धर्म एवं ज्योतिष
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (02 नवंबर 2025)
2 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- कार्य-कुशलता से संतोष, कुछ समस्यायें सुलझें किन्तु मन अशांत रहेगा।
वृष राशि :- कार्य-कुशलता एवं स्त्री-वर्ग से सुख-भोग की प्राप्ति होगी, कार्य बनेंगे।
मिथुन राशि :- धन लाभ, कार्य-कुशलता से संतोष, बिगड़े हुये कार्य बनेंगे, कार्य लाभ होगा।
कर्क राशि :- आशानुकूल सफलता का हर्ष, स्वभाव में क्रोध, मन में उद्विघ्नता रहेगी।
सिंह राशि :- भाग्य का सितारा चमकेगा, रुके हुये कार्य बनेंगे, योजनायें फलीभूत अवश्य होंगी।
कन्या राशि :- स्त्री-वर्ग से सुख, कार्य में सुधार अवश्य होगा, आर्थिक योजना पूर्ण अवश्य ही होगी।
तुला राशि :- आशानुकूल सफलता का हर्ष अवश्य होगा, कार्यवृत्ति में सुधार, बिगड़े कार्य बनेंगे।
वृश्चिक राशि :- मान-प्रतिष्ठा, प्रभुत्व वृद्धि, इष्ट-मित्र सुखवर्धक होंगे, रुके कार्य बन ही जायेंगे।
धनु राशि :- असमर्थता, शारीरिक बेचैनी, कुछ चिन्तायें मन उद्विघ्न रखें, कार्य अवरोध होगा।
मकर राशि :- कार्य-कुशलता से संतोष, परिवर्तन प्रभावी फलप्रद होगा, रुके व्यवसाय बनेंगे।
कुंभ राशि :- कुटुम्ब की समस्यायें कष्टप्रद हों, व्यवसायिक क्षमता पर ध्यान अवश्य दें।
मीन राशि :- सामाजिक कार्यों में मान-प्रतिष्ठा, कार्य-कुशलता से संतोष, अधिकारियों से मेल-मिलाप।
हनुमानजी के इस मंदिर में लगता है डर, भूत प्रेत के लिए प्रेतराज सरकार की लगती है पेशी, नहीं लेते यहां का प्रसाद
1 Nov, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारत में आज भी कई ऐसे मंदिर हैं, जो रहस्यों और चमत्कारों से भरे हुए हैं. हर मंदिर की अपनी कहानी होती है, लेकिन मेहंदीपुर बालाजी मंदिर की बात ही अलग है. यह मंदिर ना केवल राजस्थान का बल्कि पूरे भारत का सबसे प्रसिद्ध और चमत्कारी हनुमान मंदिर है. यह राजस्थान के दौसा जिले में दो पहाड़ियों के बीच बसा हुआ है. जैसे ही आप यहां कदम रखते हैं, आपको कई अजीबोगरीब नजारे देखने को मिलेंगे, जिन्हें देखकर पहली बार आने वाले लोग चौंक जाते हैं और कभी-कभी डर भी जाते हैं. यह मंदिर जीवित बालाजी के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यहां आज भी हनुमानजी के प्रत्यक्ष चमत्कार और दिव्य अनुभव प्राप्त होते हैं. आइए जानते हैं राजस्थान के मेहंदीपुर बालाजी मंदिर की खास बातें…
बाल रूप में हनुमानजी
मंदिर में बालाजी की मूर्ति हनुमानजी का बाल रूप है. इस मूर्ति की सबसे खास बात यह है कि बाईं ओर एक छिद्र से लगातार जल बहता रहता है. लोग इसे बालाजी का पसीना मानते हैं और इस जल की छीटों को इतना पवित्र मानते हैं कि इससे बुरी नजर से बचाव होता है. हालांकि, इसका स्रोत क्या है, यह किसी को नहीं पता, लेकिन श्रद्धालुओं में इसे लेकर गहरा विश्वास है. त्रिदेव रूप इस मंदिर की विशेषता है कि यहां हनुमानजी, भैरवजी और प्रेतराजजी मिलकर पीड़ितों को मुक्ति प्रदान करते हैं.
मंदिर के नियम
मंदिर में प्रेतराज सरकार और भैरवबाबा यानी कोतवाल कप्तान की मूर्तियां भी हैं. यहां हर दिन दो बजे प्रेतराज सरकार के दरबार में पेशी होती है, जिसमें लोगों पर आए भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र को दूर किया जाता है. मंदिर का एक और नियम है कि यहां के किसी भी प्रसाद को आप घर नहीं ले जा सकते और न ही किसी को दे सकते हैं. अगर ऐसा करते हैं, तो ऊपरी साया आप पर आ सकता है.
मंदिर में 2 प्रकार के प्रसाद
मंदिर में प्रसाद दो प्रकार के हैं, दर्खावस्त और अर्जी. दर्खावस्त को हाजरी भी कहा जाता है और इसे लेने के बाद तुरंत वहां से निकलना होता है. अर्जी का प्रसाद तीन थालियों में मिलता है और लौटते समय इसे पीछे फेंकना होता है. हालांकि, इसे फेंकते समय पीछे बिल्कुल नहीं देखना चाहिए. मेहंदीपुर बालाजी मंदिर अपने रहस्यों, अनोखी परंपराओं और आस्था के लिए जाना जाता है. यहां सिर्फ सिर झुकाने से ही मन को शांति और जीवन में नई दिशा मिलती है.
इस तरह हुई मंदिर की स्थापना
लोककथाओं के अनुसार लगभग 1000 वर्ष पहले एक ब्राह्मण के पुत्र को स्वप्न में बालाजी महाराज ने दर्शन दिए और कहा कि वह जिस स्थान पर स्वयंभू रूप में प्रकट होंगे, वहां उनका मंदिर बनवाया जाए. स्वप्न के अनुसार भूमि खोदने पर हनुमानजी की मूर्ति निकली और वहीं मेहंदीपुर बालाजी मंदिर की स्थापना हुई. तब से आज तक यह स्थान भूत-प्रेत, नकारात्मक ऊर्जा, नजरदोष, जादू-टोना और ग्रहबाधा से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है.
मेहंदीपुर बालाजी मुख्य आरती और समय
प्रातः आरती: लगभग 5:00 बजे
दोपहर आरती: 12:00 बजे
सायंकालीन आरती: सूर्यास्त के बाद
मेहंदीपुर बालाजी मंदिर के नियम
मंदिर परिसर में फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी पूर्णतः निषिद्ध है.
किसी भी वस्तु को वापस नहीं ले जाना चाहिए, चाहे वह प्रसाद ही क्यों न हो.
मंदिर में पूजा करते समय किसी पीड़ित व्यक्ति का मजाक या डर ना उड़ाएं, यह अनादर माना जाता है.
यहां के प्रसाद में लड्डू और चना-गुड़ होता है, जो केवल मंदिर परिसर में ही ग्रहण किया जाता है.
देवउठनी एकादशी पर करें 5 चमत्कारी मंत्रों का जाप... कट जाएंगे सारे पाप! होगा फायदा ही फायदा
1 Nov, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से शुभ फल प्राप्त होता है। ज्योतिषी पंडित कल्कि राम के अनुसार इस दिन अगर विशेष मंत्रों का जाप किया जाए तो न केवल सभी पापों का नाश होता है बल्कि जीवन में धन, सुख और सौभाग्य की वृद्धि भी होती है.
अयोध्या के ज्योतिषी पंडित कल्कि राम बताते हैं कि कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवउठनी एकादशी कहा जाता है. यह वही पावन तिथि है जब भगवान श्रीहरि विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागृत होते हैं. इसी दिन से सभी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत मानी जाती है. इस दिन श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना करने और विशेष मंत्रों का जाप करने से भगवान प्रसन्न होते हैं.
कहां जाता है अगर देवउठनी एकादशी तिथि के दिन पूरी श्रद्धा के साथ अगर आप भगवान श्री हरि विष्णु के मंत्र का जाप कर रहे हैं तो आपकी मनचाहा मुराद भी पूरी होगी और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होगी. ऐसी स्थिति में इस दिन जरूर दिए गए इस मंत्र का जाप करें .
<strong>ॐ नमो भगवते वासुदेवाय </strong>अगर आप देवउठनी एकादशी तिथि के दिन दिए गए 108 बार इस मंत्र का जाप करते हैं तो जीवन में सफलता प्राप्त होगी मां को शांति मिलेगी और समस्त पापों से मुक्ति मिलेगी .
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णु: प्रचोदयात्॥</strong> देवउठनी एकादशी के दिन अगर आप इस मंत्र का जाप करते हैं तो नकारात्मक ऊर्जा दूर होगी भगवान विष्णु की दिव्य कृपा पर सदैव बनी रहेगी .
ॐ श्री विष्णवे नमः</strong> इस मंदिर के जाप करने से घर में हमेशा सकारात्मक ऊर्जा बना रहता है. जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है. विशेष कर देवउठनी एकादशी के दिन इस मंत्र का जाप अत्यंत फलदाई माना जाता है.
एकादशी तिथि के दिन भूलकर भी अनाज ग्रहण नहीं करना चाहिए क्रोध झूठ और चुगली से बचना चाहिए दूसरों की आलोचना अथवा अपमान नहीं करना चाहिए इस दिन शराब मांस का सेवन करना बहुत ही बड़ा पाप माना जाता है इस दिन मां को सात्विक रखना चाहिए और भक्ति भाव में भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा आराधना में लीन रहना चाहिए.
गलती से भी भूलें नहीं तुलसी विवाह पर ये काम, वरना लक्ष्मी नाराज़ होकर छोड़ देंगी आपका घर
1 Nov, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तुलसी विवाह का पर्व हिंदू परंपरा में अत्यंत शुभ और पवित्र माना गया है. यह त्योहार कार्तिक मास में देवउठनी एकादशी के बाद आता है, जब भगवान विष्णु चार महीने के योग निद्रा से जागते हैं. ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान विष्णु का विवाह माता तुलसी के साथ होता है. इस शुभ अवसर पर घर-घर में तुलसी और विष्णु जी की विशेष पूजा की जाती है. इस दिन अगर कुछ विशेष उपाय किए जाएं तो जीवन में खुशहाली, समृद्धि और सुख का प्रवाह बना रहता है. इन्हीं उपायों में से एक है “धन की शुभ पोटली” जिसे तुलसी विवाह के दिन घर के मुख्य द्वार पर बांधना बेहद शुभ माना गया है. कहा जाता है कि यह छोटी-सी पोटली न केवल नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखती है, बल्कि घर में लक्ष्मी का वास भी बनाए रखती है. इस पोटली में रखी वस्तुएं प्रतीकात्मक रूप से धन, सौभाग्य और सकारात्मकता को आकर्षित करती हैं. आइए जानते हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से कि इसे तैयार करने का तरीका क्या है और इससे क्या-क्या लाभ मिलते हैं.
तुलसी विवाह का महत्व
तुलसी विवाह के दिन विशेष पूजा और अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है. इस अवसर पर महिलाएं पारंपरिक वस्त्र धारण करती हैं, तुलसी मंडप सजाया जाता है और तुलसी जी को सुहाग की सारी सामग्री अर्पित की जाती है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन पूजा करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम और स्थिरता बनी रहती है. साथ ही, घर में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है. कुछ लोग इस दिन देवउठनी एकादशी पर ही तुलसी विवाह करते हैं, जबकि कई स्थानों पर यह अगली द्वादशी तिथि को किया जाता है. दोनों ही दिन धार्मिक दृष्टि से समान रूप से शुभ माने जाते हैं.
तुलसी विवाह के दिन करें यह शुभ उपाय
अगर आप तुलसी विवाह यानी 2 नवंबर के दिन अपने घर के मुख्य द्वार पर धन की पोटली बांधते हैं, तो यह पूरे साल आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मदद करती है. कहा जाता है कि इस उपाय से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सौभाग्य का मार्ग खुलता है.
यह पोटली घर की रक्षा कवच की तरह काम करती है. अगर घर में बार-बार पैसों की तंगी महसूस होती है या बिना कारण धन खर्च होता है, तो यह उपाय काफी प्रभावी साबित हो सकता है. बस यह ध्यान रखें कि पोटली को एक बार तैयार करने के बाद एक साल तक मुख्य द्वार पर ही बांधकर रखें.
पोटली तैयार करने की विधि
1. तुलसी विवाह के दिन एक साफ लाल कपड़ा लें.
2. तुलसी के पौधे की जड़ को निकालकर गंगाजल से अच्छी तरह धो लें.
3. 11 अक्षत (चावल के साबुत दाने) लें, जो किसी भी तरह टूटे हुए न हों.
4. एक रुपये का सिक्का लें और इन सभी वस्तुओं को लाल कपड़े में रखकर छोटी-सी पोटली बना लें.
5. इस पोटली को घर के मुख्य द्वार के बाईं ओर मजबूती से बांध दें.
यह पोटली पूरे साल घर में शुभ ऊर्जा बनाए रखती है. इससे न केवल नकारात्मकता दूर होती है, बल्कि कार्यों में आने वाली अड़चनें भी खत्म होने लगती हैं.
पोटली कब और कैसे बदलें
यह पोटली पूरे एक साल तक मुख्य द्वार पर बंधी रहनी चाहिए. अगले साल जब तुलसी विवाह का दिन दोबारा आए, तब इसे उतारकर नई पोटली तैयार करें. पुरानी पोटली से एक रुपये का सिक्का निकालकर अपने पर्स या तिजोरी में रख लें, जिससे धन का संचित प्रभाव बना रहे. बाकी पोटली को किसी साफ बहते जल में प्रवाहित कर दें.
ऐसा करने से घर में धन का प्रवाह निरंतर बना रहता है और जीवन में स्थिरता आती है. यह एक ऐसा उपाय है जो न किसी भारी पूजा की मांग करता है, न किसी विशेष वस्तु की – बस सच्ची श्रद्धा और विश्वास से करने की जरूरत है.
पोटली के लाभ
-घर में धन और समृद्धि का प्रवाह बना रहता है.
-नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं कर पाती.
-आर्थिक परेशानियां धीरे-धीरे कम होने लगती हैं.
-परिवार के सदस्यों के बीच सामंजस्य और शांति बनी रहती है.
-नए अवसर और उन्नति के मार्ग खुलते हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (01 नवंबर 2025)
1 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष- दूसरों के कार्यो में रखने से मानसिक भावना विक्षुब्ध होगी ध्यान अवश्य रखे।
वृष- मान प्रतिष्ठा प्रभुत्व वृद्धि कार्य कुशलता स्त्री वर्ग सुखभोग ऐश्वर्य होगा।
मिथुन- आशानुकूल सफलता का हर्ष कार्य में सुधार व्यवसाय गति उत्तम अवश्य होगी।
कर्क- अधिकारियों का समर्थन विफल हो व्यवसायिक क्षमता व कार्य रुकेगें।
सिंह- अधिक प्रयोजन संघर्ष करने से सफल होगा भाग्य का सितारा प्रबल होंगा।
कन्या- तर्क वितर्क भावकुता से हानि वृथा थकावट बेचैनी तथा कार्य में हानि होगी।
तुला- असमर्थता का वातावरण बना रहे प्रयत्नशीलता प्रभावी अवश्य ही रहेगी।
वृश्चिक- दैनिक कार्य वृत्ति में बाधा असमर्थता का वातावरण बना ही रहेंगा।
धनु- कहीं विभ्रम विघटन कारी तत्व परेशान करें आकस्मिक कार्य हानि होगी।
मकर- कार्य बनने में मानसिक अशांति मिले मनोबल उत्साह वर्धक अवश्य होगा।
कुंभ- स्त्री शरीर कष्ट मानसिक बेचैनी कहीं तनाव ग्रस्त विवाद होने से बचेंगे ध्यान दे।
मीन- मानसिक विभ्रम धन का व्यय एवं उद्विघ्नता बनी रहें कार्य हानि होगी।
142 दिन बाद निद्रा से जागेंगे श्रीहरि
31 Oct, 2025 06:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दो दिन होगी देव प्रबोधिनी एकादशी… रवि योग और रुचक महापुरुष राजयोग का संयोग
देवउठनी एकादशी (Devuthani Ekadashi) इस बार 1 नवंबर, शनिवार को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु (Lord Vishnu) और मां लक्ष्मी (Goddess Lakshmi) की उपासना की जाती है। इस एकादशी को देवोत्थान एकादशी, देवुत्थान एकादशी और देव प्रबोधिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी से सभी मांगलिक कार्यों जैसे विवाह, मुंडन की शुरुआत हो जाती है और चार महीने के चातुर्मास का समापन होता है। इस बार देवउठनी एकादशी बेहद खास मानी जा रही है, क्योंकि इस दिन एक खास योग बनने जा रहे हैं। दरअसल, इस दिन रवि योग और रुचक महापुरुष राजयोग का संयोग बनने जा रहा है। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु लगभग 142 दिन बाद योग निद्रा से जागेंगे।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। यह तिथि हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और शुभ मानी गई है। इसी दिन भगवान विष्णु चार महीनों की योग निद्रा से जागते हैं। भगवान विष्णु के जागने के साथ ही चातुर्मास का समापन होता है और सभी मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन आदि पुन: प्रारंभ हो जाते हैं। देवउठनी एकादशी को देव प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन साधक भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत का पालन करते हैं। इसके साथ ही इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है। इस साल एकादशी तिथि दो दिन होने के कारण असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि किस दिन देवउठनी एकादशी का व्रत रखना लाभकारी हो सकता है।
वैदिक पंचांग के अनुसार
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 1 नवंबर को सुबह 9 बजकर 12 मिनट पर आरंभ हो रही है, जो 2 नवंबर को शाम 7 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में देवउठनी एकादशी का व्रत गृहस्थ लोग 1 नवंबर को और वैष्णव संप्रदाय के लोग 2 नवंबर को रखेंगे। दरअसल, वैष्णव परंपरा में व्रत का पारण हरियासर करते हैं यानी श्रीहरि विष्णु के जागने का सटीक मुहूर्त होता है, वहीं गृहस्थ लोग पंचांग के अनुसार रखते हैं।
संतों को अक्षय फल, गृहस्थों को लाभ
साल 2025 में हरि प्रबोधिनी एकादशी दो दिन तक मनाई जाएगी। गृहस्थ जीवनयापन वाले और वैष्णव यानी साधु-संतों को इस एकादशी का संपूर्ण फल प्राप्त होगा। कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 1 नवंबर से शुरू होगी, जो 2 नवंबर तक रहेगी। 1 नवंबर को स्मार्त यानी गृहस्थी में रहने वाले साधकों की ओर से एकादशी का व्रत करने पर इसका संपूर्ण फल प्राप्त होगा और जीवनभर कार्यों में बाधा, समस्याएं नहीं आएंगी। 2 नवंबर को वैष्णव संप्रदाय यानी साधु-संतों की ओर से यह व्रत करने पर उन्हें अक्षय फल की प्राप्ति होगी।
एकादशी व्रत पारण का समय
2 नवंबर को पारण का समय – दोपहर 01 बजकर 11 मिनट से 03 बजकर 23 मिनट
हरि वासर समाप्त होने का समय -12.55
3 नवंबर को गौण एकादशी के लिए पारण का समय-सुबह 06 बजकर 34 मिनट से 08 बजकर 46 मिनट तक
विधि-विधान से करें पूजन
देवउठनी ग्यारस के दिन ब्रह्मï मुहूर्त में जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। इस दिन घर के दरवाजे को पानी से स्वच्छ करना चाहिए, फिर चूने व गेरू से देवा बनाने चाहिए। उसके ऊपर गन्ने का मंडप सजाने के बाद देवताओं की स्थापना करना चाहिए। भगवान विष्णु का पूजन करते समय गुड़, रूई, रोली, अक्षत, चावल, पुष्प रखना चाहिए। पूजन में दीप जलाकर देव उठने का उत्सव मनाते हुए ‘उठो देव बैठो देव’ का गीत गाना चाहिए। देव प्रबोधिनी एकादशी का महत्व शास्त्रों में उल्लेखित है। गोधूलि बेला में तुलसी विवाह करने का पुण्य लिया जाता है। एकादशी व्रत और कथा श्रवण से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
नारायण से पहले जागती हैं महालक्ष्मी
देवउठनी ग्यारस को भगवान चार माह की निद्रा से उठते हैं। आषाढ़ माह शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान नारायण शयन करते हैं और कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागते हैं। यह भी मान्यता है कि पति से पूर्व पत्नी जागती हैं और घर की सफाई सहित अन्य कार्य पूर्ण कर पति के जागने की प्रतीक्षा करती हैं। ठीक उसी प्रकार माता महालक्ष्मी दीपावली के दिन जागती हैं। इसी कारण सभी घरों में साफ-सफाई की जाकर घरों की साज-सज्जा की जाती है।
ऐसे जगाएं भगवान को
व्रती स्त्रियां इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन में चौक बनाएं। इसके पश्चात भगवान विष्णु के चरणों को कलात्मक रूप से अंकित करें। फिर दिन की तेज धूप में विष्णु के चरणों को ढंक दें। देवउठनी एकादशी को रात्रि के समय सुभाषित स्तोत्र पाठ, भगवत कथा और पुराणादि का श्रवण और भजन आदि का गायन करें। घंटा, शंख, मृदंग, नगाड़े और वीणा बजाएं। मंत्रों का जाप करें।
घर में विराजेंगे श्री, संपदा और वैभव
श्रीकृष्ण अथवा विष्णुजी तुलसी पत्र से प्रोक्षण किए बिना नैवेद्य स्वीकार नहीं करते। कार्तिक मास में विष्णु भगवान का तुलसीदल से पूजन करने का महत्व अवर्णनीय है। तुलसी विवाह से कन्यादान के बराबर पुण्य मिलता है, साथ ही घर में श्री, संपदा, वैभव विराजते हैं।
तुलसी नामाष्टक का जप करें
अश्वमेध यज्ञ से प्राप्त पुण्य कई जन्मों तक फल देने वाला होता है। यही पुण्य तुलसी नामाष्टक के नियमित पाठ से मिलता है। तुलसी नामाष्टक का पाठ किया जाना चाहिए।
तुलसी नामाष्टकवृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नन्दनीच तुलसी कृष्ण जीवनी।।
एतभामांष्टक चैव स्त्रोतं नामर्थं संयुतम।
य: पठेत तां च सम्पूज् सौऽश्रमेघ फलंलमेता।।
सनातन धर्म के अनुसार
शास्त्रानुसार ग्यारस के दिन किए गए दान-पुण्य का हजार गुना फल मिलता है। अत: इन दोनों ही दिन जितना अधिक से अधिक हो सके दान-पुण्य करना चाहिए। इस दिन गायों को चारा खिलाने तथा गरीब भिखारियों को भोजन, दान करने से समस्त पापों का नाश होता है और मृत्यु के बाद स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
एकादशी को भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी का भी दिन माना जाता है। अत: यथाशक्ति देवशयनी एकादशी को उपवास रखकर भगवान विष्णु एवं मां लक्ष्मी की विधि अनुसार पूजा-आराधना करना चाहिए। ऐसा करने से इस जीवन में तो सुख-समृद्धि और शांति का आशीर्वाद मिलता है, मृत्यु उपरांत मोक्ष भी प्राप्त होता है।
अबूझ मुहूर्त में शुभ कार्य
ú नम: नारायणाभ्याम, ú उमा माहेश्वराय नम:, ú रां ईं हीं हूं हूं, ú घृणी सूर्याय आदित्य ú व दिवाकराय विरमहे महातेनाम धीमहिं तन्नाभानू प्रचोदयात मंत्र के जप से नौकरी में तरक्की, उत्तम स्वास्थ्य सहित मनोकामनाएं पूरी होती हैं। व्रत के दौरान इन मंत्रों का जप करना चाहिए। खखोल्काय स्वाहा से सूर्यदेव को अघ्र्य दें। देवउठनी ग्यारस के अबूझ मुहूर्त में सोने और चांदी की खरीदी लाभदायक रहेगी। इस दिन खरीदी गई वस्तु को भगवान विष्णु को अर्पित करने के बाद उसका उपयोग करने से शुभ फल प्रदान करने के साथ ही लंबे समय तक आपके पास रहेगी। इस दिन गन्ना और अन्य ऋतु फलों को दान करने से समृद्धि बढ़ती है।
भगवान की मूर्ति रखने की सही दिशा कौनसी है? क्या W3 दिशा में रखने से कैसे रुक सकती है प्रगति?
31 Oct, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
घर का हर कोना कुछ न कुछ कहता है. कई बार हम सोचते हैं कि अगर कोई दिशा खाली है, तो वहां भगवान की मूर्ति रख दी जाए. खासतौर पर वेस्ट-थ्री (W3) यानी पश्चिम की तीसरी दिशा में, लेकिन क्या ये सही है? बहुत लोग कहते हैं “भगवान को रख दो, फिर कुछ नहीं करना पड़ेगा, वो खुद सब देख लेंगे.” लेकिन वास्तु शास्त्र ऐसा नहीं मानता. हर दिशा का एक असर होता है, और अगर आपने किसी जगह पर गलत तरीके से भगवान को रखा, तो वहां रुकावटें आ सकती हैं. इस लेख में हम बात करेंगे कि W3 दिशा में भगवान को रखना सही है या नहीं, और इससे जुड़ी खास बातें जो आपको जाननी चाहिए. इस बारे में बता रहे हैं
W3 दिशा क्या होती है?
W3 यानी पश्चिम दिशा का तीसरा भाग, जो मुख्य वेस्ट लाइन के करीब होता है. यह दिशा सामान्य तौर पर मूवमेंट और ठहराव से जुड़ी होती है. यहीं पर अगर कोई चीज़ लंबे समय तक रख दी जाए जैसे भगवान की मूर्ति तो वहां रुकावटें बनने लगती हैं. वास्तु के मुताबिक, W3 एक ऐसी जगह है जो चीजों को अटका देती है. यहां कोई भी चीज रख दो, वह वहीं की होकर रह जाती है. अब अगर आप भगवान को यहां बिठा देते हैं, तो सिर्फ आपकी श्रद्धा नहीं अटकती, बल्कि आपके जीवन में कई फैसले भी अटकने लगते हैं. लोग कोशिश करते रहते हैं, लेकिन बात नहीं बनती.
क्या होता है जब भगवान W3 में होते हैं?
जब आप भगवान की मूर्ति W3 में रखते हैं, तो ऐसा महसूस होता है जैसे कुछ चीज़ें रुक गई हैं. आप काम कर रहे हैं, मेहनत भी कर रहे हैं, लेकिन उसका रिजल्ट नहीं मिल रहा. यहां बैठा हुआ भगवान “स्थान” ले लेता है. वो हिलता नहीं, आगे नहीं बढ़ता और न ही आपको आगे बढ़ने देता है. आपके घर में एक तरह की रुकी हुई ऊर्जा बनने लगती है. कुछ लोगों को ऐसा लगता है जैसे कोई भी बात पूरी होने ही नहीं देती. यही वजह है कि वास्तु में इस जगह को पूजा के लिए सही नहीं माना गया है.
सही दिशा कौन-सी है?
अगर आप भगवान की मूर्ति या पूजा की जगह तय करना चाहते हैं, तो सबसे अच्छे विकल्प हैं:
1. ईशान कोण (North-East) – इसे सबसे शुभ दिशा माना जाता है पूजा-पाठ के लिए.
2. पूर्व (East) – यहां पर सूर्य की ऊर्जा सबसे पहले आती है, जो घर में पॉज़िटिव एनर्जी लाती है.
3. उत्तर (North) – इसे धन और तरक्की से जोड़कर देखा जाता है.
इन तीनों में से कोई भी दिशा चुन सकते हैं, बस ये ध्यान रखें कि भगवान का मुख आमतौर पर पश्चिम या दक्षिण की ओर न हो.
अगर गलती से W3 में रख दिया हो तो?
अगर आपने पहले से ही भगवान की मूर्ति W3 में रख दी है और अब पढ़कर समझ में आया है कि ये जगह ठीक नहीं है, तो घबराने की ज़रूरत नहीं है.
आप बस पूजा के स्थान को धीरे-धीरे शुभ दिशा में शिफ्ट करें. मूर्ति को हटाने से पहले एक दिन पूजा करें, उन्हें धन्यवाद दें, फिर उन्हें नई जगह रखें.
अगर घर में शिवलिंग गलत दिशा में रखी है तो हो जाएं सतर्क, वरना छिन सकती है सकारात्मकता
31 Oct, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भगवान शिव यानी भोलेनाथ, वो शक्ति जो पूरे ब्रह्मांड की ऊर्जा को संतुलित रखती है. कहते हैं, जहां शिव का वास होता है, वहां नकारात्मक ऊर्जा टिक नहीं पाती और घर में सुख-शांति का माहौल बना रहता है. शायद इसीलिए कई लोग अपने घरों में शिव जी की मूर्ति या शिवलिंग की स्थापना करते हैं ताकि माहौल सकारात्मक रहे और जीवन में स्थिरता बनी रहे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि शिव जी की मूर्ति या शिवलिंग को घर में कहीं भी रख देना ठीक नहीं होता? वास्तु शास्त्र के मुताबिक, अगर मूर्ति सही दिशा में रखी जाए तो घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है, लेकिन गलत दिशा में रखने पर इसका उलटा असर भी पड़ सकता है. शिवलिंग या भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित करने के लिए कुछ खास नियम बताए गए हैं – जैसे किस दिशा में रखना शुभ है, मूर्ति कैसी होनी चाहिए, और किन बातों से बचना जरूरी है. अगर आप भी अपने घर में भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग रखने की सोच रहे हैं, तो वास्तु से जुड़ी ये बातें जान लेना बेहद जरूरी है, क्योंकि छोटी सी गलती भी आपके घर की ऊर्जा को प्रभावित कर सकती है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
भगवान शिव की मूर्ति की सही दिशा
वास्तु शास्त्र के मुताबिक, भगवान शिव की मूर्ति उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) में रखनी चाहिए. यह दिशा देवताओं की मानी जाती है और शिव जी के वास की दिशा भी यही है. जब मूर्ति इस दिशा में होती है, तो घर में सुख, शांति और आपसी मेलजोल बढ़ता है.
मूर्ति को इस तरह स्थापित करें कि शिव जी का मुख दक्षिण दिशा की ओर रहे. इसका कारण यह है कि शिव जी का दक्षिण दिशा से गहरा संबंध है, और इस दिशा से घर में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है. अगर मूर्ति गलत दिशा में रखी गई तो घर के सदस्यों के बीच तनाव या अनबन की स्थिति भी बन सकती है, इसलिए दिशा तय करते समय कंपास या वास्तु सलाहकार की मदद लेना अच्छा रहेगा.
कैसी हो शिव जी की मूर्ति?
मूर्ति का आकार बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए. घर के मंदिर के लिए 5 से 8 इंच की मूर्ति सबसे बेहतर मानी जाती है. बहुत बड़ी मूर्ति मंदिर के आकार और घर की ऊर्जा पर भारी पड़ सकती है.
घर में शिवलिंग रखने के नियम
सामग्री की बात करें तो मूर्ति पत्थर, पीतल, क्रिस्टल या पंचधातु की बनी हो तो ज्यादा शुभ मानी जाती है. इन धातुओं में प्राकृतिक ऊर्जा होती है जो वातावरण को शांत और संतुलित बनाती है.
ध्यान रहे, मूर्ति शांत या ध्यानमग्न मुद्रा में होनी चाहिए. घर के मंदिर में तांडव मुद्रा वाली मूर्ति नहीं रखनी चाहिए क्योंकि यह मुद्रा ऊर्जा को अस्थिर कर देती है और घर के माहौल में बेचैनी ला सकती है.
घर में शिवलिंग रखने के नियम
अगर आप मूर्ति की जगह शिवलिंग स्थापित करना चाहते हैं, तो उसके लिए भी कुछ नियम हैं.
शिवलिंग को हमेशा उत्तर-पूर्व दिशा में ही रखें. शिवलिंग के नीचे योनिपीठ (आधार भाग) होना चाहिए और जलाधारी का मुख उत्तर दिशा की ओर रहना जरूरी है.
हर सुबह शिवलिंग पर गंगाजल, दूध और बेलपत्र चढ़ाना शुभ माना जाता है. इससे घर में पॉजिटिविटी बनी रहती है और नकारात्मकता खत्म होती है.
एक बात और – घर में एक ही शिवलिंग रखें. कई शिवलिंग एक साथ रखने से ऊर्जा असंतुलित हो जाती है और वास्तु के हिसाब से यह ठीक नहीं माना जाता.
मूर्ति की जगह और प्लेटफॉर्म का ध्यान रखें
भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग को कभी भी सीधे फर्श पर न रखें. इसे लकड़ी या संगमरमर के छोटे मंच पर रखें. इससे मूर्ति ऊंचाई पर रहेगी और ऊर्जा का प्रवाह सही दिशा में जाएगा.
मूर्ति के आसपास हमेशा साफ-सफाई रखें और वहां जूते-चप्पल या गंदे कपड़े न रखें, अगर आप वहां दीपक जलाते हैं, तो उसे भी पूर्व या उत्तर दिशा में रखें. घर में भैरव या तांडव मुद्रा वाली मूर्तियां रखने से बचें क्योंकि यह घर की शांति में बाधा डाल सकती हैं.
मूर्ति की देखभाल और श्रद्धा का महत्व
मूर्ति या शिवलिंग केवल सजावट का हिस्सा नहीं, बल्कि श्रद्धा और ऊर्जा का प्रतीक है. इसलिए जब भी पूजा करें, मन को शांत रखकर करें. पूजा के समय जल्दबाज़ी न करें और मूर्ति को रोज़ गंगाजल से साफ करें. अगर किसी वजह से मूर्ति टूट जाए, तो उसे तुरंत हटाकर किसी मंदिर या नदी में प्रवाहित कर दें. टूटी मूर्ति को घर में रखना अशुभ माना जाता है.
घर में नहीं हो रही तरक्की? देवउथान एकादशी पर करें ये उपाय, खुल जाएगी किस्मत
31 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वैसे तो साल भर में कई एकादशी का व्रत आता है और सभी का खास महत्व होता है. वर्तमान में कार्तिक महीना चल रहा है और इस महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विशेष महत्व है. इसे देवउठनी एकादशी कहा जाता है. इस दिन भगवान विष्णु चार महीने बाद योग निद्रा से जागते हैं और सभी मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है. भगवान विष्णु के जागने पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. यदि इस दिन कुछ विशेष उपाय किए जाएं, तो जीवन की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं और घर में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है. इन उपायों के बारे में बैद्यनाथ मंदिर के तीर्थपुरोहित से जानें.
क्या कहते हैं बैद्यनाथ मंदिर के तीर्थपुरोहित
देवघर के बैद्यनाथ मंदिर के प्रसिद्ध तीर्थपुरोहित प्रमोद श्रृंगारी ने लोकल 18 के संवाददाता से बातचीत में बताया कि बैद्यनाथ पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को यह व्रत रखा जाता है. इसे देवोत्थान एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. इस वर्ष देवउठनी एकादशी 1 नवंबर 2025, शनिवार को मनाई जाएगी. शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु चार महीनों की योग निद्रा से जागते हैं और सृष्टि के संचालन का कार्य पुनः संभालते हैं. इस दिन कुछ उपाय अवश्य करने चाहिए.
देवउठनी एकादशी के दिन क्या उपाय करने चाहिए
बैद्यनाथ मंदिर के तीर्थपुरोहित प्रमोद श्रृंगारी बताते हैं कि इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा-अर्चना अवश्य करनी चाहिए. पूजा में दूध से बनी वस्तु भगवान विष्णु को अर्पित करनी चाहिए. इसके साथ ही तुलसी दल अर्पित करने से घर में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है. यदि इस दिन तुलसी के पौधे में कलावा बांधते हैं, तो हर मुसीबत से छुटकारा मिलेगा और सारे ग्रह दोष से मुक्ति मिलेगी.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (31 अक्टूबर 2025)
31 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- इष्ट मित्र सुखवर्धक अवश्य होंगे, सुख के साधन बने किन्तु गुप्त चिन्ता बनी रहेगी।
वृष राशि :- अधिक भावुकता से हानि होने का भय, कार्य-व्यवसाय में सतर्कता अवश्य रखें।
मिथुन राशि :- लाभांवित योजना बनेगी, आशानुकूल सफलता से हर्ष होगा, रुके कार्य बनेंगे।
कर्क राशि :- योजना फलीभूत होंगी, तनाव व बेचैनी बने, रुके कार्य पर ध्यान अवश्य दें।
सिंह राशि :- चिन्ताएं कम होंगी, लाभ आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, रुके कार्य बन जायेंगे।
कन्या राशि :- कार्य योजना में बाधायें, मन उद्विघ्न रखें तथा विभ्रम होने से बचने का प्रयास करें।
तुला राशि :- किसी से धोखा व विवादग्रस्त होने की सम्भावना है, समय का ध्यान अवश्य रखें।
वृश्चिक राशि :- कार्यगति में बाधा होते हुए भी कुछ सफलता मिलेगी, धैर्य से कार्य कर लें।
धनु राशि :- अधिकारी वर्ग से तनाव व मित्र की उपेक्षा से तनाव, अशांति तथा कार्यबाधा होगी।
मकर राशि :- स्त्री वर्ग से भोग-ऐश्वर्य की प्राप्ति, व्यवसायिक क्षमता अनुकूल बनी ही रहेगी।
कुम्भ राशि :- कार्य विफलत्व, प्रयत्न करने पर भी सफलता दिखायी न दें, अवरोध होगा।
मीन राशि :- तनाव कुछ कम हो, उद्विघ्नता बनी ही रहेगी, सतर्कता से रुके कार्य निपटा लें।
इन कारणों से हाथ में नहीं टिकता पैसा
30 Oct, 2025 07:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पैसा हर दौर में इंसान की जरूरत रहा है। इसलिए हर इंसान पैसा कमाना और पैसा बचाना भी चाहता है। कई बार ज्यादा कमाने के बावजूद पैसा हाथ में नहीं टिकता, ऐसा वास्तु दोष के लगने से भी होता है। इन दोषों की वजह से धन की देवी लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं, जिससे घर में नकारात्मक ऊर्जा का वास बढ़ जाता है लेकिन वास्तु शास्त्र में इसके उपाय बताए गए हैं, आइए जानते हैं उन उपायों के बारे में।
दीवार से निशान हटाएं
वास्तु शास्त्र में घर या दुकान की दीवारों पर गंदगी नकारात्मक ऊर्जा को आमंत्रित करती है। शास्त्रों में कहा गया है कि जहां मैल और अव्यवस्था हो, वहां देवी लक्ष्मी का वास नहीं होता। इसलिए, दीवारों की साफ-सफाई का भी विशेष ध्यान रखना जरूरी है, खास-तौर से उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा की दीवारें बिल्कुल साफ रखें। यह दिशा कुबेर और विष्णु से जुड़ी मानी गई है. अगर दीवारों में दरारें या सीलन दिखे तो तुरंत मरम्मत करवाएं। वास्तु के मुताबिक घर की दीवारों की रंगाई करवाने में चमकीले और हल्के रंगों का इस्तेमाल धन की स्थिरता बढ़ाने में मददगार साबित होता है।
मकड़ी के जाले देखने में मामूली लगते हैं, लेकिन वास्तु और धार्मिक दृष्टि से ये धन और अवसरों में रुकावट पैदा करते हैं। वास्तु के मुताबिक मकड़ी के जाले घर की सकारात्मक ऊर्जा को रोकते हैं। इसलिए सप्ताह में एक बार कोनों, छतों और फर्नीचर के पीछे की जगहों की सफाई जरूर करें।
पौधों की सूखी पत्तियां
वास्तु शास्त्र के मुताबिक पौधों की सूखी पत्तियां आलसपन का संकेत है! धर्मग्रंथों में भी कहा गया है कि सूखे या मुरझाए पेड़-पौधे नकारात्मक ऊर्जा लाते हैं! इसलिए रोजाना अपने पौधों की देखभाल करें, सूखी पत्तियां या टूटे तने तुरंत हटा दें! घर में तुलसी, मनी प्लांट या बांस जैसे पौधे रखें! माना जाता है कि ये पौधे तरक्की के रास्ते खोलते हैं! मुरझाई हुई तुलसी कभी भी घर के आंगन में न रखें! इससे देवी लक्ष्मी नाराज होती हैं.
चमगादड़
चमगादड़ अंधेरे और गंदगी में वास करने वाला जीव है, वास्तु शास्त्र के मुताबिक जहां चमगादड़ बसे हों वहां नकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है. ऐसी भी मान्यता है कि जिस घर या दुकान में चमगादड़ रहते हैं वहां देवी लक्ष्मी नहीं आती! ऐसी जगहों की तुरंत सफाई करवाएं! साफ-सफाई के बाद रोजाना सुबह गायत्री मंत्र या श्री सूक्त का पाठ करें, इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है!
नवंबर 2025 में पड़ने वाले व्रत और त्योहार
30 Oct, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में नवंबर 2025 का महीना धार्मिक दृष्टिकोण से बहुत ही खास रहेगा क्योंकि इसी महीने में चातुर्मास समाप्त होगा और शुभ कार्य जैसे विवाह आदि पर लगी रोक हट जाएगी। इस महीने में अन्य कईं प्रमुख त्योहार भी मनाए जाएंगे जैसे देवउठनी एकादशी, कालभैरव अष्टमी आदि। ये महीना हिंदू पंचांग के कार्तिक और अगहन मास के अंतर्गत रहेगा। नवंबर 2025 में पड़ने वाले व्रत ओर त्योहार इस प्रकार हैं।
1 नवंबर, शनिवार- देवउठनी एकादशी
2 नवंबर, रविवार- चातुर्मास समाप्त
3 नवंबर, सोमवार- सोम प्रदोष व्रत
4 नवंबर, मंगलवार- बैकुंठ चतुर्दशी
5 नवंबर, बुधवार- त्रिपुरारी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा, स्नान-दान व्रत पूर्णिमा
8 नवंबर, शनिवार- गणेश चतुर्थी व्रत
12 नवंबर, बुधवार- कालभैरव अष्टमी
15 नवंबर, शनिवार- उत्पन्ना एकादशी
17 नवंबर, सोमवार- प्रदोष व्रत
18 नवंबर, मंगलवार- शिव चतुर्दशी व्रत
19 नवंबर, बुधवार- श्राद्ध अमावस्या
20 नवंबर, गुरुवार- स्नान-दान अमावस्या
24 नवंबर, सोमवार- विनायक चतुर्थी व्रत
25 नवंबर, मंगलवार- विवाह पंचमी, नाग दिवाली, श्रीराम विवाहोत्सव
26 नवंबर, बुधवार- बैंगन छठ, चंपा षष्ठी
27 नवंबर, गुरुवार- नंदा सप्तमी
शनिदेव के हैं नौ वाहन
30 Oct, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सूर्यपुत्र शनिदेव न्याय के देवता हैं हालांकि लोग उनके कोप से भयभीत रहते हैं पर वह हमेशा ही कार्यों के अनुरुप परिणाम देते हैं। उनके कई वाहन हैं। शनि के वाहनों की बात करते हुए सामान्य रूप से कौवे के बारे में ध्यान आता है, लेकिन उनके कौवे सहित कुल 9 वाहन है। जिनमें से कई को ज्योतिषीय और धार्मिक महत्व के अनुसार बेहद शुभ माना गया हैं। इसके बावजूद जरूरी नहीं है कि वे सभी आपके लिए भी शुभ ही हों। इसलिए ये जानना अत्यंत आवश्यक है कि कौन शुभ है और कौन अशुभ। शास्त्रों की माने तो शनि जिस वाहन में सवार होकर किसी व्यक्ति की कुंडली में प्रवेश करते हैं उसकी राशि की गणना करके तय होता है कि उनका आगमन व्यक्ति के लिए अच्छा है या बुरा।
इस गणना की विधि सुनने में कठिन लगती है पर है गणित के सूत्रों की तरह एक दम तय है। इसके लिए जन्म नक्षत्र की संख्या और शनि के राशि बदलने की तिथि के नक्षत्र की संख्या जोड कर उसके योगफल को नौ से भाग करना होता है। इस गणना से मिली संख्या के आधार पर ही शनि का वाहन निर्धारित होता है। एक दूसरी विधि भी है, इसमें शनि के राशि प्रवेश करने की तिथि की संख्या, ऩक्षत्र संख्या, वार संख्या और नाम के प्रथम अक्षर संख्या सभी को जोडकर योगफल को 9 से भाग देदें, जो शेष संख्या आयेगी वो शनि के वाहन की जानकारी देगी। दोनो विधियों मे यदि शेष 0 बचे तो मानना चाहिए कि आपकी अपेक्षित संख्या 9 है।
सूर्य देव का परिवार
रविवार को सूर्यदेव का दिन माना जाता है। यश और सम्मान हासिल करने के लिए सभी लोग उनकी पूजा करते हैं। पर क्या आप सूर्यदेव के परिवार को जानते हैं। सूर्य देव का परिवार काफी बड़ा है। उनकी संज्ञा और छाया नाम की दो पत्नियां और दस संताने हैं। जिसमे से यमराज और शनिदेव जैसे पुत्र और यमुना जैसी बेटियां शामिल हैं। मनु स्मृति के रचयिता वैवस्वत मनु भी सूर्यपुत्र ही हैं।
सूर्य देव की दो पत्नियां संज्ञा और छाया हैं। संज्ञा सूर्य का तेज ना सह पाने के कारण अपनी छाया को उनकी पत्नी के रूप में स्थापित करके तप करने चली गई थीं। लंबे समय तक छाया को ही अपनी प्रथम पत्नी समझ कर सूर्य उनके साथ रहते रहे। ये राज बहुत बात में खुला की वे संज्ञा नहीं छाया है। संज्ञा से सूर्य को जुड़वां अश्विनी कुमारों के रूप में दो बेटों सहित छह संताने हुईं जबकि छाया से उनकी चार संताने थीं।
देव शिल्पी विश्वकर्मा सूर्य पत्नी संज्ञा के पिता थे और इस नाते उनके ससुर हुए। उन्होंने ही संज्ञा के तप करने जाने की जानकारी सूर्य देव को दी थी।
धर्मराज या यमराज सूर्य के सबसे बड़े पुत्र और संज्ञा की प्रथम संतान हैं।
यमी यानि यमुना नदी सूर्य की दूसरी संतान और ज्येष्ठ पुत्री हैं जो अपनी माता संज्ञा को सूर्यदेव से मिले आर्शिवाद के चलते पृथ्वी पर नदी के रूप में प्रसिद्ध हुईं।
सूर्य और संज्ञा की तीसरी संतान हैं वैवस्वत मनु वर्तमान (सातवें) मन्वन्तर के अधिपति हैं। यानि जो प्रलय के बाद संसार के पुर्निमाण करने वाले प्रथम पुरुष बने और जिन्होंने मनु स्मृति की रचना की।
सूर्य और छाया की प्रथम संतान है शनिदेव जिन्हें कर्मफल दाता और न्यायधिकारी भी कहा जाता है। अपने जन्म से शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखते थे। भगवान शंकर के वरदान से वे नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर नियुक्त हुए और मानव तो क्या देवता भी उनके नाम से भयभीत रहते हैं।
छाया और सूर्य की कन्या तप्ति का विवाह अत्यन्त धर्मात्मा सोमवंशी राजा संवरण के साथ हुआ। कुरुवंश के स्थापक राजर्षि कुरु का इन दोनों की ही संतान थे, जिनसे कौरवों की उत्पत्ति हुई।
सूर्य और छाया पुत्री विष्टि भद्रा नाम से नक्षत्र लोक में प्रविष्ट हुई। भद्रा काले वर्ण, लंबे केश, बड़े-बड़े दांत तथा भयंकर रूप वाली कन्या है। शनि की तरह ही इसका स्वभाव भी कड़क बताया गया है। उनके स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ही भगवान ब्रह्मा ने उन्हें कालगणना या पंचांग के एक प्रमुख अंग विष्टि करण में स्थान दिया है।
सूर्य और छाया की चौथी संतान हैं सावर्णि मनु। वैवस्वत मनु की ही तरह वे इस मन्वन्तर के पश्चात अगले यानि आठवें मन्वन्तर के अधिपति होंगे।
संज्ञा के बारे में जानकारी मिलने के बाद अपना तेज कम करके सूर्य घोड़ा बनकर उनके पास गए। संज्ञा उस समय अश्विनी यानि घोड़ी के रूप में थी। दोनों के संयोग से जुड़वां अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति हुई जो देवताओं के वैद्य हैं। कहते हैं कि दधीचि से मधु-विद्या सीखने के लिये उनके धड़ पर घोड़े का सिर रख दिया गया था, और तब उनसे मधुविद्या सीखी थी। अत्यंत रूपवान माने जाने वाले अश्विनीकुमार नासत्य और दस्त्र के नाम से भी प्रसिद्ध हुए।
सूर्य की सबसे छोटी और संज्ञा की छठी संतान हैं रेवंत जो उनके पुनर्मिलन के बाद जन्मी थी। रेवंत निरन्तर भगवान सूर्य की सेवा में रहते हैं।
दीपक को न रखें जमीन पर
30 Oct, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जगत में सभी लोग धन और वैभव चाहते हैं और इसके लिए जी जान से प्रयास करते हैं। उनके हर प्रयास के पीछे असली लक्ष्य सुख शान्ति और अपने परिवार की खुशहाली और तरक्की होती है पर लेकिन कई बार आपने देखा होगा की सब प्रयास करने के बाद हम धन सम्पदा तो कमा लेते है पर घर की शान्ति और अमन बिगड़ जाता है। ऐसी क्या गलतियां हैं जो भूलवश हम करते रहते है और जिनके कारण हमारे सुखी जीवन पर ग्रहण लगा रहता है।
दीपक हमारे घर में प्रतिदिन जलाया जाता है। दीपक का प्रयोग हम भगवान् की पूजा के लिए करते है। कभी गलती से भी दीपक को ज़मीन पर नहीं रखना चाहिए।
शिवलिंग की पूजा हम प्रतिदिन करते है ,पर क्या आप जानते है कभी शिवलिंग ज़मीन पर नहीं रखना चाहिए। कई लोग मंदिर साफ़ करते समय कई बार शिवलिंग ज़मीन पर रखते है। ऐसा कभी न करे। शालिग्राम की पूजा तो सभी करते है। पर ज्योतिष एक बात हमेशा ध्यान में रखे कि कभी भी शालिग्राम को ज़मीन पर न रखे। इससे आप के घर कि आर्थिक स्थिति ख़राब हो सकती है।जनेऊ को बहुत पवित्र माना गया है। इसलिए इसे कभी ज़मीन पर नहीं रखना चाहिए। न ही फेकना चाहिए। अगर आप का जनेऊ ख़राब है तो उसे पेड़ की टहनी से बाँध दे या पेड़ की जड़ में डाल दे। शंख का प्रयोग हर रोज पूजा पाठ में किया जाता है। इसलिए कभी भी शंख को ज़मीन पर नहीं रखना चाहिए। शंख बजाने के बाद हमेशा उसे धोकर रखना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार भोजन की थाली को भी कभी जमीन पर नहीं रखना चाहिए ऐसा करना भी दुर्भाग्य की वजह बन जाता है।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (30 अक्टूबर 2025)
30 Oct, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- समय में विडम्बनापूर्ण योजनाएं फलीभूत हों, परंतु लाभ से आप वंचित रहेंगे।
वृष राशि :- व्यवसायिक तनाव तथा विवाद से कष्ट होगा, मानसिक अशांति, कष्टप्रद होगी।
मिथुन राशि :- समय की अनुकूलता से लाभांवित हों, इष्ट मित्र सुखवर्धक होंगे, समय का ध्यान रखें।
कर्क राशि :- सामाजिक कार्यों में मान-प्रतिष्ठा एवं धन का लाभ तथा उच्च कार्य अवश्य बनेंगे।
सिंह राशि :- विरोधियों के तनाव से बचें तथा झूठे आश्वासन अवश्य प्राप्त होंगे, ध्यान अवश्य रखें।
कन्या राशि :- अशुद्ध गोचर रहने से विरोध होगा, कार्य स्थगित रखें, व्यर्थ यात्रा से हानि होगी।
तुला राशि :- मानसिक क्लेश व अशांति व आरोप, मनोवृत्ति संवेदनशील बनी रहे, रुके कार्य बना लें।
वृश्चिक राशि :- कुटुम्ब में क्लेश व अशांति विभ्रम व असमंजस की स्थिति अवश्य ही होगी।
धनु राशि :- समय की अनुकूलता से लाभांवित होंगे, कल्याणकारी योजना अवश्य ही बनेगी।
मकर राशि :- पुरानी योजना अवश्य ही फलप्रद होगी, समय की अनुकूलता का लाभ लेवें।
कुम्भ राशि :- दैनिक समृद्धि के साधन जुटायें, तनाव, क्लेश व अशांति के वातावरण से बचेंगे।
मीन राशि :- अधिकारियों का समर्थन मिले, कार्य-व्यवसाय गति अवश्य ही बन जायेगी।
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