धर्म एवं ज्योतिष
पूजा करते समय शास्त्रों के अुनसार किसका प्रयोग करना चाहिए, धूपबत्ती या अगरबत्ती, और क्यों?
5 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारतीय संस्कृति में पूजा-पाठ का विशेष महत्व है. पूजा के दौरान वातावरण को सुगंधित और पवित्र बनाने के लिए लोग धूपबत्ती या अगरबत्ती का प्रयोग करते हैं. लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि शास्त्रों के अनुसार कौन सा विकल्प सही है. धूपबत्ती या अगरबत्ती? आइए जानते हैं इसका उत्तर और कारण.
धूपबत्ती और अगरबत्ती में अंतर
धूपबत्ती: यह बिना लकड़ी की स्टिक के होती है और आमतौर पर गोंद, लकड़ी का चूर्ण, जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक सुगंधित पदार्थों से बनाई जाती है. इसे जलाने पर धुआं अधिक निकलता है, जो वातावरण को शुद्ध करता है.
अगरबत्ती: यह पतली लकड़ी की स्टिक पर सुगंधित पाउडर चढ़ाकर बनाई जाती है. इसे जलाने पर हल्की खुशबू आती है और धुआं कम होता है.
शास्त्रों में क्या कहा गया है?
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, पूजा में वातावरण को शुद्ध और देवताओं को प्रसन्न करने के लिए प्राकृतिक पदार्थों से बनी धूप का प्रयोग करना श्रेष्ठ माना गया है.
धूप का महत्व: धूप को अग्नि में अर्पित करने से वातावरण में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है. यह देवताओं को प्रिय है और यज्ञ की तरह वातावरण को पवित्र करता है.
अगरबत्ती का उल्लेख: अगरबत्ती का प्रयोग आधुनिक समय में अधिक हुआ है. शास्त्रों में इसका सीधा उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन इसे सुगंध के लिए स्वीकार किया जा सकता है.
क्यों धूपबत्ती को प्राथमिकता दें?
प्राकृतिक तत्वों से बनी होती है – धूपबत्ती में गोंद, कपूर, चंदन, जड़ी-बूटियां होती हैं, जो वातावरण को शुद्ध करती हैं.
धार्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ – शास्त्रों में धूप को देवताओं के लिए अर्पण माना गया है.
ऊर्जा संतुलन – धूप का धुआं नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकारात्मकता बढ़ाता है.
अगरबत्ती का उपयोग कब करें?
अगरबत्ती का प्रयोग तब किया जा सकता है जब आप हल्की सुगंध चाहते हैं और धूपबत्ती का धुआं आपको भारी लगता है. यह सुविधाजनक है और जल्दी जल जाती है.
स्वास्थ्य और सावधानियां
धूपबत्ती का धुआं अधिक होता है, इसलिए इसे हवादार जगह पर जलाएं.
अगरबत्ती चुनते समय ध्यान दें कि इसमें केमिकल न हों. प्राकृतिक सुगंध वाली अगरबत्ती ही लें.
शास्त्रों के अनुसार पूजा में धूपबत्ती का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यह वातावरण को शुद्ध करती है, और देवताओं को प्रिय है. अगरबत्ती का प्रयोग आधुनिक सुविधा के लिए किया जा सकता है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से धूप का महत्व अधिक है. इसलिए अगली बार पूजा करते समय धूपबत्ती का प्रयोग करें और वातावरण को पवित्र बनाएं.
शुभ योग में करें माता लक्ष्मी की पूजा, जानें महत्व और व्रत कब से करें शुरू, संतोषी माता के व्रत में इनसे रहें दूर
5 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी और संतोषी माता की पूजा का विशेष महत्व है. शुक्रवार को लक्ष्मी पूजा इसलिए शुभ है क्योंकि यह शुक्र ग्रह का विशेष दिन है और शुक्र ही लक्ष्मी तत्त्व का वाहक है. इस दिन की पूजा से धन, दांपत्य, सौभाग्य व शांति की सीधी प्राप्ति होती है. आइए जानते हैं शुक्रवार का महत्व और माता लक्ष्मी की पूजा विधि...
पौष माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि 5 दिसंबर दिन शुक्रवार को है. शुक्रवार का दिन बिष्णु प्रिया माता लक्ष्मी और वैभव, सौभाग्य के कारक ग्रह शुक्र को समर्पित है. शुक्र ग्रह और माता लक्ष्मी, दोनों ही सौंदर्य, सुख, समृद्धि, प्रेम, भोग और धन के अधिकारी हैं. इसी कारण शुक्रवार का दिन देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना गया है. शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के साथ बहुत से जातक संतोषी माता का भी व्रत करते हैं. शुक्रवार के दिन सिद्ध योग और साध्य योग भी बन रहा है, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है. शुभ योग में माता लक्ष्मी की पूजा करने से सभी कार्य अपने आप संपन्न हो जाते हैं और सुख-सुविधा और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है. आइए जानते हैं शुक्रवार का महत्व और माता लक्ष्मी की पूजा विधि...
शुक्रवार पंचांग 2025 - द्रिक पंचांग के अनुसार, शुक्रवार के दिन अभिजित मुहूर्त सुबह 11 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 33 मिनट तक रहेगा और राहुकाल का समय सुबह 10 बजकर 54 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 12 मिनट तक रहेगा. इस दिन सूर्य वृश्चिक राशि में और चंद्रमा रात के 10 बजकर 15 मिनट तक वृषभ राशि में रहेंगे. इसके बाद मिथुन राशि में गोचर करेंगे. साथ ही शुक्रवार के दिन सिद्ध योग और साध्य योग भी बन रहा है.
शुक्रवार का महत्व - पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, शुक्रवार व्रत मुख्य रूप से संतोषी मां और धन की देवी मां लक्ष्मी को समर्पित होता है. इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से जातक के जीवन में चल रहे सभी कष्टों का नाश होता है और माता रानी अपने भक्तों को सभी कष्टों से बचाती हैं. साथ ही उनकी जो भी मनोकामनाएं होती हैं, उन्हें भी पूर्ण करती हैं. शुक्रवार का व्रत शुक्र ग्रह को मजबूत करने और उससे संबंधित दोषों को दूर करने के लिए भी रखा जाता है. इस व्रत को किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के पहले शुक्रवार से शुरू किया जा सकता है. आमतौर पर यह व्रत लगातार 16 शुक्रवार तक रखा जाता है, जिसके बाद उद्यापन किया जाता है.
शुक्रवार माता लक्ष्मी पूजा विधि - शुक्रवार का व्रत करने के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें. लाल कपड़े पर माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें. दीप जलाएं और फूल, चंदन, अक्षत, कुमकुम और मिठाई का भोग लगाएं. श्री सूक्त और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए. मंत्र जप करें, 'ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः' और 'विष्णुप्रियाय नमः' का जप भी लाभकारी है.
संतोषी माता के व्रत में इन चीजों से रहें दूर - अगर आप मां संतोषी का व्रत रखते हैं, तो खट्टी चीजों का सेवन ना करें. हालांकि, दिन में एक बार मीठे के साथ किसी एक अनाज का सेवन कर सकते हैं, जैसे खीर-पूरी. व्रत के दिन तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा) का सेवन घर के किसी सदस्य को भी नहीं करना चाहिए और साथ ही गरीबों को भोजन, वस्त्र आदि का दान करना चाहिए. माना जाता है कि ऐसा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (05 दिसंबर 2025)
5 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- कुटुम्ब में तनाव, क्लेश व अशांति, व्यर्थ धन का व्यय तथा पीड़ा धन की हानि होगी।
वृष राशि :- इष्ट मित्रों से सुख, अधिकारियों से मेल मिलाप तथा लाभप्रद बना रहेगा तथा कार्य अवरोध होगा।
मिथुन राशि :- कार्य व्यवस्था अनुकूल हो, सफलता के साधन जुटाए तथा रुके कार्य अवश्य ही बन जाएगे।
कर्क राशि :- मनोवत्ति, उदर विकार तथा मनोवांछित कार्य संपन्न हो, क्लेश व हानि संभावित होवे, ध्यान दें।
सिंह राशि :- समय नष्ट न होवे, व्यवसायिक क्षमता अवश्य अनुकूल बनेगी, कार्यवृद्धि के योग है।
कन्या राशि : आर्थिक योजना सफल होगी, व्यावसायिक क्षमता अवश्य अनुकूल बनेगी, कार्य वृद्धि के योग है।
तुला राशि :- धन का व्यय, व्यर्थ परिश्रम से हानि, मानसिक उद्विघ्नता तथा परेशानी होगी तथा कष्ट होगा।
वृश्चिक राशि :- स्त्री कार्य से क्लेश व हानि, विघटनकारी तत्व आपको परेशान करेंगे, व्यवसाय का ध्यान दें।
धनु राशि :- कुटुम्ब की समस्या सुलझे, धन का व्यय होगा, व्यर्थ भ्रमण अवश्य होवेगा, घरेलू व्यवस्था का ध्यान दे।
मकर राशि :- अर्थ व्यवस्था, छिन्न-भिन्न होगी कार्य, व्यवसाय गति उत्तम समय का उपयोग कर लाभ लें।
कुंभ राशि :- दैनिक कार्य गति में सुधार चिन्ताएं कम होगी तथा सफलता के साधन जुटाए, ध्यान रखेंगे।
मीन राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक होगा तथा कार्यगति अनुकूल अवश्य ही बन जाएगी, ध्यान दें।
इन मंदिरों में नेत्र रोगों से मुक्ति के लिए पहुंचते हैं भक्त
4 Dec, 2025 07:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
देशभर में श्रद्धा और भक्तिभाव से कई प्राचीन और शक्तिपीठ मंदिरों की आराधना की जाती है, लेकिन देश में कुछ मंदिर ऐसे भी हैं, जहां भक्त अपने रोगों से निजात पाने के लिए मां के चरणों में पहुंचते हैं। भक्तों का मानना है कि मां की कृपा से बड़ी से बड़ी बाधा और रोग का नाश हो सकता है।
उत्तराखंड का नैना देवी मंदिर भक्तों के बीच में नेत्र रोगों के लिए प्रसिद्ध है। माना जाता है कि नेत्र विकारों से मुक्ति पाने के लिए नैना मां के द्वार जाना चाहिए। भक्तों का मानना है कि यहां आकर मां की कृपा से आंखों के रोग से मुक्ति मिलती है। नैना देवी एक शक्तिपीठ मंदिर है, जहां मां सती के दोनों नयन गिरे थे, जिसके बाद इस शक्तिपीठ की स्थापना हुई। हालांकि पुराना मंदिर भूस्खलन के समय टूट गया था, लेकिन मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया।
वहीं मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के पहाड़ों में माता निरार वाली विराजमान हैं। ये एक प्राचीन मंदिर है। इनका मंदिर घने जंगलों के बीचों बीच है, लेकिन फिर भी मान्यता में कोई कमी नहीं है। भक्तगण दूर-दूर से अपनी आंखों के रोगों को लेकर मंदिर में आते हैं और ठीक होकर जाते हैं। मान्यता है कि यहां अर्जी लगाने से मां आंखों के रोगों को खत्म करती है। इसके अलावा संतान प्राप्ति और त्वचा संबंधी रोगों के लिए इस मंदिर में अर्जी लगती है।
उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले के मकरंद नगर क्षेत्र में बना माता फूलमती का मंदिर बेहद खास है, क्योंकि माना जाता है कि जिसको भी यहां आंखों के रोग से मुक्ति मिलती है, उसे माता रानी पर चांदी की आंख अर्पित करनी होती है। माता फूलमती की स्थापना राजा जयचंद्र ने की थी और उन्हें उन्हीं की कुलदेवी माना गया है। इस मंदिर में मां की प्रतिमा को जल से स्नान कराया जाता है और इसी जल को नेत्र रोगी भक्त अपनी आंखों पर लगाते हैं।
उत्तर प्रदेश में एक और मंदिर है, जो नेत्र रोगों को सही करने के लिए जाना जाता है। कानपुर में मां कुष्मांडा देवी स्थिति अपनी मान्यताओं की वजह से प्रसिद्ध है। यहां मां पिंडी के रूप में विराजमान है, और जल मां के होकर मंदिर के बाहर जाता है; उस जल को भक्त अपनी आंखों पर लगाते हैं।
राजस्थान का सूलाबावजी मंदिर भी नेत्र रोगों की मुक्ति के लिए जाना जाता है। ये मंदिर मां भवानी का नहीं है, लेकिन इसकी प्रसिद्धि इतनी ज्यादा है कि दूर-दूर से लोग आते हैं। माना जाता है कि मंदिर का पानी पीने से या आंखों पर छिड़कने से भक्त को नेत्र रोगों में आराम मिलता है। ये मंदिर सिंगोली के पास बना है
घर के मंदिर में नहीं होने चाहिये दो शंख
4 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अधिकांश घरों में देवी-देवताओं के लिए एक अलग स्थान होता है। कुछ घरों में छोटे-छोटे मंदिर बनवाए जाते हैं। घर के मंदिर में पूजन करने पर चमत्कारी रूप से शुभ फल प्राप्त होते हैं। वातावरण पवित्र बना रहता है, जिससे महालक्ष्मी सहित सभी दैवीय शक्तियां घर पर अपनी कृपा बनाए रखती हैं। लेकिन हम जानकारी के अभाव में मंदिर में कुछ ऐसी गलतियां कर देते हैं, जो कि अशुभ होती है। आज हम आपको कुछ ऐसी बातें बता रहे हैं, जो कि घर के मंदिरों में नहीं की जानी चाहिए।
घर के मंदिर में सभी श्री गणेश की मूर्तियां तो रखते हैं, लेकिन पूजा घर में कभी भी गणेश जी की 3 प्रतिमाएं नहीं होना चाहिए। कहा जाता है कि ऐसा होने सही नहीं होता है। आप अपने घर के मंदिर में पूजा करने के लिए शंख तो रखते ही होंगे, लेकिन कभी आपके घर में दो शंख तो नहीं है। अगर मंदिर में दो शंख है तो आप उनमे से एक शंख हटा दें।
घर के मंदिर में ज्यादा बडी मूर्तियां नहीं रखनी चाहिए। बताया जाता है कि यदि हम मंदिर में शिवलिंग रखना चाहते हैं तो शिवलिंग हमारे अंगूठे के आकार से बड़ा नहीं होना चाहिए। शिवलिंग बहुत संवेदनशील होता है और इसी वजह से घर के मंदिर में छोटा-सा शिवलिंग रखना शुभ होता है। शास्त्रों के अनुसार खंडित मूर्तियों की पूजा वर्जित है। जो भी मूर्ति खंडित हो जाती है, उसे पूजा के स्थल से हटा देना चाहिए और किसी पवित्र बहती नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए। खंडित मूर्तियों की पूजा अशुभ मानी गई है।
घर के मंदिर में ज्यादा बडी मूर्तियां नहीं रखनी चाहिए। बताया जाता है कि यदि हम मंदिर में शिवलिंग रखना चाहते हैं तो शिवलिंग हमारे अंगूठे के आकार से बड़ा नहीं होना चाहिए। शिवलिंग बहुत संवेदनशील होता है और इसी वजह से घर के मंदिर में छोटा-सा शिवलिंग रखना शुभ होता है। शास्त्रों के अनुसार खंडित मूर्तियों की पूजा वर्जित है। जो भी मूर्ति खंडित हो जाती है, उसे पूजा के स्थल से हटा देना चाहिए और किसी पवित्र बहती नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए। खंडित मूर्तियों की पूजा अशुभ मानी गई है।
तुलसी पूजन और गो सेवा से रहेंगे रोग दूर
4 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, बहुत सारे ऐसे उपाय बताए गए हैं, जिन्हें अपनाकर व्यक्ति सरल एवं सुलभ जीवन व्यतित कर सकता है। उन्हीं में से तुलसी पूजन और गो सेवा दो ऐसे शुभ कर्म हैं, जिस घर में प्रतिदिन होते हैं, वहां का द्वार रोग कभी नहीं खटखटाते और मिलते हैं ढेरों लाभ।
‘स्कंद पुराण’ के अनुसार जिस घर में तुलसी का बगीचा होता है (एवं प्रतिदिन पूजन होता है), उसमें यमदूत प्रवेश नहीं करते।’
‘पद्म पुराण’ में आता है कि ‘कलियुग में तुलसी का पूजन, कीर्तन, ध्यान, रोपण और धारण करने से वह पाप को जलाती है और स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करती है।’
‘पद्म पुराण’ के उत्तर खंड में आता है कि कैसा भी पापी, अपराधी व्यक्ति हो, तुलसी की सूखी लकडिय़ां उसके शव के ऊपर, पेट पर, मुंह पर थोड़ी-सी बिछा दें और तुलसी की लकड़ी से अग्नि शुरू करें तो उसकी दुर्गति से रक्षा होती है। यमदूत उसे नहीं ले जा सकते।
‘गरुड़ पुराण’ (धर्म कांड-प्रेत कल्प : 38.99) में आता है कि ‘तुलसी का पौधा लगाने, पालन करने, सींचने तथा ध्यान, स्पर्श और गुणगान करने से मनुष्यों के पूर्व जन्मार्जित पाप जल कर विनष्ट हो जाते हैं।’
‘मृत्यु के समय जो तुलसी-पत्ते सहित जल का पान करता है वह सपूर्ण पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक में जाता है।’ (ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खंड : 21.43)
‘जो दारिद्रय मिटाना व सुख-सपदा पाना चाहता है उसे शुद्ध भाव व भक्ति से तुलसी के पौधे की 108 परिक्रमा करनी चाहिए।’
ईशान कोण में तुलसी का पौधा लगाने से बरकत होती है।
हृदय रेखा छोटी है तो विवाह संबंधों में हो सकता है विच्छेाद
4 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
विवाह के लिए वर-वधू का योग देखने में हस्तसरेखा का बहुत बड़ा योगदान होता है। किसी भी विवाह का भविष्यं वर और कन्यास की हथेली पर उपस्थित विभिन्ना रेखाओं, पर्वतों और चिह्नों की स्थिति पर निर्भर करता है। कुछ ऐसी रेखाओं के बारे में जान लें जो विवाह के मामले में अच्छी साबित नहीं होतीं।
हृदय रेखा
यदि आपकी हृदय रेखा छोटी या फिर हल्कीे है तो आपके लिए वैवाहिक संयोग अच्छें नहीं हैं। ऐसे में विवाह होने के बाद भी आपके संबंधों में विच्छेंद हो सकता है।
मंगल पर्वत
यदि आपका मंगल पर्वत जरूरत से ज्याहदा विकसित हो या फिर मंगल पर दोषपूर्ण चिह्न हो तो ऐसे में विवाह करना आपके लिए सही नहीं होगा।
शुक्र पर्वत हों कम विकसित
शुक्र पर्वत कम विकसित होने पर वैवाहिक जीवन में शारीरिक संतुष्टि नहीं प्राप्तण होती। चंद्र पर्वत और बृहस्पवति के कम विकसित होने पर भी ऐसा ही होता है।
हृदय रेखा पर काले चिह्न अशुभ
यदि आपकी हृदय रेखा पर किसी प्रकार के काले चिह्न शुभ नहीं है। मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा में जरूरत से ज्याकदा दूरी होना सही नहीं है। हाथ का निचला क्षेत्र अत्य धिक विकसित होना अच्छा् नहीं माना जाता। ये सभी बातें विवाह पश्चा्त शारीरिक अनुकूलता के लिए सही नहीं है। ये सभी विकार असंतुष्ट यौन संबंधों को दर्शाते हैं।
संतान सुख नहीं मिल पाता इनको
अगर आपकी हृदय रेखा छोटी है और शुक्र व गुरु पर्वत के उभार भी कम हैं। विवाह रेखा के ऊपर क्रॉस है। जिस स्था न पर मस्तिष्क। रेखा बुध रेखा को काटती है, अगर वहां तारा है तो यह शुभ नहीं है।
ऐसे में हो सकता है तलाक भी
विवाह रेखा अंत में दो भागों में बंट रही हो। शुक्र पर्वत पर जाल या फिर एक-दूसरे को काटती हुई रेखाएं हो तो ये शारीरिक अक्षमता को दर्शाता है। विवाह रेखा को कोई रेखा काटे तो तलाक की आशंका बढ़ जाती है।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (04 दिसंबर 2025)
4 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- कार्य कुशलता से संतोष तथा स्त्री शरीर कष्ट, कुछ बाधाएं मन चितिंत रहेगा, कार्य संतोष होगा।
वृष राशि :- मान प्रतिष्ठा, प्रभुत्व वृद्धि तथा कार्य कुशलता से संतोष होगा तथा रुके कार्य धीरे-धीरे बन जाएगे।
मिथुन राशि :- क्रोध से अशांति तथा झगड़े से बचे, क्रोध करने से कार्य अवरोध होगा तथा हानियां हो सकती है।
कर्क राशि :- कार्य व्यवसाय में सुधार हो, अर्थलाभ कार्यकुशलता से संतोष होगा, कार्य के साथ समय का ध्यान रखे।
सिंह राशि :- व्यवहारिक गति अनुकूल, तनाव, क्लेश व अशांति तथा व्यर्थ धन का व्यय होगा, ध्यान रखे।
कन्या राशि : योजनाएं फलीभूत हो अधिकारियों के तनाव से बचे, सतर्क रहकर कार्य करें, समय का ध्यान रखे।
तुला राशि :- विशेष कार्य स्थिगित रखे, लेन देन के मामलें में हानि होगी, सर्तकता से कार्य करें, अवरोध होगा।
वृश्चिक राशि :- विशेष कार्य स्थिगित रखे, लेन देन के मामलें में हानि होगी, कुटुम्ब की चिन्ता, विशेष रुप से रहेगी।
धनु राशि :- मानसिक बेचैनी, उद्विघ्नता एवं असमर्थता का वातावरण बना ही रहेगा, समय का ध्यान रखकर कार्य करें।
मकर राशि :- क्रोध व अशांति से बचिए, मानसिक विभ्रम तथा व्यवस्था नष्ट हो सकती है, विरोध से बचे।
कुंभ राशि :- नवीन योजनाएं फलप्रद हो, कार्य कुशलता से संतोष होगा, किन्तु कार्यगति में अवरोध होगा।
मीन राशि :- इष्ट मित्र से तनाव, क्लेश व अशांति से बचिएगा, मनोबल की कमी, कार्य में ध्यान दें।
सृष्टि के आरंभ में यह थी पहली ध्वनि, फिर बन गया संपूर्ण ब्रह्मांड और त्रिदेव का रहस्य
3 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ॐ एक बहुत ही विशेष मंत्र है, जिसे ब्रह्मांड की पहली ध्वनि माना जाता है. इसे तीन भागों (अ, उ और म) में बांटा गया है. ‘अ’ सृजन और व्यापकता का प्रतीक है, ‘उ’ बुद्धि और संचालन का और ‘म’ अनंतता और स्थिरता का. इन तीनों का मतलब मिलाकर यही होता है कि ‘ॐ’ में परम सत्ता का पूरा स्वरूप समाया हुआ है. यही कारण है कि इसे सभी मंत्रों का बीज मंत्र कहा जाता है. ॐ शब्द हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों में गहरा महत्व है. ॐ त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश), तीन गुणों (सत्व, रज, तम) और सत-चित-आनंद का भी प्रतिनिधित्व करता है. आइए जानते हैं ॐ का महत्व…
सृष्टि के आरंभ की पहली ध्वनि
पुराणों में भी बताया गया है कि सृष्टि के आरंभ में जब पहली ध्वनि गूंजी, वह ॐ थी. यह ध्वनि किसी टकराव से नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की अपनी ऊर्जा से उत्पन्न हुई थी. ध्यान की गहन अवस्था में साधक आज भी इसे सुनते हैं और इसे परम शांति का स्रोत मानते हैं.
ॐ मंत्र का महत्व
ॐ का जप मन और शरीर दोनों को शांत करता है. इससे साधक को आत्मा और परमात्मा के करीब जाने का अनुभव होता है. साधना में स्थिरता आती है, मौन और अंतरात्मा की जागृति बढ़ती है. यही कारण है कि हर मंत्र की शुरुआत ॐ से होती है, जैसे ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय.’
वैज्ञानिक दृष्टि से ॐ का महत्व
वैज्ञानिक दृष्टि से भी ॐ का उच्चारण शरीर में कंपन पैदा करता है. जीभ, तालू, कंठ, फेफड़े और नाभि में यह कंपन ग्रंथियों और चक्रों को सक्रिय करते हैं. इसके नियमित जप से तनाव और घबराहट दूर होती है, पाचन और रक्त संचार सुधरता है, शरीर में ऊर्जा लौटती है और नींद भी अच्छी आती है. कुछ प्राणायाम के साथ करने पर फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है और थकान कम होती है.
वास्तु के हिसाब से ॐ का महत्व
वास्तु के हिसाब से भी ॐ का जप घर में सकारात्मक ऊर्जा लाता है. वातावरण शांत होता है और मानसिक तनाव कम होता है. सकारात्मक शब्दों से हार्मोन बनते हैं और नकारात्मक शब्दों से विषैले रसायन. इसलिए ॐ की लय मन और हृदय पर अमृत की तरह असर करती है.
स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए ॐ का जप
अधिकतर लोग 108 बार ॐ का जप करते हैं. ऐसा करने से शरीर तनावमुक्त होता है, ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है, मनोबल मजबूत होता है और व्यवहार में धैर्य आता है. बच्चों की पढ़ाई और स्मरण शक्ति पर भी इसका अच्छा असर होता है. जप की सही विधि यह है कि प्रातः स्नान के बाद शांत जगह पर पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन या वज्रासन में बैठें. ‘ओ’ को लंबा खींचें और अंत में ‘म्’ हल्की गूंज की तरह करें. जप माला का उपयोग भी किया जा सकता है.
भूलकर भी न करें ऐसा हस्ताक्षर, धीरे-धीरे कर देगा कंगाल, पैतृक संपत्ति का हो जाएगा सर्वनाश!
3 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सिग्नेचर एस्ट्रोलॉजी की दुनिया काफी रोचक और रहस्यमयी होती है. इसे आप ऐसे समक्ष सकते है कि हर व्यक्ति का हस्ताक्षर अलग होता है, उस व्यक्ति के हस्ताक्षर की बनावट, शब्दों के उपयोग, लाइन, डॉट्स आदि में कई शुभ और अशुभ संकेत छिपे होते हैं, जिससे वह व्यक्ति स्वयं भी अनजान रहता है. लेकिन सिग्नेचर एस्ट्रोलॉजी की मदद से उस व्यक्ति के भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है कि वह उन्नति करेगा या कंगाल होगा. आज सिग्नेचर एस्ट्रोलॉजी में हम बात करने वाले हैं, ऐसे हस्ताक्षर के बारे में, जो व्यक्ति को धीरे-धीरे कंगाल कर सकता है क्योंकि उसे लगातार धन हानि होती है. ऐसा हस्ताक्षर उसके पैतृक संपत्ति को बर्बाद कर देता है. आइए जानते हैं कंगाल करने वाले हस्ताक्षर के बारे में.
कंगाल करने वाला हस्ताक्षर
सिग्नेचर एस्ट्रोलॉजी विशेषज्ञ विवेक त्रिपाठी के अनुसार जो लोग अपने हस्ताक्षर में गौमूत्रीय रेखा बनाते हैं, उन लोगों का पतन धीरे-धीरे होता है, उनकी पैतृक संपत्ति का सर्वनाश हो जाता है. ऐसे लोगों को अपने पिता से जो भी संपत्ति प्राप्त होती है, वह खत्म हो जाती है. वह आदमी अपनी पूरी पैतृक संपत्ति को बेच देता है, कर्ज में डूब जाता है. वह व्यक्ति अपने पिता की विरासत को नष्ट कर देता है.
इतना ही नहीं, ऐसे हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति पैतृक संपत्ति का नाश तो करते ही हैं, वे अपनी अर्जित संपत्ति को भी खत्म कर देते हैं, उनका जीवन कंगाली में व्यतीत होता है. उनका बैंक बैलेंस खत्म हो जाता है. हस्ताक्षर में आने वाली गौमूत्रीय रेखा बहुत ही हानिकारक और अशुभ फलदायी होती है. यह माउंटेन वेव या सी वेव से बिल्कुल अलग होती है.
हस्ताक्षर में गौमूत्रीय रेखा
कंगाल करने वाले सिग्नेचर में गौमूत्रीय रेखा काफी लहरदार होती है. जब कोई व्यक्ति अपना हस्ताक्षर करता है तो वह प्रारंभ या अंत वाले अक्षर से जोड़कर एक लहरदार रेखा बनाता है. यह लहरदार रेखा ही गौमूत्रीय रेखा कहलाती है. हालांकि गौमूत्रीय रेखा और माउंटेन वेव या सी वेव में अंतर करना काफी जटिल होता है, आम व्यक्ति के समझ से परे है. सिग्नेचर एस्ट्रोलॉजी के विशेषज्ञ ही उसे पहचान कर सही से विश्लेषण करते हैं.
हस्ताक्षर में माउंटेन वेव और सी वेव से लोगों को काफी लाभ होता है, लेकिन गौमूत्रीय रेखा हानि के सिवाय कुछ नहीं देती है. गौमूत्रीय रेखा व्यक्ति को पतन की ओर लेकर जाती है. गौमूत्रीय रेखा की लहरें आपके जीवन में उथल-पुथल मचा देती हैं. लोग गौमूत्रीय रेखा हस्ताक्षर के पहले अक्षर, अंतिम अक्षर, हस्ताक्षर के नीचे या ऊपर बनाते हैं. कई बार गौमूत्रीय रेखा हस्ताक्षर के बीच में ही बन जाती है.
तिरुपति बालाजी मंदिर के 5 बड़े रहस्य, भगवान को क्यों पहनाते हैं साड़ी और धोती?
3 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
देश के हर कोने में बने मंदिर खुद में कई रहस्य समेटे हुए हैं, लेकिन तिरुमाला का तिरुपति बालाजी मंदिर अपने आप में अनोखा मंदिर है. यह मंदिर भक्तों के लिए आस्था का केंद्र तो है ही, लेकिन साथ ही ये मंदिर कई रहस्यों को खुद में छिपाए हुए हैं. आज हम आपको तिरुपति बालाजी मंदिर से जुड़े अनसुने रहस्यों के बारे में बताएंगे.
दही-चावल का भोग
आंध्र प्रदेश के तिरुमाला में तिरुपति बालाजी मंदिर स्थित है. यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार श्रीवेंकटेश्वर स्वामी को समर्पित है. भक्तों का मानना है कि कलयुग में यहीं भगवान का निजी निवास है, इसलिए इस मंदिर में मांगी गई हर मन्नत भगवान पूरी करते हैं. तिरुपति बालाजी मंदिर का लड्डू प्रसाद के रूप में बहुत प्रसिद्ध है और लोग दूर-दूर से मंदिर में चढ़ने वाले प्रसाद को ग्रहण करने के लिए आते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि लड्डू के अलावा भगवान तिरुपति बालाजी को दही-चावल खिलाने की परंपरा है? सबसे पहले उन्हें दही-चावल का भोग लगता है. दही-चावल का भोग लगाने की प्रथा एक भक्त की भक्ति के बाद से शुरू की गई थी.
तिरुपति बालाजी मंदिर में बाल चढ़ाने की परंपरा है. माना जाता है कि भगवान विष्णु ने कुबेर से ऋण लिया था और वादा किया था कि जब तक कलयुग खत्म होगा, तब तक सारा ऋण चुका दिया जाएगा. उसी ऋण को चुकाने के लिए भक्त मनोकामना पूरी होने पर बालों का दान करते हैं. बाल का दान ऋण की किस्त के तौर पर देखा जाता है. इस प्रथा को लेकर कई किंवदंतियां भी प्रचलित हैं.
बालाजी को पहनाते हैं धोती और साड़ी
तिरुपति बालाजी मंदिर की प्रतिमा बहुत खास है. माना जाता है कि प्रतिमा के पीछे हमेशा समुद्र की लहरों की आवाज आती है. जिन लोगों ने भी प्रतिमा के पीछे कान लगाकर सुना है, उन्हें समुद्र की लहरों की आवाज सुनाई दी है. इसके अलावा, प्रतिमा को मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु का रूप माना जाता है, इसलिए बालाजी को स्त्री और पुरुष दोनों के वस्त्र पहनाने की परंपरा रही है.
प्रतिमा पर असली बाल
तिरुपति बालाजी मंदिर की प्रतिमा पर असली बाल लगे हैं. माना जाता है कि प्रतिमा पर लगे बाल कभी भी उलझते नहीं हैं और हमेशा काले और चमकदार रहते हैं.
गर्मियों में भगवान को आता है पसीना
बालों के अलावा श्री वेंकटेश्वर स्वामी की प्रतिमा को गर्मियों में पसीना आते हुए भी देखा गया है. तिरुपति बालाजी मंदिर में हमेशा एक दीया जलता रहता है. माना जाता है कि दीए में कोई भी तेल या घी नहीं डालता, लेकिन फिर भी दीया लगातार जलता रहता है. ये दीया सभी के लिए रहस्य बना हुआ था.
शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव पर ये चीजें चढाने से दूर होती हैं परेशानियां, जान लें कैसे करें उपाय
3 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भगवान शिव को हिंदू धर्म में संहारक और कल्याणकारी देवता माना जाता है. शास्त्रों में बताया गया है कि शिवलिंग पर विभिन्न वस्तुएं चढ़ाने से जीवन की कई समस्याएं दूर होती हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं. आइए जानें कौन सी चीज चढ़ाने से कौन सी परेशानी दूर होती है.
1. जल अर्पित करने का महत्व
क्यों करें?
जल अर्पित करना सबसे सरल और महत्वपूर्ण पूजा है.
लाभ:
मानसिक शांति मिलती है, तनाव कम होता है और जीवन में सकारात्मकता आती है.
शास्त्रों में उल्लेख:
जल अर्पण से पापों का नाश होता है और मन निर्मल होता है.
2. दूध चढ़ाने से क्या होता है?
लाभ:
शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि आती है.
किसके लिए:
व्यापार में रुकावट या धन की कमी से परेशान लोग इसे जरूर करें.
3. बेलपत्र का महत्व
क्यों खास है?
बेलपत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है.
लाभ:
बेलपत्र चढ़ाने से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां दूर होती हैं और लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है.
शास्त्रों में मान्यता:
बेलपत्र अर्पण करने से पितृ दोष भी शांत होता है.
4. धतूरा और भांग
लाभ:
शिवलिंग पर धतूरा और भांग चढ़ाने से शत्रु बाधा और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है.
किसके लिए:
जिन लोगों को जीवन में बाधाएं और विरोध का सामना करना पड़ रहा है, उनके लिए यह उपाय लाभकारी है.
5. शहद और गन्ने का रस
लाभ:
शहद चढ़ाने से वाणी मधुर होती है और रिश्तों में मिठास आती है.
गन्ने का रस अर्पित करने से मानसिक तनाव और क्रोध कम होता है.
6. चावल और फल
लाभ:
चावल चढ़ाने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति आती है.
ताजे फल अर्पित करने से संतान सुख और परिवार में खुशहाली बनी रहती है.
7. रुद्राभिषेक का महत्व
क्यों करें?
रुद्राभिषेक में जल, दूध, दही, घी, शहद और बेलपत्र से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है.
लाभ:
यह सभी प्रकार की परेशानियों को दूर करता है और जीवन में सुख-समृद्धि लाता है.
शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव पर अर्पित की जाने वाली वस्तुओं का गहरा महत्व है. हर वस्तु का अपना अलग प्रभाव होता है, जो जीवन की समस्याओं को दूर करने में मदद करता है. श्रद्धा और विश्वास के साथ इन उपायों को करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में शांति आती है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (03 दिसंबर 2025)
3 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- सामाजिक कार्यो में प्रतिष्ठा प्रभुत्व, वृद्धि कार्य कुशलता से संतोष होगा, ध्यान दें।
वृष राशि :- वृथा थकावट बैचेनी मानसिक विभ्रम धन का व्यय भ्रमणशीलता होगी, कार्य पूर्ण होगें।
मिथुन राशि :- विशेष कार्य स्थिगित रखें, सामाजिक कार्यो में प्रभुत्व वृद्धि के कार्य बन जाएंगे।
कर्क राशि :- इष्ट मित्रों से सुख एश्वर्य तथा भोग विलास में समय बीतेगा, सुख समृद्धि के योग बनेंगे।
सिंह राशि :- सामाजिक कार्य में समय व्यतीत होगा, समय पर सोचे हुए कार्य पूर्ण अवश्य होंगे।
कन्या राशि : दूसरों के कार्यो में समय शक्ति नष्ट न करें, व्यावसायिक क्षमता में बाधा ही होगी।
तुला राशि :- अनायास विभ्रम मानसिक बैचेनी बनेगी तथा स्वभाव नरम-गरम बना ही रहेगा।
वृश्चिक राशि :- धन लाभ आशानुकूल समय व सफलता का हर्ष होगा, कार्य में संतोष होगा।
धनु राशि :- तनाव क्लेश व अशांति मानसिक उद्विघ्नता होगी रूके कार्य बन जाएंगे।
मकर राशि :- योजनाएं फलीभूत हो, मित्रों से परेशानी तथा चिंता बनेगी तथा मानसिक परेशानी होगी।
कुंभ राशि :- इष्टमित्र सुख वर्धक होगें, व्यवसायिक गति अनुकूल कार्मिक चिंता अवश्य बनेंगी।
मीन राशि :- किसी अपने का कार्य बनने से संतोष होंवें, दैनिक कार्यगति की अनुकूलता बनी रहेगी।
समंदर के पास मीठे पानी का रहस्यमयी कुआं, मां सीता से खास कनेक्शन, वैज्ञानिक भी करते हैं नमस्कार
2 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
धर्म और आस्था के केंद्र हमारे देश में कई प्राचीन, सिद्धपीठ और महाशक्ति पीठ मंदिर हैं, जहां भक्त अपनी श्रद्धानुसार जाते हैं. देश में मंदिर के साथ ही कुछ रहस्यमी चमत्कारी कुएं भी मौजूद हैं. कुछ कुओं को लेकर मान्यता है कि वे बड़ी से बड़ी बीमारी को ठीक करने की क्षमता रखते हैं, लेकिन तमिलनाडु के रामेश्वरम में ऐसा कुआं मौजूद है, जहां आज भी माता सीता के होने के प्रमाण मिलते हैं. यह कुआं 64 पवित्र कुओं में से एक माना जाता है और इस कुंआ के दर्शन करने मात्र से सभी इच्छाएं भी पूरी हो जाती है. गहरे समुद्र के पास एक मीठा कुआं होना किसी चमत्कार से कम नहीं है इसलिए भारत को चमत्कार का देश कहा जाता है. आइए जानते हैं इस खास कुंआ के बारे में…
श्रीराम ने बाण के प्रहार से बनाया पानी का झरना
तमिलनाडु के रामेश्वरम में विल्लुण्डी तीर्थम नाम का स्थल है, जहां भगवान श्रीराम और माता सीता का आगमन हुआ था. माना जाता है कि भगवान श्रीराम जब माता सीता को रावण की कैद से मुक्त करके वापस अयोध्या आ रहे थे, तब इसी स्थान पर माता सीता को प्यास लगी थी और भगवान श्रीराम ने बाण के प्रहार से पानी का झरना बनाया था. खास बात ये है कि ये स्त्रोत मीठे पानी का है और इसके पास खारे पानी का समंदर है. कोई नहीं जानता है कि समंदर के पास कुएं में मीठा पानी कहां से आया. भक्तों का मानना है कि ये भगवान श्रीराम का चमत्कार है और इस मीठे जल से शारीरिक रोगों का नाश होता है. भक्त कुएं का जल अपने साथ भी लेकर जाते हैं.
64 पवित्र कुओं में से एक
इस स्थान को विल्लुण्डी तीर्थम इसलिए कहा गया क्योंकि तमिल भाषा में बाण से बने छेद को विल्लुण्डी कहते हैं और तीर्थम का अर्थ है पवित्र स्थान. यह कुआं इसलिए भी खास है क्योंकि ये रामेश्वरम के 64 पवित्र कुओं में से एक है. कुएं से पहले भगवान शिव का प्राचीन मंदिर त्रयम्बकेश्वर भी है. भगवान शिव छोटे से मंदिर में शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं. कुएं के दर्शन करने से पहले भक्त भगवान शिव की अराधना करते हैं.
त्रयम्बकेश्वर मंदिर की स्थापना
माना जाता है कि त्रयम्बकेश्वर मंदिर की स्थापना भी माता सीता और भगवान श्रीराम ने मिलकर की थी. भक्त जोड़े में त्रयम्बकेश्वर महादेव की पूजा करने के लिए आते हैं. विल्लुंडी तीर्थम के पास कई और तीर्थ स्थल मौजूद हैं, जिनके दर्शन किए जा सकते हैं. मंदिर से कुछ किलोमीटर दूर ही पंचमुखी हनुमानजी, अग्नि तीर्थम, धनुषकोडी और अरुलमिगु रामनाथस्वामी मंदिर भी मौजूद हैं. ये सभी मंदिर रामेश्वरम के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक हैं.”
काला जादू से मुक्ति के लिए मां भवानी के इस मंदिर आते हैं भक्त, प्रसाद में चढ़ता है नमक, खास अनुष्ठान से पूरी होती है मनोकामना
2 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
देश भर में मां भगवती के अलग-अलग रूपों के शक्तिपीठ और सिद्धपीठ स्थित हैं, जो अपनी अलग-अलग मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध हैं. कर्नाटक के रामनगर जिले में मां भगवती का ऐसा मंदिर मौजूद है, जहां बुरी नजर और टोने-टोटके से बचने के लिए भक्त भारत के हर कोने से आते हैं. मां चामुंडेश्वरी का यह मंदिर कई रहस्यों से भरा है. मान्यता है कि इस मंदिर में दर्शन करने मात्र से ही भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं और हर चिंता व परेशानी से मुक्ति मिलती है. यहां मन्नत मांगने के लिए खास चमत्कारी पत्थर का इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही यहां माता रानी के साथ नंदी महाराज भी विराजमान हैं. आइए जानते हैं मां भगवती के इस चमत्कारी मंदिर के बारे में…
पंच धातुओं की बनी है मूर्ति
कर्नाटक के रामनगर जिले के चन्नापटना तालुक के गौडगेरे गांव में देवी चामुंडेश्वरी को समर्पित मां गौडगेरे चामुंडेश्वरी मंदिर है. मंदिर में अचंभित कर देने वाले कई रहस्य हैं. मंदिर के प्रवेश द्वार पर देवी चामुंडेश्वरी की 60 फुट ऊंची पंच धातुओं की मूर्ति बनी है, जिसमें मां की 18 भुजाएं हैं और सभी में अस्त्र-शस्त्र मौजूद हैं. यह प्रतिमा भक्तों के बीच आकर्षण का बड़ा केंद्र है, लेकिन असली रहस्य मूल मंदिर के गर्भगृह में छिपा है, जहां मां की प्राचीन प्रतिमा विराजमान है.
बुरी नजर से बचने के लिए करते हैं यह काम
माना जाता है कि अगर किसी पर काला जादू-टोना हुआ है या बुरी नजर से परेशान है, तो मंदिर में मां चामुंडेश्वरी के सामने नमक चढ़ाने से सारी बला दूर हो जाती है. भक्त मंदिर के परिसर में मां के नाम से प्रसाद स्वरूप नमक चढ़ाते हैं. इतना ही नहीं, खास मनोकामना को पूरा कराने के लिए मंदिर में भेंट स्वरूप नारियल भी बांधा जाता है और कर्ज से मुक्ति के लिए एक चमत्कारी पत्थर पर सिक्का भी चिपकाया जाता है. कर्ज मुक्ति के लिए भक्त मंदिर में आकर अनुष्ठान भी कराते हैं.
मंदिर में नंदी महाराज भी
मंदिर में एक नंदी महाराज भी रहते हैं. माना जाता है कि जिस किसी को भी नंदी महाराज का आशीर्वाद मिलता है, उसके सारे दुख दूर हो जाते हैं. भक्त नंदी महाराज के पैरों में लेटकर आशीर्वाद लेते हैं. माना जाता है कि मां के दर्शन के बाद नंदी महाराज के दर्शन करना जरूरी है. नंदी महाराज मंदिर में गर्भगृह में आकर पहले मां चामुंडेश्वरी का आशीर्वाद लेते हैं और फिर भक्तों को दर्शन देते हैं. नंदी महाराज के साथ हमेशा एक शख्स रहता है, जो उन्हें नोटों से सजाता है. मंदिर को लेकर पौराणिक कथा भी प्रचलित है. माना जाता है कि वर्षों पहले एक किसान को अपने खेत में मां चामुंडेश्वरी की स्वयंभू प्रतिमा मिली थी. किसान को मां ने स्वप्न में दर्शन देकर मंदिर बनाने का आदेश दिया था.
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