धर्म एवं ज्योतिष
बेहद शुभ योग में 31 अगस्त को राधा अष्टमी, इन नियमों का अवश्य करें पालन
25 Aug, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जाता है और इस बार यह शुभ तिथि 31 अगस्त को है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्माष्टमी के 15 दिन बाद इस दिन श्री राधा जी का प्राकट्य हुआ था और राधा रानी को ब्रज, भक्ति और प्रेम की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है. मथुरा, वृंदावन समेत पूरे ब्रज में राधा रानी का विशेष उत्सव मनाया जाता है और झांकियों का आयोजन भी किया जाता है. इस बार राधा अष्टमी पर कई शुभ योग बन रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ जाता है. साथ ही राधा अष्टमी पर कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक माना गया है.
राधाष्टमी का महत्व
श्री राधा जी भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति स्वरूपा और प्रेम की सर्वोच्च प्रतीक हैं. श्रीमद्भागवत एवं पुराणों में कहा गया है कि बिना राधा नाम के कृष्ण का स्मरण अधूरा है, राधा-रमण कृष्ण. इस दिन व्रत-पूजन करने से भक्ति, वैवाहिक सुख, प्रेम और समृद्धि की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि राधाष्टमी का व्रत करने से अविवाहित कन्याओं को योग्य वर प्राप्त होता है. विवाहित स्त्रियों के लिए यह व्रत दांपत्य जीवन में सुख-सौभाग्य देने वाला है. जो भक्त इस दिन श्री राधा-कृष्ण का स्मरण कर कीर्तन करते हैं, उन्हें मोक्ष और दिव्य प्रेम की प्राप्ति होती है.
राधा अष्टमी 31 अगस्त 2025
अष्टमी तिथि का प्रारंभ – 30 अगस्त, रात 10 बजकर 46 मिनट से
अष्टमी तिथि का समापन – 31 अगस्त, देर रात 12 बजकर 57 मिनट तक
उदिया तिथि के चलते हुए राधा अष्टमी का पर्व 31 अगस्त दिन रविवार को मनाया जाएगा.
राधाष्टमी पूजन का समय और योग
राधाष्टमी का पर्व भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को प्रातः 12 बजे के आसपास (मध्यान्ह काल) पूजन के लिए श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इसी समय राधारानी प्रकट हुई थीं. राधाष्टमी पर सिंह राशि में बुध और सूर्य ग्रह के होने से बुधादित्य योग बनेगा. साथ ही सिंह राशि में केतु, सूर्य और बुध के होने से त्रिग्रही योग का भी निर्माण हो रहा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुभ योग में राधा अष्टमी की पूजा अर्चना करने से व्यक्ति को सभी सुखों की प्राप्ति होती है और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है.
राधाष्टमी व्रत के नियम
– प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें और दिनभर सात्त्विक रहकर उपवास करें (फलाहार किया जा सकता है).
– दोपहर के समय में ही श्री राधाजी का पूजन करें और राधा मंत्रों का जप करें.
– राधा-कृष्ण के विग्रह या चित्र को गंगाजल से स्नान कराएं, पुष्प, वस्त्र, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित करें.
– राधा स्तुति, राधा सहस्त्रनाम या राधे राधे जप करना विशेष फलदायी है. व्रत का समापन संध्या या परायण काल में फलाहार से करें.
– राधा अष्टमी के व्रत में अनाज या नमक का सेवन नहीं करना चाहिए. साथ ही जो लोग व्रत नहीं कर रहे हैं, वे भी तामसिक भोजन से दूर रहें.
ग्रहों को चुनौती देने वाला पर्व! दरभंगा राजघराने की अनोखी कहानी
25 Aug, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मिथिलांचल में चौरचन पर्व अपने आप में बेहद खास और महत्वपूर्ण माना जाता है. इस पर विशेष जानकारी देते हुए कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर ज्योतिष विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. कुणाल कुमार झा बताते हैं कि मिथिला धाम में इस पर्व का विशेष महत्व है. दरभंगा राजघराने से इसकी मान्यता जुड़ी है. आइए जानते हैं.
चौरचन पर्व की उत्पत्ति और महत्व
चतुर्थी चंद्र का अन्य माह में दर्शन दोष का कारक का योग बनता है. मिथिला धाम में महेश ठक्कुर, जो दरभंगा के राज परिवार के मूल व्यक्ति थे. उनके पुत्र हेमंत तुंग के कहने से चौठ यानी चौरचन अर्थात चौथ चंद्र का पूजन करने का विधान मिथिलांचल में चलता आ रहा है. यह व्रत गणेश चतुर्थी से प्रसिद्ध है और भाद्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है. चौरचन पर्व में खासकर अस्त के समय में चौठ तिथि का पड़ना आवश्यक होता है.
चौरचन पर्व में चंद्र पूजन का महत्व:
चौरचन पर्व में चंद्र दर्शन और पूजन का विशेष महत्व है. इसमें भाद्र शुक्ल रोहिणी चतुर्थी को चंद्र पूजन करने का विधान है. फल या दही लेकर चंद्रमा का दर्शन किया जाता है और प्रार्थना की जाती है.
चौरचन पर्व का मिथिलांचल में महत्व
चौरचन मिथिलांचल में बहुत महत्वपूर्ण पर्व है. इसी दिन से हर पूजा, व्रत, त्योहार और पर्व का शुभारंभ होता है. यह पर्व मिथिलांचल की संस्कृति और परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे लोग आज भी निभा रहे हैं और यह बहुत खास भी है. दरभंगा राजघराने से इस पर्व की मान्यता जुड़ी है. जिन्होंने ग्रह दोष को भी बदल डाला. इस प्रकार, चौरचन पर्व मिथिलांचल में एक विशेष और महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें चंद्र पूजन का विशेष महत्व है. यह पर्व विभिन्न व्रत और त्योहारों के शुभारंभ का प्रतीक है. दरभंगा राज परिवार में कई ऐसे विद्वान हुए हैं, जिन्होंने समाज के लिए इतिहास रचा है.
भगवान गणेश को क्यों नहीं चढ़ाई जाती तुलसी?
25 Aug, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हर साल गणेश उत्सव बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है, और इस बार 26 अगस्त 2025 से इसकी शुरुआत हो रही है. इस पर्व में भगवान गणेश को मोदक, दुर्वा और तरह-तरह के पकवान अर्पित किए जाते हैं, लेकिन एक चीज है जो उन्हें कभी नहीं चढ़ाई जाती तुलसी का पत्ता. पूर्णिया इसके पीछे एक पौराणिक कथा है जो बताती है कि आखिर क्यों गणेश जी की पूजा में तुलसी वर्जित मानी जाती है.
क्यों गणेश जी ने तुलसी को दिया था श्राप?
धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि एक बार देवी तुलसी तीर्थ यात्रा पर निकली थीं. गंगा किनारे उन्होंने भगवान गणेश को तपस्या में लीन देखा. गणेश जी रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान थे, उनके शरीर पर चंदन लगा था, और वे आभूषणों से सजे हुए थे. गणेश जी के इस दिव्य रूप को देखकर तुलसी उन पर मोहित हो गईं और उनके मन में विवाह की इच्छा जागी.
जानिए क्या है इसकी कहानी
तुलसी ने गणेश जी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, लेकिन गणेश जी ने यह कहकर मना कर दिया कि वह एक ब्रह्मचारी हैं. जब गणेश जी ने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया, तो तुलसी क्रोधित हो गईं और उन्होंने गणेश जी को श्राप दिया कि उनके दो विवाह होंगे. इस पर, गणेश जी को भी गुस्सा आ गया और उन्होंने तुलसी को श्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर शंखचूड़ से होगा. हालांकि, बाद में गणेश जी ने उन्हें यह कहकर राहत दी कि वह भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को बहुत प्रिय होंगी, लेकिन उनकी पूजा में तुलसी का उपयोग कभी नहीं होगा. तब से लेकर आज तक यह मान्यता चली आ रही है कि भगवान गणेश की पूजा में तुलसी का पत्ता कभी भी अर्पित नहीं किया जाता है.
पहली बार रख रही हैं हरितालिका तीज व्रत? सुहागिन हों या कन्याएं
25 Aug, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में हरितालिका तीज व्रत का विशेष महत्व है. इस दिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं. उत्तर भारत के कई राज्यों में यह व्रत बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है. सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, वैवाहिक सुख और परिवार की खुशहाली के लिए यह व्रत रखती हैं, वहीं अविवाहित कन्याएं मनचाहा जीवनसाथी पाने की कामना से इस व्रत का पालन करती हैं. अगर आप पहली बार हरितालिका तीज का व्रत रखने जा रही हैं, तो आपको जानना जरूरी है कि इस दिन पूजा कैसे करनी है और कौन-कौन से नियमों का पालन करना आवश्यक है.
क्यों मनाते हैं हरितालिका तीज
इस बार हरतालिका तीज 26 अगस्त को शुक्ल पक्ष भाद्रपद की तृतीया तिथि में पड़ रही है. पंडित जी ने इस व्रत का महत्व बताते हुए कहा कि पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शंकर को पाने के लिए यह व्रत किया था. पंडित जी ने कथा बताते हुए कहा कि माता पार्वती ने बचपन से ही भगवान शिव को अपना पति मान लिया था और उन्हीं से विवाह करने का संकल्प लिया था, लेकिन हिमालय राज ने उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया. यह जानकर पार्वती जी बहुत व्यथित हो गईं. अपने मन की पीड़ा किसी से साझा न कर पाने पर, वह अपनी सखी की सहायता से घर से निकलकर वन में चली गईं. वहां उन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए गहन तपस्या शुरू की. पार्वती जी ने तप के दौरान भीषण सर्दी, गर्मी और वर्षा के कष्ट सहन किए और अन्न-जल का त्याग कर दिया. उनकी इस अटूट श्रद्धा और कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया.
क्या कन्याएं कर सकती है हरितालिका तीज
आमतौर पर देखा जाता है हरतालिका तीज का व्रत सुहागन महिलाएं करती है, लेकिन पंडित जी ने बताया कि यह व्रत सुहागन महिलाएं वह अविवाहित कन्याए भी कर सकती है. सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र पाने के लिए इस व्रत को करती है तो वहीं कन्याएं अच्छा वर पाने के लिए इस व्रत को करती है.
पहली बार रख रहीं है व्रत तो ये बातें जानना जरूरी
हरितालिका तीज व्रत को सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है, क्योंकि इस दिन महिलाएं जल तक ग्रहण नहीं करतीं. यह निर्जला व्रत होने के कारण हर कोई इसे निभा नहीं पाता. इसलिए जो महिलाएं पहली बार यह व्रत करने जा रही हैं, उन्हें पहले से ही मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार रहना चाहिए. व्रत की शुरुआत सूर्योदय से पहले होती है. महिलाएं स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और भगवान शिव, माता पार्वती व श्री गणेश की पूजा-अर्चना करती हैं. पूजा के समय मूर्तियों का जल, पुष्प, धूप, दीप, चंदन, अक्षत, फल और मिठाई से विधिवत पूजन किया जाता है.
हरितालिका तीज व्रत के नियम
इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, यानी जल सहित कोई भी तरल पदार्थ ग्रहण नहीं किया जाता.
व्रत के दौरान भगवान शिव और माता पार्वती के मंत्रों का जप करना शुभ माना जाता है.
व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद पूजा करने के पश्चात किया जाता है.
पारण से पहले भगवान को भोग अर्पित किया जाता है, फिर महिलाएं जल और फल ग्रहण करती हैं.
पारण के समय ब्राह्मणों को भोजन कराना और दक्षिणा देना अत्यंत शुभ माना गया है.
इस व्रत के दौरान महिलाओं को बुरे विचार, क्रोध और अशुद्ध कर्मों से बचना चाहिए.पंडित जी ने बताया कि इस व्रत में पवित्रता को ज्यादा महत्व दिया जाता है. ऐसे में जो माता, बहने मासिक धर्म में हो उन्हें यह व्रत न करने की सलाह दी जाती है. अगर वह व्रत कर रही है तो पूजा करने से बचें और साफ सफाई का विशेष ध्यान दें.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 25 अगस्त 2025)
25 Aug, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष :- राजकीय सम्मान तथा उच्चपद की प्राप्ति संभव है तथा संतान का सुख अवश्य मिलेगा।
वृष :- धन-स्वास्थ्य लाभ, मित्र-कुटुम्बियों से प्रेम, सहयोग बढ़ेगा तथा रुके कार्य बन जायेंगे।
मिथुन :- उत्तम विचार, भाग्य की उन्नति होगी, मानसिक अशांति, सुख, स्वजनों की कमी में मिलन होगा।
कर्क :- जमीन-जायजाद का लाभ मिलेगा, स्वास्थ्य कष्ट होगा, ध्यान रखें।
सिंह :- दाम्पत्य जीवन में उल्लास, पुत्र का भाग्योदय होगा तथा मौसमी प्रकोप हो सकता है।
कन्या :- दाम्पत्य में आकस्मिक झंझट आयेगा, पड़ोसियों से कष्ट, विवाद बनेगा, द्वोष, विचार रहेगा।
तुला :- भाग्योदय होगा, व्यवसायिक जीवन में उन्नति के लिए एक नया अवसर प्राप्त होगा।
वृश्चिक :- कार्य सिद्ध, स्त्री-पुत्रादि की कमी तथा मन अशांत रहेगा तथा कार्य जीवन सुखी रहेगा।
धनु :- सांसारिक सुखों की प्राप्ति, मित्र मिलाप, आमोद-प्रमोद तथा ब्यौहार में सफलता मिले।
मकर :- शैक्षणिक प्रगति में बाधा होगी, अनावश्यक व्यय से कार्य बनेंगे, क्रोध शांत रखें।
कुम्भ :- चतुराई एवं बैद्धिक विकास तथा अधिकांश प्रयत्नों से निश्य लाभ होगा, ध्यान रखें।
मीन :- विभिन्न रोगों से शरीर पीड़ित रहेगा, संतान शिक्षा से अधिकारी से पीड़ा होगी।
व्रत और पूजा से मिलती है भगवान की कृपा, पति की उम्र और बच्चों की तरक्की में सहायक, शास्त्रों में भी बताया गया है महत्व
24 Aug, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारतीय संस्कृति में व्रत और पूजा का बहुत खास महत्व माना गया है. खासकर जब कोई महिला शादी के बाद अपने पति के घर आती है तो उसका हर धार्मिक काम सिर्फ उसके लिए नहीं होता बल्कि पूरे परिवार के लिए शुभ फल लेकर आता है. चाहे वह एकादशी का व्रत हो, सोमवार का, मंगलवार का, गुरुवार या चतुर्थी का-हर पूजा और उपवास के पीछे गहरी मान्यता जुड़ी होती है. कहा जाता है कि जब कोई स्त्री श्रद्धा से पूजा-पाठ करती है तो उसका असर उसके पति, बच्चों और पूरे परिवार पर पड़ता है. यही वजह है कि पीढ़ियों से महिलाएं घर-परिवार की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करते हुए व्रत-उपवास करती आ रही हैं.
व्रत का उल्लेख स्कंद पुराण में
स्कंद पुराण में साफ तौर पर लिखा है कि जब कोई स्त्री शादी के बाद अपने पति के साथ गृहस्थ जीवन जीती है और व्रत-पूजन करती है तो उसका फल सिर्फ उसे ही नहीं मिलता. उसका पुण्य पति के खाते में भी जुड़ता है. इतना ही नहीं, बेटी और बेटे को भी उस साधना का असर मिलता है. यही कारण है कि हिंदू धर्म में स्त्रियों के व्रत और पूजा को परिवार की नींव का आधार कहा गया है.
स्त्री के व्रत का पति पर असर
कहा जाता है कि जब पत्नी पूरे मन से व्रत करती है तो पति को लंबी आयु, स्वास्थ्य और तरक्की का आशीर्वाद मिलता है. चाहे वह सोमवार का व्रत हो, जो शिवजी को समर्पित है, या फिर गुरुवार का व्रत, जो विष्णु भगवान को माना जाता है-हर व्रत का सीधा असर पति की खुशहाली से जुड़ा हुआ है. यही वजह है कि शादीशुदा महिलाएं अपने पति के लिए उपवास रखना शुभ मानती हैं.
बच्चों पर पड़ता है असर
जब मां कोई व्रत करती है, पूजा-पाठ करती है या किसी देवता की आराधना करती है, तो उसका असर बच्चों पर भी पड़ता है. मां के तप और पुण्य से बच्चों की शिक्षा, करियर और जीवन में आने वाली परेशानियां भी कम हो जाती हैं. यही कारण है कि माता-पिता के पुण्य को संतान का सबसे बड़ा सहारा माना गया है.
परिवार की समृद्धि और सुख-शांति
एक स्त्री का उपवास और पूजा केवल पति-पत्नी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे घर में सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है. घर में सुख-शांति बनी रहती है, विवाद और कलह दूर होते हैं और समृद्धि के रास्ते खुलते हैं. स्कंद पुराण के अनुसार, जब घर की स्त्री ईमानदारी से व्रत करती है तो पूरा परिवार भगवान की कृपा का हकदार बन जाता है.
कब शुरू होगी शारदीय नवरात्रि? क्या है इस बार माता दुर्गा की सवारी?
24 Aug, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व होता है. वैसे तो साल में चार बार नवरात्रि मनाई जाती है,जिसमें दो गुप्त नवरात्रि होती हैं, एक शारदीय नवरात्रि और एक चैत्र नवरात्रि होती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, नवरात्रि के दिनों में माता रानी के विभिन्न स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है. नवरात्रि में लोग अपने घरों में माता दुर्गा की विशाल प्रतिमा की स्थापना करते हैं और बड़े-बड़े दुर्गा पंडाल सजाए जाते हैं. आइए, इस रिपोर्ट में जानते हैं कि शारदीय नवरात्रि कब से शुरू हो रही है, कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त क्या है और माता रानी की सवारी किस पर होंगी.
कि हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन माह की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि प्रारंभ होगी और नवमी तिथि को समापन होगा. इस साल शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 22 सितंबर से होगी और इसी दिन कलश स्थापना भी की जाएगी. 30 सितंबर को महा अष्टमी है और 1 अक्टूबर को महानवमी है. वहीं 2 अक्टूबर को गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाएगा. नवरात्रि में घट स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6:09 से लेकर 8:06 तक रहेगा, जबकि अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:49 से लेकर 12:38 तक रहेगा.
कैसे होता है माता की सवारी का निर्धारण?
पंडित कल्कि राम बताते हैं नवरात्रि के दौरान माता की सवारी दिन के अनुसार तय होती है. अगर नवरात्रि की शरुआत रविवार और सोमवार से होती है तो माता की सवारी हाथी होती है. मंगल और शनि के दिन नवरात्रि की शुरुआत हो रही हो तो माता की सवारी घोड़ा होता है. वहीं गुरु और शुक्रवार को अगर नवरात्रि की शुरुआत हो तो माता की सवारी डोली या पालकी होती है. साल 2025 में नवरात्रि की शुरुआत सोमवार के दिन हो रही है, इसलिए माता की सवारी हाथी होगी.
घर में तुलसी को जल चढ़ाने के नियम: किस दिन चढ़ाएं, किस दिन नहीं, मिलेगा स्वास्थ्य लाभ और दूर होंगी नकारात्मक ऊर्जा
24 Aug, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तुलसी का पौधा भारतीय घरों में सिर्फ सजावट के लिए नहीं बल्कि स्वास्थ्य और आध्यात्मिकता के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इसे भगवान विष्णु की प्रिय और घर में सुख-शांति लाने वाला पौधा कहा जाता है. घर में तुलसी के पौधे की देखभाल करना और उसे सही तरीके से जल देना बहुत जरूरी है, अगर सही समय, सही दिशा और सही तरीके से जल चढ़ाया जाए, तो इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है. इसके साथ ही बीमारियों से बचाव और परिवार में सुख-समृद्धि का वातावरण बनता है. यही कारण है कि हर सुबह तुलसी के पास दीपक जलाने और जल अर्पित करने की परंपरा आज भी कायम है. माना जाता है कि तुलसी का पौधा घर के वास्तु दोष को भी दूर करता है और मानसिक शांति प्रदान करता है. वैज्ञानिक दृष्टि से भी तुलसी के पौधे की पत्तियां और उसकी खुशबू वातावरण को शुद्ध बनाती हैं. इसलिए तुलसी को जल देने के कुछ खास नियम हैं, जिन्हें हर व्यक्ति को जानना चाहिए.
तुलसी में जल चढ़ाने के नियम
1. समय का ध्यान
तुलसी में जल हमेशा सूर्योदय के समय देना चाहिए. सुबह की ताजी हवा और सूर्य की किरणें पौधे के लिए लाभकारी होती हैं और इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है.
2. स्वच्छता और स्नान
तुलसी में जल चढ़ाने से पहले स्नान करना आवश्यक है. बिना नहाए जल चढ़ाने से यह शुभ नहीं माना जाता. यह नियम शुद्धता और सम्मान का प्रतीक है.
3. पात्र का चुनाव
जल चढ़ाने के लिए तांबे या पीतल के लोटे का उपयोग करना शुभ होता है, ये धातु नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में मदद करती हैं और पौधे के लिए भी लाभकारी मानी जाती हैं.
4. जल देने की दिशा
जल हमेशा तुलसी के पौधे की जड़ में देना चाहिए. पत्तों पर सीधे जल डालना सही नहीं माना जाता. जड़ में जल डालने से पौधा स्वस्थ रहता है और उसकी जड़ें मजबूत बनती हैं.
5. सप्ताह का ध्यान
तुलसी में जल रविवार और मंगलवार को नहीं चढ़ाना चाहिए. इन दिनों में जल देने से शुभ प्रभाव कम माना जाता है.
6. स्थान का महत्व
तुलसी का पौधा पूर्व या उत्तर दिशा में रखना सबसे अच्छा माना जाता है. यह दिशा घर में सकारात्मक ऊर्जा लाती है और परिवार में सुख-शांति बढ़ाती है.
7. नियमित देखभाल
पौधे के आसपास की सफाई बनाए रखना जरूरी है. तुलसी के पास गंदगी या कचरा नहीं होना चाहिए. रोज़ाना थोड़ी मिट्टी हटाना और पौधे की जड़ों को हवादार रखना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है.
8. सजावट और प्रेम
तुलसी को सजाने या उसमें जल चढ़ाने का तरीका इस तरह होना चाहिए कि पौधे को चोट न पहुंचे. हमेशा प्यार और सम्मान के साथ जल डालें.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 24 अगस्त 2025)
24 Aug, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष :- यात्रा से लाभ, परिवार से लाभ, कार्य में रुकावट होगी, समय का ध्यान रखें।
वृष :- धार्मिक कार्यों में खर्च होगा, धन का आभाव मन में खेद तथा दुख: अवश्य होगा।
मिथुन :- व्यापारिक योजना बने, शरीर सुख तथा लाभ के कार्य में बाधा होगी।
कर्क :- चिन्ताओं की समाप्ति होगी, नये कार्य-व्यापार से लाभ के कार्य होंगे तथा बाधा बनेगी।
सिंह :- शारीरिक कष्ट, परेशानी, स्त्री से अनवन तथा सामान्य लाभ होगा।
कन्या :- संघर्ष, कार्य व्यापार में अशांति हो, संतान से सुख समाचार मिले।
तुला :- रोग, शरीर व्याधि से कष्ट धन की कमी, घर में कलह होगी, ध्यान दें।
वृश्चिक :- मेहनत से कार्य पूर्ण हों, स्त्री का सहयोग फलदायी होगा, व्यय की वृद्धि होगी।
धनु :- खांसी-जुकाम का प्रभाव रहेगा, स्त्री से मन-मुटाव होगा, ध्यान रखें।
मकर :- व्यापार में सुधार होगा, शत्रुपक्ष से सावधान रहें, स्वास्थ्य ठीक रहेगा।
कुम्भ :- संघर्षपूर्ण स्थिति होगी, लाभ तथा व्यय होगा, समय का ध्यान अवश्य रखें।
मीन :- व्यापार में लाभ, कार्यक्षेत्र में सुधार, भूमि-भवन की खरीद-फरोख्त अवश्य हो|
मां दुर्गा का आगमन हाथी पर! इस नवरात्रि बन रहा है दुर्लभ संयोग
23 Aug, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में नवरात्रि का बेहद खास महत्व होता है. विशेषकर शारदीय नवरात्रि पूरे देश भर में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है. जगह-जगह पूजा पंडाल बनाए जाते हैं और माता दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती है. पूरे 9 दिनों तक मां दुर्गा के नौ रूपों की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. हर साल आश्विन मास की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होती है. इस साल 22 सितंबर से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होने वाली है. माना जाता है कि नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा स्वयं धरती पर वास करती हैं. तो साल 2025 में मां दुर्गा की सवारी क्या रहने वाली है और उसका क्या संकेत है, जानते हैं
क्या कहते हैं ज्योतिषाचार्य
इस साल 22 सितंबर से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होगी और 2 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ इसका समापन होगा. परंपरा के अनुसार, नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा अपनी सवारी पर सवार होकर धरती पर आती हैं. इस शारदीय नवरात्रि में भी वह अपने वाहन से धरती पर पधारेंगी. माता दुर्गा की सवारी भविष्य में होने वाली घटनाओं के संकेत अवश्य देती है.
माता दुर्गा की सवारी क्या रहेगी?
माता दुर्गा की सवारी वार (दिन) के अनुसार तय होती है. रविवार या सोमवार को शुरू होने वाली नवरात्रि में माता दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है. इसका अर्थ है कि इस बार किसानों के लिए समय बेहद शुभ रहने वाला है. हाथी की सवारी वर्षा के अच्छे योग और समृद्धि का संकेत देती है. इस बार की नवरात्रि पूजा विशेष रूप से फलदायी मानी जा रही है.
तीज व्रत रखने वाली महिलाएं ध्यान दें! पूजा की थाली में जरूर रखें ये चीजें, मिलेगा महादेव का विशेष आशीर्वाद
23 Aug, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
26 जुलाई को हरितालिका तीज का त्यौहार है. हरितालिका तीज का व्रत सुहागिन और अविवाहित महिलाएं पूरे विधि-विधान के साथ करती हैं. इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विशेष महत्व होता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर शिव-पार्वती के आशीर्वाद से अखंड सौभाग्य और दांपत्य सुख की कामना करती हैं. मान्यता है कि इस व्रत से पति की दीर्घायु और विवाह योग्य कन्याओं को योग्य वर की प्राप्ति होती है. ऐसे में पूजा की थाली का सुसज्जित होना बहुत आवश्यक माना गया है. इसमें हर वह सामग्री शामिल होनी चाहिए जो देवी-देवताओं को प्रिय हो और पूजा-व्रत को पूर्णता प्रदान करे.
जानिए पूजा की थाली में होनी चाहिए कौन सी चीजें
कि तीज के दौरान पूजा की थाली में सबसे पहले भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या तस्वीर के लिए फूल और माला होनी चाहिए. इसके अलावा बेलपत्र, धतूरा, आकड़े के फूल, चंदन, रोली, अक्षत और गंगाजल भी होना चाहिए. व्रती महिलाएं थाली में लाल-सफेद चुनरी, सुहाग का सामान जैसे सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी और आलता भी लेकर पूजा शुरू करनी चाहिए. उन्होंने बताया कि शिव-पार्वती को अर्पित करने के लिए फल, मौसमी मिठाई, पान के पत्ते और नारियल शामिल करना आवश्यक है. चूंकि यह व्रत निर्जला होता है, इसलिए पूजा की थाली में जल से भरा कलश और दूध-दही-घी जैसे पंचामृत के घटक भी रखे जाते हैं. यह सब सामग्री भगवान को अर्पण कर व्रती महिलाएं अपनी पूजा को संपूर्ण बनाती हैं.
इन चीजों का होना भी है आवश्यक
ज्योतिषाचार्य ने बताया कि हरितालिका तीज की पूजा थाली में दीपक और धूप का होना भी अनिवार्य है, क्योंकि इनके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है. उन्होंने बताया कि इसके साथ ही थाली में एक छोटे पात्र में शहद और शक्कर भी रखना चाहिए, जिसका प्रयोग पंचामृत बनाने में किया जाता है. उन्होंने कहा कि अगर घर में मौसमी फल जैसे केला, अमरूद या सेब उपलब्ध हों तो उन्हें भी थाली में अवश्य रखा जाए. ज्योतिषाचार्य ने बताया कि सुसज्जित पूजा थाली के साथ हरितालिका तीज का व्रत करने से महिलाओं को सुख, सौभाग्य और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है.
भीष्म पितामह कौन थे? गंगा के पुत्र और महाभारत के सबसे धर्मनिष्ठ योद्धा की कथा
23 Aug, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
महाभारत की कथा में कई ऐसे पात्र हैं जिनके बिना यह महाकाव्य अधूरा लगता है. उन्हीं में से एक हैं भीष्म पितामह. महायोद्धा, धर्मनिष्ठ और अटूट प्रतिज्ञा के प्रतीक भीष्म पितामह की कहानी हर किसी को आकर्षित करती है. उनके जन्म से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक घटनाओं की श्रृंखला ऐसी है जो प्रेरणा भी देती है और भावुक भी करती है. भीष्म पितामह का असली नाम देवव्रत था और वे गंगा और हस्तिनापुर के राजा शांतनु के पुत्र थे. उनकी जीवन यात्रा त्याग, कर्तव्य और तपस्या का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि गंगा के कितने पुत्रों में से भीष्म पितामह कौन से थे? आइए जानते हैं ज्योतिषाचार्य रवि पराशर से उनकी जन्म कथा और प्रतिज्ञा से जुड़ी पूरी कहानी.
गंगा और शांतनु का विवाह
पौराणिक कथाओं के अनुसार हस्तिनापुर के राजा शांतनु गंगा से विवाह करना चाहते थे. गंगा ने उनकी इच्छा स्वीकार तो की लेकिन एक शर्त रखी कि राजा उनके किसी भी कार्य पर सवाल नहीं करेंगे. राजा शांतनु ने यह शर्त मान ली और दोनों का विवाह हुआ. विवाह के बाद जब गंगा ने पहला पुत्र जन्मा तो उसे नदी में प्रवाहित कर दिया. राजा शांतनु यह देखकर दुखी हुए, लेकिन उन्होंने वचन निभाया और कुछ नहीं बोले. इसी तरह गंगा ने अपने सात पुत्रों को नदी में बहा दिया.
जब गंगा ने आठवें पुत्र को जन्म दिया और उसे भी नदी में प्रवाहित करने लगीं तो इस बार राजा शांतनु खुद को रोक नहीं पाए और उन्होंने गंगा को रोक दिया. गंगा इस पर नाराज होकर राजा को छोड़कर चली गईं और अपने आठवें पुत्र को लेकर स्वर्ग लोक चली गईं. वही आठवां पुत्र आगे चलकर देवव्रत के नाम से प्रसिद्ध हुआ और इतिहास में भीष्म पितामह के रूप में जाना गया. यानी भीष्म पितामह गंगा के आठवें पुत्र थे.
भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा
देवव्रत ने छोटी उम्र से ही शौर्य, नीति और धर्म का पालन करना सीख लिया था. जब राजा शांतनु ने दूसरी बार विवाह करने की इच्छा जताई तो सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि नई रानी के पुत्र को गद्दी कैसे मिलेगी. उसी समय देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचर्य और सिंहासन न लेने की प्रतिज्ञा कर ली. यह प्रतिज्ञा इतनी कठोर और असाधारण थी कि उन्हें उसी दिन से भीष्म कहा जाने लगा.
भीष्म का महत्व
महाभारत की कथा में भीष्म पितामह का स्थान बेहद ऊंचा है. वे न सिर्फ एक महान योद्धा थे बल्कि धर्म और नीति के सबसे बड़े ज्ञाता भी माने जाते हैं. कुरुक्षेत्र के युद्ध में उन्होंने कौरवों की तरफ से सेनापति की भूमिका निभाई, लेकिन जीवन के अंत समय में उन्होंने पांडवों को नीति और धर्म से जुड़े उपदेश दिए. उनकी मृत्युशैया पर दिए गए विचार आज भी लोगों के लिए मार्गदर्शन का काम करते हैं.
क्या कुंवारी कन्या रख सकती हैं हरतालिका तीज का व्रत?
23 Aug, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में महिलाओं के लिए कई ऐसे व्रत हैं जो अखंड सौभाग्य की कामना से रखे जाते हैं. जैसे हरियाली तीज, कजरी तीज और करवाचौथ, ये सभी व्रत सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु और सुखमय वैवाहिक जीवन की कामना के लिए रखती हैं. इन सभी व्रतों में हरतालिका तीज के व्रत को सबसे कठिन माना जाता है. ऐसे में बहुत सी कुंवारी कन्याओं के मन में विचार आता है कि इस व्रत को कर सकती हैं या नहीं?
कब मनाई जाएगी हरतालिका तीज?
वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 25 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 34 मिनट के लगभग पर प्रारंभ होगी और 26 अगस्त को दोपहर 01 बजकर 54 मिनट के लगभग पर समाप्त होगी. हरतालिका तीज पूजन का सुबह के समय शुभ मुहूर्त सुबह 05 बजकर 56 मिनट से सुबह 08 बजकर 31 मिनट तक रहेगा.
कुंवारी कन्या को व्रत रखने के लाभ
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह व्रत माता पार्वती और भगवान शिव के मिलन का प्रतीक है. ऐसा माना जाता है कि कुंवारी लड़कियां यदि यह व्रत करती हैं तो उन्हें योग्य जीवनसाथी का आशीर्वाद मिलता है. यह व्रत करने से अच्छे विवाह योग बनते हैं और भविष्य में सुखी दांपत्य जीवन की कामना पूरी होती है.
पहली बार रखने जा रहीं व्रत तो जानें नियम
– हरितालिका तीज के दिन कुंवारी लड़कियां व्रत रखते समय सुबह जल्दी उठकर स्नान करें. फिर, भगवान शिव-पार्वती के समक्ष व्रत का संकल्प लें.
– हरितालिका तीज व्रत को कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, इस व्रत के दिन जल ग्रहण नहीं किया जाता, निर्जला व्रत होने के कारण ही हर कोई इसे नहीं ले पाता, इसलिए अगर आप पहली बार यह व्रत रखने वाली हैं, तो कुछ दिन पहले से ही खुद को मानसिक रूप से तैयार रखें.
– इस व्रत का आरंभ सूर्योदय से पहले होता है, महिलाएं स्नान करके साफ वस्त्र इस दिन धारण करती हैं और भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की विधि-विधान से पूजा करती हैं.
– पूजा के दौरान व्रत लेने वाली महिलाएं भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की मूर्तियों का विधिवत पूजन करती हैं. साथ ही, उन्हें पुष्प, धूप, दीप, चंदन, अक्षत, फल और मिठाई आदि अर्पित करती हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 23 अगस्त 2025)
23 Aug, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष :- आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, दैनिक कार्यगति में सुधार होगा, कार्ययोजना अवश्य बनेगी।
वृष :- समय की अनुकूलता से लाभांवित होंगे, विवादग्रस्त होने से अवश्य बचें।
मिथुन :- मनोबल उत्साह वर्धक होगा, इष्ट मित्र सुखवर्धक रहें, विशेष कार्य अवश्य ही बनेंगे।
कर्क :- स्वास्थ्य हानि से बेचैनी, मानसिक उद्विघ्नता, शरीर क्षमता कमजोर पड़ेगी, ध्यान रखें।
सिंह :- आशानुकूल सफलता का हर्ष, कार्यवृत्ति में सुधार के योग बनेंगे, समय का ध्यान अवश्य रखें।
कन्या :- समय पर सोचे हुए कार्य बनेंगे किन्तु कुछ बाधा व विलम्ब अवश्य होगा।
तुला :- मानसिक क्लेश व अशांति, मनोवृत्ति मलिन रहे तथा विरोधी तत्व परेशान अवश्य करें।
वृश्चिक :- आर्थिक योजना पूर्ण हों, सफलता के साधन जुटायें, कार्य संतोष की चिन्ता होगी।
धनु :- कार्य योजना फलीभूत होगी, आशानुकूल सफलता से हर्ष होगा, रुके कार्य बनेंगे।
मकर :- इष्ट मित्रों से सुख-ऐश्वर्य की प्राप्ति, स्त्री वर्ग से हर्ष, तनाव तथा क्लेश, अशांति बनेगी।
कुम्भ :- मान-प्रतिष्ठा, प्रभुत्व वृद्धि, कार्य कुशलता से संतोष एवं रुके कार्य बनेंगे।
मीन :- दैनिक कार्यगति में सुधार, प्रत्येक कार्य में बाधा उद्विघ्नता अवश्य बनेगी।
जयपुर का प्रसिद्ध गणेश मंदिर, जहां विराजमान हैं दाहिने सूंड वाले गणपति, पहनते हैं स्वर्ण मुकुट, नौलखा हार
22 Aug, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के साथ गणेश उत्सव की शुरुआत हो जाएगी. इस साल गणेश चतुर्थी 27 अगस्त बुधवार को है. देश में विघ्न विनाशक के कई ऐसे मंदिर हैं, जो उनसे जुड़े चमत्कार को बताते हैं. राजस्थान की ‘गुलाबी नगरी’ जयपुर में भी ऐसा ही एक अनोखा मंदिर है, जहां मोती की बूंद जैसी दिखने वाली पहाड़ी पर दाहिने सूंड वाले गणपति विराजमान हैं.
मोती की बूंद जैसी पहाड़ी पर है मंदिर
जयपुर अपनी समृद्ध संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए विश्व प्रसिद्ध है. इस शहर का मोती डूंगरी गणेश मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि पर्यटकों के लिए भी आकर्षण के प्रमुख केंद्रों में से एक है. मोती की बूंद जैसी दिखने वाली पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर भगवान गणेश की दाहिनी सूंड वाली प्राचीन मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है.
मान्यता है कि इस मंदिर में भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है और बाधाओं का भी नाश होता है. गणेश उत्सव के मौके पर मंदिर में श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में भीड़ जुटती है.
18वीं शताब्दी में बना था गणेश मंदिर
राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार, जयपुर में मोती डूंगरी गणेश मंदिर एक पवित्र और प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है. यह मंदिर एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है, जिसे मोती डूंगरी कहा जाता है, क्योंकि यह मोती की बूंद जैसी दिखती है. इस पहाड़ी के चारों ओर जयपुर शहर बसा हुआ है. 18वीं शताब्दी में सेठ जय राम पालीवाल ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था.
मोती डूंगरी गणेश मंदिर की कथा
मंदिर के बारे में एक रोचक कथा भी मिलती है. किंवदंती है कि मेवाड़ के राजा एक लंबी यात्रा के बाद बैलगाड़ी में गणेश जी की विशाल मूर्ति लेकर लौट रहे थे. उन्होंने तय किया कि जहां गाड़ी रुकेगी, वहीं मंदिर बनाया जाएगा. बैलगाड़ी मोती डूंगरी की तलहटी में रुकी और यहीं 1761 में यह भव्य मंदिर स्थापित हुआ. मूर्ति करीब 500 साल पुरानी मानी जाती है, मूर्ति मावली से उदयपुर और फिर जयपुर लाई गई थी.
नागर शैली में संगमरमर से बना मंदिर
मोती डूंगरी गणेश मंदिर की संरचना और डिजाइन नागर शैली में है, जो उत्तर भारत की पारंपरिक मंदिर वास्तुकला है. साथ ही, इसका डिजाइन स्कॉटिश महल से प्रेरित है, जो इसे अनूठा बनाता है. मंदिर में तीन प्रवेश द्वार हैं और सामने कुछ सीढ़ियां हैं, जो भक्तों को गणेश जी की मूर्ति तक ले जाती हैं. इसका निर्माण चूना पत्थर और संगमरमर से हुआ है.
हर बुधवार को लगता है मेला
गणेश भगवान की मूर्ति दाहिनी सूंड वाली है, जिसे बहुत शुभ माना जाता है. हर बुधवार को यहां मेला लगता है और गणेश चतुर्थी जैसे पर्व पर भक्तों की भीड़ उमड़ती है. गणेश चतुर्थी, जो भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को शुरू होती है, मोती डूंगरी मंदिर में धूमधाम से मनाई जाती है. इस दौरान मंदिर को फूलों, रोशनी और झांकियों से सजाया जाता है. गणेश चतुर्थी, नवरात्रि, दीपावली और अन्य त्योहारों पर यहां विशेष आयोजन होते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं.
स्वर्ण मुकुट और नौलखा हार पहनते हैं गणपति
भगवान गणेश को स्वर्ण मुकुट और नौलखा हार पहनाया जाता है, साथ ही पंचामृत अभिषेक होता है. मंदिर में भगवान का मेहंदी से पूजन होता है, जिसे भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है. मान्यता है कि जिन लोगों की शादी होने में बाधा आ रही हो, उनके लिए ये मेहंदी वरदान स्वरुप होती है.
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