धर्म एवं ज्योतिष
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (20 दिसंबर 2025)
20 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- यात्रा भय कष्ट, व्यावसाय बाधा, लाभ, पारिवारिक समस्या उलझन भरी रहेगी।
वृष राशि :- राजभय रोग, स्वजन सुख, शिक्षा व लेखन कार्य में सफलता व प्रगति होगी।
मिथुन राशि :- वाहन भय, मातृ कष्ट, हानि तथा अशांति का वातावरण रहेगा, लाभ के अवसर बनेंगे।
कर्क राशि :- सफलता, उन्नति, शुभ कार्य, विवाद, राज कार्य मामलें मुकदमें में प्रगति, जीत होगी।
सिंह राशि :- शरीर कष्ट, कार्य व्यय, कार्य में सफलता, आर्थिक सुधार होगे, रुके कार्य बन जाएगे।
कन्या राशि :- खर्च, विवाद, स्त्री कष्ट, विद्या लाभ और धीरे-धीरे सुधार होगा, अवरोध में सुधार होगा।
तुला राशि :- यात्रा से हर्ष, राज लाभ, शरीर कष्ट, खर्च की मात्रा बढ़ेगी, आर्थिक कष्ट बढ़ जाएंगे।
वृश्चिक राशि :- कार्यवृत्ति से लाभ, यात्रा संपत्ति, लाभ, व्यापारी गति में सुधार अवश्य होगा।
धनु राशि :- अल्प लाभ चोट और अग्नि शरीर भय, मानसिक परेशानी अवश्य ही बनेगी।
मकर राशि :- शत्रु से हानि, कार्य व्यय, शारीरिक सुख होवे, कभी-कभी कुछ कष्ट अवश्य हो।
कुंभ राशि :- सुख व्यय, संतान सुखकार्य, सफलता उत्साह की वृद्धि होगी, ध्यान रखें।
मीन राशि :- पदोन्नति, राजभय, न्याय, लाभ हानि, अधिकारियों से मन मुटाव अवश्य बनेगा।
अचानक बन रहे यात्रा के अवसर या आध्यात्मिक क्षेत्र में बढ़ रही रुचि? नौवें भाव का केतु बनाता ऐसे योग, अशुभ प्रभाव के कर लें उपाय
19 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ज्योतिष में नौवां भाव बहुत अहम माना जाता है क्योंकि यह सीधे आपकी सोच, भाग्य, यात्रा और उच्च शिक्षा पर असर डालता है. जब केतु इस भाव में होता है, तो यह आपके जीवन में कई तरह के बदलाव लाता है. कुछ लोग इसे गहरी समझ, रहस्यमय अनुभव और आध्यात्मिक रुचि के रूप में महसूस करते हैं, जबकि दूसरों के लिए यह अचानक बदलाव और भ्रम का कारण बन सकता है. नौवां भाव हमारी सोच, विश्वास और भाग्य की स्थिति को दर्शाता है. इस भाव में केतु की स्थिति यह संकेत देती है कि व्यक्ति जीवन में किस तरह के अनुभवों से गुजरेगा, कौन से अवसर मिलेंगे और किस प्रकार की यात्रा उसके लिए लाभदायक होगी. यह भाव हमारे गुरुओं, धार्मिक विश्वासों और मानसिक संतुलन पर भी असर डालता है. जब केतु इस भाव में मजबूत होता है, तो व्यक्ति में रहस्यमय मामलों में रुचि बढ़ सकती है. उसे आध्यात्मिक और मानसिक विकास के लिए नए रास्ते मिल सकते हैं. वहीं कमजोर स्थिति में भ्रम, शिक्षा में परेशानी या धार्मिक मामलों में उलझन महसूस हो सकती है. इसलिए इस स्थिति को समझना और सही उपाय करना बहुत जरूरी है ताकि इसके नकारात्मक असर कम हो और सकारात्मक प्रभाव बढ़े. इसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव क्या हैं और कैसे आसान उपाय करके इसे संतुलित किया जा सकता है.
केतु नौवें भाव के सकारात्मक प्रभाव
1. आध्यात्मिक रुचि और अंतर्दृष्टि:
केतु इस भाव में होने पर व्यक्ति को गहरी समझ और मानसिक स्थिरता मिलती है. उसे जीवन के रहस्यों और आध्यात्मिक साधनाओं में रुचि होती है.
2. ज्ञान और शिक्षा में रुचि:
यह स्थिति व्यक्ति को नए विचार सीखने और उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है.
3. भाग्य और यात्रा में बदलाव:
केतु के प्रभाव से अचानक यात्रा के अवसर मिल सकते हैं. यह नई जगहों और अनुभवों के लिए मार्ग खोलता है.
4. गुरु और मेंटर के साथ संबंध:
नौवां भाव हमारे जीवन में मार्गदर्शन देने वाले व्यक्तियों को दर्शाता है. केतु के सही प्रभाव से व्यक्ति सही गुरु और सलाहकार से जुड़ सकता है.
केतु नौवें भाव के नकारात्मक प्रभाव
1. शिक्षा में रुकावट:
कमजोर स्थिति में व्यक्ति पढ़ाई में मन नहीं लगने या उलझन महसूस कर सकता है.
2. धार्मिक और आध्यात्मिक भ्रम:
केतु भ्रम और आध्यात्मिक सवालों को जन्म दे सकता है, जिससे मानसिक अस्थिरता बढ़ सकती है.
3. भाग्य पर असर:
जीवन में अचानक बदलाव और अनिश्चितता महसूस हो सकती है. कई बार व्यक्ति मेहनत करने के बाद भी सफलता नहीं पा पाता.
4. यात्रा में परेशानियां:
यात्रा के दौरान अड़चनें, देरी या असुविधा का सामना करना पड़ सकता है.
आसान उपाय
1. ध्यान और साधना:
प्रतिदिन ध्यान या मेडिटेशन करने से मानसिक शांति मिलती है और भ्रम दूर होता है.
2. गुरु या मेंटर से मार्गदर्शन:
किसी अनुभवी व्यक्ति से सलाह लेने से केतु के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं.
3. धार्मिक पुस्तकें पढ़ें:
आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ना मन को स्थिरता देता है और जीवन में दिशा दिखाता है.
4. सकारात्मक सोच अपनाएं:
नकारात्मक परिस्थितियों में धैर्य रखें और अपने भाग्य पर भरोसा करें.
5. रहस्यमय या मानसिक रुचि बढ़ाएं:
योग, ध्यान या मानसिक खेलों में समय देना आपके ज्ञान और समझ को बढ़ाता है.
6. दान और सेवा:
जरूरतमंदों की मदद करने से भाग्य में सुधार और मानसिक संतुलन मिलता है.
पवनपुत्र हनुमान और सुग्रीव से जुड़े हैं इस मंदिर के तार, यहीं बसा था किष्किंधा लेकिन पूजा-पाठ पूरी तरह से बंद
19 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कर्नाटक में हम्पी में एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जिसके हर पत्थर में रहस्य छिपा है. मंदिर की बनावट और स्तभों की वास्तुकला पर आस्था और विजयनगर शैली का गहरा प्रभाव दिखता है. मंदिर की दीवारों पर चीन और मिस्र की कला भी देखने को मिलती है. हम बात कर रहे हैं कर्नाटक के हम्पी के विजयनगर में बने श्री अच्युतराय स्वामी मंदिर की, जहां अब पूजा-पाठ नहीं होती है. इस मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है और यहां देखने लायक कई चीजें मिलती हैं. यह मंदिर ना केवल ऐतिहासिक है बल्कि यह विशाल वास्तु शिल्प को भी दर्शाता है. आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में खास बातें…
वास्तुकला शैली मंदिरों को बेहतरीन रूप
श्री अच्युतराय स्वामी मंदिर को अपने इतिहास और वास्तुकला के लिए जाना जाता है. मंदिर मातंग पहाड़ियों के बीच स्थित है, जहां आसपास की जनसंख्या बेहद कम है. यह शानदार मंदिर विजयनगर वास्तुकला शैली के मंदिरों को अपने सबसे अच्छे और सबसे बेहतरीन रूप में दिखाता है. यह उन आखिरी शानदार मंदिरों में से एक था, जो विजयनगर साम्राज्य के पतन से पहले हम्पी के प्रसिद्ध शहर में बनाए गए थे. बताया जाता है कि मंदिर का निर्माण 1534 ईस्वी में हुआ था और बदलते समय के साथ आज मंदिर में अलग-अलग शताब्दी की झलक भी देखने को मिलती है.
स्तंभों पर सिर्फ हिंदू देवी-देवता
यह मंदिर अपने बड़े गोपुरम और विशाल परिसर के लिए प्रसिद्ध है. मंदिर को कई स्तंभों के निर्माण के साथ बनाया गया है. स्तंभों पर सिर्फ हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां ही नहीं, बल्कि चीन और मिस्र के व्यापारियों के हम्पी आने के सबूत भी हैं. मंदिर के स्तंभों पर व्यापार के कुछ चिन्ह या कलाकृति बनी हैं. यह मंदिर भगवान विष्णु के तिरुवेंगलनाथ रूप को समर्पित है.मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी हैं, लेकिन मूल देवता के रूप में काफी समय तक भगवान विष्णु को पूजा गया.
मंदिर में पूजा-पाठ भी बंद
आज यह मंदिर रखरखाव के अभाव में खंडहर बन चुका है और मंदिर में पूजा-पाठ भी बंद है. मंदिर को रामायण के पात्र सुग्रीव और बाली से जोड़कर देखा गया है. माना जाता है कि अपने भाई बाली के प्रकोप से बचने के लिए सुग्रीव ने मातंग पहाड़ियों की शरण ली थी और यहीं पर उनकी मुलाकात हनुमान और लक्ष्मण से हुई थी. पुराणों में इस क्षेत्र को किष्किंधा भी कहा गया है, जो वानरों का क्षेत्र रहा था. बाली का इस क्षेत्र में आना वर्जित था, जिसकी वजह से सुग्रीव ने मातंग पहाड़ियों की शरण ली थी.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (19 दिसंबर 2025)
19 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- तनाव व उदर रोग, मित्र लाभ, राजभय तथा पारिवारिक समस्या अवश्य उलझेगी
वृष राशि :- अनुभव सुख मंगल कार्य विरोध मामलें मुकदमों पर प्राय: जीत की संभावना हो।
मिथुन राशि :- कुसंगत हानि, विरोध भय यात्रा, सामाजिक कार्यों में व्यवधान अवश्य बनेंगे।
कर्क राशि :- भूमि लाभ, स्त्री सुख, हर्ष, प्रगति, स्थिति में सुधार, लाभ अवश्ह ही होगा।
सिंह राशि :- तनाव व विवाद से बचे, विरोधियों की चिन्ता, राजकार्यों से प्रतिष्ठा मिल सकेगी।
कन्या राशि :- भूमि लाभ, स्त्री सुख, हर्ष, प्रगति, स्थिति में सुधार, लाभ तथा कार्य उत्तम होगा।
तुला राशि :- प्रगति, वाहन क्रय, भूमि लाभ, कलह, कुछ अच्छे कार्य कर सकेंगे, ध्यान रखे।
वृश्चिक राशि :- कार्य सिद्ध, विरोध, लाभ, हर्ष कष्ट, व्यय होवे, व्यापार में सुधार होवे, खर्च हो।
धनु राशि :- यात्रा में हानि, मित्र कष्ट, व्यय की कमी किन्तु कुछ व्यवस्था का अनुभव होगा।
मकर राशि :- शुभ कार्य, वाहन आदि, रोग, धार्मिक कर्म, कुछ अच्छे कार्य हो सकते है, ध्यान रखे।
कुंभ राशि :- अभीष्टसिद्ध, राज भय, कार्य बाधा, राज कार्यों में रुकावट का अनुभव अवश्य होगा।
मीन राशि :- अल्प हानि, रोग भय, संपर्क लाभ, राज कार्य में विलंब परेशानी होगी।
साल 2026 में इस कारण 26 एकादशी पड़ेंगी
18 Dec, 2025 07:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में एकादशी तिथि भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित मानी जाती है। हर महीने कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की एकादशी पर व्रत रखकर विष्णु भगवान की पूजा की जाती है। सामान्यतः एक साल में 24 एकादशी व्रत पड़ते हैं, लेकिन साल 2026 में कुल 26 एकादशी आएंगी। इसका प्रमुख कारण है अधिकमास का लगना है।
हिंदू कैलेंडर में लगभग हर 32 महीने 16 दिनों में सूर्य और चंद्र वर्ष में अंतर बढ़ने के कारण एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है। इसे पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है। साल 2026 में अधिकमास 17 मई से 15 जून 2026 तक रहेगा। इस अवधि में अन्य महीनों की तरह सभी व्रत रखे जाते हैं, जिसमें एकादशी भी शामिल है। इसी कारण इस वर्ष दो अतिरिक्त एकादशी पड़ेंगी पद्मिनी एकादशी 27 मई 2026 और परम एकादशी 11 जून 2026। इसी वजह से साल 2026 में एकादशी की कुल संख्या 26 हो जाती है।
भगवान गणेश के साथ-साथ सूर्य देव की उपासना करना लाभप्रद
18 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मान्यता है कि भगवान गणेश के साथ-साथ सूर्य देव की उपासना करना बहुत फलदायी माना जाता है। इसलिए बप्पा के साथ ही सूर्य देव की भी उपासना करें।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य देव को सभी ग्रहों का राजा माना जाता है। इसीलिए इसकी शुभ-अशुभ स्थिति व्यक्ति के जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डालती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार सूर्य देव की अलग-अलग प्रतिमाएं रखना शुभ माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अपनी इच्छानुसार घर में सूर्य देव की प्रतिमाएं रखी जा सकती हैं। तो आइए आज जानते हैं कि सूर्य देव की कौन सी प्रतिमा को घर में रखा जा सकता है।
लकड़ी की प्रतिमा
ज्योतिष और वास्तु के अनुसार सूर्यदेव की लकड़ी की प्रतिमा घर रखना बहुत अच्छा माना जाता है। मान्यता है कि इसके निरंतर पूजा-पाठ करने से घर के लोगों का समाज में मान-सम्मान बढ़ता है। इसके साथ ही उन्हें भाग्य का साथ मिल जाता है।
मिट्टी की प्रतिमा
जिस जातक की कुंडली में सूर्य दोष हो और उसके सभी कामों में बार-बार बाधाएं आ रही हो तो वो इंसान घर में पत्थर या मिट्टी की सूर्य प्रतिमा रख सकता है। कहा जाता है कि इसकी पूजा करने से हर कार्य में सफलता मिलती है।
तांबे की प्रतिमा
कहते हैं कि घर में सकारात्मकता बनाए रखने के लिए हर किसी को तांबे से बनी प्रतिमा रखनी चाहिए। इसके शुभ असर से सभी परेशानियों से छुटकारा मिल सकता है।
चांदी की प्रतिमा
कार्य क्षेत्र में अधिकार बनाए रखने के लिए चांदी की सूर्य प्रतिमा रख सकते हैं।
सोने की प्रतिमा
सोने से बनी सूर्य प्रतिमा घर में रखने और उसकी पूजा करने से घर में धन-धान्य बढ़ता है, सुख-समृद्धि बनी रहती है।
व्यवहार से ग्रहों की स्थितियां होती हैं प्रभावित
18 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ग्रहों का व्यक्ति के जीवन के साथ-साथ व्यवहार पर भी सीधा प्रभाव पड़ता है। हमारा व्यवहार हमारे ग्रहों की स्थितियों से संबंध रखता है या हमारे व्यवहार से हमारे ग्रहों की स्थितियां प्रभावित होती हैं। अच्छा या बुरा व्यवहार सीधा हमारे ग्रहों को प्रभावित करता है। ग्रहों के कारण हमारे भाग्य पर भी इसका असर पड़ता है। कभी-कभी हमारे व्यवहार से हमारी किस्मत पूरी बदल सकती है।
वाणी-
वाणी का संबंध हमारे पारिवारिक जीवन और आर्थिक समृद्धि से होता है।
ख़राब वाणी से हमें जीवन में आर्थिक नुक्सान उठाना पड़ता है।
कभी-कभी आकस्मिक दुर्घटनाएं घट जाती हैं।
कभी-कभी कम उम्र में ही बड़ी बीमारी हो जाती है।
वाणी को अच्छा रखने के लिए सूर्य को जल देना लाभकारी होता है।
गायत्री मंत्र के जाप से भी शीघ्र फायदा होता है।
आचरण-कर्म
हमारे आचरण और कर्मों का संबंध हमारे रोजगार से है।
अगर कर्म और आचरण शुद्ध न हों तो रोजगार में समस्या होती है।
व्यक्ति जीवन भर भटकता रहता है।
साथ ही कभी भी स्थिर नहीं हो पाता।
आचरण जैसे-जैसे सुधरने लगता है, वैसे-वैसे रोजगार की समस्या दूर होती जाती है।
आचरण की शुद्धि के लिए प्रातः और सायंकाल ध्यान करें।
इसमें भी शिव जी की उपासना से अद्भुत लाभ होता है।
जिम्मेदारियों की अवहेलना
जिम्मेदारियों से हमारे जीवन की बाधाओं का संबंध होता है।
जो लोग अपनी जिम्मेदारियां ठीक से नहीं उठाते हैं उन्हें जीवन में बड़े संकटों, जैसे मुक़दमे और कर्ज का सामना करना पड़ता है।
व्यक्ति फिर अपनी समस्याओं में ही उलझ कर रह जाता है।
अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में कोताही न करें।
एकादशी का व्रत रखने से यह भाव बेहतर होता है।
साथ ही पौधों में जल देने से भी लाभ होता है।
सहायता न करना-
अगर सक्षम होने के बावजूद आप किसी की सहायता नहीं करते हैं तो आपको जीवन में मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
कभी न कभी आप जीवन में अकेलेपन के शिकार हो सकते हैं।
जितना लोगों की सहायता करेंगे, उतना ही आपको ईश्वर की कृपा का अनुभव होगा।
आप कभी भी मन से कमजोर नहीं होंगे।
दिन भर में कुछ समय ईमानदारी से ईश्वर के लिए जरूर निकालें।
इससे करुणा भाव प्रबल होगा, भाग्य चमक उठेगा।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (18 दिसंबर 2025)
18 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- मन में अशांति, किसी परेशानी से बचिए, कुटुम्ब की समस्याएं सुलझ जाएगी।
वृष राशि :- संवेदनशील होने से बचिएगा, नहीं तो अपने किए पर पछताना ही पड़ेगा, ध्यान रखे।
मिथुन राशि :- मानसिक कार्य में सफलता, सहयोग तथा संतोष होगा धन लाभ होगा, बिगड़े कार्य बनेंगे।
कर्क राशि :- विरोधियों का समर्थन फलप्रद होगा तथा शुभ कार्य के योग अवश्य ही बन जाएगा।
सिंह राशि :- व्यवसायिक क्षमता अनुकूल रहे, स्थिति पूर्ण नियंत्रण पर बनी ही रहेगी, ध्यान रखे।
कन्या राशि :- सामाजिक कार्यो में प्रभुत्व प्रतिष्ठा वृद्धि होगी, धन लाभ आशानुकूल सफलता से हर्ष होगा।
तुला राशि :- अधिकारी वर्ग से विशेष समर्थन फल प्राप्त होवे तथा रुके कार्य अवश्य ही बन जाएगे।
वृश्चिक राशि :- धन लाभ, कार्य कुशलता से संतोष होगा, पराक्रम एवं समृद्धि के योग बन जाएगे।
धनु राशि :- स्त्री शरीर चिन्ता, विवाद ग्रस्त होने से बचिएगा, रुके कार्य बनने के योग बनेंगे।
मकर राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक हो, दैनिक कार्य गति में सफलता अवश्य प्राप्त होगी।
कुंभ राशि :- कार्य व्यवसाय में उत्तेजना, धन का व्यय तथा शक्ति निश्फल अवश्य होगी।
मीन राशि :- अधिकारी वर्ग का समर्थन फलप्रद होवे, सामाजिक कार्य में प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
प्रकृति की तीन शक्तियां
17 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
प्रकृति में तीन शक्तियां हैं- ब्रह्म शक्ति, विष्णु शक्ति और शिव शक्ति। प्राय: तुममें कोई भी एक शक्ति अधिक प्रबल होती है। ब्रह्म शक्ति वह ऊर्जा है जो नव-निर्माण करती है; विष्णु शक्ति ऊर्जा का पालन करती है और शिव शक्ति वह ऊर्जा है जो रूपांतरण करती है- नया जीवन देकर या संहार कर। तुममें से कुछ हैं जिनमें ब्रह्म शक्ति प्रबल है। तुम सृष्टि तो कर सकते हो, पर अपनी रचना को सुरक्षित नहीं रख पाते। हो सकता है तुम तुरंत ही नए मित्र बना लो, परंतु वह मित्रता अधिक समय तक टिकती नहीं। तुममें कुछ और लोग हैं जिनमें विष्णु शक्ति है। तुम रचना नहीं कर सकते, परंतु जो है उसे अच्छी तरह संभालकर रखते हो। तुम्हारी सभी पुरानी दोस्ती बहुत स्थायी होती है, परंतु तुम नए मित्र नहीं बना पाते। और तुममें कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनमें शिव शक्ति प्रबल है। वे नव-जीवन लाते हैं या रूपांतरण, या जो है उसे खत्म करते हैं। गुरु शक्ति में ये तीनों शक्तियां पूर्ण रूप से प्रफुल्लित हैं। पहले यह पहचानो कि तुममें कौन-सी शक्ति प्रबल है और फिर गुरु शक्ति की आकांक्षा करो, प्रार्थना करो।
संपूर्ण सृष्टि सरलता और बुद्धिमत्ता के मंगलमय लय से प्रकृति के नियमों पर चल रही है। यही मंगल ही दिव्यता है। शिव वह सामंजस्यपूर्ण सरलता है जो कोई नियंत्रण नहीं जानती। शिव का विपरीत है वशी, यानी नियंत्रण। नियंत्रण मन का होता है। नियंत्रण का अर्थ है दो, द्वैत, कमजोरी। वशी का अर्थ है स्वाभाविकता से कुछ करने के बजाए दबाव द्वारा कुछ करना। प्राय: लोग समझते हैं कि उनका जीवन, परिस्थितियां उनके नियंत्रण में, उनके वश में हैं; परंतु नियंत्रण एक भ्रम है, मन में क्षणिक ऊर्जा का दबाव नियंत्रण है। यह है वशी। शिव इसका विपरीत है। शिव ऊर्जा का स्थाई और अनंत स्रेत है, सत्ता की अनंत अवस्था, वह एक जिसका कोई दूसरा नहीं। द्वैत भय का कारण है और वह सामंजस्यपूर्ण सरलता द्वैतवाद को विलीन करती है। जब एक क्षण पूर्ण है, संपूर्ण है; तब वह क्षण दिव्य है। वर्तमान क्षण में होने का अर्थ है- न भूतकाल का पछतावा, न भविष्य की कोई मांग। समय रुक जाता है, मन रुक जाता है। तुम्हारे शरीर के प्रत्येक कोष में पांचों इंद्रियों की क्षमता है। आंखों के बिना तुम देख सकते हो, दृष्टि चेतना का अंश है; इसीलिए स्वप्न में तुम आंखों के बिना देख सकते हो।
महाभारत: मन ही मन किसे पसंद करती थी दुर्योधन की पत्नी, पति की मृत्यु के बाद कर ली उसी से शादी
17 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कहा जाता है कि दुर्योधन से शादी होने से पहले उसकी पत्नी भानुमति किसी को मन ही मन चाहती थी. उससे शादी भी करना चाहती थी लेकिन ऐसा हो नहीं सका. लेकिन साफ्ट कॉर्नर तो बना ही रहा. जब महाभारत के युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु हो गई तो उसने उसी शख्स से शादी कर ली, जिसे वह मन ही मन चाहती थी.
दुर्योधन की पत्नी अतीव सुंदरी थी. बुद्धिमान थी. शादी से पहले वह जिस पुरुष से वह शादी करना चाहती थीं, जिसे पसंद करती थीं, वैसा वह नहीं कर पाईं. समय ने उन्हें दुर्योधन की पत्नी बना दिया. नाम था भानुमति. युद्ध में पति के मारे जाने के बाद जीवन ने उनके सामने फिर एक रास्ता खोला. वह जिसे चाहती थीं. उसे पति बनाने का मौका मिला. और ये शख्स एक पांडव था. कौरवों का प्रबल शत्रु
महाभारत के मुख्य पात्र दुर्योधन के बारे में बहुत लिखा और कहा गया है लेकिन क्या आपको मालूम है कि उनकी पत्नी कौन थी, जिसे वह बहुत प्यार करते थे. उसका महाभारत के युद्ध में पति समेत कौरवों की मृत्यु के बाद क्या हुआ. दुर्योधन की पत्नी का नाम भानुमति था, जो अपूर्व सुंदरी थी
आंचलिक कथाओं में ये कहा गया कि जब दुर्योधन नहीं रहा तो भानुमति ने अर्जुन से विवाह कर लिया. कहा जाता है कि दुर्योधन से विवाह करने से पहले वह मन ही मन अर्जुन को चाहती थीं. हालांकि अर्जुन से विवाह के कोई पुख्ता साक्ष्य महाभारत या उसकी उत्तर कथा वाले ग्रंथों में नहीं मिलते.
महाभारत के मुताबिक दुर्योधन की पत्नी का नाम भानुमति था. महाभारत में दुर्योधन की पत्नी का तीन बार ज़िक्र मिलता है. शांति पर्व में बताया गया है कि दुर्योधन ने कर्ण की मदद से राजा चित्रांगद की बेटी भानुमति का स्वयंवर से अपहरण करके विवाह कर लिया था. बाद में, स्त्री पर्व में भी दुर्योधन की सास गांधारी ने भानुमति का ज़िक्र किया है. भानुमती के एक बेटा और एक बेटी थी
शांति पर्व में ऋषि नारद दुर्योधन और कर्ण की मित्रता के बारे में एक कहानी सुनाते हुए बताते हैं कि किस तरह कर्ण की मदद से दुर्योधन ने कलिंग राजा चित्रांगद की बेटी का अपहरण कर शादी की थी. भानुमति के बारे में उल्लेख हुआ है कि वह ताजिंदगी कृष्ण की पूजा करती रही. बेशक उसके पति दुर्योधन ने कई बार कृष्ण को खरीखोटी सुनाई, अपमान भी किया लेकिन भानुमति के लिए वह हमेशा आराध्य रहे. यहां तक कि पति के निधन के बाद भी वह उनकी भक्त बनी रही
भानुमति के बारे में उल्लेख किया गया है कि वह ताजिंदगी कृष्ण की पूजा करती रही. बेशक उसके पति दुर्योधन ने कई बार कृष्ण को खरीखोटी सुनाई, अपमान भी किया लेकिन भानुमति के लिए वह हमेशा आराध्य रहे. यहां तक कि पति के निधन के बाद भी वह उनकी भक्त बनी रही. महाभारत के स्त्री पर्व में दुर्योधन की मां गांधारी , कृष्ण से अपनी पुत्रवधू का वर्णन इस प्रकार करती हैं. भानुमति के बेटे का नाम लक्ष्मण था, जो खुद महाभारत के युद्ध में मारा गया. बेटी का नाम लक्ष्मणा था
गांधारी कृष्ण से कहती हैं, हे कृष्ण! देखो, ये दृश्य मेरे पुत्र की मृत्यु से भी अधिक दुःखदायी है. दुर्योधन की प्रिय पत्नी महाबुद्धिमान कन्या है, देखो वह कैसे अपने पति और बेटे के लिए विलाप कर रही है. अब सवाल ये उठता है कि भानुमति ने पति दुर्योधन के सबसे बड़े दुश्मन पांडु पुत्र अर्जुन से क्यों विवाह कर लिया. भानुमति जितनी रूपवती थी, उतनी ही चतुर भी.
कहा जाता है कि जब महाभारत का युद्ध तय हो गया, तब भानुमति को पता था कि कौरवों का सर्वनाश हो जाएगा. अपने कुनबे को बचाने के लिए उसने ही भगवान श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब को अपनी पुत्री लक्ष्मणा को भगाकर ले जाने की युक्ति सुझाई
एक अन्य कथा के अनुसार साम्ब जब लक्ष्मणा का अपहरण कर फरार हो गया तो भानुमति ने दुर्योधन को अपने अपहरण की याद दिलाई और साम्ब से लक्ष्मणा के विवाह में अहम भूमिका निभाई. भानुमति ने अपने कुनबे को बचाने के लिए हर वो असंगत कार्य किया, हर उस चीज को जोड़ा, जिसका जुड़ना संभव नहीं था. इसीलिए कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा. संबंधित कहावत बनी
पुत्र की मृत्यु से लक्ष्मणा को गहरा झटका लगा था, महाभारत के युद्ध में अभिमन्युू के हाथों दुर्योधन के पुत्र की मृत्यु हुई थी. इसके बाद भी भानुमति को मालूम था कि खुद को सुरक्षित रखने के लिए अर्जुन से विवाह कर लेना चाहिए. भगवान कृष्ण ने इसमें खास भूमिका अदा की. उन्होंने अर्जुन और भानुमति का विवाह कराया
इसके पीछे एक कहानी और कही जाती है कि भानुमती शल्य की बेटी थी, जो नकुल और सहदेव के चाचा थे. वह पहले अर्जुन से ही शादी करना चाहती थी. जब स्वयंवर हुआ तो अर्जुन उसमें आए ही नहीं, तब उसने पिता की इच्छा थी कि वह दुर्योधन से शादी करे तो उसने वैसा ही किया लेकिन पति के निधन के बाद अर्जुन की नौवीं पत्नी बनना पसंद किया. इसकी वजह ये भी थी कि अब कोई लड़ाई नहीं हो और कुनबे में शांति बनी रहे.
महाभारत में युद्ध के बाद की उत्तर कथा ज्यादा नहीं मिलती, लिहाजा किसी बड़े ग्रंथ में अर्जुन और भानुमति के विवाह की कोई जानकारी नहीं मिलती. लेकिन ये बात एकदम तय है कि महाभारत युद्ध में भीम के हाथों दुर्योधन की मृत्यु के बाद पांडवों ने भानुमति का सम्मान किया. वह अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित थी. उसने कौरव और पांडव परिवारों को एकजुट करने की कोशिश की. कुछ जानकारियां ये भी कहती हैं कि वह पति के निधन के बाद विधवा रहीं.
कथाएं ये भी कहती हैं कि भानुमति ने अपने ससुराल में रहकर धृतराष्ट्र की सेवा की. धृतराष्ट्र के साथ गंगा नदी के किनारे रहकर तपस्या की.बाद में भानुमति ने गंगा में समाधि ले ली. एक तमिल लोककथा है, जिसमें बताया गया कि दुर्योधन के कहने पर कर्ण अक्सर भानुमति की देखभाल के लिए उसके पास आ जाता था. कर्ण और भानुमती ने पासा खेलना शुरू किया. धीरे-धीरे कर्ण जीतने लगा. इसी बीच दुर्योधन लौटा. कमरे में प्रवेश किया. पति को अंदर आते देख भानुमती सम्मान से खड़ी हो गई. कर्ण को पता नहीं लगा. उसको लगा कि भानुमति इसलिए उठ गई क्योंकि हारना नहीं चाहती.
कर्ण ने भानुमती की शॉल पकड़कर खींचा तो शॉल के मोती बिखर गए. इससे भानुमति की स्थिति बहुत विचित्र हो गई, वह स्तब्ध हो गई कि अब पति पता नहीं क्या सोचेगा और करेगा. तब दुर्योधन ने समझदारी का परिचय देते हुए दोनों को अप्रिय स्थिति से बचा लिया. उसने पत्नी से कहा, "क्या मुझे सिर्फ मोतियों को इकट्ठा करना चाहिए या क्या आप चाहेंगी कि मैं उन्हें भी पिरोऊँ?" दरअसल दुर्योधन को अपनी पत्नी पर बहुत विश्वास था.
शिवाजी सावंत के उपन्यास मृत्युंजय में , जो कर्ण के जीवन पर आधारित है, उसमें लिखा है कि भानुमती की एक दासी थी जिसका नाम सुप्रिया था, जो उसके बहुत करीब थी. जब दुर्योधन और कर्ण ने भानुमती का अपहरण किया तो सुप्रिया भी साथ चली आई. जब भानुमती ने दुर्योधन को अपना जीवनसाथी स्वीकार कर लिया तो सुप्रिया ने कर्ण को पति चुना. हालांकि सुप्रिया ने कर्ण के युद्ध में वीरगति प्राप्त करने के बाद ताजिंदगी विधवा रहने का ही फैसला किया. हालांकि उसे भी दूसरा विवाह कर लेने की सलाह दी गई थी.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (17 दिसंबर 2025)
17 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- मान प्रतिष्ठा बाल-बाल बचें, कार्य व्यवसाय गति उत्तम, स्त्री से हर्ष उल्लास होगा।
वृष राशि :- धन प्राप्त के योग बनेंगे, नवीन मैत्री तथा मंत्रणा फल प्राप्त होगा, समय का ध्यान रखे।
मिथुन राशि :- इष्ट मित्र सहायक रहे, व्यावसायिक क्षमता में वृद्धि होवे तथा कार्य अवश्य बन जाएगे।
कर्क राशि :- सामाजिक मान प्रतिष्ठा, कार्यकुशलता से संतोष, रुके कार्य बन ही जाएंगे, ध्यान दें।
सिंह राशि :- परिश्रम से समय पर कार्य पूर्ण होंगे तथा व्यवसाय गति उत्तम अवश्य बनेगी।
कन्या राशि :- अधिकारियों का समर्थन फलप्रद्र रहे तथा कार्य कुशलता से संतोष होगा, ध्यान रखे।
तुला राशि :- दैनिक व्यवसाय गति उत्तम, मान सम्मान तथा व्यावसायिक चिन्ताएं कम होगी।
वृश्चिक राशि :- कार्यवृत्ति में सुधार होगा, असमंजस तथा सफलता न मिलें, कार्य अवरोध होगा।
धनु राशि :- स्थिति अनियमित रखे तथा नियंत्रण स्थिति को रखना आवश्यक होगा, ध्यान रखे।
मकर राशि :- मानसिक खिन्नता एवं भाव में मानसिक उद्विघ्नता, अस्थिरता अवश्ह ही होगी।
कुंभ राशि :- योजनाएं फलीभूत होगी, विघटनकारी तत्व परेशान अवश्य ही करेंगे।
मीन राशि :- मनोबल उत्साह वर्धक होगा, कार्य कुशलता से संतोष अवश्य होगा।
मां काली के इस मंदिर ने बदला बंगाल का भाग्य, हर रात गायब हो जाती है प्रतिमा, ब्रिटिश सेना से लड़ने के लिए मिली तलवार
16 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अपनी परेशानियों और दुख से मुक्ति के लिए भक्त पूजनीय देवी-देवताओं के पास आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में एक ऐसा मंदिर है, जहां खुद मां भक्तों के संकट निवारण के लिए मंदिर से बाहर निकलती हैं. बंगाल में स्थापित मां काली का यह मंदिर कई मायनों में खास है. यह मंदिर श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है. बताया जाता है कि आजादी के आंदोलन में भी इस मंदिर का काफी योगदान रहा है और यहां हर दिन ऐसे चमत्कार होते हैं, जिसे देखकर कोई भी विश्वास नहीं करता. मान्यता है कि माता काली के दर्शन करने मात्र से भय, संकट, ग्रह-नक्षत्र के अशुभ प्रभाव, नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है और हर कार्य में सफलता मिलती है. आइए जानते हैं माता काली के इस मंदिर के बारे में…
मां काली का अद्भुत मंदिर
पश्चिम बंगाल के नाओगांव के पास काशीपुर गांव में मां काली का एक अद्भुत मंदिर है, जिसे विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. मंदिर में मां को खुश करने के लिए भक्त प्रतिमा को सिर पर उठाकर चलते हैं और उनका खास तौर पर आशीर्वाद पाते हैं. यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और भक्त हर साल परंपरा का निर्वाह करते हैं.
रात के समय गायब हो जाती है प्रतिमा
काली मंदिर को लेकर मान्यता है कि मां काली की प्रतिमा रात के समय गायब हो जाती है क्योंकि मां अपने भक्तों के संकट हरने के लिए खुद मंदिर का पवित्र स्थान छोड़कर भक्तों के पास जाती हैं. यह मंदिर अपनी चमत्कारी शक्ति और परंपरा के लिए प्रसिद्ध है और मां को ‘भवतारिणी’ रूप में पूजा जाता है. यह रूप मां ने भक्तों को संकट से मुक्त करने के लिए धारण किया था.
आजादी के आंदोलन में माता काली की भूमिका
प्रतिमा बहुत अद्भुत है, जहां मां काली भगवान शिव की छाती पर पैर रखे खड़ी हैं. मां के हाथ में खड़ग और कमल का फूल दोनों हैं, जो उनके उग्र और कोमल दोनों रूपों को दिखाता है. इस मंदिर को बंगाल का भाग्य बदलने वाला मंदिर भी कहा जाता है. पौराणिक कथाओं की मानें तो जब बंगाल पर ब्रिटिश सेना ने हमला किया था, तब राजा कृष्ण चंद्र ने ब्रिटिश सेना का सामना किया था. इस जंग में बंगाल के कई गांव जल गए थे और अकेले लड़ते राजा कृष्ण चंद्र हारने की कगार पर पहुंच गए थे.
कृष्ण-काली भक्त के रूप में हुए प्रसिद्ध
बताया जाता है कि ऐसे में उन्होंने मां काली की घोर तपस्या की थी. भक्त की तपस्या से प्रसन्न होकर मां काली स्वयं प्रकट हुईं और उन्होंने लड़ने के लिए एक शक्तिशाली तलवार भी प्रदान की थी. इस घटना के बाद राजा ने ब्रिटिश सेना का सामना किया और उन्हें खदेड़ दिया. राज्य को बचाने के बाद राजा कृष्ण चंद्र ‘कृष्ण-काली भक्त’ के रूप में प्रसिद्ध हो गए. इसी कथा के बाद से मंदिर को विजय के प्रतीक और दिव्य ऊर्जा के स्रोत के रूप में पूजा जाता है.
9000 हजार साल पुराना दक्षिण भारत का पहला तिरुपति मंदिर! देवताओं ने रखी थी मंदिर की नींव, नारदजी ने की थी मूर्ति स्थापित
16 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
दक्षिण भारत में तिरुपति बालाजी मंदिर की महिमा बहुत ज्यादा है, हर भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए इस मंदिर की चौखट पर जरूर आता, लेकिन क्या आप जानते हैं कि तिरुपति बालाजी मंदिर से अधिक पुराना मंदिर आंध्र प्रदेश में मौजूद है? इस मंदिर को पहला और असली तिरुपति मंदिर माना जाता है. हम बात कर रहे हैं आंध्र प्रदेश के काकीनाडा जिले के पास बने श्री श्रृंगरा वल्लभ स्वामी मंदिर की, जो अपने आप में एक इतिहास को संजोए हुए है. बताया जाता है कि देवताओं ने खुद इस मंदिर की नींव रखी थी और महर्षि नारद ने माता लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित की थी. मान्यता है कि यहां दर्शन करने मात्र से ही सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं. आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में खास बातें…
श्री श्रृंगरा वल्लभ स्वामी मंदिर
श्री श्रृंगरा वल्लभ स्वामी मंदिर को ‘थोली तिरुपति’ मंदिर भी कहा जाता है. ‘थोली तिरुपति’ का मतलब है पहला तिरुपति. यह मंदिर इसलिए भी खास है क्योंकि मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर की मुस्कुराती प्रतिमा मौजूद है, जो उम्र में ऊंचाई के साथ अलग-अलग नजर आती है. भगवान वेंकटेश्वर की मुस्कुराती प्रतिमा को लेकर कहा जाता है कि अगर प्रतिमा को बच्चे देखते हैं तो वे उन्हें बाल रूप में नजर आते हैं और जब बड़े भक्त देखते हैं, तो वे बड़े वेंकटेश्वर के रूप में दर्शन देते हैं.
भगवान वेंकटेश्वर की प्रतिमा स्वयंभू
मंदिर में मौजूद भगवान वेंकटेश्वर की प्रतिमा स्वयंभू है. प्रतिमा में शंख-चक्र भी तिरुमला बालाजी से उल्टी दिशा में है. तिरुमला बालाजी में दाईं तरफ सुदर्शन चक्र और बाईं तरफ शंख है, लेकिन श्री श्रृंगरा वल्लभ स्वामी मंदिर में दोनों की उपस्थिति उल्टी है. 9000 साल पुराने मंदिर के निर्माण को लेकर भी कहा जाता है कि मंदिर की नींव खुद देवी-देवताओं ने रखी थी, जिसके बाद धीरे-धीरे मंदिर का निर्माण हुआ. कहा जाता है कि महर्षि नारद ने देवी लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित की थी. पहले मंदिर में भगवान वेंकेटश्वर अकेले थे, जिसके बाद नारद महर्षि ने मंदिर को पूर्ण करने के लिए मां लक्ष्मी के रूप में देवी भूदेवी की स्थापना की.
मंदिर में मौजूद शिलालेख
मंदिर में कुछ शिलालेख भी मौजूद हैं, जो मंदिर के इतिहास को दिखाते हैं. शिलालेखों पर पुरानी तमिल भाषा में मंदिर के इतिहास के बारे में लिखा है. खास बात ये है कि मंदिर के प्रांगण में एक कुआं मौजूद है, जिसे चमत्कारी कुआं कहा जाता है. कुएं के पानी में 15 जड़ी-बूटियों का मिश्रण होने का दावा किया जाता है और मंदिर के प्रसाद को बनाने में इसी पानी का प्रयोग सदियों से होता आया है. इस कुएं का पानी स्वाद में मीठा होता है. भक्त शरीर की बीमारियों से निजात पाने के लिए कुएं का पानी अपने साथ भी लेकर जाते हैं. मंदिर में बड़ा मंडपम भी मौजूद है, जो कि कई स्तंभों के सहारे खड़ा है. स्तंभ पर भगवान विष्णु के अलग-अलग रूपों की प्रतिमा अंकित की गई है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (16 दिसंबर 2025)
16 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- धन का व्यय संभव है, तनावपूर्ण वार्ता से बचिएगा, कार्य का ध्यान अवश्य दें।
वृष राशि :- अधिकारियों के समर्थन से सफलता, कार्य कुशलता से संतोष हो तथा कार्य करें।
मिथुन राशि :- चिन्ताएं कम हो, सफलता के साधन जुटाए तथा शुभ समाचार अवश्य ही प्राप्त होगा।
कर्क राशि :- बड़े-बड़े लोगों से मेल मिलाप होगा तथा सुख समृद्धि के साधन अवश्य ही बनेंगे।
सिंह राशि :- स्त्रीवर्ग से हर्ष उल्लास होवे, भोग ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी तथा कार्य गति उत्तम होगी।
कन्या राशि :- प्रतिष्ठा बाल-बाल बचें, संघर्ष से अधिकारियों का भाग्य तथा साथ अवश्य प्राप्त होगा।
तुला राशि :- कुटुम्ब और धन की चिन्ता बनी रहें, परिश्रम से सोचे कार्य अवश्य ही हो जाएगे।
वृश्चिक राशि :- प्रत्येक कार्य में बाधा क्लेश, स्थिति सामर्थ्य के योग्य अवश्य ही बनेगी।
धनु राशि :- भावनाएं मन को विक्षुब्ध रखे, दैनिक कार्यगति मंद रहे, परिश्रम से कार्य अवश्य सफल होगे।
मकर राशि :- तनाव क्लेश व अशांति, धन का व्यय, मानसिक खिन्नता अवश्य ही बन सकेगी।
कुंभ राशि :- कार्य कुशलता से संतोष, व्यावसायिक समृद्धि के साधन बनेंगे, कार्य बनेंगे।
मीन राशि :- कुटुम्ब के कार्यों में समय बीतेगा तथा हर्षप्रद समाचार अवश्य ही मिलेगे।
दक्षिण का काशी में दर्शन करने मात्र से कालसर्प और ग्रह दोष से मिलेगी मुक्ति, दोनों हर मामले में एक जैसे
15 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पूरे भारत में काशी को मोक्ष का स्थान कहा गया है और वहां काशी विश्वनाथ के रूप में भगवान शिव विराजमान हैं, लेकिन दक्षिण भारत में एक ऐसा मंदिर है जिसे दूसरा काशी कहा जाता है. काशी और आंध्र प्रदेश का एक गांव, पेडकल्लेपल्ली, आध्यात्मिक और भौगोलिक दृष्टि से एक जैसे हैं और यही वजह है कि पेडकल्लेपल्ली में बने शिव मंदिर की तुलना काशी के विश्वनाथ शिव मंदिर से होती है. इस मंदिर में दर्शन करने मात्र से ग्रहों से जुड़े सभी दोषों का निवारण होता है और कालसर्प दोष से भी मुक्ति मिलती है. मान्यता है कि यहां भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और यहां आने पर शिवलोक जैसा महसूस होता है. आइए जानते हैं दक्षिण के काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में…
पेडाकल्लेपल्ली श्री दुर्गा नागेश्वर स्वामी मंदिर
आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के पास बने पुराने गांव पेडाकल्लेपल्ली में श्री दुर्गा नागेश्वर स्वामी मंदिर स्थापित है. इस मंदिर को पेडाकल्लेपल्ली मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. मंदिर में भगवान शिव नागेश्वर स्वामी के रूप में विराजमान हैं और मां पार्वती को मां दुर्गा के रूप में विराजित किया गया है. ये मंदिर भगवान शिव और मां पार्वती के प्रेम और तप का प्रतीक है.
क्षेत्रपालक के रूप में भगवान वेणुगोपाल स्वामी मौजूद
मंदिर को पुराने समय से ही दक्षिण काशी के नाम से भी जाना जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि पेडाकल्लेपल्ली में कृष्णा नदी उत्तर की ओर बहती है जैसे गंगा नदी बनारस में उत्तर की ओर बहती है. दूसरा, काशी में क्षेत्रपालक भगवान बिंदु माधव स्वामी हैं, जबकि पेडाकल्लेपल्ली में क्षेत्रपालक के रूप में भगवान वेणुगोपाल स्वामी मौजूद हैं. माना जाता है कि वेणुगोपाल स्वामी को पेडाकल्लेपल्ली का क्षेत्रपाल खुद महर्षि विश्वामित्र ने बनाया था.
शैली में उत्तर भारत और दक्षिण भारत
मंदिर की दीवार से लेकर गोपुरुम तक कई अलग राजाओं और शैलियों की झलक देखने को मिलती है. 12वीं शताब्दी में काकतीय राजगुरु सोमशिवाचार्य ने निर्माण कार्य शुरू किया था, जिसके बाद 17वीं शताब्दी में श्री यारलागड्डा कोदंडा रमन्ना ने मंदिर का कुछ हिस्सा बनवाया और 1795 में मंदिर के ट्रस्ट से जुड़े श्री यारलागड्डा नागेश्वर राव नायडू ने मंदिर के गोपुरम का निर्माण कराया. मंदिर पर काकतीय शैली का सबसे ज्यादा प्रभाव देखने को मिलता है. इस शैली में उत्तर भारत और दक्षिण भारत दोनों की झलक देखने को मिलती है.
ग्रह दोष और कालसर्प दोष से यहां मिलती है मुक्ति
ग्रहों से जुड़ी समस्या या सर्प दोष से पीड़ित भक्त इस मंदिर में दर्शन के लिए जरूर आते हैं. माना जाता है कि मंदिर में भगवान शिव और मां दुर्गा के सामने अनुष्ठान करने से सारे ग्रह संतुलित हो जाते हैं. मंदिर में सर्प दोष निवारण के लिए अलग से अनुष्ठान कराया जाता है. मंदिर में एक कुंड भी बना है. माना जाता है कि इस कुंड का निर्माण नागों के कर्कोटक यानी राजा ने किया था. सर्प दोष से बचने के लिए इसी कुंड में भक्त पवित्र स्नान करने आते हैं. शिवरात्रि और सावन के महीने में मंदिर में सबसे ज्यादा भीड़ लगती है.
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