धर्म एवं ज्योतिष
कजरी तीज पर बनाएं सत्तू के लड्डू - स्वाद, परंपरा और भक्ति से भरा यह खास त्योहारी प्रसाद
12 Aug, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कजरी तीज का नाम आते ही मन में सजधजकर व्रत करने वाली महिलाओं की तस्वीर, पूजा की थाली, और स्वादिष्ट सत्तू के पकवान का ख्याल आ जाता है. उत्तर भारत के कई हिस्सों में ये त्योहार बेहद धूमधाम से मनाया जाता है, खासकर सुहागिन महिलाएं इस दिन का बेसब्री से इंतजार करती हैं. इस मौके पर घर-घर में सत्तू से बने लड्डू, पराठे और मिठाइयां तैयार होती हैं. माना जाता है कि कजरी तीज पर सत्तू का भोग लगाने से माता पार्वती और भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद मिलता है, अगर आप भी इस बार कजरी तीज पर घर में आसानी से स्वादिष्ट सत्तू के लड्डू बनाना चाहती हैं, तो यह रेसिपी आपके लिए बिल्कुल सही है.
कजरी तीज और सत्तू का रिश्ता
कजरी तीज भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है. इस बार कजरी तीज 12 अगस्त 2025 को है इस दिन महिलाएं व्रत रखकर अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं. कई जगह इसे सातुड़ी तीज भी कहा जाता है. परंपरा के अनुसार इस दिन सत्तू का खास महत्व होता है. सत्तू न सिर्फ सेहत के लिए अच्छा है बल्कि इसकी मिठास भक्ति में और भी रंग भर देती है.
सत्तू के लड्डू बनाने के लिए सामग्री
सत्तू – 1 कप
पिसी हुई चीनी – ½ कप (स्वाद अनुसार कम-ज्यादा कर सकती हैं)
घी – ¼ कप
कटे हुए पिस्ता – 2 टेबलस्पून
कटे हुए बादाम – 2 टेबलस्पून
इलायची पाउडर – ½ छोटी चम्मच
नारियल का बूरा – 1 टेबलस्पून
बनाने की विधि
1. सबसे पहले एक कढ़ाई में घी डालकर धीमी आंच पर गरम करें.
2. गरम घी में सत्तू डालें और लगातार चलाते हुए हल्का भूरा होने तक भूनें. ध्यान रहे, सत्तू जल्दी जल सकता है, इसलिए आंच और चलाने का रफ्तार सही रखें.
3. सत्तू हल्का सुनहरा होते ही इसमें इलायची पाउडर डालकर मिला दें.
4. अब इसमें कटे हुए पिस्ता और बादाम डालें और अच्छी तरह मिलाएं.
5. गैस बंद करके मिश्रण को थोड़ा ठंडा होने दें.
6. ठंडा होने पर पिसी हुई चीनी डालें और सभी चीजों को अच्छे से मिक्स करें.
7. अब हाथों में थोड़ा सा घी लगाकर छोटे-छोटे लड्डू बनाएं.
8. लड्डुओं के ऊपर नारियल का बूरा लपेट दें ताकि स्वाद और खुशबू दोनों बढ़ जाएं.
टिप्स
1. आप चाहें तो इसमें किशमिश या काजू भी डाल सकती हैं.
2. अगर ज्यादा हेल्दी वर्जन बनाना चाहती हैं तो चीनी की जगह गुड़ पाउडर इस्तेमाल करें.
3. लड्डू बनाने से पहले मिश्रण को ज्यादा ठंडा न करें, वरना घी जम सकता है और लड्डू बांधना मुश्किल हो जाएगा.
जन्माष्टमी के बाद पड़ने वाली एकादशी पर बन रहा बेहद शुभ संयोग, दोगुना मिलेगा व्रत का फल!
12 Aug, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में हर महीने में दो एकादशी तिथियां आती हैं. एक शुक्ल पक्ष की और एक कृष्ण पक्ष की. हर एकादशी तिथि का अपना अलग महत्व होता है, लेकिन सालभर में आने वाली 24 एकादशी तिथियों में अजा एकादशी का विशेष महत्व है. मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से भगवान विष्णु अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर देते हैं. भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी, जिसे अजा एकादशी भी कहते हैं, इस बार इसका बड़ा महत्व है.
कब मनाई जाएगी अजा एकादशी?
वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रप कृष्ण एकादशी तिथि 18 अगस्त को शुरू होगी और 19 अगस्त को दोपहर 03:32 मिनट पर तिथि का समापन होगा. उदया तिथि में 19 अगस्त को अजा एकादशी व्रत रखा जाएगा. पूजा मुहूर्त सुबह 9:08 बसे लेकर दोपहर 2:02 बजे तक होगा.
शुभ योग में अजा एकादशी
भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी पर सिद्धि योग बन रह है. इसके अलावा इस एकादशी तिथि पर शिववास योग समेत कई और शुभ और मंगलकारी योग बन रहे हैं. इन योग में अगर विष्णुजी और मां लक्ष्मी की पूजा आराधना करें तो जीवन के सभी दुखों का नाश हो सकता है और भौतिक सुखों की प्राप्ति हो सकती है.
अजा एकादशी व्रत से मिलेगा ये लाभ
शास्त्रों के अनुसार, यह व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का एक बेहतरीन अवसर माना जाता है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से साधक सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है. माना जाता है कि इस व्रत को करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान शुभ फल मिलता है. यह उपवास न केवल समृद्धि और भौतिक कल्याण लाता है, बल्कि आध्यात्मिक प्रगति में भी योगदान देता है.
एकादशी व्रत के दिन क्या करें?
एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि के बाद व्रत संकल्प लें. पूजा के दौरान भगवान विष्णु को पीली मिठाई का भोग लगाना चाहिए क्योंकि पीला रंग भगवान श्रीहरि को प्रिय माना जाता है. भगवान विष्णु के साथ-साथ देवी लक्ष्मी की भी पूजा करें. इस दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाना भी शुभ माना जाता है.
हनुमान चालीसा कब और किसने लिखी थी? क्या है इसकी पौराणिक कथा
12 Aug, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिन्दू धर्म में सप्ताह का हर दिन किसी न किसी देवी-देवताओं को समर्पित है. इसी तरह मंगवलार के दिन हनुमानजी की पूजा और व्रत का विधान है. यह व्रत जीवन के दुखों को दूर करने के लिए किया जाता है. ज्योतिषविदों की मानें तो श्रीराम के परम भक्त की पूजा हनुमान चालीसा के बिना अधूरी मानी जाती है. इसलिए जो जातक पूजा के दौरान हनुमान चालीसा का पाठ करता है उसको सभी कार्यों में सफलता मिलती है. साथ ही, अक्षय फलों की भी प्राप्ति होती है. अब सवाल है कि आखिर हनुमान चालीसा किसने और कब लिखी? हनुमान चालीसा का दोहा और चौपाई क्या हैं
हनुमान चालीसा कब और किसने लिखी थी?
शास्त्रों के अनुसार, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और हनुमानजी एक-दूसरे के पूरक हैं. इसलिए जहां भी राम कथा या संवाद होता है वहां श्रीराम के भक्त हनुमानजी जरूर आते हैं. एक बार की बात है कि तुलसीदास जी राम कथा सुना रहे थे. इसी दौरान तुलसीदासजी की मुलाकात एक मनुष्य से होती है. इसपर तुलसीदास बिना समय गवाए समझ गए कि वह असाधारण मनुष्य नहीं है, बल्कि कोई अदृश्य शक्ति है. फिर उस शक्ति ने तुलसीदास को हनुमानजी से मुलाकात का स्थान बताया.
कालांतर में प्रेत द्वारा बताए गए स्थान पर तुलसीदास की मुलाकात हनुमान जी से हुई. मुलाकात कर तुलसीदास सुध-बुध खो बैठे. इसके बाद उन्होंने भगवान श्रीराम से मुलाकात के लिए विनती की. उनकी इस प्रार्थना पर हनुमान जी बोले-आप चित्रकूट जाएं. यहीं पर भगवान रामजी आपको दर्शन देंगे. इसके बाद तुलसीदास ने बजरंगबली को प्रसन्न करने के लिए हनुमान चालीसा लिखी थी. इससे वह बेहद प्रसन्न हुए थे. ऐसा माना जाता है कि भक्ति आंदोलन के दौरान ही तुलसीदास ने हनुमान चालीसा की रचना की थी.
हनुमान चालीसा का पाठ हिन्दी में-
दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निजमन मुकुरु सुधारि। बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायक फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे। कांधे मूंज जनेउ साजे।।
शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग वंदन।।
बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचन्द्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्र जोजन पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना।।
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरे सब पीरा। जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै।।
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकन्दन राम दुलारे।।
अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुह्मरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै।।
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।
सङ्कट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बन्दि महा सुख होई।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।
दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
जय श्रीराम, जय हनुमान, जय हनुमान
जन्माष्टमी पर राशि अनुसार लगाया लड्डू गोपाल को भोग, तो बन जाएगा हर काम, मिलेगा विशेष आशीर्वाद
12 Aug, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भादो मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है. इस दिन लड्डू गोपाल की पूजा की जाती है. जगह-जगह भगवान श्रीकृष्ण की झांकिया लगती हैं. जन्माष्टमी पर व्रत का विधान है. धार्मिक मान्यता है कि भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ था. वहीं ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अगर इस दिन अगर राशि अनुसार लड्डू गोपाल को भोग लगाया जाए, तो सालभर भगवान का आशीर्वाद मिलता है.
मेष- इस राशि के स्वामी मंगल हैं. मेष राशि के जातकों को कृष्ण जन्माष्टमी पर कान्हा को सेब का भोग लगाना चाहिए.
वृषभ- इस राशि के स्वामी शुक्र हैं. वृषभ राशि के जातकों को लड्डू गोपाल को प्रसन्न करने के लिए मक्खन का भोग लगाना चाहिए. इससे आपको कान्हा की विशेष कृपा प्राप्त हो सकती है.
मिथुन- इस राशि के स्वामी बुध हैं. मिथुन राशि वाले जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल को हरे रंग के फलों का भोग लगाएं, शुभ रहेगा.
कर्क- इस राशि के स्वामी चंद्र हैं. कर्क राशि वाले जन्माष्टमी के अवसर पर कान्हा को मक्खन का भोग लगाएं, शुभ रहेगा.
सिंह- इस राशि के स्वामी सूर्य हैं. सिंह राशि के जातकों को बाल गोपाल का आशीर्वाद पाने के लिए उन्हें दूध का भोग लगाना चाहिए.
कन्या- इस राशि के स्वामी बुध हैं. लड्डू गोपाल को प्रसन्न करने के लिए उन्हें पेड़े का भोग लगाएं.
तुला- इस राशि के स्वामी शुक्र हैं. तुला राशि के जातकों के लिए जन्माष्टमी के दिन कान्हा को केले का भोग लगाना शुभ रहेगा.
वृश्चिक- इस राशि के स्वामी मंगल हैं. वृश्चिक राशि के जातक जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण को अनार का भोग लगाएं, शुभ रहेगा.
धनु- इस राशि के स्वामी देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं. धनु राशि के जातक जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल को अंगूर का भोग लगाएं, फायदेमंद रहेगा.
मकर- इस राशि के स्वामी शनि हैं. मकर राशि के लोगों के लिए कृष्ण जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल को सूखे मेवे का भोग लगाना शुभ रहेगा.
कुंभ- इस राशि के स्वामी भी शनिदेव ही हैं. कुंभ राशि के जातक कृष्ण जन्माष्टमी पर उड़द की दाल से बने पकवान का भोग लगाएं, शुभ रहेगा.
मीन- इस राशि के स्वामी देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं. मीन राशि वाले जन्माष्टमी के दिन कान्हा को प्रसन्न करने के लिए अनन्नास का भोग लगाएं, शुभ रहेगा.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 12 अगस्त 2025)
12 Aug, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष :- उन्नति, कार्यसिद्ध, वाहनभय, शरीर कष्ट, घरु प्रवास से सफलता मिल सकती है।
वृष :- खर्च, सिद्धी, बाधा, शुभ कार्य, कष्ट, मानसिक कार्य एवं सफलता का योग है।
मिथुन :- राज से हानि, घरु विरोध, अपव्यय, लेखन कार्य में रुकावट अवश्य होगी।
कर्क :- संतान कष्ट, आर्थिक कष्ट, खर्च शत्रु भय, धार्मिक कार्य एवं शुभ कार्य का योग है।
सिंह :- सफलता का हर्ष, भय-दबाव, विवाद, कुछ प्रसन्नता का योग बनेगा, पारिवारिक सुख होगा।
कन्या :- हानि, अपव्यय योग, रोग, मातृ कष्ट, शिक्षा जगत में संतोष रहेगा।
तुला :- लाभ, संतान सुख, रोगभय, झंझट, लेखन, कार्य सामान्य प्रगति कारक रहेगा।
वृश्चिक :- अभिष्ट सिद्धी, स्वजन कार्य कष्ट, यश, संतान पक्ष अपेक्षाकृत अच्छा रहे, प्रसन्नता बनेगी।
धनु :- राजभय, स्त्रीकष्ट, कार्यसिद्धी, धन लाभ, सामाजिक कार्य में व्यवधान के साथ सफलता मिलेगी।
मकर :- विवाद, कष्ट, बाधा हानि, घरु कष्ट, नौकरी की स्थिति सामान्य अवश्य रहेगी।
कुम्भ :- यश, सुख, कार्य-मुकदमे से लाभ, धार्मिक तथा कुछ अच्छे कार्य भी हो सकते हैं।
मीन :- रोगभय, अभिष्ट सिद्धी, अल्प हानि, नौकरी में अनबन हो सकती है, ध्यान रखें।
जन्माष्टमी पर किस्मत चमकाने का मौका, जान लें आपको किस चीज का दान करना है?
11 Aug, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भादो मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है. इस बार गृहस्थों की जन्माष्टमी 15 अगस्त और वैष्णव की 16 अगस्त को मनाई जाएगी. इस दिन लड्डू गोपाल की पूजा की जाती है. जगह-जगह भगवान श्रीकृष्ण की झांकिया लगती हैं. जन्माष्टमी पर व्रत का विधान है. धार्मिक मान्यता है कि भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ था. इस दिन अगर जातक अपनी राशि अनुसार कुछ चीजों का दान करें, तो सालभर लड्डू गोपाल की कृपा बरसती है. कि जन्माष्टमी पर किन चीजों का दान करना शुभ रहेगा.
मेष- इस राशि के स्वामी मंगल हैं. मेष राशि के जातकों को कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए गेहूं और गुड़ का दान करना चाहिए.
वृषभ- इस राशि के स्वामी शुक्र हैं. वृषभ राशि के जातकों को लड्डू गोपाल को प्रसन्न करने के लिए माखन, मिश्री और चीनी का दान करना चाहिए.
मिथुन- इस राशि के स्वामी बुध हैं. मिथुन राशि वालों को जन्माष्टमी के दिन जरूरतमंद को अन्न का दान करना चाहिए.
कर्क- इस राशि के स्वामी चंद्र हैं. कर्क राशि वालों को जन्माष्टमी के अवसर पर दूध, दही, चावल और मिठाई का दान करना शुभ बताया गया है.
सिंह- इस राशि के स्वामी सूर्य हैं. सिंह राशि के जातक जन्माष्टमी के दिन बाल गोपाल का आशीर्वाद पाने के लिए गुड़ और शहद का दान करें.
कन्या- इस राशि के स्वामी बुध हैं. कन्या राशि वाले लड्डू गोपाल को खुश करने के लिए गौ माता की सेवा करने के बाद चारा दान करें.
तुला- इस राशि के स्वामी शुक्र हैं. तुला राशि वाले आर्थिक समस्या से छुटकारा पाना चाहते हैं, तो जन्माष्टमी के दिन श्वेत और नीले रंग के वस्त्रों का दान करें.
वृश्चिक- इस राशि के स्वामी मंगल हैं. वृश्चिक राशि के जातकों को जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए गेहूं, गुड़ और शहद का दान करना चाहिए.
धनु- इस राशि के स्वामी देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं. धनु राशि के जातकों को जन्माष्टमी पर धार्मिक पुस्तक गीता का दान करना चाहिए.
मकर- इस राशि के स्वामी शनि हैं. मकर राशि के लोगों को कृष्ण जन्माष्टमी पर किसी गरीब को मध्यम नीले रंग के वस्त्र का दान करना चाहिए.
कुंभ- इस राशि के स्वामी भी शनिदेव ही हैं. कुंभ राशि के जातकों को कृष्ण जन्माष्टमी के दिन धन का दान करना चाहिए.
मीन- इस राशि के स्वामी देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं. मीन राशि के जातकों को जन्माष्टमी पर कान्हा को प्रसन्न करने के लिए केले, बेसन के लड्डू, मिश्री, माखन आदि का दान करना चाहिए.
क्या अंगूठे से लंबी है बगल वाली उंगली? ईमानदार या चालाक किस पर्सनैलिटी के होते ऐसे लोग, पैरों में छिपा व्यक्तित्व का राज
11 Aug, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
शरीर के हर अंग के अपने संकेत होते हैं. समुद्र शास्त्र के अनुसार, ये संकेत व्यक्ति के स्वभाव, व्यवहार और भविष्य का खुलासा करते हैं. आपने अक्सर हाथ की रेखाओं, अंगूठे के आकार और हथेली की बनावट से संकेतों के बारे में सुना होगा.
पैर की उंगलियों और अंगूठे के आकार से भी व्यक्ति के स्वभाव और व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ पता लगाया जा सकता है.
यदि आपके पैर का अंगूठा सबसे बड़ा है और बाकी उंगलियां लगभग बराबर लंबाई की हैं, तो ऐसे लोग आमतौर पर बहुत शांत, सरल और संवेदनशील स्वभाव के होते हैं. ये किसी भी तरह के विवाद से बचते हैं और निर्णय लेने में समय लेते हैं. इन्हें अक्सर कमज़ोर निर्णय लेने की क्षमता वाला समझा जाता है, जबकि वास्तव में ये सोच-समझकर निर्णय लेने में विश्वास रखते हैं. प्यार के मामले में ये बहुत वफ़ादार और गंभीर होते हैं.
अगर आपके पैर का अंगूठा सबसे बड़ा है और बाकी उंगलियां छोटी हैं, तो ऐसे लोग स्वाभाविक रूप से आत्मविश्वासी, दृढ़ निश्चयी और कभी-कभी ज़िद्दी होते हैं. इन्हें अपने फैसलों पर पूरा भरोसा होता है और ये जीवन के हर अनुभव से कुछ न कुछ सीखना चाहते हैं. हालाँकि, इनका दबंग स्वभाव कभी-कभी रिश्तों में चुनौती बन जाता है.
यदि आपका अंगूठा आपकी दूसरी और तीसरी उंगली के बराबर लंबाई का है और बाकी दो उंगलियां छोटी हैं, तो ऐसे लोग ज़िम्मेदार, मेहनती और अपने परिवार के प्रति समर्पित होते हैं. दूसरों की मदद करना, अपनी गलतियों की ज़िम्मेदारी खुद लेना और हमेशा सकारात्मक सोचना इनकी खासियत है. ये लोग रिश्ते निभाने में यकीन रखते हैं और बेहद भरोसेमंद होते हैं.
यदि आपके पैर की दूसरी उंगली अंगूठे से बड़ी है और उसके बाद की उंगलियां क्रमशः छोटी हैं, तो ऐसे व्यक्ति अपनी मेहनत से अपना भाग्य बदल सकते हैं.
वे छोटी उम्र से ही ज़िम्मेदारी लेते हैं और ज़्यादातर काम खुद करते हैं. वे नई चीज़ें सीखने और कुछ अलग करने के लिए उत्सुक रहते हैं. हालाँकि उन्हें सफलता अक्सर 28 या 30 की उम्र के बाद मिलती है, लेकिन जब मिलती है, तो विस्फोटक होती है. वे अपनी मेहनत से समाज और दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाते हैं.
घर में तुलसी का पौधा किस दिन लगाना चाहिए? किस दिशा में रखना होगा शुभ
11 Aug, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिन्दू धर्म में तुलसी के बिना घर का आंगन अधूरा सा लगता है. इसलिए लगभग हर सनातनी घर में तुलसी का पौधा जरूर होता है. तुलसी का पौधा बेहद पवित्र और पूजनीय माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार, सुबह और शाम तुलसी की पूजा करने से दरिद्रता पास नहीं आती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. इसलिए घर में विधि-विधान से तुलसी पूजा होती है. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि, तुलसी का पौधा लगाने से लेकर उसे रखने की जगह का भी महत्व है.
धार्मिक मान्यता है कि तुलसी के पौधे को वास्तु शास्त्र के अनुसार, सही जगह पर रखने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है. ऐसे ही वास्तु शास्त्र में तुलसी के पौधे को लगाने के लिए सही दिन के बारे में भी बताया गया है. अब सवाल है कि आखिर तुलसी का पौधा किस दिन लगाना चाहिए? घर में तुलसी का पौधा किस दिशा में रखें? आइए जानते हैं इस बारे में-
तुलसी पूजा करने से क्या होगा?
शास्त्रों के अनुसार, सुबह और शाम तुलसी की पूजा करने से दरिद्रता पास नहीं आती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. माना जाता है कि तुलसी के पौधे को वास्तु शास्त्र के अनुसार, सही जगह पर रखने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है.
पवित्र तुलसी का पौधा लगाने से लेकर रखने तक का महत्व
इस दिन लगाएं तुलसी: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, घर में तुलसी का पौधा लगाने के लिए गुरुवार और शुक्रवार का दिन बेहद शुभ माना गया है. गुरुवार भगवान विष्णु को और शुक्रवार मां लक्ष्मी को समर्पित होता है. इन दिनों तुलसी लगाने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं.
कब न लगाएं तुलसी: शास्त्रों के अनुसार, रविवार, सोमवार और बुधवार को तुलसी का पौधा लगाना अशुभ माना जाता है. साथ ही एकादशी के दिन भी तुलसी लगाना वर्जित है.
घर में किस दिशा में रखें तुलसी: तुलसी का पौधा हमेशा घर की उत्तर-पूर्व दिशा में लगाना चाहिए, क्योंकि उत्तर दिशा लक्ष्मी जी की दिशा होती है. यहां से घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है. इस दिशा में देवी देवताओं का स्थान होता है और यह हरे रंग को भी रिप्रेजेंट करता है. इसलिए यहां तुलसी का पौधा लगाना अति शुभ होता है.
इस दिशा में न लगाएं तुलसी: अगर आपने अपने घर में तुलसी पौधा दक्षिण की दिशा में लगा दिया है तो फिर यह बहुत अशुभ हो जाएगा. इसलिए वास्तु के अनुसार ही पौधे की जगह का चयन करें. उत्तर दिशा में रखने से आप देखेंगे कि तुलसी का पता नहीं सूखेगा और घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होगा. घर में सुख समृद्धि बनी रहेगी.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 11 अगस्त 2025)
11 Aug, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष :- व्यापार में प्रगति, यात्रा सुख, खर्च अधिक होगा, व्यर्थ का विरोध होता रहेगा।
वृष :- कलह, अभिष्ट सिद्धी, धन लाभ, चिन्ता, शारीरिक सुख, मांगलिक कार्य अवश्य बनेंगे।
मिथुन :- भय, व्यापार लाभ, सुख, सामाजिक कार्यों में व्यवधान, परेशानी अवश्य बनेगी।
कर्क :- विद्या बाधा, व्यापार मध्यम, चिन्ता, धार्मिक कार्यों में विरोध होगा।
सिंह :- स्त्री संतान सुख, यात्रा बाधा, विवाद, आर्थिक सुधार होगा, प्रतिष्ठा अवश्य बढ़े।
कन्या :- भूमि लाभ, प्रवास कष्ट, व्ययभार बढ़ेगा, शुभ समाचार तथा प्रसन्नता का योग है।
तुला :- कारोबार मध्यम, सफलता, स्त्री कष्ट, व्यर्थ धन का नाश होगा, खर्च से परेशानी बढ़ेगी।
वृश्चिक :- थोड़ा लाभ, खेती की चिंता, उलझन, शिक्षा की स्थिति सामान्य लाभदायक रहेगी।
धनु :- घरु सुख, हानि, उन्नत खेती योग मध्यम, कुछ अच्छे कार्य बनेंगे, ध्यान दें।
मकर :- हर्ष, भूमि लाभ, यश, कारोबार बढ़ेगा, कारोबार में लाभ व्यय बढ़ेगा।
कुम्भ :- भय, हानि, स्त्री सुख, कार्य सिद्धी, जमीन-जायजाद के कार्यों में सफलता अवश्य मिले।
मीन :- विद्या बाधा, विवाद, चोरों से भय, पारिवारिक लोगों से लाभ, सफलता मिलेगी।
पांडवों ने बनाया, दो बार आपदा में दबा, इस मंदिर में साल में एक बार होती है पूजा, धरती में 7 फीट नीचे
10 Aug, 2025 06:40 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
देहरादून. उत्तरकाशी के धराली में आई आपदा ने सब कुछ तबाह कर दिया. इसने न सिर्फ इंसानों के आशियानों को उजाड़ा बल्कि पौराणिक महत्त्व रखने वाले प्राचीन मंदिरों को भी अपनी चपेट लिया और वे मलबे में दब गए. एक ऐसा ही मंदिर कल्प केदार मंदिर भी था. खीरगंगा की तबाही की ऐसी तस्वीर पहली बार लोगों ने नहीं देखी है, बल्कि इससे पहले भी खीरगंगा के भयानक रूप को देखा है. कल्प केदार मंदिर, 19वीं शताब्दी की शुरुआत में भी खीरगंगा में आई आपदा की मार को झेल चुका था. बीते 5 अगस्त को धराली में खीरगंगा से आई आपदा के चलते कल्प केदार मंदिर दोबारा मलबे में दब गया.
भगीरथ मंदिर से कनेक्शन
कल्प केदार मंदिर, कत्यूरी शैली का बना हुआ जिसे 17वीं सदी में बनवाया गया था. पांडवों ने इसका निर्माण करवाया. 19वीं शताब्दी की शुरुआत में खीरगंगा में आपदा आई थी जिसके बाद यह मंदिर मलबे में दब गया था. यहां रहने वाले लोगों को इसका ऊपरी हिस्सा नजर आया तो साल 1945 में इसकी खुदाई हुई और रिसर्च की गई, जिसमें पता चला कि यह मंदिर कत्यूरी शैली का बनाया गया. इस मंदिर का पुनःनिर्माण करवाया गया. यह मंदिर खुदाई के बावजूद भी 6-7 फीट नीचे दबा हुआ था और ऊपर 12-13 ऊपर नजर आता था.
साल में एक पूजा
कल्प केदार मंदिर, कई फीट नीचे गहरा दबा था. इस मंदिर में सफेद शिवलिंग है, जिसकी साल में एक ही बार पूजा होती है क्योंकि यह पानी में डूबा रहता है, जिसका पानी साल में एक बार निकाला जाता है तभी पूजा हो पाती है. इसलिए मंदिर के सामने ऊपरी भाग में एक शिवलिंग और नंदी को स्थापित किया गया था. मंदिर के बाहर नंदी, शेर और घड़े की आकृति उकेरी गई. धराली का पुराना नाम श्याम प्रयाग है. यह स्थान खीरगंगा और भगीरथी नदी का संगम है. कल्प केदार मंदिर का गर्भगृह हमेशा पानी में डूबा रहता है. भगीरथी नदी के पानी से मंदिर का कनेक्शन भी है. ओम द्विवेदी कहते हैं कि इस क्षेत्र में कल्प केदार जैसे लगभग 240 प्राचीन मंदिरों का समूह था जो धराली में आई आपदा में जमीदोंज होते गए.
दूध और पानी की बूंदों से जलती आस्था की लौ! जानें बाबा अमर सिंह स्थान का अद्भुत रहस्य
10 Aug, 2025 06:40 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
समस्तीपुरः समस्तीपुर जिले में स्थित राजकीय पर्यटक स्थल बाबा अमर सिंह स्थान, जिसे निषादों के राष्ट्रीय तीर्थस्थल के रूप में भी जाना जाता है, वहां सावन महीने में लगने वाला मेला इन दिनों देशभर के श्रद्धालुओं के बीच आस्था का केंद्र बना हुआ है. यह पावन स्थल न केवल समस्तीपुर या इसके आसपास के जिलों से, बल्कि उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार और यहां तक कि नेपाल से भी हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. यहां साल में दो बार मेला आयोजित होता है. पहला चैत्र माह में रामनवमी के अवसर पर और दूसरा सावन माह में, जो पूरे एक महीने तक चलता है और सावन पूर्णिमा को समापन होता है. इस दौरान, श्रद्धालु नदी तट पर पूजा-अर्चना, हवन, और भजन-कीर्तन करते हैं. लेकिन इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां आग में पेट्रोल या डीजल नहीं, बल्कि दूध और पानी की कुछ बूंदें डालते ही लपटें पेट्रोल जैसी उठती हैं, जो लोगों में गहरी आस्था और रहस्यमय आकर्षण पैदा करती है.
मंत्रोच्चार के साथ दूध-पानी डालते ही उठती हैं चिंगारियां
पूजा स्थल पर भक्त हवन कुण्ड तैयार करते हैं और मंत्रोच्चार के साथ अग्नि प्रज्वलित करते हैं. इसके बाद वे अग्नि में दूध और पानी की बूंदें डालते हैं, जिससे आश्चर्यजनक रूप से तेज़ चिंगारी और लपटें उठती हैं, ठीक वैसे ही जैसे पेट्रोल या कोई ज्वलनशील पदार्थ डालने पर होता है. उत्तर प्रदेश के मऊ जिला से आए श्रद्धालु रामनरेश बताते हैं, मैं पिछले 15 वर्षों से बाबा के दरबार में आता रहा हूँ. यहां की आग में जो ताकत है, वो मंत्रों और श्रद्धा की है. हम लोग हवन के बाद पंचमेवा का प्रसाद भी तैयार करते हैं और कई बार 15-20 बार तक अग्नि प्रज्वलन की प्रक्रिया करते हैं. उनका कहना है कि यहां की चिंगारी श्रद्धा का प्रमाण है, इसमें कोई पेट्रोल या डीजल नहीं होता. केवल आस्था, मंत्र और अग्नि की पवित्रता होती है.
यहां सच्चे मन से आने वालों की मनोकामना होती है पूरी
मेले में उत्तर प्रदेश के मधुबन से आईं 70 वर्षीय छठिया देवी कहती हैं, मैं वर्षों से बाबा के स्थान पर आ रही हूं. यहां आने से मन को शांति मिलती है और जो भी सच्चे मन से मन्नत मांगता है, उसकी इच्छा बाबा ज़रूर पूरी करते हैं. इसी तरह उत्तर प्रदेश की एक अन्य महिला चुनौती देवी बताती हैं, जिस तरह लोग देवघर बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के लिए जाते हैं, वैसे ही हम हर साल समस्तीपुर बाबा अमर सिंह स्थान आते हैं. हमारे कुल देवता हैं बाबा अमर सिंह, इसलिए आना अनिवार्य है. यहां आने वाले ज़्यादातर श्रद्धालु पैदल यात्रा करते हैं, रास्ते में भजन-कीर्तन, झंडा यात्रा, और पूजन सामग्री लेकर पहुंचते हैं. बाबा के दरबार में पहुंचकर वे नदी किनारे बैठकर पूजा करते हैं और मन की बात बाबा के चरणों में समर्पित करते हैं.
आस्था और चमत्कार का अद्भुत संगम
श्रद्धालु इस स्थान को निषादों का काशी भी कहते हैं प्रभानश साहनी, जो मऊ से 19 वर्षों से आ रहे हैं, कहते हैं, हमारे पूर्वजों से यह स्थल जुड़ा है, इसलिए हम हर साल आते हैं. यह केवल पूजा का स्थान नहीं, एक ऊर्जा का केंद्र है. गाजीपुर से आए गुलाब साहनी कहते हैं, यहां आने पर आत्मिक शांति मिलती है. जो आग में दूध और पानी डालने से उठने वाली लपटें हैं, वो आम नहीं होतीं ये बाबा की शक्ति है. यह स्थल अब केवल एक धार्मिक स्थान नहीं रह गया है, बल्कि धार्मिक पर्यटन का भी केंद्र बन चुका है. प्रशासन की ओर से प्रशासनिक सुविधा, सुरक्षा व्यवस्था, और साफ-सफाई का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है.
इस मंदिर में धोक लगाने से मिलती है नौकरी, भक्त मां को अर्पित करते हैं पहला वेतन, 300 साल पुराना है इतिहास
10 Aug, 2025 06:20 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सीकर. राजस्थान के सीकर जिला स्थित खटूंदरा गांव में करणी माता का एक ऐसा चमत्कारी मंदिर मौजूद है, जहां बेरोजगार अपनी नौकरी की अरदास लेकर पहुंचते हैं. इस मंदिर का इतिहास भी बेहद रोचक है. पुजारी वासुदेव सिंह पालावत के अनुसार, खटूंदरा राय माता के नाम से प्रसिद्ध करणी माता मंदिर की स्थापना लगभग 300 साल पूर्व हुई थी. उस समय खटूंदरा में चारणों की 18 बीघा जमीन पर जागीरदारी थी. देशनोक की करणी माता के निधन के बाद चारणों के बड़े ठिकानों में मूर्तियों की स्थापना की गई. इसमें से खटूंदरा ग्राम भी चारणों का बड़ा ठिकाना था.
उन्होंने बताया कि चारणों के स्वामी सांवलदास महाराज नाडा चारणवास (दांतारामगढ़) अपने पिता की अस्थियां लेकर लोहार्गल जा रहे थे. रात्रि विश्राम खटूंदरा में किया तब रात में दैवीय शक्ति का आभास हुआ. महाराज ने कई देवियों का आह्वान किया, उनमें से एक नाम खटु का लिया तब आवड़ माता प्रकट हुई. माताजी ने सांवरियाजी महाराज को एक शस्त्र फरसा भेंट किया और कहा कि इसकी पूजा करो, जब दूसरा अवतार होगा तब मूर्ति की स्थापना की जाएगी. उस फरसे की आज भी मंदिर में पूजा की जाती है.
मर्दाना भेष में ही रहती थी इंद्र कंवर बाईसा
87 वर्ष पूर्व आसोज सुदी चौदस संवत 1995 को चारण गोत्र की दैवीय शक्ति इंद्र कंवर बाइसा के कर कमलों से आवड़ माता की स्थापना की गई. इंद्र कंवर बाईसा हरदम मर्दाना भेष में ही रहती थी. इंद्र बाईसा ने जाते-जाते अमर रोटी का वरदान दिया था कि जो भी इस माता के स्थान पर शीश नवाएगा उसको अमर रोटी प्राप्त होगी. 2018 में माताजी के मंदिर का पुनः निर्माण शुरू किया गया. उस समय माताजी के दरबार में मनौती मांगने वाले लोगों की इच्छा पूर्ण होने पर अपनी पहली सैलरी से माताजी के मंदिर का निर्माण शुरू किया गया. यहां मन्नत मांगने पर कांस्टेबल छगन मीणा ने अमेरिका में पुलिस फायर गेम्स प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता था.
बेरोजगाराें की अरदास होती है पूरी
बेरोजगार द्वारा नौकरी के लिए की गई मन्नत जरूर पूरी होती है. यही कारण है कि सरकारी भर्ती परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी इस मंदिर में अक्सर आते रहते हैं. सीकर शहर में रहकर एसएससी की तैयारी कर रहे कुलदीप सिंह ने बताया कि जब भी उनका मन करता है, वह यहां पर आ जाते हैं. इस मंदिर में आकर आत्मीय शांति मिलती है. यही कारण है कि इस मंदिर को नौकरी वाली करणी माता मंदिर के नाम से जाना जाता है. खास बात यह है कि इस मंदिर में प्रसाद के रूप में भक्तों को रोटी दी जाती है. आटे से बनी रोटी को ही प्रसाद के रूप में यहां चढ़ाया जाता है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 10 अगस्त 2025)
10 Aug, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष :- स्वभाव से पारिवारिक सफलता मिल सकती है, व्यवसाय में अच्छी उन्नति होगी।
वृष :- कार्यों में सफलता मिले मान-सम्मान की प्राप्ति होगी, शत्रु कमजोर होंगे।
मिथुन :- सप्ताह उत्तम फलकारक है, अधिकारियों का पूर्ण सहयोग-समर्थन मिलेगा।
कर्क :- नौकरी में व्यवधान हो सकता है, व्यवसाय ठीक नहीं रहेगा ध्यान रखें।
सिंह :- आप आनंद का अनुभव करेंगे, केतु गृह पीड़ा कारक, आपसी मतभेद से बचकर चलें।
कन्या :- मनोरंजन से अति हर्ष होगा, व्यवसाय में लाभ होगा, रुके कार्य अवश्य ही बनेंगे।
तुला :- पारिवारिक उत्तरदायित्व की वृद्धि होगी, आमोद-प्रमोद में विशेष ध्यान देंगे।
वृश्चिक :- मानसिक तनाव अकस्मिक बढ़ेगा, स्वजनों से सहानुभूति अवश्य ही बढ़ेगी।
धनु :- व्यवसाय की उन्नति से आर्थिक स्थिति में विशेष सुधार होगा, ध्यान रखें।
मकर :- विलास सामग्री का संचय होगा, अधिकारी वर्ग की कृपा का लाभ अवश्य मिलेगा।
कुम्भ :- इष्ट मित्रों से अच्छा सहयोग हो, उन्नति एवं लाभ के योग अवश्य बनेंगे।
मीन :- गृह कलह, हीन मनोवृत्ति, शरीर पीड़ा से परेशानी अवश्य ही बन जायेगी।
भगवान श्रीकृष्ण की बहन के रूप में पूजी जाती हैं यहां की देवी, जानिए इस अनोखे मंदिर का इतिहास और मान्यता
9 Aug, 2025 08:32 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विंध्य पर्वत पर मां अष्टभुजा का मंदिर स्थित है. इस मंदिर का जुड़ाव भगवान श्रीकृष्ण है. ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के वक्त यशोदा के यहां मां अष्टभुजा ने जन्म लिया था. जब कंश ने मां को पटककर मारने की कोशिश की तो माँ उनके हाथों से छूटकर आकाश मार्ग से विंध्य पर्वत पर आ गई. मां को महासरस्वती का रूप माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि यहां दर्शन से हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है और तैयारी करने वाले छात्रों की मनोरथ सिद्ध होती है.
पं. अनुपम महराज ने लोकल 18 से बताया कि मां अष्टभुजा का विग्रह बेहद ही दिव्य व अलौकिक है. मां महासरस्वती की अवतार है. विंध्य पर्वत के सिर पर मां विराजमान है. मां अष्टभुजा आठ भुजाओं वाली दुर्गा का स्वरूप है. मां का जो महात्मय है, उसमें सरस्वती का अवतार माना जाता है. मां अष्टभुजा का जुड़ाव भगवान कृष्ण से है. जब वासुदेव बड़े परेशान हुए कि मेरे सात संतान समाप्त हो गई और मेरी आठवीं संतान जो कि कंश का विनाश का कारक होगा, वह आने वाला है. उसकी रक्षा कैसे होगी. इन्हीं को लेकर वासुदेव ने अपने गुरु गर्गाचार्य का स्मरण किया, जिसके बाद गुरु गर्गाचार्य मिलने के लिए जेल में आए. उन्होंने कहा कि मेरी आठवीं संतान कैसे जीवित रहेगा. इसको लेकर उपाय बताए.
भगवती का किया अनुष्ठान
पं. अनुपम महराज ने बताया कि गर्गाचार्य ने वासुदेव से कहा कि मुझे विंध्याचल जाना होगा और भगवती की उपासना करनी होगी, तब आठवीं संतान जीवित रहेगा. गर्गाचार्य ने वासुदेव से संकल्प लेकर विंध्याचल आएं और भगवती का पूजन किया, जिसके बाद मां प्रकट हुई और कहा कि मैं शाहचारणिनी के रुप में आकर कृष्ण की रक्षा करूंगी. कहा कि मैं नंद के घर यशोदा के यहां जन्म लुंगी. यह आशीर्वाद गर्गाचार्य ने वासुदेव को बताया और सारे प्रदान बता दिए.
कंश करना चाह रहा था वध
बताया कि जेल में जब कृष्ण का जन्म हुआ तो वासुदेव अपने पुत्र को ले जाकर अपने मित्र नंद के यहां रख दिया और कन्या को लेकर चले आए. जब कंश को पता चला कि वासुदेव को आठवीं संतान पुत्री हुई है तो कंश कारागार में पहुंचे और पुत्री के बाएं पैर को पकड़कर पटकना चाहा तो मां आकाश मार्ग में उड़ गई. उन्होंने कहा कि हे पापी कंश आज के बाद तेरे विनाश के दिन शुरू हो गए हैं. पाप का घड़ा भर गया है और मारने के लिए कृष्ण जन्म ले चुके हैं.
पूरी होती है हर मनोकामना
अनुपम महराज ने बताया कि मां आकाश मार्ग से ज्ञान की बात कहकर उड़कर विंध्य में आकर निवास करने लगी. आज भी मां के बाएं पैर में कंश के उंगलियों के निशान है. ऐसा माना जाता है कि मां का पूजन करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है. हर काम सिद्ध होते हैं. जो भी बच्चे तैयारी कर रहे हैं और सफल नहीं हो पा रहे हैं तो मां का पूजन अर्चन करें. उन्हें निश्चित ही सफलता मिलेगी. यहां पर जो बच्चे बोल नहीं सकते हैं. वह भी पूजन अर्चन करें. ऐसा करने पर उनकी भी हर मनोकामना पूर्ण होती है और मनोरथ सिद्ध होता है.
पत्ता तोड़ते ही हो जाएगी अनहोनी, 1000 साल पुराने इस बरगद को लोगों से चिढ़, छूने से घबराते हैं बड़े-बड़े शूरमा
9 Aug, 2025 07:03 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सुल्तानपुर. हमारा देश कई विविधताओं को समेटे हुए है. यहां कई ऐसी परंपराएं और मान्यताएं रही हैं, जो लोगों को अचंभित कर देती हैं. एक ऐसी ही मान्यता उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में मौजूद बरगद के पेड़ के बारे में है. कहा जाता है कि ये पेड़ 1000 साल पुराना है. इस बरगद की कहानी हैरान करने वाली है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, जो भी इस पेड़ की टहनी या पत्ते तोड़ता है, उसके साथ कोई न कोई अनहोनी होकर रहती है. इसका असल कारण क्या है, आइये जानते हैं.
दिखने में मकड़ी जैसा
स्थानीय निवासी अशोक सिंह लोकल कहते हैं कि सुलतानपुर के देवरहर गांव स्थित बरगद का यह पेड़ मकड़ी के आकार जैसा है. इसकी शाखाएं पेड़ को चारों तरफ से बांध कर रखी हैं. ऐसा लगता है जैसे कई सांप आपस में अठखेलियां कर रहे हैं. इस पेड़ की आकृति कुछ ऐसी है कि यहां पर यदि आप रात में चले जाएं तो आपको डर पक्का लगेगा. बड़ी-बड़ी टहनियां, पेड़ की कई शाखाएं और पेड़ से निकलते लटकन, ऐसे लगते हैं जैसे सांप लोट रहे हों. अशोक बताते हैं कि यह पेड़ काफी पुराना है. यहां जब भुरुचों का कबीला हुआ करता था, ये पेड़ तब का माना जाता है. कुछ लोग इसे 1000 साल पुराना मानते हैं.
मुख्य पुजारी आचार्य प्रशांत उपाध्याय के अनुसार, बरगद का ये पेड़ बाबा महेश नाथ धाम प्रांगण में मौजूद है. यह स्थान महाभारत काल में भुरुचों का कबीला हुआ करता था. पुजारी बताते हैं कि मंदिर बनने से पहले जो भी व्यक्ति इस स्थल के आसपास आता और कोई भी सामान या पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाता, उसके साथ 24 घंटे के भीतर कोई अनहोनी जरूर हो जाती थी. इस बरगद की एक ही जड़ में दो पेड़ आपस में जुड़कर निकली हैं. लगता है जैसे जुड़वा भाई हों.
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