धर्म एवं ज्योतिष
बहुत शुभ होते हैं ये 5 जीव, घर में पालने से दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ेगी तरक्की, धन की भी कभी नहीं होगी कमी!
8 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जीव-जंतु और पशु-पक्षियों में दिलचस्पी रखने वालों के लिए यह रोचक खबर हो सकती है. दरअसल, कई लोग अपने घर में पशु-पक्षी पालते हैं. इसमें कुछ ऐसे भी पशु-पक्षी हैं जो आपके लिए लकी साबित हो सकते हैं. माना जाता है कि, जो लोग पशु-पक्षी पालते हैं, उनके लिए वे सौभाग्य का प्रतीक माने जाते हैं. उनके घर में हमेशा खुशहाली बनी रहती है. इन जीव के बारे में बता रहे हैं
ज्योतिषाचार्य के मुताबिक, जीव-जंतुओं को पालना शुभ माना जाता है, क्योंकि यह न केवल भावनात्मक जुड़ाव और खुशी देता है, बल्कि वास्तु और ज्योतिष के अनुसार घर में सकारात्मक ऊर्जा, धन, सुख-समृद्धि और सौभाग्य भी लाता है.
खरगोश: ज्योतिषाचार्य के अनुसार, घर में खरगोश को पालना काफी ज्यादा अच्छा माना जाता है. खरगोश का घर आगमन शुभ संकेत होता है. माना जाता है कि घर में खरगोश पालने से नकारात्मकता बाहर चली जाती है और हमेशा सकारात्मक माहौल बन रहता है.
मछलियां: वास्तु शास्त्र के अनुसार, मछलियों को शुभ माना गया है. इसलिए घर में मछलियों को पालना अच्छा कहा जाता है. अगर कोई अपने घर में मछलियां पालता है तो इससे उसके घर में खुशियां आती हैं. सुख-शांति हमेशा बनी रहती है. मछलियों को धन का प्रतीक भी कहा जाता है
कछुआ: घर में कछुआ पालना भी शुभ कहा गया है. अगर आप घर में कछुआ पालते हैं तो उससे धन की परेशानियां दूर होती हैं. कछुआ पालने से घर में मां लक्ष्मी की कृपा बरसती है. धन की लक्ष्मी के आशीर्वाद से कभी हाथ तंग नहीं रहता है.
बिल्ली: घर में राशि के अनुसार बिल्ली पालना भी बहुत शुभ माना जाता है. इसे पालने से स्वास्थ्य लाभ होते हैं. जिन लोगों में सुस्ति छाई रहती है, उनके लिए बिल्ली पालना अच्छा होता है. इसके अलावा, बिल्लियां स्ट्रेस से निपटने में मदद करती हैं.
घोड़ा: घोड़ पालना भी बहुश शुभ माना जाता है. घोड़े सिर्फ पालतू जानवर ही नहीं, स्ट्रेस रिलीवर भी होते हैं. आज पूरी दुनिया में हॉर्स थेरेपी काफी फेमस है, जो इंसानों को तनाव और अवसाद से निजात दिलाती है. इसके लिए घोड़ों को खुश रखना भी बेहद जरूरी है, इसलिए इन्हें 2 से 3 घंटे खुले वातावरण में छोड़ देना चाहिए
मिर्गी से छुटकारा, पुत्र की कामना होगी पूरी, बस इस मंदिर में आना है पांच सोमवार
8 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मध्य प्रदेश में ऐसे कइयों प्राचीन मंदिर हैं, जहां आज भी चमत्कार होते हैं. कहीं साक्षात भगवान विराजमान हैं, तो कहीं के दर्शन मात्र से परेशानियों से छुटकारा मिल जाता है. ऐसा ही राज्य के शिवपुरी जिले के मायापुर क्षेत्र में स्थित प्राचीन खाती बाबा (ठाकुर बाबा का मंदिर) मंदिर को स्थानीय लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है. मान्यता है कि यहां अर्जी लगाने और विशेष तरीके से पूजा करने पर पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है. इतना ही नहीं, मंदिर में मिर्गी की बीमारी में भी राहत मिलती है. ग्रामीण बताते हैं कि वर्षों से इस मंदिर में मनोकामनाएं पूरी होने के कई उदाहरण सुनने-देखने में आते रहे हैं. इसी आस्था के चलते श्रद्धालु दूर-दूर से यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं.
शिवपुरी जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर और ग्राम मायापुर से लगभग चार किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित खाती बाबा का मंदिर लंबे समय से चमत्कारिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. बताया जाता है कि यहां पांच सोमवार पूजा करने से मिर्गी जैसी गंभीर बीमारी में विशेष लाभ मिलता है. वहीं जिन दंपतियों की पुत्र प्राप्ति की कामना होती है, वे भी मंदिर में अर्जी लगाकर पांच सोमवार पूजा करते हैं और इसे पूर्ण फलदायी मानते हैं.
होली की दूज के दिन मंदिर में विशेष पूजा
स्थानीय परंपरा के अनुसार, होली की दूज के दिन मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है. इस अवसर पर दूरदराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी अर्जी लगाने और पूजा करने पहुंचते हैं.
वर्षों से आस्था का केंद्र खाती बाबा का मंदिर
कि खाती बाबा का यह मंदिर वर्षों से लोगों की आस्था का केंद्र है. उनके अनुसार, मंदिर में अर्जी लगाने और पांच सोमवार पूजा करने से मिर्गी जैसी बीमारी में राहत मिलती है और पुत्र रत्न की प्राप्ति भी होती है. यहां के लोगों में ऐसी मान्यता प्रचलित है. मनोकामना पूरी होने के उदाहरण अक्सर देखने और सुनने को मिलते हैं.
संकष्टी चतुर्थी पर ग्रह बाधा दूर करने के लिए ऐसे करें गणेश पूजन, चंद्रमा को अर्घ्य देते समय इस मंत्र का करें जप
8 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है, लेकिन पौष माह में अखुरथ संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है, जो कि भगवान गणेश को समर्पित है. इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है. भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है क्योंकि वह अपने भक्तों के सभी विघ्नों को दूर कर देते हैं. यह तिथि सभी संकटों को दूर करने वाली है और हर कार्य में सफलता मिलती है. सारावली में गणेश को आरंभ का देवता कहा गया है अर्थात् जो भी कार्य शुभ संकल्प के साथ इस दिन शुरू किया जाए, उसमें बाधाओं की संभावना बहुत कम रहती है. आइए जानते हैं अखुरथ संकष्टी चतुर्थी तिथि का महत्व, कर्ज और ग्रह बाधा दूर करने के लिए ऐसे करें गणेशजी की पूजा…
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी का महत्व
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी का महत्व यह है कि यह तिथि विघ्नहर्ता ऊर्जा के उदय का समय है. यह तिथि मानसिक एवं ग्रहजन्य कष्टों को शांत करती है और मंगल, चंद्र, राहु–केतु की बाधाएं कम करती है. गणेशजी की कृपा से यह तिथि संकल्प सिद्धि और कार्य-सफलता प्रदान करती है. इस दिन चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलना, गणपति अथर्वशीर्ष या संकट नाशक गणेश स्तोत्र, दूर्वा, मोदक, लाल पुष्प का अर्पण और राहु–केतु संबंधित पीड़ाओं में गणेश जी को श्री गणेशाय नमः की 108 बार जप करने का विशेष शुभ माना जाता है.
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी पंचांग 2025
द्रिक पंचांग के अनुसार, सोमवार को सूर्य वृश्चिक राशि में और चंद्रमा कर्क राशि में रहेंगे. इस तिथि को अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 52 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 34 मिनट तक रहेगा और राहुकाल का समय सुबह 8 बजकर 20 मिनट से शुरू होकर 9 बजकर 37 मिनट तक रहेगा.
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि
पौष मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को अखुरथ संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन गजानन की पूजा करने से साधक हर काम में सफलता हासिल करता है. साथ ही माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह व्रत रख सकती हैं. इस व्रत की शुरुआत करने के लिए जातक ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करने के बाद पीले वस्त्र पहनकर पूजा स्थल को साफ करें और गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें.
इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा के समक्ष दूर्वा, सिंदूर और लाल फूल अर्पित करने के बाद श्री गणपति को बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं. इनमें से 5 लड्डुओं का दान ब्राह्मणों को करें और 5 भगवान के चरणों में रख बाकी प्रसाद में वितरित करें. पूजन के समय श्री गणेश स्तोत्र, अथर्वशीर्ष, और संकटनाशक गणेश स्तोत्र का पाठ करना चाहिए. ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का 108 बार जाप करें. शाम के समय गाय को हरी दूर्वा या गुड़ खिलाना शुभ माना जाता है.
अर्घ्य देते समय इस मंत्र का करें जप
संकटों से मुक्ति के लिए चतुर्थी की रात्रि को चंद्रमा को अर्घ्य देते हुए ‘सिंहिका गर्भसंभूते चन्द्रमांडल सम्भवे. अर्घ्यं गृहाण शंखेन मम दोषं विनाशय॥’ मंत्र बोलकर जल अर्पित करें. यदि संभव हो तो चतुर्थी का व्रत रखें, जिससे ग्रहबाधा और ऋण जैसे दोष शांत होते हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (08 दिसंबर 2025)
8 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- इष्ट मित्रों से सुख कार्य, व्यवसाय गति उत्तम योजनाएं फलीभूत होवेगी, लाभ मिलेगा।
वृष राशि :- अचानक शुभ समाचार धन प्राप्ति के योग बनेंगे, संवेदनशील बनेगी, ध्यान रखें ।
मिथुन राशि :- क्रोध से अशांति तनाव झगड़े से बचें, कार्य व्यवस्था कुछ अनूकूल बनेगी।
कर्क राशि :- कार्य कुशलता से संतोष स्त्री वर्ग से हर्ष तथा भोग ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी।
सिंह राशि :- इष्टमित्रों से सुखवर्धक फल प्राप्त होगा, कुटुम्ब की समस्याएं सुलझेंगी, समय का ध्यान रखे।
कन्या राशि :- व्यर्थ व्यय, असमंजस स्थिरता का वातावरण, हीन भावना की उत्पत्ति हो जाएगी।
तुला राशि :- अधिकारियों का समर्थन विफल हो तथा कार्य व्यवसाय गति अनुकूल हो जाएगी।
वृश्चिक राशि :- समय की अनुकूलता से लाभान्वित हो, पूर्ण कार्य हो जाने से कार्य कुशल अनुकूल बनें।
धनु राशि :- व्यवसाय गति उत्तम, भाग्य का सितारा साथ देगा, बिगड़े हुए कार्य अवश्य बन जाएगे।
मकर राशि :- स्त्री वर्ग से हर्ष उल्लास स्वास्थ्य नरम रहेगा, स्थितियों में सुधार होवेगा, खुशी मिलेगी।
कुंभ राशि :- स्त्री शरीर सुख मानसिक बैचेनी से बचिए कार्य गति में अनुकूलता अवश्य बनेगी।
मीन राशि :- धन लाभ होगा, आशानुकूल सफलता का हर्ष बिगड़े हुए कार्य अवश्य ही बन जाएंगे।
07 या 08 दिसंबर कब मनाई जाएगी संकष्टी चतुर्थी? उज्जैन के आचार्य से जानें सही तिथि और गजानन को प्रसन्न करने के उपाय
7 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में हर तिथि हर वार का अत्यधिक महत्व शास्त्रों में बताया गया है. इन्हीं तिथियों में से पौष माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का खास महत्व है. क्योंकि इस दिन संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है. भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता का दर्जा प्राप्त है. इसलिए हर एक माह की चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित होती है.
मान्यता है कि यह व्रत दुखों और संकटों को दूर करने वाला माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से गणेश जी की पूजा करने से भक्तों के जीवन से सभी बाधाएं दूर होती हैं और सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है. आइए उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज से जानते हैं कि साल 2025 की आख़री दिसम्बर माह की संकष्टी चतुर्थी कब है, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि क्या है.
पंचांग के अनुसार पौष माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 7 दिसंबर 2025 को शाम 6.24 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 8 दिसंबर 2025 को शाम 4.03 पर इसका समापन होगा. वहीं आपको बता दें, गणाधिप संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र दर्शन करने का विधान है. इसके लिए 7 नवंबर को गणाधिप संकष्टी चतुर्थी मनाई जाएगी. इस दिन चंद्र दर्शन का समय संध्याकाल 7 बजकर 55 मिनट पर है.
चंद्र दोष मिलती है मुक्ति?
इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होगी. इसके साथ ही सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है. साथ ही जिन लोगों की कुंडली में चंद्र दोष है, उनका चंद्र दोष दूर होता है. इसलिए इस दिन व्रत रखने का विशेष महत्व शास्त्रों मे बताया गया है.
जरूर करें यह उपाय बनेंगे बिगड़े काम
संकष्ठी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की विधि विधान से पूजा करें. इसके बाद मोदक और दूर्वा अर्पित करें. इसके बाद गणेश चालीसा का पाठ करने के साथ मंत्रों का जाप करें. मान्यता है कि ऐसा करने से व्यक्ति पर भगवान गणेश की कृपा होती है. इसके अलावा कुंड़ली में बुध ग्रह मजबूत होता है और भगवान गणेश सभी कस्टो को हरते हैं.
सफला एकादशी कब है? शोभन योग में होगी पूजा, जानें तारीख, मुहूर्त, पारण समय
7 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सफला एकादशी का व्रत पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है. सफला एकादशी के दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और व्रत कथा सुनते हैं. इस बार सफला एकादशी के दिन शोभन योग बन रहा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सफला एकादशी का व्रत रखने से कार्य सफल होते हैं. विष्णु कृपा से पाप मिटते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है. पंचांग से जानते हैं कि सफला एकादशी कब है? सफला एकादशी का मुहूर्त और पारण समय क्या है?
सफला एकादशी की तारीख
दृक पंचांग के अनुसार, सफला एकादशी के लिए आवश्यक पौष कृष्ण एकादशी तिथि 14 दिसंबर को शाम 6 बजकर 49 मिनट से प्रारंभ होगी. इस तिथि का समापन 15 दिसंबर को रात 9 बजकर 19 मिनट पर होगा. उदयातिथि के आधार पर सफला एकादशी का व्रत 15 दिसंबर सोमवार को है.
सफला एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त 05:17 ए एम से 06:12 ए एम तक है. इस समय में आप स्नान कर सकते हैं. उस दिन का शुभ समय यानि अभिजीत मुहूर्त 11:56 ए एम से दोपहर 12:37 पी एम तक है. जो लोग सफला एकादशी का व्रत रखेंगे, वे भगवान विष्णु की पूजा अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त में सुबह 07:06 ए एम से 08:24 ए एम के बीच कर सकते हैं.
इसके बाद पूजा का दूसरा शुभ-उत्तम मुहूर्त सुबह 09:41 ए एम से सुबह 10:59 ए एम तक है. इन दो शुभ समय में आप पूजा कर लें. उस दिन का राहुकाल सुबह 08:24 ए एम से 09:41 ए एम तक है. इस समय में कोई शुभ कार्य न करें.
शोभन योग में सफला एकादशी
15 दिसंबर को सफला एकादशी के दिन शोभन योग बन रहा है. शोभन योग प्रात:काल से लेकर दोपहर 12:30 पी एम तक है. उसके बाद से अतिगण्ड योग बनेगा. वहीं एकादशी पर चित्रा नक्षत्र प्रात:काल से सुबह 11:08 ए एम तक है, उसके बाद से स्वाति नक्षत्र है.
सफला एकादशी का पारण समय
यदि आप सफला एकादशी का व्रत रखते हैं, तो व्रत का पारण 16 दिसंबर दिन मंगलवार को है. पारण सुबह में 07 बजकर 07 मिनट से सुबह 09 बजकर 11 मिनट के बीच किया जा सकता है. पारण के दिन द्वादशी तिथि का समापन रात में 11:57 पी एम पर होगा.
लड़कों का कान छिदवाना शुभ या अशुभ, राहु-केतु से क्या है संबंध, जानें किस्मत पर इसका प्रभाव
7 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में लड़का हो या लड़की, कान छिदवाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. बताया जाता है कि पहले जिन लड़कों के कान नहीं छिदे होते थे, उनको अंतिम संस्कार नहीं करने दिया जाता था. लेकिन समय बदलता गया और अब केवल लड़कियों के ही कान छेदे जाते हैं. लेकिन अब कान छिदवाना एक फैशल सिंबल बन गया है, जो लड़कियों के साथ-साथ लड़कों में भी काफी लोक प्रिय है. लेकिन क्या आपको पता है कि कान छिदवाने का संबंध ज्योतिष से भी है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, लड़के अगर कान छिदवाते हैं तो इसका असर उनकी किस्मत पर भी पड़ता है और राहु-केतु के अशुभ प्रभाव से मुक्ति भी मिलती है.
भारतीय संस्कृति में कान छिदवाना
भारतीय संस्कृति में लड़कों का दायां कान तो लड़कियों के दोनों कान छेदा जाता है. कान छिदवाने की परंपरा को कर्णवेध संस्कार बोला जाता है, यह सोलह संस्कारों में से नौंवा संस्कार है, जो बच्चे के जन्म के 6 महीने बाद करवाया जाता है. आज के दौर में कान छिदवाना फैशन सिंबल भी बन गया है और यह फैशन लड़कियों के साथ-साथ लड़कों में भी काफी देखने को मिल रहा है. आज कल आपने कई लड़कों को कान में पियर्सिंग करवाते हुए देखा होगा. हालांकि लड़कों का कान में पियर्सिंग करवाना मेंटल हेल्थ के लिए अच्छा माना जाता है. काने छिदवाने का ना केवल ज्योतिष फायदा बल्कि इसके कई वैज्ञानिक कारण भी है.
ज्योतिष में लड़कों का कान छिदवाना
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, लड़के या लड़की के कान में छेद होना राहु और केतु के नकारात्मक प्रभाव को कम करता है. इसलिए कई ज्योतिष कान में सोना पहनने की सलाह देते हैं. आपने देखा होगा कि प्राचीन समय में ऋषि-मुनि, देवता और भगवान भी अपने कान में कुंडल पहनते थे क्योंकि उनको पता था कि यह संस्कार मानसिक विकास के लिए जरूरी है. लेकिन समय के साथ कान छिदवाना एक फैशन बन गया और लड़कियों तक सीमित कर दिया. हालांकि फैशन के दौर में बहुत से लड़के अब कान छिदवाना शुरू कर दिया लेकिन अगर यह काम बचपन में ही हो जाता तो उनको इसका पूरा लाभ मिल पाता.
इस शुभ दिन में ही करवाएं कान में पियर्सिंग
कान की पियर्सिंग शरीर की आंतरिक ऊर्जा को जगाता है और आपके आज्ञा चक्र यानी तीसरे नेत्र को सक्रिय भी करता है, जिससे आपको ध्यान लगाने में भी मदद मिलती है. साथ ही कान में पियर्सिंग करवाने से जीवन में आर्थिक समृद्धि आने लगती है. वहीं कान की पियर्सिंग करवाने के लिए शुभ दिनों का भी विशेष महत्व है. वैदिक ज्योतिष के अनुसार, कान छिदवाने के लिए पुष्य, रोहिणी और हस्त नक्षत्र के दिन करवाना शुभ होता है. वहीं ग्रहण काल या राहुकाल में ऐसा करना अशुभ माना गया है क्योंकि इन काल में करवाई गई पियर्सिंग और छेद शुभ प्रभाव नहीं देते हैं.
कान छिदवाने वैज्ञानिक लाभ
कान छिदवाने के केवल ज्योतिष ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक फायदे भी हैं. कान में पियर्सिंग करवाने से मेंटल हेल्थ अच्छी रहती है और हमारी शरीर की ऊर्जा भी सक्रिय रहती है. साथ ही सुनने की शक्ति, आंखों की रोशनी और मस्तिष्क का विकास होता है. लड़का या लड़की जब कान छिदवाते हैं तब मस्तिष्क के हिस्से सक्रिय हो जाते हैं और दिमागी शक्ति में भी वृद्धि होती है. कान के छिदने से दिमाग की नसों का दवाब कम हो जाता है. लकवा, दिमाग सुन्न होना, अस्थमा और टीबी जैसी समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है.
2 हजार साल से भी पुराना है मीनाक्षी देवी का यह भव्य मंदिर, बेहद रहस्यमयी रूप में विराजमान हैं माता
7 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारत के कोने-कोने में ऐसे मंदिर स्थित हैं, जिन्हें देखकर मुंह से बरबस निकल पड़ता है अद्भुत, अकल्पनीय, अति सुंदर. तमिलनाडु के मदुरै में स्थित श्री मीनाक्षी अम्मन मंदिर भी कुछ ऐसा ही है. 2 हजार साल से भी पुराने मंदिर में माता पार्वती का रहस्यमयी रूप देखने को मिलता है. श्री मीनाक्षी अम्मन मंदिर कोई साधारण मंदिर नहीं है, यह जीता-जागता इतिहास है, प्रेम का महाकाव्य है और द्रविड़ वास्तुकला का मुकुट है. मंदिर में साल भर बड़ी संख्या में भक्त माता पार्वतीके दर्शन को आते हैं. तमिलनाडु पर्यटन विभाग के ऑफिशियल वेबसाइट पर मीनाक्षी अम्मन मंदिर के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है.
14वीं सदी में भव्य रूप दिया गया
तमिलनाडु के साथ ही देश के मुख्य मंदिरों में श्री मीनाक्षी अम्मन मंदिर की गिनती होती है. यह मंदिर देवी मीनाक्षी और भगवान सुन्दरेश्वर (शिव) को समर्पित है और 2000 साल से भी अधिक पुराना माना जाता है. धार्मिक पुस्तकों में इसका जिक्र मिलता है. मान्यता है कि मदुरै यात्रा के दौरान देवराज इंद्र को यहां एक स्वयंभू शिवलिंग मिला था, जिसे उन्होंने स्थापित किया था. साल 1310 में यह मंदिर पूरी तरह नष्ट हो गया था, लेकिन 14वीं सदी में इसे फिर से भव्य रूप दिया गया.
मंदिर में 1000 खंभों वाला एक हॉल
मंदिर में 1000 खंभों वाला एक हॉल है, जिसमें कुछ खंभे छूने पर संगीत की ध्वनि निकालते हैं, जिन्हें म्यूजिकल पिलर भी कहा जाता है. मंदिर परिसर के बीच में एक बड़ा पवित्र तालाब है और दीवारों पर सुंदर चित्र बने हैं, जो भगवान शिव की 64 लीलाओं की कहानियों का वर्णन करते हैं. मीनाक्षी देवी की आंखें मीन के समान हैं. मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसके 14 विशाल गोपुरम (टावर) हैं, जो लगभग 50 मीटर ऊंचे हैं और इन पर हजारों रंग-बिरंगी मूर्तियां उकेरी गई हैं.
देवी मीनाक्षी और सुन्दरेश्वर का दिव्य विवाह
हर साल अप्रैल-मई में चिथिरई ब्रह्मोत्सव में देवी मीनाक्षी और सुन्दरेश्वर का दिव्य विवाह का आयोजन होता है, जिसे देखने के लिए प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में आते हैं. नवरात्रि, अवनी मूलम और मासी मंडला जैसे त्योहार भी धूमधाम से मनाए जाते हैं. मंदिर में एक म्यूजियम भी है जिसमें पुरानी मूर्तियां, सिक्के, चित्र और शक्ति के आठ रूपों की मूर्तियां भी रखी हैं. अब सवाल है कि मंदिर कैसे पहुंचे, तो मदुरै एयरपोर्ट पहुंचने के बाद मीनाक्षी मंदिर के लिए आप टैक्सी या कैब बुक कर सकते हैं. वहीं, मदुरै रेलवे स्टेशन सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (07 दिसंबर 2025)
7 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- भाग्य का सितारा साथ देगा, बिगड़े कार्य बनेंगे, योजनापूर्ण अवश्य होगी।
वृष राशि :- नवीन मैत्री मंत्रणा सफल होगा, संवेदनशील होने से बचिएगा, समय को समझकर कार्य बना लें।
मिथुन राशि :- स्त्री वर्ग से हर्ष उल्लास, कुछ चिंता बनेगी, व्यावसायिक कार्य अवरोध होगा, हीनभाव बनेंगे।
कर्क राशि :- व्यग्रता तथा मन उद्विघ्न रखें, कार्यगति मंद होवे, कार्य बनेंगे, स्थति का ध्यान रखें।
सिंह राशि :- साधन संपन्नता के योग बनेंगे, दैनिक व्यवसाय गति अनुकूल बनेगी, हानि होगी।
कन्या राशि :- विरोधी परेशान करें, व्यर्थ धन का व्यय असमंजस अस्थिरता बनी रहेगी।
तुला राशि :- कार्य व्यवसाय में बाधा तथा तनाव क्लेश से आप बचने का प्रयास करें।
वृश्चिक राशि :- चिंता बनी रहेगी, कुटुम्ब की समस्याओं को समझदारी से निपटाने का प्रयास करें।
धनु राशि :- बिगड़े हुए कार्य बनने से सफलता के योग बनेंगे, सहयोग प्राप्त होने के आसार बनेंगे।
मकर राशि :- स्थति में सुधार कार्य कुशलता से संतोष होवेगा, बिगड़े कार्य अवश्य बनेंगे।
कुंभ राशि :- स्वास्थ्य नरम गरम एवं कहीं तनावपूर्ण कष्टप्रद होवेगी तथा कार्य अवरोध होगा।
मीन राशि :- दूसरों के कार्यो में समय और धन नष्ट न करें, समय व स्थिति का ध्यान रखें।
क्या हनुमान चालीसा सच में घटा सकती है मंगल दोष का प्रभाव? जानिए कैसे करें पाठ
6 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हर व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कई बार ये कठिनाइयां ग्रहों की स्थिति के कारण होती हैं. उनमें से एक महत्वपूर्ण दोष है मंगल दोष. जब किसी की कुंडली में मंगल ग्रह पहले, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में स्थित होता है, तो इसे मंगल दोष कहा जाता है. इसे सामान्य भाषा में मांगलिक दोष भी कहा जाता है. मंगल ग्रह अग्नि तत्व का प्रतिनिधि है और इसकी ऊर्जा तेज, सक्रिय और कभी-कभी उग्र होती है. इसका प्रभाव व्यक्ति के स्वभाव, निर्णय लेने की क्षमता और जीवन की दिशा पर पड़ता है. अक्सर लोग सोचते हैं कि क्या हनुमान चालीसा का पाठ करने मात्र से इस दोष से मुक्ति मिल सकती है. हनुमान जी, जो शक्ति, धैर्य और साहस के प्रतीक हैं, की उपासना करने से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. यह न केवल मंगल दोष के प्रभाव को कम करता है, बल्कि जीवन में संतुलन, मानसिक स्थिरता और आत्मविश्वास भी लाता है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
1. मंगल दोष क्या है?
मंगल दोष तब उत्पन्न होता है जब कुंडली में मंगल ग्रह पांच संवेदनशील भावों में से किसी एक में बैठा हो. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मंगल ग्रह की तीन श्रेणियां होती हैं:
सौम्य मंगल: यह प्रकार हानिरहित होता है और इसके नकारात्मक प्रभाव न्यूनतम होते हैं.
मध्यम मंगल: इसका असर व्यक्ति पर हल्का होता है और सामान्यतः 28 वर्ष की आयु के बाद कम हो जाता है.
कड़क मंगल: यह गंभीर दोष उत्पन्न करता है और विवाह या महत्वपूर्ण जीवन निर्णयों में सावधानी की आवश्यकता होती है.
मंगल दोष का प्रभाव व्यक्ति के स्वभाव और जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग ढंग से दिखाई देता है.
2. मंगल दोष के प्रभाव
ज्योतिष अनुसार, मंगल दोष से प्रभावित व्यक्ति में कुछ विशेष लक्षण दिखाई दे सकते हैं.
पहले भाव में मंगल: व्यक्ति में साहस, आक्रामकता और आवेगपूर्ण स्वभाव बढ़ता है.
चौथे भाव में मंगल: क्रोध, असंतोष और जिद्दी स्वभाव दिखाई देता है.
सातवें भाव में मंगल: विवाह और साझेदारी संबंधों में बाधाएं आती हैं.
आठवें भाव में मंगल: अहंकार, हठ और जोखिम भरे निर्णय लेने की प्रवृत्ति बढ़ती है.
बारहवें भाव में मंगल: मानसिक बेचैनी, संघर्ष और असमझ निर्णय लेने की संभावना रहती है.
हालांकि, इन प्रभावों की तीव्रता अन्य ग्रहों की स्थिति और उनकी दृष्टि पर निर्भर करती है. यदि मंगल मजबूत और शुभ है, तो व्यक्ति को साहस, नेतृत्व क्षमता और ऊर्जा मिलती है, जबकि अशुभ मंगल जीवन में कठिनाइयां और संघर्ष उत्पन्न करता है.
3. मंगल से जुड़े देवता
मंगलवार को भगवान हनुमान और मंगल देव की विशेष पूजा की जाती है. मंगल ग्रह पर मंगल देव का अधिकार होता है, और उनकी पूजा करने से मंगल दोष से राहत मिल सकती है. भारत के विभिन्न मंदिरों में, जैसे उज्जैन के मंगलनाथ मंदिर, मंगल देव की पूजा की जाती है. हनुमान जी की उपासना भी विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है, क्योंकि वे शक्ति, अनुशासन और मानसिक स्थिरता का स्रोत हैं.
शनि दोष से मुक्ति के लिए करें दीपक का यह आसान उपाय, शनि कृपा से दूर होगी नकारात्मकता
6 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पौष माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि 6 दिसंबर शनिवार को पड़ रही है. इस दिन सूर्य वृश्चिक में और चंद्रमा मिथुन राशि में रहेंगे. इस दिन कोई विशेष पर्व नहीं है, लेकिन वार के हिसाब से आप शनिवार का व्रत रख सकते हैं. इस दिन दीपक का उपाय करने से शनि दोष से मुक्ति पा सकते हैं और शनि कृपा से जीवन की नकारात्मकता भी दूर होगी.
द्रिक पंचांग के अनुसार, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 51 मिनट से शुरु होकर दोपहर 12 बजकर 33 मिनट तक रहेगा और राहुकाल का समय सुबह 9 बजकर 36 मिनट से शुरू होकर 10 बजकर 54 मिनट तक रहेगा.
शनिवार को दीपक का उपाय
मान्यता है कि शनिदेव का वास पीपल के पेड़ पर होता है. अगर आपके घर के आसपास शनिदेव का मंदिर न हो, तो आप पीपल के पेड़ पर दीया जला सकते हैं. यदि किसी कारणवश जातक व्रत या पूजा नहीं कर सकते, तो हर शनिवार सरसों के तेल का दीया या फिर छाया दान (सरसों के तेल का दान) जरूर करें. इससे नकारात्मकता दूर होती है और शनिदेव की विशेष कृपा प्राप्त होती है, लेकिन शनिदेव की पूजा के समय उनसे नजरें न मिलाएं. ऐसा करने से शनिदेव का प्रकोप पड़ता है.
शनिदेव की पूजा विधि
शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें. फिर मंदिर या पूजा स्थल को साफ करें. इसके बाद शनिदेव की प्रतिमा को जल से स्नान कराएं. उन्हें गुड़, काले वस्त्र, काले तिल, काली उड़द की दाल और सरसों का तेल अर्पित करें और उनके सामने सरसों के तेल का दीया भी जलाएं. इसके बाद शनि चालीसा और कथा का पाठ भी करें. पूजा के दौरान शनिदेव को पूरी और काले उड़द दाल की खिचड़ी का भोग लगाएं और आरती करें.
7 शनिवार व्रत के फायदे
पौराणिक धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि शनिवार का व्रत रखने या शनिदेव की विधि-विधान से पूजा करने मात्र से जातक को शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से मुक्ति प्राप्त होती है. शनिवार का व्रत किसी भी शुक्ल पक्ष के पहले शनिवार से आप शुरु कर सकते हैं और 7 शनिवार व्रत रखने से शनि के प्रकोप से मुक्ति मिलती है और हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है.
60 या 100 भोग नहीं? जानें क्यों सिर्फ 56 भोग ही चढ़ते हैं भगवान को, कहां से आई ये अनोखी परंपरा
6 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हमारे देश में पूजा-पाठ सिर्फ एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि भावनाओं से भरा अपना घर जैसा माहौल है. यहां भक्त भगवान को सिर्फ याद नहीं करते, उन्हें अपने परिवार के सदस्य की तरह मानकर सेवा करते हैं. इसी भाव से भोग चढ़ाने की परंपरा जुड़ी हुई है. रोजमर्रा के भोजन से लेकर बड़े त्योहारों तक, भगवान को अलग-अलग पकवान चढ़ाना हमारे जीवन का हिस्सा रहा है. लेकिन इन सब में सबसे खास नाम एक ही है छप्पन भोग. अक्सर लोग पूछते हैं कि आखिर भगवान को 56 ही भोग क्यों लगाए जाते हैं? कोई और संख्या क्यों नहीं? इस सवाल का जवाब सिर्फ स्वाद या परंपरा तक सीमित नहीं, बल्कि एक बेहद दिलचस्प कथा से जुड़ा है, जिसमें प्रेम, समर्पण और सम्मान की गहराई छिपी है. कृष्ण और गोकुलवासियों के बीच का यह प्रसंग न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि बताता है कि हमारी संस्कृति में भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि श्रद्धा का सबसे सरल और सुंदर रूप है. यही कारण है कि आज भी बड़े त्योहारों जैसे जन्माष्टमी, अन्नकूट या विशेष उत्सवों पर मंदिरों में 56 भोग लगाना एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है.
1. भोग लगाने की परंपरा
भारत में भगवान को भोग लगाना सबसे सामान्य और प्यारी परंपराओं में से एक है. लोग पूजा के दौरान फल, मिठाई, पका हुआ खाना या घर में बने साधारण व्यंजन भगवान को अर्पित करते हैं. कई परिवार रोज सुबह या शाम की पूजा में भोग रखते हैं, जबकि कई लोग विशेष शुभ दिनों पर ही इसे करते हैं. यही वजह है कि भोग सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि प्रेम और सम्मान का रूप माना जाता है.
2. भगवान को 56 ही भोग क्यों, 60 या 100 क्यों नहीं?
छप्पन यानी 56 का अर्थ सिर्फ संख्या भर नहीं है. यह संख्या भगवान को अर्पित किए जाने वाले अलग-अलग 56 पकवानों का प्रतीक है. लेकिन सवाल यही है कि आखिर 56 ही क्यों? क्या वजह है कि यह संख्या बदलती नहीं? इसका जवाब उस कथा में छिपा है जिसमें कृष्ण ने सात दिन तक भूखे रहकर अपने भक्तों की रक्षा की थी. इस घटना के बाद गोकुलवासियों ने भगवान के प्रति अपने प्रेम को दर्शाने के लिए एक ऐसी परंपरा शुरू की, जो आज भी उसी भाव से निभाई जाती है.
3. इंद्र और गोवर्धन से जुड़ी कथा
कहानी के अनुसार, गोकुलवासी हर वर्ष इंद्र की पूजा करते थे ताकि बारिश और खेती अच्छी हो सके. पर बालकृष्ण ने उन्हें समझाया कि असली सहारा गोवर्धन पर्वत है, क्योंकि वही बादलों को रोककर बारिश और अनाज का आधार बनता है. गोकुलवासियों ने कृष्ण की बात मान ली, जिससे इंद्र नाराज़ हो गए.
इंद्र ने गोकुल पर लगातार सात दिन और सात रात भारी बारिश बरसाई. इस संकट से बचाने के लिए कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और पूरे गांव को आश्रय दे दिया. इतने दिनों तक कृष्ण ने भोजन नहीं किया. यह देखकर गोकुलवासियों को अपनी गलती महसूस हुई और उन्हें लगा कि कृष्ण की भूख का सम्मान करना चाहिए. इसलिए उन्होंने निर्णय लिया कि एक दिन के भोजन के मुकाबले आठ गुना अधिक व्यंजन उन्हें अर्पित किए जाएं.
4. 56 की संख्या कैसे बनी?
कथा के अनुसार, कृष्ण दिन में एक बार भोजन करते थे. गोकुलवासियों ने तय किया कि वे उन्हें आठ गुना भोजन अर्पित करेंगे. चूंकि कृष्ण ने लगातार सात दिन तक कुछ नहीं खाया:
8 (गुना) × 7 (दिन) = 56
यही गणना छप्पन भोग की परंपरा की जड़ मानी जाती है. इसलिए भक्त भगवान को 56 प्रकार के व्यंजन अर्पित करते हैं मिठाई, अनाज, पेय, नमकीन, फल, दालें, सब कुछ.
5. 56 भोग का महत्व
छप्पन भोग सिर्फ व्यंजनों का समूह नहीं है. यह उस भावना का प्रतीक है जिसमें भक्त भगवान को अपना परिवार मानकर उनका सम्मान करते हैं. इसमें शामिल प्रत्येक पकवान कृष्ण की पसंद और उनके जीवन से जुड़े स्वादों का प्रतिनिधित्व करता है. इस भोग को समर्पण, प्रेम और कृतज्ञता का एक सुंदर रूप माना जाता है. कई मंदिरों और घरों में इसे बड़े उत्साह, संगीत और भक्ति के साथ चढ़ाया जाता है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (06 दिसंबर 2025)
6 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- बैचेनी उद्विघ्नता से बचिए समय पर सोचे हुए कार्य अवश्य ही बनेंगे, समय का ध्यान दें।
वृष राशि :- चिंताएं कम होंगी, सफलता के साधन जुटायें, व्यावसायिक क्षमता में वृद्धि अवश्य ही होगी, कष्ट होगा।
मिथुन राशि :- सफलता के साधन जुटाये, व्यावसायिक क्षमताओं में वृद्धि अवश्य बनेंगी, कार्य व्यवसाय अवश्य बढ़े।
कर्क राशि :- व्यथ धन का व्यय समय व शन्ति नष्ट होवेगी, विघटनकारी तत्व परेशान करेंगे, ध्यान रखें।
सिंह राशि :- भोग एश्वर्य से स्वास्थ्य नरम रहेगा, विरोधी वर्ग आपको अवश्य ही परेशान करेंगे, ध्यान रखे।
कन्या राशि :- समय ठीक नहीं सोचकर चले, समय व धन नष्ट होवे, क्लेश व अशांति, यात्रा से कष्ट होगा।
तुला राशि :- परिश्रम से सफलता के साधन जुटायें कार्य में बाधा उत्पन्न होने से कार्य रुकेंगे।
वृश्चिक राशि :- चोट आदि से बचिए, भाग्य का सितारा बड़ा ही प्रबल होगा, समय सीमा का ध्यान रखे।
धनु राशि :- क्लेश व अशांति से बचिए भाग्य का सितारा बड़ा ही प्रबल होवेगा, चोट चपेट से बचकर चले।
मकर राशि :- परिश्रम विफल होगा, चिंता व यात्रा व्यग्रता तथा स्वास्थ्य नरम गरम रहेगा।
कुंभ राशि :- आकस्मिक घटनाओं से कष्ट चोट आदि का भय होगा, ध्यान रखकर कार्य करें।
मीन राशि :- अधिकारियों से कष्ट मित्र सहायक न होवे, समय का ध्यान रखकर कार्य अवश्य करें।
इस दिन से लग जाएगा खरमास, एक महीने नहीं होंगे शुभ काम...नये साल में बजेगी शहनाई, होगा गृहप्रवेश, जनेऊ, मुंडन!
5 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में खरमास का खास महत्व है. इस साल यह अवधि 16 दिसंबर 2025 से शुरू हो रही है जो 15 जनवरी 2026 तक रहेगी. इस दौरान किसी भी तरह के शुभ काम करने पर रोक लगायी जाती है. शास्त्रों के अनुसार इस अवधि में शुभ काम करने से बचना चाहिए. इस समय में किसी तरह की शादी-विवाह या फिर उपनयन, गृह प्रवेश या गृह आरंभ जैसे शुभ काम नहीं किए जाते हैं.
कोई भी अच्छा काम, कोई भी बड़ी खरीदारी इस दौरान अच्छी नहीं मानी जाती. ऐसा शास्त्र के विद्वानों का कहना है. इस पर जानकारी देते हुए कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के उत्तर ज्योतिष विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. कुणाल कुमार झा ने क्या जानकारी दी, जानते हैं.
खरमास की अवधि
खरमास की अवधि 16 दिसंबर 2025 से 15 जनवरी 2026 तक रहेगी. इस दौरान किसी भी तरह के शुभ काम नहीं किए जाएंगे, जैसे विवाह, उपनयन, दुरागमन, गृह प्रारंभ, गृह प्रवेश आदि. लोग इस दौरान कोई भी अच्छा काम नहीं करते और इन दिनों के खत्म होने का इंतजार करते हैं.
शुभ काम क्यों नहीं किए जाते?
शास्त्रों के अनुसार खरमास की अवधि में शुभ काम करने से बचना चाहिए. इस समय किए गए शुभ काम का फल नहीं मिलता है और इससे जीवन में परेशानियां आ सकती हैं. यही वजह है कि शास्त्रों में इस महीने में किसी भी तरह का शुभ काम करना रोक दिया जाता है. तो अब 16 दिसंबर 2025 से लेकर 15 जनवरी 2026 तक सभी तरह के मांगलिक कामों पर रोक लग गई है. फिर इस अवधि के खत्म होते ही सभी तरह के शुभ काम शुभ लगन के आधार पर शुरू होंगे. लोग मुर्हूत निकलवाकर फिर शुभ काम करेंगे.
कब से शुरू होंगे शुभ काम?
खरमास की अवधि 16 जनवरी 2026 तक रहेगी. इसके बाद 16 जनवरी 2026 से शुभ काम शुरू किए जा सकते हैं. माघ गुप्त नवरात्रि 19 जनवरी से शुरू होगी, लेकिन अशुद्ध समय 27 जनवरी तक रहेगा. 28 जनवरी के बाद शुद्ध आरंभ होगी, जिसके बाद विवाह आदि शुभ काम शुरू होंगे.
भगवान विष्णु का एक ऐसा मंदिर जो शादीशुदा लोगों के लिए खोल देता है सौभाग्य के द्वार, जानें त्रियुगीनारायण धाम की चमत्कारी मान्यता
5 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारत में मंदिर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं होते, बल्कि आस्था, इतिहास, रहस्य और चमत्कारों की जीवंत पहचान होते हैं. हर राज्य में आपको ऐसे अनोखे मंदिर मिलेंगे जिनसे जुड़ी मान्यताएं लोगों के जीवन को गहराई से प्रभावित करती हैं. इन्हीं पवित्र स्थानों में से एक ऐसा मंदिर भी है जिसे शादीशुदा जोड़ों के लिए बेहद शुभ माना जाता है. कहा जाता है कि इस मंदिर में दर्शन करने वाला हर विवाहित जोड़ा अपने जीवन में सौभाग्य, स्थिरता और खुशहाली महसूस करता है. सिर्फ इतना ही नहीं, नवविवाहित दंपति यहां आकर अपने रिश्ते को और ज्यादा मजबूत बनाने की कामना करते हैं. आजकल सोशल मीडिया पर भी यह मंदिर काफी ट्रेंड में है क्योंकि इसकी मान्यता बेहद अनोखी और दिव्य है. हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड के प्रसिद्ध त्रियुगीनारायण मंदिर की, जहां सदियों से एक अखंड धूनी जल रही है और माना जाता है कि इस धूनी के सामने भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था. यही कारण है कि यह मंदिर शादीशुदा लोगों के लिए भाग्य का दरवाजा खोलने वाला स्थान कहा जाता है.
कहां स्थित है त्रियुगीनारायण मंदिर?
त्रियुगीनारायण मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है और यह सिर्फ भगवान विष्णु का पवित्र स्थान ही नहीं, बल्कि एक ऐसा स्थल है जिसका संबंध सीधे शिव और पार्वती के दिव्य विवाह से जुड़ा हुआ है. इस मंदिर को वह वास्तविक विवाह स्थल माना जाता है जहां सतयुग में भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया था.
मंदिर की बनावट बेहद पुरानी और अनोखी है. यहां आने वाले भक्त सिर्फ भगवान विष्णु के दर्शन नहीं करते बल्कि उस दिव्य ऊर्जा को महसूस करते हैं जो हजारों साल बाद भी इस स्थान को पवित्र बनाए हुए है.
त्रियुगीनारायण नाम क्यों पड़ा?
त्रियुगीनारायण शब्द तीन भागों से मिलकर बना है
-त्रि = तीन
-युगी = युग
-नारायण = भगवान विष्णु
इसका अर्थ है “तीनों युगों से नारायण का पवित्र स्थान”
यह मंदिर इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि यहां सदियों से एक अखंड धूनी जल रही है. माना जाता है कि यही वह पवित्र अग्नि है जिसमें शिव-पार्वती के विवाह की रस्में पूरी हुई थीं और यह धूनी आज भी बिना रुके जल रही है.
अखंड धूनी की मान्यता: सौभाग्य और अटूट रिश्ता
मंदिर के सामने जो हवन कुंड है उसे शिव-पार्वती के असली विवाह का अग्नि कुंड माना जाता है. इसी कुंड से उठने वाली पवित्र अग्नि की धूनी को वैवाहिक जीवन की मजबूती का प्रतीक माना जाता है.
मान्यता है कि
-इस धूनी की राख को प्रसाद के रूप में घर लाने से शादीशुदा जीवन में स्थिरता आती है
-पति-पत्नी के बीच का बंधन और मजबूत होता है
-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है
-जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं
-इस वजह से विवाहित जोड़े और नवविवाहित दंपति खास तौर पर इस मंदिर में आते हैं.
विवाह समारोहों के लिए भी प्रसिद्ध
आज भी कई जोड़े अपने विवाह या विवाहोपरांत रस्में यहां कराते हैं क्योंकि माना जाता है कि इस दिव्य स्थान पर किया गया विवाह या पूजा रिश्ते को जन्म-जन्मांतर तक अटूट बनाती है.
इस विवाह में भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई के रूप में सभी रस्में निभाई थीं जबकि ब्रह्मा जी पुरोहित बने थे. इस दिव्य कथा को सुनकर लोग और भी ज्यादा आस्था से यहां आते हैं.
मंदिर परिसर के पवित्र जल कुंड
त्रियुगीनारायण मंदिर में चार प्रमुख पवित्र कुंड हैं
-रुद्रकुंड
-विष्णुकुंड
-ब्रह्मकुंड
-सरस्वतीकुंड
मान्यता के अनुसार विवाह से पहले सभी देवताओं ने इन कुंडों में स्नान किया था. इसलिए इन जल कुंडों को पवित्रता और सौभाग्य का स्रोत माना जाता है.
भक्त इन कुंडों के जल को विवाह संबंधी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए उपयोग करते हैं.
क्यों माना जाता है यह मंदिर शादीशुदा लोगों के लिए चमत्कारी?
त्रियुगीनारायण मंदिर को दंपतियों के लिए बेहद शुभ इसलिए माना जाता है क्योंकि
यहां शिव-पार्वती का विवाह हुआ था
-तीन युगों से जल रही धूनी को पवित्रता और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है
-यहां की राख को वैवाहिक सुख का वरदान माना जाता है
-मंदिर में पूजा करने से रिश्ते में मिठास और स्थिरता आती है
-कई जोड़े बताते हैं कि इस मंदिर में दर्शन करने के बाद उनके वैवाहिक जीवन में शांति, समझ और खुशहाली बढ़ी है.
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