धर्म एवं ज्योतिष
फिर सजने जा रहा अयोध्या! पहली बार चांदी-सोने के झूले पर विराजमान होंगे रामलला, इस दिन जाकर देखें भव्य उत्सव
18 Jul, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अयोध्या नगरी एक बार फिर भगवान राम की भक्ति में सराबोर होने जा रही है. इस बार सावन के पावन महीने में एक ऐतिहासिक आयोजन होने जा रहा है. पहली बार अयोध्या के भव्य राम मंदिर परिसर में रामलला 29 जुलाई से चांदी और सोने के झूले (हिंडोले) पर विराजमान होंगे. इस दौरान देश-विदेश से आए रामभक्त अपने आराध्य के झूलन स्वरूप के दर्शन कर सकेंगे. यह अवसर बेहद खास होगा, क्योंकि राम मंदिर में राम दरबार की स्थापना के बाद यह पहला सावन झूला मेला होगा.
सावन झूला मेला अयोध्या की एक पुरातन परंपरा रही है, जिसमें सभी प्रमुख मठ-मंदिरों के विग्रह झूलन उत्सव में भाग लेते हैं. इस आयोजन की शुरुआत तीज से होती है और पूरा महीना भगवान के झूले पर सवार होने और भक्तों द्वारा भक्ति-भाव से दर्शन करने में समर्पित रहता है. रामलला के इस पावन झूलन स्वरूप को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु अयोध्या पहुंचते हैं. मंदिरों में भजन-कीर्तन, कजरी के सुर और भगवान को समर्पित गीत गूंजते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय बन जाता है.
राम मंदिर ट्रस्ट ने इस बार झूलनोत्सव को और भी भव्य और श्रद्धालुओं के अनुकूल बनाने की तैयारी कर ली है. ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के अनुसार, इस बार पहली बार रामलला राजाराम स्वरूप में झूले का आनंद लेंगे. भगवान को नित्य मंडप में कजरी और सावन गीत सुनाए जाएंगे. साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी प्रतिदिन किया जाएगा, जिसमें भक्त भक्ति संगीत और नृत्य के माध्यम से अपनी आस्था प्रकट करेंगे.
श्रद्धालुओं की सुविधा का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है. राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा मणि पर्वत पर भोजन प्रसाद की व्यवस्था की जा रही है, ताकि दूर-दराज से आए भक्तों को भोजन की कोई परेशानी न हो. इसके अतिरिक्त, तीर्थ क्षेत्र पूरम बाग बिजेसी में रात्रि विश्राम की व्यवस्था भी की जाएगी. राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य डॉक्टर अनिल मिश्रा के अनुसार, यह पहली बार होगा जब रामलला का उत्सव इतने भव्य रूप में मनाया जाएगा. यह झूलनोत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि अयोध्या की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है. भगवान राम के प्रति भक्तों की असीम श्रद्धा इस आयोजन को विशेष बनाती है. यह आयोजन न सिर्फ धार्मिक आस्था को प्रकट करता है, बल्कि अयोध्या की पहचान को भी वैश्विक मंच पर सशक्त बनाता है.
गलती से टूट जाए सावन सोमवार का व्रत तो क्या करें
18 Jul, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
श्रावण मास भगवान शिव को सबसे प्रिय है. शास्त्रों के अनुसार, इस महीने भोलेनाथ अपने परिवार के साथ पृथ्वी पर विचरण करने आते हैं. इसी वजह से इस पूरे महीने भगवान शिव से जुड़ी तमाम धार्मिक यात्राएं होती हैं. लोग पूरे माह मंदिरों में शिवलिंग पर जल अर्पित कर महादेव का नाम स्मरण करते हैं. श्रावण मास में पड़ने वाले हर सोमवार का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है क्योंकि यह भोलेनाथ का प्रिय मास होता है. इस माह में शिवभक्त विधिपूर्वक व्रत रखकर महादेव की आराधना करते हैं. कई बार लोग जाने-अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे सोमवार का व्रत टूट जाता है. कि अगर सावन सोमवार का व्रत गलती से टूट जाए, तो क्या करें.
धार्मिक मान्यता के अनुसार, सावन में सोमवार का व्रत करने से मानसिक शांति मिलती है, रोग दूर होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है. इसके अलावा सावन सोमवार व्रत करने से विवाहित महिलाओं के वैवाहिक जीवन में सामंजस्य और प्रेम बना रहता है, वहीं कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है.
गलती से टूट जाए व्रत तो क्या करें?
क्षमा याचना- सावन सोमवार का व्रत अगर गलती से टूट जाए, तो आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है बल्कि इसके लिए आपको भगवान शिव से क्षमा मांगनी चाहिए और आगे ऐसा नहीं होगा, इस बात की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए. साथ ही भगवान शिव से क्षमा मांगकर फिर से व्रत को रख सकते हैं या फिर अगले सोमवार का व्रत विधि-विधान से कर सकते हैं.
हवन- इसके अलावा सावन सोमवार का व्रत टूटने पर घर में छोटा सा हवन करिए. इससे भी आपको लाभ मिलता है. जब आपका व्रत टूट जाए, तो आप अगले सोमवार को प्रायश्चित व्रत रखकर इससे मुक्ति पा सकते हैं.
मंत्र का जाप- शिव पुराण के अनुसार, अगर सावन सोमवार का व्रत गलती से टूट जाए, तो महामृत्युंजय मंत्र का जप करके आप प्रायश्चित कर सकते हैं. यह विशेष लाभकारी माना गया है.
गरीबों की सेवा- सावन में सोमवार का व्रत टूटने पर गरीबों को भोजन कराना या दान करना भी शुभ फलदायी माना जाता है. आप इस उपाय को करके भी प्रायश्चित कर सकते हैं.
एकादशी के दिन चावल को हाथ भी न लगाना...महर्षि मेधा के शरीर से की जाती है तुलना
18 Jul, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में हर तिथि और हर वार का बहुत महत्व होता है. हर महीने में दो एकादशी तिथियां आती हैं, एक शुक्ल पक्ष की और एक कृष्ण पक्ष की. हर एकादशी तिथि का अपना अलग महत्व होता है. एकादशी के दिन कई लोग व्रत कर नियमों का पालन करते हैं, जिससे भगवान विष्णु प्रसन्न हों. एकादशी के दिन कई ऐसे नियम शास्त्रों में बताए गए हैं, जिनका पालन करना बेहद जरूरी होता है. अक्सर आपने देखा होगा कि घर के बड़े-बुजुर्ग एकादशी के दिन चावल खाने या बनाने को मना करते हैं. इसके पीछे क्या वजह है, आइए जानते हैं उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज से.
सावन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 21 जुलाई को होगी. 21 जुलाई को कामिका एकादशी मनाई जाएगी. एक पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि मेधा ने मां के क्रोध से बचने के लिए अपनी योग शक्तियों के माध्यम से शरीर का त्याग कर दिया और उनका अंश पृथ्वी में समा गया. यह घटना एकादशी के दिन हुई थी. उन्होंने जौ और चावल के रूप में जन्म लिया. माना जाता है कि एकादशी के दिन चावल और जौ खाने की तुलना महर्षि मेधा के शरीर से की जाती है, इसलिए एकादशी के दिन चावल नहीं खाए जाते हैं.
एकादशी के दिन इन नियमों का भी करें पालन
एकादशी के दिन गलती से भी चावल का सेवन न करें, साथ ही एकादशी व्रत के दिन मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज जैसी तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए. एकादशी व्रत रख रहे हैं, तो झूठ बोलने से बचें और किसी के लिए अपशब्द का प्रयोग न करें. एकादशी के दिन तुलसी तोड़ना वर्जित माना गया है, तो पूजा के लिए एक दिन पहले ही तुलसी तोड़कर रख लें.
लक्ष्मीनारायण की पूजा से सभी दुखों का नाश
बताते चलें कि एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है. मान्यता है कि एकादशी के दिन व्रत रखकर लक्ष्मीनारायण की पूजा करने से सभी दुखों का नाश होता है और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. वहीं सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी काफी खास होती है क्योंकि इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु की कृपा पाने का सबसे अच्छा अवसर होता है.
महादेव को बेहद प्रिय हैं ये 5 पत्ते...सावन में कर दें अर्पण, बाबा होंगे प्रसन्न, मिटेंगे कष्ट-क्लेश, बरसेगा धन!
18 Jul, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सावन में महादेव को जल्दी प्रसन्न करना हो तो ये पांच पत्ते पूजा के समय जरूर चढ़ाएं. ऐसी मान्यता है कि भोले बाबा को ये पत्ते बेहद प्रिय हैं और जो भक्त सच्चे मन से मनोकामना मानते हुए ये पत्ते उन्हें अर्पण करता है उसकी सारी इच्छाएं जल्द से जल्द पूरी हो जाती हैं. जानते हैं कौन से हैं वो पांच पत्ते.
महादेव को प्रसन्न करने के लिए शिवभक्त कई चीजें महादेव को अर्पित करते हैं लेकिन इसमें से सबसे खास शमी का फूल और पत्ता होता है. धर्म शास्त्रों की मानें तो महादेव को प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग पर शमी के पत्ते और फूल को चढ़ाने से वे बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं. दरअसल सावन के पवित्र महीने में अगर कोई भक्त शिवलिंग के ऊपर शमी के पत्ते और फूल चढ़ाता है तो उन्हें मनवांछित फल मिलता है.
अक्सर आपने देखा होगा कि धतूरे का फूल सावन के महीने में सबसे ज्यादा खिलता और फलता है. धतूरे का फूल भगवान भोलेनाथ को बहुत प्रिय होता है. कहते हैं इसे चढ़ाने से लोगों की हर मनोकामना जल्दी पूरी होती है. वहीं, जानकार बंशीधर झा बताते हैं कि धर्मशास्त्र के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को महादेव ने ही ग्रहण किया था. जिस कारण उनके शरीर में विष का असर सावन के महीने में ज्यादा हो जाता है. इसी वजह से सावन का महीना सबसे खास होता है और इस महीने में शिव भक्त शिवलिंग पर धतूरे का फूल चढ़ाते हैं. ऐसा कहा जाता है कि धतूरे का फूल चढ़ाने से भगवान शिव पर विष का असर कम होता है. वहीं, शिवलिंग पर धतूरे का फूल चढ़ाने से महादेव खुश होते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं.
सावन में शिवलिंग पर कई चीजें महादेव को अर्पित करते हैं लेकिन इसमें भांग के पत्ते चढ़ाने से महादेव विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं. दरअसल कहा जाता है कि भांग के पत्ते चढ़ाने से लोगों की लाइफ में मौजूद नेगेटिविटी आसानी से दूर हो जाती है. साथ ही साथ आयुर्वेद के अनुसार भांग में कई औषधीय गुण भी पाये जाते हैं. भांग के पत्ते शिवलिंग पर चढ़ाने से लोगों के जीवन में खुशहाली आती है, ऐसी मान्यता है.
शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से महादेव जल्द प्रसन्न होते हैं. इसके तीन पत्ते तीन भुजा ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक माने जाते हैं. इसे चढ़ाने से शिव भक्तों पर महादेव की विशेष कृपा बनी रहती है. बेलपत्र कई औषधीय गुणों का खजाना भी कहा जाता है. बेलपत्र के पौधे लोगों के लिए खूब फायदेमंद होते हैं. यह सबसे अधिक शुद्ध हवा भी इंसानों को देता है. शिवजी की पूजा में बेलपत्र ना हो तो शिवजी की पूजा भी अधूरी मानी जाती है. ऐसे में याद रहे की शिव जी की पूजा करते समय शिवलिंग पर बेलपत्र जरूर अर्पित करें. लेकिन कभी भी टूटा हुआ या खंडित बेलपत्र शिवलिंग पर अर्पित ना करें.
शिवलिंग पर दूर्वा चढ़ाना भी बहुत शुभ माना जाता है. बताया जाता है कि दूर्वा शिवजी को प्रिय है. दूर्वा चढ़ाने से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं. दूर्वा चढ़ाने से इंसानों के जीवन में आने वाले सभी प्रकार की बाधाएं खुद दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी हमेशा बना रहता है. दूर्वा हरे रंग की होती है और इससे लोगों के जीवन में हमेशा हरियाली बनी रहती है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 18 जुलाई 2025)
18 Jul, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- कार्य बाधा, स्वभाव में उद्विघ्नता तथा दु:ख अवश्य ही बनेगा, कार्य पर ध्यान दें।
वृष राशि :- आरोप से बचें, कार्यगति मंद रहेगी, क्लेश व अशांति अवश्य ही बनेगी, धैर्य रखें।
मिथुन राशि :- योजनायें पूर्ण होंगी, धन लाभ होगा, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, समय का ध्यान रखें।
कर्क राशि :- मित्र सुख वर्धक होगा, कार्यगति में सुधार होगा, चिन्तायें कम होंगी, सोच-विचार कर कार्य करें।
सिंह राशि :- साम्थर्य और धन अस्त-व्यस्त रहेगा, सतर्कता से कार्य अवश्य निपटायें, विचार पूर्वक निर्णय लें।
कन्या राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक होगा, कार्यगति में सुधार होगा, चिन्ता में कमी होगी, धैर्य रखें।
तुला राशि :- मान-प्रतिष्ठा के साधन बनेंगे, स्त्री से सुख-शांति अवश्य ही रहेगी, मित्र सहयोग करेंगे।
वृश्चिक राशि :- अग्नि, चोटादि का भय, व्यर्थ भ्रमण से धन व्यय होगा, रुके कार्य अवश्य बनेंगे।
धनु राशि :- मानसिक क्लेश व अशांति, मानसिक विभ्रम तथा भय की स्थिति रहेगी, सावधानी से कार्य करें।
मकर राशि :- विवाद ग्रस्त होने से बचें, तनाव, क्लेश व मानसिक अशांति का वातावरण रहेगा।
कुंभ राशि :- धन लाभ, आशानुकूल सफलत का हर्ष होगा, इष्ट मित्र सुखवर्धक होगा, समय का ध्यान रखें।
मीन राशि :- भोग-ऐश्वर्य की प्राप्ति, समय उल्लास से बीतेगा, मनोवृत्ति उत्तम रहेगी, अति उत्साह से बचें।
सावन में करें भोलेनाथ की अराधना
17 Jul, 2025 07:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
महादेव को प्रिय श्रावण मास चल है, जिसे लेकर शिव भक्तों में विशेष उत्साह है। इस मास में भोलेनाथ की पूजा का विशेष महत्व है। यह महीना भगवान शिव की पूजा, आराधना के लिए विशेष माना गया है। श्रावण मास में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस मास में शिवलिंग पर जल चढ़ाना, बिल्व पत्र अर्पित करना और रुद्राभिषेक करना विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।
सावन सोमवार का व्रत हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, खासकर भगवान शिव के भक्तों के लिए। यह महीना भगवान शिव को समर्पित होता है और सोमवार का दिन उन्हें अत्यंत प्रिय है।
मान्यता है कि सावन के सोमवार का व्रत रखने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। अविवाहित लड़कियों को मनपसंद वर की प्राप्ति होती है और विवाहित महिलाओं को सुखद वैवाहिक जीवन और संतान सुख का आशीर्वाद मिलता है।
सोमवार के दिन भगवान शिव को गंगाजल, दूध, घी, शक्कर के साथ अबीर, इत्र, अक्षत (चावल के साबूत दाने) समेत अन्य पूजन सामग्री अर्पित करनी चाहिए। इसके साथ ही चीनी और दूध समेत सफेद चीजों का दान करना चाहिए। घर में या मंदिर में रुद्राभिषेक करने का भी विशेष प्रावधान है।
भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर फिर मंदिर या पूजा स्थल को साफ करें। एक चौकी पर सफेद कपड़ा बिछाकर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा को स्थापित करें, गंगाजल और दूध से अभिषेक करें, और बिल्वपत्र, चंदन, अक्षत, फल और फूल चढ़ाएं। लेकिन एकादशी के दिन भगवान शिव को अक्षत नहीं चढ़ाना चाहिए।
भोलेनाथ की पूजा के साथ ही माता पार्वती की भी पूजा करनी चाहिए। माता को सोलह श्रृंगार की वस्तुएं चढ़ाएं। इसके साथ ही भगवान शिव का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें और दीपक जलाकर भगवान शिव की आरती करें। इसके बाद ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप करना चाहिए। व्रत के बाद, गरीबों, ब्राम्हणों के साथ ही जरूरतमंदों को दान करना चाहिए।
शनिदेव के हैं नौ वाहन
17 Jul, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सूर्यपुत्र शनिदेव न्याय के देवता हैं हालांकि लोग उनके कोप से भयभीत रहते हैं पर वह हमेशा ही कार्यों के अनुरुप परिणाम देते हैं। उनके कई वाहन हैं। शनि के वाहनों की बात करते हुए सामान्यन रूप से कौवे के बारे में ध्याभन आता है, लेकिन उनके कौवे सहित कुल 9 वाहन है। जिनमें से कई को ज्योतिषीय और धार्मिक महत्व के अनुसार बेहद शुभ माना गया हैं। इसके बावजूद जरूरी नहीं है कि वे सभी आपके लिए भी शुभ ही हों। इसलिए ये जानना अत्यंनत आवश्यरक है कि कौन शुभ है और कौन अशुभ। शास्त्रों की माने तो शनि जिस वाहन में सवार होकर किसी व्याक्तिप की कुंडली में प्रवेश करते हैं उसकी राशि की गणना करके तय होता है कि उनका आगमन व्यरक्ति के लिए अच्छाै है या बुरा।
इस गणना की विधि सुनने में कठिन लगती है पर है गणित के सूत्रों की तरह एक दम तय है। इसके लिए जन्म नक्षत्र की संख्या और शनि के राशि बदलने की तिथि के नक्षत्र की संख्या जोड कर उसके योगफल को नौ से भाग करना होता है। इस गणना से मिली संख्या के आधार पर ही शनि का वाहन निर्धारित होता है। एक दूसरी विधि भी है, इसमें शनि के राशि प्रवेश करने की तिथि की संख्या, ऩक्षत्र संख्या, वार संख्या और नाम के प्रथम अक्षर संख्या सभी को जोडकर योगफल को 9 से भाग देदें, जो शेष संख्या आयेगी वो शनि के वाहन की जानकारी देगी। दोनो विधियों मे यदि शेष 0 बचे तो मानना चाहिए कि आपकी अपेक्षित संख्यान 9 है।
सूर्य देव का परिवार
रविवार को सूर्यदेव का दिन माना जाता है। यश और सम्मान हासिल करने के लिए सभी लोग उनकी पूजा करते हैं। पर क्या आप सूर्यदेव के परिवार को जानते हैं। सूर्य देव का परिवार काफी बड़ा है। उनकी संज्ञा और छाया नाम की दो पत्निोयां और दस संताने हैं। जिसमे से यमराज और शनिदेव जैसे पुत्र और यमुना जैसी बेटियां शामिल हैं। मनु स्मृजति के रचयिता वैवस्वत मनु भी सूर्यपुत्र ही हैं।
सूर्य देव की दो पत्निमयां संज्ञा और छाया हैं। संज्ञा सूर्य का तेज ना सह पाने के कारण अपनी छाया को उनकी पत्नीम के रूप में स्थाहपित करके तप करने चली गई थीं। लंबे समय तक छाया को ही अपनी प्रथम पत्नीर समझ कर सूर्य उनके साथ रहते रहे। ये राज बहुत बात में खुला की वे संज्ञा नहीं छाया है। संज्ञा से सूर्य को जुड़वां अश्विनी कुमारों के रूप में दो बेटों सहित छह संताने हुईं जबकि छाया से उनकी चार संताने थीं।
देव शिल्पीं विश्वेकर्मा सूर्य पत्नीव संज्ञा के पिता थे और इस नाते उनके ससुर हुए। उन्होंंने ही संज्ञा के तप करने जाने की जानकारी सूर्य देव को दी थी।
धर्मराज या यमराज सूर्य के सबसे बड़े पुत्र और संज्ञा की प्रथम संतान हैं।
यमी यानि यमुना नदी सूर्य की दूसरी संतान और ज्येसष्ठा पुत्री हैं जो अपनी माता संज्ञा को सूर्यदेव से मिले आर्शिवाद के चलते पृथ्वीज पर नदी के रूप में प्रसिद्ध हुईं।
सूर्य और संज्ञा की तीसरी संतान हैं वैवस्वत मनु वर्तमान (सातवें) मन्वन्तर के अधिपति हैं। यानि जो प्रलय के बाद संसार के पुर्निमाण करने वाले प्रथम पुरुष बने और जिन्हों।ने मनु स्मृपति की रचना की।
सूर्य और छाया की प्रथम संतान है शनिदेव जिन्हें् कर्मफल दाता और न्याषयधिकारी भी कहा जाता है। अपने जन्मन से शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखते थे। भगवान शंकर के वरदान से वे नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर नियुक्तव हुए और मानव तो क्या देवता भी उनके नाम से भयभीत रहते हैं।
छाया और सूर्य की कन्या तप्तिह का विवाह अत्यन्त धर्मात्मा सोमवंशी राजा संवरण के साथ हुआ। कुरुवंश के स्थापक राजर्षि कुरु का इन दोनों की ही संतान थे, जिनसे कौरवों की उत्पत्ति हुई।
सूर्य और छाया पुत्री विष्टि भद्रा नाम से नक्षत्र लोक में प्रविष्ट हुई। भद्रा काले वर्ण, लंबे केश, बड़े-बड़े दांत तथा भयंकर रूप वाली कन्या है। शनि की तरह ही इसका स्वभाव भी कड़क बताया गया है। उनके स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ही भगवान ब्रह्मा ने उन्हें कालगणना या पंचांग के एक प्रमुख अंग विष्टि करण में स्थान दिया है।
सूर्य और छाया की चौथी संतान हैं सावर्णि मनु। वैवस्वत मनु की ही तरह वे इस मन्वन्तर के पश्चांत अगले यानि आठवें मन्वन्तर के अधिपति होंगे।
संज्ञा के बारे में जानकारी मिलने के बाद अपना तेज कम करके सूर्य घोड़ा बनकर उनके पास गए। संज्ञा उस समय अश्विनी यानि घोड़ी के रूप में थी। दोनों के संयोग से जुड़वां अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति हुई जो देवताओं के वैद्य हैं। कहते हैं कि दधीचि से मधु-विद्या सीखने के लिये उनके धड़ पर घोड़े का सिर रख दिया गया था, और तब उनसे मधुविद्या सीखी थी। अत्यं्त रूपवान माने जाने वाले अश्विनीकुमार नासत्य और दस्त्र के नाम से भी प्रसिद्ध हुए।
सूर्य की सबसे छोटी और संज्ञा की छठी संतान हैं रेवंत जो उनके पुनर्मिलन के बाद जन्मीा थी। रेवंत निरन्तर भगवान सूर्य की सेवा में रहते हैं।
विजेता बनना है तो धारण करें वैजयंती माला
17 Jul, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वैजयंती माला- एक ऐसी माला जो सभी कार्यों में विजय दिला सकती है। इसका प्रयोग भगवान श्री कृष्ण माता दुर्गा, काली और दूसरे कई देवता करते थे। रत्न के जानकार मानते हैं कि अगर इस माला को सही विधि-विधान के साथ प्राण प्रतिष्ठित करके धारण किया जाए तो इसके परिणाम आपको तत्काल मिल सकते हैं। कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो जिसमें रुकावट आएगी।
वैजयंती माला को धारण करने वाला इंद्र के समान सारे वस्त्रों को जीतने वाला बन जाता है और श्री कृष्ण के समान सभी को मोहित करने वाला बन जाता है और महर्षि नारद के समान विद्वान बन जाता है। इस सिद्ध माला को धारण करने वाला हर जगह विजय प्राप्त करता है। उसके सर्व कार्य अपने आप बनते चले जाते हैं । यदि किसी काम में लंबे समय से बाधा आ रही है तो वह काम आसानी से बन जाता है। यह माला शत्रुओं का नाश भी करती है। वैजयंती माला को सिद्ध करने के लिए इसी विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए। पूरा फल पाने के लिए जरूरी है कि माला सही विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठा के बाद ही पहनी चाहिए।
पूजा में कपूर होता है अहम
17 Jul, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में पूजा में कपूर बहुत जरुरी होता है। पूजा के बाद आरती में कपूर का उपयोग किया जाता है। कपूर के बिना आरती अधूरी मानी जाती है। कपूर जलाने से नकारात्मकता सकारात्मक ऊर्जा में बदल जाती है। कपूर का उपयोग बीमारियों के इलाज में भी किया जाता है। इसलिए धर्मग्रंथों के साथ आयुर्वेद में भी कपूर के बारे में खासतौर से बताया गया है। ज्योतिषीय और वास्तु उपायों में भी कपूर का उपयोग महत्वपूर्ण रूप से किया जाता है। भारतीय पूजा पद्धति वैज्ञानिक नजरिये से भी महत्वपूर्ण है। कपूर के बारे में वैज्ञानिक शोधों के आधार पर भी कहा जाता है कि इसकी सुगंध से जीवाणु, विषाणु आदि बीमारी फैलाने वाले जीव खत्म हो जाते हैं। यह वातावरण को शुद्ध करता है जिससे बीमारी होने खतरा कम हो जाता है। घर में कपूर जलाने से हानिकारक बैक्टीरिया खत्म होते हैं।
बाहर हो जाती है दूषित वायु
पूजा या हवन करते समय जब हम कपूर जलाते हैं, तो उससे निकलने वाला धुआं आसपास की नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करता है। कपूर जलाने से आसपास की हवा साफ होने लगती है। खराब हवा घर से बाहर हो जाती है और वातावरण शुद्ध हो जाता है। सुबह-शाम कपूर जलाने से बाहरी नकारात्मक ऊर्जा घर में नहीं आ पाती है। कपूर जलाने से हवा में ऑक्सीजन की मात्रा भी बढ़ सकती है। प्रदूषित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को बीमारियों से बचने के लिए कपूर जलाना चाहिए। वास्तु दोष दूर करने में भी कपूर का अच्छा असर होता है। घर के जिस कमरे में शुद्ध वायु आने-जाने के लिए खिड़की, रोशनदान आदि न हों वहां कांच के बर्तन में कपूर रखने से शुद्ध वायु का संचार होता है।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 17 जुलाई 2025)
17 Jul, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष- आज चंद्रमा की स्थिति 17 जुलाई, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मीन राशि में है. आपकी राशि से चंद्रमा बारहवें भाव में होगा. आपका दिन अस्वस्थता और चिंता में गुजरेगा. आपको सर्दी, कफ और बुखार की समस्या हो सकती है. किसी का भला करने की जगह आज अपने काम में ही व्यस्त रहें. किसी से पैसों का लेन-देन ना करें। जमीन और संपत्ति के काम आज ना ही करें. किसी तरह का महत्वपूर्ण निर्णय ना लें. चिंता में वृद्धि होगी. अधिक लाभ के लालच में आपकी हानि हो सकती है. व्यवसाय में कुछ नया प्रयोग आज ना ही करें. जीवनसाथी के साथ आपके संबंध सामान्य रहेंगे.
वृषभ- आज चंद्रमा की स्थिति 17 जुलाई, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मीन राशि में है. आपकी राशि से चंद्रमा ग्यारहवें भाव में होगा. आज का दिन सावधानीपूर्वक गुजारें. आप का मन अनेक प्रकार की चिंताओं में रहने वाला है. स्वास्थ्य बिगड़ सकता है और आंखों में पीड़ा होने की संभावना है. आत्मीयजनों एवं परिवारजनों से विवाद हो सकता है. ज्यादातर समय आज आपको धैर्य के साथ गुजारना चाहिए. आज प्रारंभ किए हुए सभी काम अधूरे रह सकते हैं. फिजूलखर्ची से खुद को बचाएं. दुर्घटना होने का भय रहेगा, इसलिए सावधानी रखें. गहन परिश्रम के बाद भी आज उसका उचित परिणाम नहीं मिलेगा.
मिथुन- आज चंद्रमा की स्थिति 17 जुलाई, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मीन राशि में है. आपकी राशि से चंद्रमा दसवें भाव में होगा. आज शारीरिक और मानसिक सुख बना रहेगा. नौकरी और व्यवसाय में आपके काम की प्रशंसा होगी. सहकर्मी आपका साथ देंगे. व्यापारी अपने व्यापार की वृद्धि कर सकेंगे. इससे आप अधिक प्रोत्साहित होंगे. आर्थिक लाभ होगा और कहीं निवेश करने संबंधी कोई योजना भी आप बना सकते हैं. समाज में मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी. सरकारी कामों में सफलता मिलेगी. गृहस्थ जीवन में आनंद रहेगा. प्रेम जीवन में भी आज सकारात्मकता रहेगी.
कर्क- आज चंद्रमा की स्थिति 17 जुलाई, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मीन राशि में है. आपकी राशि से चंद्रमा नवें भाव में होगा. तन-मन में आनंद की अनुभूति होगी. आपके भाग्य में निखार आ सकता है. विदेश से अच्छे समाचार मिलेंगे. धर्म संबंधी कामकाज या किसी मंदिर दर्शन के लिए बाहर जाना पड़ सकता है. पारिवारिक सदस्यों के साथ आनंद के पल बीता सकते हैं. अचानक आर्थिक लाभ हो सकता है. हालांकि परिवार की जरूरत पर धन खर्च करके मन को प्रसन्नता भी होगी. नौकरी में भी लाभ होने की संभावना है. यदि कॅरियर में बदलाव के बारे में विचार कर रहे हैं, तो आज आवेदन कर सकते हैं. स्वास्थ्य उत्तम रहेगा.
सिंह- आज चंद्रमा की स्थिति 17 जुलाई, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मीन राशि में है. आपकी राशि से चंद्रमा आठवें भाव में होगा. आज आपको अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना रहेगा. चिकित्सा पर धन खर्च होने की संभावना है. नकारात्मक विचार आपको गलत मार्ग पर ले जा सकते हैं. आज ऑफिस में आपका मन काम में नहीं लगेगा. पारिवारिक सदस्यों के साथ मनमुटाव होगा. नियम विरुद्ध किए गए काम से बदनामी हो सकती है. आध्यात्मिकता से आपको काफी राहत मिलेगी. हालांकि ध्यान रखें, समय कभी भी एक जैसा नहीं रहता है, इसलिए सकारात्मक सोच रखें. निराशा और चिंता से आपका ही नुकसान होगा.
कन्या- आज चंद्रमा की स्थिति 17 जुलाई, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मीन राशि में है. आपकी राशि से चंद्रमा सातवें भाव में होगा. उग्रता और नकारात्मकता आपके मन को बेचैन कर देंगे. मन पर नियंत्रण रखना आवश्यक है. व्यवसाय में किसी से विवाद होने से आपको परेशानी हो सकती है. खान-पान में सावधानी रखना आवश्यक है. स्वास्थ्य खराब हो सकता है. परिवार में थोड़ी अशांति रहेगी. खर्च बढ़ने से आर्थिक संकट का सामना करना पड़ेगा. नए सम्बंध आपको कठिनाई में डाल सकते हैं. रिश्तों को बढ़ाने की जल्दबाजी नहीं करें. आज आपको किसी नए काम की शुरुआत नहीं करनी चाहिए. आय स्थिर रहेगी.
तुला- आज चंद्रमा की स्थिति 17 जुलाई, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मीन राशि में है. आपकी राशि से चंद्रमा छठे भाव में होगा. आज नौकरीपेशा लोगों के लिए अत्यंत लाभदायक दिन है. नौकरीवालों को उनके काम में यश और सफलता मिलेगी. विरोधियों पर विजय मिलेगी. ऑफिस में सहकर्मियों का सहयोग मिलेगा. व्यापार के लिए भी लाभप्रद दिन है. पारिवारिक वातावरण अच्छा रहेगा. ननिहाल पक्ष से अच्छे समाचार मिलेंगे. स्वास्थ्य अच्छा रहेगा. विद्यार्थियों को पढ़ाई में सफलता मिलेगी. धन की योजना बनाने के लिए यह अच्छा दिन है. परिश्रम से प्रगति होगी. संतान के बारे में शुभ समाचार मिलेंगे.
वृश्चिक- आज चंद्रमा की स्थिति 17 जुलाई, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मीन राशि में है. आपकी राशि से चंद्रमा पांचवें भाव में होगा. स्वास्थ्य को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत है. संतान की समस्या आपको चिंतित करेगी. आज आप अपने काम पर ही ध्यान दें. अनावश्यक किसी के विवाद में पड़ने से मानहानि की संभावना है. निवेश को लेकर किसी भी तरह की जल्दबाजी से आपको बचना चाहिए. संभव हो तो यात्रा टालें. विद्यार्थियों को पढ़ाई में सफलता मिलेगी. आर्थिक आयोजन सफलतापूर्वक पूरे हो सकेंगे. हालांकि दोपहर के बाद आपकी स्थिति बदलेगी और आपके विचार सकारात्मक बनेंगे.
धनु- आज चंद्रमा की स्थिति 17 जुलाई, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मीन राशि में है. आपकी राशि से चंद्रमा चौथे भाव में होगा. तन और मन में ताजगी का अभाव रहेगा. मन पर चिंता का भार रहेगा. परिवार में किसी से विवाद हो सकता है. माता या बड़ी बहन से कोई विवाद हो सकता है. उनकी तबीयत के संबंध में भी चिंता रहेगी. सार्वजनिक कार्यक्रम में आप मौन ही रहें. अनिद्रा और समय पर भोजन नहीं मिलने से गुस्सा आएगा. महत्वपूर्ण काम आज ना करें. जीवनसाथी से विचारों का ताल-मेल बनाकर रखें. प्रेम जीवन में आपको अपने प्रिय के साथ समय गुजारने का अच्छा अवसर मिल सकता है.
मकर- आज चंद्रमा की स्थिति 17 जुलाई, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मीन राशि में है. आपकी राशि से चंद्रमा तीसरे भाव में होगा. दैनिक कामों में अनुकूल परिस्थिति निर्मित होने पर राहत महसूस करेंगे. जीवनसाथी के साथ कोई पुराना मतभेद दूर होगा और गृहस्थ जीवन की समस्याएं हल होती हुई प्रतीत होंगी. संपत्ति संबंधी काम के परिणाम सुखद आएंगे. व्यापार में आर्थिक लाभ होगा. भाई-बहनों का सहयोग मिलेगा. विद्यार्थियों के लिए अच्छा समय है. प्रिय व्यक्ति से मुलाकात होगी. विरोधियों से आगे निकल सकेंगे. नए काम के लिए आज का दिन अनुकूल है.
कुंभ- आज चंद्रमा की स्थिति 17 जुलाई, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मीन राशि में है. आपकी राशि से चंद्रमा दूसरे भाव में होगा. वाणी पर संयम रखेंगे तो आज बहुत सी समस्याओं से बच जाएंगे. किसी के साथ वाद-विवाद में न पड़ें. अनावश्यक खर्च पर अंकुश रखें. काम में कम सफलता मिलेगी. असंतोष की भावना का अनुभव होगा. स्वास्थ्य खराब होगा. विद्यार्थियों को विद्या प्राप्ति में बाधा आएगी. आर्थिक हानि की संभावना है. आज का दिन धैर्य के साथ गुजारें. जल्दबाजी से आपको नुकसान होने की आशंका रहेगी. हालांकि शाम के बाद स्थिति में परिवर्तन होगा.
मीन- आज चंद्रमा की स्थिति 17 जुलाई, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मीन राशि में है. आपकी राशि से चंद्रमा पहले भाव में होगा. आपको खर्च पर संयम रखना होगा. ज्यादा खर्च से मानसिक कष्ट हो सकता है. लोगों से गुस्से या आवेश में बात ना करें. आज किसी से मनमुटाव हो सकता है. खासकर धन के लेन-देन में सावधानी बरतें. स्वजनों के साथ खटपट होने की आशंका है. शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य मध्यम रहेगा. नेगेटिव विचारों के कारण मन उदास रह सकता है. व्यापारियों के लिए दिन सामान्य रहेगा. प्रेम जीवन में नकारात्मक विचार आपको परेशान कर सकते हैं.
तुलसी पूजन और गो सेवा से रहेंगे रोग दूर
17 Jul, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, बहुत सारे ऐसे उपाय बताए गए हैं, जिन्हें अपनाकर व्यक्ति सरल एवं सुलभ जीवन व्यतित कर सकता है। उन्हीं में से तुलसी पूजन और गो सेवा दो ऐसे शुभ कर्म हैं, जिस घर में प्रतिदिन होते हैं, वहां का द्वार रोग कभी नहीं खटखटाते और मिलते हैं ढेरों लाभ।
‘स्कंद पुराण’ के अनुसार जिस घर में तुलसी का बगीचा होता है (एवं प्रतिदिन पूजन होता है), उसमें यमदूत प्रवेश नहीं करते।’
‘पद्म पुराण’ में आता है कि ‘कलियुग में तुलसी का पूजन, कीर्तन, ध्यान, रोपण और धारण करने से वह पाप को जलाती है और स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करती है।’
‘पद्म पुराण’ के उत्तर खंड में आता है कि कैसा भी पापी, अपराधी व्यक्ति हो, तुलसी की सूखी लकडिय़ां उसके शव के ऊपर, पेट पर, मुंह पर थोड़ी-सी बिछा दें और तुलसी की लकड़ी से अग्नि शुरू करें तो उसकी दुर्गति से रक्षा होती है। यमदूत उसे नहीं ले जा सकते।
‘गरुड़ पुराण’ (धर्म कांड-प्रेत कल्प : 38.99) में आता है कि ‘तुलसी का पौधा लगाने, पालन करने, सींचने तथा ध्यान, स्पर्श और गुणगान करने से मनुष्यों के पूर्व जन्मार्जित पाप जल कर विनष्ट हो जाते हैं।’
‘मृत्यु के समय जो तुलसी-पत्ते सहित जल का पान करता है वह सपूर्ण पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक में जाता है।’ (ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खंड : 21.43)
‘जो दारिद्रय मिटाना व सुख-सपदा पाना चाहता है उसे शुद्ध भाव व भक्ति से तुलसी के पौधे की 108 परिक्रमा करनी चाहिए।’
ईशान कोण में तुलसी का पौधा लगाने से बरकत होती है।
राजस्थान का ऐसा मंदिर, जिसे औरंगज़ेब भी मिटा नहीं पाया… आज भी गूंजता है ‘हर हर शंभू’!
16 Jul, 2025 07:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सीकर. सीकर जिले में स्थित हर्ष पर्वत को राजस्थान का केदारनाथ कहा जाता है. यहां भगवान शिव की हजारों साल पुरानी मूर्ति स्थापित है. चारों ओर पहाड़ों से घिरे इस पर्वत की ऊंचाई 3100 फीट है. इस ऊंचाई पर स्थित शिव मंदिर की यात्रा भक्तों के लिए बेहद खास होती है. खड़ी चढ़ाई, गहरी घाटियां और ऊंचाई पर भगवान शिव का चमत्कारी मंदिर लोगों को केदारनाथ जैसा अनुभव देता है. पूजा के साथ-साथ यह स्थान पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. खासकर बारिश के मौसम में जब चारों ओर बादल मंडराते हैं, तो यह पर्वत और भी अधिक सुंदर दिखाई देता है.
हर्ष पर्वत, खाटूश्यामजी से मात्र 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इसलिए खाटू के दर्शन के बाद श्रद्धालु आसानी से यहां पहुंच सकते हैं. माउंट आबू के बाद इसे राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा पर्वत माना जाता है. यहां स्थित शिव मंदिर को मुगल शासक औरंगजेब की सेना ने तहस-नहस कर दिया था, जिसके प्रमाण आज भी यहां देखे जा सकते हैं. इस पर्वत पर भगवान गणेश की विश्व की एकमात्र अर्द्धनारीश्वर रूप वाली मूर्ति भी है, जिसे गणेशी अवतार कहा जाता है. इसके अलावा यहां सफेद शिवलिंग, पंचमुखी शिवलिंग और हजार साल से भी ज्यादा पुरानी मूर्तियां मौजूद हैं.
प्राकृतिक नजारों और आध्यात्म का संगम है हर्षनाथ मंदिर
हर्ष पर्वत की ऊंचाई पर स्थापित पवन चक्कियां दूर से बेहद आकर्षक दिखाई देती हैं. जैसे-जैसे इनके पास पहुंचते हैं, दृश्य और भी सुंदर होता चला जाता है. हर्षनाथ मंदिर प्रकृति की गोद में बसा एक शांत और दिव्य स्थल है. 3100 फीट की ऊंचाई से सूर्योदय और सूर्यास्त देखना अपने आप में एक अविस्मरणीय अनुभव होता है. यहां की लहरदार सड़कें लॉन्ग ड्राइव के लिए बिल्कुल उपयुक्त हैं. बरसात के मौसम में यहां की हरियाली और नमी इस स्थान को और भी अधिक आकर्षक बना देती है.
सावन में उमड़ती है भक्तों की भीड़
सावन के महीने में इस स्थान पर श्रद्धालुओं की संख्या में काफी वृद्धि होती है. देश के अलग-अलग हिस्सों जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और हरियाणा से लोग यहां शिव दर्शन को पहुंचते हैं. हर्ष पर्वत राजस्थान के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों में से एक बन चुका है. प्राचीन मंदिर, विशाल पवन चक्कियां, गहरी घाटियां और प्रकृति की सुंदरता यहां के अनुभव को अद्वितीय बनाती हैं. यही कारण है कि हर साल हजारों की संख्या में लोग यहां आकर आध्यात्म और प्रकृति दोनों का आनंद लेते हैं.
क्यों हनुमान नहीं पहुंचा पाए गोवर्धन पर्वत को श्रीराम तक? जानिए वो रहस्य जो द्वापर में कृष्ण ने पूरा किया!
16 Jul, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मथुरा: भगवान के अवतारों और उनकी लीलाओं से जुड़ी कहानियों में ब्रजभूमि का विशेष स्थान रहा है. मथुरा, वृंदावन और गोवर्धन जैसे स्थानों पर ऐसी कई कथाएं मौजूद हैं जो भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों से जुड़ी हुई हैं. ऐसी ही एक कथा है गोवर्धन पर्वत की, जो सीधे सतयुग और द्वापर युग से जुड़ती है. लोकल18 की टीम पहुंची गोवर्धन, जहां उन्हें मिले पंडित हर्षवर्धन कौशिक, जिनसे उन्होंने सुनी भगवान हनुमान और गोवर्धन पर्वत की रहस्यमयी कहानी.
जब सेतु बनाने के लिए निकले हनुमान…
पौराणिक मान्यता के अनुसार, सतयुग में रावण से युद्ध करने के लिए जब भगवान राम को लंका जाना था, तो समुद्र पार करने के लिए एक पुल (सेतु) बनाने का निर्णय लिया गया. इसके लिए श्रीराम ने अपनी वानर सेना को पत्थर, पर्वत और बड़े पेड़ लाने का आदेश दिया. इस आदेश पर हनुमान जी अन्य वानरों के साथ अलग-अलग दिशाओं में पर्वतों की तलाश में निकल पड़े.
हनुमान जी जब द्रोणगिरी पर्वत के पास पहुंचे, तो वहां उन्हें एक वृद्ध पर्वत मिले, जिन्होंने खुद को गोवर्धन और रत्नागिरी पर्वत का पिता बताया. उन्होंने हनुमान जी से आग्रह किया कि उनके दोनों पुत्रों को श्रीराम की सेवा में ले जाएं, लेकिन एक शर्त भी रखी जब श्रीराम से मुलाकात हो तो उन्हें भी दर्शन कराएं.
हनुमान ने गोवर्धन पर्वत को क्यों ब्रज में ही छोड़ दिया?
हनुमान जी गोवर्धन पर्वत को लेकर समुद्र तट की ओर चल पड़े. लेकिन तभी श्रीराम की ओर से संदेश आया कि पुल बनाने के लिए पर्याप्त सामग्री एकत्रित हो चुकी है, और अब जहां जो भी पत्थर है वहीं उसे छोड़ दिया जाए. इस आदेश के बाद हनुमान जी ने गोवर्धन पर्वत को ब्रजभूमि में स्थापित कर दिया.
यह सुनकर गोवर्धन पर्वत दुखी हो गए. उन्होंने हनुमान जी से कहा कि आपने मुझसे वादा किया था कि मुझे भगवान श्रीराम के दर्शन कराओगे, लेकिन अब आप बिना दर्शन कराए ही मुझे यहां छोड़कर जा रहे हो. यदि आपने अपना वादा पूरा नहीं किया तो आप पर झूठ बोलने का दोष लगेगा.
हनुमान की प्रार्थना और भगवान श्रीराम का वचन
हनुमान जी ने गोवर्धन पर्वत की बात सुनकर भगवान राम का ध्यान किया और उनसे इस संकट से मुक्ति की प्रार्थना की. तब श्रीराम ने हनुमान से कहा, “तुम चिंता मत करो. मैं द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लूंगा और तब स्वयं आकर गोवर्धन पर्वत की पूजा करूंगा.”
और हुआ भी ऐसा ही. द्वापर युग में जब भगवान श्रीराम ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया, तो उन्होंने गोवर्धन लीला रचाई. उस समय जब इंद्रदेव ने बृजवासियों पर भारी वर्षा कर दी थी, तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठाकर सभी को सुरक्षित किया. यह उसी वादे की पूर्ति थी जो हनुमान जी ने सतयुग में गोवर्धन पर्वत से किया था.
गोवर्धन दानघाटी मंदिर के पुजारी हर्षवर्धन कौशिक ने लोकल18 की टीम को यह पूरी कथा सुनाई. उन्होंने बताया कि यह सिर्फ पौराणिक मान्यता नहीं, बल्कि ब्रजभूमि की आस्था का प्रतीक है. यहां हर साल हजारों श्रद्धालु गोवर्धन परिक्रमा करते हैं और भगवान श्रीकृष्ण के उस वादे को याद करते हैं जो उन्होंने अपने परम भक्त हनुमान के माध्यम से गोवर्धन से किया था.
बढ़ रहा सबसे बड़े चमत्कारी शिवलिंग का आकार, भूतेश्वर नाथ मंदिर का रहस्य आज भी रहस्य
16 Jul, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
छत्तीसगढ़ में सावन माह की शुरुआत के साथ ही चारों ओर आस्था का ज्वार उमड़ पड़ा है. गरियाबंद जिले में स्थित प्रसिद्ध भूतेश्वर नाथ महादेव मंदिर इन दिनों शिवभक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. यहां स्थापित 80 फीट लंबा और 210 फीट गोलाई वाला अद्भुत स्वयंभू शिवलिंग भक्तों को चमत्कृत कर रहा है, जिसके दर्शन और जलाभिषेक के लिए दूरदराज से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं. यहां हर रोज काफी संख्या में श्रद्धालु आ रहे हैं.
आसपास के गांव के लोगों का मानना है कि पहले भूतेश्वर महादेव एक छोटे टीले के रूप में थे. फिर धीरे-धीरे इनका आकार बढ़ता गया. साथ ही शिवलिंग के आकार में बढ़ाव अब भी जारी है. यह शिवलिंग न सिर्फ अपने विशाल आकार के लिए विख्यात है बल्कि इसे प्रकृति का एक अनमोल और स्वनिर्मित उपहार माना जाता है. स्थानीय लोगों की प्रबल मान्यता है कि यह शिवलिंग स्वयं पृथ्वी से प्रकट हुआ है और वर्षों से इसी स्थान पर विद्यमान है. इसका विशालकाय स्वरूप और इसकी प्राकृतिक उत्पत्ति इसे और भी रहस्यमयी और पूजनीय बनाती है.
सावन मास में लगती लंबी कतारें
सावन के पावन महीने में भूतेश्वर नाथ मंदिर की छटा देखते ही बनती है. हर सोमवार और पूरे सावन माह में पूजन-अर्चन के लिए यहां भक्तों की लंबी कतारें लगती हैं. स्थानीय श्रद्धालु हों या दूरदराज से आए कांवड़ यात्री, सभी ‘बोल बम’ के जयघोष के साथ महादेव को जल अर्पित करने पहुंचते हैं. कांवड़ यात्रा के दौरान ‘बोल बम’ के जयकारों से पूरा मंदिर परिसर शिवमय वातावरण में डूबा रहता है, जहां भक्तिगीतों की गूंज और धूप-दीप की सुगंध मन को शांति प्रदान करती है.
दर्शन मात्र से दूर होते दुख-दर्द
इस स्वयंभू शिवलिंग को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है. मान्यता है कि भूतेश्वर नाथ महादेव के दर्शन मात्र से भक्तों के सभी दुख-दर्द दूर होते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. यह स्थल केवल एक मंदिर नहीं बल्कि आस्था, विश्वास और प्राचीन परंपरा का प्रतीक है, जो हर साल हजारों भक्तों को अपनी ओर खींचता है.
पत्नी भी पति को बांध सकती है राखी? जानिए क्या कहते हैं शास्त्र, क्या है समाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण?
16 Jul, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Raksha Bandhan 2025: रक्षाबंधन का त्योहार भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है, जिसे हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. यह पर्व भाई-बहन के बीच प्रेम, सुरक्षा और एक-दूसरे के प्रति दायित्व का प्रतीक माना जाता है. इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसकी लंबी उम्र तथा खुशहाली की कामना करती है. वही, भाई अपनी बहन की सुरक्षा का वचन देता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पर्व पर एक सवाल अक्सर पूछा जाता है – क्या पत्नी अपने पति को राखी बांध सकती है? इस सवाल का उत्तर शास्त्र, परंपरा और समाज के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है. आइए इस बारे में समझते हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से कि क्या यह शास्त्र सम्मत है.
रक्षाबंधन का पारंपरिक अर्थ
रक्षाबंधन की परंपरा में राखी बांधने का एक गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. पंडित अरविंद मिश्र के अनुसार, राखी एक पवित्र धागा है, जिसे बहन अपने भाई की कलाई पर बांधती है. यह राखी न केवल सुरक्षा का प्रतीक होती है, बल्कि इसमें बहन की दीर्घायु, समृद्धि और खुशी की कामना भी छिपी रहती है. यह रिश्ता भाई-बहन के बीच स्नेह, विश्वास और एक-दूसरे को बचाने के वचन से जुड़ा होता है.
क्या पत्नी पति को राखी बांध सकती है?
यह सवाल समाज और शास्त्र दोनों के दृष्टिकोण से विचारणीय है. ज्योतिषाचार्य डॉ. अरविंद मिश्र का कहना है कि पत्नी द्वारा पति को राखी बांधने की परंपरा नहीं है. इसके पीछे कारण यह है कि राखी का बंधन भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है, जिसमें निःस्वार्थ प्रेम और देखभाल की भावना निहित होती है. जबकि पति-पत्नी का संबंध प्रेम, समर्पण और सहयोग पर आधारित होता है. यदि पत्नी अपने पति को राखी बांधती है, तो यह रिश्तों की मर्यादा और समाजिक परंपरा के खिलाफ माना जाता है.
शास्त्रीय दृष्टिकोण से भी, इस कार्य को अनुचित माना जाता है. क्योंकि राखी बांधने की प्रक्रिया विशेष रूप से भाई की सुरक्षा और समृद्धि की कामना के लिए होती है. यदि यह काम पति-पत्नी के रिश्ते में किया जाता है, तो यह उन दोनों के बीच के दांपत्य संबंधों को प्रभावित कर सकता है, जिससे जीवन में समस्याएं आ सकती हैं.शास्त्र और पुराणों में क्या है इस विषय पर?
अगर हम पुराणों की बात करें, तो कहीं भी “पत्नी द्वारा पति को राखी बांधने” का उल्लेख नहीं मिलता है. चाहे वह भगवद्गीता हो, महाभारत हो, रामायण हो, या फिर अन्य कोई प्रमुख धर्मग्रंथ, इनमें यह परंपरा कहीं दिखाई नहीं देती. खासकर भविष्य पुराण में रक्षाबंधन का वर्णन मिलता है, जिसमें इन्द्र की पत्नी शचि ने उन्हें युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए रक्षासूत्र बांधा था, लेकिन यह संदर्भ पति-पत्नी के रिश्ते से अधिक देव-दानव युद्ध से जुड़ा था.
महाभारत में द्रौपदी द्वारा श्रीकृष्ण को राखी बांधने का प्रसंग भी प्रसिद्ध है, लेकिन यहां राखी का उद्देश्य सुरक्षा और समृद्धि से संबंधित था, न कि दांपत्य जीवन से. इस प्रकार, इस परंपरा का संबंध केवल भाई-बहन के रिश्ते से है, न कि पति-पत्नी से.
क्या पत्नी को अपने पति को शुभकामनाएं देने के लिए कोई अन्य तरीका अपनाना चाहिए?
यदि आप अपने पति को शुभकामनाएं देना चाहती हैं, तो इसके लिए आप अन्य वैदिक उपायों का पालन कर सकती हैं, जैसे कि व्रत, पूजा, या अन्य धार्मिक अनुष्ठान. इन उपायों से न केवल आपके पति का कल्याण होता है, बल्कि यह आपके रिश्ते को भी मजबूत बनाता है.
समाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण
धार्मिक और समाजिक दृष्टिकोण से यह महत्वपूर्ण है कि हम परंपराओं का सम्मान करें और किसी भी कार्य को बिना सोचे-समझे न करें. यदि कोई परंपरा शास्त्रों में निर्दिष्ट नहीं है और वह समाजिक मर्यादाओं से टकराती है, तो हमें उसे अपनाने में सतर्क रहना चाहिए. हमारे त्योहारों का गहरा आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व है, जिसे हमें समझकर, सम्मानपूर्वक पालन करना चाहिए.
रक्षाबंधन कब है 2025 में?
इस साल रक्षाबंधन का पर्व 9 अगस्त 2025, शनिवार को मनाया जाएगा. रक्षासूत्र बांधने का सबसे शुभ समय अभिजीत मुहूर्त में दोपहर 12 बजे से 12 बजकर 53 मिनट तक रहेगा.
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