
इस पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए अश्विनी वैष्णव ने कहा, मुझे नहीं पता आईएमएफ का यह वर्गीकरण किस आधार पर है, लेकिन स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट भारत को एआई पेनेट्रेशन, एआई प्रिपेयर्डनेस और एआई टैलेंट में दुनिया में तीसरे स्थान पर रखती है। एआई टैलेंट में भारत दूसरे नंबर पर है। ऐसे में भारत को सेकंड-टीयर कहना सही नहीं है। भारत साफ तौर पर फर्स्ट ग्रुप में है।
वैष्णव ने यह भी स्पष्ट किया कि एआई में सफलता केवल बहुत बड़े मॉडल बनाने से नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि 95 प्रतिशत काम 20 से 50 बिलियन पैरामीटर वाले मॉडल से ही हो जाता है और भारत ऐसे कई मॉडल विकसित कर चुका है, जिन्हें विभिन्न क्षेत्रों में लागू किया जा रहा है। इससे उत्पादकता, कार्यकुशलता और तकनीक के प्रभावी इस्तेमाल में बढ़ोतरी हो रही है। उन्होंने बताया कि एआई आर्किटेक्चर की पांच प्रमुख लेयर— एप्लिकेशन, मॉडल, चिप, इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी में भारत लगातार प्रगति कर रहा है। खासतौर पर एप्लिकेशन लेयर में भारत दुनिया का सबसे बड़ा सर्विस प्रोवाइडर बनने की क्षमता रखता है, जहां एंटरप्राइज जरूरतों के अनुसार एआई समाधान देकर सबसे ज्यादा रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट हासिल किया जा सकता है।
अश्विनी वैष्णव ने कहा कि भारत का फोकस एआई को बड़े पैमाने पर फैलाने पर है, न कि केवल आकार बढ़ाने पर। साथ ही उन्होंने बताया कि भारत तेजी से सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम विकसित कर रहा है, जिसमें डिजाइन से लेकर फैब्रिकेशन तक सभी पहलू शामिल हैं। गूगल जैसी वैश्विक कंपनियां भारत में एआई डेटा सेंटर बढ़ा रही हैं और भारतीय स्टार्टअप्स के साथ साझेदारी कर रही हैं।
ट्रंप बोले-अब नोबेल नहीं ग्रीनलैंड लूंगा, नार्वे ने कहा- कितनी बार बताएं ये अवार्ड सरकार नहीं देती
21 Jan, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ओस्लो। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गाहर स्टोरे के बीच नोबेल शांति पुरस्कार और ग्रीनलैंड के मुद्दे पर तीखी जुबानी जंग छिड़ गई है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब ट्रंप ने नोबेल शांति पुरस्कार न मिल पाने का अपना पुराना दर्द साझा करते हुए नॉर्वे की सरकार को निशाने पर लिया। इसके जवाब में प्रधानमंत्री स्टोरे ने स्पष्ट किया कि नोबेल शांति पुरस्कार देने का निर्णय नॉर्वे की सरकार नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र समिति करती है और इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है।
इस कूटनीतिक विवाद की पृष्ठभूमि में ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की ट्रंप की महत्वाकांक्षा और यूरोपीय देशों पर प्रस्तावित टैरिफ (आयात शुल्क) में बढ़ोतरी का मुद्दा शामिल है। प्रधानमंत्री स्टोरे के अनुसार, हाल ही में उन्होंने और फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने ट्रंप को एक संयुक्त संदेश भेजकर अमेरिकी टैरिफ नीतियों का विरोध किया था। इसके जवाब में ट्रंप ने एक ऐसा टेक्स्ट मैसेज भेजा जिसे बाद में उन्होंने अन्य नाटो नेताओं के साथ भी साझा किया। इस मैसेज में ट्रंप ने नाराजगी जताते हुए कहा कि चूंकि उन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं मिला, इसलिए अब वे शांति के लिए बाध्य नहीं महसूस करते और ग्रीनलैंड पर पूर्ण नियंत्रण चाहते हैं। ट्रंप के इस रवैये पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री स्टोरे ने दो टूक शब्दों में कहा कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और नॉर्वे इस मुद्दे पर पूरी तरह से डेनमार्क के संप्रभु अधिकारों के साथ खड़ा है। उन्होंने आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता के लिए नाटो के प्रयासों का समर्थन तो किया, लेकिन इसे जिम्मेदारी और संतुलन के साथ करने की बात भी कही। स्टोरे ने फिर दोहराया कि राष्ट्रपति ट्रंप को यह समझना चाहिए कि नोबेल समिति एक स्वायत्त निकाय है और सरकार के पास पुरस्कार विजेताओं को चुनने का अधिकार नहीं है।
दरअसल, नोबेल पुरस्कार का यह मुद्दा हाल ही में तब फिर से गरमा गया जब वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो ने अपना नोबेल शांति पुरस्कार डोनाल्ड ट्रंप को समर्पित करने की घोषणा की। मेडल मिलते ही ट्रंप का पुराना गुस्सा भड़क उठा और उन्होंने नॉर्वे को टैरिफ वाले देशों की सूची में डाल दिया। ट्रंप का मानना है कि उनके पिछले कार्यकाल में किए गए कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद उन्हें इस सम्मान से वंचित रखा गया। वर्तमान स्थिति यह है कि ट्रंप ने न केवल नॉर्वे को आर्थिक कार्रवाई की धमकी दी है, बल्कि ग्रीनलैंड के मसले पर अपने आक्रामक रुख को नोबेल शांति पुरस्कार के साथ जोड़कर एक नया वैश्विक विवाद खड़ा कर दिया है। नॉर्डिक देशों के नेताओं ने इस व्यवहार पर चिंता जताई है और वे आने वाले समय में सामूहिक रूप से अमेरिकी दबाव का सामना करने की रणनीति बना रहे हैं। फिलहाल, ट्रंप के इस टैरिफ और ग्रीनलैंड वाले दांव ने अमेरिका और उसके पारंपरिक यूरोपीय सहयोगियों के बीच दरार को और गहरा कर दिया है।
ग्रीनलैंड के पिटफिक बेस पर अमेरिकी विमानों की तैनाती, डेनमार्क ने भी बढ़ाई चौकसी
21 Jan, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कोपेनहेगन। ग्रीनलैंड की संप्रभुता को लेकर वैश्विक स्तर पर जारी राजनीतिक तनाव के बीच आर्कटिक क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की इच्छा जताने और हालिया धमकियों के बाद उत्तर अमेरिकी एयरोस्पेस डिफेंस कमांड (नोराड) ने सोमवार को घोषणा की है कि उसके सैन्य विमान जल्द ही ग्रीनलैंड के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पिटफिक स्पेस बेस पर तैनात किए जाएंगे। जिसे पहले थुले एयर फोर्स बेस के नाम से जाना जाता था, यह बेस उत्तर-पश्चिमी ग्रीनलैंड में स्थित है और अमेरिका की मिसाइल चेतावनी प्रणाली का एक अहम केंद्र है।
नोराड के अधिकारियों के अनुसार, यह तैनाती नियमित सैन्य गतिविधियों का हिस्सा है और इसका उद्देश्य उत्तरी अमेरिका की हवाई सुरक्षा को और अधिक सुदृढ़ करना है। बयान में स्पष्ट किया गया है कि यह कदम अमेरिका, कनाडा और डेनमार्क के बीच मौजूदा रक्षा समझौतों के तहत उठाया गया है और इसके लिए कोपेनहेगन (डेनमार्क) से आवश्यक कूटनीतिक मंजूरी ले ली गई है। साथ ही, ग्रीनलैंड के स्थानीय प्रशासन को भी इस सैन्य आवाजाही की सूचना दे दी गई है। इस बीच, डेनमार्क ने भी द्वीप पर अपनी सैन्य उपस्थिति को व्यापक स्तर पर बढ़ा दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, डेनमार्क के अतिरिक्त सैनिकों और भारी सैन्य उपकरणों को लेकर कई विमान ग्रीनलैंड की राजधानी नूक और कांगेरलुसुआक पहुंचे हैं। वहां पहले से तैनात 200 से अधिक सैनिकों की टुकड़ी के साथ अब नई इकाइयां भी रणनीतिक मोर्चों पर तैनात की गई हैं। यह सैन्य सक्रियता उस समय देखी जा रही है जब हाल ही में डेनमार्क की अगुवाई में एक बहुराष्ट्रीय युद्धाभ्यास संपन्न हुआ है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का तर्क है कि रूस और चीन की बढ़ती आर्कटिक महत्वाकांक्षाओं के कारण ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य है। उन्होंने यहां तक संकेत दिए हैं कि वे ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इस स्थिति पर डेनमार्क के विदेश मंत्री ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि यूरोप हर दिन एक नई धमकी के साथ जाग रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए ठीक नहीं है। हालांकि, जर्मनी ने इस मुद्दे पर अन्य यूरोपीय देशों से अलग रुख अपनाते हुए कहा है कि सुरक्षा के लिहाज से अमेरिका की आशंकाएं पूरी तरह निराधार नहीं हैं। फिलहाल, इन सैन्य गतिविधियों ने आर्कटिक क्षेत्र में भविष्य के टकराव की आशंकाओं को बढ़ा दिया है।
Russia Ukraine War: घायल सैनिकों को नहीं बचा पा रहा यूक्रेन, खाने-पीने के पड़े लाले
21 Jan, 2026 10:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मॉस्को। रूस और यूक्रेन (Russia Ukraine War) के बीच 4 सालों से जारी जंग के बीच एक यूक्रेनी सेना (Ukrainian army) ने दावा किया है कि यूक्रेन (Ukraine) अपने घायल सैनिकों को भी नहीं बचा पा रहा है और कई सैनिक बिना इलाज के मर रहे हैं। यह दावा रूस के कब्जे में मौजूद यूक्रेन के युद्धबंदी एलेक्जेंडर सोतनिवोक ने किया है। सोतनिवोक ने रूसी रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी एक वीडियो में यह दावा किया है
सोतनिवोक ने सोमवार को एक बयान जारी करते हुए कहा, “घायलों को लड़ाई वाले क्षेत्रों से निकालने में एक बड़ी समस्या आ रही है। अगर कोई सैनिक घायलों को ले जाने वाले ट्रक तक नहीं पहुंच पा रहा, तो उसका मरना तय है। यूक्रेनी सेना घायलों को तभी निकाल रही है, जब वह एक खास जगह पहुंच रहे हैं।”
उन्होंने कहा कि दिमित्रोव की ओर पांच-दिन की यात्रा के दौरान उन्होंने कई मृतकों को देखा। एक सैनिक एक पेड़ से लगकर बैठा था। सोतनिवोक और उनके साथी सैनिक को लगा कि वह जिन्दा है, लेकिन वह मर चुका था। उन्होंने कहा कि वह शख्स युद्ध में घायल होने के बाद निकासी बिंदु तक पहुंचने की कोशिश कर रहा था, लेकिन रास्ते में ही मर गया।
सोतनिकोव ने आगे कहा कि उनका चार सैनिकों का समूह दिमित्रोव में युद्धक्षेत्र में पहुंचा, तो उनके ऊपर मोर्टार से हमला हो गया। इस हमले में दो सैनिक घायल हो गये। बचे हुए दोनों सैनिक जैसे-तैसे कुछ दूर चलकर एक घर में घुसे, जहां पहले से रूसी सैनिक मौजूद थे। उन्होंने वहां हथियार डालने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि यूक्रेनी सेना के पास खाने-पीने की चीजों की भी कमी है। कभी-कभी ड्रोन खाने का सामान युद्धक्षेत्र में पहुंचाते हैं, लेकिन उनमें भी नाश्ते की ही चीजें होती हैं।
सोतनिकोव ने कहा कि उनके पास कोई सैन्य अनुभव नहीं था, लेकिन यूक्रेन ने उन्हें जबरदस्ती सीमा पर भेज दिया। उन्होंने अफवाहें सुनी थीं कि भर्ती कार्यालय के स्टाफ 15-16 हज़ार डॉलर लेकर लोगों को रिहा कर रहे थे, लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं थी। उन्होंने कहा, ” आप एक दरवाजे से निकलते हैं और फौरन ही दूसरे लोग आपको पकड़कर दूसरी दिशा में भेजने के लिए सेना में भर्ती करने आ जाते हैं। “
आधुनिक युद्ध, खुफिया तंत्र और आर्थिक ताकत की नींव अब एडवांस्ड एआई चिप्स पर टिकी
21 Jan, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन। अमेरिका के सांसदों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पूर्व अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अमेरिका और चीन के बीच एआई को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा अब देश की सुरक्षा का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। उनका कहना है कि आधुनिक युद्ध, खुफिया तंत्र और आर्थिक ताकत की नींव अब एडवांस्ड एआई चिप्स पर टिकी है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विशेषज्ञों ने बताया कि आने वाले दस सालों में एआई की यह दौड़ तय करेगी कि सैन्य शक्ति में आगे कौन रहेगा और क्या अमेरिका चीन पर अपनी तकनीकी बढ़त बनाए रख पाएगा या नहीं। समिति के अध्यक्ष ने साफ शब्दों में कहा कि एआई की दौड़ जीतना अमेरिका की राष्ट्रीय और आर्थिक सुरक्षा दोनों के लिए जरूरी है। उन्होंने कहा कि इसका सीधा असर इस बात पर पड़ेगा कि सैन्य ताकत में अमेरिका चीन से आगे रहता है या नहीं।
समिति के अध्यक्ष के मुताबिक आज एआई का इस्तेमाल सेना के कमांड सिस्टम, निगरानी, साइबर ऑपरेशन और परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण में हो रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मैट पॉटिंजर ने चेतावनी दी कि अगर चीन को एडवांस्ड अमेरिकी एआई चिप्स तक पहुंच दी गई, तो उसकी सैन्य ताकत बढ़ेगी। उनका कहना था कि एनविडिया की एडवांस्ड चिप्स चीन की साइबर युद्ध, ड्रोन और खुफिया क्षमताओं को मजबूत कर सकती है। पॉटिंजर ने बताया कि चीन की नीति में जो तकनीक आम इस्तेमाल के लिए बनती है, वही सैन्य कामों में भी जाती है।
पूर्व बाइडन प्रशासन अधिकारी जॉन फाइनर ने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच एआई अब सबसे अहम प्रतिस्पर्धा बन चुका है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस मुद्दे पर लापरवाही भारी पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि चीन तेजी से एआई को महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी के रूप में देख रहा है जो उनकी आर्थिक और सैन्य महत्वाकांक्षा को सक्षम बनाएगी। इसी वजह से एडवांस्ड चिप्स और सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरणों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध चीन की रफ्तार को धीमा करने में अहम रहे हैं। पॉटिंजर के मुताबिक चीन विदेशों से एडवांस्ड चिप्स खरीदकर इस कमी को पूरा करने की कोशिश कर रहा है और हर हाल में अमेरिका की बराबरी करना चाहता है। सांसदों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि अमेरिकी चिप्स खरीदने वाली प्राइवेट चीनी टेक्नोलॉजी कंपनियां अक्सर सरकार के साथ मिलकर काम करती हैं। पोटिंगर ने डीपसीक, अलीबाबा और टेनसेंट जैसी कंपनियों का उदाहरण दिया, जो चीन के बड़े मिलिट्री लक्ष्यों से जुड़ी हैं।
भारत-यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौता अंतिम चरण में, EU प्रमुख ने इसे बताया ऐतिहासिक
21 Jan, 2026 09:20 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दावोस । यूरोपीय संघ (EU) की प्रमुख उर्सुला वॉन डर लेयेन (Ursula von der Leyen) ने कहा है कि भारत (India) और यूरोपीय संघ (European Union) के बीच होने वाला मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अब अपने निर्णायक चरण में पहुंच गया है। उन्होंने दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक मंच (WEF) में कहा कि दोनों पक्ष एक “ऐतिहासिक व्यापार समझौते के बेहद करीब” हैं, जिसे कुछ लोग “मदर ऑफ ऑल डील्स” भी कह रहे हैं। अपने संबोधन में वॉन डर लेयेन ने कहा कि यूरोप टैरिफ की बजाय निष्पक्ष व्यापार, अलगाव की बजाय साझेदारी और शोषण की बजाय टिकाऊ विकास को बढ़ावा देना चाहता है। उन्होंने बताया कि दावोस के तुरंत बाद वह भारत दौरे पर जाएंगी, हालांकि अभी कुछ मुद्दों पर काम बाकी है।
क्यों है यह समझौता खास?
उन्होंने कहा, “हम एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते के मुहाने पर खड़े हैं। कुछ लोग इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहते हैं।” EU प्रमुख के अनुसार, यह समझौता करीब दो अरब लोगों का साझा बाजार बनाएगा और दुनिया की लगभग 25% जीडीपी को कवर करेगा। इससे यूरोपीय कंपनियों को भारत जैसे तेजी से बढ़ते बाजार में पहले कदम का बड़ा फायदा मिलेगा।
भारत EU की रणनीति का केंद्र
वॉन डर लेयेन ने भारत को यूरोप की नई आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र इस सदी का आर्थिक केंद्र है और यूरोप भारत जैसे देशों के साथ अपने रिश्ते और मजबूत करना चाहता है। उन्होंने कहा कि EU खासतौर पर क्लीन टेक्नोलॉजी, डिजिटल ढांचा, दवाइयों और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में भारत के साथ सप्लाई चेन मजबूत करना चाहता है।
जल्द भारत दौरा
EU प्रमुख के ये बयान ऐसे समय में आया है, जब वह 25 से 27 जनवरी 2026 के बीच भारत के दौरे पर आने वाली हैं। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा और EU प्रमुख उर्सुला वॉन डर लेयेन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर भारत आएंगे। दोनों नेता भारत के 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगे, जो भारत-EU संबंधों की बढ़ती अहमियत को दर्शाता है।
शिखर सम्मेलन और बिजनेस फोरम
27 जनवरी को नई दिल्ली में 16वां भारत-EU शिखर सम्मेलन होगा, जिसकी सह-अध्यक्षता प्रधानमंत्री मोदी करेंगे। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच उच्चस्तरीय बैठकें होंगी और एक भारत-EU बिजनेस फोरम भी आयोजित किया जाएगा। अगर यह व्यापार समझौता पूरा होता है तो यह दुनिया के सबसे बड़े और महत्वाकांक्षी समझौतों में से एक होगा। इसमें केवल टैक्स नहीं, बल्कि सेवाएं, निवेश, डिजिटल व्यापार, पर्यावरण मानक, नियमों में सहयोग जैसे मुद्दे भी शामिल होंगे। भारत को इससे यूरोप जैसे बड़े बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी, जबकि यूरोप को भारत जैसे तेज़ी से बढ़ते देश में मजबूत पकड़ मिलेगी। हालांकि अभी कुछ जटिल मुद्दे बाकी हैं, लेकिन दावोस से आए संकेत बताते हैं कि भारत और यूरोपीय संघ इस ऐतिहासिक समझौते को पूरा करने के बेहद करीब हैं। आने वाले दिनों में नई दिल्ली में होने वाली बैठकें इस दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती हैं।
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