धर्म एवं ज्योतिष
हर माता-पिता अपने बच्चों को सिखाएं ये 6 पॉजिटिव मंत्र, बच्चों में बढ़ेगा आत्मविश्वास, हर मुश्किल का करेंगे डटकर सामना
13 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हर माता-पिता अपने बच्चों के लिए सबसे अच्छा चाहते हैं. वे चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ाई में अच्छा करे, आत्मविश्वासी बने और हर चुनौती का डटकर सामना कर सके. लेकिन ये सिर्फ किताबों या क्लासरूम की सीख से नहीं आता. असली शिक्षा तब होती है जब बच्चे के मन और आत्मा को मजबूत बनाया जाए. आज के समय में बच्चे बहुत सी चीजों से गुजरते हैं- कॉम्पिटिशन, सोशल प्रेशर, स्ट्रेस और ओवरथिंकिंग. ऐसे में अगर उन्हें बचपन से कुछ पॉजिटिव मंत्र या छोटे-छोटे आत्मबल देने वाले वाक्य सिखा दिए जाएं, तो वे हर परिस्थिति में खुद को संभालना सीख जाते हैं. ये मंत्र न सिर्फ उनकी सोच को मजबूत बनाते हैं बल्कि उन्हें शांत, केंद्रित और आत्मविश्वासी भी रखते हैं. चलिए जानते हैं वे 6 आसान और असरदार मंत्र जो हर माता-पिता को अपने बच्चों को जरूर सिखाने चाहिए, ताकि वे जीवन की हर मुश्किल का सामना हिम्मत से कर सकें.
1. ॐ – मन को शांत और स्थिर करने वाला मंत्र
‘ॐ’ सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक दिव्य स्पंदन है. बच्चे को रोज सुबह या रात को कुछ मिनट ‘ॐ’ का उच्चारण करने की आदत डालें. इससे उनका मन शांत रहेगा और फोकस बढ़ेगा. ‘ॐ’ बोलते समय सांस पर ध्यान दिलाएं ताकि वे ध्यान और मेडिटेशन दोनों सीख सकें. इससे बच्चे का दिमाग स्थिर होता है और वे डर या गुस्से जैसी भावनाओं को काबू करना सीखते हैं.
2. “ॐ श्री महाकालिकायै नमः” – डर और नेगेटिव एनर्जी को खत्म करने वाला मंत्र
यह मंत्र मां काली को समर्पित है जो शक्ति और साहस का प्रतीक हैं. जब बच्चा यह मंत्र बोलता है, तो उसे लगता है कि कोई मजबूत शक्ति उसकी रक्षा कर रही है. यह विश्वास उसे डर और असुरक्षा से मुक्त करता है. अगर बच्चा अंधेरे में सोने या अकेले रहने से डरता है, तो सोने से पहले यह मंत्र 3 बार दोहराने को कहें. धीरे-धीरे उसका डर खत्म हो जाएगा और आत्मविश्वास बढ़ेगा.
3. महामृत्युंजय मंत्र – चिंता और नकारात्मकता से सुरक्षा का कवच
महामृत्युंजय मंत्र भगवान शिव का है जो मन को साहस और स्थिरता देता है. यह मंत्र किसी भी प्रकार की नकारात्मक सोच, डर या घबराहट को दूर करता है. बच्चों को यह मंत्र धीरे-धीरे एक-एक पंक्ति में सिखाएं और साथ ही उसका अर्थ भी बताएं ताकि वे समझ सकें कि यह सिर्फ शब्द नहीं बल्कि सकारात्मक ऊर्जा है. जब बच्चा इसे रोज सुने या बोलेगा तो उसके मन में आत्मबल बढ़ेगा.
4. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” – भरोसे और संतुलन का मंत्र
यह मंत्र भगवान विष्णु को समर्पित है और यह बच्चों को जीवन में बैलेंस और भरोसा रखना सिखाता है. जब बच्चा किसी चीज को लेकर परेशान या उदास हो, तो उसे यह मंत्र बोलने की आदत डालें. इससे उसे यह एहसास होगा कि हर चीज किसी न किसी कारण से होती है और सब ठीक हो जाएगा. यह मंत्र मन को शांति और सोच को सकारात्मक दिशा देता है.
5. हनुमान चालीसा – साहस और निडरता की पहचान
हनुमान जी शक्ति, साहस और समर्पण के प्रतीक हैं. बच्चों को हनुमान चालीसा धीरे-धीरे याद करवाएं या रोज सुनाएं. इससे उनमें आत्मविश्वास और निडरता आएगी. जब बच्चे डर या मुश्किल में हों, तो हनुमान जी की कहानियां जैसे लंका दहन या संजीवनी पर्वत लाने की कथा सुनाएं. इससे वे समझेंगे कि चाहे कितनी भी मुश्किल क्यों न आए, हिम्मत और विश्वास से हर काम मुमकिन है.
6. सकारात्मक वाक्य (Affirmation) – ‘मैं कर सकता हूं’
हर बच्चा मंत्र नहीं बोल पाता, लेकिन एक आसान अफर्मेशन सिखाना बहुत असरदार होता है. रोज सुबह या रात को उन्हें बोलने को कहें – “मैं निडर हूं, मुझमें आत्मविश्वास है और मैं यह कर सकता हूं.” ये छोटे-छोटे शब्द बच्चे के मन में बड़ा असर छोड़ते हैं. इससे उनमें आत्मविश्वास, साहस और खुद पर भरोसा बढ़ता है. मुश्किल समय में जब कोई डर या हिचकिचाहट हो, तो यही वाक्य उन्हें मजबूत बनाएगा.
बच्चों को सिर्फ पढ़ाई या ग्रेड से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों और सकारात्मक सोच से भी मजबूत बनाया जा सकता है. अगर माता-पिता रोज कुछ मिनट इन मंत्रों या अफर्मेशन्स के लिए बच्चों के साथ बिताएं, तो उनका रिश्ता भी गहरा होगा और बच्चा मानसिक रूप से और अधिक संतुलित बनेगा.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (13 अक्टूबर 2025)
13 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- इष्ट मित्र सुखवर्धक होगा, प्रयास जारी रखें, प्रयत्नशीलता तथा सफलता से लाभ अवश्य होगा।
वृष राशि :- सोचे कार्य समय पर पूर्ण कर लें, कार्य तत्परता से लाभांवित होंगे, सफलता से हर्ष होगा।
मिथुन राशि :- मनोबल उत्सावर्धक होगा, व्यवसायिक क्षमता में वृद्धि होगी, कार्य संतोष रहेगा, मन प्रसन्न रहेगा।
कर्क राशि :- परिश्रम से सफलता मिलेगी, सामर्थ्य के अनुसार प्रयास अवश्य करें, अवसरों का लाभ अवश्य लें।
सिंह राशि :- कार्यवृत्ति में सुधार होगा, चिन्तायें कम होंंगी, सफलता के साधन जुटायेंगे, कार्य समय पर पूर्ण करें।
कन्या राशि :- परिश्रम करने पर भी सफलता दिखाई न दे, स्त्री वर्ग से तनाव व कष्ट होगा, मन में धैर्य रखकर कार्य करें।
तुला राशि :- कुछ लोगों से मेल-मिलाप फलप्रद रहेगा, क्षमता के अनुकूल फल मिलेगा, कार्य बनेंगे ध्यान दें।
वृश्चिक राशि :- स्वास्थ्य नरम रहेगा, चोटादि का भय, मनोबल उत्साहवर्धक रहेगा, कायों को समय पर पूरा करने का प्रयास करें।
धनु राशि :- कार्यकुशलता से संतोष होगा, दैनिक कार्यगति में सुधार होगा, परिश्रम से कार्यों में सफलता मिलेगी।
मकर राशि :- मनोबल उत्सावर्धक रहेगा, मित्र-इष्ट मित्र सहयोगी होंगे, कार्य पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
कुंभ राशि :- कार्य व्यवसाय गति मंद रहेगी, साधन सम्पन्नता अवश्य बनेगी, विशेष अवसरों को हाथ से न जाने दें।
मीन राशि :- विघटनकारी तत्व परेशान करेंगे, मनसिक कष्ट का अनुभव होगा, कार्य बाधा बनेगी, कार्यगति पर ध्यान दें।
रावण की वह खूबसूरत बेटी... जिसे हनुमानजी से पहली नजर में हो गया था प्रेम, चोरी-छुपे की थी राम सेतु बनवाने में मदद
12 Oct, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
रामायण काल से जुड़ीं तमाम ऐसी कथाएं हमारे सामने आती हैं, जिनका जिक्र कम किया जाता है. आपको बता दूं कि, श्रीराम, हुनमानजी और रावण वध से जुड़ी कई कहानियां भारत ही नहीं, दूसरे देशों में भी सुनी-सुनाई जाती हैं. वाल्मीकी रामायण के अलावा भी कई देशों में अलग-अलग रामायण लिखी गई हैं. विदेशों की रामायण में उन लोगों का भी जिक्र है, जो भारत की रामायण में नहीं है. उन्हीं में से एक है रावण की खूबसूरत बेटी. उनमें रावण की बेटी को हनुमानजी से प्रेम होने का उल्लेख किया गया है. वह हनुमान जी से विवाह करना चाहती थी. आज हम बताएंगे कौन-कौन सी रामायण में रावण की बेटी से जुड़ी कहानियां लिखी गई हैं.
कहां की रामायण में रावण की बेटी का जिक्र
वाल्मीकी रामायण के बाद दक्षिण भारत ही नहीं, कई देशों में रामायण को अपने-अपने तरीके से लिखा गया है. इनमें ज्यादातर रामायण में श्रीराम के साथ ही रावण को भी काफी महत्व दिया गया है. इसीलिए श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया, माली, थाईलैंड और कंबोडिया में रावण को भी पूरी अहमियत दी जाती है. रावण की बेटी का उल्लेख भी थाईलैंड की रामकियेन रामायण और कंबोडिया की रामकेर रामायण में किया गया है.
कौन थी रावण की बेटी? (Who is the real daughter of Ravana?)
थाईलैंड और कंबोडिया की रामायण के अनुसार, रावण की बेटी आधी मनुष्य और आधी मछली थी. देखने में वह बेहद सुंदर थी और उसका नाम था सुवर्णमछा, जिसे कुछ लोग सुवर्णमत्स्य के नाम से भी जानते थे. उसको जलपरी भी कहते थे क्योंकि, वह आधी मछली थी. इसके अलावा, उसका शरीर सोने का होने के कारण उसे स्वर्णमछा भी कहा जाता था. बता दें कि थाईलैंड और कंबोडिया रामायण में रावण की बेटी बेहद ही पूजनीय है.
रामकियेन और रामकेर रामायण क्या कहती है?
रामकियेन और रामकेर रामायण के मुताबिक, रावण के तीन पत्नियों से 7 बेटे थे. इनमें पहली पत्नी मंदोदरी से दो बेटे मेघनाद और अक्षय कुमार थे. वहीं, दूसरी पत्नी धन्यमालिनी से अतिकाय और त्रिशिरा नाम के दो बेटे थे. वहीं, तीसरी पत्नी से प्रहस्थ, नरांतक और देवांतक नाम के तीन बेटे थे. दोनों रामायण में बताया गया है कि सात बेटों के अलावा रावण की एक बेटी भी थी, जिसका नाम सुवर्णमछा या सुवर्णमत्स्य था. एक अन्य रामायण ‘अद्भुत रामायण’ में देवी सीता को भी रावण की बेटी बताया गया है.
रावण की बेटी को कैसे हुआ हनुमानजी से प्रेम?
थाईलैंड और कंबोडिया की रामायण के अनुसार, जब वानरसेना की ओर से डाले जाने वाले पत्थर गायब होने लगे तो हनुमानजी ने समुद्र में उतरकर देखा कि आखिर ये चट्टानें जा कहां रही हैं? इस दौरान उन्होंने देखा कि पानी के अंदर रहने वाले लोग पत्थर और चट्टानें उठाकर कहीं ले जा रहे हैं. हनुमानजी ने उनका पीछा किया तो देखा कि एक मत्स्य कन्या उनको इस कार्य के लिए निर्देश दे रही है. कथा में कहा गया है कि सुवर्णमछा ने जैसे ही हनुमानजी को देखा, उनसे प्रेम हो गया. हनुमानजी उसके मन की स्थिति भांप लेते हैं और समुद्रतल पर ले जाकर पूछते हैं कि आप कौन हैं देवी? तब वह बताती हैं कि मैं रावण की बेटी हूं? फिर हनुमानजी उन्हें समझाते हैं कि रावण गलत कार्य कर रहा है. इस पर सुवर्णमछा चट्टानें लौटा देती हैं और चोरी चुपके रामसेतु के निर्माण में मदद कर देती है.
थाईलैंड-कंबोडिया में पूजी जाती सुनहरी मछली?
दशानन रावण की बेटी सुवर्णमत्स्य का शरीर सोने की तरह दमकता था. इसीलिए उनको सुवर्णमछा भी कहा जाता है. इसका शाब्दिक अर्थ होता है, सोने की मछली. इसीलिए थाईलैंड और कंबोडिया में सुनहरी मछली को ठीक उसी तरह से पूजा जाता है.
दक्षिण भारत के 5 प्रसिद्ध भगवान शिव के प्राचीन मंदिर, दर्शन मात्र से ही पूरी होती है इच्छा, कुछ तो सृष्टि के आरंभ से मौजूद
12 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
देशभर में शिव को अलग-अलग रूपों में पूजा जाता है. उत्तर से लेकर दक्षिण में अलग-अलग मान्यताओं के साथ भगवान शिव की पूजा होती है. दक्षिण भारत में शिव मंदिरों की भरमार है, जहां भक्त अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए आते हैं. इनमें कुछ शिव मंदिर तो ज्योतिर्लिंग हैं तो कुछ शिव मंदिर हजारों वर्षा पुराने हैं. ये शिव मंदिर ना केवल अपने चमत्कारों की वजह से प्रसिद्ध हैं बल्कि मंदिर के वास्तुकला के देखने देश विदेश से लाखों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं. आज हम साउथ में स्थापित प्रसिद्ध शिव मंदिरों की जानकारी लेकर आए हैं. आइए जानते हैं दक्षिण भारत के प्रसिद्ध शिव मंदिरों के बारे में…
तमिलनाडु का शोर मंदिर
तमिलनाडु के महाबलीपुरम के पास बंगाल की खाड़ी के तट पर बसे ‘शोर मंदिर’ की गिनती प्राचीन मंदिरों में होती है. माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण पल्लव राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय ने कराया था. इस मंदिर में भगवान शिव के अलावा भगवान विष्णु भी मौजूद हैं. इस मंदिर को महाबलीपुरम मंदिरों के ग्रुप का हिस्सा माना गया है, जिसकी वास्तुकला अनोखी और प्राचीन है. पूरा मंदिर ग्रेनाइट से बना है और यूनेस्को इसे विश्व धरोहर घोषित कर चुका है.
आंध्र प्रदेश का श्रीकालहस्ती मंदिर
आंध्र प्रदेश के तिरुपति के चित्तूर जिले में श्रीकालहस्ती मंदिर है. मंदिर का निर्माण स्वर्णमुखी नदी पर हुआ है. खास बात ये है कि यहां भगवान शिव को वायु तत्व के रूप में पूजा जाता है और कहा जाता है कि मकड़ी, सांप और बिच्छू जैसे जहरीले जीव-जंतु यहां भगवान शिव से मोक्ष लेने आते हैं. माना जाता है कि ये वही स्थल है, जहां पवन देव ने भगवान शिव को अपनी आराधना से खुश किया था. यहां एक अखंड ज्योति भी चलती है, जो कभी नहीं बुझती.
तमिलनाडु का रामनाथस्वामी मंदिर
तमिलनाडु के रामेश्वरम तट के पास रामनाथस्वामी मंदिर है, जो पूरी तरह भगवान शिव को समर्पित है. यह मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. इस मंदिर का इतिहास भगवान राम से जुड़ा है. कहा जाता है कि इसी तट पर भगवान राम ने लंका जाने से पहले मिट्टी का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की थी. रावण के वध के बाद भी प्रायश्चित करने के लिए उन्होंने इसी शिवलिंग की पूजा की थी.
तमिलनाडु का थिल्लई नटराज मंदिर
तमिलनाडु के चिदंबरम में स्थित थिल्लई नटराज मंदिर अपनी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. माना जाता है कि इस मंदिर में भगवान शिव और मां पार्वती के बीच नृत्य की प्रतियोगिता हुई थी. भगवान शिव, जिन्हें नृत्य का देवता नटराज कहा जाता है, ने अपनी कला से मां पार्वती को हार स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया था. भक्तों का मानना है कि यहां मात्र दर्शन से ही भगवान शिव सारी मनोकामना पूरी करते हैं.
तमिलनाडु का अरुणाचलेश्वर मंदिर
तमिलनाडु में तिरुवन्नामलाई जिले में बना अरुणाचलेश्वर मंदिर शिव भक्तों के लिए बहुत खास है. इस मंदिर की वास्तुकला भी हमेशा आकर्षण का केंद्र रही है. माना जाता है कि भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के बीच कौन बड़ा और पूजनीय है, इस मामले को सुलझाते हुए भगवान शिव ने एक स्तंभ का ओर-छोर पता करने के लिए कहा. भगवान विष्णु ने तो हार मान ली लेकिन ब्रह्मा जी ने झूठ बोल दिया. इस स्थिति में भगवान शिव ने ब्रह्मा जी को कभी न पूजे जाने का श्राप दे दिया.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (12 अक्टूबर 2025)
12 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- कुटुम्ब की समस्यायें सुलझेंगी, स्थिति नियंत्रण में रखें, कार्य में असफलता की संभावना है।
वृष राशि :- कारोबार में लाभांवित योजना बनेगी, नवीन कार्य योजनायें बनेंगी, परिश्रम से काम बनेंगे।
मिथुन राशि :- कार्य कुशलता से संतोष एवं स्त्री वर्ग से हर्ष होगा, कार्य-व्यवसाय में तेजी अवश्य ही आयेगी।
कर्क राशि :- धन लाभ होगा, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, कार्य-व्यवसाय पर ध्यान देने से लाभ होगा।
सिंह राशि :- अधिकारियों की उपेक्षा से हानि होगी, मानसिक बेचैनी रहेगी, कार्य में बाधा आयेगी, धैर्य से कार्य करें।
कन्या राशि :- सोचे कार्य परिश्रम से पूर्ण होंगे, कार्य में सफलता मिलेगी, संघर्ष पूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ेगा।
तुला राशि :- समृद्धि के साधन बनेंगे, कार्यक्षमता अनुकूल होगी, अधिकारियों से तनाव बन सकता है, विवाद से बचें।
वृश्चिक राशि :- भाग्य का सितारा साथ देगा, बिगड़े हुये कार्य बनेंगे, समय का उपयोग अवश्य करें, कार्य पूर्ण अवश्य करें।
धनु राशि :- मानसिक क्लेश व मन अशांत रहेगा, धन हाथ सये होकर जाता रहेगा, कार्य अवश्य बनेंगे ध्यान दें।
मकर राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक होगा, इष्ट मित्रों से परेशानी होगी, तटस्थता से कार्य निपटा लें, समय का ध्यान रखें।
कुंभ राशि :- दैनिक कार्यगति अनुकूल होगी, चिन्तायें कम होंगी, तटस्थता से कार्य अवश्य निपटा लें, तनाव से बचें।
मीन राशि :- कार्यगति अनुकूल होगी, सफलता के साधन अवश्य ही जुटायेंगे, समय परिस्थिति का लाभ अवश्य लें।
नीम का पेड़ शुभ क्यों माना जाता है? घर के बाहर लगाने से क्या होंगे लाभ, जानिए इसे लगाने की कौन सी दिशा बेस्ट
11 Oct, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में कई पौधों को पूजनीय माना जाता है. तुलसी, पीपल, बरगद, केला और बेल सबसे प्रमुख हैं. इन पौधों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है और इनकी पूजा विभिन्न त्योहारों और अनुष्ठानों में की जाती है. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि नीम का पौधा भी बहुत शुभ माना जाता है. नीम का पेड़ शनि के दोषों को खत्म कर सकता है.
उन्नाव के ज्योतिषाचार्य ऋषिकांत मिश्र शास्त्री के मुताबिक, नीम कई औषधीय गुणों से भरपूर होने के साथ कई वास्तु दोषों को खत्म करने में अहम भूमिका निभाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि नीम के पेड़ को घर के बाहर सही दिशा में लगाने से घर में बरकत होने लगेगी. आइए जानते हैं आखिर नीम के पेड़ महत्व क्या है और घर के बाहर लगाने के फायदे क्या हैं?
हिन्दू धर्म में नीम के पेड़ का विशेष महत्व होता है. घर के बाहर नीम का पेड़ होने से नकारात्मक शक्तियों की हानि होती है. इसके साथ ही यह शनि, राहु-केतु की पीड़ा से भी बचाता है. ऐसे में यदि घर के बाहर सही दिशा में इस पेड़ को लगाते हैं तो घर की बरकत होने लगती है.
घर के बाहर नीम का पेड़ होना बेहद फलदायी माना जाता है. इस पेड़ का सीधा संबंध मंगल ग्रह से होता है. इसके साथ ही केतु और शानि ग्रह भी इससे संबंध रखते हैं. ऐसे में यदि आप नीम का पेड़ लगाना चाहते हैं तो दक्षिण दिशा बेहद शुभ रहेगी. दक्षिण दिशा में नीम का पेड़ लगाने से घर में लंबे समय से रुकी बरकत दोबारा से शुरू हो जाएगी.
हिन्दू धर्म में नीम के पेड़ को नीमाड़ी देवी कहा जाता है. इस पेड़ में देवी का वास होने से इसका पूजन किया जाता है. मान्यता है कि इस पेड़ की लकड़ियों से हवन करने से वास्तु दोष दूर हो जाते हैं. परिवार में सुख-शांति आती है और पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है. इसके अलावा नीम की पत्तियों से घर में धुआं करने से नकारात्मक शक्तियां नष्ट होती है.
नीम के पेड़ का मंगल ग्रह से संबंध होता है. इसके चलते इस पेड़ पर जल अर्पित करने से हनुमान जी प्रसन्न होते हैं, जिसके फलस्वरूप वह मंगल के दुष्प्रभाव के खत्म करते हैं. इसके साथ ही, नीम की माला पहनने से शनि के दोषों को टाला जा सकता है. वहीं, कुंडली में केतु ग्रह शांत करने के लिए नीम की पत्तियां पानी में डालकर स्नान करें. ऐसा करने से आपको कई समस्याओं से छुटकारा मिलता है.
भगवान धन्वंतरि के 5 प्रसिद्ध मंदिर, जहां धनतेरस पर होती है विशेष पूजा, मिलता है आरोग्य का वरदान
11 Oct, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
विष्णु भगवान के रूप भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक माना जाता है. भगवान धन्वंतरि रोगों से मुक्ति दिलाने के लिए जाने जाते हैं, क्योंकि समुंद्र मंथन के समय के वह हाथ में अमृत कलश और जड़ी-बूटियां के साथ अवतरित हुए थे. दक्षिण भारत में भगवान धन्वंतरि को समर्पित कई मंदिर हैं, जहां धनतेरस पर दूर-दूर से भक्त अपनी मन्नत लेकर आते हैं.
धनतेरस पर धन्वंतरि की विशेष पूजा
धनतेरस त्योहार पर भगवान धन्वंतरि की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और आरोग्य होने का वरदान लिया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान धन्वंतरि के सबसे ज्यादा मंदिर दक्षिण भारत में हैं? यहां धनतेरस के दिन भक्त अपने रोगों से मुक्ति पाने के लिए आते हैं.
तिरुमला का धन्वंतरि मंदिर
आंध्र प्रदेश के तिरुमला में धन्वंतरि मंदिर है, जिसे अपनी सकारात्मक ऊर्जा और रोगों से मुक्ति पाने के लिए जाना जाता है. मान्यता है कि यहां विशेष पूजा-अर्चना करने से आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ती है और धन-धान्य का आशीर्वाद भी मिलता है. यहां हर साल धन्वंतरि होमम होता है, जो वहां के पुजारी करते हैं. ये होमम पूरे देश के कल्याण और महामारी से बचाने के लिए होता है.
श्री धन्वंतरि आरोग्य पीठम मंदिर
तमिलनाडु के चेन्नई में प्राचीन श्री धन्वंतरि आरोग्य पीठम मंदिर है, जहां आयुर्वेदिक पूजा का महत्व बहुत ज्यादा है. दूर-दूर से भक्त यहां आकर अपनी बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए भगवान धन्वंतरि को जड़ी-बूटी अर्पित करते हैं. धनतेरस के मौके पर यहां मंदिर में खास पूजा रखी जाती है और मंदिर को फूलों से सजा दिया जाता है.
त्रिशूर धन्वंतरि मंदिर
केरल के वैद्यनाथपुर जिले के त्रिशूर में भी भगवान धन्वंतरि का मंदिर है, जो अपने आप में अनूठा है. इस मंदिर को अपनी पारंपरिक आयुर्वेदिक विरासत के लिए जाना जाता है.
माना जाता है कि धनतेरस के दिन अगर मंदिर में बैठकर पूजा और जाप किया जाए तो सभी रोगों से मुक्ति मिलती है और भक्त को लंबी आयु भी मिलती है. यहां भगवान धन्वंतरि पर खास तौर पर घी और तुलसी के पत्ते अर्पित किए जाते हैं और प्रसाद के तौर पर भी उन्हें खाया जाता है. वहां खास तरह का प्रसाद मुक्कुडी बनता है.
थोट्टुवा धन्वंतरि मंदिर
केरल के थोट्टुवा में भी भगवान धन्वंतरि का मंदिर है. माना जाता है कि इस मंदिर में खुद भगवान धन्वंतरि विराजते हैं और यहां की गई पूजा फलदायी होती है.
धनतेरस के मौके पर भक्त लंबी-लंबी लाइनों में लगकर भगवान के दर्शन करते हैं और प्रसाद स्वरूप प्राकृतिक चीजें अर्पित करते हैं. भक्त यहां अपने परिवार के लिए अनुष्ठान भी कराते हैं.
रंगनाथस्वामी मंदिर
तमिलनाडु का रंगनाथस्वामी मंदिर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का मंदिर है, लेकिन धनतेरस पर यहां धन्वंतरि भगवान की विशेष पूजा-अर्चना होती है और जड़ी-बूटियों से बना प्रसाद अर्पित किया जाता है.
धनतेरस पर ये खास खरीदारी करें, माता लक्ष्मी होंगी प्रसन्न, जानिए कुछ खास टिप्स
11 Oct, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दीपावली का पर्व हिंदू धर्म में बहुत धूमधाम के साथ मनाया जाता है. इसे धन त्रयोदशी भी कहते हैं. इस साल धनतेरस का यह पर्व 18 अक्टूबर को मनाया जाएगा. यह दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा के लिए समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार, धनतेरस के दिन कुछ खास नियमों का पालना करना होता है, जिससे घर में सुख-समृद्धि आती है और मां लक्ष्मी की कृपया होती है. आइए जानते है कि अगर सोने-चांदी खरीदने का बजट नहीं है तो पूरे साल मां लक्ष्मी की कृपा कैसे होगी?
अगर आप भी धनतेरस के दिन सोने-चांदी की खरीदारी नहीं कर पा रहे हैं, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है. धनतेरस के दिन तांबा अथवा पीतल के बर्तन की खरीदारी भी शुभ मानी जाती है. इसके अलावा अगर आपका बजट कम है और आप सोना-चांदी या बर्तन भी नहीं खरीद सकते, तो ऐसी स्थिति में खड़ी धनिया जरूर खरीदनी चाहिए और उससे जुड़े कुछ खास उपाय करने चाहिए. ऐसा करने से कहा जाता है कि माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और धन आगमन के मार्ग भी प्रशस्त होता हैं.
शनिवार को धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा. कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को ही धनतेरस मनाया जाता है. इस दिन माता लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए तमाम सनातन धर्म के अनुयायी सोने-चांदी जैसे आभूषणों की खरीदारी करते हैं. कई ऐसे लोग भी हैं जो इन चीजों की खरीदारी नहीं कर सकते. यदि आप सोना-चांदी नहीं खरीद पा रहे हैं तो उसके स्थान पर तांबा और पीतल के बर्तन खरीदना चाहिए, जो स्वास्थ्य के लिए भी उत्तम माने जाते हैं. ऐसा करने से आरोग्यता का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है.
इसके अलावा आप धनिया भी खरीद सकते हैं. धनिया का संबंध श्रीधर से होता है. धनतेरस के दिन साबुत धनिया खरीदनी चाहिए और पूजन के समय कुछ धनिया भगवती को समर्पित करनी चाहिए. उसके बाद उस धनिया को पीले कपड़े में बांधकर किसी तिजोरी में रख दें. इसके अलावा गोमती चक्र की भी खरीदारी कर सकते हैं, जिन्हें माता लक्ष्मी के भाई के रूप में माना जाता है. भगवती लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए पीले रंग की कौड़ी भी लानी चाहिए. ऐसा करने से माता रानी बेहद प्रसन्न होती हैं.
कार्तिक माह में ये 2 पौधे बना सकते हैं करोड़पति, उज्जैन के आचार्य ने बताया सफलता का राज
11 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हर तिथि और हर वार के साथ-साथ माह का भी विशेष महत्व शास्त्रों में बताया गया है. इन्हीं माह में से कार्तिक महीने को पुराणों में सर्वश्रेष्ठ मास कहा जाता है. कार्तिक मास 8 अक्टूबर से शुरू हुआ और इसका समापन 5 नवंबर को होगा. इस मास में राधा-दामोदर पूजन, शालिग्राम पूजन और विष्णु पूजन का विशेष महत्व है. मान्यता है कि इस महीने सूर्य और चंद्रमा की किरणों का पृथ्वी पर पड़ने वाला प्रभाव मनुष्य के मन-मस्तिष्क को स्वस्थ रखता है. इस महीने में इंसान अपने सभी पापों का नाश कर सभी संकटों को दूर कर सकता है. यही नहीं, कुछ कर्मों को कर धन, सुख, समृद्धि, शांति और निरोगी जीवन को भी प्राप्त किया जा सकता है. पौधों की सेवा मात्र से आप ये सबकुछ पा सकते हैं. तो आइए उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज से जानते हैं कि इस महीने कौन से पौधों की सेवा करनी चाहिए.
हर दिन तुलसी जी की पूजा करने का विशेष महत्व है. सुबह स्नान के बाद तुलसी के पौधे के पास दीप जलाएं और जल अर्पित करें. तुलसी पर लाल या पीला वस्त्र चढ़ाकर तुलसी मंत्र का जाप करें. ‘ॐ तुलस्यै नमः’ मंत्र है. इसके बाद तुलसी पर चंदन, फूल और धूप अर्पित करें. ऐसा करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और पारिवारिक जीवन में शांति आती है, साथ ही मां लक्ष्मी की विशेष कृपा से धन-धान्य में वृद्धि होती है.
आंवले के पेड़ की करें पूजा
आचार्य आनंद भारद्वाज ने दूसरे पौधे के बारे में बताते हुए कहा कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन आंवले के पेड़ की पूजा करना शुभ माना गया है. इस दिन आंवले के वृक्ष के नीचे दीपक जलाकर, जल अर्पित करें और भगवान विष्णु का स्मरण करें. कुछ लोग इस दिन आंवले के पेड़ की परिक्रमा भी करते हैं. मान्यता है कि आंवले की पूजा करने से शरीर में रोगों से रक्षा होती है और मानसिक शांति प्राप्त होती है.
कार्तिक मास के नियम?
इस महीने तामसिक भोजन से परहेज करना चाहिए. अपशब्द नहीं बोलने चाहिए और गलत व्यवहार से बचना चाहिए. तन और मन की स्वच्छता बनाए रखना जरूरी है. इसके साथ ही किसी भी प्रकार के पशु-पक्षी को नुकसान पहुंचाने से भी बचना चाहिए. इस माह में संयम और साधना का विशेष महत्व है, जो जीवन को पवित्रता और शांति प्रदान करती है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (11 अक्टूबर 2025)
11 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- दैनिक व्यवसाय गति में सुधार होगा, योजनायें फलीभूत होंगी, रुके कार्य बनेंगे ध्यान दें।
वृष राशि :- दैनिक क्षमता में वृद्धि होगी, सफलता एवं प्रभुत्व वृद्धि के योग बनेंगे, कार्यगति पर ध्यान अवश्य दें।
मिथुन राशि :- आर्थिक योजना पूर्ण होगी, कार्य क्षमता में वृद्धि के योग बनेंगे, इष्ट मित्र सुखवर्धक होगा।
कर्क राशि :- कार्य व्यवसाय अनुकूल रहेगा, चिन्तायें कम होंगी तथा इष्ट मित्र सुखवर्धक होगा, समय का ध्यान रखें।
सिंह राशि :- धन लाभ होगा, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, कार्यवृत्ति में सुधार होगा, कार्य पर ध्यान दे।
कन्या राशि :- कुछ समस्या सुलझेंगी कुछ पैदा होंगी, समय अनुकूल नहीं सोच-विचार कर कार्य अवश्य करें।
तुला राशि :- कार्य-व्यवसाय क्षमता अनुकूल होगी, आशाओं में कुछ सफलता किन्तु तनाव बनेगा, धैर्य अवश्य रखें।
वृश्चिक राशि :- धन लाभ होगा, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, कुटुम्ब की समस्यायें अवश्य ही सुलझेंगी ध्यान दें।
धनु राशि :- प्रत्येक कार्य में विलम्ब संभव है, धन लाभ होगा, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, कार्य समय पर करें।
मकर राशि :- आरोप व क्लेश संभव है, धन का व्यय होगा किन्तु विशेष सफलता से खुशी होगी, धैर्य के साथ कार्य करें।
कुंभ राशि :- सफलता के साधन जुटायेंगे, सोचे कार्य समय पर पूर्ण होंगे, रुके कार्य परिश्रम से बनेंगे, आलस्य से हानि।
मीन राशि :- किसी तनाव व क्लेश की स्थिति से बचें, अशांति व असमंजस का वातावरण रहेगा, वाद-विवाद से बचें।
क्या द्रौपदी और सीता भी करती थीं करवा चौथ,क्या कहा गया शास्त्रों में इस बारे में
10 Oct, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
10 अक्टूबर को करवाचौथ व्रत है. उत्तर भारत में ये व्रत बड़े पैमाने पर विवाहित महिलाएं रखती हैं. कहा जाता है कि ये व्रत सैकड़ों सालों से रखा जा रहा है. क्या ये मुश्किल व्रत महाभारत काल में द्रौपदी और रामायण काल में सीता भी रखती थीं. आखिर हमारे शास्त्र इस बारे में क्या कहते हैं. हां ये जरूर है कि अर्जुन को लेकर एक बार द्रौपदी ने एक कठिन व्रत जरूर रखा था, जिसकी कथा को करवा चौथ से जोड़ा जाता है.
तो इसका सीधा जवाब होगा – नहीं. आज जो करवा चौथ का व्रत रखा जाता है, उसका उल्लेख ना तो रामायण में है और ना ही महाभारत में लेकिन कुछ कुछ प्राचीन ग्रंथों में ऐसे समानार्थी व्रतों का ज़िक्र ज़रूर मिलता है जिनका स्वरूप करवा चौथ से मिलता-जुलता है. मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, अथवा गृह्यसूत्रों में “करवा चौथ” जैसा व्रत नहीं मिलता.
रामायण और महाभारत क्या कहते हैं
करवा चौथ” नाम से कोई व्रत न तो वेद ना पुराण और ना ही रामायण या महाभारत में मिलता है. यह व्रत लोक परंपरा (लोकायत धर्म) से विकसित हुआ, जो बाद में धर्मशास्त्रों में स्थान पाता गया. “करक चतुर्थी” या “करक व्रत” का उल्लेख कुछ पुराणों जैसे भविष्य पुराण और नारदीय पुराण में मिलता है. इसमें बताया गया है कि स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु के लिए चतुर्थी तिथि पर उपवास रखती हैं – इसे आधुनिक करवा चौथ का ही शुरुआती रूप माना जा सकता है.
वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण या रामचरितमानस – किसी में भी सीता द्वारा “करवा चौथ” या “सौभाग्य हेतु व्रत” रखने का उल्लेख नहीं हुआ है. उत्तरकांड में ये ज़रूर कहा गया है कि सीता ने पति के धर्म के पालन और तपस्या में अटूट निष्ठा रखी – पर उपवास के रूप में करवा चौथ जैसा व्रत नहीं उस दौर में नहीं होता था.
हां उत्तर भारत की कुछ लोककथाओं में ये कहा जाता है कि जब राम वनवास में थे, सीता ने उनकी सुरक्षा के लिए चंद्रमा को अर्घ्य दिया था. लेकिन यह लोक परंपरा है, शास्त्रीय प्रमाण नहीं.
धार्मिक मान्यताएं जरूर हैं कि माता सीता ने भगवान श्रीराम के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था, विशेष रूप से जब वे अशोक वाटिका में थीं. माना जाता है कि उन्होंने पति की लंबी आयु और सुख-संपत्ति के लिए यह व्रत किया था.हालांकि उन्होंने व्रत जरूर किया था लेकिन इसे करवा चौथ नहीं कहा गया.
चिंतित द्रौपदी ने अर्जुन के लिए कौन सा व्रत रखा
महाभारत में एक प्रसिद्ध प्रसंग है. पांडव वनवास में हैं. अर्जुन तपस्या को गए हैं. द्रौपदी चिंतित हैं. तब कृष्ण उन्हें “करक व्रत” करने का सुझाव देते हैं, जिससे पति की सुरक्षा और सफलता होती है. हालांकि यह प्रसंग “महाभारत” के मूल संस्करण में नहीं बल्कि बाद में जोड़े गए “व्रत-खंड या “कथासरित्सागर” जैसी ग्रंथों की लोक कथाओं वाली शृंखला में मिलता है. कहते हैं कि इसी प्रसंग के बाद करवा चौथ की कथा विकसित हुई. जिसमें एक स्त्री अपने पति की रक्षा के लिए चतुर्थी तिथि का व्रत रखती है.
मिट्टी का घड़ा और कृष्ण चतुर्थी
अधिकांश विद्वानों के अनुसार, यह व्रत उत्तर-पश्चिम भारत यानि पंजाब, हरियाणा और राजस्थान की परंपरा से आया है. “करवा” यानि मिट्टी का घड़ा और “चौथ” का मतलब चतुर्थी तिथि. यानि कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी को किया जाने वाला उपवास. कृषि आधारित समाज में, यह समय रबी फसलों की बुवाई से पहले का होता था. तब स्त्रियां पति की दीर्घायु और परिवार की समृद्धि के लिए व्रत रखती थीं. धीरे धीरे यह कथा शृंगार और चांद के दीदार करके व्रत तोड़े जाने से जुड़ गई.
द्रौपदी का ‘करक व्रत’ जो अब करवा चौथ बन गया
आइए जानते हैं कि वो करक व्रत कथा कौन सी है, जिस व्रत को द्रौपदी ने कृष्ण के कहने पर अर्जुन की रक्षा के लिए रखा था., बाद में ये करवा चौथ की कथा के रूप में विकसित हुई. कहा जाता है कि इसी से आधुनिक करवा चौथ की नींव पड़ी.
एक बार पांडव जब वनवास में थे, तो अर्जुन तपस्या करने के लिए हिमालय चले गए. अर्जुन के जाने के बाद द्रौपदी बहुत चिंतित रहने लगीं. क्योंकि वन में पांडवों को तरह-तरह के संकटों और राक्षसों से जूझना पड़ रहा था. द्रौपदी ने मन ही मन भगवान कृष्ण को याद किया. उन्होंने कहा, “हे माधव! मेरे पति संकट में हैं. उनके जीवन की रक्षा कैसे हो, इसका उपाय बताइए.”
भगवान कृष्ण मुस्कराए और बोले, “हे द्रौपदी, तुम्हारी चिंता उचित है.एक प्राचीन व्रत है – करक चतुर्थी व्रत, जिसे यदि श्रद्धा से किया जाए तो पति की आयु बढ़ती है, संकट दूर होते हैं और सौभाग्य अखंड रहता है.” द्रौपदी ने पूछा, “हे माधव, यह व्रत कैसे किया जाता है?” तब कृष्ण ने ये बताया कि ये व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को स्नान करके मिट्टी के घड़े में जल भरकर रखा जाना चाहिए. उसमें गणेशजी तथा चंद्रमा का पूजन कर पति की लंबी उम्र का संकल्प करना चाहिए. फिर रात में चांद को अर्घ्य देकर फिर पानी पीना चाहिए.”
द्रौपदी ने उसी अनुसार व्रत किया. कहा गया कि इस व्रत के चलते अर्जुन की तपस्या सफल हुई. बाद में यही करक व्रत “करवा चौथ” बन गया. कई स्थानों पर यह भी मान्यता है कि माता पार्वती ने पहला करवा चौथ व्रत भगवान शिव के लिए रखा था.
जीवन में कोई भी कष्ट या संकट हो... चतुर्थी की सुबह कर लें गणेशजी के इन 6 मंत्रों का जप, समस्या हो जाएगी दूर!
10 Oct, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
“जीवन है तो परेशानियां भी होंगी” यह सिर्फ कहावत मात्र नहीं, बल्कि जीवन से जुड़ा एक कड़वा सच है. क्योंकि जीवन की निरंतरता, विकास और संघर्ष ही उसे अर्थपूर्ण बनाते हैं. परेशानियां अनुभव देती हैं और हमें सही-गलत के बीच अंतर भी सिखाती हैं. वैसे तो, ये समस्याएं एक समय के बाद कम हो जाती हैं, लेकिन कुछ लोगों की समस्याएं हैं कि मिटने का नाम ही नहीं लेती हैं. अगर आप ऐसे ही लोगों में हैं तो चतुर्थी तिथि की सुबह एक आसान उपाय कर सकते हैं. यह तिथि 10 अक्टूबर को पड़ रही है. अब सवाल है कि आखिर कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि कब है? संकष्टी चतुर्थी पर किसकी पूजा होती है? संकष्टी चतुर्थी पर गणेशजी का पूजा करने के लाभ क्या हैं?
संकष्टी चतुर्थी तिथि का महत्व
ज्योतिषाचार्य के मुताबिक, हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है. यह व्रत विघ्नहर्ता भगवान गणेश को समर्पित है. इस दिन श्रद्धा और भक्ति भाव से गणपति बप्पा की पूजा-अर्चना करने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं. मान्यता है कि जो भी व्यक्ति संकष्टी चतुर्थी के दिन पूरे नियम और विधि-विधान से व्रत रखता है, उसे मनचाहा फल अवश्य मिलता है.
संकष्टी चतुर्थी पर इन मंत्रों के जप से होगा लाभ
ॐ सुमुखाय नम: सुंदर मुख वाले; हमारे मुख पर भी सच्ची भक्ति प्रदान सुंदरता रहे.
ॐ दुर्मुखाय नम: मतलब भक्त को जब कोई आसुरी प्रवृत्ति वाला सताता है तो… भैरव देख दुष्ट घबराएं.
ॐ मोदाय नम: मुदित रहने वाले, प्रसन्न रहने वाले. उनका सुमिरन करने वाले भी प्रसन्न हो जाएं.
ॐ प्रमोदाय नम: प्रमोदाय; दूसरों को भी आनंदित करते हैं. भक्त भी प्रमोदी होता है और अभक्त प्रमादी होता है यानी आलसी. आलसी आदमी को लक्ष्मी छोड़ कर चली जाती है. और जो प्रमादी नहीं होता है, वहां लक्ष्मी स्थायी होती हैं.
ॐ अविघ्नाय नम: यह मंत्र गणेश जी से जीवन की सभी बाधाओं को दूर करने और बिना किसी विघ्न के कार्य सिद्ध करने की प्रार्थना है, ताकि जीवन में शांति और सफलता बनी रहे.
ॐ विघ्नकरत्र्येय नम: यह मंत्र नहीं, बल्कि इसका एक भिन्न रूप लग रहा है. अधिक प्रचलित मंत्र “विघ्नकरत्र्येय” के बजाय “विघ्नहर्त्र्येय” या “विघ्नेश्वराय” हो सकता है, जिसका अर्थ “बाधाओं को दूर करने वाले देवता” होता है.
वृंदावन जा रहे हैं? बांके बिहारी मंदिर की नई व्यवस्था और दर्शन समय जानना न भूलें
10 Oct, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर भक्तों के लिए हमेशा से ही विशेष महत्व रखता है. यह मंदिर सिर्फ धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी बेहद प्रसिद्ध है. हर साल लाखों श्रद्धालु यहां भगवान श्रीकृष्ण के रूप में बांके बिहारी के दर्शन करने आते हैं. अब मंदिर प्रशासन ने दर्शन और आरती का समय बदल दिया है. इसका मतलब है कि भक्त अब पहले की तुलना में लंबे समय तक, करीब पौने तीन घंटे तक, ठाकुर जी के दर्शन कर सकते हैं. यह बदलाव मंदिर प्रबंधन और जिलाधिकारी मथुरा के आदेश के तहत किया गया है, ताकि भक्त आराम से दर्शन कर सकें और मंदिर में भीड़ को नियंत्रित किया जा सके, अगर आप आने वाले दिनों में बांके बिहारी मंदिर जाने का प्लान बना रहे हैं, तो पहले नए समय की जानकारी लेना आपके लिए बेहद जरूरी है. इस तरह आप मंदिर में शांति और भक्ति के साथ ठाकुर जी के दर्शन कर पाएंगे और अनुभव यादगार बन जाएगा.
1. बांके बिहारी मंदिर के दर्शन और आरती का नया समय
30 सितंबर 2025 से मंदिर में दर्शन और आरती का नया शेड्यूल लागू हो गया है. सुबह की प्रातःकालीन सेवा दर्शन सुबह 7 बजे शुरू होगा और श्रृंगार आरती 7:10 बजे होगी. दोपहर की राजभोग आरती 12:25 बजे है, इसके बाद दर्शन दोपहर 12:30 बजे तक खुलेंगे. शाम को मंदिर में सेवा दर्शन शाम 4:15 बजे से शुरू होगा और रात 9:25 बजे शयन आरती होगी. इसके बाद दर्शन रात 9:30 बजे बंद हो जाएंगे.
इस नई व्यवस्था का मकसद भक्तों को बेहतर अनुभव देना और मंदिर के भीतर भीड़ को नियमित करना है. भक्तों से विशेष अनुरोध किया गया है कि वे दर्शन के लिए आने से पहले समय को ध्यान में रखें ताकि किसी प्रकार की असुविधा न हो.
2. मंदिर पहुंचने का तरीका
बांके बिहारी मंदिर वृंदावन, मथुरा जिले में स्थित है. यदि आप बाहर से आ रहे हैं, तो सबसे पहले मथुरा रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड तक पहुंचें, जो मंदिर से लगभग 12 किलोमीटर दूर है. मथुरा से वृंदावन तक ऑटो, टैक्सी, कैब या स्थानीय बसों की सुविधा आसानी से उपलब्ध है. वृंदावन पहुंचने के बाद मंदिर तक पैदल, ई-रिक्शा या तांगे से पहुँचा जा सकता है. सबसे नजदीकी हवाई अड्डा आगरा या दिल्ली में है, इसलिए बाहर से आने वाले लोग हवाई मार्ग से भी आसानी से मंदिर पहुंच सकते हैं.
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3. मंदिर में जाने का सही समय
बांके बिहारी मंदिर का सबसे अच्छा समय विशेष रूप से त्योहारों और उत्सवों के दौरान होता है. होली और जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर की रौनक देखने लायक होती है. इसके अलावा शरद और बसंत ऋतु में मौसम सुहावना रहता है, जिससे भक्त आराम से दर्शन कर सकते हैं. गर्मियों और मानसून में भीड़ और असुविधा अधिक हो सकती है, इसलिए इस समय में आने वाले भक्तों को तैयार रहना चाहिए. सुबह और शाम की आरती के समय दर्शन करना सबसे बेहतर माना जाता है.
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खास बातें ध्यान रखने योग्य
1. मंदिर में प्रवेश करते समय अनुशासन का पालन करना जरूरी है.
2. बड़े समूह में आने पर पहले से योजना बनाना बेहतर होता है.
3. दर्शन के दौरान मोबाइल और कैमरे का प्रयोग सीमित रखा जाता है.
4. मंदिर के आस-पास भोजन और पानी की सुविधा मौजूद है, लेकिन ज्यादा समय मंदिर परिसर में बिताने के लिए खुद तैयार रहें.
करवा चौथ के दिन घर पर यहां जलाएं दीये, वास्तु दोष से मिलेगी मुक्ति, शादीशुदा जीवन भी रहेगा सुखी
10 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पहले नौ दुर्गा, फिर दशहरा और अब करवा चौथ, दिवाली… एक के बाद एक आ रहे त्योहार को लेकर हर राज्य हर जिले में उत्साह बना हुआ है. कल करवा चौथ है. करवा चौथ का व्रत भारतीय परंपरा में सुहागिन महिलाओं के लिए सबसे पवित्र और श्रद्धा से भरा त्योहार माना जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार करवा चौथ का व्रत प्रतिवर्ष कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है. ऐसी स्थिति में साल का यह व्रत 10 अक्टूबर को रखा जाएगा. इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति के लंबी उम्र के लिए व्रत करती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन माता करवा की पूजा आराधना की जाती है. साथ ही लक्ष्मी-गणेश और सूर्य देवता की भी पूजा आराधना करने का विधान है. मगर, क्या आपको पता है कि इस खास दिन अगर आप अपने घर के कुछ स्थानों पर दीए जलाते हैं तो आपको बहुत फायदा होता है. नहीं ना.. तो चलिए आज हम आपको इस खबर में विस्तार से सब बताते हैं.
कि करवा चौथ के दिन मंदिर में घी का दीपक जलाने से कई तरह की सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है. साथ ही नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं. ऐसी स्थिति में करवा चौथ के दिन विधि-विधान पूर्वक पूजा आराधना करने के बाद दीपक जरूर जलाना चाहिए. कुछ खास स्थान पर दीपक जलाने से वास्तु दोष से भी मिलती है.
वहीं, करवा चौथ के दिन रात्रि में चंद्रमा दर्शन के दौरान को दीपक को जरूर जलाना चाहिए. ऐसा करने से व्रत भी सफल होता है और व्रत का पुण्य फल भी प्राप्त होता है. इसके अलावा, अगर आप रसोई घर में भी दीपक जलाकर रखेंगे तो आपको शुभ परिणाम देखने को मिलेंगे. ऐसी स्थिति में रसोई घर के पास अवश्य दीपक जलाना चाहिए. साथ ही घर में धन की कमी नहीं होती है. अगर आप घर की पूर्व दिशा में भी दीपक रख कर चला रहे हैं तो ऐसा करने से वास्तु दोष से भी मुक्ति मिलती है घर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है.
हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे को बहुत पवित्र माना गया है. ऐसी स्थिति में वैसे तो प्रतिदिन तुलसी के पौधे के समक्ष दीपक प्रज्ज्वलित करना चाहिए अगर आप करवा चौथ की शाम को भी तुलसी के पास दीपक जलाते हेतु इसे सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (10 अक्टूबर 2025)
10 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- व्यवसायिक क्षमता अनुकूल रहेगी, किसी तनाव या विवादग्रस्त होने से बचें, कार्य में सावधानी अवश्य रखें।
वृष राशि :- स्त्री वर्ग से भोग-ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी, कार्य संतोषप्रद रहेगा, स्त्री वर्ग से हानि होगी, समय का ध्यान रखें।
मिथुन राशि :- सामाजिक कार्यों में मान-प्रतिष्ठा व प्रभुत्व वृद्धि होगी, कार्य कुशलता से संतोष अवश्य होगा।
कर्क राशि :- कार्य कुशलता से संतोष एवं नवीन कार्य योजना फलप्रद होगी, रुके कार्य परिश्रम से बनेंगे ध्यान अवश्य दें।
सिंह राशि :- मान-प्रतिष्ठा, प्रभुत्व में वृद्धि होगी, अधिकारियों की अपेक्षा से कार्य हानि होगी, कार्यगति पर ध्यान अवश्य दें।
कन्या राशि :- दैनिक कार्यगति में सुधार होगा, तत्परता से रुके कार्य निपटा लें, कार्य बनने से चिन्तामुक्त होंगे।
तुला राशि :- तनाव व अशांति से कष्ट होगा, दुर्घटनाग्रस्त होने से बचें, रुके कार्य समय पर करने का प्रयास अवश्य करें।
वृश्चिक राशि :- स्त्री शरीर सुख, मनोबल उत्साहवर्धक होगा, आपके कार्यों का विरोध होगा, कार्य अवरोध से हानि होगी।
धनु राशि :- स्वाभाव में उद्विघ्नता व क्लेश से मन अशांत रहेगा, तनाव से बचें, कार्य अवरोध होगा, धैर्य अवश्य रखें।
मकर राशि :- सफलता के साधन जुटायेंगे, मनोबल उत्साहवर्धक रहेगा, समय का ध्यान अवश्य रखें, कार्य पर ध्यान दें।
कुंभ राशि :- विशेष कार्य स्थगित रखें, सामाजिक विभ्रम व उद्विघ्नता से बचें, समय परिस्थिति को समझकर आगे बढ़ें।
मीन राशि :- किसी तनाव व क्लेश से बचें, मानसिक उद्विघ्नता का वातावरण बनेगा, परेशानी का अनुभव होगा।
दिशा दर्शन भ्रमण आत्मनिर्भरता का सशक्त माध्यम: मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े
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