धर्म एवं ज्योतिष
काशी के इस मंदिर हर साल तिल के बराबर बढ़ता है शिवलिंग, सावन में दर्शन मात्र से अश्वमेध यज्ञ का पुण्य
21 Jul, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सावन का पावन माह चल रहा है. ऐसे में शिवनगरी काशी, जहां की हर गली में शिव की महिमा गूंजती है, वहां कई मंदिर हैं, जो ना केवल चमत्कार की कहानी कहते हैं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच के रिश्ते को भी दिखाते हैं. ऐसा ही एक मंदिर है, तिलभांडेश्वर महादेव का, जो एक अनूठा चमत्कार समेटे हुए है. इस मंदिर का स्वयंभू शिवलिंग हर साल मकर संक्रांति पर तिल के बराबर बढ़ता है, जिसका उल्लेख शिव पुराण के काशी खंड में मिलता है. सावन मास में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है और मनोकामना पूर्ति के लिए पूजा अर्चना करते हैं.
ऋषि विभांड की थी तप स्थली
मान्यता है कि काशी के तिलभांडेश्वर मंदिर के दर्शन करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है, जो भक्तों की आस्था को और गहरा करता है. काशी विश्वनाथ मंदिर से महज 500 मीटर दूर, पांडे हवेली में स्थित यह मंदिर ऋषि विभांड की तपस्थली पर बना है. यह क्षेत्र ऋषि विभांड की तप स्थली थी और यहीं पर वह ध्यान लगाकर पूजा करते थे. उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें वरदान दिया था कि यह शिवलिंग (तिलभांडेश्वर) हर साल तिल के बराबर बढ़ता रहेगा. तिल के बराबर बढ़ते रहने से और ऋषि विभांड के नाम पर इस मंदिर को तिलभांडेश्वर नाम मिला है.
मंदिर को लेकर मान्यता
धर्म शास्त्र में इस मंदिर के बारे में कथा उल्लेखित है, जिसके अनुसार भगवान शिव ने ऋषि को वरदान दिया था कि उनका शिवलिंग कलयुग में हर साल तिल जितना बढ़ेगा. तिलभांडेश्वर मंदिर में भक्त कालसर्प दोष की शांति के लिए भी पूजा करते हैं. मंदिर में भोलेनाथ के अलावा कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं. मान्यताओं के अनुसार, सावन मास के दौरान इस मंदिर के दर्शन करने से भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता और व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है.
दर्शन मात्र से मिटते हैं पाप
काशीवासियों के साथ ही देश-दुनिया से लोग बाबा के दर्शन को यहां पहुंचते हैं. काशी की रहने वाली श्रद्धालु रीता त्रिपाठी ने बताया कि हम लोग काफी समय से मंदिर आते रहे हैं. तिलभांडेश्वर हर साल तिल के बराबर बढ़ता है. सावन में पूरे माह में बाबा के दर्शन करने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं. बाबा स्वयंभू हैं और इनके दर्शन करने से पाप मिट जाते हैं और अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है. माना जाता है कि तिलभांडेश्वर मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में हुआ था.
ग्रह-नक्षत्र के कष्टों से मिलती है मुक्ति
उत्तर प्रदेश, पर्यटन विभाग के अनुसार, काशी नगरी में हर शिवलिंग का अपना अलग महात्म्य है. यहां अति प्राचीन तिलभांडेश्वर महादेव का पौराणिक इतिहास भी है. यह मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर से लगभग 500 मीटर दूर, पांडेय हवेली के पास स्थित है. मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव का शिवलिंग विराजमान है. यहां सावन के साथ ही महाशिवरात्रि और प्रदोष पर भी भक्तों की भीड़ लगती है. सावन, महाशिवरात्रि और प्रदोष व्रत पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. भक्त तिल, जौ और जल चढ़ाकर कालसर्प दोष, ग्रह-नक्षत्रों के कष्टों से मुक्ति पाते हैं. मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी मंत्रमुग्ध करती हैं.
सावन में क्यों नहीं खानी चाहिए कढ़ी और साग? आयुर्वेदिक वजहें जानकर यकीनन आप भी सोच में पड़ जाएंगे
21 Jul, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सावन का महीना आते ही चारों तरफ हरियाली छा जाती है, बारिश का सुहावना मौसम दिल को सुकून देता है और धार्मिक माहौल हर जगह महसूस होता है. इस पवित्र महीने में लोग व्रत रखते हैं, शिव पूजा करते हैं और खानपान में भी खास सावधानी बरतते हैं. आमतौर पर लोग नॉनवेज से दूरी बना लेते हैं, तले-भुने खाने से परहेज करते हैं और सात्विक भोजन को प्राथमिकता देते हैं. लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि इस महीने में कढ़ी और साग जैसे स्वादिष्ट और देसी खाने को भी मना किया जाता है? यह जानकर हैरानी जरूर होती है, क्योंकि कढ़ी-चावल और साग-रोटी तो हर घर में पसंद किए जाते हैं. फिर आखिर क्यों आयुर्वेद इन्हें सावन में खाने से मना करता है? क्या इसके पीछे कोई धार्मिक वजह है या सेहत से जुड़ा बड़ा कारण? आइए जानते हैं कि ऐसा क्यों कहा जाता है और सावन में किन चीजों का सेवन करना चाहिए ताकि सेहत भी बनी रहे और मौसम का लुत्फ भी उठाया जा सके.
बरसात में डाइजेशन रहता है कमजोर
आयुर्वेद के अनुसार, सावन यानी मॉनसून का मौसम हमारे पाचन तंत्र के लिए थोड़ा चुनौतीपूर्ण होता है. इस दौरान वातावरण में बहुत ज्यादा नमी होती है, जिससे शरीर की अग्नि यानी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है. जब पाचन कमजोर होता है, तब भारी, खट्टे या ठंडे पदार्थों को पचाना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में कुछ खास चीजें खाने से पेट में गैस, अपच, एसिडिटी या ब्लोटिंग जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.
कढ़ी क्यों नहीं खानी चाहिए?
कढ़ी बेसन और छाछ से बनती है और दोनों ही चीजें सावन के मौसम में पेट पर भारी पड़ती हैं. इस मौसम में गायें गीली घास खाती हैं, जिससे दूध और उससे बनी छाछ की तासीर बदल जाती है. ऐसी छाछ ठंडी और भारी मानी जाती है, जिसे पचाना आसान नहीं होता. ऊपर से बेसन खुद में भारी होता है और छाछ के साथ मिलकर ये मिक्स पाचन पर असर डालता है. इससे गैस, अपच और एसिडिटी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं.
साग से भी हो सकता है नुकसान
सावन के महीने में पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, बथुआ, सरसों या मेथी भी कम से कम खानी चाहिए. दरअसल, ये सब्जियां ठंडी तासीर की होती हैं और इस मौसम में आसानी से पचती नहीं हैं. साथ ही, बारिश के कारण मिट्टी में बैक्टीरिया, फंगस और कीड़े ज्यादा हो जाते हैं, जो साग की पत्तियों में छिपे रह सकते हैं. अच्छे से धोने और पकाने के बावजूद इनमें कीटाणु रह सकते हैं, जो फूड पॉइजनिंग या पेट से जुड़ी बीमारियां दे सकते हैं.
क्या खाएं सावन में?
इस मौसम में हल्का और सुपाच्य खाना ही सबसे सही रहता है. जैसे- खिचड़ी, मूंग दाल, लौकी, तुरई, सहजन, आलू, परवल जैसी सब्जियां. इन सब्जियों की तासीर गर्म होती है और ये पेट पर ज्यादा भार नहीं डालतीं. इसके अलावा दूध, छाछ की जगह गुनगुना दूध या हल्दी वाला दूध पीना फायदेमंद होता है. मौसमी फल जैसे सेब, केला, नाशपाती, और पपीता खाना अच्छा रहता है. ड्राई फ्रूट्स और बीज जैसे अखरोट, चिया सीड्स और अलसी भी इम्युनिटी बढ़ाते हैं.
इन बातों का रखें खास ध्यान
तली-भुनी चीजें जितना हो सके कम खाएं. बाहर का खाना और खुले में रखे फूड्स से परहेज करें. पीने के पानी को उबालकर या फिल्टर करके ही इस्तेमाल करें. हल्का व्यायाम और प्राणायाम करें जिससे पाचन अच्छा रहे. ज्यादा खट्टी, ठंडी और भारी चीजों से दूरी बनाएं.
सावन का महीना सिर्फ पूजा-पाठ का नहीं, बल्कि शरीर को डिटॉक्स करने का भी समय होता है. ऐसे में सही खानपान सेहत को बनाए रखने में मदद करता है. कढ़ी और साग जैसी चीजें स्वाद में तो लाजवाब हैं, लेकिन सावन के मौसम में इन्हें खाने से परहेज करके आप अपनी सेहत को बेहतर बना सकते हैं. आयुर्वेद के अनुसार खानपान में थोड़े बदलाव से आप बिना दवा के कई बीमारियों से बचे रह सकते हैं.
घर में है वास्तु दोष या जीवन में है नकारात्मक प्रभाव, तो सावन माह की शिवरात्रि के दिन करें ये उपाय, दूर होंगे संकट
21 Jul, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित रहता है. शास्त्र के अनुसार इस महीने में भगवान शिव की उपासना करने से जातक के जीवन में सुख समृद्धि की वृद्धि होती है इसके साथ ही सभी प्रकार के रोग, दोष, कष्ट, दुख, काल सब समाप्त हो जाते हैं. अगर आपके घर में वास्तु दोष है या फिर लगातार जीवन में नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है तो सावन के महीने में भगवान शिव के शिवलिंग से जुड़े कुछ उपाय अपना कर इन सभी समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं. आखिर क्या कुछ खास उपाय करना चाहिए?
इस साल 11 जुलाई से सावन महीने की शुरुआत हो चुकी है और 9 अगस्त तक चलने वाला है. पूरा सावन महीना भगवान शिव के नाम से जाना जाता है. इस महीने में शिवरात्रि तिथि भी आती है जो अत्यंत ही महत्वपूर्ण होता है. इस साल सावन शिवरात्रि 23 जुलाई को है. धार्मिक पुराण के अनुसार शिवरात्रि के दिन ही माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह संपन्न हुआ था. शिवरात्रि के दिन भगवान शिव के शिवलिंग की विधि विधान के साथ पूजा आराधना की जाए तो हर समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है.
वास्तु दोष से छुटकारा पाने के लिए करें ये वास्तु उपाय
कि अगर आप अब वास्तु दोष से परेशान है या फिर आपके जीवन में लगातार नकारात्मक प्रभाव बढ़ रहा है. कई तरह के समस्याओं से परेशान है तो सावन माह की शिवरात्रि के दिन घर में पार्थिव शिवलिंग बनाकर शोडशोपचार विधि से पूजा करे और दो लॉन्ग का जोड़ा और कपूर अर्पण कर घी का दीपक एक शिवलिंग के पास और एक घर के मुख्य द्वार के पास अवश्य जलाए. इससे घर में जो भी वास्तु दोष है वह समाप्त हो जाएगा और जीवन में जो भी समस्याएं हैं उससे भी छुटकारा मिल जाएगा.
सावन में भूलकर भी न करें इन चीजों का सेवन! वरना... बुरा होगा अंजाम
21 Jul, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सावन का पवित्र महीना चल रहा है और इस महीने में भोलेनाथ की आराधना का विशेष महत्व है. धार्मिक मान्यता है कि सावन के महीने में भगवान शिव अपने परिवार के साथ धरती पर भ्रमण करते हैं. सावन के प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव और माता पार्वती के निमित्त व्रत रखा जाता है. इस महीने में कुछ चीजें खाने की मनाही भी होती है. खासकर तामसिक भोजन को नहीं खाना चाहिए. अगर आप तामसिक भोजन का सेवन करते हैं तो इससे भगवान शिव और माता पार्वती नाराज हो सकते हैं. तो चलिए इस रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं कि सावन के महीने में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं.
सत्येंद्र दास वेदांती बताते हैं कि सावन का महीना बेहद पवित्र माना जाता है. इस महीने में भोलेनाथ की आराधना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इस महीने हर सोमवार का व्रत भी रखा जाता है. इस पूरे महीने सात्विक भोजन को ग्रहण करना चाहिए और तामसिक भोजन से परहेज करना चाहिए. अगर आप इस महीने केवल सात्विक भोजन का सेवन करते हैं तो ऐसा करने से भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं.
इन बातों का रखें ध्यान
सत्येंद्र दास वेदांती बताते हैं कि सावन के महीने में अगर आप सोमवार का व्रत कर रहे हैं तो आपको फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, कटु का आटा, सिंघाड़े का आटा जैसी चीजें खाना चाहिए. इन चीजों का सेवन करने से शरीर को ऊर्जा मिलती है और मन भी शुद्ध रहता है. सावन के महीने में अगर आप प्याज और लहसुन का सेवन कर रहे हैं तो ऐसा बिल्कुल ना करें. यह तामसिक भोजन में माना जाता है और व्रत के दौरान इन्हें बिल्कुल नहीं खाना चाहिए. इसके अलावा सावन के महीने में मांसाहारी भोजन से परहेज करना चाहिए. पूरे महीने मांसाहारी भोजन को दूर रखना चाहिए और केवल सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 21 जुलाई 2025)
21 Jul, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- धन का व्यय होगा, तनावपूर्ण वातावरण से बचिये, कार्य पर ध्यान अवश्य दें।
वृष राशि :- अधिकारियों के समर्थन से सफलता मिलेगी, कार्य कुशलता से संतोष होगा, कार्य करें।
मिथुन राशि :- चिन्तायें कम होंगी, सफलता के साधन जुटायें तथा शुभ समय की प्राप्ति होगी।
कर्क राशि :- बड़े-बड़े लोगों से मेल-मिलाप होगा तथा भोग-ऐश्वर्य की प्राप्ति अवश्य होगी।
सिंह राशि :- स्त्री वर्ग से हर्ष-उल्लास होगा तथा भोग-ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी, समय का लाभ लें।
कन्या राशि :- प्रतिष्ठा बाल-बाल बचे, संघर्ष से सफलता मिलेगी, अधिकारियों से वाद-विवाद हो सकता है।
तुला राशि :- कुटुम्ब और धन की चिन्ता बनी रहेगी, परिश्रम के साथ कार्य अवश्य बना लें।
वृश्चिक राशि :- प्रत्येक कार्य में बाधा क्लेशयुक्त रखेगी, स्थिति सामर्थ्य योग्य बनेगी, धैर्य से कार्य करें।
धनु राशि :- भावनायें विक्षुब्ध रहेंगी, दैनिक कार्यगति मंद रहेगी, परिश्रम से कार्य अवश्य बना लें।
मकर राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति, धन का व्यय होगा, मानसिक अशांति अवश्य बनेगी।
कुंभ राशि :- कार्य कुशलता से संतोष होगा, व्यवसायिक समृद्धि के कार्य अवश्य होंगे, ध्यान दें।
मीन राशि :- कुटुम्ब के कार्य में समय बीतेगा, हर्षप्रद समाचार अवश्य ही मिलेगा।
काशी विश्वनाथ की परछाई है छतरपुर का ये शिव मंदिर, महाभारत काल से जुड़ा है इतिहास
20 Jul, 2025 12:40 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
छतरपुर: सावन का पावन महीना चल रहा है. देशभर के सभी शिवालयों में हर-हर महादेव की गूंज है. मंदिरों में बेलपत्र चढ़ाए जा रहे हैं, गंगाजल से अभिषेक हो रहा है. भक्ति के इस रंग में हर कोना शिवमय हो गया है, लेकिन छतरपुर में भगवान भोलेनाथ का एक ऐसा मंदिर है, जहां न तो कोई भक्त पहुंच रहा है और न ही इस पौराणिक और रहस्यमई मंदिर का कहीं कोई जिक्र है. आज हम आपको काशी विश्वनाथ की तर्ज पर बने इस भव्य और दिव्य मंदिर से परिचित कराएंगे और आपको इस मंदिर की महत्ता से भी अवगत कराएंगे.
महाभारत काल से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
छतरपुर शहर से 15 किलोमीटर दूर मऊ सहनिया में स्थित इस मंदिर को 'भीमकुंड मंदिर समूह' के नाम से जाना जाता है. पुरातत्व विभाग के अनुसार इस मंदिर की स्थापना 9वीं-10वीं शताब्दी में हुई थी. इस प्राचीन मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है. स्थानीय निवासी और इतिहास के जानकार अप्पू राजा सोनी बताते हैं कि "अज्ञातवास के दौरान जब पांडव यहां से गुजर रहे थे, तो उन्हें बहुत जोर से प्यास लगी थी. प्यास से व्याकुल पांडवों ने आसपास नजर दौड़ाई, लेकिन उन्हें कहीं पानी नजर नहीं आया.
इसके बाद महाबलशाली भीम ने अपने गदे से एक चट्टान पर प्रहार किया और वहीं से एक जलधारा फूट पड़ी. आज उस जलधारा को 'भीमकुंड' के नाम से जाना जाता है और इस पहाड़ को 'फटा पहाड़' कहा जाने लगा. यहां का जल आज भी शुद्ध, निर्मल और अविरल बहता है". अप्पू राजा सोनी कहते हैं कि "यह जल शिव की कृपा और भीम के पराक्रम का प्रतीक है, जो रोगों से मुक्ति और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करता है."
बिना गारे के इस्तेमाल से बनाया गया है मंदिर
यहां 4 प्राचीन मंदिरों के साथ एक भव्य शिव मंदिर विद्यमान है, जो काशी विश्वनाथ की तर्ज पर बना है. इसकी अद्भुत कलाकृति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह विशाल और भव्य मंदिर बिना किसी गारे (सीमेंट) के एक पत्थर को दूसरे पत्थर से जोड़कर बनाया गया है. मंदिर के चारों ओर माता रानी, नीलकंठ, श्री राम और हनुमान के प्राचीन मंदिर भी हैं. चट्टानों पर उकेरे गए शिल्प इसे आध्यात्मिक ही नहीं, सांस्कृतिक धरोहर भी बनाते हैं.
छिपी हुई काशी मानते हैं लोग
भीमकुंड समूह मंदिर चारों तरफ पहाड़ियों से घिरा हुआ है. इस शिव धाम को प्राकृतिक सुंदरता मन मोह लेती है. हालांकि पहाड़ों से घिरे होने की वजह से इस रमणीय और मनोरम स्थल तक लोगों की पहुंच उतनी नहीं है, जितनी बाकी के दैवीय स्थलों तक है. कुछ लोग इसको छिपी हुई काशी भी कहते हैं. यहां भीड़-भाड़ नहीं रहती, तो भगवान की भक्ति और आराधना करने वालों के लिए ये शानदार स्थल है.
मंदिर को संरक्षित करने की मांग
छतरपुर के रिटायर्ड प्रोफेसर और इतिहासकार सीएम शुक्ला बताते हैं कि "ये मंदिर 9वीं-10वीं सदी के पहले के मंदिर हैं. चंदेल शासन के पहले प्रतिहारों का शासन था. ये मंदिर उस समय के हैं. यह इलाका महाराजा छत्रशाल की कर्मभूमि भी रहा है. लोग इसको महाभारत काल से भी जोड़कर देखते हैं.
यहां पर एक काशी विश्वनाथ मंदिर जैसी बनावट का शिव मंदिर बना हुआ है. इसके अलावा और 4 छोटे-छोटे मंदिर हैं, जो पत्थरों के बने हैं. एक कुंड जो अति प्राचीन हैं." सरपंच प्रतिनिधी अप्पू राजा सोनी का कहना है कि इस प्राचीन स्थल को संरक्षित करने की जरूरत है, नहीं तो ये अपना अस्तित्व जल्द ही खो देगा.
राशि अनुसार पहनें कछुए की अंगूठी! किस उंगली और किस दिन में पहनें?
20 Jul, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आजकल हम में से कई लोग सौभाग्य और आर्थिक समृद्धि के लिए अपने हाथों में कछुए की अंगूठी पहनते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कभी-कभी इस कछुए की अंगूठी को पहनने वाले व्यक्ति पर इसका उल्टा असर भी हो सकता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कछुए की अंगूठी पहनने के कुछ खास नियम होते हैं और इन्हीं नियमों का ध्यान में रखते हुए अंगूठी पहनी जाए तो इसका जबरदस्त फायदा मिलता है. हममें से कई लोग सड़क किनारे या छोटी-मोटी दुकानों से कछुए वाली अंगूठियां खरीदकर पहन लेते हैं. जानकारी कम होने की वजह से कई बार लोग यह नहीं देख पाते कि वह अंगूठी किस धातु की बनी है या फिर किस दिन पहन रहे हैं. आइए जानते हैं कछुए की अंगूठी धारण करते समय किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए…
कछुए की अंगूठी पहनने के लाभ
ज्योतिष शास्त्र में कछुआ को बहुत ही भाग्यशाली माना गया है और यह जीवन में सुख, समृद्धि, धन और सौभाग्य लाता है. ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि कछुए की अंगूठी का संबंध देवी लक्ष्मी से है और सही समय देखकर इस अंगूठी को धारण किया जाए तो हमेशा माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है. कछुए की अंगूठी वास्तु और ज्योतिष दोनों में शुभ मानी जाती है, लेकिन इसे पहनने की विधि और नियम ध्यानपूर्वक पालन करना अत्यंत आवश्यक है.
कछुए की अंगूठी पहनने वाले को जीवन में हर तरह की खुशियां मिलेंगी और आर्थिक तंगी भी दूर होगी. कछुए को शांति और सहनशीलता का प्रतीक माना जाता है इसलिए इस अंगूठी को पहनने वाले में धैर्य की भावना अधिक होगी और जीवन में शांति बनी रहेगी. इस अंगूठी के धारण करने से धन से संबंधित समस्या दूर होंगी और नौकरी व बिजनस में सफलता भी मिलती है.
कछुए की अंगूठी का मुख इस तरफ रखें
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कछुए की अंगूठी पहनते समय ध्यान रखें कि कछुए का मुख हमेशा आपकी ओर हो. तभी धन आपकी ओर आकर्षित होगा और जीवन में सुख-समृद्धि आएगी. अगर मुख बाहर की ओर होगा, तो धन पानी की तरह बहेगा. शास्त्रों में केवल चांदी की कछुए की अंगूठी को मान्यता दी गई है, क्योंकि यह चंद्रमा, बुध और लक्ष्मी का प्रतिनिधित्व करती है.
उतारने के बाद फिर से इस तरह धारण करें
कछुए वाली अंगूठी को उतारने के बाद दोबारा पहनने के भी कुछ नियम हैं. इस अंगूठी को कहीं भी नहीं रखा जा सकता. उतारने के बाद अंगूठ को मंदिर में देवी लक्ष्मी के चरणों में रखना होता है. इसके बाद अगले दिन स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें. फिर अंगूठी को दूध से भरे बर्तन में रखें और फिर देवी लक्ष्मी के चरणों में रखकर दोबारा पहन लें. पहनने के बाद ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः मंत्र का 108 बार जप करें.
कछुए की अंगूठी इस दिन पहनें
कछुए की अंगूठी केवल राइट हेंड साइन की मिडिल फिंगर में ही पहनी जा सकती है. अंगूठी को केवल शुक्रवार के दिन शुभ मुहूर्त में पहनना शुभ माना जाता है क्योंकि शुक्रवार का दिन धन की देवी माता लक्ष्मी और भौतिक सुख सुविधा के स्वामी शुक्र ग्रह को समर्पित है. शुक्रवार के दिन शुभ मुहूर्त में धारण करने से धन संपदा में बढ़ोतरी होती है और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद भी बना रहता है.
इन राशि वाले सलाह लेकर पहनें
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मेष, कर्क, वृश्चिक और मीन राशि वालों को बिना ज्योतिषी की सलाह के कछुए की अंगूठी नहीं पहननी चाहिए. अगर इन राशियों के लोग कछुए की अंगूठी पहनते हैं, तो वे ग्रह दोषों के शिकार हो सकते हैं और उन्हें नुकसान होने लगता है. सिंह और तुला राशि के लोगों को अपनी कुंडली बनवाने के बाद ही कछुए की अंगूठी पहननी चाहिए.
इस तरह करें धारण
बाजार से खरीदी हुई कछुए वाली अंगूठी को बिना शुद्ध किए पहन लेना अशुभ होता है. पहनने से पहले अंगूठी को गंगाजल, दूध, शुद्ध जल, शहद, घी आदि से पंचामृत से पवित्र करें. फिर उसे धूप-दीप दिखाकर लक्ष्मी मंत्र या कछुए के बीज मंत्र से अभिमंत्रित करें.
रामा और श्यामा तुलसी में क्या फर्क है? जानिए कौन सी तुलसी घर में लगाना माना जाता है शुभ!
20 Jul, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारतीय संस्कृति में तुलसी को सिर्फ पौधा नहीं, बल्कि आस्था और अध्यात्म का प्रतीक माना जाता है. इसे मां लक्ष्मी का रूप कहा गया है और भगवान विष्णु की प्रिय माना जाता है. हर घर में तुलसी का पौधा लगाने की परंपरा है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि तुलसी के दो रूप होते हैं – रामा तुलसी और श्यामा तुलसी (Rama Tulsi and Shyama Tulsi). दोनों का रंग, प्रकृति और धार्मिक महत्व अलग होता है, मगर इनकी भूमिका श्रद्धा में बराबर की है.
रामा तुलसी का महत्व
रामा तुलसी को अधिकतर घरों में लगाया जाता है. इसका रंग हरा होता है और इसे भगवान श्रीराम से जोड़ा जाता है. यह तुलसी शांति, संयम और विनम्रता का प्रतीक मानी जाती है. उनके अनुसार, इसे घर में लगाने से सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और मानसिक शांति मिलती है. पूजा-पाठ में इसके पत्तों का प्रयोग आरती, प्रसाद और जल अर्पण में किया जाता है. आयुर्वेद के अनुसार यह तुलसी सर्दी-खांसी, बुखार और पाचन से जुड़ी परेशानियों में भी लाभकारी होती है.
श्यामा तुलसी का महत्व
पुजारी शुभम तिवारी बताते हैं कि श्यामा तुलसी को कृष्णा तुलसी या काली तुलसी भी कहा जाता है. इसका रंग गहरा बैंगनी या जामुनी होता है और इसे भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह तुलसी उग्र स्वरूप की मानी जाती है और नकारात्मकता को दूर करती है. इसकी पूजा से आत्मबल बढ़ता है और भक्ति-भावना मजबूत होती है. विशेष रूप से श्रीकृष्ण और विष्णु भगवान को इसे अर्पित किया जाता है. यह तुलसी भी औषधीय गुणों से भरपूर होती है और कई रोगों में लाभ देती है.
घर में कौन सी तुलसी लगानी चाहिए?
मान्यताओं के अनुसार, घर में रामा तुलसी का पौधा लगाना सबसे शुभ माना गया है. इस पौधे को घर में लगाने से सुख-शांति बनी रहती है. वहीं, श्यामा तुलसी ज्यादातर जंगलों में पाई जाती हैं. जो औषधीय गुणों से भरपूर होती है और कई रोगों में लाभ देती है.
तुलसी का पौधा घर में क्यों लगाएं?
रामा और श्यामा दोनों ही तुलसी के पौधे सिर्फ पूजा के लिए नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और वातावरण के लिए भी फायदेमंद होते हैं. ये न केवल हवा को शुद्ध करते हैं, बल्कि तनाव और नकारात्मक सोच को भी कम करते हैं. यही कारण है कि घर में तुलसी का होना शुभ और जरूरी माना गया है.
सोमवार के दिन इस तरह करें शिवजी की पूजा, जानें महत्व, पूजन समय और शिव पूजा में क्या न करें?
20 Jul, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में सोमवार का दिन विशेष रूप से भगवान शिव को समर्पित माना गया है. इस दिन शिव भक्त व्रत रखते हैं, मंदिरों में जाकर जलाभिषेक करते हैं और भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए विविध पूजन विधियां अपनाते हैं. माना जाता है कि सोमवार को सच्चे मन से शिव पूजा करने से मनचाहा वरदान मिलता है, विशेष रूप से विवाह, संतान और आर्थिक सुख से जुड़ी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. साथ ही भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है. आइए जानते हैं सुख-समृद्धि के लिए सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा कैसे करें…
सोमवार को शिव पूजा क्यों है खास?
सोमवार को शिव का प्रिय दिन माना गया है. यही दिन सोम यानी चंद्रमा से भी जुड़ा है, जिसे शिव ने अपने सिर पर धारण किया है. यह दिन शांत चित्त, संयम और आध्यात्मिक ऊर्जा के विकास के लिए उत्तम होता है. सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा करने से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है. कर्ज और आर्थिक संकट से मुक्ति मिलती है. मन और मस्तिष्क शांत रहता है, चिंता और क्रोध पर नियंत्रण आता है. सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा करने से संतान सुख, नौकरी व विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं.
सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा कैसे करें?
प्रातःकाल उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें, सफेद या पीले वस्त्र शुभ माने जाते हैं. इसके बाद पास के शिवालय में जाकर शिवलिंग को गंगाजल से शुद्ध करें. फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें. उसके बाद स्वच्छ जल से स्नान कराएं. बेलपत्र, धतूरा, आक, भांग, सफेद फूल, चावल और भस्म चढ़ाएं. पंचमेवा, फल, मिठाई अर्पण करें. इसके बाद दीपक में घी या तिल का तेल रखें. रुद्राक्ष की माला से ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप कम से कम 108 बार करें. शिव चालीसा या रुद्राष्टक का पाठ करें और शिवजी की आरती करें. शिवजी को मिश्री या गुड़ का भोग लगाएं. इसी विधि के साथ प्रदोष काल में भी भगवान शिव की पूजा करें.
शिव पूजा क समय
भगवान शिव की पूजा के लिए सुबह 4 बजे से लेकर 7 बजे तक का मुहूर्त उत्तम रहता है. इसके बाद प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन करें. भगवान शिव की पूजा करने का सबसे उत्तम समय प्रदोष काल माना जाता है. प्रदोष काल का समय सूर्यास्त से पहले के 1.5 घंटे और बाद के 1.5 घंटे का योग होता है, आमतौर पर शाम 5:30 से 7:30 तक.
शिव मंत्र जाप करें
ॐ नमः शिवाय
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
सोमवार के दिन शिव पूजा में क्या न करें?
– हल्दी, तुलसी पत्र शिवलिंग पर अर्पित ना करें.
– केतकी का फूल और नारियल पानी शिवलिंग पर अर्पित ना करें.
– शिवजी के साथ शिव परिवार की भी आराधना करें, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश.
– कभी भी बासी फूल या दूषित जल शिव अभिषेक में प्रयोग न करें.
– अति शोरगुल और मन में अशांति लेकर पूजा न करें.
शनि की साढ़े साती और ढैय्या से तुरंत मिलेगी मुक्ति, बस घर में लगा दें यह पौधा, शनिदेव और भगवान शिव की होगी कृपा
20 Jul, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पूर्णिया. आपका काम भी बनते-बनते बिगड़ जाता है या करते कुछ हैं और होता कुछ और है. शारीरिक मानसिक सहित अन्य कई समस्याओं से ग्रस्त रहते हैं तो हो सकता है आप पर शनि का प्रभाव हो या ढैय्या या साढ़ेसाती का भी हो सकता है. ऐसे में आप सावन के इस पावन मास में इस पौधे को लगाकर शंकर भगवान और शनिदेव की कृपा पा सकते हैं.
सावन के इस पवित्र महीने में यह एक पौधा लगाने से शनि का प्रभाव दूर होता है और साढ़ेसाती से मुक्ति भी मिलती है. वहीं, हिंदू कैलेंडर का पांचवा महीना सावन चल रहा है जो भोलेनाथ को समर्पित है, सावन मास को बेहद ही पवित्र और पूजनीय माना जाता है. 12 महीना में सावन सबसे पवित्र महीना माना जाता है. वहीं यह महीना महादेव की विशेष कृपा पाने के लिए सबसे उत्तम माना जाता है. यह सावन मास से भक्तों के लिए बेहद खास होता है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन के पावन महीने में शमी का पौधा लगाने से लोगों को लाभ मिलता है. कि यह शमी का पौधा शनिदेव और भगवान शिव शंकर दोनों को ही बहुत प्रिय है. इसलिए शमी के पत्ते और फूल महादेव को अर्पित किये जाते हैं. हर शनिवार के दिन लोग शनिदेव की विशेष कृपा पाने के लिए शमी पौधा का पूजन भी करते हैं. जबकि शास्त्रों मुताबिक सावन मास में शमी का पौधा लगाने से कई लाभ मिल सकते हैं.
शमी पौधा लगाते समय रखें ध्यान
उन्होंने कहा कि शास्त्र के अनुसार शमी के पौधे को कभी भी घर के अंदर नहीं लगाना चाहिए. इस पौधे को लगाने की सबसे उत्तम जगह छत या बालकनी होती है. इस पौधे को लगाने के लिए दक्षिण दिशा शुभ माना जाती है. इस दिशा में शमी का पौधा लगाने से लोगों को सुख शांति सुख समृद्धि की हमेशा प्राप्ति होती है.
दीपक जलाने से ढैय्या से मिलेगी मुक्ति
शास्त्रों के अनुसार शमी के पौधे की रोज पूजा करने व तिल तेल का दीपक जलाने से लोगों के ऊपर लगे शनि की ढैय्या और साढ़ेसाती का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता है. साथ ही साथ उस व्यक्ति पर महादेव और शनिदेव दोनों की कृपा हमेशा बनी रहती है. यह शमी का पौधा शास्त्रों के अनुसार सावन के पावन महीने में किसी भी सोमवार के दिन आप इसे लगा सकते है. जिससे आपका दिन दोगुना रात चौगुना होता रहेगा.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 20 जुलाई 2025)
20 Jul, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- मानसिक बेचैनी, दुर्घटनाग्रस्त होने से बचें, अधिकारियों से तनाव बनेगा।
वृष राशि :- योजनायें फलीभूत होंगी, सफलता के साधन जुटायेंगे तथा विशेष लाभ अवश्य होगा।
मिथुन राशि :- अचानक हुआ झगड़ा कष्टप्रद होगा, विशेष कार्य स्थगित रखें, कार्य की अधिकता रहेगी।
कर्क राशि :- परिश्रम से कुछ सफलता मिले, कार्य-व्यवसाय की विशेष चिन्ता बनेगी।
सिंह राशि :- किसी अपवाद व दुर्घटना से बचें, व्यवसायिक क्षमता में बाधा बनेगी।
कन्या राशि :- व्यवसायिक गति उत्तम होगी, चिन्ता कम होगी, अवरोध के बाद कार्य बनेंगे।
तुला राशि :- मानसिक बेचैनी, उद्विघ्नता के योग बनेंगे तथा कुटुम्ब में क्लेश होगा।
वृश्चिक राशि :- साम्थर्य वृद्धि के बाद तनाव, झगड़ा व झंझट की स्थिति बनेगी, धैर्य से कार्य करें।
धनु राशि :- कुटुम्ब की समस्यायें कष्टप्रद होंगी, तनाव तथा धन का व्यर्थ व्यय होगा।
मकर राशि :- योजनायें फलीभूत होंगी, सफलता के साधन अवश्य ही जुटायें, कार्य बनेंगे।
कुंभ राशि :- स्वाभव में खिन्नता, मानसिक बेचैनी तथा अनेक कार्य बिगड़ जायेंगे ध्यान दें।
मीन राशि :- तनाव, क्लेश तथा अशांति का वातावरण बनेगा, परिश्रम विफल होगा, कार्यगति मंद होगी।
सावन में धारण करें इतने मुखी रुद्राक्ष, शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या का प्रकोप होगा खत्म
19 Jul, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि को सबसे क्रूर ग्रहों में से एक माना जाता है. जब शनि अपनी राशि बदलता है, तो कुछ राशियों पर शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव अवश्य पड़ता है. मान्यता है कि जैसे ही किसी राशि पर शनि का यह प्रभाव शुरू होता है, व्यक्ति के बुरे दिन शुरू हो जाते हैं और जीवन में कई तरह की समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं. हालांकि, इन प्रभावों से बचने के लिए सावन का महीना उत्तम माना जाता है, क्योंकि इस माह में एक खास उपाय अपनाकर शनि के अशुभ प्रभावों को कम किया जा सकता है.
अगर आपकी कुंडली में शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या का प्रभाव चल रहा है, तो सावन के महीने में 10 मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण कर लें.
शनि का प्रकोप होगा कम
रुद्राक्ष भगवान शिव का प्रतीक है. सावन के महीने में इसे धारण करने से न केवल शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से मुक्ति मिलती है, बल्कि यह बीमारी, दुख, और कष्टों से भी छुटकारा दिलाता है. साथ ही, घर की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होती है.
10 मुखी रुद्राक्ष का महत्व
मान्यता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से हुई है, इसलिए इसका महत्व बेहद खास है. वैसे तो एक से लेकर 21 मुखी तक रुद्राक्ष होते हैं, लेकिन आमतौर पर 14 मुखी तक के रुद्राक्ष धारण किए जाते हैं. सभी रुद्राक्षों का अपना अलग-अलग महत्व है.
10 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से सभी ग्रह नक्षत्रों के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है. यह घर से नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है, मानसिक शांति प्रदान करता है, और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है. इसके अतिरिक्त, यह आर्थिक स्थिति को भी मजबूत बनाता है.
रुद्राक्ष धारण करने की विधि
रुद्राक्ष धारण करने के लिए सावन का महीना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि यह महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है. आप सावन की किसी एकादशी, प्रदोष, सोमवार, शिवरात्रि, या शिवयोग के दिन शोडशोपचार विधि से रुद्राक्ष की पूजा-आराधना करने के बाद उसे धारण कर सकते हैं.
राजस्थान के इस मंदिर में अब नहीं चढ़ेंगे नारियल-मखाने, मंदिर समिति ने लगाई रोक
19 Jul, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
राजस्थान के नागौर जिले के बुटाटी गांव स्थित संत चतुरदास महाराज मंदिर में अब से नारियल, मखाना, मिठाई और नकली चांदी से बने मानव अंगों के प्रतीक को चढ़ाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. मंदिर विकास समिति ने यह फैसला मंदिर की पवित्रता बनाए रखने और श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए लिया है. मंदिर विकास समिति के अध्यक्ष देवेंद्र सिंह ने बताया कि श्रद्धालु जो नारियल लेकर आते हैं, वे कई बार अंदर से सड़े-गले या कीड़ों से भरे होते हैं.
उन्होंने बताया कि जब ऐसे नारियल हवन-कुंड में चढ़ाए जाते हैं तो यज्ञ-हवन की शुद्धता भंग होती है. इसलिए अब से मंदिर में सिर्फ नारियल गट (गोटा) ही चढ़ाने की अनुमति होगी. इसी तरह, बाजार में मिलने वाले केमिकल युक्त मखानों को भी प्रतिबंधित किया गया है. बताया गया कि यह मखाने स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, विशेषकर उन मरीजों के लिए जो पैरालिसिस जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रसित होकर बुटाटी धाम पर मन्नत मांगने आते हैं.
कौन हैं संत चतुरदास जी महाराज
राजस्थान के नागौर जिला मुख्यालय से 50 किमी बुटाटी गांव को चमत्कारी गांव कहा जाता है. इस गांव में संत चतुरदास महाराज का मंदिर मौजूद है, जिसे बुटाटी धाम के नाम से जाना जाता है. यहां पर लकवा ग्रस्त मरीजों का चमत्कारिक ढंग से इलाज होता है. बुटाटी धाम संत श्री चतुरदास महाराज के जप-तप व कारीगरों के कर्म कौशल के रूप में दुनियाभर भर में ख्याति पा चुका है. बुटाटी धाम आस्था का बड़ा केन्द्र बना हुआ है. देश ही नहीं बल्कि विदेशी लोग भी मानते हैं कि इस मंदिर में आने और पूजा-अर्चना करने से लकवा ग्रस्त मरीज पूरी तरीके से ठीक हो जाते हैं. यहीं, कारण है कि इस मंदिर में विदेशी लोगों को भी आसानी से देखा जा सकता है.
चतुरदास महाराज मंदिर से जुड़ी मान्यताएं
मान्यता है बाबा की तपोस्थली में सप्तदिवसीय परिक्रमा व धूणे की भभूत मात्र से लकवे जैसा असाध्य मर्ज दूर हो जाता है. गौरतलब है कि बाबा ने करीब 300 साल पहले बुटाटी गांव में संत चतुरदास महाराज ने पवित्र स्थल पर जीवित समाधि ली थी. धीरे-धीरे आस्था बढ़ने लगी और बाबा के प्रति लोगों की श्रद्धा भी बलवती होती गई. तब से आज तक लगातार इस चमत्कारी धूणे पर अनगिनत श्रद्धालु परिक्रमा करने के साथ मस्तक पर भभूत लगाकर असाध्य बीमारी से ठीक हुए हैं. मंदिर के पुजारियों के अनुसार, लकवा ग्रस्त मरीजों को यहां 7 दिन तक रखा जाता है. जिसके बाद मरीज लगभग ठीक हो जाते हैं.
शिव मंदिर से लौटते समय की भूलकर भी न करें ये गलती, वरना नाराज हो जाएंगे महादेव, घर में छा जाएगी गरीबी
19 Jul, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिन्दू धर्म में पूजा-पाठ का बहुत अधिक महत्व माना जाता है. पूजा करने से भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनकी भक्ति से मन व तन शुद्ध होता है. अभी श्रावण का पवित्र महीना चल रहा है. शास्त्रों के अनुसार, इस महीने भोलेनाथ अपने परिवार के साथ पृथ्वी पर विचरण करने आते हैं. इसी वजह से इस पूरे महीने भगवान शिव से जुड़ी तमाम धार्मिक यात्राएं होती हैं. लोग पूरे माह मंदिरों में शिवलिंग पर जल अर्पित कर महादेव का नाम स्मरण करते हैं. श्रावण मास में शिव मंदिरो मे भक्त भोलनाथ को प्रसन्न करने के कई उपाय करते है. लेकिन मंदिर से लौटते वक्त ऐसी गलतियां कर बैठते हैं कि मंदिर जाने के सारे फायदों पर पानी फिर जाता है. ये गलतियां जीवन में कई मुसीबतें लाती हैं. ना ही पूजा का फल मिलता है, ना भगवान की कृपा बरसती है. उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज के अनुसार गरुड़ पुराण, मनुस्मृति और विष्णु धर्मसूत्र जैसे ग्रंथों में बताया गया है कि मंदिर से घर लौटते वक्त किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.
भूलकर भी ना करें यह गलती
खाली लोटा – भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कई भक्त श्रावण मे रोज भगवान को जल अर्पित करते है. इसके लिए लोग घर से पूजा सामग्री, प्रसाद के साथ लोटा आदि भी ले जाते हैं. मंदिर से वापस लौटते समय कभी भी लोटा खाली नही लाना चाहिए. बल्कि उसमें थोड़ा सा जल जरूर लाएं या लोटे में फूल, अक्षत के दाने डालकर लाएं. इससे घर में सकारात्मकता और समृद्धि बढ़ती है. वरना खाली लोटा गरीबी और नकारात्मकता लाता है.
प्रसाद और फूल – मंदिर से लाए गए प्रसाद या फूल को आते ही सम्मान पूर्वक पवित्र स्थान पर रखना चाहिए. प्रसाद को सभी लोगों में बांटें और खुद भी खाएं. वहीं फूलों को जल में प्रवाहित कर दें या पौधे की जड़ में रख दें. फूल फेंकने या प्रसाद को अशुद्ध स्थान पर रखने की गलती ना करें.
पैर धोना – मंदिर से आकर तुरंत पैर नही धोना चाहिए. जब आप नंगे पैर मंदिर जाते हैं तो घर आकर अपने पैर धो देते हैं ताकि पैर में लगी मिट्टी धुल जाए. यही गलती अधिकतर लोग करते हैं. ऐसा नहीं करना चाहिए. मंदिर से जब आप घर आएं तो अपने पैर को किसी कपड़े से पोछ लीजिए ताकि मंदिर की मिट्टी घंटे या आधे घंटे तक आपके पैर में लगी रहे. मंदिर की वह पॉजिटिव एनर्जी आपके शरीर में कुछ समय तक रहनी चाहिए. यह आपके लिए बहुत अच्छा रहेगा.
घंटी – जब भी आप मंदिर से पूजा पाठ खत्म करके घर वापस लौटें तो मंदिर की घंटी को न बजाएं. बहुत सारे लोगों को देखा गया है कि वे मंदिर में प्रवेश के समय और वहां से लौटते समय घंटी बजाते हैं. यह एक बड़ी गलती है, जिसे करने से बचना चाहिए. यदि आप भी ऐसा करते हैं तो अगली बार जब मंदिर जाएं तो घर लौटते समय यह गलती न करें.
2 अगस्त को दिन में हो जाएगी रात, 6 मिनट तक गायब रहेगा सूरज, फिर 100 साल बाद दिखेगा ऐसा दुर्लभ नजारा
19 Jul, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अगर दिन में रात हो जाए और पूरी दुनिया अंधेरे में डूब जाए तो आपको कैसा लगेगा. वो भी पूरे 6 मिनट के लिए. 6 मिनट तक सूरज गायब हो जाए तो बेचैनी होना स्वभाविक है. ये काल्पनिक बातें नहीं है. 2 अगस्त 2027 को पूर्ण सूर्य ग्रहण लगेगा. पूर्ण सूर्यग्रहण की वजह से दिन में पूरा आसमान अंधेरे में डूब जाएगा. इस तरह का सूर्य ग्रहण अगले करीब 100 साल तक भी नहीं देखने को मिलेगा. दुनिया के अलग-अलग महाद्वीपों पर रहने वाले करोड़ों लोगों को यह नजारा देखने को मिलेगा. इस तरह का सूर्यग्रहण 2114 तक दोबारा देखने को नहीं मिलेगा.
माना जा रहा है कि यह सूर्य ग्रहण अटलांटिक महासागर से शुरू होगा. फिर जिब्राल्टर जलडमरूमध्य, दक्षिणी स्पेन, उत्तरी मोरक्को, उत्तरी अल्जीरिया, उत्तरी ट्यूनेशिया, उत्तर पूर्वी लीबिया, मिस्त्र, सूडान, दक्षिण पश्चिमी सऊदी अरब, यमन, सोमालिया और अरब प्रायद्वीप के अन्य देशों तक जाएगा. हालांकि हिंद महासागर के ऊपर यह धुंधला पड़ जाएगा. इतिहास का सबसे लंबा पूर्ण सूर्य ग्रहण 7 मिनट 28 सेकंड तक का था जो 743 ईसा पूर्व हुआ था.
इस सूर्य ग्रहण ‘महान उत्तरी अफ्रीकी ग्रहण’ भी कहा जा रहा है. इसकी वजह यह है कि अफ्रीका के ज्यादातर देशों से यह दिखाई देगा. अधिकांशत: सूर्यग्रहण 3 मिनट से कम समय तक रहते हैं लेकिन 2 अगस्त 2027 को पड़ने वाला पूर्ण सूर्यग्रहण दुनिया के कई हिस्सों को पूरे 6 मिनट तक अंधेरे में डुबोए रखेगा.
इतने लंबे सूर्यग्रहण का कारण क्या है?
इसका कारण सूर्य-चंद्रमा और पृथ्वी के बीच दुर्लभ खगोलीय संरेखण है. इतने लंबे सूर्यग्रहण के तीन मुख्य कारण है. पहला यह है कि पृथ्वी सूर्य से सबसे दूरी पर होगी. इसे अपसौर कहा जाता है. इस वजह से पृथ्वी से सूरज छोटा दिखेगा. उसी समय, चंद्रमा धरती के सबसे करीब होगा जिससे यह बड़ा दिखाई देगा. तीसरा ये कि चंद्रमा की छाया भूमध्य रेखा पड़ेगी और परछाई धीमी गति से बढ़ेगी.
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