धर्म एवं ज्योतिष
राम, रावण और सुप्रीम कोर्ट, सनातन धर्म की दृष्टि से प्रेम और वासना के बीच की क्या है पतली रेखा?
5 Nov, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आज के समय में जब समाज प्रेम और वासना के बीच की रेखा को धुंधला कर देता है, तब ऐसे फैसले लोगों को सोचने पर मजबूर करते हैं. प्रेम हमेशा दो आत्माओं का संगम होता है, जबकि वासना केवल शरीर का आकर्षण. सनातन दृष्टिकोण यह सिखाता है कि प्रेम में सम्मान और जिम्मेदारी होनी चाहिए. अगर उसमें मर्यादा है, तो वही प्रेम जीवन का आधार बनता है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला दिया जिसने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया. यह मामला एक युवा जोड़े का था, जिसमें लड़की नाबालिग थी और लड़के को पॉस्को एक्ट के तहत दस साल की सजा सुनाई गई थी. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह वासना का नहीं, प्रेम का मामला है. कोर्ट ने यह भी बताया कि दोनों अब शादीशुदा हैं और एक बच्चे के माता-पिता हैं. यह फैसला केवल कानून का निर्णय नहीं, बल्कि समाज के लिए एक नैतिक और भावनात्मक सबक है कि हर संबंध को केवल उम्र या कानून की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता.
भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि सनातन धर्म के अनुसार, प्रेम आत्मा का गुण है जबकि वासना मन की प्रवृत्ति. प्रेम वह शक्ति है जो आत्मा को ऊंचा उठाती है, जबकि वासना व्यक्ति को नीचे खींचती है. जब भावना में सम्मान, समर्पण और मर्यादा होती है, तब वह प्रेम कहलाती है. लेकिन जब वही भावना केवल शारीरिक आकर्षण तक सीमित हो जाती है, तो वह वासना बन जाती है. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस अंतर को उजागर करता है जहां नीयत और भावना का महत्व समाज के नियमों से कहीं ऊपर है. यही सनातन विचारधारा की खूबसूरती है, जो मनुष्य को बाहरी नहीं बल्कि भीतरी सच्चाई से परखना सिखाती है.
सनातन धर्म हमेशा से मनुष्य के आचरण और भावनाओं को आत्मा की दृष्टि से देखता है. भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, “मैं वह काम हूं जो धर्म के अनुसार है.” यहां काम का अर्थ केवल इंद्रिय-सुख नहीं, बल्कि वह भावना है जो मर्यादा में रहकर प्रेम का रूप लेती है. यही धर्मसम्मत काम प्रेम कहलाता है, और जो मर्यादा से बाहर हो जाए, वह वासना बन जाता है.
रामायण का उदहारण
रामायण में इस भेद को बहुत सुंदर तरीके से दिखाया गया है. भगवान राम और माता सीता का संबंध त्याग, आदर और सच्चे प्रेम का प्रतीक है. राम का सीता के प्रति प्रेम केवल आकर्षण नहीं था, वह एक जिम्मेदारी, एक बंधन और आत्मिक जुड़ाव था. इसके विपरीत, रावण की भावना वासना से प्रेरित थी. उसने सीता को पाने की कोशिश की, लेकिन उसका उद्देश्य केवल अपने अहंकार और इच्छा की पूर्ति था. यही सनातन धर्म सिखाता है प्रेम में समर्पण होता है, वासना में स्वार्थ.
इंद्र का छल
इसी तरह इंद्र और अहल्या की कथा भी इस फर्क को दर्शाती है. इंद्र ने ब्रह्मर्षि गौतम की पत्नी अहल्या के साथ छल किया. यह कृत्य वासना से प्रेरित था, प्रेम से नहीं. परिणामस्वरूप, अहल्या को शाप मिला और इंद्र को अपमान का सामना करना पड़ा. यहां धर्म यह सिखाता है कि छल, प्रलोभन और स्वार्थ से उत्पन्न भावना कभी प्रेम नहीं कहलाती. प्रेम ईमानदारी और सच्चाई से जन्म लेता है, वासना धोखे से.
रामायाण का दूसरा उदहारण
रामायण में एक और उदाहरण मिलता है शूर्पणखा का. वह रावण की बहन थी जिसने राम से विवाह की इच्छा जताई. राम ने उसे सम्मान के साथ समझाया कि उनका मन सीता में है. यह घटना बताती है कि आकर्षण हर किसी के मन में उठ सकता है, लेकिन संयम ही व्यक्ति को मर्यादित बनाता है. शूर्पणखा का आकर्षण वासना से प्रेरित था, जबकि राम का व्यवहार प्रेम और मर्यादा का प्रतीक था.
भागवत पुराण के अनुसार
भागवत पुराण में राधा और कृष्ण के प्रेम को आत्मा और परमात्मा के मिलन के रूप में बताया गया है. यह प्रेम शुद्ध है, इसमें कोई शारीरिक इच्छा नहीं, केवल भक्ति और भावनात्मक समर्पण है. यही वह प्रेम है जो व्यक्ति को ईश्वर के करीब लाता है, जबकि वासना उसे मोह और बंधन में डाल देती है.
सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसले
अब जब हम सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले को देखते हैं, तो समझ आता है कि हर प्रेम कहानी का मूल्य उसकी भावना से तय होता है. कोर्ट ने जब कहा कि “यह वासना का नहीं, प्यार का मामला है,” तो उसने यह स्वीकार किया कि नीयत और भावना का महत्व कानून की परिभाषा से बड़ा है. सनातन धर्म भी यही कहता है अगर भावना सच्ची है, किसी का शोषण नहीं करती, और उसमें त्याग है, तो वही प्रेम है.
प्रेम और वासना के बीच की रेखा
आज के समय में जब समाज प्रेम और वासना के बीच की रेखा को धुंधला कर रहा है, तो धर्म और न्याय दोनों हमें संयम और विवेक का संदेश देते हैं. प्रेम आत्मा का विकास करता है, वासना मन को बांध देती है. जो संबंध सम्मान और मर्यादा में बंधा हो, वही सच्चा प्रेम कहलाता है. यही शिक्षा सनातन धर्म बार-बार देता है प्रेम ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग है, वासना उस मार्ग की बाधा.
शादी में दुल्हन ही पहले वरमाला क्यों पहनाती है? जानिए इस रस्म के पीछे छिपे शुभ और आध्यात्मिक संकेत
5 Nov, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
शादी का जिक्र आते ही हमारे दिमाग में कई खूबसूरत रस्में घूमने लगती हैं – हल्दी, मेहंदी, फेरे और वरमाला. इनमें से वरमाला की रस्म सबसे मजेदार और दिल छू लेने वाली मानी जाती है. जब दुल्हन और दुल्हा एक-दूसरे के गले में माला डालते हैं, तो वही पल शादी की शुरुआत का प्रतीक बन जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमेशा सबसे पहले दुल्हन ही क्यों पहनाती है वरमाला? ये सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा अर्थ और कई शुभ संकेत छिपे हैं, ये रस्म केवल “एक फोटो लेने वाला पल” नहीं है, बल्कि इसमें प्रेम, सम्मान और स्वीकार्यता का खूबसूरत संदेश छिपा होता है. कहा जाता है कि इस पल में दुल्हन अपने वर को दिल से स्वीकार करती है और वर अपनी सहमति जताता है. पंडितों के मुताबिक, इस रस्म का रिश्ता सीधे शिव-पार्वती के विवाह से जुड़ा है. आइए जानते हैं इस रस्म के पीछे छिपे वो खास कारण, जो शादीशुदा जिंदगी में सुख-समृद्धि और आपसी समझ को मजबूत करते हैं. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.
सबसे पहले दुल्हन ही क्यों पहनाती है वरमाला?
-शादी के दिन को बहुत पवित्र माना जाता है. कहा जाता है कि इस दिन दुल्हा-दुल्हन भगवान शिव और माता पार्वती के रूप में पूजे जाते हैं. वरमाला की रस्म भी इन्हीं की तरह पवित्र मानी जाती है. इस रस्म में दुल्हन सबसे पहले वरमाला पहनाती है क्योंकि शादी में स्त्री की सहमति सबसे अहम होती है.
-दुल्हन जब दूल्हे के गले में वरमाला डालती है, तो वह यह संकेत देती है कि “मैं तुम्हें अपना जीवनसाथी स्वीकार करती हूं.” -इसके बाद जब दूल्हा वरमाला पहनाता है, तो वह कहता है कि “मैं भी तुम्हें पूरे दिल से स्वीकार करता हूं.”
-पंडितों के मुताबिक, वरमाला के पहले पड़ाव में मंगल और शुक्र ग्रह का शुभ प्रभाव होता है. यही वजह है कि शादी के समय यह रस्म सबसे पहले निभाई जाती है, ताकि रिश्ता प्रेम, सौभाग्य और खुशियों से
वरमाला से जुड़ा शुभ संकेत और वैवाहिक जीवन
वरमाला का आदान-प्रदान केवल एक रस्म नहीं, बल्कि रिश्ते की नींव है.
1. जब दुल्हन पहले वरमाला पहनाती है, तो ये इस बात का प्रतीक है कि वो अपने रिश्ते में प्रेम और समझदारी की शुरुआत खुद करती है.
2. यह दर्शाता है कि किसी भी रिश्ते को अहंकार नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और अपनापन मजबूत बनाता है.
3. इस रस्म से दांपत्य जीवन में सकारात्मकता आती है और दोनों के बीच भावनात्मक जुड़ाव गहरा होता है.
4. जैसे भगवान शिव और माता पार्वती ने अपने रिश्ते को प्रेम और समानता से निभाया, वैसे ही ये रस्म हर जोड़े को उसी भाव से जीना सिखाती है.
वरमाला के पीछे छिपा संदेश
दुल्हन जब वरमाला पहनाती है, तो ये सिर्फ “हाँ” कहने का तरीका नहीं, बल्कि एक वादा होता है – साथ निभाने का, समझदारी से चलने का और रिश्ते को प्राथमिकता देने का.
इस रस्म से यह संदेश मिलता है कि शादी में कोई एक बड़ा या छोटा नहीं होता, बल्कि दोनों बराबर होते हैं. वरमाला का एक-एक फूल जैसे रिश्ते के हर रंग को दर्शाता है – विश्वास, प्रेम, सम्मान और साथ.
यह एक प्रतीकात्मक तरीका है ये दिखाने का कि दुल्हन-दुल्हा अब एक नई यात्रा की शुरुआत करने जा रहे हैं, जहां हर फैसला मिलकर लिया जाएगा और हर मुश्किल साथ में झेली जाएगी.
वरमाला की अहमियत को समझें
कई बार लोग वरमाला को सिर्फ “मजेदार पल” मानते हैं, लेकिन यह शादी का आध्यात्मिक आरंभ है. इस पल में जो ऊर्जा और भावना होती है, वही आगे चलकर दांपत्य जीवन की दिशा तय करती है. इसलिए जब अगली बार आप किसी शादी में वरमाला का पल देखें, तो समझिए कि ये सिर्फ हंसी-मजाक नहीं, बल्कि दो आत्माओं का एक होना है.
तुलसी के पौधे में आ गई है मंजरी, तो यहां जान लें क्या है तोड़ने का सही नियम...इस दिन तो भूलकर भी न तोड़े
5 Nov, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में तुलसी को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है. महंत स्वामी कामेश्वरानंद के अनुसार, तुलसी की मंजरी माता का नाखून मानी जाती है. इसे भूरा होने पर ही तोड़ना शुभ होता है. रविवार और मंगलवार को मंजरी नहीं तोड़नी चाहिए. तोड़ने से पहले तुलसी माता से क्षमा याचना अवश्य करनी चाहिए.
सनातन धर्म में तुलसी के पौधे को देवी लक्ष्मी का रूप माना गया है. ज्यादातर घरों में इसकी रोज पूजा होती है और माना जाता है कि जहां तुलसी की नियमित पूजा होती है, वहां लक्ष्मी का वास होता है.
चैनल से बातचीत में महंत स्वामी कामेश्वरानंद वेदांताचार्य ने बताया कि तुलसी की पत्तियों के साथ-साथ उसकी मंजरी का भी खास महत्व है. इसे तुलसी माता का नाखून कहा जाता है और इसे तोड़ने के कुछ नियम होते हैं.
महंत के अनुसार जब तुलसी के पौधे पर पहली बार मंजरी आती है तो तुरंत नहीं तोड़नी चाहिए. मंजरी आना बहुत शुभ माना जाता है, इसलिए इसे तभी तोड़ें जब इसका रंग भूरा हो जाए.
तुलसी की मंजरी को कभी भी रविवार या मंगलवार के दिन नहीं तोड़ना चाहिए. इन दिनों इसे तोड़ना अशुभ माना जाता है और इससे घर में सुख-शांति में बाधा आ सकती है.
मंजरी तोड़ने के बाद उसे पैरों के नीचे नहीं पड़ने देना चाहिए. तुलसी माता का अपमान माना जाता है अगर मंजरी जमीन पर गिर जाए या रौंदी जाए.
अगर कोई व्यक्ति जल्दबाजी में मंजरी तोड़ देता है तो यह अशुभ फल दे सकता है. कहा जाता है कि इससे घर में मनमुटाव और परेशानियां बढ़ सकती हैं.
मंजरी तोड़ने से पहले हाथ जोड़कर तुलसी माता का ध्यान करें और उनसे क्षमा याचना करें. ऐसा करने से कोई दोष नहीं लगता और पुण्य फल की प्राप्ति होती है.
भगवान कृष्ण को तीर किसने मारा था, मोहन मुरारी ने कहां त्यागा था देह, उनकी मृत्यु का क्या है रहस्य
5 Nov, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जब-जब धरती पर धर्म की हानि होती है परब्रह्म परमेश्वर मानव रूप में अवतरित होते हैं. भगवान कृष्ण भी इसी तरह मानव रूप में द्वापर का आखिर में आए और धर्म की स्थापना के साथ इस धरती से विदा हो गए. इस धरती पर भगवान कृष्ण सर्वगुण संपन्न रूप में अवतरित हुए. उनके पास अलौकिक शक्ति तो थी ही, वे धर्म, राजनीति, रहस्य, कला, गीत, संगीत, प्रेम, भक्ति और अनगिनत गुणों से परिपूर्ण थे. इसलिए भगवान कृष्ण को ईश्वर का पूर्ण अवतार माना जाता है. लेकिन क्या आपको पता है कि इतने शक्ति संपन्न होते हुए भी भगवान कृष्ण को एक व्यक्ति ने तीर मारकर हत्या कर दी. आखिर इसके पीछे का क्या रहस्य है. आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं.
भगवान कृष्ण को तीर किसने मारा
बहुत कम लोग जानते हैं कि भगवान कृष्ण को वैकुंठ प्रस्थान से पहले एक साधारण मनुष्य ने मृत्यु को प्राप्त कराया था लेकिन इस कहानी के पीछे कई राज है. चलिए पहले यह जान लेते हैं कि भगवान कृष्ण को तीर किसने मारी थी. जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया तब भगवान कृष्ण द्वारका चले गए. द्वापर युग में जहां-जहां अधर्म था लगभग सबका अंत उन्होंने कर दिया. जब हर जगह शांति होने लगी तब भगवान कृष्ण स्वयं मृत्यु को प्राप्त करने के लिए वन में जाकर ध्यान और तपस्या में लीन होने का निर्णय लिया. एक दिन वे एक पेड़ के थोड़ा उपर बैठ गए. इससे उनके दोनों पैर लटक गए. इस बीच एक बहेलिया शिकार करने उसी वन में आ गया. पत्तों की झुरमुट के बीच भगवान कृष्ण के दोनों पैर को देखकर जरा नाम का एक बहेलिया को लगा कि यह हिरण हो सकती है. उसने तुरंत वाण चलाया. तीर सीधे श्रीकृष्ण के पैरों में जाकर लगा. भगवान मुर्छित हो गए. अपनी भूल का एहसास होते ही जरा वहां दौड़कर आया और क्षमा मांगने लगा. भगवान ने जरा का माफ कर दिया. जरा को यह पता चला कि इस समय भगवान श्रीकृष्ण का पृथ्वी से जाना नियत है. वही साधन बनकर उन्होंने कृष्ण के वैकुंठ गमन का मार्ग प्रशस्त कर दिया.आइए अब जानते हैं इसके पीछे की कहानी.
पूर्व जन्म में बाली था जरा
वास्तव में त्रेता युग में भगवान राम के रूप में आए थे. सीता की खोज में जब भगवान राम और लक्ष्मण निकले तो रास्ते में सुग्रीव जैसा साथी मिला. सुग्रीव की भी एक समस्या थी. सुग्रीव की पत्नी का उसके बड़े भाई बाली ने हरण कर लिया था. भगवान राम ने उन्हें उनकी पत्नी को बाली से मुक्त कराने का वचन दिया था. इस वचन को पूरा करने के लिए भगवान राम ने महाबली बाली का पीछे से तीर मारकर बध किया था.भगवान पर यह ऋण था.यही बाली द्वापर युग में जरा नाम का साधारण बहेलिया बना. इस तरह भगवान ने स्वयं यह लीला रची थी. जरा ने जब भगवान कृष्ण को तीर मारी तो उनका त्रेता युग वाला ऋण पूरा हो गया और भगवान ने जरा को इस तरह क्षमा दान दे दिया.
गांधारी का श्राप
महाभारत युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण अर्जुन के सारथी थे. युद्ध में सभी कौरवों के मारे जाने के बाद कौरवों की माता गांधारी कृष्ण को ही इसके लिए उत्तरदायी मानती थी. इससे उनपर बहुत क्रोधित थी. इसलिए जब कृष्ण विदा होते समय गांधारी के सामने आए तो अपने पुत्रों की मृत्यु के लिए कृष्ण को दोषी मानते हुए उन्होंने उन्हें श्राप दिया कि आने वाले 36 वर्षों में उनकी पूरी यदु वंश की प्रजा आपस में ही लड़कर नष्ट हो जाएगी और कृष्ण सब कुछ असहाय होकर देखते रह जाएंगे. धीरे-धीरे श्राप सच होने लगा. जो यदुवंशी पहले समृद्ध और सदाचारी थे, वे अनैतिक आचरण करने लगे. कृष्ण सब देख रहे थे, परंतु यह दिव्य योजना थी, इसलिए उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया. समय के साथ आपसी वैमनस्य बढ़ता गया और समृद्ध यदु वंश विनाश की ओर बढ़ने लगा.
एक बार कुछ यदुवंशी पुरुष मदहोश होकर नदी किनारे एक-दूसरे का मजाक उड़ाने लगे. बात बढ़ गई और वे आपस में युद्ध करने लगे. अंत में उन्होंने एक-दूसरे की हत्या कर दी और पूरा वंश नष्ट हो गया.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (05 नवंबर 2025)
5 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- थकावट व बेचैनी बनी रहेगी, आशानुकूल सफलता का हर्ष अवश्य होगा, बिगड़े कार्य पूरे अवश्य कर लें।
वृष राशि :- मित्र-वर्ग की उपेक्षा एवं अधिकारी वर्ग की उपेक्षा से कार्य हानि संभव है ध्यान अवश्य दें।
मिथुन राशि :- व्यवसायिक कार्य में वृद्धि किन्तु लापरवाही से हानि तथा धन का व्यय होगा।
कर्क राशि :- स्त्री-वर्ग से कष्ट तथा चिन्ता, कार्य अवरोध, मान हानि होने की संभावना है।
सिंह राशि :- अशुद्ध गोचर रहने से सतर्कता से कार्य करें तथा कार्य निष्पादन करें लाभ होगा।
कन्या राशि :- आशानुकूल सफलता का हर्ष, कार्य-व्यवसाय गति अनुकूल बनी रहेगी।
तुला राशि :- व्यवसायी कार्यों में वृद्धि होगी, साधन जुटाने का प्रयास करें, कार्य पर ध्यान दें।
वृश्चिक राशि :- व्यर्थ भ्रमण, धन का व्यय तथा सुख-समृद्धि के योग अवश्य ही बनेंगे, कार्य बनेंगे।
धनु राशि :- आशानुकूल सफलता का हर्ष, कार्य योजना बनेगी, कार्य अवश्य ही बन जायेंगे।
मकर राशि :- शारीरिक कष्ट, तनाव, क्लेश व अशांति, स्वभाव में क्रोध बना रहेगा।
कुंभ राशि :- किसी घटना का शिकार होने बचिये, भावुकता से हानि हो सकती है।
मीन राशि :- अचानक वाद-विवाद तथा कार्य उपेक्षा से हानि, दुर्घटना के योग बनेंगे।
एक दिन की चूक और 18 वर्षों के लिए बंद पृथ्वी का सबसे बड़ा धाम जगन्नाथ पुरी मंदिर, चौंका देंगे ये 2 कारण
4 Nov, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि अपने रहस्यों और परंपराओं के लिए भी विख्यात है. यह मंदिर अपने चमत्कारों, भव्य रथ यात्रा और अनगिनत कहानियों के लिए जाना जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि मंदिर की 2 ऐसी परंपराएं हैं, जिनका अनुपालन अगर गलती से भी ना किया जाए तो यह मंदिर 18 वर्षों के लिए बंद हो सकता है? जी हां, आपने सही सुना. पृथ्वी के सबसे बड़े धाम जगन्नाथ पुरी मंदिर में दो परंपराएं ऐसी हैं, जिनका हर रोज पालन करना अनिवार्य माना गया है. इस वजह से मंदिर के पुजारी से लेकर अधिकारी तक सभी बेहद खास ध्यान रखते हैं. आइए जानते हैं किन गलतियों की वजह से पृथ्वी का सबसे बड़ा धाम जगन्नाथ पुरी मंदिर 18 वर्षों तक बंद हो सकता है…
भगवान जगन्नाथ के लिए बनने वाला महाप्रसाद
जगन्नाथ पुरी मंदिर की सबसे पवित्र परंपराओं में से एक है ‘नीति चक्र के अनुसार महाप्रसाद की नित्य अग्नि जलाना’. इसे आकाशीय अग्नि भी कहा जाता है, जो प्रतिदिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के लिए भोग पकाती है. यह अग्नि सदियों से कभी नहीं बुझी और इसे देव अग्नि का स्वरूप माना जाता है. मंदिर की रसोई में सात मिट्टी के बर्तनों में भोग पकता है, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इसमें सबसे नीचे बर्तन में रखा भोग सबसे लेट और सबसे ऊपर रखा हुआ भोग सबसे पहले पकता है.
18 साल तक बंद हो सकता है मंदिर
मान्यता है कि अगर यह अग्नि किसी कारणवश बुझ जाए तो मंदिर को अपवित्र मानते हुए 18 साल तक भक्तों के लिए बंद करना पड़ता है. इस दौरान मंत्रोच्चार, अनुष्ठान और विशेष यज्ञों के जरिए मंदिर को पुनः शुद्ध किया जाता है. भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहन के लिए प्रसाद में खिचड़ी, मालपुआ, भात और छप्पन भोग जैसी कई चीजें शामिल होती हैं, जिनमें सबसे प्रिय खिचड़ी मानी जाती है.
मंदिर पर लगने वाला झंडा
इसके अलावा, पटकासी सेवा भी जगन्नाथ मंदिर की अहम परंपरा है. मंदिर की चोटी पर लगा पतित पावन झंडा प्रतिदिन पुजारियों द्वारा बदला जाता है. यह झंडा हवा की दिशा के विपरीत लहराता है, जिसे श्रद्धालु भगवान का चमत्कारी संकेत मानते हैं. 215 फीट ऊंचाई पर बिना किसी सुरक्षा के पुजारियों द्वारा झंडा बदलने की यह अनोखी परंपरा सदियों से निभाई जा रही है.
जगन्नाथ धाम की 2 परंपराएं
इन दो परंपराओं की अखंडता बनाए रखना मंदिर की शुद्धता और जीवंतता के लिए अनिवार्य है. इसे बारिश या तूफान में भी निभाया जाता है. इनकी निरंतरता ही मंदिर की दिव्यता और श्रद्धालुओं की आस्था को बनाए रखती है. यही कारण है कि पुरी का जगन्नाथ मंदिर न केवल भव्यता और आस्था का केंद्र है, बल्कि अपने अनुशासन और रहस्यमयी परंपराओं के लिए भी अद्वितीय है.
दर्शन के बाद मंदिर की सीढ़ी पर क्यों बैठना चाहिए? जानें इस प्राचीन परंपरा का महत्व
4 Nov, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आपने बहुत से लोगों को देखा है कि वे दर्शन करने के बाद मंदिर की पैड़ी या सीढ़ी पर कुछ समय के लिए बैठ जाते हैं और फिर चले जाते हैं. लेकिन आज भी हम में से बहुत से ऐसे लोग हैं, जिनको इस परंपरा के पीछे की परंपार के बारे में जानकारी नहीं है. मंदिर की पैड़ी या सीढ़ी पर बैठना सिर्फ आराम करने का जरिया नहीं, बल्कि इसके पीछे एक खास परंपरा और उद्देश्य छिपा है. आजकल लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर, व्यापार या राजनीति की बातें करने लगते हैं, लेकिन प्राचीन समय में यह पैड़ी शांति, मंत्र और ध्यान का स्थान था. सीढ़ियों पर कुछ समय के लिए बैठकर मंत्र जप भी किया जाता है, जिससे जप करके पूजा संपूर्ण मानी जाती है. आइए जानते हैं दर्शन के बाद मंदिर की सीढ़ियों पर क्यों बैठना चाहिए…
मंदिर की सीढ़ियों पर ना करें ऐसी बातें
आजकल लोग मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर घर, राजनीति, धर्म संबंधित मामलों में बातचीत करते हैं लेकिन सीढ़ियों पर बैठकर ऐसा नहीं करना चाहिए. दर्शन के बाद मंदिर की सीढ़ियों पर बैठना एक प्राचीन परंपरा है. शास्त्रों में बताया गया है कि जब भी हम किसी मंदिर में दर्शन करते हैं, तो बाहर आकर थोड़ी देर पैड़ी पर बैठकर भगवान का ध्यान करना चाहिए.
सीढ़ियों पर बैठकर मंत्र का करें जप
मंदिर की सीढ़ी पर बैठते ही एक विशेष श्लोक ‘अनायासेन मरणम्, बिना देन्येन जीवनम्. देहान्त तव सानिध्यम्, देहि में परमेश्वरम्.’ का पाठ करना चाहिए. इसका अर्थ है कि हमारी मृत्यु बिना किसी तकलीफ के हो, हम बीमार होकर या परेशान होकर न मरें. साथ ही जीवन ऐसा हो कि हमें किसी पर आश्रित न रहना पड़े, अपने बलबूते पर जीवन व्यतीत करें. जब भी मृत्यु हो, भगवान के सामने हमारे प्राण जाएं और भगवान का आशीर्वाद प्राप्त हो.
इस श्लोक में यह संदेश है कि हमें सांसारिक वस्तुओं के लिए याचना नहीं करनी चाहिए. घर, धन, नौकरी, पुत्र-पुत्री जैसी चीजें भगवान अपनी कृपा से देते हैं. प्रार्थना का मतलब निवेदन और विशेष अनुरोध है, जबकि याचना सांसारिक इच्छाओं के लिए होती है.
मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर करें ये काम
दर्शन करते समय आंखें खुली रखनी चाहिए और भगवान के स्वरूप, चरण, मुखारविंद और श्रृंगार का पूरा आनंद लेना चाहिए. आंखें बंद करना गलत है, क्योंकि हम दर्शन करने आए हैं. लेकिन बाहर आने के बाद, पैड़ी पर बैठकर आंखें बंद करके भगवान का ध्यान करना चाहिए और ऊपर बताए गए श्लोक का पाठ करना चाहिए. अगर ध्यान करते समय भगवान का स्वरूप ध्यान में नहीं आता, तो फिर से मंदिर जाकर दर्शन करें और फिर पैड़ी पर बैठकर ध्यान और श्लोक का पाठ करें. यह प्रथा हमारे शास्त्रों और बुजुर्गों की परंपरा में बताई गई है. इसका उद्देश्य हमारे जीवन में स्वास्थ्य, लंबी उम्र और मानसिक शांति सुनिश्चित करना है. मंदिर में नेत्र खुले और बाहर बैठकर नेत्र बंद करके ध्यान करना हमारी श्रद्धा, ध्यान और भक्ति का प्रतीक है.
हनुमानजी के इस मंदिर में मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है ऐसा काम, भक्त चढ़ाते हैं ये चीजें
4 Nov, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
बल, बुद्धि और शक्ति के देवता राम भक्त भगवान हनुमान को माना जाता है. अपने आराध्य के प्रति भक्ति कैसे की जाती है, इसका उदाहरण विश्व के सामने भगवान हनुमान ने ही दिया है और उनकी इन्हीं महानताओं ने उन्हें बाकी देवी-देवताओं से अलग बनाया है. भगवान हनुमान के भक्त उनके दर्शन करने के लिए देश के अलग-अलग मंदिर में जाते हैं लेकिन भोपाल में बना हनुमानजी का मंदिर सबसे खास है, जहां हर हनुमान भक्त को एक बार अर्जी लगाने के लिए तो जरूर आना चाहिए. मान्यता है कि यहां हनुमानजी के दर्शन करने मात्र से रोग, शोक समेत सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. आइए जानते हैं हनुमानजी के इस मंदिर के बारे में खास बातें…
शिला के लिए प्रसिद्ध है मंदिर
मध्य प्रदेश के भोपाल न्यू मार्केट में बना खेड़ापति हनुमान मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है. अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए भक्त दूर-दूर से बालाजी के दर्शन करने के लिए आते हैं. मंदिर अपनी एक शिला के लिए सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है. माना जाता है कि मंदिर में मौजूद एक शिला भक्तों की मनोकामना को पूरी करती है. शिला मंदिर के ग्राउंड फ्लोर पर है और भक्त शिला पर अपनी मनोकामना को लिखते हैं और पूरी होने पर खास आयोजन करते हैं.
हनुमानजी करते हैं मनोकामना पूरी
भक्तों का मानना है कि शिला पर लिखी हर मनोकामना खुद भगवान हनुमान आकर पूरी करते हैं. मनोकामना पूरी होने पर भक्त हनुमान बाबा को नारियल और लाल चोला अर्पित करते हैं. खेड़ापति हनुमान मंदिर सिर्फ आम जनों के लिए ही नहीं बल्कि राजनीतिक हस्तियों के लिए भी आस्था का केंद्र है. बड़े राजनेता और मंत्री अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए इसी मंदिर में आते हैं.
बल, बुद्धि और शक्ति के देवता राम भक्त भगवान हनुमान को माना जाता है. अपने आराध्य के प्रति भक्ति कैसे की जाती है, इसका उदाहरण विश्व के सामने भगवान हनुमान ने ही दिया है और उनकी इन्हीं महानताओं ने उन्हें बाकी देवी-देवताओं से अलग बनाया है. भगवान हनुमान के भक्त उनके दर्शन करने के लिए देश के अलग-अलग मंदिर में जाते हैं लेकिन भोपाल में बना हनुमानजी का मंदिर सबसे खास है, जहां हर हनुमान भक्त को एक बार अर्जी लगाने के लिए तो जरूर आना चाहिए. मान्यता है कि यहां हनुमानजी के दर्शन करने मात्र से रोग, शोक समेत सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. आइए जानते हैं हनुमानजी के इस मंदिर के बारे में खास बातें…
शिला के लिए प्रसिद्ध है मंदिर
मध्य प्रदेश के भोपाल न्यू मार्केट में बना खेड़ापति हनुमान मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है. अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए भक्त दूर-दूर से बालाजी के दर्शन करने के लिए आते हैं. मंदिर अपनी एक शिला के लिए सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है. माना जाता है कि मंदिर में मौजूद एक शिला भक्तों की मनोकामना को पूरी करती है. शिला मंदिर के ग्राउंड फ्लोर पर है और भक्त शिला पर अपनी मनोकामना को लिखते हैं और पूरी होने पर खास आयोजन करते हैं.
हनुमानजी करते हैं मनोकामना पूरी
भक्तों का मानना है कि शिला पर लिखी हर मनोकामना खुद भगवान हनुमान आकर पूरी करते हैं. मनोकामना पूरी होने पर भक्त हनुमान बाबा को नारियल और लाल चोला अर्पित करते हैं. खेड़ापति हनुमान मंदिर सिर्फ आम जनों के लिए ही नहीं बल्कि राजनीतिक हस्तियों के लिए भी आस्था का केंद्र है. बड़े राजनेता और मंत्री अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए इसी मंदिर में आते हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (04 नवंबर 2025)
4 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- विशेष कार्य स्थिगित रखें, धन का व्यर्थ व्यय होगा, उपद्रव तथा क्लेश बना रहेगा।
वृष राशि :- कार्यगति में सुधार, सफलता के साधन बनें, स्त्री-वर्ग से हर्ष होगा, समय का ध्यान रखें।
मिथुन राशि :- अधिकारियों के तनाव से बचें, अर्थलाभ, कार्यकुशलता से संतोष अवश्य होगा।
कर्क राशि :- कुटुम्ब से हर्ष-उल्लास, भाग्य का सितारा प्रबल होगा, विशेष कार्य बनेंगे, ध्यान दें।
सिंह राशि :- भाग्य का सितारा प्रबल हो, बिगड़े कार्य बनें, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा।
कन्या राशि :- सामाजिक कार्य में मान-प्रतिष्ठा बनें, व्यवसायिक कार्यों में सफलता मिलेगी।
तुला राशि :- अशुद्ध गोचर रहने से लेन-देन के मामले स्थगित रखें, रुके कार्य अवश्य बनेंगे।
वृश्चिक राशि :- अधिकारियों का समर्थन फलप्रद होगा तथा सामाजिक प्रतिष्ठा अवश्य बढ़ेगी।
धनु राशि :- अधिकारियों से समर्थन मिलेगा, कार्य कुशलता से संतोष होगा, रुके कार्य बनेंगे।
मकर राशि :- मानसिक बेचैनी, तर्क-वितर्क से दूर रहें, आरोप का शिकार अवश्य हो सकते हैं।
कुंभ राशि :- भाग्य का सितारा प्रबल हो, बिगड़े कार्य बनेंगे तथा आशानुकूल सफलता मिलेगी।
मीन राशि :- सामाजिक कार्यों में मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी तथा कार्यों में सफलता अवश्य ही बढ़ेगी।
घर में किस दिशा का मुख्य दरवाजा सबसे शुभ? पूर्व, पश्चिम, उत्तर या फिर दक्षिण
3 Nov, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिन्दू धर्म में ज्योतिष शास्त्र की तरह वास्तु शास्त्र का विशेष महत्व है. इसलिए घर में कोई भी चीज रखने से पहले वास्तु को देखा जाता है. इसी तरह घर खरीदते समय लोग दिशा को देखते हैं कि, उसका दरवाजा किस तरफ है. क्योंकि, कई बार वास्तु खराब होने से घर फलदायी नहीं होता है. इसका गलत प्रभाव जीवन पर पड़ने लगता है. हालांकि, कुछ लोग घर बनवाते समय मुख्य दरवाजे को किस दिशा में रखें? इसपर ध्यान नहीं देते हैं. यदि आप भी ऐसा करते हैं तो यकीन मानिए आप बड़ी गलती कर रहे हैं. क्योंकि, घर के मुख्य द्वार से घर में मां लक्ष्मी का आगमन होता है. साथ ही घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है. इसलिए घर के मुख्य दरवाजे को सही दिशा में रखना शुभ होगा. अब सवाल है कि आखिर घर का दरवाजा किस दिशा में रखें? दरवाजे से जुड़े हैं जरूरी नियम?
घर के दरवाजे की सबसे शुभ दिशा?
घर का मुख्य दरवाजा उत्तर-पूर्व या पूर्व-पश्चिम दिशा में होना शुभ होता है. प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा के मध्य में स्थित होना चाहिए. मान्यता है कि, ऐसे घर में सुख-समृद्धि का वास रहता है. इसके अलावा, घर के मुख्य दरवाजे का आकार न छोटा और न ही अधिक बड़ा होना चाहिए. इसलिए घर बनवाते समय घर के मुख्य दरवाजे का आकार भवन के आकार के अनुपात ही रखें.
रसोई का दरवाजा किस दिशा में शुभ?
घर बरकत रसोईघर से जुड़ी होती है. इसलिए रसोई घर का दरवाजा उत्तर, पश्चिम या दक्षिण-पूर्व दिशा में होना चाहिए. अधिकतम सकारात्मक ऊर्जा के लिए उत्तर और पश्चिम दिशा सबसे अच्छी मानी जाती है. यदि ये दिशाएं संभव न हों, तो दक्षिण-पूर्व एक अच्छा विकल्प है, क्योंकि यह अग्नि तत्व की दिशा है जो रसोई के लिए आदर्श है.
घर के दरवाजे पर क्या बांधना शुभ?
वास्तु के मुताबिक, घर के दरवाजे पर आप तुलसी की सूखी जड़, नमक की पोटली, मंगल कलश या आम के पत्तों का वंदनवार बांध सकते हैं. ये उपाय नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने, आर्थिक समृद्धि लाने और घर में सुख-शांति बनाए रखने के लिए शुभ माने जाते हैं.
गेट के सामने न रखें चीजें
घर के मुख्य द्वार के सामने किसी भी प्रकार की गंदगी नहीं होनी चाहिए. कूड़ा, करकट, कंकड़, पत्थर आदि मेन गेट के पास नहीं रखने चाहिए. गंदे पानी का बहाव भी नहीं होना चाहिए. इससे घर में दरिद्रता आ सकती है. इसलिए घर का मुख्य दरवाजा हमेशा साफ रखना चाहिए. क्योंकि, मां लक्ष्मी भी साफ सुथरी जगह पर ही निवास करती हैं.
सजाकर रखना चाहिए दरवाजा
घर में सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए घर के मुख्य दरवाजे को सजा कर रखना चाहिए. मुख्य दरवाजे पर ॐ या स्वास्तिक भी बना सकते हैं और धातु या लकड़ी की नेमप्लेट लगा सकते हैं. घर के मुख्य दरवाजे पर बड़ी घंटी की जगह मधुर ध्वनि उत्पन्न करने वाली डोरबेल लगानी चाहिए.
एक छोटी-सी गलती, जो पलभर में मिटा देती है आपकी मेहनत और इज्जत!
3 Nov, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हर इंसान अपनी मेहनत, लगन और ईमानदारी से जीवन में इज्जत कमाता है, लेकिन कई बार एक छोटी-सी गलती सब कुछ छीन लेती है. यह गलती और कुछ नहीं, बल्कि “अभिमान” यानी अहंकार है. महाभारत के समय के नीति ज्ञाता विदुर ने अपने उपदेशों में इस बात पर खास ज़ोर दिया है कि जब इंसान सफलता, धन या पद पाता है, तो उसके भीतर धीरे-धीरे घमंड पैदा हो जाता है. वही घमंड उसके पतन की वजह बनता है. विदुर नीति बताती है कि अभिमान इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी है. जब कोई व्यक्ति अपनी ताकत, सुंदरता, बुद्धि या संपत्ति पर इतराने लगता है, तो उसका संतुलन बिगड़ जाता है. वह दूसरों को छोटा समझने लगता है और यही सोच उसके पतन का कारण बनती है. विदुर ने कहा था कि जैसे बुढ़ापा सुंदरता को मिटा देता है, वैसे ही अभिमान सफलता को खत्म कर देता है. आज के समय में भी यह नीति उतनी ही सटीक बैठती है. चाहे कोई बिज़नेस में हो, नौकरी में या किसी ऊंचे पद पर अगर विनम्रता नहीं रही, तो सम्मान ज्यादा देर तक नहीं टिकता. इसलिए सफलता के बाद खुद को संभालना सबसे बड़ा हुनर है. विनम्र रहना ही असली समझदारी है, क्योंकि जो सिर झुकना जानता है, वही ऊंचाइयां छूता है.
विदुर नीति श्लोक और उसका अर्थ
श्लोक:
न राज्यम् प्राप्तमित्येव वर्तितव्यमसाव्रतम्।
श्रियं ह्यनिनयो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम्॥
अर्थ:
यह सोचकर कि अब राज्य या सफलता मिल ही गई है, व्यक्ति को अनुचित व्यवहार नहीं करना चाहिए. क्योंकि अभिमान और उद्दंडता संपत्ति और इज्जत को उसी तरह नष्ट कर देते हैं, जैसे बुढ़ापा सुंदर रूप को मिटा देता है.
अभिमान क्यों बनता है विनाश का कारण
जब व्यक्ति को सफलता, पैसा या शोहरत मिलती है, तो उसके भीतर एक झूठा विश्वास पैदा होता है कि अब वह सबसे श्रेष्ठ है. यही सोच उसे दूसरों की इज्जत करना भूलाती है. अहंकार धीरे-धीरे उसकी सोच पर पर्दा डाल देता है. फिर चाहे कोई भी समझाए, वह सही गलत नहीं समझ पाता
विदुर कहते हैं कि सफलता तब तक ही खूबसूरत है, जब तक उसमें विनम्रता की खुशबू हो. जैसे फूल खुशबू से ही पहचान पाता है, वैसे ही इंसान अपने व्यवहार से, अगर व्यवहार में अहंकार आ गया, तो नाम और इज्जत सब मिट जाते हैं.
अहंकार के नुकसान
अहंकार का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह इंसान को अकेला कर देता है. जो व्यक्ति दूसरों की इज्जत नहीं करता, लोग भी धीरे-धीरे उससे दूरी बना लेते हैं. इससे उसका मानसिक संतुलन बिगड़ता है और गलत फैसले शुरू हो जाते हैं. कई बार ये गलत फैसले पूरे जीवन की मेहनत पर पानी फेर देते हैं.
विदुर नीति यही सिखाती है कि सफलता कभी स्थायी नहीं होती, इसलिए उसे सिर पर चढ़ाना बेवकूफी है. जो व्यक्ति विनम्र रहकर काम करता है, वही लंबे समय तक सम्मान पाता है.
किन बातों का अभिमान नहीं करना चाहिए
विदुर नीति के अनुसार, मनुष्य को सुंदरता, शक्ति, धन, बुद्धि और पद का अभिमान नहीं करना चाहिए, ये सब समय के साथ बदल जाते हैं. जो आज है, कल नहीं भी हो सकता. सच्ची कीमत उसी की होती है जो अपनी सफलता के बावजूद सरल, ईमानदार और विनम्र रहे.
सच्ची सफलता वही जो सबको साथ लेकर चले
विदुर कहते हैं कि सच्चा विजेता वही है जो दूसरों के दिल जीतता है, अगर किसी की सफलता में अभिमान घुल गया, तो वह लोगों के दिल से उतर जाता है. इसलिए अपने व्यवहार में हमेशा मधुरता, धैर्य और विनम्रता रखनी चाहिए. जब इंसान दूसरों की इज्जत करता है, तो दुनिया भी उसे सिर आंखों पर बैठाती है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (03 नवंबर 2025)
3 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- अशुद्ध गोचर रहने से विशेष रूप से सतर्क रहें, शारीरिक कष्ट अवश्य होगा।
वृष राशि :- अशुद्ध गोचर रहने से कार्य बाधा होगी, मानसिक थकावट व बेचैनी अवश्य बनेगी।
मिथुन राशि :- कुटुम्ब व संतान से क्लेश व अशांति, मानसिक विभ्रम, मन विक्षुब्ध रहेगा।
कर्क राशि :- अशुद्ध गोचर रहने से विशेष कार्य स्थिगित रखें अन्यथा धन का व्यय होगा।
सिंह राशि :- स्त्री-वर्ग से कष्ट व चिन्ता, व्यवसाय में लाभ रहेगा, मानसिक वृत्ति उत्तम रहेगी।
कन्या राशि :- अधिकारियों के तनाव तथा क्लेश से बचिये, दैनिक कार्यगति में बाधा होगी।
तुला राशि :- आवश्यकता की पूर्ति के प्रयास करें, मानसिक विभ्रम बनेगा ध्यान अवश्य रखें।
वृश्चिक राशि :- अशुद्ध गोचर रहने से विशेष कार्य स्थिगित रखें, आर्थिक लाभ अवश्य होगा।
धनु राशि :- व्यवसाय में बेचैनी, तनाव बना रहेगा, परिश्रम विफल होगा, लोगों से अपवाद होगा।
मकर राशि :- चोटादि का भय, कष्टकारक समय बनेगा, अशुद्ध गोचर रहने से हानि हो सकती है।
कुंभ राशि :- स्त्री-वर्ग, संतान के योग, क्लेश व अशांति, मानसिक विभ्रम व भय बना रहेगा।
मीन राशि :- समय ठीक नहीं, विशेष कार्य स्थिगित रखें तथा अनायास विभ्रम अवश्य होगा।
जन्मोत्सव पर यूरोपीय फूलों से सजा दरबार, 101 किलो का काटा गया केक, 24 घंटे खुले रहेंगे मंदिर
2 Nov, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
विश्व प्रसिद्ध बाबा श्याम के जन्मोत्सव पर आज से दो दिवसीय मेले का आगाज हो चुका है. देश के कोने-कोने से श्याम भक्त बाबा श्याम के जन्मदिन पर केक चढ़ाकर जन्मोत्सव मना रहे हैं. मंदिर कमेटी के मंत्री मानवेन्द्र सिंह चौहान ने बताया कि इस बार बाबा श्याम के दरबार को वार्षिक फाल्गुन मुख्य मेले की तरह आकर्षक सजाया गया है. उन्होंने बताया कि विशेष अवसर पर आज 56 भोग की झांकी सजाकर बाबा को भोग लगाया गया है. इसके अलावा 101 किलों का केक काटा गया है. श्याम भक्तों को सुगमतापूर्वक दर्शन हो सकें, इसके लिए श्री श्याम मंदिर कमेटी ने व्यवस्थाएं की हैं.
खाटूधाम में धर्मशाला, होटल, गेस्ट हाउस में बुकिंग फूल हो चुकी है. धर्मशालाओं, होटलों, गेस्ट हाउसों को भी रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया गया है. मंदिर कमेटी ने अपील की है कि आने वाले भक्त दर्शन के दौरान मंदिर में इत्र व फूल आदि नहीं फेंके. कमेटी के कोषाध्यक्ष कालू सिंह चौहान ने बताया कि मंदिर कमेटी ने 1000 होमगार्ड्स व 1000 सुरक्षाकर्मी प्रशासन को उपलब्ध करवाए हैं. संपूर्ण मेला क्षेत्र में 230 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, मेला क्षेत्र में 6 स्थानों पर मेडिकल कैंप लगाए गए हैं.
एक किलो से लेकर एक क्विंटल तक के केक तैयार
बाबा श्याम के जन्मोत्सव के अवसर पर बाबा श्याम को मावे के केक चढ़ाने की होड़ मची रहती है. खाटूश्यामजी के प्रसाद भंडारों पर कई तरह के केक व 56 भोग तैयार किए गए हैं. एक होटल के के निदेशक अंकित अग्रवाल डब्बू ने बताया कि बाबा श्याम के भोग के लिए मावे के केक तैयार करवाए गए हैं. इनमें एक किलोग्राम से लेकर एक क्विंटल तक के केक तैयार हैं. बाबा श्याम को दूध से बने 101 किलो का केक चढ़ाएंगे. इसके अलावा भी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, हरियाणा सहित देश-विदेश से श्रद्धालु बाबा के लिए केक लेकर आ रहे हैं.
यूरोपीय देशों के फूलों से हुआ श्रृंगार
जन्मोत्सव के मौके पर बाबा श्याम का मनमोहक श्रृंगार किया गया है. श्री श्याम मंदिर कमेटी के मंत्री मानवेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि आज बाबा बाबा का यूरोपीय देशों से मंगवाए गए खुशबूदार फूलों से शृंगार किया गया है. इसके अलावा रत्न जड़ित सोने का मोरपंखी मुकुट भी पहनाया गया है. भक्तों की भीड़ के चलते आज पूरे 24 घंटे मंदिर खुला रहेगा. रात के समय में भी भक्तों के लिए मंदिर बंद नहीं होगा. इसके अलावा रविवार को मेले का समापन होगा.
घर में रामा या श्यामा, कौनसी तुलसी लगाएं?
2 Nov, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तुलसी का पौधा हर हिंदू घर की पहचान माना जाता है. किसी भी घर में तुलसी का होना सिर्फ धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि वास्तु और स्वास्थ्य के नजरिए से भी बेहद शुभ माना जाता है. बचपन से ही हम सुनते आए हैं कि तुलसी के पौधे में देवी लक्ष्मी का वास होता है और जिस घर में तुलसी रहती है, वहां सुख, समृद्धि और शांति बनी रहती है. पूजा-पाठ में तुलसी के पत्ते का इस्तेमाल आम बात है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि तुलसी की भी कई किस्में होती हैं – जिनमें रामा तुलसी और श्यामा तुलसी सबसे प्रमुख हैं? कई लोग इस बात को लेकर उलझन में रहते हैं कि घर में कौन-सी तुलसी लगानी चाहिए – रामा या श्यामा? दोनों ही तुलसी अपने-अपने तरीके से पवित्र और लाभकारी मानी जाती हैं. एक जहां शांति और समृद्धि का प्रतीक है, वहीं दूसरी ऊर्जा और शक्ति का स्रोत मानी जाती है. वास्तु शास्त्र में दोनों के अलग-अलग फायदे बताए गए हैं, अगर आप भी घर में तुलसी लगाने की सोच रहे हैं, तो यह जानना जरूरी है कि दोनों में अंतर क्या है, कौन-सी तुलसी किस देवता को प्रिय है, और किसका असर घर के माहौल पर ज्यादा सकारात्मक माना गया है. आइए जानते हैं ज्योतिषाचार्य रवि पराशर से.
रामा और श्यामा तुलसी में फर्क क्या है
सबसे पहले अगर बात करें पहचान की, तो रामा तुलसी के पत्ते हल्के हरे रंग के होते हैं और इसकी खुशबू बेहद सौम्य होती है. वहीं श्यामा तुलसी के पत्तों का रंग गहरा हरा, बैंगनी या काला होता है और इसकी महक थोड़ी तेज होती है. दोनों ही तुलसी पवित्र हैं और इनका धार्मिक महत्व अलग-अलग है. रामा तुलसी को भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को अर्पित किया जाता है. इसे सौम्यता और शांति का प्रतीक माना गया है. दूसरी ओर, श्यामा तुलसी को श्रीकृष्ण से जोड़ा गया है और यह ऊर्जा, शक्ति और रक्षा का प्रतीक मानी जाती है.
वास्तु शास्त्र के अनुसार कौन-सी तुलसी लगाना शुभ है
-वास्तु शास्त्र में कहा गया है कि तुलसी का कोई भी पौधा शुभ होता है. चाहे आप रामा तुलसी लगाएं या श्यामा, दोनों ही घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाती हैं और नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती हैं.
-रामा तुलसी को उत्तर या पूर्व दिशा में लगाने से घर में सुख-शांति बनी रहती है. वहीं श्यामा तुलसी अगर घर के आंगन या बालकनी में रखी जाए तो यह परिवार में एकजुटता और आत्मबल बढ़ाती है.
अगर घर में तनाव, विवाद या अनबन ज्यादा रहती है तो श्यामा तुलसी का पौधा लगाना अच्छा माना गया है, क्योंकि यह वातावरण को शांत और संतुलित बनाती है. वहीं जो लोग धन और समृद्धि की कामना करते हैं, उन्हें रामा तुलसी लगानी चाहिए, क्योंकि यह लक्ष्मी कृपा का प्रतीक है.
दोनों तुलसी के औषधीय गुण
रामा और श्यामा तुलसी दोनों ही सेहत के लिए बेहद फायदेमंद हैं.
1. रामा तुलसी में एंटीबैक्टीरियल और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो सर्दी-जुकाम, खांसी और गले के दर्द में राहत देते हैं.
2. श्यामा तुलसी इम्यूनिटी बढ़ाने में मदद करती है और ब्लड शुगर को कंट्रोल करती है. यह हृदय के लिए भी फायदेमंद मानी जाती है.
आयुर्वेद में तुलसी को “औषधियों की रानी” कहा गया है क्योंकि यह शरीर से टॉक्सिन निकालने में मदद करती है और दिमाग को शांत रखती है.
तुलसी की देखभाल कैसे करें
तुलसी के पौधे को रोज पानी देना चाहिए, लेकिन ज्यादा पानी डालने से बचें. सूरज की हल्की धूप में इसे रखना सबसे अच्छा रहता है. पौधे के आसपास सफाई बनाए रखें, और शाम के समय दीया जलाकर तुलसी की परिक्रमा करें. इससे घर में पॉजिटिव एनर्जी बनी रहती है. यह भी ध्यान रखें कि तुलसी को रविवार और एकादशी के दिन न तोड़ें, और ना ही उस पर झूठे हाथ लगाएं. तुलसी के सूखे पत्तों को फेंकने की बजाय गंगा जल में प्रवाहित करना शुभ माना गया है.
घर पर कर रहे हैं तुलसी-शालीग्राम विवाह तो इन नियमों का रखें खास ध्यान
2 Nov, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि और द्वादशी तिथि को तुलसी-शालीग्राम विवाह किया जाता है. घर पर तुलसी-शालिग्राम विवाह करना अत्यंत पुण्यदायक कार्य बताया गया है, यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विष्णु-लक्ष्मी विवाह का प्रतीक है जो घर में सुख, सौभाग्य और समृद्धि को स्थिर करता है. चार माह की योगनिद्रा के बाद भगवान विष्णु के जागते हैं और सभी शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन आदि प्रारंभ हो जाते हैं. यही वजह है कि इस दिन घर या मंदिरों में तुलसी-शालीग्राम विवाह का किया जाता है. लेकिन अगर आप घर पर तुलसी-शालीग्राम विवाह कर रहे हैं तो आपको कुछ नियमों का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है. आइए जानते हैं तुलसी-शालीग्राम विवाह में किन बातों का ध्यान रखें.
तुलसी विवाह 2025 (Tulsi Vivah 2025)
द्वादशी तिथि की शुरुआत – 2 नवंबर, सुबह 7 बजकर 31 मिनट से
द्वादशी तिथि का समापन – 3 नवंबर, सुबह 5 बजकर 7 मिनट तक
साल 2025 में तुलसी विवाह 2 नवंबर दिन रविवार को किया जाएगा.
तुलसी पूजन मंत्र Tulsi Puja Mantra
ॐ तुलस्यै हरिप्रिया नमः।
ॐ तुलस्यै नम:।
ॐ तुलसीश्रियै नम:।
ॐ तुलसीदेव्यै नम:।
शालिग्राम पूजन मंत्र Shaligram Puja Mantra
ॐ श्री शालिग्राममाय नम।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ लक्ष्मीपति देवदेवाय नमः।
घर पर तुलसी विवाह के नियम Tulsi Vivah Rules
तुलसी-शालीग्राम विवाह में शालीग्राम को अक्षत यानी चावल अर्पित ना करें. तुलसी विवाह में शालीग्राम को अक्षत अर्पित करना अशुभ माना जाता है. विवाह के दौरान आप केवल तुलसी दल, फूल और तिल अर्पित करें.
तुलसी-शालीग्राम विवाह हमेशा प्रदोष काल में करना चाहिए. तुलसी विवाह हमेशा प्रदोष काल में ही किया जाता है.
तुलसी विवाह में तुलसी माता को लाल चुनरी और सुहाग का सामान अर्पित करें. ऐसा करने से सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है. साथ ही कुंवारी कन्याएं अगर तुलसी माता को सुहाग का सामान अर्पित करती हैं तो अच्छी जीवनसाथी के योग बनेंगे.
विवाह मंडप (तुलसी चौरा) के चारों ओर चार दिशाओं में 4-4 दीपक और मध्य में एक दीपक प्रज्वलित करें. तुलसी विवाह में गाय के घी का दीपक ही सर्वोत्तम माना जाता है. तुलसी के पास जलाया गया घी का दीप पवित्रता, संतति और समृद्धि तीनों का सूचक होता है.
तुलसी-शालीग्राम विवाह के लिए गन्ने का मंडप तैयार किया जाता है और भोग में शकरकंद, सिंघाड़ा, पंचामृत, लड्डू आदि सात्विक चीजें अर्पित करें.
घर के उत्तर या पूर्व दिशा में तुलसी चौरा को साफ जल से धोकर सजाएं और चौरे को गंगाजल से पवित्र करें.
तुलसी चौरा के चारों ओर आम्रपत्र (आम के पत्ते) और आम्र-कलश लगाएं और शालिग्राम (भगवान विष्णु का स्वरूप) को पीले वस्त्र में रखें.
तुलसी-शालीग्राम विवाह के लाभ Benefits of Tulsi Vivah
घर पर तुलसी-शालीग्राम विवाह करने से नकारात्मक ऊर्जा, वास्तु दोष, नजर दोष आदि चीजें दूर हो जाती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है.
जिन लोगों के विवाह में देरी या बाधाएं आती हैं तो वे घर पर तुलसी विवाह अवश्य करें.
घर पर तुलसी विवाह का आयोजन करने से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है और दंपत्तियों के बीच चल रहे तनाव भी दूर हो जाते हैं.
जिन घरों में कन्यादान का अवसर नहीं मिलता, उनको अपने घरों में तुलसी विवाह का आयोजन अवश्य करवाना चाहिए. तुलसी विवाह से इस पुण्य का लाभ उठा सकते हैं.
तुलसी विवाह करने से घर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का वास होता है और धन व धान्य की कोई कमी नहीं होती. साथ ही परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम बना रहता है और उन्नति भी होती है.
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