धर्म एवं ज्योतिष
4 शुभ योग में कल लाभ पंचमी,जानें इस दिन कछुआ खरीदना क्यों है शुभ, मां लक्ष्मी की होगी कृपा
26 Oct, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को लाभ पंचमी है, जिसे सौभाग्य और ज्ञान पंचमी भी कहते हैं. लाभ पंचमी को आमतौर पर सौभाग्य और ज्ञान पंचमी के नाम से भी जाना जाता है. यह पर्व दीपावली के पांच दिन बाद आता है और इसे अत्यंत शुभ माना जाता है. इस दिन विशेष पूजा और शुभ कार्य करने से व्यवसाय और जीवन में लाभ की प्राप्ति होती है. पंचांग के अनुसार, लाभ पंचमी के दिन रवि योग, शोभन योग समेत कई शुभ योग बन रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है. शुभ योग में माता लक्ष्मी और गणेशजी की पूजा करने से हर सुख की प्राप्ति होती है और सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं. आइए जानते हैं लाभ पचंमी पर कौन से शुभ योग बन रहे हैं और इस पर्व का महत्व…
लाभ पंचमी पर शुभ योग
द्रिक पंचांग के अनुसार, रविवार के दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 42 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 27 मिनट तक रहेगा और राहुकाल का समय शाम 4 बजकर 17 मिनट से शुरू होकर 5 बजकर 41 मिनट तक रहेगा. इस दिन सूर्य तुला राशि में और चंद्रमा सुबह 10 बजकर 46 मिनट तक वृश्चिक राशि में रहेंगे. इसके बाद धनु राशि में गोचर करेंगे. लाभ पंचमी के दिन गुरु-बुध की युति से नवपंचम राजयोग, सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग और शोभन योग बन रहा है, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है.
लाभ पंचमी का महत्व
लाभ पंचमी, दीपावली के बाद मनाई जाने वाली एक अत्यंत शुभ पंचमी तिथि है. इसे सौभाग्य पंचमी, ज्ञान पंचमी या लाभ पंचमी के नाम से जाना जाता है. यह कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी को आती है और दीपावली पर्व के समापन का प्रतीक मानी जाती है. माना जाता है कि इस दिन भगवान गणेश और मा लक्ष्मी की संयुक्त पूजा से संपत्ति, सुख और व्यवसायिक लाभ प्राप्त होता है. इस दिन घर या दुकान में नया लेखा-जोखा प्रारंभ करना, सोना या वस्त्र खरीदना या नए सौदे करना ग्रहों की दृष्टि से शुभ परिणाम देता है. इस दिन किसी भी नए कार्य, व्यवसाय या सौदे की शुरुआत को अत्यंत शुभ माना गया है क्योंकि यह उपचय भावों (3, 6, 10, 11 भाव) के सक्रिय होने का संकेत देती है.
गुजराती नववर्ष का पहला कार्य दिवस
यह पर्व विशेष रूप से गुजरात में मनाया जाता है और गुजराती नववर्ष के पहले कार्य दिवस के रूप में भी मनाया जाता है. ज्यादातर व्यवसायी इस दिन अपने बिजनेस को नए सिरे से शुरू करते हैं. वे नई डायरी खोलते हैं, जिसके शुरू के पन्ने में बाईं ओर शुभ, दाईं ओर लाभ लिखते हैं और केंद्र में स्वास्तिक बनाकर कारोबार की शुरुआत करते हैं. मान्यता है कि यह परंपरा मुनाफे और समृद्धि का प्रतीक है.
मां लक्ष्मी का मिलता है आशीर्वाद
लाभ पंचमी के दिन कई शुभ कार्य किए जाते हैं, जो धन और सौभाग्य साथ लेकर आते हैं. इस दिन चांदी या पीतल का कछुआ खरीदकर घर लाना आर्थिक समृद्धि का सूचक माना जाता है. कारोबारी नई डायरी में शुभ-लाभ और स्वास्तिक लिखकर कारोबार का प्रारंभ करने के अलावा, मां लक्ष्मी को खीर का भोग लगाकर सात कन्याओं को भोग करवाते हैं. मान्यता है कि ऐसा करने से कारोबार में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और धन की देवी मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है. साथ ही, पूजा स्थल और तिजोरी में हल्दी की गांठ और फूल रखने से घर में बरकत बनी रहती है, जिससे आर्थिक स्थिति मजबूत होती है.
जब सूर्यदेव ने असुर को दिया पुत्र बनने का वरदान, जानिए छठ व्रत से जुड़ी कर्ण की संपूर्ण कहानी
26 Oct, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
छठ पर्व विशेष रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में मनाया जाता है. यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया की पूजा के लिए प्रसिद्ध है. इसी पावन परंपरा का आधार महाभारत के अद्भुत पात्र सूर्यपुत्र कर्ण यानी अंगराज कर्ण से भी जुड़ा हुआ है. चार दिनों तक चलने वाले इस छठ पूजा में व्रती 36 घंटे तक निर्जल उपवास रखते हैं. कहते हैं कि इस पूजा से व्यक्ति के पाप दूर होते हैं, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं. छठ पर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होती है, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य और चौथे दिन यानी अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है.
महान योद्धाओं में से एक कर्ण
महाभारत में कर्ण को महान योद्धाओं में से एक माना गया है, जिनकी बहादुरी, दानवीरता और धर्म के प्रति आस्था आज भी लोगों के लिए प्रेरणा है. कर्ण सूर्यदेव के पुत्र थे, जिन्हें माता कुंती ने सूर्य मंत्र के जाप से जन्म दिया था. सामाजिक दबाव के कारण कुंती ने कर्ण को नदी में बहा दिया. नदी में बहता यह बच्चा राधा-अधिरथ दंपति को मिला, जिन्होंने उसे पाला. बालक कर्ण में सूर्य देव का आशीर्वाद और दिव्यता स्पष्ट रूप से झलकती थी. उनका पूर्वजन्म भी सूर्य देव के प्रति समर्पित था.
सूर्यदेव ने दिया पुत्र बनने का वरदान
कहा जाता है कि पूर्वजन्म में कर्ण दंभोद्भवा नामक असुर थे, जिसे सूर्य देव ने 1000 कवच और दिव्य कुंडल दिए थे, जो उसे असाधारण सुरक्षा प्रदान करते थे. वरदान के कारण वह असुर अपने को अजेय-अमर समझकर अत्याचारी हो गया था. नर और नारायण ने बारी-बारी से तपस्या करके दंभोद्भवा के 999 कवच तोड़ दिए और जब एक कवच बच गया तो असुर सूर्य लोक में जाकर छुप गया. सूर्य देव ने उनकी भक्ति देखकर अगले जन्म में उन्हें अपना पुत्र बनने का वरदान दिया.
यहां कर्ण ने पहली बार की छठ पूजा
जब कर्ण बड़े हुए, तब उनकी मित्रता दुर्योधन से हुई. दुर्योधन ने उन्हें अंग देश का राजा बनाया. अंग देश का क्षेत्र वर्तमान बिहार के भागलपुर और मुंगेर के आसपास था. यही वह जगह थी, जहां कर्ण ने पहली बार छठ पूजा होते देखी. यह पूजा सूर्य देव और छठी मैया को अर्घ्य देने की थी. कर्ण सूर्यपुत्र थे, इसलिए उन्होंने रोज सुबह सूर्य नमस्कार और सूर्य को अर्घ्य देना शुरू किया. छठ पूजा का महत्व समझकर उन्होंने इसे नियमित रूप से करना शुरू किया. वह न केवल सूर्य देव की पूजा करते थे, बल्कि छठी मैया की स्तुति भी करते थे. इस प्रकार महाभारत काल में अंगराज कर्ण के माध्यम से छठ पूजा की परंपरा को बिहार और पूर्वांचल में स्थायी रूप मिला.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (26 अक्टूबर 2025)
26 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- प्रत्येक कार्य में विघ्न-बाधा, धन हानि, चिन्ता व असमंजस की स्थिति अवश्य बन जायेगी।
वृष राशि :- सफलता के साधन जुटायें, इष्ट मित्र सुख वर्धक होंगे तथा विशेष कार्य आप अवश्य ही करें।
मिथुन राशि :- कार्य-कुशलता से संतोष, योजनाएं फलीभूत हों तथा इष्ट मित्र सुखवर्धक व सहयोगी होगी।
कर्क राशि :- कहीं तनाव, क्लेश व अशांति, मानसिक विभ्रम तथा स्त्री शरीर कष्ट अवश्य बने।
सिंह राशि :- विरोधियों के तनाव से बचें, क्रोध, अशांति व झूठे आश्वासन से आप बचकर चलें।
कन्या राशि :- अर्थ लाभ होकर हाथ से जाता रहे, विभ्रम, आवेश व अशांति आप में अवश्य बनेगी।
तुला राशि :- आर्थिक समस्याएं सुलझें, व्यवसायिक क्षमता में वृद्धि होगी, पारिवारिक चिन्ता कम होगी।
वृश्चिक राशि :- अग्नि चोटादि का भय, सतर्कता से कार्य करें तथा कार्य अवरोध, विरोधियों से सतर्क रहें।
धनु राशि :- कला-कौशल एवं निर्माणकारी योजना बने, प्रभुत्व वृद्धि से कार्य अवश्य ही बना लेवें।
मकर राशि :- स्थिति यथावत चलती रहे परंतु स्त्री वर्ग से भोग-एश्वर्य की प्रप्ति अवश्य होगी।
कुम्भ राशि :- योजनाबद्ध रुके कार्य करने में सफलता अवश्य मिले तथा सार्थक सफलता बनेगी।
मीन राशि :- स्त्री वर्ग से हर्ष-उल्लास तथा सामाजिक कार्य में मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी, कार्य बनेंगे।
सिर्फ डिजाइन नहीं, जानें कौन-सी एंगेजमेंट रिंग आपके रिश्ते को बना सकती है और मजबूत!
25 Oct, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
शादी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों का भी मेल होता है. इसी में सबसे खास होती है सगाई की रस्म और उस रस्म का मुख्य आकर्षण होती है सगाई की अंगूठी. यह सिर्फ एक गहना नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और जीवनभर साथ निभाने का प्रतीक होती है. अक्सर लड़कियां इस अंगूठी के चुनाव में सिर्फ डिजाइन या कीमत पर ध्यान देती हैं, लेकिन ज्योतिष और राशि के अनुसार सही अंगूठी चुनना भी बहुत जरूरी है. गलत अंगूठी का चुनाव वैवाहिक जीवन में टकराव और नाखुशी ला सकता है. वहीं सही अंगूठी आपके रिश्ते में प्यार, समझ और सामंजस्य बनाए रख सकती है. हर राशि के लिए कुछ विशेष नियम होते हैं, जो यह बताते हैं कि कौन-सी धातु, कौन-सा स्टोन और किस आकार की अंगूठी शुभ होती है. अगर आप अपनी सगाई की अंगूठी सोच-समझकर चुनती हैं तो यह न सिर्फ आपको और आपके साथी को खुश रखेगी, बल्कि रिश्तों में मिठास और स्थायित्व भी लाएगी. हर राशि के लिए कौन-सी अंगूठी शुभ है और कौन-सी अंगूठी से बचना चाहिए. यह जानकारी आपके सगाई के अनुभव को यादगार और खुशहाल बनाने में मदद करेगी.
राशि के अनुसार सगाई की अंगूठी
1. मेष राशि: केवल सोने की अंगूठी शुभ है. किसी भी तरह का स्टोन रखने से रिश्तों में दरार आ सकती है.
2. वृषभ राशि: कोई भी धातु ले सकती हैं, लेकिन अंगूठी का साइज बड़ा होना चाहिए. छोटा साइज़ वैवाहिक जीवन में समस्याएं ला सकता है.
3. मिथुन राशि: किसी भी स्टोन और धातु की अंगूठी शुभ है. अंगूठी पर दूल्हा-दुल्हन का नाम और तिथि अंकित हो तो बहुत अच्छा माना जाता है.
4. कर्क राशि: सबसे अच्छा है सॉलिटेयर अंगूठी. लड़के और लड़की दोनों के लिए यह शुभ रहती है.
5. सिंह राशि: अपने बर्थस्टोन वाली सोने की अंगूठी पहनें. इससे जीवन में शुभ फल और सफलता मिलती है.
6. कन्या राशि: हीरे की अंगूठी शुभ होती है. कोई भी आकार या डिजाइन चुन सकते हैं.
7. वृश्चिक राशि: सोने की अंगूठी जिसमें बगेट (आयताकार) स्टोन लगा हो, सबसे शुभ रहती है. इससे रिश्तों में सामंजस्य बढ़ता है.
8. धनु राशि: किसी भी अंगूठी में इनफिनिटी साइन बनवाएं. यह प्रेम और समर्थन बनाए रखता है.
9. मकर राशि: ट्रायंगल हीरे वाली अंगूठी शुभ होती है. लड़कियों के लिए बड़ा और लड़कों के लिए छोटा आकार अच्छा माना जाता है.
10. कुंभ राशि: स्क्वायर शेप का सोलिटेयर सबसे अच्छा रहता है. इससे प्रेम और समझ बढ़ती है.
11. मीन राशि: प्लेटिनम की अंगूठी शुभ होती है. स्टोन लगाने पर संख्या 3 या 5 रख सकते हैं.
जब रावण ने बनाई धरती से स्वर्ग तक पहुंचने की 4 सीढ़ियां, पांचवी आज भी अधूरी, पढ़ें अधूरे वरदान की कथा
25 Oct, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
रावण का नाम सुनते ही दिमाग में एक महान योद्धा और भगवान शिव का परम भक्त उभरता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि रावण के मन में एक और अनोखी इच्छा भी थी, जो मानवीय कल्पना की हदों से बाहर थी? पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण चाहता था कि कोई भी मनुष्य पुण्य-कर्मों के बिना सीधे स्वर्ग जा सके. इस असाधारण इच्छा को पूरा करने के लिए उसने भगवान शिव की घोर तपस्या की और अमरता का वरदान मांगा. भगवान शिव ने उसे एक शर्त दी – अगर वह केवल एक ही रात में पृथ्वी से स्वर्ग तक पांच सीढ़ियां बना दे, तो वह न केवल अमर हो जाएगा बल्कि स्वर्ग तक जाने का मार्ग भी प्राप्त कर सकेगा.
रावण ने पूरी लगन और शक्ति के साथ काम शुरू किया. उसकी मेहनत और समर्पण की कहानी आज भी लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत है, लेकिन जैसा कि अक्सर हमारी आकांक्षाएं पूरी नहीं होतीं, रावण भी चौथी सीढ़ी बनाते-बनाते थक कर सो गया. परिणामस्वरूप उसकी योजना अधूरी रह गई. यही कारण है कि आज भी रावण द्वारा बनाई गई चार सीढ़ियां मौजूद हैं और पाँचवीं सीढ़ी का रास्ता अधूरा माना जाता है, ये चार सीढ़ियां सिर्फ पत्थर या धरातल की संरचना नहीं हैं, बल्कि उनमें छिपा हुआ रहस्य, भव्यता और धार्मिक महत्व आज भी लोगों को आकर्षित करता है. हर सीढ़ी का अपना अलग इतिहास और अपनी अलग महत्ता है, जो हमें रावण की बुद्धिमत्ता, तपस्या और आध्यात्मिक दृष्टि का अनुभव कराती है.
रावण के जरिए बनाई गई चार स्वर्ग की सीढ़ियां
पहली सीढ़ी – हरिद्वार, उत्तराखंड
रावण की बनाई पहली सीढ़ी आज हरिद्वार के प्रसिद्ध घाट, हर की पौड़ी पर स्थित है. ‘पौड़ी’ का अर्थ होता है सीढ़ी. धार्मिक मान्यता है कि रावण ने इसी स्थान पर स्वर्ग तक जाने वाली पहली सीढ़ी का निर्माण किया था. गंगा नदी के किनारे यह जगह आज भी लाखों श्रद्धालुओं के लिए मोक्ष की कामना से स्नान करने का प्रमुख स्थल है.
दूसरी सीढ़ी – पौड़ीवाला, सिरमौर, हिमाचल प्रदेश
दूसरी सीढ़ी का निर्माण सिरमौर जिले के पौड़ीवाला शिव मंदिर के पास हुआ था. यह स्थान प्राचीन काल से ही धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है. रावण ने यहां स्वर्ग तक जाने के लिए दूसरी सीढ़ी बनाई. आज भी यह मंदिर भक्तों के बीच बहुत प्रसिद्ध है और अपनी दिव्यता के लिए जाना जाता है.
तीसरी सीढ़ी – चूड़ेश्वर महादेव मंदिर, सिरमौर, हिमाचल प्रदेश
तीसरी सीढ़ी चूड़ेश्वर महादेव मंदिर के मार्ग से होकर जाती है. यह मंदिर ऊंचाई पर स्थित है और वहां तक पहुंचने का रास्ता बहुत कठिन माना जाता है. कहा जाता है कि इस सीढ़ी तक पहुंचने पर भक्तों को दिव्य दर्शन और आध्यात्मिक शांति मिलती है.
चौथी सीढ़ी – किन्नौर कैलाश पर्वत, हिमाचल प्रदेश
चौथी सीढ़ी किन्नौर जिले के कैलाश पर्वत पर स्थित है. यह स्थान भगवान शिव का पवित्र निवास माना जाता है. रावण इसी सीढ़ी का निर्माण करते हुए थक कर सो गया था, इसलिए पांचवी सीढ़ी अधूरी रह गई. कैलाश पर्वत की यह सीढ़ी आज भी अपनी भव्यता और धार्मिक महत्ता के लिए प्रसिद्ध है.
Ravana’s four stairs,
रावण की यह कोशिश सिर्फ एक शारीरिक निर्माण नहीं थी, बल्कि यह उसकी आध्यात्मिक आकांक्षा और मानव जीवन के पुण्य-कर्मों से परे जाने की चाह का प्रतीक थी. चार सीढ़ियां आज भी मौजूद हैं और ये हमें रावण की इच्छाशक्ति और तपस्या की याद दिलाती हैं.
तुलसी विवाह के दिन करें ये 5 उपाय... दूर हो जाएंगी शादी की अड़चनें! मिलेगा समझदार पति
25 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में तुलसी विवाह का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. गौरतलब है कि माता तुलसी को मां लक्ष्मी का स्वरूप भी माना जाता है और मान्यता है कि तुलसी के पौधे पर माता लक्ष्मी का वास होता है. कई अवसरों पर माता तुलसी की विधिपूर्वक पूजा-आराधना की जाती है. विशेष रूप से तुलसी विवाह के दिन पूजा करने से लाभ कई गुना बढ़ जाता है. इस दिन भगवान विष्णु के प्रतीक शालिग्राम और माता तुलसी के पौधे का विवाह करवाया जाता है. मान्यता है कि ऐसा करने से शादीशुदा जीवन खुशहाल रहता है और आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं. इस रिपोर्ट में आगे हम जानेंगे कि तुलसी विवाह कब है और इस दिन कौन-से विशेष उपाय और पूजा-अर्चना करनी चाहिए ताकि इसे करने वाले को अधिक फल और सौभाग्य प्राप्त हो.
दरअसल, अयोध्या के ज्योतिष नीरज बताते हैं कि हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को तुलसी विवाह का पर्व मनाया जाता है. इस वर्ष यह पर्व 2 नवंबर को मनाया जाएगा, जिसकी तिथि सुबह 7:31 बजे शुरू होकर 3 नवंबर तक रहेगी. इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 5:07 बजे से पूरे दिन तक रहेगा. इस अवसर पर माता तुलसी और भगवान शालिग्राम की विधि विधानपूर्वक पूजा-आराधना की जाती है और उनका विवाह कराया जाता है. मान्यता है कि इस दिन अगर कुंवारी कन्या कुछ खास उपाय करती हैं, तो उनके विवाह के योग जल्दी बनते हैं.
करें ये 5 उपाय
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, तुलसी विवाह के दिन यदि कुंवारी कन्या या आविवाहित महिलाएं अच्छा वर पाने या सुखद वैवाहिक जीवन के लिए कुछ उपाय करती हैं, तो उन्हें मनचाहा आशीर्वाद प्राप्त होता है. इस अवसर पर किया जाने वाला प्रमुख उपाय इस प्रकार है:
तुलसी के पौधे की विधि-विधानपूर्वक पूजा-आराधना करें.
हल्दी वाला दूध माता तुलसी को अर्पित करें.
माता तुलसी को श्रृंगार का सामान अर्पित करें.
पूजा के बाद तुलसी के पास दीपक प्रज्वलित करें.
तुलसी विवाह के दिन व्रत और पूजा के बाद भगवान सूर्य की भी पूजा-आराधना करनी चाहिए
पूजा के बाद करें ये काम
तुलसी विवाह के दिन किया गया यह उपाय हर मनोकामना की पूर्ति करता है. खास तौर पर इस दिन सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा के साथ माता तुलसी से प्रार्थना करनी चाहिए. मनोकामना की सिद्धि के लिए अपनी भक्ति और प्रार्थना को दिल से अर्पित करना लाभकारी होता है. इसके अलावा, तुलसी विवाह के दिन व्रत और पूजा के बाद भगवान सूर्य की भी पूजा-आराधना करनी चाहिए. ऐसा करने से विवाह में आने वाली बाधाएं समाप्त होती हैं और वैवाहिक जीवन सुखद और मंगलमय बनता है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (25 अक्टूबर 2025)
25 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- सफलता के साधन जुटायें, कार्य-व्यावसाय अनुकूल हो, समय पर कार्य अवश्य करें।
वृष राशि :- कार्य अनुकूलता से चिन्ताएं कम होंगी, सफलता से संतोष, व्यावसायक गति उत्तम होगी।
मिथुन राशि :- दैनिक कार्यक्षमता में वृद्धि, अधिकारियों का समर्थन फलप्रद बना ही रहेगा, ध्यान रखें।
कर्क राशि :- स्वाभाव नरम रहे, शारीरिक क्षमता कमजारे हो, आर्थिक चिंता संभव होगी, कार्य निपटायें।
सिंह राशि :- आशानुकूल सफलता का हर्ष, कार्यगति में सुधार, कार्ययोजना बनेगी तथा अर्थ लाभ होगा।
कन्या राशि :- मानसिक तनाव व उद्विघ्नता, उद्वेग व अशांति, कार्य-व्यावसाय में बाधा अवश्य होगी।
तुला राशि :- मित्रों की उपेक्षा कष्टप्रद होगी, प्रयत्न सफल होंगे, कार्यवृत्ति में सुधार अवश्य होगा।
वृश्चिक राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति, मानसिक बेचैनी तथा व्यर्थ धन का व्यय, कष्ट होगा।
धनु राशि :- तर्क-विर्तक से हानि, कष्ट होगा, प्रबलता, प्रभुत्व वृद्धि से कार्यकुशलता व कार्य बनेंगे।
मकर राशि :- दूसरों के आरोप से बेचैनी तथा असमंजस तथा असमर्थता का वातावरण बना ही रहेगा।
कुम्भ राशि :- कुटुम्ब की समस्याएं सुलझें, सामाजिक कार्यों में मान-प्रतिष्ठा अवश्य ही बढ़ेगी।
मीन राशि :- विरोधी तत्व परेशान करें, लेनेदेन के मामले में हानि अवश्य होगी, ध्यान दें।
न मैदा और न चीनी... फिर भी बनेगा वही स्वाद वाला ठेकुआ, बस डालनी है ये हेल्दी चीज, शरीर में बढ़ाएगा आयरन
24 Oct, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ठेकुआ बिहार और झारखंड की पारंपरिक मिठाई है, जिसे खासतौर पर छठ पूजा के अवसर पर बनाया जाता है. इसका स्वाद न केवल लाजवाब होता है बल्कि यह बेहद पौष्टिक भी होती है. आमतौर पर ठेकुआ मैदा और चीनी से बनाया जाता है, लेकिन आज हम आपको बता रहे हैं बिना मैदा और चीनी के हेल्दी ठेकुआ रेसिपी, जो स्वाद में बिल्कुल पारंपरिक लगेगी पर सेहत के लिए और भी बेहतर होगी. इस रेसिपी में हम गेहूं के आटे और गुड़ का इस्तेमाल करेंगे, जो शरीर को ऊर्जा देने के साथ-साथ पाचन के लिए भी फायदेमंद हैं.
सबसे पहले जानते हैं कि इस हेल्दी ठेकुआ को बनाने के लिए क्या-क्या चाहिए. इसके लिए आपको चाहिए- दो कप गेहूं का आटा, एक कप कसा हुआ गुड़ (या गुड़ का घोल), एक चौथाई कप नारियल का बुरादा, दो बड़े चम्मच देसी घी, एक चम्मच सौंफ, थोड़ा सा इलायची पाउडर और पानी जरूरत अनुसार. चाहें तो इसमें कटे हुए सूखे मेवे जैसे बादाम, काजू या किशमिश भी डाल सकते हैं, जो स्वाद और पौष्टिकता दोनों बढ़ाते हैं.
अब बात करते हैं इसके बनाने के तरीके पर
– सबसे पहले एक बर्तन में कसा हुआ गुड़ और थोड़ा पानी डालकर धीमी आंच पर पिघला लें.
– जब गुड़ अच्छी तरह से घुल जाए तो गैस बंद करके उसे ठंडा होने दें.
– अब एक बड़े बर्तन में गेहूं का आटा, नारियल का बुरादा, इलायची पाउडर, सौंफ और देसी घी डालें.
– इन सबको अच्छे से मिलाएं ताकि मिश्रण हल्का कुरकुरा महसूस हो.
– फिर धीरे-धीरे गुड़ का घोल डालते हुए नरम पर थोड़ा टाइट आटा गूंथ लें.
– ध्यान रहे कि आटा न ज्यादा सख्त हो और न ज्यादा ढीला.
– अब आटे से छोटे-छोटे गोले बनाएं और हाथ से दबाकर ठेकुआ का आकार दें.
– अगर आप चाहें तो पारंपरिक लकड़ी वाले मोल्ड का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, उसपर डिजाइन लाने के लिए.
– एक पैन में देसी घी या नारियल तेल गर्म करें और धीमी आंच पर ठेकुआ को तलें.
– जब ये सुनहरे भूरे रंग के हो जाएं और चारों तरफ से कुरकुरे दिखें, तो इन्हें निकालकर टिश्यू पेपर पर रखें ताकि अतिरिक्त तेल निकल जाए.
कहां से और कैसे शुरू हुई छठ पूजा की परंपरा, भारत के बाहर यहां भी मनाते हैं खूब
24 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
छठ पूजा भारत का एक प्राचीन और सबसे पवित्र त्योहार माना जाता है, जो सूर्य देव (Lord Surya) और छठी मइया को समर्पित होता है. यह त्योहार प्रकृति, जल और सूर्य की आराधना का प्रतीक है. छठ पूजा का संबंध खासतौर पर बिहार राज्य से माना जाता है, जहां से इसकी शुरुआत हजारों साल पहले हुई थी. यह त्योहार आज न सिर्फ बिहार, बल्कि झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कई हिस्सों में बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पर्व मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन और आभार की भावना को दर्शाता है.
छठ पूजा का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा हुआ है. प्राचीन ग्रंथों में सूर्य उपासना का वर्णन मिलता है, जहां ऋषि-मुनि मानसिक और शारीरिक शुद्धि के लिए सूर्य देव की आराधना करते थे. माना जाता है कि कर्ण, जो सूर्य देव और कुंती के पुत्र थे, सबसे पहले छठ पूजा करने वाले व्यक्ति थे. वे रोज नदी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। इसके अलावा महाभारत में भी उल्लेख मिलता है कि द्रौपदी और पांडवों ने अपने संकट के समय सूर्य पूजा की थी. इन कथाओं से यह साबित होता है कि छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मशुद्धि और ऊर्जाशक्ति का प्रतीक है.
बिहार से कैसे शुरू हुई छठ पूजा
छठ पूजा की सबसे गहरी जड़ें बिहार राज्य में पाई जाती हैं. बिहार को इस त्योहार की जन्मभूमि माना जाता है क्योंकि यहां की नदियां जैसे गंगा, कोसी और सोन जल और सूर्य उपासना के लिए उपयुक्त स्थान प्रदान करती हैं. बिहार की धरती हमेशा से भक्ति, कृषि और अध्यात्म का केंद्र रही है. यहां के लोग प्रकृति को जीवनदाता मानते हैं, इसलिए सूर्य और जल के प्रति आभार प्रकट करने की परंपरा यहीं से शुरू हुई. “छठ” शब्द का अर्थ होता है “छठा दिन”, क्योंकि यह त्योहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है. धीरे-धीरे यह परंपरा बिहार से निकलकर पूरे भारत और विदेशों तक फैल गई.
छठ पूजा के अनुष्ठान
छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला त्योहार है, जिसमें भक्त पूरी श्रद्धा, संयम और शुद्धता के साथ उपवास रखते हैं. इन चार दिनों के नाम हैं- नहाय-खाय, लोहंडा और खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य. इस दौरान भक्तगण नदी या तालाब के किनारे खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। पूजा के दौरान महिलाएं “व्रती” कहलाती हैं, जो बिना अन्न और जल ग्रहण किए उपवास रखती हैं. इस पर्व में उपयोग की जाने वाली हर वस्तु जैसे गन्ना, केला, नारियल, ठेकुआ और दीपक का अपना एक विशेष धार्मिक महत्व होता है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (24 अक्टूबर 2025)
24 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, दैनिक कार्यगति में सुधार होगा, कार्ययोजना अवश्य ही बनेगी।
वृष राशि :- समय की अनुकूलता से लाभांवित होंगे, विवादग्रस्त होने से बचें, समय का ध्यान रखें।
मिथुन राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक होगा, इष्ट मित्र सुखप्रद रहें, विशेष कार्य अवश्य ही बनेंगे।
कर्क राशि :- स्वभाव में बेचैनी, मानसिक विघ्नता, शरीर क्षमता कमजोर पड़ेगी, ध्यान अवश्य रखें।
सिंह राशि :- आशानुकूल सफलता का हर्ष, कार्यवृत्ति में सुधार के योग बनेंगे, ध्यान रखें।
कन्या राशि :- समय पर सोचे हुए कार्य बनेंगे किन्तु कुछ बाधा विलम्ब संभव है।
तुला राशि :- मानसिक क्लेश व अशांति, मनोवृत्ति मलिन रहे, विरोधी तत्व परेशान करें।
वृश्चिक राशि :- आर्थिक योजना पूर्ण हो, सफलता के साधन जुटायें, कार्य संतोष की चिन्ता होगी।
धनु राशि :- योजना फलीभूत होगी, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, निश्चय पूर्ण होगा व कार्य बनेंगे।
मकर राशि :- इष्ट मित्रों से सुख-ऐश्वर्य की प्राप्ति, स्त्री-वर्ग से हर्ष, क्लेश तथा अशांति होगी।
कुम्भ राशि :- मान-प्रतिष्ठा, प्रभुत्व वृद्धि, कार्यकुशलता से संतोष एवं कार्य बनेंगे।
मीन राशि :- दैनिक कार्यवृत्ति में सुधार, प्रत्येक कार्य में बाधा, उद्विघ्नता से अवश्य बचें।
इस प्रकार महादेव को प्रसन्न करें
23 Oct, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कालों के काल महाकाल शिव शंकर की महिमा से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं हैं। कहते हैं कि देवों के देव महादेव को प्रसन्न करना बहुत आसान है। इनकी पूजा पूरी श्रद्धा और भाव से की जाए तो आप पर भोलेनाथ की कृपा बनी रहेगी।
इस शिव स्तुति से करें प्रभु के हर रूप का ध्यान। जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करूणाकर करतार हरे। जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशी सुखसार हरे। जय शशिशेखर, जय डमरूधर, जय जय प्रेमागार हरे।जय त्रिपुरारी, जय मदहारी, नित्य अनन्त अपार हरे। निर्गुण जय जय सगुण अनामय निराकार साकार हरे। पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।जय रामेश्वर, जय नागेश्वर, वैद्यनाथ, केदार हरे।मल्लिकार्जुन, सोमनाथ, जय महाकार, ओंकार हरे।जय त्रयम्बकेश्वर, जय भुवनेश्वर, भीमेश्वर, जगतार हरे।काशीपति श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अधहार हरे।नीलकंठ, जय भूतनाथ, जय मृतुंजय अविकार हरे।पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे। भोलानाथ कृपालु दयामय अवढर दानी शिवयोगी।निमिष मात्र में देते है नवनिधि मनमानी शिवयोगी। सरल हृदय अति करूणासागर अकथ कहानी शिवयोगी। भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर बने मसानी शिवयोगी।
स्वयं अकिंचन जन मन रंजन पर शिव परम उदार हरे। पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।
आशुतोष इस मोहमयी निद्रा मुझे जगा देना। विषय वेदना से विषयों की मायाधीश छुड़ा देना। रूप सुधा की एक बूद से जीवन मुक्त बना देना। दिव्य ज्ञान भण्डार युगल चरणों की लगन लगा देना। एक बार इस मन मन्दिर में कीजे पद संचार हरे।
पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे। दानी हो दो भिक्षा में अपनी अनपायनी भक्ति विभो।
शक्तिमान हो दो अविचल निष्काम प्रेम की शक्ति प्रभो। त्यागी हो दो इस असार संसारपूर्ण वैराग्य प्रभो।
परम पिता हो दो तुम अपने चरणों में अनुराण प्रभो। स्वामी हो निज सेवक की सुन लीजे करूण पुकार हरे।
पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।
तुम बिन व्यकुल हूं प्राणेश्वर आ जाओ भगवन्त हरे। चरण कमल की बॉह गही है उमा रमण प्रियकांत हरें।
विरह व्यथित हूं दीन दुखी हूं दीन दयाल अनन्त हरे। आओ तुम मेरे हो जाओ आ जाओ श्रीमंत हरे।
मेरी इस दयनीय दशा पर कुछ तो करो विचार हरे। पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे। जय महेश जय जय भवेश जय आदि देव महादेव विभो। किस मुख से हे गुणातीत प्रभुत तव अपार गुण वर्णन हो। जय भव तारक दारक हारक पातक तारक शिव शम्भो। दीनन दुख हर सर्व सुखाकर प्रेम सुधाकर की जय हो। पार लगा दो भवसागर से बनकर करूणा धार हरे।
पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे। जय मनभावन जय अतिपावन शोक नसावन शिवशम्भो।
विपति विदारण अधम अधारण सत्य सनातन शिवशम्भो। वाहन वृहस्पति नाग विभूषण धवन भस्म तन शिवशम्भो।
मदन करन कर पाप हरन धन चरण मनन धन शिवशम्भो। विश्वन विश्वरूप प्रलयंकर जग के मूलाधार हरे।
पारवती पति हर हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।
इसलिए भगवान गणेश को नहीं चढ़ती तुलसी
23 Oct, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भगवान गणेश की पूजा में कभी भी तुलसी का इस्तेमाल नहीं होता। पद्मपुराण आचाररत्न में भी लिखा है कि ‘न तुलस्या गणाधिपम’ अर्थात् तुलसी से गणेश जी की पूजा कभी न करें। इसके पीछे भी पौराणिक कथा है। गणेश जी ब्रह्मचारी रहना चाहते थे, पर उन्हें तुलसी के कारण ही दो विवाह करने पड़े। तभी से उनकी पूजा में इसे नहीं चढ़ाया जाता। कथा के अनुसार, एक बार श्री गणेश गंगा किनारे तप कर रहे थे। तब तुलसी विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर थी और वह भ्रमण करते हुए गंगा के तट पर पहुंचीं।
वहां तपस्या में लीन गणेश को देखकर तुलसी गणेशजी पर आसक्त हो गईं। तुलसी ने विवाह करने की इच्छा से गणेशजी का ध्यान भंग कर दिया। तब भगवान श्री गणेश ने तुलसी द्वारा तप भंग करने को अशुभ बताया। जब तुलसी ने गणेश के सामने विवाह की मंशा बताई, तो उन्होंने स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर तुलसी के विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
इससे दुखी हो तुलसी ने आवेश में आकर गणेशजी को श्राप दे दिया कि उनके दो विवाह होंगे। इसी वजह से आगे चलकर गणेशजी ने ऋद्धि और सिद्धि से विवाह किया। इस पर गणेशजी ने भी तुलसी को शाप दे दिया कि तुम्हारा विवाह एक असुर से होगा।
एक राक्षस की पत्नी होने का शाप सुनकर तुलसी ने गणेशजी से क्षमा मांगी। तब विध्नहर्ता गणेश ने तुलसी से कहा कि बाद में तुम एक पौधे का रूप धारण करोगी जो सभी का कल्याण करेगा। भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय होने के साथ ही कलयुग में लोगों को मोक्ष दोगी, लेकिन मेरी पूजा में तुम्हारा प्रयोग वर्जित होगा। कहा जाता है कि तभी से गणेशजी पर तुलसी चढ़ाना मना है।
इन उपायों से सुखमय होगा जीवन
23 Oct, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सभी लोग सुख और खुशहाली से रहना चाहते हैं और इसके लिए धन सबसे अहम होता है। धन के बिना किसी प्रकार के कामकाज नहीं हो सकते। कई बार धन की कमी के पीछे कुछ ऐसे कारण होते हैं जिन्हें हम ज्योतिष उपायों से ठीक कर सकते हैं। इसका कारण यह है कि जिस घर में कलह होता है, वहां मां लक्ष्मी का वास नहीं होता। हर किसी की अपने गृहस्थ जीवन में सुख और शांति की कामना होती है। घर और जीवन की खुशहाली ही व्यक्ति को जीवन में प्रगति के मार्ग पर ले जाती है। परिवार में व्याप्त कलह यानी की क्लेश से व्यक्ति का जीवन कठिनाइयों से भर जाता है। गृह क्लेश से बचने या उसे कम करने के लिए ज्योतिष में कई प्रकार के उपाय बताए गए हैं। हम आगे आपको ऐसे ही कुछ उपाय बता रहे हैं, जिनके इस्तेमाल से आपका जीवन सुखमय और खुशहाल बनाया जा सकता है।
पूर्व की और सिर रखकर सोए
आप किस दिशा में सिर और पैर करके सोते हैं यह गृह कलह में काफी अहम भूमिका निभाता है। गृह कलह से मुक्ति के लिए रात को सोते समय पूर्व की और सिर रखकर सोए। इससे आपको तनाव से राहत मिलेगी। ऐसा करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
हनुमान जी की पूजा करें
हनुमान जी की नियमित रूप से की गई उपासना आपको सभी प्रकार के संकट और गृह कलह से दूर रखता है। यदि कोई महिला गृह कलह से परेशान हैं तो भोजपत्र पर लाल कलम से पति का नाम लिखकर तथा ‘हं हनुमंते नम:’ का 21 बार उच्चारण करते हुए उस पत्र को घर के किसी कोने में रख दें। इसके अलावा 11 मंगलवार नियमित रूप से हनुमान मंदिर में चोला चढाएं एवं सिंदूर चढाएं। ऐसा करने से परेशानियों से राहत प्राप्त होगी।
शिवलिंग पर जल चढ़ायें
प्रतिदिन सुबह में स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर मंदिर या घर पर शिवलिंग के सामने बैठकर शिव उपासना करें। आप ‘ऊँ नम: सम्भवाय च मयो भवाय च नम:। शंकराय च नम: शिवाय च शिवतराय च:।।’ मंत्र का 108 बार उच्चारण कर सकते हैं। इसके बाद आप शिवलिंग पर जलाभिषेक करें। ऐसा नियमित करने से प्पति-पत्नी के वैवाहिक जीवन में सुख शांति बनी रहती है।
गणेश जी की उपासना करें
यदि किसी घर में पति-पत्नी या बाप-बेटे के बीच कलह है या किसी भी बात पर विवाद चल रहा है तो इसमें गणेश उपासना फायदेमंद रहेगी। वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने के लिए आप नुक्ति के लड्डू का भोग लगाकर प्रतिदिन श्री गणेश जी और शक्ति की उपासना करे।
चीटियों को शक्कर या आटा डालें
चीटियों के बिल के पास शक्कर या आटा व चीनी मिलाकर डालने से गृहस्थ की समस्याओं का निवारण होता है। ऐसा नियमित 40 दिन तक करें। ध्यान रखें कि इस प्रक्रिया में कोई नागा न हो।
कुमकुम लगाए
एक गेंदे के फूल पर कुमकुम लगाकर उसे किसी देव स्थान में मूर्ति के सामने रख दें। ऐसा करने से रिश्तों में आया तनाव और मतभेद दूर होते हैं। साथ ही छोटी कन्या को शुक्रवार को मीठी वस्तु खिलाने और भेंट करने से आपके संकटों का निवारण होता है।
घर मे व्याप्त कलह क्लेश को कम करने के लिए पति-पत्नी को रात को सोते समय अपने तकिये में सिंदूर की एक पुड़िया और कपूर रखें। सुबह में सूर्योदय से पहले उठकर सिंदूर की पुड़िया घर से बाहर फेंक दें और कपूर को निकालकर अपने कमरे में जला दें। ऐसा करने से लाभ मिलेगा।
मां लक्ष्मी को समर्पित है शुक्रवार का दिन
23 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी को समर्पित है। इस दिन धन की देवी मां लक्ष्मी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए वैभव लक्ष्मी का व्रत भी किया जाता है। इस व्रत को करने वाले जातक को धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। साथ ही जातकों को सभी संकटों से मुक्ति मिलती है। वहीं आर्थिक तंगी से निजात पाने के लिए मां लक्ष्मी की पूजा करने की सलाह दी जाती है।
ऐसे में जातक श्रद्धा-भाव से हर शुक्रवार को मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं। इसलिए अगर आप भी धन की समस्या से निजात पाना चाहते हैं, तो आप हर शुक्रवार के दिन भक्ति-भाव से मां लक्ष्मी की पूजा कर सकते हैं। वहीं मां लक्ष्मी की पूजा के दौरान उनके विभिन्न नामों का जप भी करना चाहिए।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (23 अक्टूबर 2025)
23 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- तनाव व उदर रोग, मित्र लाभ, राज-भय, पारिवारिक समस्या अवश्य सुलझेगी।
वृष राशि :- अनुभव सुख, मंगल कार्य, विरोध, मुकदमों-मामलों में विजय।
मिथुन राशि :- कुसंगति से हानि, विरोध, भय, यात्रा, सामाजिक कार्यों में व्यवधान अवश्य होगा।
कर्क राशि :- भूमि-लाभ, स्त्री-सुख, हर्ष, प्रगति, स्थिति में सुधार, लाभ अवश्य ही होगा।
सिंह राशि :- तनाव व विवाद से बचें, विरोधियों की चिन्ता, राज कार्यों से प्रतिष्ठा मिल सकेगी।
कन्या राशि :- भूमि-लाभ, स्त्री-सुख, हर्ष, प्रगति, स्थिति में सुधार, लाभ तथा कार्य उत्तम होंगे।
तुला राशि :- प्रगति, वाहन का भय, भूमि लाभ, कलह, कुछ अच्छे कार्य कर सकेंगे ध्यान रखें।
वृश्चिक राशि :- कार्य सिद्ध, विरोध, लाभ, हर्ष, कष्ट, व्यय होवे, व्यापार में सुधार होगा।
धनु राशि :- यात्रा में हानि, कष्ट, व्यय में कमी, व्यवस्था का अनुभव होगा।
मकर राशि :- शुभ कार्य, वाहन आदि सुख, रोग, धार्मिक कार्य, कुछ अच्छे कार्य हो सकते हैं ध्यान दें।
कुंभ राशि :- अभीष्ट सिद्ध, राज-भय, कार्य बाधा, राज कार्यों में रुकावट का अनुभव होगा।
मीन राशि :- अल्प हानि, रोग भय, सम्पर्क लाभ, राज कार्य में विलम्ब, परेशानी होगी।
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