धर्म एवं ज्योतिष
घर में गंगाजल रखने से बरसती है कृपा, बस इन गलतियों को न करें नजरअंदाज
28 Nov, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में मां गंगा को देवियों में सर्वोच्च स्थान दिया गया है, इसलिए गंगाजल को घर में रखना अत्यंत शुभ माना जाता है. मान्यता है कि गंगा का पावन जल मोक्ष प्रदान करने वाला होता है और पूजा-पाठ, शुद्धिकरण, अभिषेक और सभी धार्मिक अनुष्ठानों में इसका विशेष महत्व है. बिना गंगाजल के कोई भी पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती है लेकिन अक्सर लोग श्रद्धा से तो गंगाजल घर में रखते हैं, पर इसके नियमों का पालन न करने के कारण अनजाने में इसे अपवित्र भी कर देते हैं. ऐसे में न केवल इसका शुभ प्रभाव कम हो जाता है बल्कि नकारात्मक परिणाम भी सामने आ सकते हैं. मध्य प्रदेश के उज्जैन के ज्योतिष आचार्य आनंद भारद्वाज से जानते हैं कि गंगाजल को घर में रखते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.
1. अंधेरे या गंदे स्थान पर न रखें
गंगाजल अत्यंत पवित्र माना जाता है, इसलिए इसे ऐसे कोने या जगह पर कभी न रखें, जहां अंधेरा हो या गंदगी फैली हो. प्रकाश और स्वच्छता दोनों इसका दिव्य प्रभाव बनाए रखने के लिए जरूरी हैं.
2. तामसिक सेवन के बाद न छुएं
जिस दिन आप मांस, मदिरा या किसी भी तामसिक पदार्थ का सेवन करते हैं, उस दिन गंगाजल को छूने से बचें. जिस कमरे में इन चीजों का सेवन होता हो, वहां गंगाजल रखना भी गृहदोष का कारण बनता है.
3. घर के मंदिर का ईशान कोण सबसे उचित स्थान
गंगाजल रखने के लिए घर के मंदिर की उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) सर्वोत्तम मानी गई है. ऐसा करने से नकारात्मकता दूर रहती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास बढ़ता है. प्रतिदिन श्रद्धा से गंगाजल के पात्र की पूजा करना भी शुभ माना जाता है.
4. प्लास्टिक की बोतल में गंगाजल रखना भूल
आजकल गंगाजल प्लास्टिक की बोतलों में रख दिया जाता है जबकि शास्त्रों में प्लास्टिक को अशुद्ध माना गया है, इसलिए गंगाजल को हमेशा तांबे, पीतल, मिट्टी या चांदी के पात्र में ही रखना चाहिए. ये धातुएं शुद्ध और धार्मिक दृष्टि से उत्तम मानी जाती हैं.
बड़ा अनोखा है कुक्के सुब्रमण्या मंदिर, नाग दोष मुक्ति के लिए आते हैं भक्त, मिलता है अनोखा प्रसाद
28 Nov, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में 33 कोटि देवी-देवताओं को जितनी आस्था के साथ पूजा जाता है, उतना ही पवित्र उनके वाहनों को भी माना जाता है और उसी श्रद्धा के साथ पूजा जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव के प्रिय वासुकी नाग और भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ की दुश्मनी को खत्म कराने के लिए भगवान शिव के आदेश पर कार्तिकेय ने उन्हें अपने पास स्थान दिया था और आज भी वासुकी नाग भगवान कार्तिकेय के चरणों में शरण लिए बैठे हैं.
कुक्के सुब्रमण्या मंदिर: भगवान कार्तिकेय के चरणों में वासुकी
कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में स्थित कुक्के सुब्रमण्या मंदिर है, जो इस कहानी को जीवंत बनाता है. इस मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय की पूजा होती है. मंदिर के गर्भगृह में भगवान कार्तिकेय की बड़ी प्रतिमा विराजमान है और माना जाता है कि उनके चरणों में नीचे आज भी वासुकी नाग और बाकी सर्प प्रजाति मौजूद हैं.
सात मोक्ष स्थलों में से एक
मंदिर के प्रांगण में चांदी का स्तंभ भी स्थापित है, जिस पर गरुड़ की प्रतिमा बनी है. माना जाता है कि ये प्रतिमा सर्पों की नकारात्मकता को कम करती है. यह स्थान भगवान परशुराम द्वारा बताए गए सात मोक्ष स्थलों में से एक माना जाता है. यहां प्राचीन काल से ही नाग पूजा की जाती रही है. ऐसा माना जाता है कि वासुकी सुब्रमण्यम (वासुकी) के आशीर्वाद से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं.
नाग दोष से मिलती है मुक्ति
श्रद्धालुओं का मानना है कि इस मंदिर में आने और पूजा करने से संतान भाग्य, त्वचा संबंधी विकारों का उपचार और नाग दोष (सर्प का श्राप) से मुक्ति जैसी उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इस स्थान को गुप्त क्षेत्र भी कहा जाता है.
प्रसाद में मिलती हैं चींटी के टीले की मिट्टी
मंदिर की खास बात ये है कि यहां भक्तों के बीच प्रसाद स्वरूप चींटी के टीले की मिट्टी मिलती है, जिसे पुट्टा मन्नू भी कहा जाता है. चंपा षष्ठी महोत्सव के अवसर पर खास तौर पर मंदिर में चींटी के टीले की मिट्टी प्रसाद के रूप में मिलती है और मंदिर में विराजमान देवी-देवताओं को हल्दी और चंदन का लेप लगाकर उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश की जाती है. मंदिर में पके हुए चावल, गुड़ और केले का भोग लगाने की परंपरा चली आई है.
मंदिर के पास औषधीय गुणों वाली नदी
मंदिर के पास ही कुमारधारा नदी बहती है, जिसका नाम भगवान कार्तिकेय के नाम पर रखा गया है. ये नदी भी औषधीय गुणों से भरपूर बताई जाती है. भक्त मंदिर में दर्शन करने से इस नदी में स्नान जरूर करते हैं. मान्यता है कि इस नदी में स्नान करने से त्वचा संबंधी विकार ठीक हो जाते हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (28 नवंबर 2025)
28 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- अधिक संघर्षशीलता से बचिये, भोग-ऐश्वर्य की प्राप्ति, स्त्री-वर्ग से सुख मिलेगा।
वृष राशि :- कार्यवृत्ति अनुकूल, चिन्तायें कम होंगी, स्त्री-वर्ग से हर्ष-उल्लास अवश्य ही मिलेगा।
मिथुन राशि :- कोई शुभ समाचार हर्षप्रद रखे, थकावट, बेचैनी, धन का व्यय अवश्य होगा।
कर्क राशि :- तनाव से क्लेश व अशांति होते हुये भी व्यवस्था का कार्य अवश्य बनेगा, धैर्य रखें।
सिंह राशि :- इष्ट-मित्र सुखवर्धक हो, तनाव व अशांति से बचिये, विभ्रम अवश्य होगा।
कन्या राशि :- इष्ट मित्र सुखवर्धक हो, अधिकारियों से समर्थन मिलेगा, योजना फलीभूत होगी।
तुला राशि :- सोचे कार्य समय पर पूरे होंगे, बौद्धिक विकास होगा, चिन्ता कम होगी।
वृश्चिक राशि :- कोई शुभ समाचार मिलेगा, अनायास तनाव, क्लेश व अशांति बनेगी।
धनु राशि :- अनायास यात्राओं से बचिये, स्त्री-शरीर कष्ट, मानसिक बेचैनी होगी धैर्य रखें।
मकर राशि :- योजनायें फलीभूत हों, कार्य-कुशलता से संतोष होगा, दैनिक समृद्धि के साधन बनेंगे।
कुंभ राशि :- स्त्री-वर्ग से हर्ष-उल्लास एवं दैनिक समृद्धि के साधन जुटायें, कार्य बनेंगे।
मीन राशि :- मानसिक शांति बनाये रखें, मानसिक उद्विघ्नता से बेचैनी बढ़ेगी।
योगेश्वर रूप में जीवन का दर्शन देते हैं भगवान श्रीकृष्ण
27 Nov, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भक्ति की परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाले भगवान हैं। योगेश्वर रूप में वे जीवन का दर्शन देते हैं तो बाल रूप में उनकी लीलाएं भक्तों के मन को लुभाती है।आज पूरब से लेकर पश्चिम तक हर कोई कान्हा की भक्ति से सराबोर है। चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आन्दोलन के समय श्रीकृष्ण का जो महामंत्र प्रसिद्ध हुआ, वह तब से लेकर अब तक लगातार देश दुनिया में गूंज रहा है। आप भी मुरली मनोहर श्रीकृष्ण की कृपा पाने के लिए उनके मंत्र के जाप की शुरुआत कर सकते हैं।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे॥
१५वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आन्दोलन के समय प्रसिद्ध हुए इस मंत्र को वैष्णव लोग महामन्त्र कहते हैं। इस्कान के संस्थापक के श्रील प्रभुपाद जी अनुसार इस महामंत्र का जप उसी प्रकार करना चाहिए जैसे एक शिशु अपनी माता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए रोता है।
ॐ नमो भगवते श्री गोविन्दाय
भगवान श्रीकृष्ण के इस द्वादशाक्षर (12) मंत्र का जो भी साधक जाप करता है, उसे सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। प्रेम विवाह करने वाले अभिलाषा रखने वाले जातकों के लिए यह रामबाण साबित होता है।
कृं कृष्णाय नमः
यह पावन मंत्र स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताया गया है। इसके जप से जीवन से जुड़ी तमाम बाधाएं दूर होती हैं और घर-परिवार में सुख और समृद्धि का वास होता है।
ॐ श्री कृष्णाय शरणं मम्।
जीवन में आई विपदा से उबरने के लिए भगवान श्रीकृष्ण का यह बहुत ही सरल और प्रभावी मंत्र है। इस महामंत्र का जाप करने से भगवान श्रीकृष्ण बिल्कुल उसी तरह मदद को दौड़े आते हैं जिस तरह उन्होंने द्रौपदी की मदद की थी।
आदौ देवकी देव गर्भजननं, गोपी गृहे वद्र्धनम्।
माया पूज निकासु ताप हरणं गौवद्र्धनोधरणम्।।
कंसच्छेदनं कौरवादिहननं, कुंतीसुपाजालनम्।
एतद् श्रीमद्भागवतम् पुराण कथितं श्रीकृष्ण लीलामृतम्।।
अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्ण:दामोदरं वासुदेवं हरे।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकी नायकं रामचन्द्रं भजे।।
श्रद्धा और विश्वास के इस मंत्र का जाप करने से न सिर्फ तमाम संकटों से मुक्ति मिलती है, बल्कि सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। सुख, समृद्धि और शुभता बढ़ाने में यह महामंत्र काफी कारगर साबित होता है।
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् ।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 1 ।।
वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरम्
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 2 ।।
वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 3 ।।
गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 4 ।।
करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरम् ।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 5 ।।
गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा ।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 6 ।।
गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् ।
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 7 ।।
गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा ।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 8 ।।
कन्हैया की स्तुति करने के लिए तमाम मंत्र हैं लेकिन यह मंत्र उनकी मधुर छवि का दर्शन कराती है। इस मंत्र की स्तुति में कान्हा की अत्यंत मनमोहक छवि उभर कर सामने आती है। साथ ही साथ योगेश्वर श्रीकृष्ण के सर्वव्यापी और विश्व के पालनकर्ता होने का भी भान होता है।
हृदय रेखा छोटी या फिर हल्की होना अच्छा नहीं
27 Nov, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
विवाह के लिए वर-वधू का योग देखने में हस्तरेखा का बहुत बड़ा योगदान होता है। किसी भी विवाह का भविष्य वर और कन्या की हथेली पर उपस्थित विभिन्न रेखाओं, पर्वतों और चिह्नों की स्थिति पर निर्भर करता है। कुछ ऐसी रेखाओं के बारे में जान लें जो विवाह के मामले में अच्छी साबित नहीं होतीं।
हृदय रेखा
यदि आपकी हृदय रेखा छोटी सा फिर हल्की है तो आपके लिए वैवाहिक संयोग अच्छे नहीं हैं। ऐसे में विवाह होने के बाद भी आपके संबंधों में विच्छेद हो सकता है।
मंगल पर्वत
यदि आपका मंगल पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित हो या फिर मंगल पर दोषपूर्ण चिह्न हो तो ऐसे में विवाह करना आपके लिए सही नहीं होगा।
शुक्र पर्वत हों कम विकसित
शुक्र पर्वत कम विकसित होने पर वैवाहिक जीवन में शारीरिक संतुष्टि नहीं प्राप्त होती। चंद्र पर्वत और बृहस्पति के कम विकसित होने पर भी ऐसा ही होता है।
हृदय रेखा पर काले चिह्न अशुभ
यदि आपकी हृदय रेखा पर किसी प्रकार के काले चिह्न शुभ नहीं है। मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा में जरूरत से ज्यादा दूरी होना सही नहीं है। हाथ का निचला क्षेत्र अत्यधिक विकसित होना अच्छा नहीं माना जाता। ये सभी बातें विवाह पश्चात शारीरिक अनुकूलता के लिए सही नहीं है। ये सभी विकार असंतुष्ट यौन संबंधों को दर्शाते हैं।
संतान सुख नहीं मिल पाता इनको
अगर आपकी हृदय रेखा छोटी है और शुक्र व गुरु पर्वत के उभार भी कम हैं। विवाह रेखा के ऊपर क्रॉस है। जिस स्थान पर मस्तिष्क रेखा बुध रेखा को काटती है, अगर वहां तारा है तो यह शुभ नहीं है।
ऐसे में हो सकता है तलाक भी
विवाह रेखा अंत में दो भागों में बंट रही हो। शुक्र पर्वत पर जाल या फिर एक-दूसरे को काटती हुई रेखाएं हो तो ये शारीरिक अक्षमता को दर्शाता है। विवाह रेखा को कोई रेखा काटे तो तलाक की आशंका बढ़ जाती है।
भगवान अयप्पा के जन्म की कथा
27 Nov, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दक्षिण भारत का विश्वप्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर भगवान अयप्पा को समर्पित है। भगवान अयप्पा शिवजी और विष्णु जी के पुत्र माने जाते हैं। इनके जन्म और पालन की कथा बहुत रोचक है।
इनके पुत्र हैं भगवान अयप्पा
भगवान अयप्पा जगपालनकर्ता भगवान विष्णु और शिवजी के पुत्र हैं। दरअसल, मोहिनी रूप में भगवान विष्णु जब प्रकट हुए, तब शिवजी उनपर मोहित हो गए और उनका वीर्यपात हो गया। इससे भगवान अयप्पा का जन्म हुआ। भगवान अयप्पा की पूजा सबसे अधिक दक्षिण भारत में होती है हालांकि इनके मंदिर देश के कई स्थानों पर हैं जो दक्षिण भारतीय शैली में ही निर्मित होते हैं।
इसलिए अयप्पा कहलाते हैं हरिहरन
भगवान अयप्पा को ‘हरिहरन’ नाम से भी जाना जाता है। हरि अर्थात भगवान विष्णु और हरन अर्थात शिव। हरि और हरन के पुत्र अर्थात हरिहरन। इन्हें मणिकंदन भी कहा जाता है। यहां मणि का अर्थ सोने की घंटी से है और कंदन का अर्थ होता है गर्दन। अर्थात गले में मणि धारण करनेवाले भगवान। इन्हें इस नाम से इसलिए पुकारा जाता है क्योंकि इनके माता-पिता शिव और मोहिनी ने इनके गले में एक सोने की घंटी बांधी थी।
इन्होंने किया अयप्पा स्वामी का पालन
पौराणिक कथाओं के अनुसार, अयप्पा के जन्म के बाद मोहिनी बने भगवान विष्णु और शिवजी ने इनके गले में स्वर्ण कंठिका पहनाकर इन्हें पंपा नदी के किनारे पर रख दिया था। तब पंडालम के राजा राजशेखर ने इन्हें अपना लिया और पुत्र की तरह इनका लालन-पालन किया। राजा राजशेखर संतानहीन थे। वर्तमान समय में पंडालम केरल राज्य का एक शहर है।
तब माता का मोह हो गया खत्म
जब अयप्पा राजा के महल में रहने लगे, उसके कुछ समय बाद रानी ने भी एक पुत्र को जन्म दिया। अपना पुत्र हो जाने के बाद रानी का व्यवहार दत्तक पुत्र अयप्पा के लिए बदल गया। राजा राजशेखर, अयप्पा के प्रति अपनी रानी के दुर्व्यवहार को समझते थे। इसके लिए उन्होंने अयप्पा से माफी मांगी।
रानी ने रचा ढोंग
रानी को इस बात का डर था कि राजा अपने दत्तक पुत्र को बहुत स्नेह करते हैं, कहीं वे अपनी राजगद्दी उसे ही न दे दें। ऐसे में रानी ने बीमारी का नाटक किया और अयप्पा तक सूचना पहुंचाई कि वह बाघिन का दूध पीकर ही ठीक हो सकती हैं। उनकी चाल वन में रह रही राक्षसी महिषी द्वारा अयप्पा की हत्या कराने की थी। अयप्पा अपनी माता के लिए बाघिन का दूध लेने वन में गए। जब वहां महिषी ने उन्हें मारना चाहा तो अयप्पा ने उसका वध कर दिया और बाघिन का दूध नहीं लाए बल्कि बाघिन की सवारी करते हुए,मां के लिए बाघिन ही ले आए।
बाघिन की सवारी करते हुए आए बाहर
जब अयप्पा बाघिन की सवारी करते हुए वन से बाहर आए तो राज्य के सभी लोग उन्हें जीवित और बाघिन की सवारी करते देखकर हैरान रह गए। सभी ने अयप्पा के जयकारे लगाए। तब राजा समझ गए कि उनका पुत्र कोई साधारण मनुष्य नहीं है। इस पर उन्होंने रानी के बुरे बर्ताव के लिए उनसे क्षमा मांगी। पिता को परेशान देखकर अयप्पा ने राज्य छोड़ने का निर्णय लिया और पिता से सबरी (पहाड़ियों) में मंदिर बनवाने की बात कहकर स्वर्ग चले गए। मंदिर बनवाने के पीछे उनका उद्देश्य पिता के अनुरोध पर पृथ्वी पर अपनी यादें छोड़ना था।
ऐसे हुआ सबरी में मंदिर का निर्माण
पुत्र की इच्छानुसार राजा राजशेखर ने सबरी में मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर निर्माण के बाद भगवान परशुराम ने अयप्पा की मूरत का निर्माण किया और मकर संक्रांति के पावन पर्व पर उस मूरत को मंदिर में स्थापित किया। इस तरह भगवान अयप्पा का मंदिर बनकर तैयार हुआ और तब से भगवान के इस रूप की पूजा हो रही है और मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है।
इसलिए शिव और विष्णु ने रची लीला
मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध के बाद जीवित बची उसकी बहन महिषी ने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या की। इस तपस्या से प्रसन्न होकर जब ब्रह्मदेव ने उससे वरदान मांगने के लिए कहा तो उसने वर मांगा कि उसकी मृत्यु केवल शिव और विष्णु भगवान के पुत्र के द्वारा ही हो, ब्रह्मांड में और कोई उसकी मृत्यु न कर सके। ऐसा वर उसने इसलिए मांगा क्योंकि ब्रह्माजी ने उसे अमरता का वरदान देने से मना कर दिया था। शिव और विष्णु का पुत्र परिकल्ना से परे था, इसलिए राक्षसी ने यह इच्छा रखी। वरदान मिलते ही उसने उत्पात मचाना शुरू कर दिया। तब भगवान विष्णु को मोहिनी रूप धारण करना पड़ा। ताकि भक्तों का संकट मिटा सकें।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (27 नवंबर 2025)
27 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- बाधाओं से विचलित न हों, स्त्री शरीर कष्ट, मानसिक उद्विघ्नता अवश्य बनेगी।
वृष राशि :- शुद्ध गोचर रहने से समय की अनुकूलता से लाभांवित हों, रुके कार्य बन जायेंगे।
मिथुन राशि :- कार्यवृत्ति अनुकूल, चिन्तायें कम हों, स्त्री-वर्ग से हर्ष-उल्लास अवश्य ही बनेगा।
कर्क राशि :- दैनिक स्थिति में सुधार, चिन्तायें कम हों किन्तु स्वभाव में खिन्नता बनेगी।
सिंह राशि :- संघर्ष फलप्रद रहे, सोचे कार्य समय पर बनेंगे, मित्रों से सुख व सहयोग मिलेगो।
कन्या राशि :- दैनिक व्यवसायिक गति अनुकूल होगी, क्लेश व अशांति, समय व्यर्थ जायेगा।
तुला राशि :- सोचे कार्य समय पर पूर्ण होंगे तथा बौद्धिक क्षमता में वृद्धि होगी।
वृश्चिक राशि :- प्रगति की ओर बढ़ रहे हैं, मनोवृत्ति-भावनायें उत्साहवर्धक अवश्य होंगी।
धनु राशि :- स्थिति कुछ असमंजस में रखे, विघटनकारी तत्व परेशानी पैदा करेंगे, सतर्क रहें।
मकर राशि :- घटना का शिकार होने से बचें, स्वभाव अनुकूल रहेगा, धनागमन से शांति होगी।
कुंभ राशि :- उद्विघ्नता-असमंजस का वातावरण क्लेशयुक्त रखे, कार्य से संतोष होगा।
मीन राशि :- कार्यवृत्ति में सुधार, कुछ नई चिन्तायें मन उद्विघ्न रखेंगी, धैर्य से कार्य करें।
हवन के समय सुना होगा स्वाहा और स्वधा, लेकिन क्या आप जानते हैं दोनों के बीच का अंतर? किस तरह की पूजा में होता है उच्चारण?
26 Nov, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारतीय परंपरा में कई ऐसे मंत्र और ध्वनियां हैं जिनसे हर घर, हर अनुष्ठान और हर पूजा का जुड़ाव रहा है. इनमें से दो बेहद प्रसिद्ध नाम हैं स्वाहा और स्वधा. अक्सर लोग इन दोनों को सिर्फ एक धार्मिक शब्द मान लेते हैं, जिन्हें यज्ञ या श्राद्ध के समय बोला जाता है. लेकिन सच यह है कि ये सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि दिव्य शक्तियां मानी जाती हैं. दोनों का अपना अलग सम्मान, अलग उद्देश्य और अलग प्रभाव है. बाल्यकाल से ही हम हवन में स्वाहा और पितृ कार्यों में स्वधा सुनते आए हैं, पर इनके पीछे छिपे अर्थ को बहुत कम लोग ठीक से समझ पाते हैं. यह जानना दिलचस्प है कि ये दोनों शक्तियां दक्ष प्रजापति की पुत्रियां कही गई हैं और उनका काम है अर्पित वस्तु को सही जगह तक पहुंचाना. एक देवताओं तक पहुंचाती है, दूसरी पूर्वजों तक. इस तरह वे मनुष्य और दिव्य लोक के बीच पुल का काम करती हैं. यह भी ध्यान देने योग्य है कि इनका उच्चारण सिर्फ परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि ऊर्जा का प्रवाह माना गया है. जब कोई अर्पण स्वाहा या स्वधा के साथ किया जाता है, तो माना जाता है कि वह अपने लक्ष्य तक पहुंच जाता है. इसी वजह से ये दोनों ध्वनियां वैदिक विधियों का मूल आधार कही जाती हैं. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
कौन हैं स्वाहा और स्वधा?
स्वाहा अग्नि देव की पत्नी मानी गई हैं. जब देवताओं को कुछ अर्पित किया जाता है, तब अग्नि के साथ यह ध्वनि अर्पण को ऊपर तक ले जाती है. इसे एक ऐसी शक्ति समझा गया है जो अग्नि में डाले गए पदार्थ को रूपांतरित कर देवताओं की ओर भेज देती है. इसलिए हर यज्ञ की पूर्णता स्वाहा से ही मानी जाती है.
स्वधा पितरों की पत्नी कही गई हैं. श्राद्ध के समय जब पूर्वजों के लिए जल, तिल या भोजन अर्पित किया जाता है, तब स्वधा कहा जाता है. इससे भाव यही है कि वह अर्पण सीधे पितरों तक पहुंचे और उन्हें शांति मिले. इस ध्वनि को पितृ लोक तक संदेश पहुंचाने वाला माध्यम बताया गया है.
दोनों के बीच मूल अंतर
पहलू स्वाहा स्वधा
अर्पण का लक्ष्य देवता पितर
प्रयोग का समय हवन, यज्ञ, अग्नि आधारित विधि श्राद्ध, पितृ सम्मान से जुड़े कार्य
पौराणिक संबंध अग्नि देव की पत्नी पितरों की पत्नी
उद्देश्य देव शक्तियों तक अर्पण पहुंचाना पूर्वजों को संतुष्टि और शांति देना
उच्चारण और प्रभाव
जब हवन में कोई सामग्री अग्नि को दी जाती है, तो अंत में स्वाहा बोला जाता है. यह ध्वनि अग्नि में उठती गर्मी के साथ अर्पण को ऊपर ले जाने का प्रतीक बन जाती है. लोग मानते हैं कि अग्नि इस अर्पण को देव लोक में ले जाकर उजाला और शक्ति में बदल देती है.
श्राद्ध के समय स्वधा बोला जाता है. जल, तिल या भोजन को इस ध्वनि के साथ अर्पित किया जाता है, जिससे उस अर्पण का भाव पितृ लोक तक पहुंचने का माना जाता है. यह ध्वनि सम्मान, स्मरण और जुड़ाव की तरह काम करती है.
क्या आप भी तुलसी के पौधे पर दूध मिला जल अर्पित करते हैं? अगर हां, तो कर रहे हैं बहुत बड़ी गलती!
26 Nov, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारतीय परंपरा में तुलसी के पौधे का बहुत पवित्र और महत्व है. बड़े-बुजुर्गों का मानना है कि घर में तुलसी का होना शुभता, शांति, समृद्धि, आरोग्य की प्राप्ति होती है और वास्तु दोष भी दूर होता है. शास्त्रों में कहा गया है कि तुलसी में देवी लक्ष्मी का वास होता है इसलिए हर दिन तुलसी की पूजा अर्चना करना शुभ माना जाता है. साथ ही शास्त्रों में तुलसी पूजा के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं, इन नियमों के आधार पर ही पूजा अर्चना करने पर पूर्ण फल की प्राप्ति होती है. अगर इन नियमों का ध्यान ना दिया जाए तो कई तरह की परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है. ये नियम ना केवल पूजा का पूर्ण फल देते हैं, बल्कि यह जीवन में सकारात्मकता लाते हैं. आइए जानते हैं तुलसी पूजा के नियमों के बारे में…
तुलसी पूजा में इन चीजों से रहें दूर
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, हमेशा ध्यान रखें कि तुलसी का पौधा जहां हो, वहां आसपास कोई चीज ना रखें. साथ ही भगवान शिव को अर्पित की गई वस्तुओं को तुलसी के पौधे के सामने रखना बहुत बड़ी भूल मानी जाती है. बिल्व पत्र, पारिजात के फूल, शिवार्चन में प्रयुक्त फूल या अन्य सामग्री तुलसी के पौधे के पास नहीं रखनी चाहिए. पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने तुलसी देवी के पति जालंधर का वध किया था, इसलिए दोनों के बीच आपसी दुश्मनी थी. शिव पूजा से संबंधित कोई भी वस्तु तुलसी पर नहीं चढ़ाई जानी चाहिए.
ये चीजों तुलसी को करती हैं कमजोर
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी के पौधे पर दूध मिला जल छिड़कना शुभ माना जाता है लेकिन यह धारण पूरी तरह गलत है. तुलसी की जड़ें दूध में मौजूद वसा को अवशोषित नहीं कर पातीं, जिससे जड़ें सड़ सकती हैं और पौधा कमजोर हो सकता है. पौधे का सूखना आध्यात्मिक रूप से भी अशुभ माना जाता है. बड़े-बुज़ुर्ग कहते हैं कि इससे वास्तु दोष होता है, आर्थिक परेशानियां और परिवार में झगड़े बढ़ने जैसे नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं.
तुलसी पर अर्पित करें ये चीजें
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, तुलसी के पौधे पर काले तिल और काले बीज जैसी काली वस्तुएं अर्पित करना अशुभ होता है. काला रंग आमतौर पर तामसिक ऊर्जाओं का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए ऐसा माना जाता है कि अगर तुलसी पर ऐसी वस्तुएं चढ़ाई जाएं, तो नकारात्मक ऊर्जाएं आकर्षित होती हैं. चूंकि तुलसी के पौधे में शुद्ध और सौम्य ऊर्जा होती है, इसलिए इसे केवल हल्दी, केसर, जल और शहद जैसी शुभ सामग्री ही अर्पित करने की सलाह दी जाती है.
तुलसी जीवन में लाती है खुशहाली
माना जाता है कि अगर घर में तुलसी स्वस्थ रूप से बढ़ती है, तो यह परिवार में शांति, स्वास्थ्य और खुशहाली लाती है. इन छोटे-छोटे नियमों का पालन करके आप न केवल तुलसी के पौधे की रक्षा कर सकते हैं, बल्कि अच्छे आध्यात्मिक परिणाम भी प्राप्त कर सकते हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (26 नवंबर 2025)
26 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति, मानसिक विभ्रम, किसी घटना का शिकार होने से बचें।
वृष राशि :- असमंजस की स्थिति क्लेशप्रद रखे, विरोधी तत्व परेशान करेंगे ध्यान रखें।
मिथुन राशि :- समय की अनुकूलता से लाभांवित होंगे, विरोधी तत्व परेशान अवश्य करेंगे।
कर्क राशि :- इष्ट-मित्र सुखवर्धक हों, व्यवसायिक क्षमता अनुकूल होगी, समय का ध्यान रखें।
सिंह राशि :- कुटुम्ब की समस्यायें सुलझें, स्त्री-वर्ग से हर्ष-उल्लास हो, कार्य पर ध्यान दें।
कन्या राशि :- अर्थ-लाभ, कुटुम्ब की समस्यायें सुलझें, स्त्री-वर्ग से हर्ष-उल्लास होगा।
तुला राशि :- विवादग्रस्त होने से बचें अन्यथा संकट में फंस सकते हैं, धैर्य से काम लें।
वृश्चिक राशि :- अधिकारी वर्ग सहायक बनेंगे, कार्यवृत्ति में सुधार होगा, सफलता मिलेगी।
धनु राशि :- व्यर्थ विवाद, अनावश्यक विभ्रम, धन का व्यय, स्थिति कष्टप्रद बनेगी।
मकर राशि :- योजनायें फलीभूत हों, कार्य कुशलता से संतोष, समृद्धि के साधन जुटायें।
कुंभ राशि :- विरोधी तत्व परेशान करेंगे, व्यर्थ विभ्रम, मानसिक बेचैनी बनेगी।
मीन राशि :- सोचे हुये कार्य समय पर पूरे होंगे किन्तु अधिक ढीलेपन से परेशानी होगी।
2026 में क्यों पड़ रहा है दो बार ज्येष्ठ? जानें अधिकमास का महत्व और शुभता
25 Nov, 2025 01:15 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Adhik Maas Importance Puja: भारतीय पंचांग में समय की गणना ग्रेगोरियन कैलेंडर से अलग होती है, और इसी आधार पर हिंदू नववर्ष की शुरुआत चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा से मानी जाती है। वर्तमान में विक्रम संवत 2082 चल रहा है, जबकि फाल्गुन इसका अंतिम महीना माना जाता है। आने वाला वर्ष 2026 इसलिए खास रहेगा क्योंकि इसमें Adhik Maas Importance से जुड़ा एक दुर्लभ योग बनने वाला है।
दरअसल, वर्ष 2026 में ज्येष्ठ मास दो बार आएगा। एक सामान्य ज्येष्ठ महीना और दूसरा अधिक ज्येष्ठ यानी अधिकमास। इस कारण उस वर्ष ज्येष्ठ की कुल अवधि करीब 58 से 59 दिनों की होगी। अधिकमास को मलमास और पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, और इसे धार्मिक रूप से अत्यंत शुभ और पुण्य अर्जित करने वाला समय माना जाता है। इसी वजह से विक्रम संवत 2083 में कुल 13 महीने होंगे।
पंचांग के अनुसार, अधिकमास 17 मई 2026 से शुरू होकर 15 जून तक चलेगा। वहीं सामान्य ज्येष्ठ मास 22 मई से 29 जून 2026 तक रहेगा। लगभग हर 32 महीने 16 दिन में सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच जो समय अंतर बनता है, उसे संतुलित करने के लिए पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है। इसी अतिरिक्त महीने को अधिकमास कहा जाता है, और यह चक्र लगभग हर तीसरे वर्ष दोहराया जाता है।
Adhik Maas Importance इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह अवधि आत्मचिंतन, आध्यात्मिक साधना और मनोशुद्धि के लिए आदर्श मानी जाती है। इस माह में विष्णु भक्ति, जप, पाठ, दान और सात्त्विक आचरण को विशेष फलदायी माना गया है। परंपरा के अनुसार, अधिकमास में विवाह, गृह प्रवेश या संपत्ति खरीदने जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।
महाभारत में किसने जी सबसे लंबी जिंदगी... क्या थी उनकी उम्र, तब कैसे जी लेते थे लंबा जीवन
25 Nov, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वैसे तो ये बात सही है कि महाभारत काल में लोगों की जिंदगी आज की तुलना में ज्यादा लंबी थी. 80-90 सालों की जिंदगी पा लेना कोई मुश्किल नहीं था. फिर ये भी माना जाता है कि महाभारत काल का एक दिन और एक साल भी कहीं ज्यादा लंबा होता था. क्या आपको मालूम है कि महाभारत में कौन से वो दो योद्धा थे, जिन्होंने अपने सामने कई पीढ़ियों को पैदा होते हुए देखा. सबसे लंबी जिंदगी जी.
ये दोनों योद्धा महाभारत के महान योद्धा थे. इनकी लंबी जिंदगी का आखिर राज क्या था. इनका खाना पीना या कुछ और. इसमें कृष्ण को शामिल नहीं किया गया है.
इन्होंने 100 सालों से ऊपर की जिंदगी जी. पुख्ता तौर पर उनकी कुल उम्र क्या थी, ये हम आगे बताएंगे लेकिन उनकी इस लंबी उम्र का रहस्य आध्यात्मिकता, दैवीय आर्शीवाद, अनुशासन, योग और खानपान से जुड़ा हुआ है. आज भी दुनिया में तमाम लोग आध्यात्मिकता, योग, खानपान और अनुशासन के जरिए 100 सालों से ऊपर का जीवन जी रहे हैं. हम आपको ये भी बताएंगे कि महाभारत में उनके अलावा अन्य खास योद्धा और पांडवों ने कितनी लंबी आयु पाई.
कौन थे ये दो महान योद्धा
आइए पहले जान लेते हैं कि ये दो महान योद्धा कौन थे, जिन्होंने उस दौर में सबसे लंबा जीवन जिया. ये थे द्रोणाचार्य और भीष्म. दोनों की उम्र 120 साल के आसपास थी. दोनों शायद और लंबा जीते, अगर वो महाभारत के युद्ध में मारे नहीं गए होते. हालांकि भीष्म को तो इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था. लिहाजा उन्होंने महाभारत के युद्ध में बुरी तरह घायल होने के बाद लड़ाई खत्म होने के करीब 20 दिन बाद प्राण त्यागे.
क्या था लंबी जिंदगी का रहस्य
महाभारत में भीष्म और द्रोणाचार्य जैसे पात्रों की दीर्घायु के पीछे कई वजहें थीं. जो खासतौर पर उनकी जीवनशैली से ज्यादा जुड़ी थीं. द्रोणाचार्य की लंबी जिंदगी का रहस्य उनके योग, एक्सरसाइज, युद्ध कलाओं का अभ्यास और पवित्र शिक्षक की जिंदगी में था. भीष्म के बारे में महाभारत और शास्त्रों में ये कहा गया कि उनकी आयु 110 से 120 सालों के बीच थी.
दोनों योद्धाओं ने ताजिंदगी कड़े अभ्यास वाला जीवन जिया. दोनों ने अपने कर्तव्यों का पालन किया. उनका जीवन कड़ी अनुशासित जीवन शैली वाला था. द्रोणाचार्य मार्शल आर्ट के मास्टर और एक समर्पित शिक्षक थे, जिसने उनकी शारीरिक फिटनेस और मानसिक पैनेपन में योगदान दिया. उनके जीवन में भी संतुलित पोषण शामिल था.
भीष्म की जीवनशैली तपस्वियों वाली थी
भीष्म की तपस्वी जीवनशैली ने भी वर्षों तक उनके स्वास्थ्य को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस युग में आहार संबंधी आदतों पर भी काफी जोर दिया जाता था. आहार प्रथाएं प्राकृतिक और पौष्टिक खाद्य पदार्थों पर जोर देने वाली थीं, जिनके बारे में माना जाता था कि वे स्वास्थ्य और दीर्घायु को बढ़ावा देती हैं. भीष्म की आजीवन ब्रह्मचर्य की भी प्रतिज्ञा की हुई थी.
रोजाना आध्यात्मिक अभ्यास
दोनों ही रोजाना के जीवन में आध्यात्मिक अभ्यास करते थे, जो उनके शरीर को निरोग रखता था. महाभारत युग को अक्सर ऐसे युग के रूप में माना जाता है, जहां लोग कम प्रदूषण, स्वस्थ रहने की स्थिति और मानसिक और शारीरिक अनुशासन पर ज़ोर देने के कारण लंबा जीवन जी सकते थे. ये कहा जाता है कि उस समय के लोग 100 साल की उम्र में भी उतने ही स्वस्थ हो सकते थे, जितने आज 70 साल के लोग हैं.
इनसे ज्यादा लंबे समय जीवन भी किसी ने जिया
महाभारत महाकाव्य के लेखक और ऋषि व्यास के बारे में माना जाता है कि वो इससे भी अधिक समय तक जीवित रहे. उनकी उम्र शायद 130 वर्ष की थी. व्यास की मां भी सत्यवती थीं और पिता ऋषि पाराशर. उनके जन्म की एक अलग कहानी है.
क्या खाते पीते थे भीष्म
महाभारत से संबंधित जानकारी देने वाली किताबें कहती हैं कि भीष्म ने शायद ताजिंदगी सात्विक आहार का पालन किया, जिसमें ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज, मेवे और घी और दूध जैसे डेयरी उत्पाद शामिल हैं. प्राचीन ग्रंथों में आहार में संयम के सिद्धांतों पर जोर दिया गया था. भीष्म ने संयम से भोजन करने का अभ्यास किया होगा. अधिक खाने से परहेज किया होगा, जो स्वास्थ्य को बनाए रखने और ज्यादा खाने से जुड़ी जुड़ी बीमारियों को रोकने के मामलों में अहम माना जाता है. किताबें कहती हैं कि भीष्म अनुष्ठान के अलावा खानपान में मांस के सेवन के पक्ष में नहीं थे.
पांडवों की उम्र कितनी थी
क्या आप जानते हैं कि महाभारत के दूसरे प्रमुख योद्धाओं और पांडवों की उम्र कितनी थी. महाभारत के पांडवों की उम्र का सटीक वर्णन कहीं उपलब्ध नहीं है,लेकिन विभिन्न स्रोतों और घटनाओं के आधार पर इसका अनुमान लगाया जा सकता है.
युधिष्ठिर पांडवों में सबसे बड़े थे. उनकी उम्र का अनुमान लगभग 90-100 वर्ष तक का लगाया गया है. युधिष्ठिर के बाद भीम की उम्र थी. उनकी उम्र युधिष्ठिर से 1-2 वर्ष कम मानी जाती है.अर्जुन पांडवों में तीसरे नंबर पर थे. वह युधिष्ठिर से लगभग 3-4 साल छोटे हो सकते हैं. नकुल और सहदेव जुड़वां थे. दोनों अर्जुन से करीब 10-15 वर्ष छोटे थे. महाभारत युद्ध के समय युधिष्ठिर की उम्र लगभग 70-75 वर्ष मानी जाती है.
ये माना जाता है कि कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद पांडवों ने 36 वर्षों तक हस्तिनापुर पर शासन किया. उसके बाद सब कुछ छोड़कर स्वर्ग जाने का फैसला लिया.
धृतराष्ट्र कितना लंबा जिये
धृतराष्ट्र का जन्म महाराज विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद महर्षि वेदव्यास के द्वारा नियोग प्रक्रिया से हुआ. वह पांडु और विदुर के बड़े भाई थे. महाभारत युद्ध के समय धृतराष्ट्र की आयु करीब 90-100 वर्ष मानी जाती है. ये बात इस तथ्य पर आधारित है कि दुर्योधन और उनके भाई-बहनों की उम्र युद्ध के समय लगभग 50-60 वर्ष थी.
महाभारत युद्ध के बाद, धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती ने 15 वर्ष तक हस्तिनापुर में निवास किया. फिर वो वनवास पर चले गए. फिर करीब 2-3 वर्षों के बाद (महाभारत के अनुसार) जंगल में एक अग्निकांड में उनकी मृत्यु हो गई.
महाभारत में कितना लंबा होता था एक साल
महाभारत के युग में वर्ष की अवधारणा चंद्र-सौर कैलेंडर पर आधारित थी। इसका मतलब है कि एक वर्ष की गणना आमतौर पर चंद्र और सौर चक्र दोनों के अनुसार की जाती थी.
चंद्र वर्ष: चंद्र वर्ष में लगभग 354 दिन होते थे, जो बारह चंद्र महीनों पर आधारित होते थे, जिनमें से प्रत्येक औसत करीब 29.5 दिन के होते थे. चंद्र कैलेंडर को सौर वर्ष के साथ जोड़ने के लिए समय-समय पर अतिरिक्त महीने (अधिक मास) जोड़े जाते थे.
सौर वर्ष: सौर वर्ष लगभग 365.25 दिन लंबा होता है. चंद्र और सौर वर्षों के बीच के अंतरों को समेटने के लिए, प्राचीन भारतीय कैलेंडर में समायोजन शामिल किए गए, जैसे कि हर कुछ वर्षों में एक अतिरिक्त महीना जोड़ना.
ऐतिहासिक गणनाओं के अनुसार, चंद्र कैलेंडर को सौर चक्र के साथ तालमेल रखने के लिए हर पांच साल में दो अतिरिक्त महीने जोड़े जाते थे. इसका मतलब है कि पांच साल की अवधि में, दोनों प्रणालियों के बीच विसंगति को ध्यान में रखते हुए लगभग 12 अतिरिक्त दिन जोड़े जाएंगे.
मोक्षदा एकादशी 2025: 30 नवंबर या 1 दिसम्बर, व्रत किस दिन रखें? उज्जैन के आचार्य से जानें सही तिथि- पूजा विधि
25 Nov, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में वर्ष भर आने वाली प्रत्येक तिथि और व्रत का अपना विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व होता है. इन ही पावन तिथियों में से एक है एकादशी, जिसका स्थान अत्यंत विशेष माना गया है. साल भर में कुल 24 एकादशी पड़ती हैं. प्रत्येक माह में दो बार, एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में. धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की उपासना करने से मनुष्य के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बढ़ती है. कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है.
इस बार जो एकादशी पड़ने वाली है, वह है मोक्षदा एकादशी, एक ऐसा पावन दिन, जिसका नाम ही अपने महत्व को स्पष्ट करता है. ‘मोक्षदा’ यानी मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी, शास्त्रों में वर्णन है कि इस दिन किया गया व्रत और पूजा न केवल साधक के लिए कल्याणकारी होता है, इस बार यह यह तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति देखने को बन रही है. आइए उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज से जानते हैं सही तिथि और नियम.
कब मनाई जाएगी मोक्षदा एकादशी?
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी 30 नवंबर की रात 9 बजकर 29 मिनट से लेकर 1 दिसंबर 2025 की शाम 7 बजकर 01 मिनट बजे तक रहने वाली है. उदिया तिथि को ध्यान में रखते हुए मोक्षदा एकादशी का व्रत 1 दिसंबर को रखा जाएगा.
भूलकर भी ना करें इस दिन यह काम
एकादशी से पहले की रात सूर्यास्त के बाद भोजन न करें. रात में सोने से पहले भगवान का स्मरण या मंत्र का जाप जरूर अवश्य करें. व्रत के दौरान मन पूरी तरह शांत रखें और किसी के प्रति क्रोध या नकारात्मक भावना न आने दें. इस दिन भूलकर भी किसी की निंदा न करें. मोक्षदा एकादशी के दिन अनाज का सेवन वर्जित है. शाम की पूजा के बाद फलाहार किया जा सकता है. यदि व्रत न भी कर पाएं तो कम से कम चावल न खाएं. रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन करना शुभ माना जाता है. अगले दिन सुबह व्रत का पारण करें और ब्राह्मणों को भोजन कराकर ही स्वयं भोजन ग्रहण करें.
जरूर करें इन मंत्रों का जाप
1. ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् ||
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् ||
2. शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्
विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥
3. ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये
धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥
विवाह पंचमी को लेकर जानकी मंदिर में सभी रस्मों को निभाने की पूरी तैयारी, नेपाल से भी पहुंच रहे हैं धाम
25 Nov, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मां जानकी की जन्मस्थली बिहार के सीतामढ़ी के पुनौरा धाम में विवाह पंचमी को लेकर लोगों में उत्साह है. पूरे मिथिला क्षेत्र में विवाह पंचमी विशेष तौर पर मनाया जाता है. माता सीता की जन्मस्थली पुनौरा धाम में श्री सीताराम विवाह महोत्सव को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं. बता दें कि मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को प्रभु श्रीराम और माता जानकी का विवाह हुआ था इसलिए इस तिथि को विवाह पंचमी के नाम से जाना जाता है. विवाह पंचमी के उपलक्ष्मी में जानकी मंदिर में सजावट की गई हैं और पंचमी तिथि को इस मंदिर सभी रस्मों को पूरा किया जाएगा. साथ ही हवन-पूजा और भंडारे का भी आयोजन किया जाएगा. पुनौरा धाम के जानकी मंदिर के बारे में…
विवाह पंचमी पर होंगे ये कार्यक्रम
स्थानीय लोगों के अलावा प्रदेश और नेपाल के लोग भी इस उत्सव में भाग लेने के लिए पुनौरा धाम पहुंच रहे हैं. इस मौके पर पूरे जानकी मंदिर परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया गया है. पुनौरा धाम जानकी जन्मभूमि मंदिर के महंत कौशल किशोर दास ने बताया कि सोमवार को पारंपरिक पूजा-मटकोर और मंगलवार को दिव्य विवाहोत्सव का आयोजन किया जाएगा. बताया गया कि विवाह के सभी रस्मों को निभाने की तैयारी पूरी हो चुकी है. सोमवार शाम को पूजा-मटकोर का आयोजन होगा, जिसमें महिला मंडलियों द्वारा विधि-विधान से मिथिला परंपरा के अनुसार विधियों को पूरा किया जाएगा. वहीं, रात में हल्दी कार्यक्रम आयोजित है. इस दौरान पारंपरिक वैवाहिक गीत, शगुन, हल्दी रस्म और भजन कीर्तन होगा.
विवाह पंचमी का महत्व
मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भगवान श्री राम और माता सीता के दिव्य विवाह स्मृति के अवसर पर यहां भव्य आयोजन किया जाता है. पावन तिथि पर महिलाएं विवाह पंचमी का व्रत-उपवास रखकर पूजा-अर्चना करती हैं. मान्यता है कि इस दिन जो भी अविवाहित युवती उपवास व्रत रखकर श्री राम-जानकी की भावपूर्वक पूजा-आराधना करती हैं, उन्हें मन योग्य पति की प्राप्ति होती है. वहीं, सुहागन स्त्रियों के दांपत्य जीवन में खुशहाली आती है.
पूरे मंदिर को सजाया गया
मंगलवार की रात में विवाहोत्सव का आयोजन किया जाएगा. बुधवार को नगर के मां जानकी की प्राकट्य स्थली रजत द्वार जानकी मंदिर के महंत विनोद दास के संयोजन में निशान शोभा यात्रा निकाली जाएगी. रात में जानकी माता की महाआरती होगी. विवाह पंचमी पर मंदिर प्रांगण, सीता कुंड, सीता प्रेक्षागृह और सभी भवनों पर विशेष लाइटिंग की व्यवस्था की जा रही है. वहीं पूरे मंदिर को दीपों से सजाया जाएगा.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (25 नवंबर 2025)
25 Nov, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- व्यवसायिक क्षमता में वृद्धि, शुभ समाचार मिलने का योग, समय का ध्यान रखें।
वृष राशि :- आकस्मिक बेचैनी, स्वभाव में खिन्नता, थकावट, असमंजस की स्थिति बनेगी।
मिथुन राशि :- बेचैनी से स्वभाव में खिन्नता, मन भ्रमित होगा, मान-प्रतिष्ठा में कमी, सावधान रहें।
कर्क राशि :- दैनिक कार्य वृद्धि में सुधार एवं योजनायें फलीभूत होंगी, कार्य बनेगा ध्यान दें।
सिंह राशि :- विसंगति से हानि, आशानुकूल सफलता से हर्ष, बिगड़े कार्य बन ही जायेंगे।
कन्या राशि :- स्त्री-वर्ग से हर्ष-उल्लास, सामाजिक कार्यों में मान-प्रतिष्ठा, नवीन कार्य होंगे।
तुला राशि :- मान-प्रतिष्ठा पर आंच आने का डर, विवाद-ग्रस्त होने से बचें, धैर्य रखें।
वृश्चिक राशि :- सामाजिक कार्यों में प्रभुत्व वृद्धि, संवृद्धि, संवर्धन के योग बनेंगे।
धनु राशि :- शुभ समाचार से संतोष, दैनिक कार्यगति अनुकूल, मनोकामना पूर्ण होगी, ध्यान दें।
मकर राशि :- विघटनकारी तत्व परेशान करें, अचानक यात्रा के प्रसंग अवश्य ही बनेंगे।
कुंभ राशि :- स्वभाव में खिन्नता, मानसिक बेचैनी, परिश्रम से व्यवस्था अवश्य बनेगी।
मीन राशि :- समृद्धि के साधन जुटायें, अधिकारियों का समर्थन फलप्रद होगा, कार्य बनेंगे।
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