धर्म एवं ज्योतिष
खरमास शुरू होने के बाद क्या करें और क्या ना करें? सारे सवालों का ज्योतिषाचार्य ने दिया जवाब, आप भी जान लें
15 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म को सबसे पुराना धर्म कहा जाता है और सनातन धर्म में किसी भी कार्य को करने से पहले ग्रहों की चाल को देखकर ही शुभ कार्य किए जाते हैं. इसके लिए लोग खासतौर पर ज्योतिषाचार्य से एक शुभ मुहूर्त निकलवाते हैं. फिर गृह प्रवेश, शादी और नामकरण जैसे शुभ कार्य को करते हैं. वहीं सनातन धर्म में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, खरमास यानी मलमास को ऐसा समय माना गया है, जब शुभ कार्यों पर विराम लग जाता है. इस दौरान सूर्य देव के धनु राशि में प्रवेश करते ही यह अवधि शुरू होती है.
इस महीने में आध्यात्मिक साधना, जप-तप और दान-पुण्य का महत्व खासतौर पर बढ़ जाता है. वहीं इस बार पंचांग के मुताबिक, खरमास 16 दिसंबर से शुरू हो रहा है, जिसके बाद सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर खरमास 15 जनवरी 2026 को समाप्त होगा. दरअसल इस दौरान लगभग एक महीने तक शादियां और अन्य मांगलिक कार्यों पर रोक रहेगी और खरमास में लोगों के द्वारा दान-पुण्य का विशेष महत्व बढ़ जाएगा.
इन चीजों का दान होगा फलदायी
इस बारे में जब लोकल 18 की टीम ने अंबाला के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित दीपलाल जयपुरी से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि पंचांग के अनुसार, इस बार खरमास 16 दिसंबर से शुरू हो रहा है, जिसके बाद सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर खरमास 15 जनवरी 2026 को समाप्त होगा. उन्होंने कहा कि खरमास के दौरान अन्न दान का बहुत महत्व होता है, जिसमें गेहूं, चावल, वस्त्र दान में ऊनी कपड़े, कंबल और गुड़-तिल का दान शीतकाल में अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है.
उन्होंने बताया कि खरमास में विवाह और रिश्ते तय करने से परहेज करना होता है, क्योंकि इस अवधि में शादी या सगाई करना शास्त्रों में शुभ नहीं माना जाता है. उन्होंने बताया कि इस दौरान किए गए विवाह में तनाव या अनबन की आशंका बढ़ सकती है और गृह प्रवेश, मकान चेंज भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि नया घर लेना या गृह प्रवेश करना खरमास में ठीक नहीं माना जाता है. उन्होंने कहा कि नया व्यवसाय, बड़ा निवेश या कोई महत्वपूर्ण शुरुआत इस समय टालना चाहिए और नामकरण, मुंडन, कर्णवेध जैसे मांगलिक संस्कार भी खरमास में नहीं करना चाहिए.
खरमास के दौरान करें ये जरूरी काम
उन्होंने बताया कि मांगलिक कार्यों की शुरुआत 14 जनवरी के बाद ही संभव हो रही है, जबकि फरवरी 2026 से शुभ मुहूर्त पूरे जोर पर लौट आएंगे. उन्होंने कहा कि खरमास के दौरान पूजा-पाठ और भक्ति मंत्र जप, पाठ, कथा और सत्संग में समय देने से इस महीने में विशेष पुण्य की प्राप्ति होगी. उन्होंने बताया कि लोग इस महीने धार्मिक स्थलों की यात्रा और पवित्र नदियों में स्नान कर सकते हैं, क्योंकि खरमास में पवित्र नदियों में स्नान करना बहुत ही पुण्यकारी माना गया है.
उन्होंने बताया कि इसके साथ ही लोग कुछ उपाय भी कर सकते हैं, जो इस प्रकार है कि खरमास के दिनों में प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठना चाहिए और उगते हुए सूरज का दर्शन करते हुए तांबे के लोटे में जल और लाल चंदन लेकर अर्घ देना है. इसके बाद गायत्री मंत्र का जाप करें और इस पूरे महीने आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें. वहीं उन्होंने बताया कि अगर आप आर्थिक समस्या से जूझ रहे हैं अथवा कोर्ट-कचहरी में कोई विवाद है तो खरमास के दौरान आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ जरूर करें. इसके साथ ही सूर्य कथा का जाप करें, क्योंकि ऐसा करने से कोर्ट कचहरी के मामले में सकारात्मक परिणाम मिलेगा और आर्थिक स्थिति सुधरेगी.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (15 दिसंबर 2025)
15 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- समय विफल हो, कार्य गति में बाधा चिन्ताग्रस्त होवे, व्यर्थ भ्रमण तथा कार्य अवरोध होगा।
वृष राशि :- इष्ट मित्रों से सुख, अधिकारियों से मेल मिलाप होवे तथा रुके कार्य अवश्य ही बन जाएगे।
मिथुन राशि :- भाग्य का सितारा प्राप्त हो, बिगड़े कार्य अवश्य ही बनेंगे, समय का उपयोग अवश्य करें।
कर्क राशि :- भाग्य का सितारा प्रबल है, बिगड़े कार्य अवश्य ही बनेंगे, समय समस्याओं से घिरा है।
सिंह राशि :- इष्ट मित्र सुखवर्धक हो, कुटुम्ब की समस्याएं सुलझे तथा स्त्रीवर्ग से हर्ष अवश्य होगा।
कन्या राशि :- भावनाएं संवेदनशील रहे, कुटुम्ब में सुख तथा धन प्राप्त के साधन अवश्य बनेंगे।
तुला राशि :- समय अनुकूल नहीं, स्वास्थ्य नरम रहे तथा किसी धारणा का अनदेख अपराध होगा।
वृश्चिक राशि :- स्त्री शरीर कष्ट, मानसिक उद्विघ्नता, हानिप्रद होगी, समय का ध्यान रखें।
धनु राशि :- आशानुकूल सफलता, स्थिति में सुधार, व्यवसाय गति उत्तम अवश्य ही बनेगी।
मकर राशि :- व्यर्थ धन का व्यय, मानसिक उद्विघ्नता हानिप्रद होगी, समय का ध्यान रखे।
कुंभ राशि :- इष्ट मित्र सहयोगी, कार्य बनेंगे तथा कार्य गति अनुकूल होगी, अनुकूलता का लाभ लें।
मीन राशि :- भाग्य का सितारा प्रबल हो, बिगड़े कार्य बन जाएंगे, रुके कार्यों पर ध्यान दें।
इस तारीख को ही रखें सफला एकादशी का व्रत, 14 और 15 दिसंबर की कन्फ्यूजन यहां करें क्लियर, जानें महत्व
14 Dec, 2025 12:40 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Saphala Mahatva: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है. प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का अपना अलग धार्मिक और पौराणिक महत्व होता है. पौष मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को सफला एकादशी कहा जाता है, जिसे पौष कृष्ण एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा-अर्चना और व्रत रखने का विधान है. स्नान, दान और भक्ति भाव से की गई उपासना का इस तिथि पर विशेष फल प्राप्त होता है. मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा के साथ व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है.
15 दिसंबर को रखा जाएगा सफला एकादशी का व्रत
इस वर्ष सफला एकादशी की तिथि दो दिनों में पड़ने के कारण व्रत की सही तारीख को लेकर असमंजस बना हुआ था. पंचांग के अनुसार, पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 14 दिसंबर, रविवार को शाम 6 बजकर 50 मिनट पर आरंभ होगी और 15 दिसंबर, सोमवार की रात 9 बजकर 21 मिनट पर समाप्त होगी. उदय तिथि को मान्यता देते हुए सफला एकादशी का व्रत 15 दिसंबर, सोमवार को रखा जाएगा.
यह व्रत दशमी तिथि से प्रारंभ होकर द्वादशी तिथि तक चलता है. दशमी के दिन संयम और नियमों का पालन किया जाता है, एकादशी को उपवास रखा जाता है और द्वादशी तिथि को व्रत का पारण किया जाता है. सफला एकादशी व्रत का पारण 16 दिसंबर को सुबह 7 बजकर 7 मिनट से सुबह 9 बजकर 11 मिनट के बीच किया जा सकता है.
सफला एकादशी का क्या है महत्व
सफला शब्द का अर्थ है सफलता और समृद्धि, इसलिए यह एकादशी विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी मानी जाती है जो जीवन में प्रगति, सौभाग्य और सम्पन्नता की कामना करते हैं. इस दिन भगवान विष्णु के साथ भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने का भी विशेष महत्व है. तुलसी माता के समक्ष दीपक जलाना और दीपदान करना अत्यंत शुभ माना गया है. धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि सफला एकादशी का व्रत करने से सौ राजसूय यज्ञ और हजार अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है और भाग्य के द्वार खुल जाते हैं.
800 साल पुराना है अमृतेश्वर मंदिर, गर्भगृह में त्रिमूर्ति शिवलिंग विराजमान, उल्टी दिशा में लिखी है रामायण
14 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारत में ऐसे कई मंदिर हैं, जो सिर्फ भक्ति का ही नहीं, बल्कि कला, इतिहास और शांति का भी केंद्र हैं. कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले से मात्र 67 किमी दूर, भद्रा नदी के किनारे बसे छोटे-से गांव अमृतपुरा में चालुक्य साम्राज्य वास्तुकला का अनमोल रत्न अमृतेश्वर मंदिर है. यह मंदिर उल्टी दिशा में लिखी रामायण का गवाह है, वहीं इसके अन्य भी रहस्य चौंकाने वाले हैं.
पत्थरों पर लिखे हैं महाकाव्य
होयसल वंश ने अपने राज में इसे बनवाया था, जो अब कर्नाटक की आर्किटेक्चरल विरासत की एक पहचान बन गया है. 1196 ईस्वी में बना यह शिव मंदिर न सिर्फ भक्तों को आध्यात्मिक शांति देता है, बल्कि पर्यटकों को 800 साल पुरानी नक्काशी और पत्थरों पर लिखे महाकाव्यों की ऐसी दुनिया दिखाता है, जिसे देखते ही वे हैरत में पड़ जाते हैं.
अमृतेश्वर मंदिर का निर्माण होयसल सम्राट वीरा बल्लाल द्वितीय ने करवाया था, जो न सिर्फ भगवान शिव को समर्पित है, बल्कि उस दौर की कला, शिल्प और आध्यात्मिकता का दस्तावेज भी है. होयसल शैली में बना यह मंदिर बाहर से जितना सुंदर है, अंदर से उससे भी ज्यादा खूबसूरत है. मंदिर की बाहरी दीवारें गोलाकार डिजाइन्स और नक्काशी से ढकी हैं. सामने बंद मंडप और फिर विशाल खुला मंडप है. दोनों ही चमकदार खराद वाले स्तंभों पर टिके हैं. इन चमकीले स्तंभों को देखकर कोई विश्वास नहीं कर सकता कि ये 800 साल से ज्यादा पुराने हैं.
सबसे अनोखी बात मंदिर की बाहरी दीवारों पर बनी 140 महाकाव्य कथाएं हैं. दक्षिण की दीवार पर रामायण के 70 दृश्य एंटी क्लॉकवाइज (उल्टी दिशा में) उकेरे गए हैं, जबकि उत्तर की दीवार पर 25 पैनल भगवान कृष्ण की बाल लीलाएं और शेष 45 पैनल महाभारत की घटनाओं को सुंदर नक्काशी के माध्यम से दिखाते हैं. मानो पूरा महाकाव्य पत्थरों पर लिख दिया गया हो.
गर्भगृह में त्रिमूर्ति शिवलिंग विराजमान
जानकारी मिलती है कि होयसल कला के शिल्पकार मल्लितम्मा ने यहीं अपनी कला की शुरुआत की थी और यही मंदिर होयसल स्वर्ण युग का पहला अध्याय माना जाता है. गर्भगृह में नेपाल की कांदकी नदी से लाया गया प्राचीन त्रिमूर्ति शिवलिंग विराजमान है, बगल में मां शारदा सुशोभित हैं.
इसके साथ ही दीवारों पर शेर से लड़ता योद्धा, शिखर पर कीर्तिमुख, छोटे-छोटे टावर और गजसुर वध का दृश्य भी उत्कीर्ण है. छतों पर फूलों वाले डिजाइन और खंभों पर नक्काशी है.
शांत वातावरण, भद्रा नदी का कल-कल, और दूर तक फैली हरियाली पर्यटकों को आकर्षित करती है. मंदिर में बिल्व अर्चना और कुमकुम अर्चना विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं.
इन 4 राशियों को भूलकर भी नहीं पहनना चाहिए काला धागा, लेने के देने पड़ जाएंगे! जानें इसके नियम
14 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
शास्त्रीय और लोक–परंपरा दोनों में काला धागा पहनने को एक रक्षात्मक उपाय माना गया है. आपने बहुत से लोगों को पैर में या फिर हाथ में काला धागा पहनते हुए देखा होगा, खासतौर पर युवाओं और बच्चों के हाथ-पैर पर काला धागा बांधना आम बात हो गई है. मान्यता है कि काला धागा पहनने से नजर दोष, शनि-राहु के दुष्प्रभाव से शांति व नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं. लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर चीज हर किसी पर शुभ प्रभाव ही डालती हो. काला धागा पहनना कुछ लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है तो कुछ लोंगों के लिए नुकसानदायक. आज हम आपको उन राशियों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनको भूलकर भी काला धागा नहीं पहनना चाहिए…
नजर दोष से मिलती है राहत
काला धागा पहनने से नजर दोष से रक्षा होती है दरअसल काला रंग नकारात्मक ऊर्जा को सोखने की क्षमता रखता है. इसलिए काला धागा बुरी नजर, ईर्ष्या, अनजानी मानसिक ऊर्जा से सुरक्षा करता है. काला धागा पहनना विशेषतः बच्चों और कमजोर चंद्र वाले व्यक्तियों के लिए उपयोगी माना गया है.
ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मिलती है राहत
काला धागा पहनने से शनि-राहु जैसे ग्रहों के दुष्प्रभाव से शांति भी मिलती है. जब आप काला धागा पहनते हैं कुंडली में शनि और राहु की स्थिति मजबूत होती है और शुभ फल की प्राप्ति होती है. ज्योतिष में काला रंग मुख्यतः शनि और राहु से संबंधित होता है इसलिए शनि की बाधा, देरी और भय से मुक्ति मिलती है. वहीं राहु की भ्रम और अचानक हानि से राहत मिलती है. इन स्थितियों में काला धागा रक्षाकवच की तरह कार्य करता है.
काला धागा पनने से आत्मबल होता है मजबूत
काला धागा पहनने से स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी मिलती है. परंपरा अनुसार, काला धागा पहनने से जोड़ों का दर्द, नसों की कमजोरी और बार-बार बीमार पड़ने से राहत मिलती है. इन स्थितियों में काला धागा पहनने से ऊर्जा संतुलन रहता है. काला धागा पहनने से मानसिक सुरक्षा और आत्मबल भी मजबूत होता है. साथ ही भय से मुक्ति मिलती है और आत्मविश्वास भी बढ़ता है क्योंकि यह व्यक्ति को नकारात्मक प्रभावों से मनोवैज्ञानिक सुरक्षा देता है.
काला धागा पहनने के नियम
काला धागा हमेशा पुरुषों के राइट हैंड साइड और महिलाओं के लेफ्ट हैंड साइड पहनना चाहिए, फिर आप चाहें हाथ में पहनें या पैर में. काले धागे को शनिवार के दिन पहनना ज्यादा अच्छा माना जाता है और काला धागा पहनते समय शनि मंत्रों का जप करना चाहिए. काला धागा बच्चों के लिए कमर या टखना पर सही रहता है. धागा हमेशा साधा होना चाहिए, उसमें किसी भी तरह की गांठ नहीं होनी चाहिए. लेकिन कुंडली दिखाकर काला धागा पहनना ज्यादा अच्छा माना जाता है और हर तरह की परेशानियों से राहत भी दिलाता है.
इन राशियों को काला धागा पहनने से बचना चाहिए
काला धागा मंगल ग्रह की राशि मेष और वृश्चिक वालों को नहीं पहनना चाहिए. ज्योतिष के अनुसार, काले धागे का संबंध शनि और राहु ग्रह से होता है और इन दोनों ग्रहों के बीच शत्रुता का भाव बताया गया है इसलिए मेष और वृश्चिक राशि वाले अगर काला धागा पहनते हैं तो इसके फायदे की नकुसान होंगे.
चंद्रमा की राशि कर्क वालों को भी काला धागा पहनने से बचना चाहिए. क्योंकि ज्योतिष में चंद्रमा और शनि-राहु के बीच में शत्रुता का भाव बताया गया है. अगर कर्क राशि वाले काला धागा पहनते हैं तो कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है.
सूर्यदेव की राशि सिंह वालों को काला धागा पहनने से बचना चाहिए. काला धागा का संबंध शनि से हैं और सूर्य व शनि पिता-पुत्र होने के बाद भी शत्रुता भाव रखते हैं. इसलिए सिंह राशि वालों को काला धागा पहनने से बचना चाहिए.
600 साल से भी ज्यादा पुराने इस मंदिर में लकड़ी से बने शिवलिंग की होती है पूजा, यहां होता है लाइव चमत्कार
14 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
देवों के देव महादेव, भगवान शिव अनेक रूपों में विराजमान हैं. पूरी पृथ्वी के सृजनकर्ता और विनाशक के रूप में पूजे जाने वाले भगवान शिव को पवित्र शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है. आंध्र प्रदेश के एक प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर में आज भी लकड़ी से बने शिवलिंग की पूजा होती है. यह देश का पहला मंदिर है, जहां शिवलिंग लकड़ी का बना है. बताया जाता है कि यह मंदिर 600 साल पुराना है और इस मंदिर में दर्शन करने मात्र से सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं. शिवलिंग लकड़ी का बना होने के बाद भी इस पर लगातार जल की धारा बहती रहती है और उसके बाद भी शिवलिंग आज तक वैसा ही बना हुआ है. आइए जानते हैं महादेव के इस मंदिर के बारे में…
600 सालों से ज्यादा पुराना मंदिर
आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम के पास मुखलिंगम गांव में भगवान शिव को समर्पित श्री मुखलिंगेश्वर मंदिर स्थित है. इसे मधुकेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि मंदिर में भगवान शिव के अवतार को मधुकेश्वर कहा जाता है. बताया जाता है कि मंदिर 600 सालों से ज्यादा पुराना है, जहां भगवान शिव की पूरे विधि-विधान से पूजा होती है. अध्यात्म और इतिहास की दृष्टि से श्रीकाकुलम का अपना अस्तित्व रहा है. यह कभी कलिंग साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था और वंशधारा नदी के किनारे बसे होने की वजह से मुखलिंगम गांव में भगवान शिव को समर्पित दो मंदिर, सोमेश्वर और भीमेश्वर, भी मौजूद हैं.
मंदिर का नाम मुखलिंगेश्वर मंदिर
श्री मुखलिंगेश्वर मंदिर में स्थापित शिवलिंग अलग है. शिवलिंग पेड़ के तने से बना है, लेकिन देखने पर पत्थर की संरचना लगती है. भक्तों का मानना है कि यह शिवलिंग स्वयंभू है. इतना ही नहीं, शिवलिंग पर भगवान शिव के चेहरे की आकृति भी उकेरी गई है, जो उनके साकार और निराकार रूप का मिश्रण है. शिवलिंग पर मुख अंकित होने की वजह से ही मंदिर का नाम मुखलिंगेश्वर पड़ा.
मंदिर की वास्तुकला कलिंग शैली का उत्कृष्ट
मुखलिंगेश्वर शिवलिंग पर लगातार जल की धारा बहती रहती है, लेकिन शिवलिंग आज तक वैसा का वैसा ही बना हुआ है. यही कारण है कि भक्तों का मुखलिंगेश्वर महादेव पर विश्वास और आस्था इतनी गहरी है. भक्तों को विश्वास है कि मुखलिंगेश्वर महादेव उन पर कोई विपदा नहीं आने देंगे. मंदिर की वास्तुकला भी कलिंग शैली का उत्कृष्ट उदाहरण पेश करती है. मंदिर की दीवारों में भगवान शिव, नंदी, विष्णु भगवान और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को उकेरा गया है. मंदिर के प्रांगण में नंदी महाराज की बड़ी प्रतिमा विराजमान है.
महाराष्ट्र के इस मंदिर में खेली जाती है हल्दी की होली, बिना राक्षस के दर्शन किए भगवान मार्तंड भैरव के दर्शन हैं अधूरे
14 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
महाराष्ट्र के जेजुरी में स्थित खंडोबा मंदिर में हर साल दिसंबर के महीने में भक्त हल्दी की होली खेलते हैं. भक्त दूर-दूर से भगवान शिव के मार्तंड भैरव स्वरूप की पूजा करने के लिए आते हैं. माना जाता है कि भगवान मार्तंड भैरव के दर्शन तब तक अधूरे माने जाते हैं, जब तक भक्त राक्षस मणि के दर्शन पूरे नहीं कर लेते. यहां पर भगवान शिव की योद्धा अवतार में पूजा की जाती है और देश-विदेश से लाखों की संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं. मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने मात्र से ही ग्रह-नक्षत्र के अशुभ प्रभाव से मुक्ति मिलती है और भक्तों की हर इच्छा पूरी होती है. आइए जानते हैं भगवान शिव के इस मंदिर के बारे में…
भगवान शिव ने दिया मंदिर में स्थान
इसके पीछे का कारण एक पौराणिक कथा में छुपा है. इसके मुताबिक जब ब्रह्माजी पृथ्वी की रचना कर रहे थे तब उनकी पसीने की बूंद से मल्ल और मणि राक्षसों का जन्म हुआ. दोनों राक्षसों ने मिलकर धरती पर उत्पात मचाना शुरू कर दिया और कई बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतार दिया. ऐसे में भक्तों ने भगवान शिव से प्रार्थना की. अपने भक्तों को बचाने के लिए भगवान शिव खंडोबा या मार्तंड भैरव रूप में प्रकट हुए. उन्होंने अपनी तलवार से मल्ल राक्षस का वध किया. अपने भाई की मौत को देखकर मणि ने भगवान शिव के सामने आत्मसमर्पण किया और क्षमा मांगी. भगवान शिव ने प्रसन्न होकर मणि को क्षमा किया और उसे अपने मंदिर में स्थान भी दिया.
योद्धा अवतार में हैं भगवान शिव
खंडोबा मंदिर में भगवान शिव के मार्तंड भैरव रूप की पूजा होती है. यह रूप भगवान शिव का सबसे अनोखा रूप है. इस रूप में भगवान शिव योद्धा अवतार में हैं और उनके हाथ में बड़ी तलवार है. मार्तंड भैरव घोड़े पर सवार होकर भक्तों की रक्षा करने के लिए मौजूद हैं. भगवान शिव के मार्तंड भैरव रूप की गिनती उनके उग्र रूपों में की जाती है, जो अपनी तलवार से बुरी महाशक्तियों का नाश करते हैं.
हर इच्छा यहां होती है पूरी
शत्रुओं पर विजय पाने के उपलक्ष्य में यहां हल्दी की होली होती है और भगवान शिव को भी हल्दी अर्पित की जाती है. मंदिर के मुख्य द्वार पर भी राक्षस मणि की छोटी सी प्रतिमा विराजमान है. मंदिर में हर साल 42 किलो की तलवार उठाने की प्रतियोगिता भी रखी जाती है. माना जाता है कि इसी तलवार से भगवान मार्तंड भैरव ने राक्षसों का संहार किया था. मान्यता है कि अगर विवाह में देरी हो रही है या कोई संतान सुख से वंचित हैं, तो महाराष्ट्र में स्थापित इस मंदिर में हर मनोकामना को पूरा करने की शक्ति है. भक्त दूर-दूर से भगवान शिव के योद्धा अवतार के दर्शन करने आते हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (14 दिसंबर 2025)
14 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- मानसिक बेचैनी, दुर्घटनाग्रस्त होने से बचे तथा अधिकारियों के तनाव से बचने का प्रयास अवश्य करें।
वृष राशि :- योजनाएं फलीभूत हो, सफलता के साधन अवश्य जुटाए तथा विशेष लाभ अवश्य ही होगा।
मिथुन राशि :- अचानक उपद्रव कष्टप्रद हो, विशेष कार्य स्थिगित रखे, कार्य अवरोध होगे।
कर्क राशि :- परिश्रम से कुछ सफलता मिले, अर्थ व्यवस्था की विेशेष चिंता बन जाएगी।
सिंह राशि :- किसी अपवाद व दुर्घटना से बचें, व्यावसायिक क्षमता में विेशेष वृद्धि होगी।
कन्या राशि :- व्यवसाय गति उत्तम, चिन्ताए कम होगी, अवरोध के बाद रुके कार्य बन जाएंगे।
तुला राशि :- सामाजिक बेचैनी उद्विघ्नता के योग बनें तथा कुटुम्ब में क्लेश अवश्य होगा।
वृश्चिक राशि :- सामर्थ्य वृद्धि के साथ-साथ तनाव भड़के तथा झगड़े संभावित होगे।
धनु राशि :- कुटुम्ब की समस्याएं कष्टप्रद हो, तनाव, व्यर्थ धन व्यय होगा, ध्यान दें।
मकर राशि :- योजनाएं फलीभूत हो, सफलता के साधन जुटाए तथा कार्य बनें।
कुंभ राशि :- स्वभाव में खिन्नता, मानसिक बेचैनी तथा बने हुए काम बिगड़े।
मीन राशि :- तनाव क्लेश व अशांति बनेगी, परिश्रम विफल होंगे, कार्यगति होगी।
तुलसी के चमत्कारिक उपाय...25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस पर करें ये काम, हर मनोकामना होगी पूरी!
13 Dec, 2025 08:31 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Tulsi Pujjan Diwas: हिंदू धर्म में तुलसी पूजन दिवस को अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण दिन माना जाता है. ये दिन देवी तुलसी के औषधीय, धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व को समर्पित होता है. मान्यताओं के अनुसार, माता तुलसी को भगवान विष्णु की ‘प्रिया’ साक्षात मां लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है.
कब है तुलसी पूजन दिवस?
तुलसी पूजन दिवस हर साल 25 दिसंबर को मनाया जाता है. इस साल भी देशभर में 25 दिसंबर काे तुलसी पूजन दिवस मनाया जाएगा. इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा करने से घर में सुख, शांति, समृद्धि आती है और सभी दुख दूर होते हैं.
पूजन का शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 05:25 बजे से 06:19 बजे तक
पूजा का शुभ समय- सुबह 08:00 बजे से 10:00 बजे तक
शाम का पूजन मुहूर्त- शाम 05:30 बजे से 07:00 बजे तक
पूजन की सरल पूजा विधि
तुलसी पूजन दिवस के दिन सबसे पहले सुबह जल्दी नहाकर साफ कपड़े पहने और पूजा का संकल्प लें. जिसके बाद तुलसी के पौधे के चारों ओर सफाई करें और जल चढ़ाएं. इसके बाद पौधे पर हल्दी-कुमकुम का तिलक लगाएं और माता तुलसी को लाल चुनरी, लाल फूल और 16 शृंगार की सामग्री अर्पित करें. पूजा शुरू करने के लिए घी का दीपक जलाकर दीपदान करें.
इसके बाद तुलसी माता की सात या ग्यारह बार परिक्रमा करें. परिक्रमा के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें. आखिर में माता को मिठाई या मिश्री का भोग लगाएं, साथ ही तुलसी चालीसा और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें. वहीं तुलसी पूजन के बाद घर में धन-धान्य की वृद्धि और सकारात्मकता बनाए रखने के लिए तुलसी के पौधे पर पीले रंग का धागा सात बार लपेटना अत्यंत शुभ माना जाता है.
तुलसी पूजा के विशेष मंत्र
ॐ तुलसीदेव्यै च विद्महे, विष्णुप्रियायै च धीमहि, तन्नो वृन्दा प्रचोदयात् ।।
वृंदा वृंदावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी। पुष्पसारा नंदनीय तुलसी कृष्ण जीवनी।।
मातस्तुलसि गोविन्द हृदयानन्द कारिणी, नारायणस्य पूजार्थं चिनोमि त्वां नमोस्तुते।।
व्यापार में मुनाफा और रिश्तों में ताजगी लाना है, तो घर में लगाएं ये झंडा, फिर चाहे अपार्टमेंट हो या स्वतंत्र मकान, हर जगह दिखेगा प्रभाव
13 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
घर में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि बनाए रखने के लिए कई लोग हनुमान जी के झंडे का सहारा लेते हैं. कहते हैं कि सही दिशा में झंडा लगाने से घर और व्यवसाय में लाभ मिलता है. वास्तु के अनुसार, हनुमान जी का झंडा विशेष दिशा में रखा जाना चाहिए. यह केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे घर की ऊंचाई और दिशा के अनुसार सही जगह पर रखने से लाभकारी माना जाता है. हनुमान जी का झंडा हमेशा दक्षिण दिशा में लगाना उत्तम होता है. यदि आपके पास ऑरेंज रंग का झंडा है तो इसे घर के दक्षिण भाग में लगाना चाहिए. वहीं पीले रंग का झंडा पश्चिम दिशा में रखना शुभ माना गया है. दक्षिण दिशा में झंडा लगाने से घर में यश और मान बढ़ता है. इसके अलावा घर के सदस्यों के बीच प्रेम और मेलजोल भी बढ़ता है. पश्चिम दिशा में झंडा लगाने से आय और लाभ में वृद्धि होती है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
कई बार लोग अपार्टमेंट या फ्लैट में रहते हैं, जहां छत और बाहरी जगह अपनी नहीं होती. ऐसे में झंडा लगाने में कठिनाई आती है. इस स्थिति में भी वास्तु अनुसार लाभ प्राप्त किया जा सकता है. इसके लिए दक्षिण दिशा में ब्राउन रंग के फ्रेम में हरे रंग के पर्वतों वाली तस्वीर लगाना उपयोगी होता है. पर्वत का प्रतीक घर के दक्षिण भाग को ऊंचाई प्रदान करता है और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाता है.
यदि पश्चिम दिशा में लाभ बढ़ाना हो तो वहां सफेद रंग के पर्वतों वाली फोटो गोल्डन फ्रेम में लगाना उत्तम होता है. ऐसा करने से घर में व्यवसायिक और आर्थिक लाभ में वृद्धि होती है.
झंडा या फोटो लगाने का उद्देश्य केवल सजावट नहीं है. इसका वास्तु में विशेष महत्व है. दक्षिण और पश्चिम दिशा को ऊंचा और मजबूत बनाने से घर के वातावरण में स्थिरता और सुकून आता है. दक्षिण दिशा की ऊंचाई से परिवार में मान और प्रतिष्ठा बढ़ती है, जबकि पश्चिम दिशा की ऊंचाई से वित्तीय स्थिति मजबूत होती है.
घर में हनुमान जी का झंडा लगाने या माउंटेन फोटो रखने का समय भी महत्वपूर्ण होता है. इसे साफ और स्वच्छ स्थान पर रखना चाहिए. झंडा या फोटो को रोजाना या समय-समय पर साफ करना आवश्यक है, ताकि उसकी ऊर्जा बनी रहे.
इसके अलावा, झंडा लगाने की ऊंचाई और स्थिति भी ध्यान में रखनी चाहिए. झंडा बहुत नीचे या अव्यवस्थित रूप से नहीं होना चाहिए. दक्षिण और पश्चिम दिशा में सही ढंग से स्थापित होने पर यह घर और परिवार के लिए शुभ परिणाम लाता है.
इस प्रकार, हनुमान जी का झंडा या माउंटेन फोटो वास्तु अनुसार दक्षिण और पश्चिम दिशा में रखने से घर में यश, प्रेम और आर्थिक लाभ बढ़ता है. यह न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि घर के वातावरण और ऊर्जा संतुलन के लिए भी लाभकारी है.
आरती करने का सही तरीका क्या है? जगद्गुरु रामभद्राचार्य से जानें भगवान के सामने कितनी बार दिखाएं दीपक
13 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में देवी और देवताओं की पूजा के बाद आरती करने का विधान है. आरती करने से पूजा की कमियां दूर होती हैं और उसके बाद समापन होता है. देवी और देवताओं की आरती घी के दीपक या कपूर से करते हैं. इस दौरान संबंधित देवी और देवता की आरती भी गाते हैं. लोग आरती के समय यह भूल जाते हैं या उनको पता नहीं होता है कि देवी या देवता के समक्ष दीपक कितनी बार घुमाना है, किस स्थान पर या कहां-कहां दीपक दिखाना है. जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने आरती करने का सही तरीका बताया है.
आरती करने का सही तरीका
तुलसी पीठ के संस्थापक और जगद्गुरु रामभद्राचार्य के अनुसार, किसी भी देवी या देवता की आरती करते हैं तो उनकी आरती 14 बार उतारनी चाहिए. इसके बारे में शास्त्रों में भी बताया गया है.
रामभद्राचार्य बताते हैं कि भगवान के चरण के 4 बार आरती उतारनी चाहिए, ऐसे ही उनके नाभि की दो बार आरती उतारें. उसके बाद भगवान के मुख पर एक बार आरती उतारें. फिर उस देवी और देवता के सभी अंगों में मिलाकर 7 बार आरती उतारनी चाहिए. इस प्रकार से आप देखें तो आरती 14 बार उतारते हैं.
आरती क्यों करते हैं?
आरती ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति, आस्था, समर्पण आदि का प्रतीक माना जाता है. आरती से ईश्वर की पूजा को पूर्णता प्राप्त होती है. सामान्य लोगों को देवी और देवता के पूजा की सही विधि नहीं पता होती है, वे अपनी इच्छानुसार पूजा करते हैं और अंत में आरती करते हैं. आरती पूजा की कमियों को दूर करने का काम करती है.
आरती उतारते समय हम जो आरती गाते हैं, उसमें उनकी महिमा का गुणगान होता है. जो लोग मंत्र आदि नहीं जानते हैं, वे सामान्य पूजा करते आरती कर लेते हैं. आरती का दीपक घर और मन की नकारात्मकता को दूर करता है. घर और परिवार में सुख और शांति आती है. सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है.
कैसे आसानी से पता लगाएं कि दूसरा व्यक्ति हमसे सच्चा प्यार करता है या फिर है रेड फ्लैग!
13 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आज के दौर में किस पर विश्वास किया जाए और किस पर नहीं, यह पता लगाना बहुत मुश्किल काम है. किसी के मन में क्या छिपा है, यह कोई नहीं जानता. लेकिन आचार्य चाणक्य की नीतियों की वजह से आप आसानी से जान सकते हैं कि सामने वाला व्यक्ति सच्चा प्यार करता है या नहीं. आचार्य चाणक्य ने मानव स्वभाव, रिश्तों और प्रेम के बारे में जो सिद्धांत दिए थे, वे आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं. क्या प्रेम सच्चा होता है? क्या यह दिखावा है? कई लोगों को इस बारे में संदेह होता है. लेकिन चाणक्य के नीतिशास्त्र में, उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया है कि प्रेम करने वाला व्यक्ति कैसा व्यवहार करता है? आइए जानें कैसे…
छोटी-छोटी बातों पर झलकता है प्रेम
अगर कोई इंसान हमसे सच्चा प्यार करता है, तो उसका स्नेह सिर्फ उसकी बातों में ही नहीं, बल्कि उसके छोटे-छोटे कामों में भी झलकता है. एक ऐसा इंसान जो हमारी सच्ची परवाह करता है, ना सिर्फ तब जब वो हमारे साथ होता है, बल्कि तब भी जब हम नहीं होते. जब हम मुस्कुराते हैं तो वो खुश होता है और जब हम उदास होते हैं तो वो दुखी होता है. ऐसा प्रेम दिखावा नहीं, बल्कि हृदय से उपजा एक एहसास है.
बातों से नहीं, कर्मों से जाहिर होता है प्रेम
जैसा कि चाणक्य कहते हैं, जो व्यक्ति हमसे सच्चा प्रेम करता है, वह सबसे पहले हमें नोटिस करना शुरू करेगा. वे जहां भी होंगे, हमारा ध्यान रखने की कोशिश करेंगे. जब भी उनकी नजर हम पर पड़ेगी, वे तुरंत नजरें फेरकर हमारी ओर देखेंगे, जिससे आसानी से पता चल जाएगा कि हम उनके मन में क्या है. चाणक्य कहते हैं कि सच्चा प्यार बातों से नहीं, बल्कि कर्मों से जाहिर होता है. अगर आपके जीवन में कोई व्यक्ति उपरोक्त गुण दिखाता है, तो इसका मतलब है कि वह सचमुच आपकी परवाह करता है.
सम्मान और निर्णय का रखता है पूरा ध्यान
हमारे बारे में जानने की उत्सुकता भी सच्चे प्यार की निशानी है. हमें क्या पसंद है? हमें क्या परेशान करता है? हमें क्या अच्छा लगता है? वे हर छोटी-बड़ी बात जानने की कोशिश करते हैं. जब वे हमसे बात करते हैं, तो उनके चेहरे पर एक स्वाभाविक मुस्कान और शब्दों में कोमलता नजर आती है. वे हमारी कही हुई बातें नहीं भूलते, उन्हें याद रहती हैं और बाद में जिक्र भी करते हैं. आचार्य चाणक्य के अनुसार, जो व्यक्ति सच्चा प्रेम करता है, वह उसके सम्मान और निर्णय का पूरा ध्यान रखता है और अपने फैसले थोपने की कोशिश नहीं करता.
छोटे-छोटे कामों में मदद के लिए तैयार रहना
चाणक्य द्वारा बताए गए प्रेम के लक्षणों में से एक है, हम पर विशेष ध्यान देना. वे छोटे-छोटे कामों में भी मदद के लिए तैयार रहते हैं. ‘मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं’ यह भावना उच्च प्रेम का सूचक है. अगर हम तनाव में हों या किसी तकलीफ में हों, तो भी वे सबसे पहले यही पूछते हैं, क्या हुआ? उन्हें ऐसा लगता है जैसे हमारी समस्या उनकी ही है.
ईर्ष्या प्रेम का एक हिस्सा
ईर्ष्या भी प्रेम का एक हिस्सा है. अगर हम दूसरों से बहुत ज्यादा मुस्कुराते और बात करते हैं, तो वे अंदर से थोड़ा अधीर महसूस कर सकते हैं. यह गुस्सा नहीं है… यह बस एक एहसास है, जो उनके हमारे प्रति सच्चे प्रेम से उपजता है. जो लोग यह देखने के लिए इंतजार करते हैं कि हम किसके साथ रहेंगे और कहां जाएंगे, वही हमसे सच्चा प्यार करते हैं.
सामने वाले की तरक्की पर गर्व होगा
सबसे जरूरी बात यह है कि जो व्यक्ति हमसे सच्चा प्यार करता है, वह किसी नीचा नहीं दिखाएगा या फिर आपकी बातों को गलत दर्शाने की कोशिश करेगा. अगर कोई ऐसा करता है, तो वह सच्चा प्रेम नहीं करता है. जबकि जो सच्चा प्रेम करता है, उसको सामने वाले की तरक्की पर गर्व होगा और उसकी खुशी में खुशी मिलेगी. जब वह हमारे साथ होगा, तो वह खुद में सर्वश्रेष्ठ लाने की कोशिश करेगा.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (13 दिसंबर 2025)
13 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- बेचैनी उद्विघ्नता से बचिए, समय पर सोचे कार्य अवश्य होगे, रुके कार्य बन जाएंगे।
वृष राशि :- चिन्ताएं कम हो, सफलता के साधन जुटाए, अचानक लाभ की योजना बन ही जाएगी।
मिथुन राशि :- सफलता के साधन जुटाए, व्यावसायिक क्षमता में वृद्धि अवश्य ही होगी, समय का ध्यान रखे।
कर्क राशि :- व्यर्थ धन का व्यय, समय व शांनि नष्ट होवे, विघटनकारी तत्व परेशान अवश्य करेगा।
सिंह राशि :- भोग, ऐश्वर्य से स्वास्थ्य नरम रहे, विरोधी वर्ग अवश्य ही परेशान करें, समय का ध्यान रखे।
कन्या राशि :- समय व धन नष्ट न हो, क्लेश व अशांति, यात्रा से कष्ट तथा चिन्ता अवश्य बनेगी।
तुला राशि :- परिश्रम से सफलता के साधन अवश्य ही जुटाए, कार्य बाधा तथा कार्य अवरोध से अवश्य बचे।
वृश्चिक राशि :- चोट चपेट आदि से बचिएगा, क्लेश व अशांति तथा मानसिक उद्विघ्नता से बचकर चले।
धनु राशि :- भाग्य का सितारा साथ देवे, क्लेश व अशांति से बचिए, समय का ध्यान अवश्य ही रखे।
मकर राशि :- परिश्रम विफल हो, चिन्ता, यात्रा व व्यग्रता तथा स्वास्थ्य नरम गरम अवश्य ही रहेगा।
कुंभ राशि :- आकस्मिक घटना से चोट आदि का भय होगा, समय स्थिति का ध्यान अवश्य रखे, अन्यथा हानि।
मीन राशि :- अधिकारियों से विरोध न करें, इष्ट मित्र सहायक न होवे, समय तथा स्थिति का ध्यान अवश्य रखे।
रामा-श्यामा तुलसी लगाने का शुभ समय और दिशा: घर में सुख-शांति और समृद्धि बढ़ाने वाले नियम और उपाय
12 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तुलसी का पौधा भारतीय घरों में सिर्फ एक हरी-पत्ती वाला पौधा नहीं है, बल्कि इसे घर की पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. पुरानी मान्यताओं के अनुसार तुलसी में धन की देवी-माता लक्ष्मी का वास होता है. यही वजह है कि घर में तुलसी लगाने से न केवल सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, बल्कि परिवार के सदस्यों पर सुख-शांति और समृद्धि भी बनी रहती है. आजकल घरों में मुख्य रूप से दो प्रकार की तुलसी देखी जाती हैं-रामा तुलसी और श्यामा तुलसी. दोनों के लाभ और महत्व समान रूप से उच्च हैं. वास्तु और ज्योतिष के अनुसार, तुलसी को घर में सही दिशा और समय पर लगाना बेहद आवश्यक है. गलत स्थान या समय पर तुलसी लगाने से शुभ फल की अपेक्षा नहीं पूरी हो पाती और कभी-कभी प्रतिकूल प्रभाव भी आ सकते हैं.
रामा और श्यामा तुलसी को कब लगाना चाहिए, कब नहीं लगाना चाहिए, किस दिशा में रखना शुभ है और इसके विशेष वास्तु नियम क्या हैं. साथ ही, यह भी समझेंगे कि तुलसी लगाने से घर और परिवार को क्या-क्या लाभ मिल सकते हैं. यदि आप इन नियमों का ध्यान रखते हैं, तो घर में हमेशा धन-संपत्ति और खुशहाली बनी रहेगी और माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी.
1.रामा और श्यामा तुलसी किस दिन लगाएं?
विशेष दिनों पर तुलसी लगाना बेहद शुभ माना जाता है.
-पूर्णिमा, मंगलवार, गुरुवार और शुक्रवार के दिन तुलसी लगाना उत्तम होता है.
-शुक्ल पक्ष के दिन भी इसे लगाने की परंपरा है.
-इन दिनों रामा और श्यामा तुलसी लगाने से परिवार में सुख-शांति और आर्थिक समृद्धि बढ़ती है.
-यह परिवार के सभी सदस्यों के जीवन में नई तरक्की के मार्ग खोल सकता है.
2.रामा और श्यामा तुलसी कब नहीं लगानी चाहिए?
-कुछ दिनों पर तुलसी लगाने से बचना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं.
-एकादशी, शनिवार, रविवार और अष्टमी के दिन तुलसी लगाना वर्जित है.
-इन दिनों तुलसी को स्पर्श करना या उसमें जल डालना भी सही नहीं माना जाता.
-ऐसे दिन तुलसी लगाने से माता लक्ष्मी रुष्ट हो सकती हैं और घर में आर्थिक तंगी आ सकती है.
3.रामा और श्यामा तुलसी किस दिशा में लगाएं?
-वास्तु शास्त्र के अनुसार तुलसी को सही दिशा में लगाना जरूरी है:
-ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में तुलसी लगाना सबसे उत्तम माना गया है.
-यदि यह संभव न हो, तो उत्तर या पूर्व दिशा में भी तुलसी लगाई जा सकती है.
-रोजाना तुलसी के पास दीपक जलाना शुभ माना जाता है, इससे माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है.
4.रामा और श्यामा तुलसी से जुड़े विशेष वास्तु नियम
-तुलसी को साफ और हरे-भरे स्थान पर रखें.
-पौधे की नियमित साफ-सफाई करें. गंदगी वाले स्थान पर तुलसी रखने से माता लक्ष्मी रुष्ट हो सकती हैं.
-भूलकर भी सूखे पत्तों वाली तुलसी को घर में न रखें.
-रविवार और एकादशी के दिन तुलसी को स्पर्श न करें और न ही उसमें जल डालें.
-तुलसी को टॉयलेट या बाथरूम के पास न रखें.
-तुलसी के पौधे के आसपास सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखना आवश्यक है.
5.रामा और श्यामा तुलसी लगाने के लाभ
-तुलसी लगाने से घर में सकारात्मकता और खुशहाली बनी रहती है.
-यह भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को प्रसन्न करता है.
-तुलसी लगाने से गरीबी दूर होती है और घर की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है.
-तुलसी रखने से नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है.
-परिवार के सदस्यों पर सुख-शांति और स्वास्थ्य संबंधी लाभ होते हैं.
प्रयागराज में 3 जनवरी से माघ मेला-2026 का शुभारंभ, जानें स्नान की प्रमुख तिथियां और कल्पवास का धार्मिक महत्व
12 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में माघ मेला का विशेष महत्व है और यह हर साल संगम नगरी प्रयागराज में आयोजन किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माघ मेले में स्नान करने से व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसी कामना के साथ देश-विदेश से करोड़ों की संख्या श्रद्धालु यहां हर साल माघ मास में आते हैं. इस धार्मिक आयोजन में केवल आम श्रद्धालु या साधु-संत ही नहीं बल्कि गृहस्थ, आध्यात्मिक लोग समेत कई सनातनी इसमें शामिल होते हैं और 6 प्रमुख तिथियों पर स्नान करते हैं. माना जाता है कि इन दिनों संगम में स्नान करने से जन्मों के पाप धुल जाते हैं और जीवन में नई शुभ ऊर्जा आती है. आखिर माघ मेला स्नान इतना पवित्र क्यों माना जाता है, आइए जानते हैं इसके पीछे गहरी धार्मिक और पौराणिक मान्यता…
माघ मेले 2026 का शुभारंभ
माघ मेले की शुरुआत 3 जनवरी 2026 से होगी और इसका समापन 15 फरवरी को होने जा रहा है. कहा जाता है कि माघ मास में संगम में डुबकी लगाने से मन और कर्म दोनों शुद्ध होते हैं, इसलिए हर साल यह मेला आस्था और आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा संगम बनता है. प्रयागराज में संगम इलाके में टेंट सिटी, सुरक्षा इंतजाम, घाटों की सफाई और प्रकाश व्यवस्था तेजी से पूरी की जा रही हैं, ताकि देश–दुनिया से आने वाले भक्त बिना किसी परेशानी के पूजा, स्नान और कल्पवास कर सकें.
माघ मेला का महत्व
साल 2026 में पौष पूर्णिमा से स्नान की शुरुआत होगी, इसके बाद मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी और माघी पूर्णिमा जैसे प्रमुख स्नान पर्व बेहद खास रहने वाले हैं. इनमें से मौनी अमावस्या को सबसे बड़ा और सबसे भीड़भाड़ वाला दिन माना जाता है, जब लाखों लोग एक साथ संगम में डुबकी लगाते हैं. हिंदू धर्म में माघ मास को बेहद शुभ माना गया है. मान्यता है कि इस समय सूर्य उत्तरायण होते हैं और यह अवधि तप, दान और धर्म-कर्म के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है. पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस महीने प्रयागराज के संगम तट पर देवताओं का विशेष वास रहता है, इसलिए यहां स्नान और पूजा का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है.
स्नान करने से सभी पाप हो जाते हैं नष्ट
कई संत और महात्मा कहते हैं कि माघ स्नान सिर्फ शरीर की शुद्धि नहीं, बल्कि मन, विचार और कर्म की भी शुद्धि है. इसलिए हर साल लाखों श्रद्धालु इस कड़ाके की ठंड में भी सुबह-सुबह संगम की डुबकी लगाने पहुंचते हैं. मान्यता है कि गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में स्नान करने से जन्मों के पाप भी खत्म हो जाते हैं. माघ मास में किया गया स्नान, दान और जप मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाता है.
संगम किनारे करते हैं कल्पवास
कई श्रद्धालु पूरे माघ महीने संगम किनारे कल्पवास करते हैं यानी नदी तट पर साधना, संयम, नियम और तप का पालन करते हुए जीवन का एक शुद्ध रूप जीते हैं. इसे जीवन की सबसे बड़ी आध्यात्मिक साधनाओं में से एक माना जाता है. पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि माघ महीने देवी-देवता प्रयागराज के संगम पर निवास करते हैं. इसलिए इस दौरान की गई पूजा–अर्चना और दान अत्यधिक फलदायी माना गया है.
कल्पवास का महत्व
माघ मास में कल्पवास का विशेष महत्व है. संगम तट पर एक माह की साधना को कल्पवास कहा गया है. महाभारत में कहा गया है कि सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण करके जो तपस्या का फल मिलता है, उतना ही माघ मास में कल्पवास करके प्राप्त हो जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव को त्रिपुर राक्षस के वध करने की क्षमता कल्पवास से ही प्राप्त हुई थी. विधान के अनुसार, एक रात्रि, तीन रात्रि, तीन माह, छह माह, 12 वर्ष या जीवनभर कल्पवास किया जाता है. पुराणों में बताया गया है कि देवी-देवता पृथ्वी पर आम मनुष्य की तरह जन्म की इच्छा रखते हैं, वे चाहते हैं कि आम इंसान की तरह जन्म पाकर प्रयाग क्षेत्र में कल्पवास कर सकें.
माघ मेले की तैयारियां लगभग पूरी
महाकुंभ-2025 के सफल आयोजन के बाद अब राज्य सरकार माघ मेला-2026 को भी अभूतपूर्व, व्यवस्थित और सौंदर्यपूर्ण स्वरूप देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में माघ मेले की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं. सीएम आदित्यनाथ ने निर्देश दिए हैं कि माघ मेला-2026 ना केवल धार्मिक भावना का प्रतीक हो, बल्कि साफ-सफाई, सुरक्षा, यातायात, चिकित्सा सुविधाओं और आधुनिक अवसंरचना के मामले में भी देशभर के मेला आयोजनों के लिए एक आदर्श बने. मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में मेला प्रशासन श्रद्धालुओं को एक सुरक्षित, व्यवस्थित, आध्यात्मिक और विश्वस्तरीय अनुभव प्रदान करने में जुट गया है.
माघ मेला 2026 प्रमुख स्नान तिथियां
3 जनवरी 2026- पौष पूर्णिमा
15 जनवरी 2026- मकर संक्रांति
18 जनवरी 2026- मौनी अमावस्या
23 जनवरी 2026- बसंत पंचमी
1 फरवरी 2026- माघ पूर्णिमा
15 फरवरी 2026- महाशिवरात्रि
लापरवाही पड़ी भारी: दमोह में लिफ्ट गिरने से मालिक का बेटा और कर्मचारी लहूलुहान
माओवाद की समाप्ति के बाद अब बस्तर का सर्वांगीण विकास होगा: मंत्री राम विचार नेताम
अम्बिकापुर में विकास को नई रफ्तार
