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पाकिस्तान के रक्षा मंत्री बोले- गाजा के लिए दंडित करने नेतन्याहू का अपहरण करें ट्रंप
11 Jan, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इस्लामाबाद। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक इंटरव्यू के दौरान इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू के खिलाफ बेहद विवादित टिप्पणी की है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नया विवाद पैदा हो गया है। ख्वाजा आसिफ ने खुले मंच से अमेरिका और तुर्की जैसे देशों से अपील की, कि वे इजरायली प्रधानमंत्री का अपहरण (किडनैप) कर लें ताकि गाजा में जारी सैन्य कार्रवाई के लिए उन पर युद्ध अपराधों का मुकदमा चलाया जा सके।
पाकिस्तानी पत्रकार के साथ बातचीत के दौरान रक्षा मंत्री ने नेतनयाहू को मानवता का सबसे बड़ा अपराधी करार दिया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) द्वारा नेतनयाहू के खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट का हवाला देते हुए कहा कि वह दुनिया के सबसे वांटेड अपराधी हैं। आसिफ ने तर्क दिया कि यदि अमेरिका वास्तव में खुद को मानवता का मित्र और न्याय का समर्थक मानता है, तो उसे नेतनयाहू को पकड़कर उन पर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने अमेरिका द्वारा पूर्व में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ की गई कार्रवाई का उदाहरण देते हुए मांग की कि नेतनयाहू के मामले में भी इसी तरह की सख्ती दिखाई जानी चाहिए।
इंटरव्यू के दौरान माहौल उस समय और भी तनावपूर्ण हो गया जब रक्षा मंत्री ने तुर्की को भी इस कार्य के लिए उकसाया। उन्होंने कहा कि तुर्की भी उन्हें हिरासत में ले सकता है और पाकिस्तान की जनता इसके लिए दुआ कर रही है। हालांकि, विवाद तब चरम पर पहुंच गया जब ख्वाजा आसिफ ने उन वैश्विक नेताओं को सजा देने की बात शुरू की जो इजरायल का समर्थन कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके इस इशारे को स्पष्ट रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर देखा गया।
स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए शो के एंकर ने रक्षा मंत्री को बीच में ही टोक दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस तरह की टिप्पणी पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुश्किलें पैदा कर सकती है। एंकर ने तुरंत कमर्शियल ब्रेक ले लिया और ब्रेक के बाद घोषणा की गई कि रक्षा मंत्री अब इस चर्चा का हिस्सा नहीं रहेंगे। जानकारों का मानना है कि यह पाकिस्तान सरकार द्वारा डैमेज कंट्रोल करने की एक त्वरित कोशिश थी ताकि अमेरिका के साथ संबंधों में कोई बड़ी दरार न आए। यह विवाद ऐसे संवेदनशील समय में सामने आया है जब पाकिस्तान अपनी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच अमेरिका के साथ संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है। हाल के दिनों में पाकिस्तानी नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से डोनाल्ड ट्रंप की प्रशंसा की थी। भारत के साथ जारी तनावपूर्ण स्थितियों के बीच पाकिस्तान अपनी विदेश नीति को लेकर बेहद सतर्क रुख अपनाने का दावा करता रहा है, लेकिन रक्षा मंत्री के इस बयान ने सरकार की कूटनीतिक चुनौतियों को और बढ़ा दिया है। हालांकि पाकिस्तान इजरायल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं देता है, लेकिन इस तरह की उग्र बयानबाजी से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में उसकी छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
खालिदा जिया के निधन के बाद तारिक रहमान बने बीएनपी के अध्यक्ष
11 Jan, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ढाका । बांग्लादेश की पूर्व पीएम खालिदा जिया के निधन के बाद उनके बेटे तारिक रहमान ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की कमान संभाल ली है। बीएनपी की स्टैंडिंग कमेटी ने तारिक रहमान को पार्टी का चेयरमैन बनाने की मंजूरी दे दी है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यह फैसला शुक्रवार रात पार्टी के गुलशन दफ्तर में हुई एक बैठक में लिया गया। बैठक के बाद बीएनपी सचिव जनरल मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने इसकी पुष्टि की। बैठक में कमेटी के सभी सदस्यों ने एकमत से तारिक रहमान को बीएनपी अध्यक्ष चुना। सबकी रजामंदी के बाद तारिक रहमान ने बीएनपी संविधान के मुताबिक अध्यक्ष का पद संभाल लिया।
सूत्रों के मुताबिक रहमान इरशाद विरोधी आंदोलन के दौरान अपनी मां के साथ सड़क पर हुए विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुए थे। ढाका ट्रिब्यून ने बताया कि तारिक 1988 में पार्टी की गबताली उपजिला यूनिट के आम सदस्य के तौर पर शामिल हुए थे। 1991 के आम चुनाव से पहले उन्होंने देश के हर जिले में अपनी मां जिया के साथ अभियान चलाया था। 1993 में तारीक रहमान ने बीएनपी की बोगुरा जिला यूनिट की एक कॉन्फ्रेंस की थी, जहां इलाके के पार्टी नेतृत्व को सीक्रेट बैलेट से चुना गया था। इसके बाद उन्होंने दूसरे जिला यूनिट्स को अपना नेता चुनने में लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाने के लिए बढ़ावा दिया।
2002 में बीएनपी स्टैंडिंग कमेटी ने तारिक रहमान को सीनियर संयुक्त सचिव नामित किया। 2005 में उन्होंने देश भर में जमीनी स्तर का कॉन्फ्रेंस की और बांग्लादेश के हर उपजिला में बीएनपी इकाई के साथ परामर्श किया। 2007 में वन-इलेवन पीरियड के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और बाद में मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए विदेश भेज दिया गया, जिसके बाद वे 2008 से देश निकाला में रहे। वे 17 साल बाद 25 दिसंबर, 2025 को बांग्लादेश लौटे।
इससे पहले 2009 में उन्हें बीएनपी का सीनियर उपाध्यक्ष चुना गया। हालांकि फिर 2018 में जब बेगम खालिदा जिया को जेल हुई थी, तो तारिक रहमान को पार्टी का कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया था। इसके बाद अब पार्टी ने खालिदा जिया के निधन के बाद तारिक रहमान को बीएनपी का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है।
एक हजार साल पहले अमेरिका में हुआ था खूनखराबा, ग्रीनलैंड के रास्ते आए वाइकिंग्स
10 Jan, 2026 07:15 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) का ग्रीनलैंड (Greenland) में इंटरेस्ट एक बार फिर जाग गया है और वह इस नॉर्डिक देश (Nordic countries) पर कब्जा करने की बात करने लगे हैं। वहीं डोनाल्ड ट्रंप की बयानबाजी से डेनमार्क और ग्रीनलैंड समेत लगभग सारे ही नॉर्डिक और स्कैंडिनेवियाई देश भड़क गए हैं। नॉर्डिक देशों में नॉर्वे, स्वीडन, ग्रीनलैंड, फिनलैंड, डेनमार्क हैं। नॉर्डिक का अर्थ ही उत्तर होता है। अमेरिका और नॉर्डिक देशों का टकरवा कोई नया नहीं है। इसके पीछे की कहानी 1 हजार साल पहले ही शुरू होती है। कोलंबस से पहले भी नॉर्डिक देशों के लोगों ने अमेरिका महाद्वीप पर कदम रखा था और वह यही जमीन थी जहां आज कनाडा है।
इन देशों के लोगों को वाइकिंग कहा जाता था और ये बेहद खोजी और बहादुर हुआ करते थे। समंदर पर इनका राज था। इनमें से कई गुट लुटेरों के भी थे। वाइकिंग का काम ही यही था कि वे समंदर के रास्ते जमीन को ढूंढते थे और वहां रहने वाले लोगों को लूट लेते थे। वे कोशिश करते थे कि वहां वे स्थायी कब्जा कर लें। हालांकि अगर वहां बसने में कोई लाभ नहीं दिखता था तो वे बहुमूल्य चीजें लेकर चलते बनते थे।
ये वाइकिंग स्कैंडिनेवियाई भूमि (डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे) के रहने वाले लोगों ने ही ग्रीनलैंड की भी खोज की थी और यहां बस गए थे। वर्तमान समय में नॉर्डिक देश सांस्कृतिक रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और संकट आने पर एकजुट भी हो जाते हैं। नॉर्डिक देशों का कहना है कि अमेरिका को नाटो से बाहर कर देना चाहिए। ऐसे में जानकारों का कहना है कि उत्तरी भूमि से एक बार फि वाइकिंग्स की शुरुआत हो रही है।
अमेरिका में वाइकिंग्स का खून-खराबा
आज अमेरिका और नॉर्डिक देशों में तनाव बढ़ रहा है। वहीं इतिहास के पन्ने पलटें तो एक हजार साल पहले वाइकिंग्स ने अमेरिका में काफी रक्तपात किया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक लीफ एरिकसन और उसके साथी पहली बार अमेरिकी भूमि पर पहुंचे थे। सन् 1000 के आसपास वाइकिंग्स और अमेरिका के मूल निवासियों के बीच जमकर टकराव हुआ था। वाइकिंग्स ने अमेरिका में जमकर लूटपाट की और उनमें से कई वहां रहने भी लगे। इसके बाद वाइकिंग्स का अमेरिकी भूमि पर आना-जाना हो गया।
लीफ एरिकसन के पिता एरिक द रेड काफी हिंसक थे और उनकी आदतों की वजह से नॉर्वे और आइसलैंड ने भगोड़ा घोषित कर दिया था। इसके बाद ही एरिक अपने गुट को लेकर ग्रीनलैंड की तरफ निकल गए थे। एरिक की कई पीढ़ियां ग्रीन लैंड को खंगालती रहीं। यहां के मूल निवासियों से एरिक के संबंध पहले सौहार्दपूर्ण थे हालांकि जब व्यापार और लूट की बात आई तो संबंध खराब होने लगे। नेटिव अमेरिकन के साथ भी एरिक की दुश्मनी हो गई। नॉर्स लोगों ने वहां के मूल निवासियों की हत्या शुरू कर दी। इसके बाद रक्तपात शुरू हो गया। बाद में हुआ यह कि अमेरिका के मूल निवासियों ने वाइकिंग्स को खदेड़ा और वे फिर लौट आए। हालांकि दूसरे वाइकिंग्स गुटों का अमेरिका आना-जाना शुरू हो गया।
वाइकिंग्स उग्र थे, बावजूद इसके वे उत्तरी अमेरिका में अपनी बस्ती नहीं बसा पाए। अंततः वे ग्रीनलैंड में ही बस गए। इसके बाद उत्तरी अमेरिका के लोग ग्रीनलैंड पर हमला करने लगे। इससे वहां की बस्तियों का काफी नुकसान पहुंची। आज भी अमेरिका के साथ ग्रीनलैंड का तनाव बढ़ रहा है। वहीं ग्रीन लैंड के साथ सारे नॉर्डिक देश खड़े आ रहे हैं। नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने कहा है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का अभिन्न हिस्सा है। डेनमार्क मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बंटा है। इसमें मुख्य भूमि यूरोप में है। इसमें फ्यून और बोर्नहोम जैसे कई बड़े द्वीप हैं। दूसरा हिस्सा ग्रनलैंड है जो कि दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और अटलांटिक और आर्कटिक सागर के बीच है। यह उत्तरी अमेरिका का ही हिस्सा है। हालांकि राजनीतिक रूप से इसे किंगडम ऑफ डेनमार्क ही कहा जाता है। तीसरा हिस्सा फैरो आइलैंड है जो कि उत्तरी अटलांटिक सागर में है। यह एक स्वायत्त क्षेत्र है। ग्रीनलैंड की लगभग डेढ़ किलोमीटर की सीमा कनाडा के एक द्वीप के साथ भी जुड़ी है।
डेनमार्क से काफी दूर है ग्रीनलैंड
समुद्री मार्ग और प्राकृतिक संसाधनों की वजह से ग्रीनलैंड काफी अहम है। यहां की आबादी बेहद कम है। इतनी बड़ी भूमि पर 50 हजार के ही करीब लोग रहते हैं। यहां के लोगों की जीविका मछली पकड़ने पर निर्भर है। वहीं डेनमार्क की सरकार की तरफ से यहां सब्सिडी दी जाती है। ग्रीनलैंड की राजधानी नूक से कोपेनहेगेन की दूरी लगभग साढ़े 3 हजार किलोमीटर है।
मादुरो को हटाने के बाद भी अमेरिका ने तेल के पांचवे टैंकर पर किया कब्जा
10 Jan, 2026 06:15 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
oil वाशिंगटन। निकोलस मादुरो (Nicolas Maduro) को घर से उठाने के बाद भी अमेरिकी सेना (US Army) का वेनेजुएला पर हमला कम नहीं हुआ है। सोमवार को एक वीडियो फुटेज जारी करते हुए बताया कि उन्होंने वेनेजुएला से आने-जाने वाले एक और तेल टैंकर को जब्त कर लिया है। यह पिछले कुछ दिनों में अमेरिका द्वारा कब्जे में लिया गया वेनेजुएला का पांचवा टैंकर है।
अमेरिकी सेना की दक्षिणी कमान के मुताबिक यह कार्रवाई अमेरिकी मरीन और नौसेना कर्मियों द्वारा की गई। वेनेजुएला के ओलिना नामक पोत को जब्त करने की घोषणा करते हुए सेना ने लिखा कि अब अपराधियों के लिए कोई भी ठिकाना सुरक्षित नहीं है। अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी की सचिव क्रिस्टी नोएम ने भी कैरिबियाई सागर के पास इंटरनेशनल जलक्षेत्र में जब्त किए गए मोटर टैंकर को अपराधियों के लिए एक कड़ी चेतावनी करार दिया।
सोशल मीडिया साइट एक्स पर सेना ने एक वीडियो भी पोस्ट किया, जिसमें जिसमें एक अमेरिकी हेलीकॉप्टर को पोत पर उतरते हुए और अमेरिकी कर्मियों द्वारा पोत की तलाशी लेते हुए देखा जा सकता है। अमेरिकी सेना द्वारा जब्त किया गया ओलिना, पांचवां टैंकर है और यह कार्रवाई राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा वेनेजुएला के तेल उत्पादों के वैश्विक वितरण को नियंत्रित करने के व्यापक प्रयास के तहत की गई है। खासकर ऐसे समय में जब राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अचानक सत्ता से हटाया गया है।
रुसियों को रिहा करने के फैसले का मॉस्को ने किया स्वागत
इससे पहले जब्त किए गए टैंकर मेरिनेरा पर सवार दो रूसी नागरिकों को अमेरिका ने रिहा करने का फैसला किया है। इस फैसले का स्वागत करते हुए रूस के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने एक बयान में कहा, ‘‘हमारे अनुरोध के जवाब में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उत्तरी अटलांटिक में एक अभियान के दौरान अमेरिका द्वारा जब्त किये गए टैंकर मेरिनेरा के चालक दल के दो रूसी नागरिकों को रिहा करने का फैसला किया है।’’
मंत्रालय के टेलीग्राम चैनल पर जारी बयान में जखारोवा ने कहा, ‘‘हम इस फैसले का स्वागत करते हैं और अमेरिकी नेतृत्व के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।’’
गौरतलब है कि उत्तरी अटलांटिक महासागर में अमेरिकी तटरक्षक बल ने रूसी ध्वज वाले टैंकर मेरिनेरा (जिसे पहले बेला-1 के नाम से जाना जाता था) को बुधवार को जब्त कर लिया था। इस पर 17 यूक्रेनी नागरिक, छह जॉर्जियाई नागरिक, तीन भारतीय नागरिक और दो रूसी नागरिक सवार थे।’’ तीन भारतीयों सहित चालक दल के अन्य सदस्यों के भविष्य को लेकर अभी भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
ईरान में विरोध प्रदर्शन लगातार जारी…. इंटरनेट बंद, इंटरनेशनल टेलीफोन सेवाओं पर भी रोक
10 Jan, 2026 05:15 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तेहरान। लगातार विरोध प्रदर्शनों (Protests) के बीच ईरान (Iran) में इंटरनेट बंद (Internet shut down) कर दिया गया है। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय टेलीफोन सेवाओं (International telephone services) पर भी रोक लगा दी गई है। इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों का विरोध थम नहीं ले रहा है। प्रदर्शनकारियों द्वारा साझा किए गए वीडियो में देखा जा सकता है कि राजधानी तेहरान और अन्य क्षेत्रों की सड़कों पर मलबा बिखरा हुआ है और प्रदर्शनकारी अलाव जलाकर ईरान सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। इन सबके बीच मरने वालों की संख्या बढ़कर 62 हो गई है।
ईरानी सरकारी मीडिया ने शुक्रवार को इन प्रदर्शनों पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए आरोप लगाया कि अमेरिका और इजरायल के आतंकवादी एजेंटों ने आग लगाई और हिंसा भड़काई। उसने यह भी कहा कि कुछ लोग हताहत हुए हैं, लेकिन इसके बारे में विस्तार से नहीं बताया। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई (86) ने सरकारी टेलीविजन पर प्रसारित एक संक्षिप्त संबोधन में संकेत दिया कि अधिकारी प्रदर्शनकारियों पर कड़ी कार्रवाई करेंगे, वहीं लोग अमेरिका मुर्दाबाद! के नारे लगा रहे थे।
खामेनेई ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का जिक्र करते हुए कहा कि प्रदर्शनकारी दूसरे देश के राष्ट्रपति को खुश करने के लिए अपनी ही सड़कों को बर्बाद कर रहे हैं। पिछले साल 28 दिसंबर से शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों में लगातार तेजी आई है। विरोध प्रदर्शन इस बात की भी पहली परीक्षा है कि क्या ईरानी जनता युवराज रजा पहलवी से प्रभावित हो सकती है, जिनके गंभीर रूप से बीमार पिता 1979 की इस्लामी क्रांति से ठीक पहले ईरान से भाग गए थे।
पहलवी ने गुरुवार रात को विरोध प्रदर्शनों का आह्वान किया था और उन्होंने शुक्रवार रात 8 बजे भी प्रदर्शनों का आह्वान किया। ‘वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट फॉर नियर ईस्ट पॉलिसी‘ की वरिष्ठ फेलो होली डैग्रेस ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों का रुख बदलने वाला कारक पहलवी का ईरानियों से बृहस्पतिवार और शुक्रवार को रात 8 बजे सड़कों पर उतरने का आह्वान था। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट से यह स्पष्ट हो गया कि ईरानियों ने इस आह्वान को गंभीरता से लिया और इस्लामी गणराज्य को उखाड़ फेंकने के लिए विरोध प्रदर्शन किया।
डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, ग्रीनलैंड पर हमने कुछ नहीं किया तो रूस या चीन कब्जा कर लेंगे
10 Jan, 2026 04:15 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ग्रीनलैंड (Greenland) पर एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। शनिवार को उन्होंने कहा कि यूएस (US) इस आर्कटिक द्वीप (Arctic Island) पर कार्रवाई करेगा, चाहे वह आसान तरीके से हो या कठिन। व्हाइट हाउस में तेल उद्योग के प्रतिनिधियों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कब्जा नहीं किया, तो रूस या चीन वहां कब्जा कर लेंगे, जिससे US को इन देशों को पड़ोसी के रूप में स्वीकार करना पड़ेगा। उन्होंने कहा, ‘हम ग्रीनलैंड पर कुछ करने जा रहे हैं, चाहे उन्हें पसंद आए या नहीं। हमारे लोग आसान तरीके से डील करना चाहते हैं, लेकिन अगर नहीं हुआ तो हम इसे कठिन तरीके से करेंगे।’
डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा को आधार बनाते हुए जोर दिया कि ग्रीनलैंड का मालिकाना हक अमेरिका के पास होना चाहिए, ताकि इसे ठीक से बचाया जा सके। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति ओबामा के ईरान समझौते का जिक्र करते हुए कहा कि अल्पकालिक डील से काम नहीं चलता, बल्कि स्थायी नियंत्रण जरूरी है। मालूम हो कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का सेमी-ऑटोनॉमस क्षेत्र है और लगभग 57,000 निवासियों का घर है। यह प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है, खासकर दुर्लभ खनिजों से। ट्रंप प्रशासन इस द्वीप पर प्रभाव बढ़ाने के लिए कई विकल्प तलाश रहा है, जिसमें ग्रीनलैंडवासियों को प्रति व्यक्ति 10,000 से 1,00,000 डॉलर तक नकद भुगतान करने का प्रस्ताव शामिल है, ताकि वे डेनमार्क से अलग होकर अमेरिका के करीब आएं।
अमेरिका की क्या है पेशकश
रिपोर्ट के मुताबिक, एक अन्य विकल्प कॉम्पैक्ट ऑफ फ्री एसोसिएशन है जिसमें अमेरिका वित्तीय सहायता और रक्षा प्रदान करेगा। इसके बदले में सैन्य पहुंच मिलेगी। वैसे अधिकांश ग्रीनलैंड निवासी डेनमार्क से स्वतंत्रता चाहते हैं, लेकिन अमेरिका का हिस्सा बनना नहीं चाहते। ट्रंप का यह बयान पिछले सालों की उनकी इच्छा को दोहराता है, जब उन्होंने ग्रीनलैंड खरीदने की बात कही थी। ट्रंप के इन बयानों पर डेनमार्क और यूरोपीय देशों में भारी नाराजगी है।
डेनमार्क भी हमले के लिए तैयार
डेनमार्क ने चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनलैंड पर कोई हमला हुआ तो उसके सैनिक पहले गोली चलाएंगे और बाद में सवाल पूछेंगे। यूरोपीय नेताओं ने संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि ग्रीनलैंड का भविष्य सिर्फ उसके लोगों और डेनमार्क के हाथ में है। यह विवाद नाटो गठबंधन के लिए भी चुनौती पैदा कर रहा है, क्योंकि डेनमार्क नाटो का सदस्य है। ट्रंप का दावा है कि रूस और चीन आर्कटिक में बढ़ती गतिविधियां चला रहे हैं। वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रीनलैंड के पास ऐसी कोई प्रत्यक्ष धमकी नहीं है। यह मामला अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ाने की क्षमता रखता है।
चीनी पेप्टाइड्स के जाल में फंसते अमेरिकी युवा
10 Jan, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सैन फ्रांसिस्को । टेक कंपनियों में काम करने वाले अमेरिका युवा चीनी पेप्टाइड्स के जाल में फंसते जा रहे हैं। अमेरिकी युवा इन्हें वजन घटाने, मानसिक एकाग्रता बढ़ाने और शरीर को ज्यादा एक्टिव रखने के लिए अपना रहे हैं। ये पेप्टाइड्स सीधे चीन से मंगाए जा रहे हैं और इनके इस्तेमाल को लेकर न तो अमेरिकी सरकार की मंजूरी है और न ही इनकी सुरक्षा को लेकर कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं। इसके बावजूद स्टार्टअप ऑफिस, प्राइवेट नेटवर्क और ‘पेप्टाइड रेव’ जैसे इवेंट्स के जरिए इनका खुलेआम प्रचार और उपयोग हो रहा है। अमेरिका में इन अनधिकृत पेप्टाइड्स की मांग बीते कुछ समय में तेजी से बढ़ी है। आंकड़ों के मुताबिक 2025 के पहले नौ महीनों में ही चीन से इनका आयात करीब आठ गुना तक बढ़ गया। ये केमिकल आमतौर पर पाउडर के रूप में आते हैं, जिन्हें लोग पानी में घोलकर खुद ही इंजेक्ट कर लेते हैं।
इसके लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से इंसुलिन सिरिंज आसानी से खरीदी जा रही हैं। सैन फ्रांसिस्को में काम कर रहे एक चीनी पेप्टाइड सप्लायर का कहना है कि किसी टेक कंपनी में एक व्यक्ति इसका इस्तेमाल शुरू करता है और फिर धीरे-धीरे पूरा ग्रुप या क्लस्टर बन जाता है, जहां इसे सामान्य और सुरक्षित मान लिया जाता है। पेप्टाइड्स असल में छोटे अमीनो एसिड चेन होते हैं, जो शरीर में हार्मोन को नियंत्रित करने, सूजन कम करने और रिकवरी में मदद करने का दावा करते हैं। वजन घटाने वाली चर्चित दवाओं जैसे ओजेम्पिक और वीगोवी में भी पेप्टाइड्स का ही उपयोग होता है, लेकिन वे सख्त मेडिकल ट्रायल और सरकारी मंजूरी के बाद बाजार में आई हैं।
इसके उलट अब लोग बीपीसी-157, टीबी-500, ऑक्सीटोसिन, एपिटालॉन और रेटाटूटाइड जैसे अनप्रूव्ड पेप्टाइड्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनसे चोट जल्दी ठीक होने, बेहतर नींद, एंटी-एजिंग और ज्यादा फोकस की उम्मीद की जाती है। सोशल मीडिया इस ट्रेंड को और हवा दे रहा है। टिकटॉक और इंस्टाग्राम रील्स पर डीआईवाई इंजेक्शन गाइड खुलेआम मिल रहे हैं, जिनमें इन्हें आसान और असरदार समाधान के तौर पर दिखाया जाता है। कानून से बचने के लिए वेबसाइटों और वीडियो में इन्हें ‘रिसर्च केमिकल’ या ‘केवल अध्ययन के लिए’ बताया जाता है, ताकि सीधे मानव उपयोग का दावा न करना पड़े। हालांकि वीडियो के कमेंट्स और यूजर अनुभव साफ संकेत देते हैं कि इन्हें वजन घटाने, फोकस बढ़ाने और फिटनेस सुधारने के लिए ही इस्तेमाल किया जा रहा है।
भारतीय स्वान बना शांति का प्रतीक
10 Jan, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
टैक्सास । अमेरिका के टेक्सास राज्य में बौद्ध भिक्षुओं की शांति यात्रा जारी है। 19 बौद्ध भिक्षु एक भारतीय कुत्ते के साथ यात्रा कर रहे हैं।इस स्वान का नाम बौद्ध भिक्षुओं ने आलोका रखा है। बौद्ध भिक्षुओं का यह दल फोर्ट वर्थ से लेकर वॉशिंगटन डीसी की 2300 मिल की पदयात्रा पर निकला है। सभी जगह इनका स्वागत किया जाता है तथा लोग इन्हें खान शाकाहारी खाना भी उपलब्ध कराते हैं। रुकने की व्यवस्था भी जहां से हैं, निकलते हैं वहां के निवासी करते हैं। बौद्ध भिक्षु शांति का प्रतीक बन गए हैं। इस यात्रा का उद्देश्य लोगों में करुणा और शांति का संदेश फैलाना है।
यह भारतीय स्वान यात्रा के दौरान एक कार की चपेट में आकर घायल हो गया था। बौद्ध भिक्षुओं ने इसे इलाज के लिए एक ट्रक पर रवाना किया था। घायल होने के बाद भी यह ट्रक से छलांग लगाकर बौद्ध भिक्षुओं के पास आ गया। उनकी यात्रा में यह साथ-साथ चल रहा है। स्वान के रूप में वह शांति का प्रतीक बनकर लोगों को संदेश देने की कोशिश कर रहा है।
कनाडा में भारतीय महिलाओं के लिए खास पहल: वन स्टॉप सेंटर फॉर वीमेन शुरू
10 Jan, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
टोरंटो। कनाडा में रह रही भारतीय महिलाओं की मदद के लिए भारत के टोरंटो महावाणिज्य दूतावास में हाल ही में वन स्टॉप सेंटर फॉर विमेन (ओएससीडब्ल्यू) चालू किया है। यह केंद्र कनाडा में रहने वाली भारतीय महिलाओं, छात्रों और महिला कर्मचारियों को वित्तीय, कानूनी और भावनात्मक मदद उपलब्ध कराएगा है। कार्यवाहक महावाणिज्य दूत कपिध्वज प्रताप सिंह के अनुसार, यह पहल कनाडाई और भारतीय अधिकारियों के बीच पुल का काम करेगी, जिससे महिलाओं को सुरक्षित माहौल मिलेगा। महावाणिज्य दूत सिंह ने बताया कि कनाडा में भारतीय महिलाओं को घरेलू हिंसा, दहेज, शोषण और अन्य मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ओएससीडब्ल्यू इन्हीं जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है और यह तुरंत काउंसलिंग, साइको-सोशल सपोर्ट, कानूनी सलाह और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराएगा। कार्यवाहक महावाणिज्य दूत सिंह ने कहा कि कनाडा में कई संगठन मदद देते हैं, लेकिन सांस्कृतिक और सामाजिक बाधाओं के कारण महिलाएं खुलकर मदद नहीं ले पातीं। लेकिन इस केंद्र का उद्देश्य इन्हीं रुकावटों को दूर करना और महिलाओं को उनके अधिकारों और संसाधनों तक पहुंच सुनिश्चित करना है। ओएससीडब्ल्यू का उपयोग कनाडा में स्थायी आवासीय महिलाएं, विजिटर, वर्कर और स्टूडेंट सभी कर सकते हैं।
इस पहल को लांच हुए कुछ ही दिनों में महिला समुदाय से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। एक दर्जन से अधिक महिलाएं अपनी विभिन्न समस्याओं के साथ संपर्क कर चुकी हैं। महावाणिज्य दूत ने बताया कि यह केंद्र महिलाओं को कानूनी, वित्तीय और सामाजिक मदद देने के साथ-साथ स्थानीय समुदाय और सोशल-सर्विस रिसोर्स तक पहुंचने में भी मदद करेगा। 26 दिसंबर, 2025 को स्थापित यह केंद्र पूरी तरह कनाडा के कानून के तहत काम करेगा और महिलाओं को समय पर सही मदद मुहैया कराएगा। इस पहल से कनाडा में रह रही भारतीय महिलाओं के लिए एक सुरक्षित और सहायक माहौल तैयार होने की उम्मीद जताई जा रही है।
टैरिफ डील पर अमेरिका का दावा, मोदी के फोन न करने से आगे नहीं बढ़ी बात: हॉवर्ड लुटनिक
10 Jan, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित टैरिफ डील को लेकर अमेरिका के वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने बड़ा दावा किया है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सीधे फोन न किए जाने के कारण यह डील समय पर आगे नहीं बढ़ सकी। लुटनिक के इस बयान के बाद दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है, हालांकि भारत सरकार की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इस बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में भारत पर टैरिफ बढ़ाने के संकेत भी दिए हैं।
हॉवर्ड लुटनिक ने यह बयान ‘ऑल-इन पॉडकास्ट’ के दौरान दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका उस समय कई देशों के साथ व्यापारिक समझौतों पर काम कर रहा था और स्पष्ट नीति अपनाई गई थी कि जो देश पहले तैयार होगा, उसे पहले और बेहतर डील मिलेगी। लुटनिक के अनुसार राष्ट्रपति ट्रंप डील को एक सीढ़ी की तरह देखते हैं, जिसमें पहली सीढ़ी पर चढ़ने वाले देश को सबसे फायदेमंद शर्तें मिलती हैं। एक बार वह सीढ़ी पार हो जाने के बाद वही शर्तें दोबारा उपलब्ध नहीं रहतीं।
लुटनिक ने बताया कि सबसे पहले यूनाइटेड किंगडम के साथ डील की गई थी और उन्हें स्पष्ट समयसीमा दी गई थी। इसके बाद अन्य देशों के लिए भी यही नीति अपनाई गई। उन्होंने कहा कि उस दौरान राष्ट्रपति ट्रंप कई बार भारत का जिक्र कर रहे थे और भारत को भी स्पष्ट रूप से बताया गया था कि उसके पास सीमित समय है। लुटनिक के मुताबिक भारत को यह संदेश दिया गया था कि प्रधानमंत्री मोदी को सीधे राष्ट्रपति ट्रंप से बात करनी होगी ताकि डील को अंतिम रूप दिया जा सके।
अमेरिकी मंत्री ने दावा किया कि भारत की ओर से इस पर असहजता दिखाई गई और प्रधानमंत्री मोदी ने तय समयसीमा के भीतर कॉल नहीं किया। उनके अनुसार वह शुक्रवार निकल गया, जो डेडलाइन के रूप में तय था। इसके बाद अमेरिका ने इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम जैसे देशों के साथ तेजी से समझौते कर लिए। इस दौरान भारत कथित तौर पर पीछे रह गया।
लुटनिक ने अपने बयान में भारत पर तंज कसते हुए कहा कि जब बाद में भारत की ओर से संपर्क किया गया और यह कहा गया कि वह डील के लिए तैयार है, तब तक काफी देर हो चुकी थी। उन्होंने कहा कि यह ऐसा था जैसे कोई ट्रेन छूट जाने के बाद टिकट लेकर स्टेशन पर पहुंच जाए। उनके मुताबिक भारत जिस डील की बात कर रहा था, वह पहले वाली नहीं रह गई थी, क्योंकि परिस्थितियां और प्राथमिकताएं बदल चुकी थीं।
अमेरिकी वाणिज्य मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत और अमेरिका के बीच किसी समय एक प्रारंभिक सहमति जरूर बनी थी, लेकिन उसे समय पर पूरा नहीं किया गया। नतीजतन भारत को अब पहले जैसी शर्तों वाली डील नहीं मिल सकती। इस बयान को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब अमेरिका-भारत व्यापारिक रिश्तों में टैरिफ को लेकर तनाव के संकेत दिख रहे हैं और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक और कूटनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं।
फैज-ए-इलाही मस्जिद को लेकर पाकिस्तान ने अड़ाई टांग, भारत ने दिखाया आईना
10 Jan, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इस्लामाबाद पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। एक बार फिर भारत के आंतरिक मामलों में टांग अड़ाने की कोशिश की। हालांकि पाकिस्तान को भारत ने आईना दिखा दिया है। दिल्ली की फैज-ए-इलाही मस्जिद को लेकर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा की गई, बेबुनियाद टिप्पणियों पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई। वहीं बीजेपी ने देश के अंदर सक्रिय विपक्षी गठबंधन को भी निशाने पर लिया।
बता दें दिल्ली में स्थित फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास बुलडोजर एक्शन पर मुख्य संरचना को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया है। वह पूरी तरह सुरक्षित है। दिल्ली में की गई हालिया कार्रवाई किसी धार्मिक स्थल के खिलाफ नहीं, बल्कि अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ थी। दिल्ली हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करते हुए प्रशासन ने मस्जिद परिसर में अवैध रूप से संचालित बैंक्वेट हॉल और एक डायग्नोस्टिक सेंटर को हटाया। यह कार्रवाई पूरी तरह से कानून सम्मत थी, लेकिन पाकिस्तान इसे सांप्रदायिक रंग देने की नाकाम कोशिश कर रहा है।
मस्जिद मामले पर पाकिस्तानी बयानबाजी के बाद सियासत गरमा गई। बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने इस मुद्दे पर विपक्षी इंडिया गठबंधन’ को भी घेरा है। पूनावाला ने आरोप लगाया कि जो झूठ देश के अंदर कुछ विपक्षी नेताओं ने फैलाया, अब उसी झूठ को पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोहरा रहा है। यह देखना विचलित करने वाला है कि भारत के कुछ लोग और पाकिस्तान एक ही भाषा बोल रहे हैं। कुछ लोगों को देखकर लगता है कि उनके लिए एलओवी का मतलब लीडर ऑफ अपोजिशन नहीं, बल्कि ‘लीडर ऑफ पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा’ है।
उन्होंने कहा कि ये लोग इंडी गठबंधन की तरह नहीं, बल्कि ‘रावलपिंडी गठबंधन’ की तरह व्यवहार कर रहे हैं। वे भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जहर फैलाने के लिए पाकिस्तान को मौका दे रहे हैं। भारत ने साफ कहा कि पाकिस्तान जो खुद अपने देश में अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों के लिए दुनिया भर में बदनाम है, उसे भारत के आंतरिक मामलों पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश इस बात का प्रमाण है कि भारत में कार्रवाई धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि संविधान और कानून के आधार पर होती है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक जमीन पर किए गए किसी भी अवैध कब्जे को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
ट्रंप ने दिया झटका, भारत के इंटरनेशनल सोलर एलायंस से बाहर हुआ अमेरिका
9 Jan, 2026 08:07 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। भारत के इंटरनेशनल सोलर एलायंस को बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संगठन से अमेरिका के बाहर होने का फैसला किया है। ट्रंप प्रशासन का यह कदम न केवल वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के लिए चुनौती है, बल्कि भारत और अमेरिका के बीच पिछले तीन दशकों से बने मजबूत रिश्तों में भी दरार पैदा करने वाला है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने एक बड़ा कार्यकारी आदेश जारी करते हुए भारत द्वारा प्रवर्तित इंटरनेशनल सोलर एलायंस से हटने की घोषणा की है। यह फैसला ट्रंप की उस व्यापक नीति का हिस्सा है, जिसके तहत अमेरिका उन अंतरराष्ट्रीय संगठनों से नाता तोड़ रहा है जिन्हें वह अपने राष्ट्रीय हितों और संप्रभुता के खिलाफ मानता है। सूत्रों का मानना है कि भारत का कहना है कि अमेरिका को जहां जाना है जाए, यह गठबंधन कायम रहेगा। उसके हटने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
बता दें इस संगठन की शुरुआत 2015 में पेरिस जलवायु शिखर सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने की थी। इसका मुख्य मुख्यालय भारत के गुरुग्राम में है। इसका लक्ष्य 2030 तक सौर ऊर्जा में 1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश जुटाना है। साथ ही विकासशील देशों को सस्ती सौर तकनीक और फाइनेंस उपलब्ध कराना ताकि वे प्रदूषण बढ़ाए बिना अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकें।
अमेरिका के पूर्व जलवायु दूत जॉन केरी ने ट्रंप प्रशासन के इस कदम को खुद को पहुंचाया गया घाव बताया है। उन्होंने कहा कि यह फैसला कोई आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन यह चीन के लिए एक गिफ्ट की तरह है। इससे उन देशों और प्रदूषण फैलाने वाली ताकतों को छूट मिल जाएगी जो अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं। अमेरिका 31 यूएन संस्थाओं और 35 गैर-यूएन अंतर-सरकारी संगठनों से हट गया है, जिसमें यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज, इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज, इंटरनेशनल ट्रेड सेंटर और ग्लोबल काउंटरटेररिज्म फोरम शामिल हैं। वाइट हाउस की एक फैक्ट शीट के मुताबिक ये संगठन, कन्वेंशन और संधियां अमेरिकी राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि या संप्रभुता के विपरीत काम करते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका का बाहर होना न केवल जलवायु के लिए बुरा है, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसानदेह है। अमेरिका उन ट्रिलियन डॉलर के निवेश और रोजगार के अवसरों को खो देगा जो क्लीन एनर्जी सेक्टर में आने वाले हैं। सौर तकनीक के वैश्विक नियमों को लिखने में अब अमेरिका की कोई भूमिका नहीं रहेगी, जिससे अन्य देशों खासकर चीन का दबदबा बढ़ेगा। भारत के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है क्योंकि आईएसए पीएम मोदी का एक ड्रीम प्रोजेक्ट है। अब भारत को फ्रांस और अन्य सदस्य देशों के साथ मिलकर फंडिंग और तकनीक के नए रास्ते तलाशने होंगे।
रूस-यूक्रेन युद्ध विराम हुआ तो भी ब्रिटेन-फ्रांस की सेनाएं यूक्रेन में रहेंगी
9 Jan, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कीव। रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक प्रयास तेज हो गए हैं। शांति स्थापना की दिशा में हाल ही में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है, जहाँ यूक्रेन के राष्ट्रपति और यूरोपीय नेताओं के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठक में सुरक्षा के एक नए ढांचे पर सहमति बनी है। इस बैठक का सबसे बड़ा परिणाम ब्रिटेन और फ्रांस द्वारा जताई गई वह प्रतिबद्धता है, जिसके तहत युद्धविराम की स्थिति में ये दोनों देश यूक्रेन की धरती पर अपने सैनिक तैनात कर सकेंगे। इस संबंध में दोनों देशों ने एक औपचारिक डिक्लेरेशन ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर किए हैं, जो भविष्य में रूस के संभावित हमलों को रोकने के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करेगा। इस समझौते की रूपरेखा के अनुसार, यदि युद्धविराम लागू होता है, तो ब्रिटेन और फ्रांस यूक्रेन में अपने सैन्य ठिकाने स्थापित करेंगे।
इन ठिकानों का मुख्य उद्देश्य हथियारों और सैन्य उपकरणों के लिए सुरक्षित बुनियादी ढांचा तैयार करना होगा। यह कदम राष्ट्रपति जेलेंस्की की उस मुख्य चिंता का समाधान माना जा रहा है, जिसमें वे अक्सर यह अंदेशा जताते रहे हैं कि रूस युद्धविराम का उपयोग अपनी सैन्य शक्ति को फिर से संगठित करने और भविष्य में दोबारा हमला करने के लिए कर सकता है। विदेशी सैनिकों की मौजूदगी यूक्रेन के लिए एक ठोस गारंटी की तरह काम करेगी। समझौते के विस्तृत पहलुओं पर चर्चा करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि ब्रिटिश, फ्रांसीसी और अन्य सहयोगी देशों की सेनाएं यूक्रेन की जमीन पर सक्रिय रहेंगी। उनका प्राथमिक कार्य यूक्रेन की हवाई और समुद्री सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना और यूक्रेनी सेना को तकनीकी व सामरिक रूप से भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना होगा। हालांकि, शांति की इस राह में अब भी कई चुनौतियां बरकरार हैं। पश्चिमी नेताओं ने आगाह किया है कि कोई भी स्थायी शांति समझौता तभी संभव है जब रूसी नेतृत्व वास्तविक रूप से बातचीत के लिए तैयार हो। वर्तमान परिस्थितियों और रूस के हालिया सैन्य कदमों को देखते हुए फिलहाल शांति की स्पष्ट इच्छा कम ही दिखाई दे रही है। इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहने वाली है। हालिया बहुपक्षीय बैठक में, जिसमें लगभग 35 देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, यह तय किया गया है कि किसी भी संभावित युद्धविराम की निगरानी और कार्यान्वयन की मुख्य जिम्मेदारी अमेरिका संभालेगा। इसमें यूरोपीय देशों का भी सक्रिय सहयोग रहेगा। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने इस पहल का स्वागत करते हुए अमेरिका और अन्य सहयोगी देशों के प्रति आभार व्यक्त किया है। यह समझौता न केवल युद्ध रोकने की एक कोशिश है, बल्कि यह दीर्घकालिक स्तर पर यूक्रेन की संप्रभुता को सुरक्षित रखने का एक बड़ा रणनीतिक ब्लूप्रिंट भी पेश करता है।
शीतलहर की चपेट में फ्रांस, जर्मनी और स्विट्जरलैंड, बर्फ में दबे विमान नहीं भर पाए उड़ान
9 Jan, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ज्यूरिख। फ्रांस, जर्मनी और स्विट्जरलैंड समेत पूरा यूरोप इन दिनों भीषण शीतलहर और बर्फबारी की चपेट में है। हालात इतने खराब हैं कि ज्यूरिख एयरपोर्ट पर खड़े विमान बर्फ से ढक गए जिसके कारण वे समय पर उड़ान नहीं भर पाए। यहाँ तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे गिर चुका है, जिसके चलते खड़े विमानों पर बर्फ की मोटी परतें जम गई हैं। इस कड़ाके की ठंड के बीच विमानों को सुरक्षित उड़ान सुनिश्चित करने के लिए एक अनिवार्य तकनीकी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है, जिसे ‘डी-आइसिंग’ कहा जाता है। सुरक्षा मानकों के अनुसार, इस प्रक्रिया के बिना किसी भी विमान को रनवे पर जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है।
विमानन विशेषज्ञों के अनुसार, पंखों पर जमी बर्फ आसमान में उड़ते जहाज के लिए एक अदृश्य दुश्मन की तरह काम करती है। दरअसल, विमान के विंग्स और कंट्रोल सरफेसेज को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि हवा उनके ऊपर से सुचारू रूप से गुजर सके और विमान को जरूरी ‘लिफ्ट’ मिल सके। जब इन पर बर्फ या पाला जम जाता है, तो हवा का प्रवाह बाधित हो जाता है। इससे न केवल विमान का वजन बढ़ता है, बल्कि उसकी एयरोडायनामिक्स क्षमता भी बुरी तरह प्रभावित होती है। ऐसी स्थिति में उड़ान भरना किसी बड़े खतरे को दावत देने जैसा है। पंखों पर जमी मात्र कुछ मिलीमीटर की बर्फ भी विमान के ‘लिफ्ट’ को 30 प्रतिशत तक कम कर सकती है और हवा के खिंचाव यानी ‘ड्रैग’ को 40 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। इसका सीधा असर इंजन पर पड़ता है और विमान को हवा में बने रहने के लिए अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता है। इसके अलावा, विमान के सेंसर्स (जैसे पिटोट ट्यूब) में बर्फ जमने से पायलट को ऊंचाई और गति का गलत डेटा मिल सकता है, जो हादसों का कारण बनता है। इसी गंभीरता को देखते हुए ज्यूरिख एयरपोर्ट पर सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा रहा है। फिलहाल ज्यूरिख एयरपोर्ट पर दर्जनों टीमें चौबीसों घंटे काम कर रही हैं। एक विमान को तैयार करने में बर्फ की मोटाई के आधार पर 5 से 15 मिनट का समय लग रहा है। एयरलाइंस ने यात्रियों को सूचित किया है कि इस सुरक्षा प्रक्रिया के कारण उड़ानों में कुछ देरी हो सकती है। एयरपोर्ट प्रशासन ने पर्यावरण का ध्यान रखते हुए इस केमिकल को रीसायकल करने के लिए विशेष ड्रेनेज सिस्टम भी सक्रिय किया है।
बर्फ की परत न जमे इसके लिए होता है छिड़काव
ज्यूरिख एयरपोर्ट के विशेष ‘डी-आइसिंग पैड्स’ पर यह प्रक्रिया बेहद सावधानी से पूरी की जाती है। यहाँ बड़ी-बड़ी क्रेननुमा गाड़ियाँ (डी-आइसिंग ट्रक्स) विमान को चारों ओर से घेर लेती हैं। यह प्रक्रिया दो मुख्य चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले, विमान पर गर्म पानी और ‘प्रोपलीन ग्लाइकोल’ के मिश्रण का छिड़काव किया जाता है। इसे ‘टाइप 1’ फ्लूइड कहते हैं, जो आमतौर पर नारंगी रंग का होता है ताकि ऑपरेटर देख सके कि विमान का कौन सा हिस्सा साफ हो चुका है। यह गर्म मिश्रण जमी हुई बर्फ को तुरंत पिघला देता है। इसके बाद, यदि बर्फबारी जारी है, तो ‘एंटी-आइसिंग’ प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसमें ‘टाइप 4’ फ्लूइड का उपयोग होता है, जो हरे रंग का और जेली जैसा गाढ़ा होता है। यह पंखों पर एक सुरक्षा परत बना देता है, जिससे टेक-ऑफ के दौरान नई बर्फ नहीं जम पाती।
कंगाल पाकिस्तान ने अपनी साख बचाने के लिए अमेरिका के तलवे चाटने में खर्चे कर दिए अरबों
9 Jan, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इस्लामाबाद। एक तरफ पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है, विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने की कगार पर है और आम जनता आटा-दाल जैसी बुनियादी चीजों के लिए तरस रही है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तानी हुक्मरान अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि चमकाने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहे हैं। अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा किए गए हालिया खुलासे ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और सैन्य नेतृत्व की पोल खोल दी है। दस्तावेजों से पता चला है कि भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी साख बचाने और भारत के खिलाफ माहौल बनाने के लिए पाकिस्तान ने वॉशिंगटन में भारी-भरकम लॉबिंग कराई है।
खुलासे के अनुसार, पाकिस्तान ने अपनी गरीब जनता की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा अमेरिकी सांसदों और नीति-निर्धारकों को साधने में खर्च किया। पाकिस्तान ने वॉशिंगटन डीसी की प्रभावशाली लॉबिंग फर्म स्क्वायर पैटन बोग्स और राजनीतिक रूप से मजबूत पकड़ रखने वाली जैवेलिन एडवाइजर्स की सेवाएं लीं। जैवेलिन एडवाइजर्स को पाकिस्तान ने प्रति माह 50,000 अमेरिकी डॉलर (लगभग 1.40 करोड़ पाकिस्तानी रुपये) की भारी फीस पर नियुक्त किया था। इस फर्म का मुख्य काम अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों—हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट के शीर्ष नेताओं तक पाकिस्तान का पक्ष पहुंचाना था। हैरानी की बात यह है कि पाकिस्तान ने जिन लॉबिंग कंपनियों का सहारा लिया, उनका सीधा संबंध अमेरिकी सत्ता के गलियारों से है। जैवेलिन एडवाइजर्स के संस्थापकों में डोनाल्ड ट्रंप के पूर्व सहयोगी शामिल हैं। इन कंपनियों ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सीनेट मेजॉरिटी लीडर जॉन थ्यून और हाउस माइनॉरिटी लीडर हकीम जेफ्रीज़ जैसे प्रभावशाली नेताओं के दफ्तरों से संपर्क साधा। इनका उद्देश्य पहलगाम आतंकी हमले में पाकिस्तान की संलिप्तता से इनकार करना और खुद को शांतिप्रिय देश के रूप में पेश करना था। रिकॉर्ड बताते हैं कि मई 2025 में अमेरिकी सांसदों और पाकिस्तान के राजदूत के बीच कॉल्स भी आयोजित कराई गईं ताकि भारत के साथ बढ़ते तनाव पर पाकिस्तान अपना एजेंडा सेट कर सके।
अमेरिकी न्याय विभाग में दर्ज जानकारी के मुताबिक, लॉबिंग फर्मों ने अमेरिकी सांसदों के बीच एक विवादित नोट भी बांटा। इस नोट में पाकिस्तान ने उलटा भारत पर ही अपनी सीमा के भीतर अस्थिरता फैलाने का आरोप मढ़ा और कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की मांग दोहराई। पाकिस्तान का प्रयास था कि अमेरिका इस मामले में हस्तक्षेप करे और उसे आतंकवाद के आरोपों से क्लीन चिट मिल जाए। इतना ही नहीं, इन फर्मों ने न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉल स्ट्रीट जर्नल जैसे प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबारों के पत्रकारों से भी संपर्क किया ताकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में पाकिस्तान के पक्ष में खबरें छपवाई जा सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह खुलासा पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को उजागर करता है। जहां एक ओर वह दुनिया के सामने कर्ज के लिए हाथ फैला रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करने के लिए वह करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों के दबाव के बाद पाकिस्तान की यह छटपटाहट दिखाती है कि वह कूटनीतिक मोर्चे पर कितना अलग-थलग पड़ चुका है। खुद को निर्दोष साबित करने की यह महंगी कोशिश अब पाकिस्तान के भीतर भी राजनीतिक विवाद का कारण बन सकती है।
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