धर्म एवं ज्योतिष
दीवाली पूजा के बाद मां लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्ति के साथ क्या करें?
19 Oct, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दीवाली यानी रोशनी, खुशहाली और आस्था का सबसे बड़ा त्योहार. इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है ताकि घर में धन, बुद्धि और समृद्धि का वास बना रहे. लेकिन पूजा के बाद अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है- अब इन मूर्तियों का क्या करें? क्या उन्हें घर में ही रखें या विसर्जित कर दें? दरअसल, इस सवाल का जवाब सिर्फ रीति-रिवाजों से नहीं बल्कि श्रद्धा और भावना से भी जुड़ा है. आइए जानते हैं कि दीवाली 2025 के बाद मां लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्तियों के साथ क्या करना शुभ माना गया है और इसके पीछे की धार्मिक मान्यता क्या कहती है.
दीवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा का महत्व
दीवाली की रात को लक्ष्मी-गणेश पूजा इसलिए की जाती है ताकि घर में धन के साथ बुद्धि और सौभाग्य का आगमन हो. लक्ष्मी जी समृद्धि की प्रतीक हैं, जबकि गणेश जी शुभता और विवेक के प्रतीक. इसलिए इनकी एक साथ पूजा करने से जीवन में सुख, संतुलन और स्थिरता आती है.
दीवाली पूजा के बाद मूर्तियों के साथ क्या करें
1. अगर मूर्तियां टूटी या खराब नहीं हैं
ऐसी मूर्तियां घर के मंदिर में ही रखी जा सकती हैं. इन्हें किसी साफ और ऊंचे स्थान पर स्थापित करें और रोजाना या हर शुक्रवार पूजा करें.
2. अगर मूर्तियां मिट्टी या अस्थायी हैं
तो इन्हें बहते पानी में विसर्जित किया जा सकता है या घर के किसी पवित्र स्थान जैसे तुलसी के पास मिट्टी में दबा सकते हैं. विसर्जन हमेशा श्रद्धा और स्वच्छता के साथ करें.
3. अगर आप नई मूर्तियां लेना चाहते हैं
तो पुरानी मूर्तियों को कपड़े में लपेटकर मंदिर में सुरक्षित रखें. नई मूर्तियां लाने से पहले पुरानी मूर्तियों को प्रणाम करें और भगवान से अनुमति मांगें. विसर्जन के वक्त “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः” मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है.
मूर्तियों की देखभाल कैसे करें
मूर्तियों को कभी जमीन पर न रखें, हमेशा किसी चौकी या आसन पर रखें.
हल्के कपड़े से साफ करें और रोज दीपक जलाएं.
अगर मूर्तियां धातु की हैं, तो उन्हें सूती कपड़े में लपेटकर रखें.
मूर्तियों के आसपास हमेशा स्वच्छता और शांति बनाए रखें.
धार्मिक मान्यता और भावनात्मक जुड़ाव
हिंदू परंपरा के अनुसार, हर मूर्ति भगवान की उपस्थिति का प्रतीक होती है. पूजा के बाद मूर्तियों का सम्मानपूर्वक व्यवहार करना जरूरी है. नई मूर्तियां लाने से पहले पुरानी मूर्तियों को प्रणाम करना और धन्यवाद देना कृतज्ञता का प्रतीक है. यह हमें सिखाता है कि भक्ति केवल पूजा में नहीं, बल्कि आभार व्यक्त करने में भी होती है.
पर्यावरण का ध्यान रखें
अगर मूर्तियां मिट्टी या प्राकृतिक पदार्थों की बनी हैं, तो उनका विसर्जन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना करें. प्लास्टर ऑफ पेरिस या पेंटेड मूर्तियों को पानी में न बहाएं, बल्कि किसी मंदिर या धार्मिक संस्था को सौंप दें.
छोटी दिवाली पर गुरु के गोचर से मेष समेत 6 राशियों के लिए खुलेंगे धन के भंडार, दीपावली से मां लक्ष्मी का रहेगा आशीर्वाद
19 Oct, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
गुरु ग्रह 19 अक्टूबर दिन रविवार को कर्क राशि में गोचर करने वाले हैं. कर्क बृहस्पति की उच्च राशि है और इस राशि में गुरु का आना मेष, मिथुन समेत 6 राशियों के लिए बेहद शुभ रहने वाला है. वैदिक ज्योतिष में गुरु या बृहस्पति के नाम से जाने जाने वाला बृहस्पति ज्ञान, समृद्धि और विस्तार का ग्रह है. यह ज्ञान, आध्यात्मिकता, नैतिकता, धन, भाग्य और उच्च शिक्षा के प्रतीक हैं. बृहस्पति एक ऐसा ग्रह है जो हमें आध्यात्मिकता, धन और ज्ञान की ओर ले जाता है और हमें आत्मज्ञान और आध्यात्मिक विकास की ओर अग्रसर करता है. फिलहाल गुरु अतिचारी अवस्था में हैं, फिर भी इन 6 राशियों पर कृपा करेंगे. इन राशियों को जीवन के हर क्षेत्र में लाभ मिलेगा और सभी कार्यों को सफलतापूर्वक पूरे होंगे. आइए जानते हैं गुरु गोचर से किन किन राशियों को फायदा होने वाला है…
गुरु गोचर का मेष राशि पर प्रभाव
कर्क राशि में बृहस्पति का गोचर मेष राशि वालों के लिए शुभ रहने वाला है, गुरु आपकी राशि के नौवें और बारहवें घर में स्थित हैं. बृहस्पति का चौथे घर में गोचर आपको आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध करेगा और आपको अपनी मां का बहुत मजबूत समर्थन मिलेगा. इस गोचर के दौरान आप अपने सभी भौतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम होंगे. मेष राशि वाले धार्मिक मामलों में सक्रिय रुचि लेंगे और बहुत सारी तीर्थ यात्राएं भी हो सकती हैं. आपके मित्र आपका समर्थन करेंगे और आपको अद्भुत स्थानों पर ले जाएंगे. भाई-बहनों के साथ आपके संबंध और मजबूत होंगे, इससे आपको खुशी मिलेगी. व्यापार में उन्नति के अवसर होंगे. बृहस्पति की आठवें, दसवें और बारहवें घर पर दृष्टि से व्यापार में वृद्धि, वैवाहिक प्रेम में वृद्धि, दोनों पक्षों के संबंधों में सुधार, व्यापार का विस्तार और आय में महत्वपूर्ण वृद्धि की संभावना होगी.
गुरु गोचर का मिथुन राशि पर प्रभाव
गुरु का गोचर मिथुन राशि वालों के लिए कल्याणकारी होने वाला है. गुरु आपके परिवार, वाणी और आय के दूसरे घर में प्रवेश करने वाला है. गुरु का गोचर आपके लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा क्योंकि आपको अपने बच्चों के बारे में अच्छी खबर मिलेगी और आप माता-पिता बनने का सपना पूरा कर सकते हैं. दिवाली का पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा और आप अपने लक्ष्यों को पहचान कर पाएंगे. लाभदायक व्यापार वृद्धि के अवसर मिलेंगे और नौकरी पेशा जातकों की आमदनी बढ़ेगी. आप समुदाय के सम्मानित और शक्तिशाली सदस्यों से मिलेंगे, जिससे आपकी आय बढ़ेगी और सामाजिक प्रगति को बढ़ावा मिलेगा. आप अपने सीखने के लक्ष्यों को प्राप्त करेंगे और सीखने के प्रति अधिक जुनून विकसित करेंगे.
गुरु गोचर का कर्क राशि पर प्रभाव
गुरु आपकी राशि के लग्न भाव अर्थात पहले स्थान पर गोचर करने वाले हैं और यह राशि परिवर्तन आपके लिए शुभ रहेगा. गुरु का पहले घर में गोचर आपको परोपकारी संगठनों को दान करने के लिए प्रेरित करेगा. साथ ही आप आध्यात्मिक तीर्थयात्रा, पूजा, धर्म और अन्य सामाजिक लाभों पर पैसा खर्च करेंगे और आप कई अच्छे कार्य करेंगे. दिवाली पर पूरा परिवार एक साथ रहेगा और धूमधाम से लक्ष्मी पूजन करेंगे. इसके अलावा, यह गोचर आपको मानसिक संतुष्टि देगा और दूसरों से सम्मान प्राप्त करेगा. अगर आप सबसे अधिक प्रयास करेंगे तो आप विदेश यात्रा में सफल होंगे. परिवार की खुशियों के संसाधन बढ़ेंगे. साथ ही पारिवारिक सामंजस्य में सुधार होगा और आप अपने घरेलू स्थिति से अधिक संतुष्ट होंगे. आपको अपने ससुराल वालों से भी अच्छी खबर मिलेगी.
गुरु गोचर का सिंह राशि पर प्रभाव
गुरु का गोचर सिंह राशि वालों के लिए बेहद खास रहने वाला है. गुरु आपकी राशि के 12वें भाव में प्रवेश करने वाले हैं, इस दौरान आपको भाग्य का पूरा साथ मिलेगा. गुरु गोचर से सिंह राशि वालों की आर्थिक कठिनाइयां कम होने लगेंगी और पैसा कमाना आसान हो जाएगा. नौकरी पेशा जातकों को इस दौरान अच्छी सैलरी मिलने लगेगी और ऑफिस में आपका प्रभाव भी बढ़ेगा. खुद का बिजनेस करने वालों को अच्छा फायदा मिलेगा और कमाई के अन्य स्त्रोत के बारे में जानकारी भी मिलेगी. आपको किसी प्रकार की संपत्ति विरासत में मिल सकती है और गुप्त धन की प्राप्ति हो सकती है. इसके अलावा, यह आपके भाई-बहनों के साथ संबंध सुधारने का एक अच्छा मौका है. आपके स्वास्थ्य समस्याओं में सुधार होगा और निर्णय लेने की क्षमता में सुधार होगा.
गुरु गोचर का कुंभ राशि पर प्रभाव
गुरु आपकी राशि से छठवें भाव में गोचर करने वाले हैं और इस दौरान माता लक्ष्मी की कृपा से आपके धन कमाने के अवसर बढ़ेंगे और इच्छाएं पूरी होंगी. पर्सनल व प्रफेशनल लाइफ में बनाई गईं योजनाएं सफल होंगी और आपकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है. आप अपने कार्य में प्रगति कर सकेंगे और अपनी आय बढ़ा सकेंगे, जिससे आप नौकरी बदलने का निर्णय ले सकते हैं. इसके अलावा, आपके बच्चे संस्कृति को अपनाएंगे. छात्रों की बात करें तो शैक्षणिक प्रदर्शन उत्कृष्ट रहेगा और कॉलेज की डिग्री आपको सफलता दिलाने में मदद करेगी. आप धन कमाने की इच्छा रखेंगे.
गुरु गोचर का मीन राशि पर प्रभाव
गुरु आपकी राशि से पांचवे भाव में गोचर करने वाले हैं और इस दौरान आपको हर क्षेत्र में अच्छी सफलता मिलेगी. गुरु के प्रभाव से आपके दिवाली से ही फायदा मिलने शुरू हो जाएंगे. नौकरी पेश जातक इस दौरान बहुत मेहनत करेंगे और कार्यक्षेत्र में अच्छी सफलता प्राप्त कर सकेंगे. आपकी सफलता की संभावनाएं बढ़ेंगी क्योंकि आप अपने काम पर पूरा ध्यान देंगे. अक्टूबर बच्चों के लिए और धन कमाने के लिए अच्छा समय है. लव लाइफ के सफल होने का भी समय होगा. जब बृहस्पति वक्री होकर दिसंबर में चौथे घर में वापस आएगा, तो पारिवारिक मुद्दे और भी खराब हो सकते हैं. पारिवारिक असंतुलन समस्याओं का एक बड़ा कारण हो सकता है और सफल होने के लिए, आपको काम में भी बहुत मेहनत करनी होगी.
गोवर्धन पूजा पर ऐसे करें कृष्ण चालीसा पाठ, छप्पन भोग और मंत्र जाप से कान्हा होंगे प्रसन्न
19 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दिवाली के अगले दिन मनाई जाने वाली गोवर्धन पूजा भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित एक बेहद पवित्र तिथि है. इस दिन भक्त श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र देव के अभिमान को तोड़ने और गोवर्धन पर्वत को उठाकर अपने भक्तों की रक्षा करने की कथा को याद करते हैं. गोवर्धन पूजा को अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें भगवान कृष्ण को तरह-तरह के व्यंजन और प्रसाद अर्पित किए जाते हैं. इस दिन श्रीकृष्ण चालीसा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह न केवल भक्ति को गहरा करता है बल्कि घर में सुख-समृद्धि और सुरक्षा का भी आशीर्वाद लाता है.
कृष्ण चालीसा 40 चौपाइयों से बनी एक भक्तिपूर्ण रचना है, जो भगवान श्रीकृष्ण के जीवन, उनके बालरूप, गोकुल की लीलाओं और अर्जुन को दिए गए ज्ञान का वर्णन करती है. माना जाता है कि जो व्यक्ति गोवर्धन पूजा के दिन चालीसा का पाठ करता है, उसे जीवन में आने वाले संकटों से मुक्ति मिलती है. श्रीकृष्ण को गोवर्धन पूजा के दिन विशेष रूप से प्रसन्न करने के लिए भक्त भोग में 56 प्रकार के व्यंजन यानी छप्पन भोग लगाते हैं और फिर चालीसा का पाठ करते हैं.
श्रीकृष्ण चालीसा
दोहा:
जय यदुनंदन जय जग वंदन, जय वसुदेव देवकी नंदन।
जय यशोदा सुखदायक, नंदलाला नंद के नायक॥
चौपाइयां:
जय जय जय श्रीकृष्ण कन्हैया, भक्त जनन के दुख हरैया।
माखन चोर गिरधारी प्यारे, गोकुल ब्रज के तू रखवारे॥
बालरूप तू मन भाता, मुरली मधुर सदा तू गाता।
राधा संग रास रचावे, प्रेम सुधा सबको पिलावे॥
कंस वध कर जग को तारा, मात-पिता का किया उधारा।
देवकी बंधन छुड़वाया, यशोदा का मन हरषाया॥
गोवर्धन गिरिधर कहलाये, इंद्रदमन अभिमान मिटाये।
व्रज बालों के संकट हरने, लीलाओं से सबको तरने॥
रास रचायो संग गोपी, मुरली की मधुर आलापी।
राधा नाम तेरी पहचान, तेरा रूप सभी में महान॥
कुरुक्षेत्र में गीता बोली, धर्म रक्षा की ली तू डोली।
अर्जुन के मन संशय टारे, कर्म योग का ज्ञान उभारे॥
दीन-दुखी के तू रखवारे, संकट काटे जन के सारे।
भक्तन के तू काज सँवारे, मन की मुरादें सबको दे डाले॥
तू ही ब्रह्मा तू ही शंकर, तू ही विष्णु रूप मनोहर।
अंतहीन तेरा उपकार, तेरा नाम बड़ा आधार॥
जो कोई चालीसा गावे, प्रेम भाव मन में लावे।
उसका हर संकट टल जाये, जीवन में सुख चैन आये॥
माखन मिश्री तुलसी माला, तेरे चरणन की रखे रखवाला।
भक्त तेरा जो मन से ध्यावे, हर संकट से निज छुड़ावे॥
दोहा:
जो जन कृष्ण नाम रटत हैं, मनवांछित फल वे पतत हैं।
श्रीकृष्ण चालीसा जो गावे, भवसागर सो तरि जावे॥
श्रीकृष्ण चालीसा का पाठ भक्त के जीवन से दुख, भय और संकटों को दूर करता है. यह मन को स्थिरता, आत्मिक शांति और दिव्य आनंद प्रदान करती है. गोवर्धन पूजा, जन्माष्टमी या किसी भी शुभ दिन इस चालीसा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (19 अक्टूबर 2025)
19 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- कुछ विघटनकारी तत्व परेशान करेंगे, कुटुम्ब में अशांति का वातावरण बनेगा, समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करें।
वृष राशि :- स्त्री वर्ग की चिन्ता रहेगी, तनाव, क्लेश व अशांति का वातावरण बनेगा, मानसिक उद्विघ्नता बनेगी।
मिथुन राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति बनेगी, मानसिक विभ्रम व उद्विघ्नता का वातारण रहेगा, विरोधी परेशान करेंगे।
कर्क राशि :- भाग्य का सितारा साथ देगा, बिगड़े हुये कार्य अवश्य ही बनेगे, कार्य योजना परिश्रम से पूर्ण होगी।
सिंह राशि :- आशानुकूल सफलता से हर्ष होगा, कार्यवृत्ति में सुधार होगा, परिश्रम से सफलता मिलेगी, कार्य योजना बनेगी।
कन्या राशि :- क्लेश व अशांति से कार्य व्यवसाया में बाधा बनेगी, कार्य-व्यवसाय की गति मंद रहेगी, धैर्य से काम लें।
तुला राशि :- मानसिक उद्विघ्नता रहेगी, स्वास्थ्य नरम रहेगा, धन व्यय होगा, व्यर्थ भ्रमण होगा, ध्यान देने से कार्य बनेंगे।
वृश्चिक राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति से मानसिक बेचैनी रहेगी, व्यर्थ भ्रमण में समय व धन व्यय होगा, सावधान रहें।
धनु राशि :- चिन्तायें कम होंगी, इष्ट मित्र सुखवर्धक होगा, तनाव, क्लेश व अशांति से बचें, धैर्य रखकर कार्य बना लें।
मकर राशि :- धन का व्यर्थ व्यय होगा, चोट-चपेटादि का भय, सतर्कता से कार्य करें, समय को ध्यान में रखकर आगे बढ़ें।
कुंभ राशि :- कार्य कुशलता से संतोष होगा, समृद्धि के योग अवश्य बनेंगे, समय पर कार्य करने से धन लाभ होगा।
मीन राशि :- भाग्य का सितारा मंद रहेगा, तनाव, क्लेश व अशांति से बचें, बने कार्यों में अनावश्यक बाधा बनेगी।
दिवाली पर मां कामाक्षी की निकलेगी पालकी यात्रा, मंदिर में हर कोई नहीं कर सकता दर्शन, जानें कारण
18 Oct, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इस साल दिवाली 20 अक्टूबर सोमवार को है. दिवाली पर माता लक्ष्मी के मंदिर में पूजा की जाती है. देशभर में अलग-अलग मंदिर हैं और सभी की अपनी मान्यता, अलग परंपरा और पौराणिक कथाएं मौजूद हैं. हर मंदिर में पूजन विधि और परंपरा अलग होती है. तमिलनाडु के कांचीपुरम में स्थित मंदिर में दिवाली के दिन विशेष परंपरा को निभाया जाता है, जहां हर कोई मां कामाक्षी के दर्शन नहीं कर सकता है.
दिवाली पर ऐसे लोग नहीं कर सकते दर्शन
कांचीपुरम में श्री कांची कामाक्षी अम्मन मंदिर है, जहां दीपावली के दिन मंदिर की अनोखी छटा देखने को मिलती है. मंदिर को फूलों से सजाकर, मां को स्वर्ण गहनों से सुशोभित करते दक्षिण भारतीय संगीत से मां की आराधना की जाती है. दीपावली के दिन मंदिर में एक खास परंपरा निभाई जाती है.
माना जाता है कि जिस किसी के भी माता-पिता की मृत्यु हो जाती है, या दोनों में से किसी एक की भी मृत्यु हो जाती है, तो वो मंदिर में मां कामाक्षी के दर्शन के लिए नहीं आ सकता है. मृत्यु के एक साल बाद मंदिर में दर्शन करने की परंपरा है, इसलिए मां कामाक्षी खुद घर-घर जाकर भक्तों को आशीर्वाद देती हैं.
दिवाली पर उत्सव के दिन मां कामाक्षी की पालकी यात्रा निकाली जाती है और मां के दर्शन के लिए भक्त अपने घरों से निकलकर बाहर खड़े हो जाते हैं और मां से आशीर्वाद लेते हैं.
एक ही प्रतिमा में दो देवी का वास
श्री कांची कामाक्षी अम्मन शक्तिपीठ मंदिर है, जहां एक ही प्रतिमा में दो माताएं वास करती हैं. माना जाता है कि कामाक्षी मां की एक आंख में लक्ष्मी और दूसरी में सरस्वती विराजमान होती हैं और एक ही प्रतिमा में मां दो रूपों में भक्तों को आशीर्वाद देती हैं.
सिर्फ सिंदूर ही करते हैं अर्पित
भक्त मां के दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं और मनोकामना की पूर्ति के लिए मां के चरणों में सिंदूर अर्पित करते हैं. मां पर सिर्फ सिंदूर ही अर्पित किया जाता है.
मां कामाक्षी की कथा
कहा जाता है कि इस मंदिर में मां लक्ष्मी ने मां कामाक्षी की पूजा की थी. मां लक्ष्मी को कुरूप होने का श्राप भगवान विष्णु ने दिया था. मां लक्ष्मी को उनके कुरूप रूप से मां कामाक्षी ने छुटकारा दिलवाया था. इसके बाद मां लक्ष्मी भी मां कामाक्षी के साथ ही मंदिर में विराजमान हो गईं.
विवाहित पंडित ही करते हैं पूजा
भक्त मां कामाक्षी को माथे से लेकर चरणों तक सिंदूर अर्पित करते हैं. श्री कांची कामाक्षी अम्मन मंदिर में मां कामाक्षी आठ साल की बालिका के रूप में विराजमान हैं, जहां फिर विवाहित पंडित ही उनकी पूजा कर सकते हैं. इसे मां का अब तक का सबसे पवित्र रूप माना गया है.
दिवाली की रात चुपचाप गमले में डाल दें यह 2 रुपए वाली चीज, समृद्धि और सौभाग्य से जुड़ा है यह रहस्य
18 Oct, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
20 अक्टूबर को दीपावली का महापर्व मनाया जाएगा और इस दिन गणेश-लक्ष्मी पूजन किया जाता है. दीपावली का पर्व अमावस्या की रात को मनाया जाता है और इस दिन तंत्र-मंत्र संबंधित चीजें ज्यादा की जाती हैं. दीपावली की रात जब जलते दीप अंधकार मिटाते हैं तो ठीक उसी समय कुछ घरों में एक और परंपरा निभाई जाती है. दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन के बाद मिट्टी के गमले में धनिया के बीज डाले जाते हैं. देखने में साधारण लगने वाली यह रस्म वास्तव में समृद्धि से जुड़ी एक गहरी परंपरा है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, धनिया समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक और यह धन व लाभ को आकर्षित करता है इसलिए दिवाली की रात गमले में धनिया डालने की प्रथा है.
धन और सौभाग्य बढ़ता धनिया
धनिया शब्द ही संस्कृत के धान्यकम् से बना है, जिसका अर्थ ही है अनाज या फसल. चिकित्सा ग्रंथों में इसे अन्न, औषधि और शुभता का प्रतीक माना गया है. धनतेरस के दिन जब लोग नया बर्तन, सोना या झाड़ू खरीदते हैं, उसी दिन धनिया दाना भी खरीदा जाता है. कहा जाता है जैसे धनिया अंकुरित होता है, वैसे ही घर में धन और सौभाग्य बढ़ता है. बीज बोना, विशेषकर शुभ मुहूर्त में जीवन में नई शुरुआत और निरंतरता का प्रतीक है.
धनिया डालना एक प्रतीकात्मक कर्म
दिवाली की रात देवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा के बाद गमले में धनिया डालना एक प्रतीकात्मक कर्म है. मिट्टी धरती मां का प्रतीक है तो बीज संभावना का और अंकुरण उन्नति और शुभ फल का संकेत देता है. इस कर्म को करने से व्यक्ति अपने घर में अन्न, धन और स्वास्थ्य की निरंतरता की कामना करता है. लोकश्रुति के अनुसार जो व्यक्ति दीवाली की रात गमले में धनिया डालकर अगले सुबह जल अर्पित करता है, उसके घर पर धन की धारा बनी रहती है.
धनिया स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा
यह परंपरा सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी सुंदर है. धनिया एक औषधीय पौधा है. यह हवा शुद्ध करता है, शरीर को ठंडक देता है और भोजन का स्वाद बढ़ाता है. मौसम तेजी से बदल रहा है. बदलाव का असर हमारे पाचनतंत्र पर पड़ता है और ऐसे वक्त में ही धनिया की कीमत का अंदाजा लगाया जाता है. धनिया प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्युनिटी) को मजबूत करने, मौसमी बीमारियों से बचाव , पाचन को बेहतर बनाने और त्वचा के लिए लाभकारी होता है. इसमें विटामिन सी, एंटीऑक्सीडेंट और अन्य पोषक तत्व संक्रमण से लड़ने में मदद करते हैं और शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकाल फेंकते हैं.
गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति लेते समय इन बातों का रखें ध्यान, तभी बरसेगा छप्पर फाड़ धन
18 Oct, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
साल 2025 में दीपावली का पर्व 21 अक्टूबर, मंगलवार को मनाया जाएगा, जिसमें एक सप्ताह से भी काम का समय शेष है. दीपावली का त्यौहार हिंदू धर्म के खास पर्वों में से एक है. इस दिन माता लक्ष्मी और गणेश भगवान की पूजा आराधना करने का विधान बताया गया है. इस त्यौहार को कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, दिवाली के दिन माता लक्ष्मी और गणेश भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी नई मूर्ति को स्थापित करके ही पूजा की जाती है. पुरानी मूर्ति को चलते जल में प्रवाहित कर दिया जाता है.
इन बातों का रखें ध्यान
कि दीपावली पर माता लक्ष्मी और गणेश भगवान की पूजा का विशेष महत्त्व होता है. माता लक्ष्मी धन, सुख समृद्धि और भौतिक सुखों को प्रदान करती हैं जबकि भगवान गणेश रिद्धि सिद्धि बुद्धि विवेक ज्ञान आदि देने वाले हैं. कार्तिक अमावस्या यानी दीपावली के दिन माता लक्ष्मी और गणेश भगवान की पुरानी मूर्ति को चलते हुए जल में प्रवाहित किया जाता है जबकि नई मूर्ति को घर में स्थापित करके विधि विधान से पूजा की जाती है. माता लक्ष्मी और गणेश भगवान की मूर्ति खरीदते वक्त कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है. लक्ष्मी और गणेश भगवान की मूर्ति को खरीदते वक्त ध्यान रखें कि उनकी मूर्ति आपस में जुड़ी हुई न हो. माता लक्ष्मी की मूर्ति को अलग लें और भगवान गणेश की मूर्ति को अलग. यदि आप लक्ष्मी गणेश की जुड़ी हुई मूर्ति लेकर आते हैं और दीपावली के दिन पूजा करते हैं तो आपको कोई लाभ/फल नहीं मिलेगा.
नहीं मिलेगा कोई फल
जब माता लक्ष्मी और गणेश भगवान की मूर्ति को खरीदें तो भली भांति जांच कर ले की दोनों मूर्तियां खंडित न हों. यदि आप खंडित मूर्ति लाकर उनकी पूजा पाठ या अर्चना करेंगे तो आपको कोई फल नहीं मिलेगा. मूर्ति को खरीदते वक्त यह भी जांच कर ले की दोनों मूर्तियां मिट्टी की हो. केमिकल युक्त मूर्ति खरीदने पर साधक को कोई लाभ नहीं मिलता है. जब पुरानी मूर्ति को गंगा या चलते हुए जल में प्रवाहित किया जाता हैं तो केमिकल वाली मूर्ति के कारण जल में रहने वाले जीव जंतुओं पर इसका पूरा प्रभाव होता है जबकि मिट्टी की मूर्ति पानी में घुल जाती है.
कौन कहां है, ये भी जरूरी
दिवाली पर लक्ष्मी गणेश की मूर्ति को खरीदते वक्त ध्यान रखें की दिवाली के दिन घर में सुख समृद्धि, धन, रिद्धि सिद्धि और सभी रुके हुए कार्यों में सफलता के लिए पूजा पाठ की जाती है. ऐसे में गणेश भगवान की वह मूर्ति खरीदें जिसमें उनकी सूंड दाएं ओर हो. पंडित श्रीधर शास्त्री के अनुसार, दीपावली पर माता लक्ष्मी और गणेश भगवान की पूजा करने से पहले यह भी ध्यान रखें की गणेश भगवान माता लक्ष्मी के दाएं ओर होने चाहिए. गणेश भगवान माता लक्ष्मी के दत्तक पुत्र हैं और वह दाएं ओर विराजमान होकर ही सभी सुखों को प्रदान करते हैं.
धनतेरस, यम दीपम और शनि त्रयोदशी का विशेष संयोग, जानें पूजन का समय और जानें 13 दीपक का जलाने का महत्व
18 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को देशभर में धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा और यह शुभ तिथि 18 अक्टूबर दिन शनिवार को है. ज्योतिष तथा पुराणों के अनुसार, इस दिन समुद्र मंथन से भगवान विष्णु के अवतार धन्वंतरि अमृत कलश और औषधियां लेकर प्रकट हुए थे इसलिए यह दिन स्वास्थ्य, दीर्घायु और समृद्धि का प्रतीक है. धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि के साथ माता लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा की जाती है. धनतेरस के दिन खरीदी गईं चीजों में 13 गुणा वृद्धि होती है इसलिए इस दिन नया बर्तन, सोना या चांदी खरीदना शुभ माना गया है. आइए जानते हैं धनतेसर की पूजा का समय, महत्व और उपाय…
धनतेरस 2025 पंचांग
द्रिक पंचांग के अनुसार, शनिवार के दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 43 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 29 मिनट तक रहेगा और राहुकाल का समय सुबह 9 बजकर 15 मिनट से शुरू होकर 10 बजकर 40 मिनट तक रहेगा. द्वादशी तिथि का समय 17 अक्टूबर सुबह 11 बजकर 12 मिनट से शुरू होकर 18 अक्टूबर दोपहर 12 बजकर 18 मिनट तक रहेगा. इसके बाद त्रयोदशी शुरू हो जाएगी, जिसके हिसाब से त्रयोदशी मनाई जाएगी.
शनि पूजा का संयोग
इस दिन धनतेरस, यम दीपम और शनि त्रयोदशी का विशेष संयोग बन रहा है. शनि त्रयोदशी का उल्लेख शिव पुराण और स्कंद पुराण दोनों में मिलता है. यह व्रत चंद्र मास की दोनों त्रयोदशी को किया जाता है. प्रदोष व्रत के दिन के अनुसार, इसे सोम प्रदोष, भौम प्रदोष और शनि प्रदोष कहा जाता है, जब यह क्रमशः सोमवार, मंगलवार और शनिवार को पड़ता है. यह व्रत नाना प्रकार के संकट और बाधाओं से मुक्ति दिलाने के लिए किया जाता है.
ग्रह-नक्षत्रों का मिलता है शुभ फल
भगवान शिव शनिदेव के गुरु हैं, इसलिए यह व्रत शनि ग्रह से संबंधित दोषों, कालसर्प दोष और पितृ दोष के निवारण के लिए भी उत्तम माना जाता है. इस व्रत के पालन से भगवान शिव की कृपा से सभी ग्रह दोषों से मुक्ति प्राप्त होती है और शनि देव की कृपा से कर्मबन्धन काटने में मदद मिलती है. इस दिन सूर्यास्त के समय प्रदोष काल में शिवलिंग की पूजा की जाती है और शनि मंत्रों के जाप और तिल, तेल व दान-पुण्य करने का प्रावधान है. यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो शनि की दशा से पीड़ित हैं.
धनतेरस पूजा मुहूर्त 2025
इसी के साथ ही इस दिन धनतेरस भी है. यह पर्व त्रयोदशी तिथि को प्रदोष काल में मनाया जाता है, जो सूर्यास्त के बाद लगभग 2 घंटे 24 मिनट तक रहता है. इस समय स्थिर लग्न, खासकर वृषभ लग्न, में पूजा करना सबसे शुभ माना जाता है, क्योंकि इससे मां लक्ष्मी घर में स्थायी रूप से विराजमान होती हैं.
धनतेरस पर जलाएं 13 दीपक
धनतेरस पर शाम को 13 दीपक जलाकर भगवान कुबेर की पूजा करें. पूजा के दौरान मंत्र ‘यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये धन-धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा’ का जाप करें. 13 कौड़ियां रात में गाड़ने से धन लाभ होता है. घर के अंदर और बाहर 13-13 दीपक जलाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है. मां लक्ष्मी को लौंग अर्पित करने और सफेद वस्तुएं जैसे दूध, चावल या कपड़े दान करने से धन की कमी नहीं होती. किन्नर को दान देना और उनसे सिक्का मांगना भी शुभ है. पेड़ की टहनी लाकर घर में रखने और मंदिर में पौधा लगाने से समृद्धि और सफलता मिलती है. दक्षिणावर्ती शंख में जल छिड़कने से मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
यम दीपक जलाने का महत्व
धनतेरस के दिन संध्या समय यम दीप जलाने की परंपरा है. त्रयोदशी तिथि को घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा में एक दीपक जलाएं. यह दीपक यमराज को समर्पित होता है. मान्यता है कि इससे यमदेव प्रसन्न होते हैं और परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु से रक्षा करते हैं. इस दीपक को जलाते समय दीर्घायु और सुरक्षा की प्रार्थना करें.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (18 अक्टूबर 2025)
18 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- स्त्री वर्ग-संतान से क्लेश व अशांति बनेगी, मनोवृत्ति फलप्रद होगी, कार्य अवश्य ही बनेंगे ध्यान दें।
वृष राशि :- मानसिक उद्विघ्नता से बचें, स्वास्थ्य नरम रहेगा, विरोधियों से परेशानी होगी सावधानी अवश्य रखें।
मिथुन राशि :- विरोधी परेशान करेंगे, आकस्मिक घटना का शिकार होने से बचें, मानसिक विभ्रम व तनाव अवश्य बनेगा।
कर्क राशि :- अधिकारियों के तनाव से बचिये, दैनिक व्यवसायिक गति उत्तम बनेगी, समय को ध्यान में रखकर आगे बढ़ें।
सिंह राशि :- मानसिक बेचैनी से बचें, इष्ट मित्रों से धोका होगा, अनायास विभ्रम होगा, क्लेशप्रद स्थिति से बचें।
कन्या राशि :- विभ्रम व मानसिक अशांति रहेगी, धन हानि होगी, असमंजस की स्थिति रहेगी, धैर्य रखकर कार्य करें।
तुला राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक होगा, व्यवासयिक प्रयत्न सफल होगा, कार्यगति में निरंतरता बनी रहेगी लाभ अवश्य लें।
वृश्चिक राशि :- अग्नि-चोटादि का भय होगा, सतर्कता से कार्य करने पर लाभ होगा, परिश्रम से कार्य पूर्ण होंगे ध्यान दें।
धनु राशि :- विरोधी तत्व परेशान करेंगे, अनायास बाधा बनेगी, शरीर कष्ट से मानसिक वेदना रहेगी, धैर्य अवश्य रखें।
मकर राशि :- परिश्रम करने पर भी सफलता दिखाई न दे, अनायास विभ्रम से कष्ट होगा, कार्यगति पर ध्यान दें।
कुंभ राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति रहेगी, बड़े-बड़े लोगों से मेल-मिलाप होगा, समय स्थिति से लाभांवित होने का प्रयास करें।
मीन राशि :- सतर्कता से कार्य करें, अधिकारियों का समर्थन फलप्रद होगा, कार्यगति अनुकूल होगी, आलस्य से हानि होगी।
मुंबई का महालक्ष्मी मंदिर, भाग्य की देवी के रूप में हैं विराजमान, दिवाली पर एक साथ दर्शन देती हैं त्रिदेवी
17 Oct, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
साल के सबसे बड़े त्योहार दीपावली को आने में कुछ ही दिन बचे हैं और मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए लोगों ने पहले से ही तैयारी शुरू कर दी है. ऐसे मौके पर मां लक्ष्मी के मंदिर में दर्शन करने जाना भी बहुत शुभ माना जाता है क्योंकि उन्हें धन की देवी माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मुंबई में एक प्रसिद्ध महालक्ष्मी का मंदिर है, जहां मां त्रिदेवियों के साथ दर्शन देती हैं? ये मंदिर लोगों का भाग्य बदलने के लिए जाना जाता है.
भाग्य पलटती है माता रानी
दक्षिण मुंबई के समुद्र किनारे मुंबई के भूलाभाई देसाई मार्ग पर मां महालक्ष्मी का मंदिर है, जो अपनी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. माना जाता है कि यहां मांगी मुराद हमेशा पूरी होती है और मां भाग्य का लिखा भी पलट सकती है. दीपावली के दिन मंदिर का नजारा बहुत अद्भुत होता है. दिवाली पर माता का आशीर्वाद लेने के लिए देश विदेश से लाखों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं और मां अपना ममतामयी आशीर्वाद सभी को प्रदान करती हैं.
इस तरह त्रिदेवियों की हुई स्थापना
दीपावली के लिए खास तौर पर भक्त त्रिदेवियों का दर्शन करने के लिए आते हैं. सन 1831 में बने इस मंदिर को लेकर कई लोक-कथाएं प्रचलित हैं. बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण धकजी दादाजी नाम के शख्स ने करवाया था, जिसे मां ने सपने में दर्शन दिए थे. कहा जाता है कि आक्रमणकारियों के हमले से लोगों ने छोटे से मंदिर में स्थापित देवी महाकाली, देवी महासरस्वती और देवी महालक्ष्मी की प्रतिमा को वर्ली खाड़ी में विसर्जित कर दिया था, लेकिन फिर बाद में धकजी दादाजी को मां ने सपने में दर्शन दिए और अपने स्थान के बारे में जानकारी दी. इसके बाद नदी के किनारे पर देवी महाकाली, देवी महासरस्वती और देवी महालक्ष्मी को पुनर्स्थापित किया गया.
माता की एक और कथा
एक और किंवदंती के अनुसार कभी मुंबई शहर में वर्ली और मालाबार हिल को जोड़ने के लिए पुल का निर्माण होना था, लेकिन किसी न किसी वजह से पुल के बनने का काम पूरा नहीं हुआ. तंग आकर पुल को बनाने का काम रोक दिया गया, लेकिन फिर इसी बीच एक कारीगर को मां लक्ष्मी ने दर्शन दिए और बताया कि समुद्र किनारे मेरी प्रतिमा है, पहले उसकी स्थापना करो. सभी लोगों ने मिलकर मंदिर का निर्माण कराया और उसके बाद पुल के निर्माण का काम पूरा हुआ.
एक साथ दर्शन देती हैं त्रिदेवियां
प्रसिद्ध महालक्ष्मी मंदिर का गर्भगृह बहुत सुंदर है, जहां मां लक्ष्मी, मां काली और मां सरस्वती तीनों एक साथ भक्तों को दर्शन देती हैं. मां की प्रतिमा भी हमेशा सोने और चांदी के आभूषणों से लदी रहती है. दीपावली के दिन भाग्य की देवियों के दर्शन के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं और अपनी मनोकामना पूरी करके लौटते हैं.
रमा एकादशी पर करें कौड़ी से जुड़ा यह छोटा-सा उपाय, बदल जाएंगे तारे-सितारे, धन समेत हर समस्या होगी दूर
17 Oct, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि रमा एकादशी है और इस बार यह शुभ तिथि 17 अक्टूबर दिन शुक्रवार को है. रमा एकादशी का व्रत करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है. कार्तिक मास की रमा एकादशी का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यह एकादशी दिवाली से कुछ दिन पहले आती है और इस मास में भगवान विष्णु चार माह की निद्रा के बाद जागृत होते हैं. ज्योतिष शास्त्र में इस दिन का महत्व बताते हुए कुछ खास उपाय भी बताया गया है. एकादशी के दिन इस खास उपाय के करने से धन संबंधित समस्या दूर होगी और भगवान विष्णु का आशीर्वाद भी मिलेगा. आइए जानते हैं रमा एकादशी का महत्व, शुभ योग, पूजा विधि…
रमा एकादशी 2025 पंचांग
द्रिक पंचांग के अनुसार, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 43 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 29 मिनट तक रहेगा और राहुकाल का समय सुबह 10 बजकर 40 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 6 मिनट तक रहेगा. इस दिन सूर्य दोपहर 1 बजकर 54 मिनट से शुरू होकर कन्या राशि में रहेंगे. इसके बाद तुला राशि में गोचर करेंगे और चंद्रमा सिंह राशि में रहेंगे.
रमा एकादशी 17 अक्टूबर
शुक्रवार को रमा एकादशी का समय 16 अक्टूबर सुबह 10 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 17 अक्टूबर सुबह 11 बजकर 12 मिनट तक रहेगा, इसके बाद द्वादशी शुरू हो जाएगा. ऐसे में उदिया तिथि को मानते हुए 17 अक्टूबर को रमा एकादशी का पर्व मनाया जाएगा.
रमा एकादशी 2025 शुभ योग
रमा एकादशी के दिन दो शुभ योग बन रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है. रमा एकादशी के दिन शुक्ल योग और ब्रह्म योग बन रहे हैं, इन शुभ योग में भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करने से सभी कार्य सिद्ध होते हैं और ब्रह्म ज्ञानी की प्राप्ति भी होती है. इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना और दान करने से सभी सुखों की प्राप्ति होती हैं और व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है.
रमा एकादशी का महत्व
ब्रह्म-वैवर्त पुराण में भगवान श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद में रमा एकादशी की महिमा का उल्लेख है. वहीं, पद्म पुराण में इसे अत्यंत शक्तिशाली और पुण्यदायी एकादशी बताया गया है. इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधिवत पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति आती है और धन-संपदा में वृद्धि होती है. यह व्रत आर्थिक तंगी दूर करने और वैवाहिक जीवन में खुशहाली लाने के लिए विशेष रूप से प्रभावी माना गया है.
रमा एकादशी पूजा विधि
रमा एकादशी का व्रत विधि-विधान से करने के लिए ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें. एक चौकी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें और उन्हें फूल, चंदन, और धूप अर्पित करें और तुलसी पत्र और मिठाई का भोग लगाएं और घी का दीपक जलाकर श्रद्धा-भाव से भगवान की आरती करें. जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, या धन दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है. रमा एकादशी का व्रत ना केवल आध्यात्मिक बल्कि भौतिक सुखों को भी प्रदान करता है. इस शुभ दिन पूजा और उपायों से माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करें और अपने जीवन को समृद्ध बनाएं.
रमा एकादशी के दिन करें यह कार्य
रमा एकादशी के दिन पूजा के दौरान लाल कपड़े में पांच कौड़ियां बांधकर माता लक्ष्मी को अर्पित करें और बाद में इसे तिजोरी या पर्स में रखें, इससे धन की कमी दूर होती है. साथ ही वैवाहिक जीवन में सुख के लिए तुलसी माता की पूजा करें और देसी घी का दीपक जलाएं, इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है.
सिर्फ राम की अयोध्या वापसी नहीं, जैन, सिख और बौद्ध इस वजह से मनाते हैं दिवाली
17 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दिवाली या दीपावली उत्सव के बारे में प्रचलित कथा इस त्योहार को भगवान राम के अयोध्या में विजयी वापसी से जोड़ती है. लेकिन प्रकाश के इस त्योहार की उत्पत्ति के बारे में कई परंपराएं और मान्यताएं हैं. हर क्षेत्र में दिवाली मनाने की अपनी एक अलग और दिलचस्प कहानी है. इतिहासकारों के अनुसार दिवाली का सबसे पहला जिक्र वात्स्यायन के कामसूत्र में मिलता है. जिसकी रचना तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व और दूसरी शताब्दी ईस्वी के बीच हुई मानी जाती है. वात्स्यायन ने यक्ष रात्रि का उल्लेख किया है – यक्षों की रात्रि, जिसे घरों, दीवारों और अन्य स्थानों पर पंक्तियों में दीप जलाकर मनाया जाता था. हर्षोल्लास के साथ अलाव जलाए जाते थे. जुआ इस त्योहार का एक महत्वपूर्ण पहलू था.
इस त्योहार को अभी तक दिवाली का नाम नहीं दिया गया था. पौराणिक कथाओं के अनुसार यक्षों का संबंध धन की देवी लक्ष्मी से है. यह बात सही है कि वात्स्यायन ने प्राचीन काल में दिवाली का वर्णन सबसे अधिक प्रभावशाली तरीके से किया था. दिवाली आज केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में फैले हिंदू समुदाय का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण त्योहार है. हालांकि इसकी सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने और इसके उपलक्ष्य में मनाए जाने वाले ‘प्रकाशोत्सव’ से जुड़ी है. यह पर्व वास्तव में भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता का एक संगम है.
कश्मीर ने दिया दिवाली नाम
कश्मीर में लक्ष्मी और दिवाली के बीच एक अलग ही कहानी जुड़ी है. नीलमत पुराण में पहली बार देवी लक्ष्मी का उल्लेख दिवाली के उत्सव के केंद्र में मिलता है. नीलमत पुराण की रचना 500 ईस्वी से 800 ईस्वी के बीच कश्मीर में हुई थी. दिवाली का नाम नीलमत पुराण से ही जुड़ा है. कश्मीरी ग्रंथों में दीपमाला नामक एक त्योहार का उल्लेख है, जिसे सुखसुप्तिका भी कहा जाता है. यह चंद्र कैलेंडर की उसी रात को मनाया जाता था जिस रात आजकल दिवाली मनाई जाती है. नीलमत पुराण के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि को भक्तों को अपने घर पर मिट्टी के दीपक जलाकर देवी लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए. पूजा-अर्चना के बाद लोगों को अपने परिवार और मित्रों के साथ बैठकर भोजन करना चाहिए.
दिवाली का शाब्दिक अर्थ है ‘दीपों की पंक्ति’ (दीप+आवलि) और यह अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई, अज्ञान पर ज्ञान और निराशा पर आशा की विजय का प्रतीक है. यही कारण है कि हिंदू धर्म के अतिरिक्त, जैन धर्म, सिख धर्म और कुछ हद तक बौद्ध धर्म भी इस दिन को अपने-अपने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और आध्यात्मिक आयोजनों के कारण मनाते हैं.
हिंदू धर्म: राम की अयोध्या वापसी
हिंदू धर्म में दिवाली वस्तुतः एक दिन का नहीं बल्कि पांच दिनों का पर्व है, जिसमें धनतेरस से लेकर भाई दूज तक विभिन्न अनुष्ठान शामिल होते हैं. इसमें कई महत्वपूर्ण घटनाएं शामिल हैं, जो इसके बहुआयामी स्वरूप को दर्शाती हैं. राम की अयोध्या वापसी (विजय का उत्सव) सबसे व्यापक रूप से प्रचलित कथा है. त्रेता युग में भगवान राम द्वारा लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करने के बाद वह अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे. अयोध्यावासियों ने उनके आगमन पर घी के दीपक जलाए थे, जिससे अमावस्या की वह काली रात प्रकाश से जगमगा उठी थी. यह कथा बुराई पर धर्म की विजय का प्रतीक है.
देवी लक्ष्मी की पूजा
दिवाली की मुख्य रात को देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है. माना जाता है कि इसी दिन लक्ष्मी समुद्र मंथन से प्रकट हुई थीं. लक्ष्मी धन, समृद्धि, भाग्य और सौंदर्य की देवी हैं, जबकि गणेश को विद्या, बुद्धि और शुभता का देवता माना जाता है. दिवाली की रात व्यापारी समुदाय नए बही-खातों की शुरुआत करता है और लक्ष्मी से समृद्धि का आशीर्वाद मांगता है.
नरकासुर पर कृष्ण की विजय
दिवाली से एक दिन पहले नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) के दिन भगवान कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध किया था, जिसने 16,000 महिलाओं को बंदी बना रखा था. यह कथा भी सत्य की जीत और अत्याचारी शासन के अंत का प्रतीक है.
जैन धर्म: महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस
जैन धर्म के लिए दिवाली का आध्यात्मिक महत्व हिंदू धर्म से भी अधिक है. जैन इसे मुख्य रूप से भगवान महावीर के मोक्ष (निर्वाण) दिवस के रूप में मनाते हैं. माना जाता है कि जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर वर्धमान महावीर को ईसा पूर्व 527 में बिहार के पावापुरी में कार्तिक माह की अमावस्या (दिवाली के दिन) को मोक्ष प्राप्त हुआ था. महावीर ने लगभग 72 वर्ष की आयु में मोक्ष प्राप्त किया. यह मोक्ष उनके जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होने और अनंत ज्ञान (कैवल्य ज्ञान) प्राप्त करने का प्रतीक है.
दिये जलाने का कारण
कथाओं के अनुसार जब महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया तो 18 गणराज्यों के राजाओं और 9 मल्लकियों ने पावापुरी में इकट्ठा होकर यह घोषणा की, “चूंकि ज्ञान का प्रकाश बुझ गया है, हम भौतिक प्रकाश से इसकी भरपाई करेंगे.” जैनियों का मानना है कि महावीर की शिक्षाओं (ज्ञान का प्रकाश) को हमेशा जीवित रखने के लिए दीये जलाए जाते हैं. इसीलिए जैन धर्म में दिवाली को ‘निर्वाण दिवस’ या ‘योग-निरोध दिवस’ के रूप में जाना जाता है. इस दिन जैन मंदिरों में विशेष पूजा, उपवास और स्वाध्याय (धार्मिक ग्रंथों का पाठ) किया जाता है. जैन समुदाय के लिए दिवाली के बाद का दिन (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा) अक्सर उनके नव वर्ष की शुरुआत होती है, जिसे वे वीरांगना संवत कहते हैं.
सिख धर्म: बंदी छोड़ दिवस
सिख धर्म में दिवाली को ‘बंदी छोड़ दिवस’ के नाम से जाना जाता है और इसका संबंध 17वीं शताब्दी के एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाक्रम से है. सिख दिवाली इसलिए मनाते हैं क्योंकि इस दिन छठे गुरु हरगोबिंद सिंह जी को मुगल सम्राट जहांगीर की कैद से रिहा किया गया था. गुरु हरगोबिंद सिंह जी को ग्वालियर के किले में कैद किया गया था. रिहा किए जाने पर गुरु जी ने यह शर्त रखी कि उनके साथ जेल में बंद 52 हिंदू राजाओं को भी रिहा किया जाए. जहांगीर ने एक चाल चली और कहा कि केवल वे ही राजा रिहा हो सकते हैं जो गुरु जी का दामन पकड़कर किले से बाहर निकलेंगे. गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने एक विशेष चोला बनवाया, जिसमें 52 छोर लगे हुए थे. हर राजा ने एक छोर को पकड़ लिया और इस प्रकार वे सभी राजा स्वतंत्रता प्राप्त कर किले से बाहर निकले.
स्वर्ण मंदिर में उत्सव
गुरु जी की अमृतसर वापसी पर लोगों ने पूरे शहर को दीयों से सजाया था और स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर साहिब) को भी रोशनी से जगमगा दिया था. सिखों के लिए यह घटना न्याय की विजय, मानवाधिकारों की रक्षा और गुरु की असाधारण नेतृत्व क्षमता का प्रतीक है. सिख समुदाय इस दिन विशेष रूप से अखंड पाठ और लंगर आयोजित करते हैं.
बौद्ध धर्म: अशोक का धम्म विजय
बौद्ध धर्म में दिवाली का महत्व हिंदू या जैन धर्म जितना मुख्य नहीं है. लेकिन कुछ बौद्ध परंपराओं खासकर नेवारी बौद्धों (नेपाल) और भारतीय उपमहाद्वीप के बौद्धों के लिए इसके अपने ऐतिहासिक संदर्भ हैं. इस पर्व को प्राचीन काल में महान सम्राट अशोक के साथ जोड़ा जाता है. ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने हिंसा त्याग कर बौद्ध धर्म को अपनाया था. कुछ इतिहासकारों का मत है कि कार्तिक मास की अमावस्या के आसपास ही अशोक ने बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को पूरी तरह से अपनाया और पूरे साम्राज्य में उसके प्रचार के लिए दीये जलाकर ‘धम्म विजय’ का उत्सव मनाया. यह उत्सव शांति और करुणा के प्रसार का प्रतीक बन गया.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (17 अक्टूबर 2025)
17 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, संतोष व सफलता के साधन बनेंगे, समय का ध्यान अवश्य रखें।
वृष राशि :- समय आराम से बीतेगा, व्यवसायिक क्षमता व कार्यक्षमता में वृद्धि होगी, परिश्रम से कार्य पूर्ण होंगे।
मिथुन राशि :- अधिकारियों का समर्थन फलप्रद होगा, इष्ट मित्रों से परेशानी अशांति का कारण बनेगी, धैर्य रखें।
कर्क राशि :- इष्ट मित्र सुखवर्धक होगा, कुटुम्ब की समस्याओं में समय बीतेगा, धैर्य रखकर कार्य अवश्य बना लें।
सिंह राशि :- प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी, बड़े लोगों से मेल-मिलाप हर्षप्रद होगा, समय व सुविधा के अनुसार कार्य बना लें।
कन्या राशि :- मान-प्रतिष्ठा, प्रभुत्व वृद्धि होगी, कार्यक्षमता बढ़ेगी, समाज में प्रतिष्ठा के योग बनेंगे, लाभ होगा।
तुला राशि :- मान-प्रतिष्ठा व प्रभुत्व में वृद्धि होगी, व्यवसायिक क्षमता में वृद्धि होगी, समय पर कार्य पूर्ण करने से लाभ होगा।
वृश्चिक राशि :- अधिकारियों से सम्पर्क फलप्रद होगा, समाज में मान-प्रतिष्ठा अवश्य बढ़ेगी, आलस्य से हानि होगी।
धनु राशि :- अचानक कोई शुभ समाचार मिलेगा, कार्यगति में सुधार होगा, चिन्तायें कम होंगी, समय स्थिति का लाभ लें।
मकर राशि :- स्थिति यथावत् रहेगी, सोचे कार्य समय पर पूर्ण होंगे, परिश्रम से कार्य बनेंगे, विशेष कार्यों पर ध्यान दें।
कुंभ राशि :- इष्ट मित्र सुखवर्धक होगा, शरीर कष्ट से चिन्ता होगी, उत्तम जस की स्थिति बनेगी, स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
मीन राशि :- इष्ट मित्र सहायक होगा, दैनिक कार्यगति में अनुकूलता बनेगी, परिश्रम से कार्यगति में निरंतरता आयेगी ध्यान दें।
प्रकाश फैलाएं घर में आयेगी लक्ष्मी
16 Oct, 2025 07:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदु धर्म के सबसे बड़े त्योहार दीपावली की तैयार शुरु हो गयी है। दिवाली के लिए यदि घर को तैयार कर रहे हैं तो हर कमरे में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था करें। कुछ आसान तरीकों से आप उस कमरे को भी जगमग कर सकते हैं जहां कम रौशनी होती है। इससे घर में लक्ष्मी भी आती है।
जिस कमरे में ज्यादा अंधेरा रहता है, जहां तक संभव हो सके, अंधेरे कमरे की दीवारों पर हल्के रंग का पेंट करवाएं। लाइट शेड वाले परदे, बेडशीट का इस्तेमाल करें चमक को और बढ़ाने के लिए कमरे में परदे, बेडशीट और कुशन आदि के कलर्स भी लाइट शेड के रखें।
मिरर फर्नीचर से अंधेरे कमरे में फैलेगी रोशनी
ऐसे कमरे के लिए मिरर फर्नीचर का इस्तेमाल करना चाहिए। इसका फायदा यह होगा कि इस पर जहां से भी लाइट आएगी, यह और भी अधिक चमकने लगता है और कमरे में रोशनी बढ़ती है।
रिफ्लेक्टिंग फ्लोरिंग है अच्छा विकल्प
अंधेरे वाले कमरे में रिफ्लेक्टिंग फ्लोरिंग भी अच्छा विकल्प है, जिससे कमरे में चमक बढ़ सकती है। इसमें आजकल एलईडी का भी इस्तेमाल होता है।
कमरें में लाइट्स का ऐसे करें इस्तेमाल
इसके बावजूद भी अगर कमरे में प्रकाश नहीं आता तो आप क्रत्रिम रोशनी का इस्तेमाल कर सकते हैं। कमरे में हैंगिंग लाइट्स का प्रयोग भी अंधेरे को दूर कर सकता है। इसके अलावा दीवारों पर लैम्प्स भी लगवाए जा सकते हैं। यदि संभव हो तो कमरे की सीलिंग में लाइटिंग की व्यवस्था कर सकते हैं। आजकल लाइटिंग वाला सीलिंग फैन भी काफी चलन में है।बहरहाल यह जान लें कि आपका घर जितना चमकेगा उतनी ही लक्ष्मी आपके घर आयेगी।
दीवाली पर मनवांछित फल के लिए इस प्रकार करें पूजा
16 Oct, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दीवाली पर मां लक्ष्मी, सरस्वती एवं गणेशजी की विशेष पूजा विधी से अर्चना कर उनसे सुख-समृद्धि, बुद्धि तथा घर में शांति, तरक्की का वरदान मांगा जाता है
दीवाली पर मां लक्ष्मी, सरस्वती एवं गणेशजी की पूजा की जाती है। इन दिन इन तीनों देवी-देवताओं की विशेष पूजा-अर्चना कर उनसे सुख-समृद्धि, बुद्धि तथा घर में शांति, तरक्की का वरदान मांगा जाता है। दीवाली पर देवी-देवताओं की पूजा में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाता है जो निम्न प्रकार हैं-
दीवाली पूजा हेतु पूजन सामग्री
दीवाली पूजा के सामान की लगभग सभी चीजें घर में ही मिल जाती हैं। कुछ अतिरिक्त चीजों को बाहर से लाया जा सकता है। ये वस्तुएं हैं- लक्ष्मी, सरस्वती व गणेश जी का चित्र या प्रतिमा, रोली, कुमकुम, चावल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, कपूर, अगरबत्तियां, मिट्टी तथा तांबे के दीपक, रुई, कलावा (मौलि), नारियल, शहद, दही, गंगाजल, गुड़, धनिया, फल, फूल, जौ, गेहूँ, दूर्वा, चंदन, सिंदूर, घृत, पंचामृत, दूध, मेवे, खील, बताशे, गंगाजल, यज्ञोपवीत (जनेऊ), श्वेत वस्त्र, इत्र, चौकी, कलश, कमल गट्टे की माला, शंख, आसन, थाली, चांदी का सिक्का, देवताओं के प्रसाद हेतु मिष्ठान्न
ये है दीवाली की पूजा विधि।
दीवाली की पूजा में सबसे पहले एक चौकी पर सफेद वस्त्र बिछा कर उस पर मां लक्ष्मी, सरस्वती व गणेश जी का चित्र या प्रतिमा को विराजमान करें। इसके बाद हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा-सा जल लेकर उसे प्रतिमा के ऊपर निम्न मंत्र पढ़ते हुए छिड़कें। बाद में इसी तरह से स्वयं को तथा अपने पूजा के आसन को भी इसी तरह जल छिड़ककर पवित्र कर लें।
ऊँ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: वाह्याभंतर: शुचि:।।
इसके बाद मां पृथ्वी को प्रणाम करके निम्न मंत्र बोलें तथा उनसे क्षमा प्रार्थना करते हुए अपने आसन पर विराजमान हों
पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥
ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥ पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः
इसके बाद ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः कहते हुए गंगाजल का आचमन करें
ध्यान व संकल्प विधि
इस पूरी प्रक्रिया के बाद मन को शांत कर आंखें बंद करें तथा मां को मन ही मन प्रणाम करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर पूजा का संकल्प करें। संकल्प के लिए हाथ में अक्षत (चावल), पुष्प और जल ले लीजिए। साथ में एक रूपए (या यथासंभव धन) का सिक्का भी ले लें। इन सब को हाथ में लेकर संकल्प करें कि मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान व समय पर मां लक्ष्मी, सरस्वती तथा गणेशजी की पूजा करने जा रहा हूं, जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हों।
इसके बाद सबसे पहले भगवान गणेशजी व गौरी का पूजन कीजिए। तत्पश्चात कलश पूजन करें फिर नवग्रहों का पूजन कीजिए। हाथ में अक्षत और पुष्प ले लीजिए और नवग्रह स्तोत्र बोलिए। इसके बाद भगवती षोडश मातृकाओं का पूजन किया जाता है। इन सभी के पूजन के बाद 16 मातृकाओं को गंध, अक्षत व पुष्प प्रदान करते हुए पूजन करें। पूरी प्रक्रिया मौलि लेकर गणपति, माता लक्ष्मी व सरस्वती को अर्पण कर और स्वयं के हाथ पर भी बंधवा लें। अब सभी देवी-देवताओं के तिलक लगाकर स्वयं को भी तिलक लगवाएं। इसके बाद मां महालक्ष्मी की पूजा आरंभ करें।
सबसे पहले भगवान गणेशजी, लक्ष्मीजी का पूजन करें। उनकी प्रतिमा के आगे 7, 11 अथवा 21 दीपक जलाएं तथा मां को श्रृंगार सामग्री अर्पण करें। मां को भोग लगा कर उनकी आरती करें। श्रीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त व कनकधारा स्रोत का पाठ करें। इस तरह से आपकी पूजा पूर्ण होती है।
क्षमा-प्रार्थना करें
पूजा पूर्ण होने के बाद मां से जाने-अनजाने हुए सभी भूलों के लिए क्षमा-प्रार्थना करें। उन्हें कहें-
मां न मैं आह्वान करना जानता हूँ, न विसर्जन करना। पूजा-कर्म भी मैं नहीं जानता। हे परमेश्वरि! मुझे क्षमा करो। मन्त्र, क्रिया और भक्ति से रहित जो कुछ पूजा मैंने की है, हे देवि! वह मेरी पूजा सम्पूर्ण हो। यथा-सम्भव प्राप्त उपचार-वस्तुओं से मैंने जो यह पूजन किया है, उससे आप भगवती श्रीलक्ष्मी प्रसन्न हों।
गणेश जी की आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
एक दंत दयावंत चार भुजाधारी।
माथे पर तिलक सोहे, मुसे की सवारी।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुवन का भोग लगे, संत करे सेवा।।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
अंधन को आंख देत, कोढ़ियन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।।
सुर श्याम शरण आये सफल कीजे सेवा।। जय गणेश देवा
जय गणेश जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
लक्ष्मीजी की आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
उमा, रमा, ब्रम्हाणी, तुम जग की माता
सूर्य चद्रंमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
दुर्गारूप निरंजन, सुख संपत्ति दाता
जो कोई तुमको ध्याता, ऋद्धि सिद्धी धन पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
तुम ही पाताल निवासनी, तुम ही शुभदाता
कर्मप्रभाव प्रकाशनी, भवनिधि की त्राता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
जिस घर तुम रहती हो, ताँहि में हैं सद्गुण आता
सब सभंव हो जाता, मन नहीं घबराता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
तुम बिन यज्ञ ना होता, वस्त्र न कोई पाता
खान पान का वैभव, सब तुमसे आता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
शुभ गुण मंदिर, सुंदर क्षीरनिधि जाता
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता
उर आंनद समाता, पाप उतर जाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
स्थिर चर जगत बचावै, कर्म प्रेर ल्याता
तेरा भगत मैया जी की शुभ दृष्टि पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता,
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
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