धर्म एवं ज्योतिष
यहां दो स्वरूपों में विराजमान हैं भगवान विष्णु के उग्र रूप, जानें क्यों साल भर लगा रहता है चंदन का लेप?
12 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भगवान विष्णु ने समय-समय पर पृथ्वी को बचाने और राक्षसों का संहार करने के लिए अलग-अलग अवतार लिए हैं. आइए भगवान विष्णु के वराह और नरसिंह अवतार के बारे में जानते हैं. दोनों रूपों में भगवान विष्णु के अलग-अलग मंदिर भारत के अलग-अलग कोनों में मौजूद हैं, लेकिन विशाखापत्तनम में एक ऐसा मंदिर है, जहां भगवान विष्णु के संयुक्त रूप की पूजा होती है. यहां भगवान विष्णु के उग्र स्वरूप की पूजा अर्चना की जाती है और इस उग्र स्वरूप को शांत रखने के लिए प्रतीमा पर चंदन का लेप लगाया जाता है. मान्यता है कि इस मंदिर में दर्शन करने मात्र से सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं और सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. आइए जानते हैं भगवान विष्णु के इस मंदिर के बारे में…
वराह और नरसिंह अवतार की संयुक्त रूप से पूजा
श्री वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में सिम्हाचलम पहाड़ी पर समुद्र तल से 800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है, जिनके यहां वराह और नरसिंह अवतार की संयुक्त रूप से पूजा की जाती है. मंदिर में प्रतिमा को साल भर चंदन के लेप से ढका जाता है और सिर्फ अक्षय तृतीया के दिन ही उनका पूरा रूप देखने को मिलता है.
प्रतिमा पर लगाया जाता है चंदन का लेप
साल के बाकी दिन चंदन के लेप से ढके होने की वजह से प्रतिमा शिवलिंग के समान दिखती है. भगवान के बिना चंदन के रूप को ‘निजरूप दर्शन’ कहा जाता है, जिसके दर्शन साल में सिर्फ एक बार हो पाते हैं. प्रतिमा को चंदन के लेप से इसलिए ढका जाता है, क्योंकि भगवान का वराह और नरसिंह अवतार उग्र और भयंकर ऊर्जा से भरा है. उनकी ऊर्जा को संतुलित करने के लिए प्रतिमा पर रोजाना चंदन का लेप लगाया जाता है, जिससे भगवान को शीतलता मिले और वे शांत रूप में भक्तों को दर्शन दे सकें. प्रतिमा पर चंदन लगाने की प्रथा काफी सालों से चली आ रही है.
दोनों ही रूपों की अलग-अलग पौराणिक कथा
भगवान विष्णु के इन दोनों ही रूपों की अलग-अलग पौराणिक कथा मौजूद हैं. भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए नरसिम्हा का अवतार लेकर राक्षस हिरण्यकशिपु का वध किया था, जबकि वराह अवतार लेकर भगवान विष्णु ने राक्षस हिरण्याक्ष को मारा था और मां पृथ्वी को बचाया था.
11वीं सदी में करवाया था मंदिर का निर्माण
मंदिर के निर्माण को लेकर कई तरह की बातें की जाती हैं. माना जाता है कि 11वीं सदी में राजा श्री कृष्णदेवराय ने मंदिर का निर्माण करवाया था, लेकिन मंदिर के इतिहास में 13वीं सदी में पूर्वी गंग वंश के नरसिंह प्रथम का योगदान भी देखने को मिलता है. मंदिर की नक्काशी और गोपुरम दोनों सदी की शैली को दिखाते हैं. बढ़ते समय के साथ मंदिर अलग-अलग राज्यों के संरक्षण में रहा और धीरे-धीरे मंदिर का निर्माण बढ़ता गया.
मंदिर पर्यटन की दृष्टि से खास
मंदिर में जयस्तंभ भी स्थापित है, जिसे कलिंग के राजा कृष्णदेवराय ने युद्ध के दौरान बनवाया था. मंदिर आध्यात्मिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक शैली और अलग-अलग युगों के संरक्षण का प्रमाण देता है. यह मंदिर पर्यटन की दृष्टि से भी खास है. भक्त भगवान के अद्भुत दो रूपों को देखने के लिए आते हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (12 दिसंबर 2025)
12 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- व्यय बाधा, स्वभाव में उद्विघ्नता तथा दुख, कष्ट अवश्य ही होगा, समय का ध्यान अवश्य रखे।
वृष राशि :- किसी आरोप से बचे, कार्यगति मंद रहेगी, क्लेश व अशांति अवश्य बन जाएगी, ध्यान दें।
मिथुन राशि :- योजनाएं पूर्ण होगी, धन लाभ होगा, आशानुकूल सफलता का हर्ष अवश्य ही होगा, ध्यान दें।
कर्क राशि :- इष्ट मित्र सुख वर्धक होगे, कार्यगति में सुधार होवे, विचारे हुए कार्य अवश्य ही बनेंगे।
सिंह राशि :- सामर्थ्य और धन अस्त-व्यस्त हो, सतर्कता से कार्य अवश्य ही निपटा लेवे, ध्यान दें।
कन्या राशि :- मनोबल उत्साह वर्धक होगा, कार्य गति में सुधार होवे, घरेलू चिताएं कम होगी।
तुला राशि :- मानप्रतिष्ठा के साधन बने, स्त्रीवर्ग से सुख और शांति अवश्य ही बन जाएगी।
वृश्चिक राशि :- अग्नि चोट आदि का भय होगा, व्यर्थ धन का व्यय होगा, रुके कार्य अवश्य ही बनेंगे।
धनु राशि :- तनाव क्लेश व अशांति, मानसिक विभ्रम उद्वेग तथा मानसिक भय बना ही रहेगा।
मकर राशि :- विवाद ग्रस्त होने से बचिएगा, तनाव क्लेश तथा मानसिक अशांति अवश्य ही होगी।
कुंभ राशि :- धन लाभ, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, इष्ट मित्र सुखवर्धक अवश्य होगे।
मीन राशि :- भोग ऐश्वर्य की प्राप्ति, समय उल्लास में बीतेगा तथा मनोवृत्ति उत्तम बनेगी, ध्यान रखे।
19 दिसंबर को है पौष अमावस्या
11 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पौष अमावस्या हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है, विशेषकर पितरों के तर्पण, स्नान और दान-पुण्य के कार्यों के लिए। इसे साल की आखिरी अमावस्या भी कहा जाता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, पौष माह के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को पौष अमावस्या कहा जाता है। चूंकि अमावस्या का व्रत और मुख्य धार्मिक कार्य उदय तिथि पर किए जाते हैं इसलिए पौष अमावस्या 2025 की मुख्य तिथि 19 दिसंबर 2025, शुक्रवार को रहेगी।
महत्व
यह तिथि पूरी तरह से पितरों को समर्पित होती है। इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है, और वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। पौष मास के स्वामी सूर्य देव हैं। अमावस्या के दिन सूर्य को अर्घ्य देने और उनकी पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है। ज्योतिष में इस तिथि को कालसर्प दोष निवारण के लिए भी अत्यंत शुभ माना गया है।
मान्यता है कि यदि पितर किसी कारणवश रुष्ट हों, तो व्यक्ति के जीवन में कई बाधाएं आती हैं (जिसे पितृ दोष भी कहते हैं)। पौष अमावस्या पर कुछ विशेष कार्य करके आप पितरों को प्रसन्न कर सकते हैं:
स्नान और तर्पण
प्रातः काल पवित्र नदी में स्नान करें। यदि यह संभव न हो, तो नहाने के जल में गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करें। स्नान के पश्चात, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पितरों को जल, काले तिल, सफेद फूल और कुश से तर्पण दें। सूर्य देव को जल में लाल चंदन और लाल फूल डालकर अर्घ्य दें।
दान-पुण्य
अमावस्या पर दान का विशेष महत्व है। अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र, कंबल या काले तिल का दान करें। गरीबों, ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराएं। गर्म कपड़ों का दान करना इस ठंडे महीने में बहुत पुण्यकारी माना जाता है, इससे सूर्य और शनि देव दोनों प्रसन्न होते हैं।
गाय और पक्षियों को भोजन
इस दिन गाय को हरी घास या रोटी खिलाएं। पक्षियों को दाना डालें और छत पर पानी रखें। ऐसा माना जाता है कि इन जीवों को भोजन कराने से पितर तृप्त होते हैं।
सोना धारण करने से होता है गुरु मजबूत
11 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सोना पहनना सभी को पसंद होता है पर इस कीमती धातु को पहनने के भी कई नियम होते हैं। रत्न शास्त्र में बताया गया है कि, सोना धारण करने से गुरु ग्रह को मजबूत किया जा सकता है। जातकों को कुंडली में ग्रहों की स्थिति और राशि के अनुसार रत्न को धारण करना चाहिए। ज्योतिष में सोने को पहनने के लिए कुछ नियम बताए गए हैं, जिन्हें पालन करना काफी जरुरी है। सोने का सही विधि और सही तरीके से धारण करने से लाभ प्राप्त होता है। सोने के धारण से करने से धन-लाभ व संतान सुख की प्राप्ति होती है। आइए आपको बताते हैं सोने को कब और कैसे धारण करना आवश्य होता है। सोने का गुरु से संबंधित होने के कारण सोना को गुरुवार के दिन धारण करना शुभ माना जाता है। इसे पहनने से पहले शुद्ध करना जरुरी है। आप चाहे तो इसे अंगूठी या चेन के रुप में धारण से कर सकते हैं। सोने को शुद्धि करने के लिए आप गंगाजल, दूध और शहद से शुद्ध करें। फिर इसे आप भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित कर दें। विधि-विधान से पूजा करने के बाद अंगूठी और चेन को पहन सकते हैं। माना जाता है कि, रविवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार के दिन सोना धारण करना शुभ होता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सोने का धारण मेष, कर्क, सिंह, धनु और मीन राशि के लोगों को धारण करना चाहिए। वहीं, मकर, मिथुन, कुंभ और वृषभ राशि के जातकों को सोना नहीं पहनना चाहिए। इसके साथ ही कुंडली में गुरु की स्थिति देखकर ही सोना का धारण करना चाहिए।
दान से होता है भाग्योदय
11 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारतीय संस्कृति में दान का इतिहास काफी पुराना है। दान करने से न केवल आत्मसंतुष्टि व किसी जरूरतमंद की आवश्यकता की पूरी होती है, अपितु आपके जीवन से अशुभता भी घटने लगती है। जानिए कैसे दें दान क्या है इसकी विधि व महत्त्व।
सुखमय जीवन व्यतीत करने के लिए हर मनुष्य प्रयत्नशील रहता है। ऐसे में वह व्यवसाय, नौकरी आदि करता है। लेकिन जब इससे भी उसकी आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं हो पाती तो वह अन्य उपायों को अपनाता है। इसका कारण यह है कि सुख-समृद्धि से ही व्यक्ति की पहचान होती है और समाज में मान-सम्मान मिलता है। सुख-समृद्धि प्राप्त करने के लिए दान का विशेष महत्त्व है। दान से जहां दूसरों का हित साधन होता है, वहीं स्वयं का भी भाग्योदय हो जाता है। यदि आप खुशहाल जिंदगी जीने के इच्छुक हैं तो दान करने के निम्नलिखित उपायों को अपना सकते हैं -
शिवरात्रि व्रत वाले दिन लाल धागे में पिरोए पंचमुखी रुद्राक्ष की माला शिव मंदिर में दान करने से शिव जी प्रसन्न होते हैं। इससे व्यक्ति सदैव खुशहाल रहता है।
प्रात:काल स्नान आदि करने के पश्चात् किसी पंडित से मस्तक पर चंदन का तिलक कराएं और कुछ धन दान में देकर अपने काम-धंधे में लगें। इससे भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है और समृद्धि बढ़ती है।
किसी शुभ दिन प्रात:काल बारह अंगुल की पलाश की लकड़ी ले आएं। फिर किसी विद्वान पंडित को बुलाकर उसका शुद्धिकरण कराएं और पूजादि कराकर उसे घर में कहीं ब्राह्मïण के हाथों गड़वा दें। इसके बाद पंडित को मीठा भोजन कराकर एवं कुछ दान-दक्षिणा देकर विदा करें। इसके प्रभाव से घर में सुख-समृद्धि का वातावरण बना रहता है।
यदि घर से निकलते ही मार्ग में कोई सफाई कर्मचारी सफाई करता दिखाई दे जाए, तो उसे कुछ दान-दक्षिणा अवश्य दें। इससे परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती है। अपने भोजन में से कुछ भाग पहले निकाल लें तथा भोजन के पश्चात् उसे गाय, भैंस आदि को दे दें। इस उपाय से भी सुख-समृद्धि बनी रहती है।
एक कटोरी में जल लेकर उसमें गुलाब का पुष्प, कुमकुम एवं थोड़े से चावल डालकर रात को घर में रखें और सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर उसे किसी मंदिर के पुजारी को दान कर आएं। दक्षिणा के रूप में पांच-दस रुपए भी दें। इस क्रिया से घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है।
यदि प्रात:काल दुकान आदि पर जाते समय रास्ते में कोई ब्राह्मïण, भिखारी या हिजड़ा दिखाई दे, तो उसे कुछ दान अवश्य दें। इससे दुकान का कारोबार बढ़ता है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
गुरुवार और शनिवार को गरीबों को कुछ दान करके पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाएं। इससे भी परिवार में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है।
यदि गुरुवार को दुकान आदि में कोई फकीर लोबान की धूनी देने आए तो उसे कुछ दान-दक्षिणा देने से सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।
शनिवार के दिन विधारा की जड़ को कपड़े में सिलकर गले अथवा दाएं बाजू पर बांधें और छोटा सा निर्दोष नीलम रत्न दान करें। शनि के कारण उत्पन्न कष्ट दूर होकर सुख-समृद्धि प्राप्त होगी।
किसी शुभ समय में बछड़े सहित गाय का दान गौशाला में करें। इससे सुख-समृद्धि तथा मान-सम्मान की वृद्धि होती है।
घर में किसी बच्चे के जन्मदिन अथवा किसी अन्य उत्सव पर किसी आश्रम में जाकर कुछ दान करने से व्यक्ति सदैव खुशहाल रहता है।
प्रात:काल एक सूखे नारियल पर काला सूती धागा लपेटकर पूजा स्थान पर रख दें। सायंकाल उसे किसी बर्तन में डालकर धागे सहित जला दें। दूसरे दिन उसकी भस्म एक कागज में रखकर किसी वृक्ष की जड़ में डाल आएं। यह क्रिया नित्य आठ दिन करें। नौवें दिन पानी वाला नारियल लाएं और उस पर कलावा लपेट दें। संध्या समय उस नारियल के साथ थोड़ा सा मिष्ठान और ग्यारह रुपए रखकर किसी ब्राह्मण को दान कर दें। इससे घर में खुशहाली आ जाएगी और सुख-समृद्धि का वातावरण व्याप्त हो जाएगा।
किसी भी दिन सूर्यास्त के समय एक सिला हुआ कुर्ता-पायजामा, एक पानी वाला नारियल, पंचमेल मिठाई, एक कच्चे दूध की थैली तथा एक शहद की शीशी ब्राह्मण को दान कर दें। फिर उसे कुछ रुपए देकर उससे थोड़ा दूध और शहद ले लें। फिर दूध और शहद को मिलाकर उसके छींटे घर में चारों ओर दें तथा पात्र को किसी चौराहे पर रख आएं। इससे ग्रहों का कुप्रभाव नष्ट होकर भौतिक सुखों की प्राप्ति तथा वृद्धि होती है।
नित्य प्रात:काल अपने भोजन में से थोड़ा सा भाग निकालकर कौओं को देने से घर में सुख-शांति बनी रहती है।
सात गोमती चक्र और काली हल्दी को पीले कपड़े में बांधकर किसी धर्म स्थान पर देने से मनुष्य खुशहाल हो जाता है।
रात्रिकाल स्नान आदि करके अपने सामने चौकी पर एक लाल वस्त्र बिछाएं। फिर उस पर पीतल का कलश रखें। कलश पर शुद्ध केसर से स्वस्तिक का चिह्न बनाकर उसमें जल भर दें। इसके पश्चात् उसमें चावल के कुछ दाने, दूर्वा और एक रुपया रख दें। तत्पश्चात् पीतल की छोटी सी प्लेट को चावलों से भरकर कलश के ऊपर रख दें। उसके ऊपर श्रीयंत्र की स्थापना करें। तदनंतर उसके निकट घी का चौमुखा दीपक जलाकर उसका कुमकुम और अक्षत से पूजन करें। इसके बाद दस मिनट तक भगवती लक्ष्मी का ध्यान करें। प्रात:काल ब्राह्मण को बुलाकर श्रीयंत्र का पूजन करवाकर, यंत्र को पूजा ग्रह में स्थापित करें तथा कलश आदि ब्राह्मïण को कुछ दक्षिणा सहित दान कर दें। इस दानगाय के गोबर का एक छोटा सा दीपक बनाकर उसमें पुराने गुड़ की एक डली तथा मीठा तेल डालें। फिर दीपक जलाकर उसे घर के मुख्य द्वार के मध्य रख दें। यह कार्य घर की कोई स्त्री करे। पुरुष रात में दुकान बंद करने के बाद दुकान के द्वार के बाहर पांच-दस रुपए के सिक्के पर छोटी सी चंदन की धूप जलाकर रखें और घर आ जाएं। यदि सुबह वो सिक्का न मिले तो बहुत अच्छी बात है। यदि सिक्का अपनी जगह रखा मिल जाए, तो इस क्रिया को पुन: करें। इसके बाद दुकान में हवन और घर में सत्यनारायण भगवान की कथा कराएं। पंडित को दान-दक्षिणा देकर खुशी-खुशी विदा करें। इससे दुकान के कारोबार में आशातीत वृद्धि होगी तथा घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहेगी।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (11 दिसंबर 2025)
11 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- तनावपूर्ण वातावरण से बचिए, स्त्री शारीरिक मानसिक कष्ट, मानसिक बेचैनी अवश्य बनेगी।
वृष राशि :- अधिकारियों के सर्मथन से सुख होवे, कार्य गति विशेष अनुकूल किन्तु विचार भेद अवश्य बनेंगे।
मिथुन राशि :- भोग ऐश्वर्य प्राप्ति, वाद, तनाव व क्लेश होवे, तनाव से बचकर अवश्य चले।
कर्क राशि :- अधिकारियों का समर्थन फलप्रद होगा, भाग्य साथ दें, बिगड़े कार्य अवश्य ही बनेंगे।
सिंह राशि :- परिश्रम सफल हो, व्यवसाय मंद हो, आर्थिक योजना सफल अवश्य ही हो जाएगी।
कन्या राशि :- कार्य गति सामान्य रहे, व्यर्थ परिश्रम, कार्यगति मंद अवश्य होगा, ध्यान रखें।
तुला राशि :- किसी दुर्घटना से बचे, चोट चपेट आदि का भय होगा, रुके कार्य अवश्य ही बन जाएगे।
वृश्चिक राशि :- कार्य गति अनुकूल रहे, लाभान्वित कार्य योजना बनेगी, बाधा आदि से बच सकेंगे।
धनु राशि :- कुछ प्रतिष्ठा के साधन बने, किन्तु हाथ में कुछ न लगे तथा कार्य अवरोध अवश्य होगा।
मकर राशि :- अधिकारी वर्ग से तनाव, क्लेश होगा, मानसिक अशांति अवश्य ही बन जाएगी।
कुंभ राशि :- मनोबल बनाए रखे, किन्तु हाथ में कुछ न लगे, नया कार्य अवश्य ही होगा, ध्यान दें।
मीन राशि :- दैनिक कार्य गति उत्तम, कुटुम्ब में सुख समय उत्तम बनेगा, कार्य समझकर निपटा लें।
छोटे भाई-बहन की मैरिड लाइफ में हैं कई परेशानियां या हमेशा रहती है तालमेल में कमी? शनि के तीसरे भाव में प्रभाव और समाधान
10 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ज्योतिष में तीसरा भाव साहस, आत्मविश्वास, भाइयों-बहनों के संबंध, संचार, छोटे भाई-बहन, यात्रा, और प्रयासों के घर के रूप में जाना जाता है. यह हमारे जीवन में हर उस चीज़ का प्रतीक है जो हमें आगे बढ़ने, सीखने और जोखिम लेने में मदद करती है. जब शनि तीसरे भाव में होता है, तो यह हमारे व्यक्तित्व, सोच और व्यवहार पर गहरा प्रभाव डालता है. शनि एक धीमा लेकिन स्थिर ग्रह माना जाता है, जो जीवन में धैर्य, मेहनत और अनुशासन को महत्व देता है. तीसरे भाव में शनि का होना व्यक्ति को सतर्क, गंभीर और सोच-समझकर कदम उठाने वाला बनाता है. हालांकि, शनि की कड़वाहट और देरी का गुण कभी-कभी व्यक्ति को संकोची, डरपोक या बहनों-भाइयों के संबंधों में दूरी डालने वाला भी बना सकता है. यह स्थिति न केवल मानसिक तनाव पैदा कर सकती है बल्कि अवसरों को पाने में भी देरी ला सकती है, लेकिन सही उपायों और समझ के साथ शनि की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में मोड़ा जा सकता है. इस आर्टिकल में हम जानेंगे भोपाल निवासी ज्योतिषी, वास्तु विशेषज्ञ एवं न्यूमेरोलॉजिस्ट हिमाचल सिंह से कि शनि तीसरे भाव में होने पर कौन-कौन से सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव दिखते हैं और किन आसान उपायों से इन प्रभावों को संतुलित किया जा सकता है.
शनि तीसरे भाव में होने के सकारात्मक प्रभाव
1. धैर्य और स्थिरता बढ़ती है
शनि की वजह से व्यक्ति में धैर्य और संयम बढ़ता है. छोटे कार्यों में भी लगातार मेहनत करने की आदत बनती है.
2. संचार और सोच में गंभीरता
यह स्थिति व्यक्ति को गंभीर और सोच-समझकर बोलने वाला बनाती है. लोग उसके विचारों और सलाह को अधिक मानते हैं.
3. साहस और प्रयास की क्षमता
तीसरा भाव साहस का घर है. शनि यहां होने पर व्यक्ति जोखिम लेने से नहीं डरता और कठिन परिस्थितियों में भी प्रयास करना नहीं छोड़ता.
4. भाई-बहनों के संबंध मजबूत होते हैं
शनि के सकारात्मक प्रभाव से भाई-बहनों के बीच समझदारी और जिम्मेदारी बढ़ती है.
5. स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता
व्यक्ति में आत्मनिर्भर बनने की इच्छा और मानसिक ताकत बढ़ती है.
शनि तीसरे भाव में होने के नकारात्मक प्रभाव
1. संकोच और डर
शनि की देरी और कठोरता के कारण व्यक्ति कभी-कभी निर्णय लेने में संकोच करता है और जोखिम लेने से डरता है.
2. भाई-बहनों के साथ दूरी
नकारात्मक प्रभाव से भाई-बहनों में गलतफहमी, दूरी और तालमेल की कमी पैदा हो सकती है.
3. संचार में बाधा
बोलने या विचार व्यक्त करने में झिझक आ सकती है, जिससे सामाजिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं.
4. आसपास के अवसरों की कमी
शनि की स्थिरता कभी-कभी अवसरों को समय पर पकड़ने में देरी कर सकती है.
5. तनाव और चिंता
मानसिक दबाव और चिंता बढ़ सकती है, खासकर काम और प्रयासों में सफलता न मिलने पर.
शनि तीसरे भाव में होने पर आसान उपाय
1. शनिवार के दिन शिव जी का ध्यान करें
शनि की ऊर्जा को संतुलित करने के लिए शनिवार को किसी शांत स्थान पर शिव जी की पूजा या ध्यान करना लाभकारी होता है.
2. संतुलित बोलचाल
विचारों को स्पष्ट और संयमित तरीके से व्यक्त करें. जल्दी-जल्दी निर्णय लेने से बचें.
3. भाई-बहनों के साथ समय बिताएं
रिश्तों में दूरी दूर करने के लिए अपने भाई-बहनों के साथ समय बिताएं और उनकी मदद करें.
4. काले तिल और काला चक्र
शनि के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए काले तिल या काला चक्र शनिवार को दान में देने से लाभ मिलता है.
5. साहसिक कदम सोच-समझकर लें
जोखिम लेने से डरें नहीं, लेकिन सोच-समझकर कदम उठाएं. यह शनि की स्थिर और गंभीर ऊर्जा को सही दिशा में मोड़ता है.
यहां के मंदिर में मां काली रखती हैं 5 जी स्मार्ट फोन, भक्त भेजते हैं इस फोन पर मैसेज, क्या मिलता है जवाब? जानिए रोचक कहानी!
10 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
बर्दवान के बिरहाटा की रहने वाली काली नाम की एक बुज़ुर्ग मां स्मार्ट वॉच इस्तेमाल करती हैं. वह एक एंड्रॉयड फ़ोन भी इस्तेमाल करती हैं. वह हर साल अपना सेट बदलती हैं. पहले वह रियलमी इस्तेमाल करती थीं, अब सैमसंग वनप्लस इस्तेमाल करती हैं. मोबाइल सेट में 5G माइक्रो सिम है. इसे हर महीने रिचार्ज किया जाता है. मोबाइल हर रोज चार्ज होता है. मां की कलाई पर बंधी स्मार्ट वॉच भी चार्ज होती है. एंड्रॉयड मोबाइल सेट मां के कंधे पर टंगे वैनिटी बैग में रखा रहता है.
मेरे पास हमेशा मंदिर जाने का समय नहीं होता. मुझे काम के लिए बाहर जाना पड़ता है. उस समय, एक भक्त ने मुझे मां से बात करने के लिए यह फ़ोन दिया था. उससे पहले, एक और भक्त ने मुझे एक रियलमी सेट दिया था. क्या मेरी मां सच में फ़ोन पर बात करती हैं? कब? देर रात? या मंदिर बंद होने के बाद? आइए जानते हैं इसके बारे में…
हर रोज चार्ज होता है फोन
मंदिर के मुख्य पुजारी देबाशीष मुखोपा धया ने बताया कि पूजा के दौरान एक भक्त ने माता को एक मोबाइल फ़ोन दिया. ताकि मां इस फोन से भक्तों से मैसेज करें. भक्तों ने उन्हें एक SIM कार्ड भी दिया. वे उसे रिचार्ज करते हैं. मैं अपने पास फ़ोन नहीं रखता. मैं बस यह पक्का करता हूं कि चार्ज की कमी से वह बंद न हो जाए.
बिरहाटा कालीबाड़ी, अविभाजित वंडमान जिले के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है. लेकिन यह पता नहीं है कि मंदिर कब बना था, हांलाकि वहां पुराने समय से पूजा होती आ रही है. लोग कहते हैं कि देवी को डाक्टकाली के नाम से भी जाना जाता था. JT रोड के निर्माण के दौरान, नदी के किनारे से जंगल और मिट्टी के काम हटा दिए गए थे. काली मां की पूजा की जगह को वैसे ही छोड़ दिया गया था.
अब मां के मंदिर में रोज होती है पूजा
जानकारों के मुताबिक, बांका नदी के किनारे बसा यह इलाका जब जेट्टी रोड बना था, तब जंगल से घिरा हुआ था. मिट्टी खोदते समय मजदूरों को देवी की वेदी दिखती थी. कहा जाता है कि मलेरिया या महामारी से राहत पाने के लिए रक्षाकाली पूजा की जाती थी. 19वीं सदी के बीच में, वेदी को फिर से बनाया गया, जिसे लकड़ी की बाड़ से घेर दिया गया. घने जंगल को साफ करना पड़ा. इस समय, दक्षिण दामोदर इलाके का घोषाल परिवार देवी की पूजा में लगा हुआ था. समय के साथ, लकड़ी और लकड़ी के चबूतरे हटते रहे. मां के मंदिर में रोज़ पूजा होती है.
दिन बने आसान और मन रहे शांत! बाहर जाने से पहले मुंह में रख लें लौंग, जानें इसका असली कारण और फायदे
10 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी में कई ऐसी छोटी-छोटी बातें होती हैं जिनका सीधा असर हमारे दिन, मन और काम पर पड़ता है. कई बार हम घर से निकलते हैं और पूरा दिन अच्छा जाता है, तो कई बार बिना किसी वजह मन अशांत रहता है या काम अटकते हैं. भारत में शुरुआत को खास माना गया है, इसलिए घर से बाहर कदम रखने से पहले लोग कई तरह की छोटी सलाह और आसान उपाय अपनाते हैं ताकि दिन अच्छा बीते और अनचाही परेशानी न आए. इन्हीं में से एक उपाय है मुंह में लौंग रखना. लौंग सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाने वाला मसाला नहीं है. इसे शांति, सुरक्षा और अच्छी ऊर्जा से भी जोड़ा जाता है. कई लोग मानते हैं कि लौंग में एक ऐसी गर्माहट और ताकत होती है जो मन को स्थिर करती है और माहौल की खराब ऊर्जा को दूर करती है. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जब आप किसी अहम काम, मीटिंग, यात्रा या नए प्रयास की शुरुआत करते हैं, तब मुंह में लौंग रखने से मन मजबूत रहता है और बाहर का माहौल आपके खिलाफ नहीं जाता.
बहुत से जानकार बताते हैं कि लौंग के इस्तेमाल से आत्मविश्वास बढ़ता है, आपका ध्यान बेहतर रहता है और दिन सकारात्मक घटनाओं के साथ आगे बढ़ता है. आज हम इसी विषय पर विस्तार से समझेंगे भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से कि आखिर क्यों कहा जाता है कि घर से बाहर जाते समय मुंह में लौंग रखना फायदेमंद माना जाता है और यह उपाय कैसे आपके दिन और काम पर सूक्ष्म असर छोड़ सकता है.
घर से निकलते समय मुंह में लौंग रखने के संभावित लाभ
1. खराब ऊर्जा से बचाव
एक मान्यता यह कहती है कि लौंग आसपास की नकारात्मक ऊर्जा को जल्दी पकड़ लेती है. जब आप इसे मुंह में रखते हैं, तो यह आपके चारों ओर एक तरह की सकारात्मक परत बना देती है. ऐसा माना जाता है कि इस परत से आपको ईर्ष्या, नज़र या बाहरी दबाव का असर कम होता है. इससे आप बाहर के माहौल में भी संतुलित रहते हैं और काम आसानी से होते हैं.
2. बोलने में मजबूती और प्रभाव
लौंग की तेज सुगंध सांस को तरोताज़ा करती है और मन को केंद्रित करती है. इस वजह से आपकी बात साफ और मजबूत तरीके से निकलती है. कई लोग मानते हैं कि जब मुंह में लौंग रखकर बाहर निकला जाए, तो बातचीत का असर बढ़ता है और लोग आपकी बात ज़्यादा ध्यान से सुनते हैं. खासकर जब कोई मीटिंग, इंटरव्यू या बातचीत आपकी सफलता से जुड़ी हो, तब यह असर और भी अच्छा माना जाता है.
3. मन को शांत और आत्मविश्वासी बनाना
लौंग को स्वाभाविक रूप से तनाव कम करने वाला माना जाता है. इसकी हल्की गर्माहट और खुशबू घबराहट को कम करती है. बाहर जाते समय अगर मन बेचैन हो या कोई काम भारी लग रहा हो, तो लौंग आपको शांत रख सकती है. इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और आप स्थिति को बिना घबराहट संभाल पाते हैं.
4. अचानक आने वाली परेशानी से बचाव का विश्वास
कई लोग मानते हैं कि मुंह में लौंग रखने से अचानक आने वाली मुश्किलें हल्की पड़ जाती हैं. चाहे वह रास्ते की कोई दिक्कत हो, किसी व्यक्ति का व्यवहार हो या काम में रुकावट लौंग एक तरह से दिन को स्मूद बनाए रखने में मदद करती है. यह एक पारंपरिक मान्यता है, जिसे कई लोग अपने निजी अनुभव के आधार पर सही मानते हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (10 दिसंबर 2025)
10 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक रहे, कार्य गति में सुधार, शुभ समाचार अवश्य ही मिलेगे।
वृष राशि :- कुछ बाधाएं, कष्ट, उदर विकार, स्त्री शरीर कष्ट, कारोबार में बाधा अवश्य ही बनेगी।
मिथुन राशि :- कार्य कुशलता से संतोष, परिश्रम सफल होगा, स्त्री वर्ग से सुख अवश्य ही होगा।
कर्क राशि :- कुटुम्ब की समस्याएं सुलझे, सुख शांति में समय व्यतीत होगा, समय का ध्यान रखे।
सिंह राशि :- परिश्रम से समय पर सोचे कार्य पूर्ण होगे, व्यावसायिक क्षमता अनुकूल होगी।
कन्या राशि :- स्त्रीवर्ग से हर्ष उल्लास होवे, आशानुकूल सफलता से हर्ष बिगड़े, कार्य बन जाएगे।
तुला राशि :- कार्यगति उत्तम चिन्ताएं कम होगी, प्रभुत्व एवं प्रतिष्ठा अवश्य ही बनेगी।
वृश्चिक राशि :- योजनाएं फलीभूत होगी, सतर्कता से कार्य अवश्य निपटा ले, कार्य अवश्य होगा।
धनु राशि :- आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, कार्यगति उत्तम, भावनाएं संवेदनशील अवश्य रहेगी।
मकर राशि :- अधिकारी वर्ग से तनाव, क्लेश व मानसिक अशांति, कार्य अवरोध अवश्य ही होगा।
कुंभ राशि :- मनोबल बनाए रखे, किन्तु हाथ में कुछ न लगे, नया कार्य अवश्य प्राप्त होगा।
मीन राशि :- दैनिक कार्य गति उत्तम, कुटुम्ब में सुख समय उत्तम बनेगा, विचार भेद समाप्त होंगे
भगवान शिव के इस मंदिर में है पृथ्वी के 'आरंभ और अंत' का रहस्य! यहां कलयुग का आखिरी स्तंभ भी मौजूद
9 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कुछ मंदिर दिखने में जितने साधारण होते हैं, उससे कहीं ज्यादा उनकी मान्यताएं होती हैं. भारत के कुछ मंदिर अपने अंदर इतिहास और आने वाले भविष्य को संजोए बैठे हैं. महाराष्ट्र के हरिश्चंद्रगढ़ किले में स्थित केदारेश्वर उन्हीं चमत्कारी मंदिरों में से एक है. माना जाता है कि पृथ्वी की शुरुआत इसी मंदिर से हुई थी और अंत भी इसी मंदिर में होगा. इस मंदिर में बने स्तंभ कलयुग के अंत का संकेत देते हैं. मान्यता है कि इस मंदिर में दर्शन करने मात्र से सभी भक्तों के पाप नष्ट हो जाते हैं और मन की हर इच्छा पूरी हो जाती है. यह मंदिर ना केवल इतिहास की वजह से प्रसिद्ध था बल्कि इस मंदिर में सृष्टि का रहस्य छिपा हुआ है. आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में…
मंदिर एक गुफा के भीतर स्थित
मंदिर की कोई वास्तुकला नहीं है और ना ही मंदिर को भव्य बनाने में किसी तरह खर्च किया गया है, लेकिन फिर भी भक्त दूर-दूर से भगवान शिव के केदारेश्वर रूप के दर्शन के लिए आते हैं. मंदिर एक गुफा के भीतर स्थित है, जहां सालोंभर पानी भरा रहता है. मंदिर के चारों ओर भरा पानी भी मौसम के अनुसार अपना तापमान बदलता रहता है. सर्दियों में पानी गुनगुना और गर्मियों में बर्फ जितना ठंडा हो जाता है.
मंदिर के चार स्तंभ चार युग के प्रतीक
मान्यता है कि मंदिर के चार स्तंभ सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग के प्रतीक हैं. मंदिर के तीन स्तंभ टूट चुके हैं और एक ही बाकी है. कहा जाता है कि बचा हुआ स्तंभ कलयुग का प्रतीक है, जब कलयुग खत्म होगा, तब यह स्तंभ भी टूटकर गिर जाएगा और पृथ्वी का विनाश हो जाएगा. मंदिर तक पहुंचने का रास्ता बहुत दुर्गम है, जो पहाड़ियों से होकर गुजरता है. मंदिर तक पहुंचने का कोई पक्का रास्ता भी नहीं बना है. पहाड़ी पर ट्रेकिंग के जरिए ही मंदिर तक पहुंचा जाता है.
5 फीट का शिवलिंग विराजमान
मंदिर की गुफा के बीच में 5 फीट का शिवलिंग विराजमान है. माना जाता है कि शिवलिंग स्वयंभू है. भगवान शिव स्वयं तपस्या के बाद यहां प्रकट हुए थे. गुफा के ऊपर मंदिर का गोपुरम बना है, जिसका निर्माण पत्थर की सहायता से किया गया. इसका निर्माण छठी शताब्दी में कलचुरी राजवंश ने किया था. 11वीं सदी में गुफाओं की खोज हुई. मंदिर के आसपास प्रकृति का अनोखा नजारा देखने को मिलता है, जो भक्तों को अपनी तरफ आकर्षित करता है.
बचपन की डरावनी यादों से पाना है छुटकारा या जीवन में बढ़ना है बहुत आगे? भागवत गीता के ये 5 संदेश करेंगे मदद!
9 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
बचपन हर व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण समय होता है. यह वह अवधि है, जब हमारे अनुभव, हमारी भावनाएं और हमारी समझ जीवन की नींव तैयार करते हैं. पर कभी-कभी, बचपन में होने वाले अनुभव इतने कठिन और दर्दनाक होते हैं कि उनका असर वयस्क जीवन पर भी गहराई से पड़ता है. अनजान आघात, चाहे वह भावनात्मक असुरक्षा हो, अस्वीकार का अनुभव हो, या किसी प्रकार का डर, व्यक्ति की सोच, व्यक्तित्व और रिश्तों पर स्थायी प्रभाव डाल सकते हैं. ऐसे आघात अक्सर हमारी आत्मविश्वास की नींव को हिला देते हैं और जीवन में सफलता की राह में अनजाने अवरोध खड़े कर देते हैं. आज के समय में, मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. चिंता, अवसाद और आत्म-संदेह जैसी स्थितियां न केवल व्यक्तियों के जीवन को प्रभावित करती हैं, बल्कि उनके सामाजिक और व्यावसायिक जीवन पर भी गहरा असर डालती हैं. यही वह स्थान है, जहां भगवद् गीता की शिक्षाएं अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती हैं. गीता केवल धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि यह जीवन के हर पहलू में आंतरिक शक्ति और मानसिक स्पष्टता प्रदान करने वाला मार्गदर्शक है.
1. भगवद् गीता हमें यह सिखाती है कि अतीत में हुए अनुभव, चाहे कितने भी दर्दनाक क्यों न हों, हमें परिभाषित नहीं करते. यह हमें वर्तमान में जीने, आत्मा की शक्ति को पहचानने और अपने भीतर की स्थिरता प्राप्त करने का मार्ग दिखाती है. गीता के अनुसार, आंतरिक उपचार का पहला कदम यह समझना है कि आप अपनी पीड़ा नहीं हैं. आपकी आत्मा शाश्वत और अछूती है, और बचपन के घावों को वह प्रभावित नहीं कर सकते. जब हम अपने भीतर की असली पहचान को समझते हैं, तभी पुराने दर्द और आघात हमें हावी नहीं कर पाते.
2. गीता में वैराग्य का सिद्धांत भी इस उपचार में सहायक है. वैराग्य का अर्थ है अनुभवों और अतीत की स्मृतियों से प्रभावित हुए बिना जीवन को स्वीकार करना. यह दमन नहीं है, बल्कि पुरानी यादों और दुखों को नियंत्रित करना है. जब हम वैराग्य का अभ्यास करते हैं, तो हम भावनात्मक रूप से स्वतंत्र हो जाते हैं और अपने दर्द को अपने जीवन को नियंत्रित नहीं करने देते.
3. कर्म योग भी गीता की वह शिक्षा है, जो बचपन के आघातों से उबरने में मदद करती है. इसका मूल भाव यह है कि हम अपने कर्मों को निष्काम भाव से करें, बिना किसी अपेक्षा या अहंकार के. कर्म योग का अभ्यास करने से हम अतीत के दुखों पर प्रतिक्रिया करना बंद कर देते हैं और वर्तमान में सचेत रूप से निर्णय लेना सीखते हैं. इससे पुराने आघातों से उत्पन्न होने वाले भय और क्रोध के पैटर्न टूट जाते हैं और जीवन में सफलता की राह सहज होती है.
4. ध्यान योग गीता का एक और महत्वपूर्ण साधन है. मन अक्सर अशांत और उथल-पुथल में रहता है, और बचपन के अनुभव इसे और अस्थिर बना सकते हैं. ध्यान का अभ्यास मन और आत्मा को संतुलित करता है, भावनात्मक उथल-पुथल को कम करता है और हमें अपने विचारों से दूरी बनाने की क्षमता देता है. इस प्रक्रिया से हम अतीत की पीड़ा में जीना छोड़ देते हैं और अपने भीतर सुरक्षित और स्थिर महसूस करते हैं.
5. गीता में अर्जुन के उदाहरण के माध्यम से हमें यह भी सिखाया गया है कि अपने भीतर के भय और आघातों का सामना करना आवश्यक है. युद्धभूमि में अर्जुन अपने सगे-संबंधियों की मृत्यु और भय के सामने टूट जाता है, पर कृष्ण उसे बताते हैं कि भागने के बजाय अपने भीतर के राक्षसों का सामना करें. यही जीवन में भी लागू होता है जब हम अपने भीतर के डर और आघातों को स्वीकार करते हैं और उन्हें नियंत्रित करना सीखते हैं, तभी हम मानसिक स्वतंत्रता प्राप्त कर पाते हैं.
अंततः, गीता शरणागति की शिक्षा देती है. इसका अर्थ है पूर्ण समर्पण अपने भय, अपने दर्द और अपने संकुचित विचारों से. जब हम शरणागति अपनाते हैं, तो हम अपनी पीड़ा और दुखदायी यादों को पीछे छोड़ देते हैं और जीवन में एक नई स्वतंत्रता और सफलता की राह खोलते हैं.
सफला एकादशी पर क्या करें खास, रुका हुआ काम पूरा हो और घर में छाए खुशहाली
9 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
15 दिसंबर को सभी रुके हुए कार्यों को पूर्ण करने के लिए एक खास दिन का आगमन होगा. हिंदू कैलेंडर के अनुसार, एक संवत में कई धार्मिक पर्वों का आगमन होता है. इन धार्मिक पर्वों पर शास्त्रों में बताई गई विधि अनुसार श्रद्धा, भक्ति-भाव से धार्मिक कार्य करने पर संपूर्ण लाभ की प्राप्ति होने की धार्मिक मान्यता बताई गई है.
पौष मास सूर्य देव और विष्णु भगवान को समर्पित मास होता है, जिसमें खास तिथियों का आगमन मानव कल्याण के लिए होता है. मार्गशीर्ष में देवी एकादशी का जन्मोत्सव और मोक्ष प्राप्ति के लिए एकादशी तिथि आती है तो उसके बाद पौष मास में सफलता प्राप्ति के लिए सफला एकादशी का आगमन बेहद ही खास होता है. चलिए विस्तार से जानते हैं कि सफला एकादशी का धार्मिक महत्व क्या है.
सालभर में 24 एकादशियों का आगमन
इसकी अधिक जानकारी देते हुए हरिद्वार के विद्वान धर्माचार्य पंडित श्रीधर शास्त्री लोकल 18 को बताते हैं कि सालभर में 24 एकादशियों का आगमन मानव कल्याण के लिए होता है. धार्मिक ग्रंथो में सभी एकादशियों का अपना-अपना महत्व बताया गया है. पौष मास कृष्ण पक्ष में सफला एकादशी सभी रुके हुए कार्यों को पूर्ण करने के लिए सबसे उत्तम दिन होता है, जो साल 2025 में 15 दिसंबर को आ रही है. इस दिन नया कारोबार शुरू करने या रुके हुए कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप, विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ और नियम अनुसार एकादशी का व्रत करने मात्र से लाभ की प्राप्ति हो जाएगी.
सफला एकादशी का विशेष लाभ कैसे मिलेगा?
वह आगे बताते हैं कि कारोबार, करियर में यदि बनते-बनते काम रुक जाते हैं और काफी प्रयास करने के बाद भी सफलता नहीं मिल रही तो सफला एकादशी का व्रत हरिद्वार में गंगा स्नान करने के बाद किया जाए तो लाख गुना ज्यादा लाभ की प्राप्ति होती है. हरिद्वार में सफला एकादशी व्रत का सबसे अधिक महत्व होता है. सफला एकादशी का विशेष लाभ प्राप्त करने के लिए गरीब और जरूरतमंद लोगों को यदि सफेद रंग की वस्तुएं चावल, आटा, सफेद वस्त्र, मोती की माला और उनके दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुएं दी जाए तो देवी एकादशी की कृपा से जीवन सुखमय और खुशहाल हो जाता है. सभी एकादशी में सफला एकादशी का सबसे विशेष महत्व बताया गया है. एकादशी तिथि 14 दिसंबर की शाम 6:50 से शुरू होकर 15 दिसंबर सोमवार की रात 9:19 तक रहेगी, जिसका शुभ समय सुबह 11:20 से दोपहर 12:04 तक का है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (09 दिसंबर 2025)
9 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- साधन संपन्नता के योग फलप्रद हो, आर्थिक योजना अवश्य ही फलप्रद होगी।
वृष राशि :- अपने किए पर पछताना पड़ेगा, मानसिक बेचैनी, क्लेश तथा अशांति होगी।
मिथुन राशि :- सफलता के साधन जुटाए, व्यवसायिक क्षमता में वृद्धि होगी, समस्याओं का समाधान होगा।
कर्क राशि :- दैनिक कार्यों में सफलता मिले, स्त्री से सुख, इष्ट मित्र सुखवर्धक अवश्य होंगे।
सिंह राशि :- स्त्री वर्ग से हर्ष उल्लास हो, भोग ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी, कार्य रुचि बढ़ेगी।
कन्या राशि :- धन प्राप्त, आशानुकूल में वृद्धि, बिगड़े कार्यों की योजना सफल हो जाएगी।
तुला राशि :- बिगड़े कार्य अवश्य ही बन जाएगे, आशानुकूल सफलता से हर्ष होगा, ध्यान रखे।
वृश्चिक राशि :- दैनिक समृद्धि के साधन बनेंगे, अधिकारियों के सहयोग से कार्य योजन का लाभ होगा।
धनु राशि :- कार्य योजना पूर्ण हो, बड़े बड़े लोगों से मेल मिलाप होगा, कार्य अवरोध से बचें।
मकर राशि :- कार्य कुशलता से संतोष, स्थिति में सुधार तथा चिन्ता अवश्य होगी।
कुंभ राशि :- आर्थिक योजना पूर्ण होवे, शरीर कष्ट, मानसिक बेचैनी, रुके कार्य अवश्य बनेंगे।
मीन राशि :- दैनिक कार्यों में बाधा, चिन्ता उद्विघ्नता बने, धन का व्यय अवश्य ही होगा।
अधिक मास अलर्ट: साल 2026 में आ रहा है 'पुरुषोत्तम मास', भूलकर भी न करें ये 3 काम, वरना होगा भारी नुकसान!
8 Dec, 2025 03:52 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Adhik Maas Shubh Upay: आने वाला नया साल 2026 ज्योतिषीय और धार्मिक नजरिए से बहुत ही खास रहने वाला है, क्योंकि इस साल एक अनोखा संयोग बन रहा है. हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल में 12 के बजाय 13 महीने होंगे. यानी इसका मतलब है कि विक्रम संवत 2083 में एक अतिरिक्त चंद्र मास जुड़ने वाला है. इस स्थिति के कारण ज्येष्ठ मास की अवधि लगभग 60 दिनों तक रहेगी.
कब बनती है ‘अधिकमास’ की स्थिति ?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंद्र वर्ष और सौर वर्ष की गणना में अंतर होने के कारण ही ऐसी दुर्लभ ‘अधिकमास’ की स्थिति बनती है. धार्मिक मान्यताओं में इस महीने को अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना गया है. यह अवधि जितनी शुभ है, उतनी ही संवेदनशील भी है. इस दौरान की गई छोटी सी भी लापरवाही या गलती व्यक्ति के आने वाले पूरे साल के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है. ऐसे में आइए जानते हैं कि नए साल में सुख-शांति लाने के लिए कौन से उपाय करने चाहिए.
इस दिन से होगी ‘अधिकमास’ की शुरुआत
द्रिक पंचांग के अनुसार, 17 मई 2026 से अधिकमास की शुरुआत होगी, जो 15 जून 2026 को समाप्त होगा. वहीं साल 2026 में ज्येष्ठ का महीना 22 मई से शुरू होकर 29 जून 2026 तक चलेगा. बता दें कि जब पंचांग में एक ही महीना दो बार आता है, तो उसे ‘पुरुषोत्तम’ मास या अधिकमास कहा जाता है. यह समय बहुत दुर्लभ स्थिति में आता है, इसलिए इसे शुभ और शांति का प्रतीक भी माना जाता है.
क्या होता है अधिकमास 2026 ?
चंद्र वर्ष और सौर वर्ष की गणना के बीच समय-समय पर उत्पन्न होने वाले अंतर को संतुलित करने के उद्देश्य से पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है. यह लगभग हर 32 महीने में करीब 16 दिन और कुछ घंटे मिलकर एक पूरे महीने के बराबर हो जाते हैं. सनातन धर्म में इसी अतिरिक्त माह को दूसरे शब्दों में अधिक मास कहा जाता है.
लाभ पाने के लिए करें ये उपाय
हर रोज सुबह दीपक जलाएं
अधिकमास के समय रोज तुलसी के पास या भगवान विष्णु के सामने सरसों या घी का दीया जलाएं. इससे घर में सुख, समृद्धि बनी रहेगी और घर का माहौल शांत रहेगा.
पक्षियों को दाना-पानी देना
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, अधिकमास के समय में पक्षियों की सेवा करना बहुत लाभकारी माना गया है. इसके लिए आप अपने छत या बालकनी में मिट्टी के बर्तन में पानी भरें और दाना डालें. ऐसा करने से पक्षियां दाना खायेंगी, जिससे आपको अत्यंत लाभ मिलेगा.
गरीबों-मजदूरों को भोजन खिलाएं
अधिकमास (जिसे पुरुषोत्तम मास या मलमास भी कहा जाता है) के दौरान दान-पुण्य, विशेषकर गरीब, मजदूर या जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना, हिंदू धर्मग्रंथों में अत्यंत श्रेष्ठ कार्य माना गया है. मान्यता है कि इस पवित्र महीने में किए गए दान और धार्मिक कार्यों का फल कई गुना अधिक मिलता है.
लापरवाही पड़ी भारी: दमोह में लिफ्ट गिरने से मालिक का बेटा और कर्मचारी लहूलुहान
माओवाद की समाप्ति के बाद अब बस्तर का सर्वांगीण विकास होगा: मंत्री राम विचार नेताम
अम्बिकापुर में विकास को नई रफ्तार
