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भारत-अमेरिका की AI साझेदारी होगी मजबूत, चीन को लेकर बढ़ी रणनीतिक तैयारी
9 May, 2026 10:23 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन | कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और भविष्य की तकनीकों के क्षेत्र में भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक सहयोग एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग की उप सहायक सचिव बेथानी मॉरिसन ने 'यूएस-इंडिया एआई एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी फोरम' में जोर देते हुए कहा कि यदि दोनों देशों को एआई की वास्तविक शक्ति का उपयोग करना है, तो उन्हें साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और खुलेपन के सिद्धांतों को अपनाना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुरक्षा के लिहाज से यह अनिवार्य है कि दोनों राष्ट्र तकनीकी रूप से अपने प्रतिद्वंद्वी देशों पर निर्भर न रहें।
सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला और इंडो-पैसिफिक विजन
बेथानी मॉरिसन ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को वैश्विक तकनीक का केंद्र बनाने की अमेरिकी इच्छा को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि इस क्षेत्र के देशों को ऐसी विश्वस्तरीय तकनीक मिले, जिसका उपयोग सामाजिक कल्याण के लिए किया जा सके। मॉरिसन के अनुसार, एआई के लाभ तभी स्थायी होंगे जब तकनीकी ढांचा सुरक्षित, इंटरऑपरेबल और भरोसेमंद आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पर टिका हो। उन्होंने चेतावनी दी कि विरोधी ताकतों पर निर्भरता इस तकनीकी प्रगति के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
एआई क्षेत्र में निवेश का नया कीर्तिमान
एआई की आर्थिक क्षमता पर प्रकाश डालते हुए मॉरिसन ने बताया कि साल 2026 की पहली तिमाही में निजी क्षेत्र ने इस क्षेत्र में 300 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। दिलचस्प बात यह है कि इस वैश्विक निवेश का आधा हिस्सा अमेरिकी कंपनियों की ओर से आया है। उन्होंने इसे एक वैश्विक तकनीकी क्रांति करार दिया, जिसमें नवाचार की गति पहले से कहीं अधिक तेज हो गई है।
भारतीय कंपनियों का बढ़ता दबदबा और पीएम मोदी की प्रशंसा
अमेरिकी अधिकारी ने भारतीय कंपनियों की वैश्विक भागीदारी की जमकर सराहना की। उन्होंने बताया कि 'सेलेक्टयूएसए इन्वेस्टमेंट समिट' के दौरान भारतीय फर्मों ने 1.1 अरब डॉलर के निवेश का ऐलान किया है, जो दोनों देशों के बीच गहरे होते आर्थिक संबंधों का प्रमाण है। साथ ही, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन की तारीफ करते हुए कहा कि भारत सरकार एआई के दोहरे पहलुओं—विकास की संभावना और सुरक्षा की चुनौतियों—को बखूबी समझती है। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत और अमेरिका मिलकर वैश्विक स्तर पर एआई के भविष्य को एक सुरक्षित दिशा प्रदान करेंगे।
GAESA पर अमेरिकी प्रतिबंध: क्यूबा की अर्थव्यवस्था और सप्लाई सिस्टम पर बढ़ा दबाव
9 May, 2026 10:14 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हवाना (क्यूबा) | ट्रंप प्रशासन ने क्यूबा की सत्ता पर शिकंजा कसते हुए नए और कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा की है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इन कदमों का जोरदार समर्थन करते हुए स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई क्यूबा के आम नागरिकों के खिलाफ नहीं है। रुबियो के अनुसार, इन पाबंदियों का असल उद्देश्य उस आर्थिक तंत्र को ध्वस्त करना है जो वहां की सत्ता और सेना की ताकत को बनाए रखता है।
सैन्य कारोबारी समूह 'GAESA' बना मुख्य लक्ष्य
अमेरिका की इन ताजा पाबंदियों की सबसे बड़ी मार क्यूबा की सेना द्वारा संचालित विशाल व्यावसायिक समूह GAESA पर पड़ी है। इसके साथ ही, निकेल उत्पादन क्षेत्र में सक्रिय कनाडाई कंपनी 'शेरिट इंटरनेशनल' के संयुक्त उपक्रम 'मोआ निकेल' को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस कड़े फैसले के तुरंत बाद शेरिट इंटरनेशनल ने क्यूबा से अपना 32 साल पुराना कारोबार पूरी तरह समेटने का ऐलान कर दिया है, जो क्यूबा के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका माना जा रहा है।
विदेशी निवेश पर मंडराया संकट
आर्थिक विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने इन प्रतिबंधों को क्यूबा की जर्जर अर्थव्यवस्था के लिए 'ताबूत में आखिरी कील' जैसा बताया है। जानकारों का कहना है कि नई कानूनी शक्तियों के जरिए अमेरिका अब उन तीसरे देशों की कंपनियों पर भी कार्रवाई कर सकेगा, जो क्यूबा के साथ व्यापार कर रही हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, GAESA क्यूबा की जीडीपी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा नियंत्रित करता है, जिसमें होटल, रिटेल, और वित्तीय सेवाएं शामिल हैं। नए प्रतिबंधों के डर से अब विदेशी साझेदार क्यूबा से दूरी बना सकते हैं, क्योंकि कोई भी कंपनी अमेरिकी बाजार और संपत्ति को दांव पर नहीं लगाना चाहेगी।
मानवीय संकट गहराने की चेतावनी और सरकारी विरोध
दूसरी तरफ, क्यूबा सरकार ने इन पाबंदियों को 'सामूहिक सजा' करार देते हुए अमेरिका पर राजनीतिक दबाव बनाने का आरोप लगाया है। हवाना का कहना है कि इन प्रतिबंधों से आम जनता की मुश्किलें और बढ़ेंगी। क्यूबा पहले से ही ईंधन की कमी, बिजली संकट और खाद्य पदार्थों की किल्लत से जूझ रहा है। गौरतलब है कि GAESA का ढांचा 90 के दशक में सोवियत संघ के पतन के बाद सेना द्वारा तैयार किया गया था, जिसका नेतृत्व अब अनिया गिलर्मिना लास्त्रेस कर रही हैं, जिन्हें अमेरिका ने पहले ही ब्लैकलिस्ट कर दिया है।
चीन में हाई प्रोफाइल नेताओं पर कार्रवाई से दुनिया की नजरें टिकीं
8 May, 2026 07:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
बीजिंग: चीन में भ्रष्टाचार पर सबसे बड़ा प्रहार; दो पूर्व रक्षा मंत्रियों को 'मौत की सजा', सैन्य गलियारों में हड़कंप
बीजिंग। भ्रष्टाचार के खिलाफ चीन की जीरो टॉलरेंस नीति के तहत एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया गया है। चीनी सैन्य अदालत ने देश के दो पूर्व रक्षा मंत्रियों, ली शांगफू और वेई फेंगहे को रिश्वतखोरी के गंभीर आरोपों में दोषी करार देते हुए 'मौत की सजा' सुनाई है। हालांकि, इस सजा के साथ दो साल की मोहलत (सस्पेंडेड डेथ सेंटेंस) भी दी गई है।
क्या है सजा का प्रावधान?
चीनी कानून के तहत 'सस्पेंडेड डेथ सेंटेंस' का अर्थ है कि यदि अगले दो वर्षों तक दोषियों का आचरण सही रहता है और वे किसी नए अपराध में लिप्त नहीं पाए जाते, तो उनकी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया जाएगा।
किन आरोपों में घिरे पूर्व मंत्री?
चीनी सरकारी मीडिया और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के अनुसार:
वेई फेंगहे (2018-2023): चीन की सेना के प्रभावशाली नेता रहे वेई फेंगहे को भारी मात्रा में रिश्वत लेने का दोषी पाया गया है। उन पर रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे।
ली शांगफू (अक्टूबर 2023 तक): वेई फेंगहे के उत्तराधिकारी रहे ली शांगफू पर रिश्वत लेने के साथ-साथ रिश्वत देने के आरोप भी साबित हुए हैं। बता दें कि रूसी सैन्य उपकरणों की खरीद के कारण अमेरिका ने उन पर पहले ही प्रतिबंध लगा रखे थे।
शी जिनपिंग का 'क्लीनअप' अभियान
यह कठोर फैसला राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उस भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का हिस्सा है, जिसे उन्होंने सत्ता संभालने के बाद शुरू किया था।
सैन्य आयोग में बदलाव: रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन के केंद्रीय सैन्य आयोग (CMC) का ढांचा पूरी तरह बदल चुका है। पहले 11 सदस्यों वाले इस आयोग में अब शी जिनपिंग के अलावा केवल एक ही पुराना सदस्य बचा है।
राजनीतिक संदेश: विशेषज्ञों का मानना है कि इस कार्रवाई के जरिए जिनपिंग ने न केवल भ्रष्टाचार पर चोट की है, बल्कि सेना और सरकार पर अपनी राजनीतिक पकड़ को भी अभूतपूर्व रूप से मजबूत कर लिया है।
चीनी राजनीति पर प्रभाव
इन सजाओं ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। वर्तमान में डोंग जून चीन के रक्षा मंत्री हैं, लेकिन उन्हें अभी तक केंद्रीय सैन्य आयोग में शामिल नहीं किया गया है, जिससे चीन के शीर्ष सैन्य नेतृत्व के भविष्य को लेकर कयासों का बाजार गर्म है। यह फैसला एक स्पष्ट संदेश है कि भ्रष्टाचार के मामलों में चीन में किसी भी पद पर बैठे व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।
आरेफ का बड़ा बयान- ईरान की जीत का जश्न जल्द मनाया जाएगा
8 May, 2026 04:21 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम के बाद एक बार फिर टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रैट ऑफ होर्मुज) में दोनों ओर से नए सिरे से सैन्य हमले शुरू होने की खबरें आ रही हैं। इस बीच ईरान के पहले उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरेफ ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि ईरानी जनता जल्द ही अमेरिका और इजराइल के विरुद्ध इस संघर्ष में एक ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाएगी। उनके इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक और सैन्य हलचल बढ़ा दी है।
ईरान का दावा: जल्द हटेंगी पाबंदियां और होगी जीत
ईरानी उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरेफ ने युद्ध से प्रभावित उद्योगों और स्वास्थ्य सुविधाओं का जायजा लेते हुए कहा कि देश में पुनर्निर्माण का काम तेजी से चल रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि ईरानी लोगों के संघर्ष के परिणामस्वरूप जल्द ही उन पर लगी अंतरराष्ट्रीय पाबंदियां हटा ली जाएंगी। होर्मुज स्ट्रेट को ईरान का रणनीतिक हिस्सा बताते हुए आरेफ ने स्पष्ट किया कि ईरान इस जलमार्ग के प्रबंधन के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने जोर दिया कि ईरान क्षेत्र में अपना दबदबा कायम नहीं करना चाहता, बल्कि वह क्षेत्रीय सहयोग के जरिए इस इलाके को एक बड़ा आर्थिक केंद्र बनाने का पक्षधर है।
डोनाल्ड ट्रंप का रुख: युद्धविराम अभी भी प्रभावी
ईरान के आक्रामक बयानों और ताजा झड़पों के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि दोनों देशों के बीच युद्धविराम अभी भी लागू है। ट्रंप ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि युद्धविराम टूटता, तो दुनिया को ईरान से उठती एक बड़ी सैन्य चमक के रूप में इसका तुरंत पता चल जाता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका की ओर से ईरान को दिया गया शांति प्रस्ताव महज एक पन्ने का औपचारिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक और ठोस योजना है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होंगे और उसे अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े महत्वपूर्ण संसाधन अमेरिका को सौंपने होंगे।
शांति के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता और नया प्रस्ताव
वर्तमान में ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान एक मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। तेहरान इस समय पाकिस्तानी दूतों के जरिए मिले अमेरिकी संदेशों की समीक्षा कर रहा है। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका के प्रस्ताव में न केवल परमाणु हथियारों पर रोक शामिल है, बल्कि इसमें 'न्यूक्लियर डस्ट' और अन्य तकनीकी संसाधन भी मांगे गए हैं। यह स्थिति तब बनी हुई है जब रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज के जलक्षेत्र में तनाव बना हुआ है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि ईरान अमेरिका के इस 'व्यापक प्रस्ताव' पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है।
होर्मुज संकट का असर वैश्विक बाजार पर, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
8 May, 2026 02:34 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में छिड़ी सैन्य जंग ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। खाड़ी क्षेत्र में दोनों देशों के बीच बढ़ते मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मची हुई है। गुरुवार को कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 7.5 प्रतिशत का जबरदस्त उछाल देखा गया, जिससे तेल की कीमतें 103.70 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गईं। हालांकि, शुक्रवार को एशियाई बाजारों में मामूली गिरावट के साथ कीमतें 101.12 डॉलर प्रति बैरल पर दर्ज की गईं, लेकिन बाजार में असुरक्षा का माहौल अब भी बना हुआ है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में सैन्य टकराव और जवाबी कार्रवाई
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, तनाव तब चरम पर पहुंच गया जब ईरानी मिसाइलों, ड्रोनों और लड़ाकू नौकाओं ने अमेरिकी नौसेना के तीन युद्धपोतों को अपना निशाना बनाया। इसके जवाब में अमेरिकी सेना ने ईरान के रणनीतिक ठिकानों पर जोरदार प्रहार किया है। दूसरी ओर, ईरान ने अमेरिका पर ही युद्धविराम के उल्लंघन का आरोप मढ़ते हुए कहा है कि अमेरिकी सेना ने उनके तेल टैंकरों और केशं आइलैंड जैसे नागरिक क्षेत्रों को निशाना बनाया है। इस गोलाबारी और आरोप-प्रत्यारोप ने इस समुद्री मार्ग को एक युद्ध क्षेत्र में बदल दिया है।
वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट और बंद होता व्यापारिक मार्ग
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल गलियारा है, जहाँ से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। फरवरी महीने से ही इस जलमार्ग पर व्यापारिक जहाजों की आवाजाही लगभग ठप पड़ी हुई है, जिससे ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है। सैन्य संघर्ष की वजह से जहाजों के मार्ग बदलने और आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने के कारण तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
कीमतों में 40 प्रतिशत का उछाल और आर्थिक प्रभाव
इस युद्ध के शुरू होने के बाद से अब तक ब्रेंट क्रूड की कीमतों में कुल 40 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष जल्द नहीं रुका और तेल की कीमतें इसी तरह 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहीं, तो दुनिया भर में मुद्रास्फीति (महंगाई) का नया दौर शुरू हो सकता है। फिलहाल तेल बाजार की नजरें दोनों देशों की अगली सैन्य गतिविधि और ओपेक (OPEC) देशों के रुख पर टिकी हुई हैं।
छछरौली में युवक की मौत के बाद इलाके में दहशत और चर्चा
8 May, 2026 02:24 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
यमुनानगर। जिले के छछरौली इलाके में एक 27 वर्षीय युवक की रहस्यमयी हालात में मौत होने से सनसनी फैल गई है। मृतक की शिनाख्त बलाचौर की टपरियां निवासी सूरज के रूप में हुई है। तीन बहनों के इकलौते भाई और दो मासूम बच्चों के पिता की इस तरह अचानक मौत से पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई है। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर मामले की तफ्तीश शुरू कर दी है।
आंगन में मिला शव, परिजनों ने जताया संदेह
घटनाक्रम के अनुसार, शुक्रवार सुबह सूरज का शव उसके घर के आंगन में बेसुध पड़ा मिला। सूचना मिलते ही छछरौली थाना पुलिस और परिजन मौके पर पहुँचे। मृतक की बहन सरोज ने मौके के हालात को संदिग्ध बताते हुए पुलिस को शिकायत दी है। परिजनों का आरोप है कि जब वे घर पहुँचे तो वहां सामान बिखरा हुआ था और सूरज के शरीर पर कुछ ऐसे निशान मिले हैं, जो किसी अनहोनी की ओर इशारा कर रहे हैं। पुलिस ने साक्ष्यों को सुरक्षित करते हुए शव को पोस्टमार्टम के लिए यमुनानगर के सिविल अस्पताल भेज दिया है।
आधी रात को हुआ था विवाद, सुबह मिली लाश
पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक, सूरज की शादी साल 2022 में हुई थी और उसकी एक 3 साल की बेटी व 3 महीने का बेटा है। पूछताछ में सूरज की पत्नी ने बताया कि रात के समय दोनों के बीच किसी बात को लेकर कहासुनी हुई थी। इसके बाद वह अपने बच्चों को लेकर कमरे में सोने चली गई। पत्नी का दावा है कि जब वह सुबह करीब 4 बजे बाहर आई, तो उसने सूरज को आंगन में मृत अवस्था में पाया।
परिजनों के गंभीर आरोप और पुलिस की जांच
मृतक की बहन ने पुलिस को दी शिकायत में कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि रात को झगड़ा हुआ था और सुबह मौत हुई, तो इसकी जानकारी मायके पक्ष या अन्य रिश्तेदारों को तुरंत क्यों नहीं दी गई? उन्हें आसपास के लोगों से घटना का पता चला। फिलहाल, छछरौली पुलिस ने परिजनों के बयानों और शुरुआती साक्ष्यों के आधार पर जांच का दायरा बढ़ा दिया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के असली कारणों का खुलासा हो पाएगा।
US कोर्ट का बड़ा फैसला, Donald Trump की टैरिफ नीति पर रोक
8 May, 2026 01:32 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन: अमेरिका की भू-राजनीति और वैश्विक व्यापार के मोर्चे पर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक नीतियों को एक बड़ा न्यायिक झटका लगा है। अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने ट्रंप सरकार द्वारा वैश्विक स्तर पर लागू किए गए 10 प्रतिशत के आयात शुल्क (टैरिफ) को असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने का आदेश दिया है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार अदालत ने अपने फैसले में यह साफ कर दिया कि फरवरी 2026 में लागू किया गया यह टैरिफ 1974 के व्यापार अधिनियम की कानूनी सीमाओं का उल्लंघन करता है, जिससे अमेरिकी बाजारों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में एक बार फिर अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है।
अदालती फैसले का आधार और कानूनी विसंगतियां
अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार अदालत ने 2-1 के बहुमत से दिए गए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ने 1974 के व्यापार कानून की धारा 122 का अनुचित इस्तेमाल किया है। ट्रंप प्रशासन ने तर्क दिया था कि यह कानून भुगतान संतुलन के घाटे को सुधारने और डॉलर की स्थिति मजबूत करने के लिए 150 दिनों तक शुल्क लगाने का अधिकार देता है। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि जिन व्यापारिक घाटों का हवाला दिया गया, उन्हें ठीक करने के लिए यह टैरिफ किसी भी तरह से उचित या कानूनी कदम नहीं था। यह फैसला उन 24 राज्यों और छोटे व्यापारियों के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है जिन्होंने इस नीति को सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों को दरकिनार करने की कोशिश बताया था।
कुछ प्रमुख क्षेत्रों को फिलहाल राहत नहीं
भले ही अदालत ने 10 प्रतिशत के व्यापक आयात शुल्क को रद्द कर दिया है, लेकिन स्टील, एल्युमीनियम और ऑटोमोबाइल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। इन क्षेत्रों पर पहले से लागू टैरिफ प्रभावी रहेंगे क्योंकि वे इस विशेष कानूनी चुनौती या पिछले अदालती फैसलों के दायरे से बाहर हैं। इसका अर्थ यह है कि इन विशेष उद्योगों से जुड़ी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और कीमतों पर फिलहाल कोई नरमी आने की उम्मीद नहीं है।
भविष्य की कानूनी लड़ाई और व्यापारिक अनिश्चितता
फेडरल कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब गेंद अमेरिकी न्याय विभाग के पाले में है। ऐसी पूरी संभावना जताई जा रही है कि सरकार इस फैसले को 'यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स' में चुनौती देगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के साथ जारी तनाव और वैश्विक अस्थिरता के बीच इस तरह के कानूनी टकराव से अमेरिकी बाजारों में निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है। फिलहाल, इस आदेश ने उन देशों और कंपनियों को थोड़ी राहत दी है जो अमेरिकी बाजार में अपने निर्यात को लेकर चिंतित थे, लेकिन अंतिम समाधान उच्च न्यायालय की अगली सुनवाई पर ही टिका है।
लाडो लक्ष्मी योजना के लाभार्थियों को मिली सातवीं किश्त की सौगात
8 May, 2026 12:45 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
चंडीगढ़। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने शुक्रवार को प्रदेशवासियों के लिए सौगातों का पिटारा खोल दिया। एक भव्य कार्यक्रम के दौरान सीएम ने विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के तहत हजारों करोड़ रुपये की राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में ट्रांसफर (DBT) की। मुख्यमंत्री ने डिजिटल माध्यम से बटन दबाकर किसान, महिला और छात्र वर्ग को बड़ी आर्थिक राहत पहुंचाई।
'लाडो लक्ष्मी' और सामाजिक सुरक्षा पर जोर
मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि आज 'लाडो लक्ष्मी योजना' की सातवीं किस्त के रूप में 9.76 लाख महिलाओं के खातों में 205 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। इसके अलावा:
पेंशन: 18 अलग-अलग सामाजिक सुरक्षा पेंशनों के तहत 35.62 लाख लाभार्थियों को 1146.73 करोड़ रुपये दिए गए।
रसोई राहत: 11.23 लाख बहनों के खातों में गैस सिलेंडर सब्सिडी के रूप में 38.54 करोड़ रुपये की राशि भेजी गई।
दयालु योजना: 5677 परिवारों को संबल देते हुए 215.29 करोड़ रुपये सीधे ट्रांसफर किए गए।
किसानों और छात्रों के लिए बड़े कदम
अन्नदाताओं के हित में बड़ा फैसला लेते हुए सीएम ने खरीफ 2025 की फसल नुकसान के मुआवजे के तौर पर 1.50 लाख से अधिक किसानों को 370.52 करोड़ रुपये वितरित किए।
बीमा क्लेम: पिछले 11 वर्षों में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत अब तक किसानों को 9,888 करोड़ रुपये का क्लेम दिया जा चुका है।
सब्जी उत्पादक: भावांतर भरपाई योजना के जरिए आलू और फूलगोभी उगाने वाले 5296 किसानों को 38.88 करोड़ रुपये की सहायता दी गई।
शिक्षा: अनुसूचित जाति (SC) और पिछड़ा वर्ग (BC) के 64,923 विद्यार्थियों को 100.45 करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति सीधे उनके खातों में भेजी गई, जिसे अब राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल से जोड़ा गया है।
डिजिटल हरियाणा: अब व्हाट्सएप पर मिलेगा J-Form
किसानों की सुविधा के लिए मुख्यमंत्री ने एक नई ऐप और डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत की। अब रबी सीजन की फसलों का J-Form किसानों को सीधे उनके व्हाट्सएप नंबर पर मिलेगा, जिससे उन्हें आढ़तियों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। साथ ही, भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए 'ऑनलाइन बिल्डिंग प्लान अप्रूवल सिस्टम' भी लॉन्च किया गया।
United States पर टैंकर उड़ाने का आरोप, Iran ने दी जवाब की धमकी
8 May, 2026 12:32 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तेहरान: मध्य पूर्व में शांति की उम्मीदों को करारा झटका देते हुए ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। ईरान ने अमेरिकी सेना पर ओमान की खाड़ी में उसके तेल टैंकरों पर हमला करने और घोषित संघर्षविराम का उल्लंघन करने का सनसनीखेज आरोप लगाया है। ईरानी अधिकारियों ने कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि वे अपनी समुद्री सीमाओं और संसाधनों पर होने वाले किसी भी प्रहार को बर्दाश्त नहीं करेंगे और अमेरिकी कार्रवाई का उसी की भाषा में मुहतोड़ जवाब दिया जाएगा।
ओमान की खाड़ी में तेल टैंकरों और तटीय इलाकों पर हमला
ईरानी सैन्य मुख्यालय 'खातम अल-अंबिया' के अनुसार, अमेरिकी सेना ने जास्क के पास ईरानी समुद्री क्षेत्र से होर्मुज जलडमरूमध्य की ओर बढ़ रहे एक तेल टैंकर को निशाना बनाया है। इतना ही नहीं, फुजैरा बंदरगाह के समीप एक अन्य जहाज पर भी हमले की खबर है। प्रवक्ता ने यह गंभीर दावा भी किया है कि कुछ पड़ोसी देशों की मिलीभगत से ईरान के तटीय नागरिक क्षेत्रों जैसे बंदर खामिर, सिरिक और क़ेश्म द्वीप पर हवाई हमले किए गए हैं। हालांकि, इन कथित हमलों में हुए नुकसान की अभी तक कोई स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन इसने क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है।
प्रस्तावित शांति समझौते और सैन्य संघर्ष पर संकट
यह हिंसक घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब दोनों महाशक्तियां पर्दे के पीछे एक 'अस्थायी समझौते' की रूपरेखा पर चर्चा कर रही थीं। इस फ्रेमवर्क के तहत 30 दिनों तक सभी सैन्य अभियानों को रोकने और होर्मुज जलडमरूमध्य को व्यापारिक जहाजों के लिए सुरक्षित खोलने का प्रस्ताव था। इस कूटनीतिक पहल का उद्देश्य एक स्थायी शांति समझौते के लिए आधार तैयार करना था, लेकिन हालिया गोलाबारी के बाद अब इस बातचीत के भविष्य पर अनिश्चितता के काले बादल मंडराने लगे हैं।
परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम के मुद्दे पर गहरा गतिरोध
कूटनीतिक स्तर पर बातचीत की विफलता का सबसे बड़ा कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम बना हुआ है। अमेरिका की सख्त शर्त है कि ईरान अपना सारा समृद्ध यूरेनियम उसे सौंप दे और अगले दो दशकों तक परमाणु गतिविधियों पर पूर्ण विराम लगा दे। वहीं, ईरान अपनी तीन प्रमुख परमाणु सुविधाओं को बंद करने के पक्ष में नहीं है। ईरान ने मध्यम मार्ग अपनाते हुए यूरेनियम के कुछ हिस्से को कमजोर करने और शेष हिस्सा किसी तीसरे देश को देने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन परमाणु संयंत्रों के भविष्य को लेकर दोनों पक्षों के बीच अब भी भारी मतभेद बना हुआ है।
रिश्तों में तल्खी के बावजूद India ने बढ़ाया मदद का हाथ, Nepal को राहत
8 May, 2026 11:49 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारत और नेपाल के बीच हालिया कूटनीतिक तनाव के बावजूद, भारत ने एक बार फिर 'पड़ोसी पहले' की नीति का परिचय दिया है। लिपुलेख दर्रे को लेकर नेपाल सरकार के विवादित बयानों के बीच, भारत ने नेपाल में गहराते कृषि संकट को दूर करने के लिए मदद का हाथ बढ़ाया है। वर्तमान में ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष के कारण वैश्विक बाजार में उर्वरकों (खाद) की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं, जिससे नेपाल की खेती पर संकट मंडरा रहा था। ऐसी स्थिति में भारत अपनी जरूरतों के लिए महंगी खाद खरीदने के बावजूद नेपाल को रियायती दरों पर खाद उपलब्ध करा रहा है।
लिपुलेख विवाद और नेपाल की दोहरी नीति
काठमांडू के मेयर बालेन शाह और नेपाल सरकार द्वारा लिपुलेख दर्रे पर हाल ही में दिए गए बयानों ने दोनों देशों के बीच पुराने सीमा विवाद को फिर से गरमा दिया है। कैलाश मानसरोवर यात्रा का प्रमुख मार्ग माना जाने वाला यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से भारत का हिस्सा रहा है, लेकिन नेपाल पिछले कुछ दशकों से इसे अपना क्षेत्र बताकर विरोध दर्ज कराता रहा है। हैरानी की बात यह है कि एक ओर नेपाल राजनीतिक स्तर पर भारत के खिलाफ मुखर है, वहीं दूसरी ओर देश में खाद की भारी किल्लत और बुवाई का सीजन नजदीक होने के कारण उसने भारत से ही गुहार लगाई है।
आर्थिक संकट और भारत के साथ 'जी-टू-जी' समझौता
नेपाल को अपनी वर्तमान खेती के लिए लगभग 2.5 लाख टन खाद की तत्काल आवश्यकता है, जबकि उसके पास महज 1.71 लाख टन का स्टॉक बचा है। नेपाल के कृषि मंत्रालय के अनुसार, यदि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार से सीधे खाद खरीदते हैं, तो उन्हें लगभग 80 अरब रुपये की भारी सब्सिडी देनी होगी, जिसे वहन करना नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए असंभव है। इस संकट से निपटने के लिए नेपाल सरकार ने भारत की 'राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड' के साथ 'जी-टू-जी' (सरकार से सरकार) समझौता किया है। इसके तहत भारत 60,000 टन यूरिया और 20,000 टन डीएपी की आपूर्ति करेगा।
वैश्विक महंगाई के बीच भारत की दरियादिली
ईरान युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर यूरिया की कीमतें 512 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 959 डॉलर प्रति टन तक पहुँच गई हैं। भारत स्वयं अंतरराष्ट्रीय बाजार से लगभग दोगुनी कीमत चुकाकर खाद का आयात कर रहा है। इसके बावजूद, भारत ने 2022 में हुए द्विपक्षीय समझौते का सम्मान करते हुए नेपाल को पुराने और सस्ते दामों पर खाद देने की गारंटी दी है। भारत का यह कदम स्पष्ट करता है कि वह सीमा विवादों जैसे जटिल मुद्दों के बावजूद अपने पड़ोसी देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों के हितों को प्राथमिकता दे रहा है।
कनाडा में फिर उठी अलगाव की आवाज, Alberta में स्वतंत्र देश की मांग
8 May, 2026 11:31 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कनाडा के अल्बर्टा प्रांत में अलगाव की सुगबुगाहट ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं। तेल और गैस के विशाल भंडार वाले इस प्रांत में एक स्वतंत्र राष्ट्र बनने की मांग को लेकर अलगाववादी संगठनों ने निर्णायक कदम उठाया है। आंदोलनकारियों का दावा है कि उन्होंने जनमत संग्रह (रेफरेंडम) की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवश्यक जनसमर्थन हासिल कर लिया है, जिसके बाद जस्टिन ट्रूडो सरकार की चिंताएं बढ़ गई हैं।
तीन लाख हस्ताक्षरों के साथ जनमत संग्रह का दावा
अल्बर्टा को कनाडा से पृथक करने की मुहिम चला रहे नेताओं ने निर्वाचन अधिकारियों को लगभग तीन लाख लोगों के हस्ताक्षर वाला दस्तावेज सौंपा है। गौरतलब है कि कानूनी रूप से जनमत संग्रह की प्रक्रिया शुरू करने के लिए 1.78 लाख हस्ताक्षरों की ही आवश्यकता थी, लेकिन आंदोलनकारियों ने इससे कहीं अधिक समर्थन जुटाकर अपनी ताकत का अहसास कराया है। आंदोलन के प्रमुख नेता मिच सिलवेस्ट्रे ने इसे अल्बर्टा के इतिहास का एक नया मोड़ बताया है। हालांकि, अभी इन हस्ताक्षरों की आधिकारिक जांच होनी बाकी है और वर्तमान में एक न्यायिक आदेश के चलते इस प्रक्रिया पर अस्थायी रोक लगी हुई है।
19 अक्टूबर की तारीख और स्वायत्तता का सवाल
यदि कानूनी बाधाएं दूर हो जाती हैं, तो आगामी 19 अक्टूबर को प्रस्तावित व्यापक जनमत संग्रह के दौरान 'स्वतंत्र देश' के मुद्दे पर भी मतदान कराया जा सकता है। इसी दिन प्रांत के लोग संविधान और आव्रजन (इमिग्रेशन) जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी अपनी राय देंगे। यदि वोटिंग होती है, तो नागरिकों से सीधे तौर पर उनकी स्वतंत्रता के बारे में पूछा जाएगा। हालांकि, हालिया सर्वेक्षणों के परिणाम अलगाववादियों के लिए बहुत उत्साहजनक नहीं हैं, क्योंकि केवल 30 प्रतिशत जनता ही अलग देश के पक्ष में दिख रही है। इसके बावजूद, अल्बर्टा की प्रीमियर डेनिएल स्मिथ ने संकेत दिया है कि यदि हस्ताक्षर वैध पाए गए, तो वह लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए वोटिंग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएंगी।
आर्थिक असंतोष और ओटावा से टकराव
अल्बर्टा की इस नाराजगी की जड़ें आर्थिक कारणों में गहरी धंसी हुई हैं। यह प्रांत कनाडा के कुल तेल उत्पादन का लगभग 84 प्रतिशत हिस्सा पैदा करता है, जो इसे देश का 'आर्थिक इंजन' बनाता है। यहाँ के निवासियों और नेताओं का मुख्य आरोप यह है कि प्रांत से मिलने वाले भारी-भरकम टैक्स का उपयोग ओटावा स्थित केंद्र सरकार करती है, लेकिन जब नीतियां बनाने या संसाधनों के वितरण की बात आती है, तो अल्बर्टा की उपेक्षा की जाती है। इसी असंतुलन और 'अपनी कमाई पर दूसरे के हक' की भावना ने अलगाववादी आंदोलन को हवा दी है।
दुष्यंत चौटाला मामले में जांच प्रक्रिया पर उठे सवाल
8 May, 2026 09:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
चंडीगढ़। हरियाणा के पूर्व उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की याचिका पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने चौटाला के काफिले को रोकने और उन्हें जान से मारने की धमकी देने के मामले में हरियाणा सरकार, केंद्र सरकार और सीबीआई (CBI) को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है।
अदालत ने एसआईटी (SIT) की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विशेष जांच टीम (SIT) के रवैये पर नाराजगी जताते हुए पूछा कि आखिर अब तक की जांच की वास्तविक स्थिति क्या है? अदालत ने यह भी सवाल किया कि याचिकाकर्ता (दुष्यंत चौटाला) को अब तक जांच प्रक्रिया का हिस्सा क्यों नहीं बनाया गया।
"सहयोग को तैयार, पर नोटिस तक नहीं मिला"
दुष्यंत चौटाला की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता विनोद घई ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल जांच में हर संभव सहयोग देने को तैयार हैं। उन्होंने दलील दी कि:
जांच टीम ने अब तक चौटाला को न तो कोई नोटिस भेजा है और न ही पूछताछ के लिए बुलाया है।
बिना किसी औपचारिक प्रक्रिया के मामले को लटकाए रखना कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है।
एजेंसियों का यह ढुलमुल रवैया निष्पक्ष और पारदर्शी जांच पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
स्वतंत्र एजेंसी से जांच की मांग
बता दें कि दुष्यंत चौटाला ने अपने काफिले को रोककर हथियार दिखाने और धमकी देने की घटना के बाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। अपनी याचिका में उन्होंने दो मुख्य मांगें रखी हैं:
मामले में तुरंत औपचारिक एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए।
जांच को हरियाणा पुलिस से वापस लेकर किसी स्वतंत्र एजेंसी जैसे CBI या पंजाब/चंडीगढ़ पुलिस को सौंपा जाए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
विदेश राज्य मंत्री ने UN में कहा- प्रवासन को मानवीय और व्यावहारिक नजरिए से देखता है भारत
8 May, 2026 08:49 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
न्यूयॉर्क: संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने वैश्विक प्रवासन को लेकर अपना दूरदर्शी दृष्टिकोण साझा करते हुए स्पष्ट किया है कि वह प्रवासियों के लिए एक ऐसा सुरक्षित और मानवीय ढांचा तैयार करने में जुटा है जो भविष्य की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो। केंद्रीय मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने प्रवासन की जटिलताओं पर चर्चा करते हुए जोर दिया कि इसे केवल सांख्यिकीय आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह उन करोड़ों लोगों की उम्मीदों, संघर्षों और समाज में उनके द्वारा दिए जाने वाले बहुमूल्य योगदान का प्रतिबिंब है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह संकल्प दोहराया कि वह न केवल प्रवासियों के हितों की रक्षा कर रहा है, बल्कि मानव तस्करी और अनियमित प्रवासन जैसी गंभीर समस्याओं को जड़ से मिटाने के लिए भी निरंतर सक्रिय है।
प्रवासन प्रबंधन के प्रति भारत का समग्र दृष्टिकोण
भारत सरकार प्रवासन को प्रबंधित करने के लिए एक व्यावहारिक और व्यापक रूपरेखा पर कार्य कर रही है, जिसके केंद्र में प्रवासियों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना निहित है। देश ने अब तक दुनिया के तेईस विभिन्न राष्ट्रों के साथ द्विपक्षीय आवागमन समझौतों और महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं ताकि भारतीयों के लिए विदेशों में रोजगार और प्रवास के रास्ते सुगम और टिकाऊ बन सकें। यह रणनीतिक पहल न केवल प्रवासियों के कल्याण को सुनिश्चित करती है, बल्कि यह भी तय करती है कि प्रवासन की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और नियमबद्ध हो। वैश्विक धन प्रेषण के मामले में अग्रणी होने के कारण भारत यह भली-भांति समझता है कि कैसे सही नीतियों के माध्यम से प्रवासन न केवल व्यक्तियों के जीवन को बदल सकता है, बल्कि राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था को भी नई गति प्रदान कर सकता है।
प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा के लिए डिजिटल एवं तकनीकी पहल
विदेशों में बसे भारतीय नागरिकों की सहायता के लिए भारत ने अपनी कांसुलर सेवाओं को डिजिटल तकनीक से लैस कर एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार किया है। सरकार ने 'मदद' जैसे प्रभावी शिकायत निवारण पोर्टल और विभिन्न प्रवासी संसाधन केंद्रों की स्थापना की है ताकि संकट की घड़ी में नागरिकों को त्वरित समाधान मिल सके। इसके साथ ही पासपोर्ट सेवा ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से दुनिया भर में रहने वाले भारतीयों को बिना किसी देरी के आवश्यक सेवाएं प्रदान की जा रही हैं। तकनीक के इस समावेश ने न केवल सरकारी प्रक्रियाओं को सरल बनाया है, बल्कि प्रवासी भारतीयों के मन में यह विश्वास भी जगाया है कि उनकी मातृभूमि हर परिस्थिति में उनके साथ खड़ी है।
कौशल विकास और आपातकालीन सहायता के प्रभावी माध्यम
प्रवासियों को सशक्त बनाने के लिए भारत ने कौशल विकास और प्रस्थान पूर्व प्रशिक्षण कार्यक्रमों को विशेष प्राथमिकता दी है, जिससे विदेशों में जाने वाले नागरिक न केवल अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहते हैं बल्कि संबंधित देश की संस्कृति से भी पहले ही परिचित हो जाते हैं। आकस्मिक परिस्थितियों में सहायता के लिए भारतीय समुदाय कल्याण कोष एक जीवन रेखा की तरह कार्य कर रहा है, जो साल दो हजार नौ से ही संकट में फंसे नागरिकों को कानूनी परामर्श, आपातकालीन चिकित्सा सहायता और स्वदेश वापसी जैसी सुविधाएं निरंतर प्रदान कर रहा है। इन संगठित प्रयासों के माध्यम से भारत ने यह सिद्ध किया है कि वह अपने चौंतीस मिलियन से अधिक प्रवासी समुदाय की आकांक्षाओं को वैश्विक मानचित्र पर एक नई पहचान देने और उन्हें हर कदम पर सुरक्षित महसूस कराने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
ट्रंप बोले- युद्ध समाप्त करने को लेकर ईरान के साथ अच्छी बातचीत हुई है
7 May, 2026 04:21 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन: मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ शांति बहाली को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। बुधवार को व्हाइट हाउस में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने जानकारी दी कि पिछले 24 घंटों में दोनों देशों के बीच युद्ध समाप्त करने की दिशा में "बहुत अच्छी" बातचीत हुई है। राष्ट्रपति के इस बयान ने पिछले दो महीनों से अधिक समय से चल रहे संघर्ष के रुकने की उम्मीदें जगा दी हैं। ट्रंप के अनुसार, ईरान वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए किसी भी कीमत पर समझौता करने का इच्छुक नजर आ रहा है।
कूटनीतिक बातचीत और समझौते की संभावना
ट्रंप ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए विश्वास जताया कि अमेरिका और ईरान के बीच जल्द ही कोई औपचारिक समझौता संभव है। उन्होंने कहा, "वे (ईरान) समझौता करना चाहते हैं और हमारे बीच हुई हालिया बातचीत के नतीजे काफी उत्साहजनक रहे हैं।" राष्ट्रपति के इस बयान से संकेत मिलते हैं कि दोनों पक्ष अब सैन्य टकराव के बजाय कूटनीतिक मेज पर समस्याओं का समाधान ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं। यदि यह समझौता सिरे चढ़ता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति और तेल बाजार के लिए एक बड़ी राहत साबित हो सकता है।
सैन्य प्रहार और ईरान की वर्तमान स्थिति
ईरान पर दबाव का जिक्र करते हुए ट्रंप ने स्पष्ट किया कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए संयुक्त हमलों ने ईरान की कमर तोड़ दी है। उन्होंने दावा किया कि उन हमलों में ईरान को इतना भारी नुकसान पहुँचा है कि यदि अमेरिका आज उसे उसके हाल पर छोड़ दे, तो देश को पुनर्गठित होने में कम से कम 20 साल लग जाएंगे। राष्ट्रपति का मानना है कि सैन्य शक्ति के इस प्रदर्शन ने ही ईरान को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया है।
भविष्य की राह और अमेरिकी रुख
डोनाल्ड ट्रंप ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका किसी भी समझौते को अपनी शर्तों और मजबूती के साथ आगे बढ़ाएगा। व्हाइट हाउस का मानना है कि मौजूदा सैन्य बढ़त ने अमेरिका को बातचीत में ऊपरी स्तर पर रखा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बातचीत के बाद युद्धविराम की शर्तें क्या होती हैं और क्या ईरान अपनी नीतियों में बड़े बदलाव के लिए तैयार होता है। फिलहाल, ट्रंप के इस बयान ने वैश्विक स्तर पर युद्ध के अंत की सुगबुगाहट तेज कर दी है।
नई तकनीक से बदलेगी जंग की तस्वीर, आसमान में दिखेगा इंसान-मशीन का संगम
7 May, 2026 12:13 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन: पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच गहराते तनाव के बीच भविष्य के युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदलता नजर आ रहा है। अमेरिकी वायुसेना का 'कोलाबोरेटिव कॉम्बैट एयरक्राफ्ट' (CCA) प्रोग्राम अब केवल एक तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि हवाई जंग की एक नई पटकथा लिख रहा है। इस प्रोग्राम के तहत ऐसे एआई-पावर्ड ड्रोन फाइटर जेट्स विकसित किए जा रहे हैं, जो युद्ध के मैदान में इंसानी पायलटों के 'विंगमैन' की भूमिका निभाएंगे। यह तकनीक इंसान और मशीन के तालमेल से आसमान में ऐसी ताकत पैदा करेगी, जिसका सामना करना किसी भी पारंपरिक सेना के लिए लगभग असंभव होगा।
टेस्टिंग के दौर में 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' के लड़ाके
वर्तमान में कई प्रमुख वैश्विक डिफेंस कंपनियां अपने-अपने ड्रोन फाइटर जेट्स के प्रोटोटाइप (प्रारूप) तैयार करने में जुटी हैं। ये हाई-टेक मशीनें इस समय कड़े परीक्षणों के दौर से गुजर रही हैं। अमेरिकी वायुसेना के रणनीतिकारों का मानना है कि भविष्य की जंग किसी एक डिजाइन तक सीमित नहीं रहेगी, इसलिए वे एक से अधिक डिजाइनों को हरी झंडी दे सकते हैं। इसका उद्देश्य एक ऐसा 'मल्टी-लेयर डिफेंस सिस्टम' तैयार करना है, जो हर तरह की भौगोलिक और सामरिक स्थिति में दुश्मन को मात दे सके।
स्वायत्तता और मारक क्षमता: युद्ध का अगला स्तर
इन ड्रोन विमानों की सबसे बड़ी खासियत इनकी 'ऑटोनॉमी' (स्वायत्तता) होगी। आने वाले वर्जनों में ये विमान बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के जटिल फैसले लेने, घातक हमले करने और विभिन्न प्रकार के मिशनों को अकेले संभालने में सक्षम होंगे। इसका अर्थ यह है कि भविष्य के युद्धों में बिना किसी पायलट को जोखिम में डाले, दुश्मन के अभेद्य किलों को नष्ट किया जा सकेगा। यह तकनीक विशेष रूप से ईरान जैसे विरोधियों के खिलाफ एक बड़ा 'गेम चेंजर' साबित हो सकती है, जो ड्रोन और मिसाइल तकनीक में लगातार निवेश कर रहे हैं।
बजट और राजनीति की चुनौती
इतने महत्वाकांक्षी प्रोग्राम के रास्ते में तकनीकी चुनौतियों से कहीं ज्यादा बड़ी बाधा फंडिंग और राजनीतिक मंजूरी की है। अमेरिकी संसद (कांग्रेस) में बजट को लेकर होने वाली खींचतान इस प्रोजेक्ट की गति को धीमा कर सकती है। कितने विमानों का निर्माण होगा और अंतिम डिजाइन क्या होगा, यह पूरी तरह से मिलने वाले बजट पर निर्भर करता है। यदि समय पर पैसा और मंजूरी मिली, तो ये 'ड्रोन वॉर मशीन' जल्द ही अमेरिकी वायुसेना के बेड़े का स्थायी हिस्सा बन जाएंगी।
हवाई जंग की नई परिभाषा और अप्रत्याशित खतरे
यदि यह प्रोजेक्ट सफल होता है, तो हवाई युद्ध का पारंपरिक तरीका हमेशा के लिए बदल जाएगा। एआई से लैस ये ड्रोन दुश्मन के लिए एक ऐसा 'डिजिटल मौत का जाल' बुनेंगे, जिससे बचना नामुमकिन होगा। पश्चिम एशिया जैसे अत्यधिक संवेदनशील और अस्थिर इलाकों में इस तकनीक का प्रवेश जंग को न केवल तेज और घातक बना देगा, बल्कि इसे और भी ज्यादा 'अप्रत्याशित' (Unpredictable) बना देगा, जहाँ एक छोटा सा एल्गोरिदम पूरी दुनिया के लिए युद्ध का कारण बन सकता है।
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बिहान योजना से मिली नई पहचान, पोषण सखी बन महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य की बनीं संरक्षक
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