धर्म एवं ज्योतिष
नए साल में चमकाना है किस्मत? घर ले आएं सूर्य से जुड़ी कुछ खास चीजें और कर लें सरल उपाय
25 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अंक ज्योतिष के अनुसार सूर्य का साल माना जा रहा है. सूर्य को हिंदू धर्म में शक्ति, ऊर्जा, नेतृत्व और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. इस साल घर में सूर्य से जुड़ी चीजें रखने से जीवन में सफलता, मान-सम्मान और समृद्धि बढ़ती है. सूर्य का प्रभाव केवल स्वास्थ्य और करियर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह परिवार में सकारात्मक ऊर्जा और खुशहाली भी लाता है. इस वर्ष उन सभी चीजों को अपनाना बेहद शुभ रहेगा जो सूर्य की ऊर्जा को मजबूत करती हैं. इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि साल 2026 में घर में कौन-कौन सी चीजें लाना शुभ रहेगा और इन्हें रखने से आपके जीवन में किस प्रकार के लाभ हो सकते हैं. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
1. सूर्य देव की मूर्ति या तस्वीर साल 2026 में सूर्य देव की मूर्ति या तस्वीर घर में लाना अत्यंत लाभकारी रहेगा. इसे घर की पूर्व दिशा में रखें. इससे परिवार के सदस्यों को मान-सम्मान और करियर में तरक्की मिलेगी. साथ ही घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहेगी.
2. तांबे का सूर्य चिन्ह तांबे का सूर्य चिन्ह घर के मुख्य द्वार या पूर्व दिशा की दीवार पर लगाएं. प्रतिदिन इस पर गंगाजल छिड़कें और रोली का टीका लगाएं. यह उपाय घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और करियर में सफलता दिलाता है.
3. तांबे की अन्य चीजें साल 2026 में सूर्य की शक्ति बढ़ाने के लिए तांबे की चीजें जैसे लोटा, गिलास या अन्य सजावटी वस्तुएं घर में रखें. इससे घर में धन-संपत्ति और सुख-शांति बनी रहती है.
4. सूर्य देव की सात घोड़े वाली तस्वीर सात घोड़े वाली सूर्य रथ की तस्वीर घर में पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है. यह तस्वीर ज्ञान और ऊर्जा का प्रतीक है. इसे रखने से समाज में मान-सम्मान बढ़ता है और परिवार में खुशहाली बनी रहती है.
5. रोजाना सूर्य को जल अर्पित करें स्नान के बाद उगते हुए सूर्य को जल अर्पित करना लाभकारी रहेगा. तांबे के लोटे में जल डालकर लाल फूल, रोली और अक्षत मिलाकर अर्पित करें. यह उपाय जीवन में सफलता और सुख-शांति लाता है.
6. रविवार को दान करें रविवार के दिन गुड़, गेहूं, अन्न और धन का दान करना शुभ रहेगा. इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और घर में समृद्धि आती है.
7. मंत्र का जाप सूर्य को जल चढ़ाते समय 'ॐ सूर्याय नमः' या 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' मंत्र का जाप करें. इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और जीवन में बाधाएं कम होती हैं.
8. पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा सूर्य देव को जल चढ़ाने और पूजा करने के समय पूर्व दिशा की ओर मुख करें. यह दिशा सूर्य की शक्ति को सबसे अधिक आकर्षित करती है. इससे घर में सुख-समृद्धि और ऊर्जा का संचार होता है.
साल 2026 सूर्य का वर्ष है, इसलिए घर में सूर्य से जुड़ी चीजें लाना अत्यंत शुभ रहेगा. सूर्य देव की मूर्ति, तांबे की चीजें और सात घोड़े वाली तस्वीर रखने से परिवार में खुशहाली, सफलता और मान-सम्मान बढ़ेगा. साथ ही रोजाना जल अर्पित करना, मंत्र जाप और दान करने से घर में समृद्धि का वातावरण बनेगा.
क्या आप जानते हैं ठाकुर जी के सामने खड़े होकर दर्शन करने से क्यों मना किया जाता है?
25 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारतीय संस्कृति में भगवान के दर्शन केवल आंखों से देखने का कार्य नहीं होते, बल्कि यह आत्मा और चेतना को अनुभव कराने का एक माध्यम होते हैं. घर हो या मंदिर, अक्सर बड़े बुजुर्ग या पुजारी यह सलाह देते हैं कि ठाकुर जी की प्रतिमा के बिल्कुल सामने खड़े होकर दर्शन न किए जाएं. यह परंपरा केवल रीति-रिवाज का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी आध्यात्मिक और ऊर्जा संबंधी कारण छिपे हैं. चाहे घर का छोटा सा मंदिर हो या वृंदावन का भव्य धाम, दर्शन का विशेष तरीका भक्त और भगवान के बीच सम्मान और विनम्रता का संदेश देता है. सीधे सामने खड़े होने के बजाय थोड़ा किनारे से झुककर दर्शन करना भावनात्मक और ऊर्जा दृष्टि से अधिक उपयुक्त माना जाता है. यह अभ्यास न केवल भक्त के भीतर शांति और भक्ति भाव को जागृत करता है, बल्कि भगवान की ऊर्जा का सही तरीके से अनुभव कराता है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
दर्शन के पीछे का कारण
भगवान की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा के माध्यम से अपार ऊर्जा समाहित होती है. ठाकुर जी, अर्थात श्रीकृष्ण की दृष्टि में विशेष शक्ति होती है. जब कोई प्रतिमा के ठीक सामने खड़ा होता है, तो उस ऊर्जा की तीव्रता शरीर पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकती है. इसे सूरज की सीधी रोशनी में देखने से आंखों पर प्रभाव पड़ने के समान समझा जा सकता है. किनारे से दर्शन करने पर यह ऊर्जा धीरे-धीरे अनुभव होती है और शरीर उसे सहज रूप से ग्रहण कर पाता है.
इसके अलावा सीधे सामने खड़े होना कभी-कभी अहंकार का प्रतीक माना जाता है. इससे यह प्रतीत होता है कि भक्त ईश्वर के सामने अपनी स्थिति में बराबरी का भाव रख रहा है. वहीं थोड़ा तिरछा या हटकर खड़ा होना विनम्रता और दास्य भाव को दर्शाता है. झुककर दर्शन करने पर भक्त के भीतर यह भाव उत्पन्न होता है कि वह भगवान के चरणों का सेवक है. यही भाव उसकी भक्ति को प्रबल और गहन बनाता है
भक्ति शास्त्र में दर्शन को चरणबद्ध तरीके से करने का विधान है. पहले चरणों का, फिर कमर, उसके बाद वक्षस्थल और अंत में मुखारविंद यानी चेहरे का दर्शन किया जाता है. यदि सीधे सामने खड़े हो जाएं तो ध्यान भटक सकता है और भक्ति की गहनता कम हो सकती है. किनारे से दर्शन करने पर भक्त मूर्ति के स्वरूप को क्रमबद्ध और ध्यानपूर्वक देख सकता है.
ब्रज की परंपरा में यह भी मान्यता है कि सीधे सामने देखने से मूर्ति पर नजर लग सकती है. इसलिए भक्त झुककर या तिरछा खड़े होकर भगवान का सम्मान करते हैं. मंदिरों में मूर्तियों को ऐसे स्थान पर रखा जाता है, जहां पृथ्वी की ऊर्जा तरंगें अधिकतम होती हैं. मूर्ति के सामने खड़े होने से इन तरंगों का केंद्र सीधे शरीर पर पड़ता है, जबकि किनारे से खड़े होने पर ये ऊर्जा धीरे-धीरे हमारे शरीर और चक्रों पर प्रभाव डालती है.
ठाकुर जी के दर्शन सीधे सामने से न करना केवल परंपरा नहीं है, बल्कि यह भक्त की सुरक्षा, भक्ति भाव और ऊर्जा संतुलन का ध्यान रखने का तरीका है. झुककर या तिरछा खड़े होकर दर्शन करना विनम्रता और श्रद्धा का प्रतीक है. यह प्रक्रिया भक्त और भगवान के बीच संबंध को गहरा बनाती है और अनुभव को पूर्ण करती है.
कुछ लोगों को देखकर कुत्ते अचानक क्यों भौंकने लगते हैं? शनि दोष से क्या है संबंध
25 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कई बार आपने महसूस किया होगा, गली में चलते वक्त या किसी घर के बाहर, कुत्ता बिना वजह किसी एक इंसान को देखकर जोर-ज़ोर से भौंकने लगता है, जबकि साथ चल रहे बाकी लोगों पर उसका कोई रिएक्शन नहीं होता. ऐसे में मन में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों? क्या ये सिर्फ जानवरों की सामान्य आदत है या इसके पीछे ज्योतिष और ऊर्जा से जुड़ा कोई रहस्य भी छिपा है? भारतीय ज्योतिष शास्त्र और लोक मान्यताओं में कुत्तों को सिर्फ पालतू जानवर नहीं, बल्कि ऊर्जा पहचानने वाला जीव माना गया है. माना जाता है कि कुत्ते उन चीजों को महसूस कर लेते हैं, जिन्हें इंसान नहीं देख पाता. आइए जानते हैं आखिर कुत्ते ऐसा क्यों करते हैं…
ज्योतिष शास्त्र में कुत्ते का महत्व
ज्योतिष के अनुसार कुत्ते का संबंध सीधे न्याय व कर्म के कारक ग्रह शनि से माना जाता है. शनि ग्रह को कर्म, न्याय और अदृश्य शक्तियों का कारक ग्रह कहा जाता है. यही वजह है कि कुत्ते नकारात्मक ऊर्जा को जल्दी पहचान लेते हैं. जिन लोगों पर शनि ग्रह का प्रभाव अशुभ होता है, उन पर कुत्ते ज्यादा प्रतिक्रिया दे सकते हैं. कई मान्यताओं में कुत्तों को यमराज का दूत भी कहा गया है.
अदृश्य शक्तियों को कर लेते हैं महसूस
ज्योतिष का मानना है कि हर इंसान के आसपास एक ऊर्जा क्षेत्र होता है. अगर किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति खराब हो, गुस्सा, डर या बुरे विचार हावी हों तो कुत्ता उसे महसूस कर लेता है. साथ ही माना जाता है कि जिन लोगों की कुंडली में शनि दोष या पितृ दोष होता है, उनके आसपास कुत्ते बार-बार भौंकते या पीछे पड़ जाते हैं. ग्रामीण और पारंपरिक मान्यताओं में कहा जाता है कि कुत्ते नकारात्मक या अदृश्य शक्तियों को देख सकते हैं. इसीलिए रात में अचानक कुत्तों का भौंकना शुभ नहीं माना जाता.
चाल को बारीकी से पढ़ते हैं कुत्ते
सभी जानवरों की तरह कुत्तों की भी अपनी टेरिटरी होती है और जब कोई अजनबी उस टेरिटरी में आता है तो वह भौंककर चेतावनी जारी करता है कि यहां मत आओ. जो तेज-तेज चलकर आते हैं या अचानक से आ जाते हैं, उन पर कुत्ते ज्यादा रिएक्शन देते हैं. कुत्ते इंसान की बॉडी लैंग्वेज और चाल को बारीकी से पढ़ते हैं और उनकी हर चीज पर बारीकी से ध्यान देते हैं. कुत्तों में सूंघने की शक्ति इंसान से 1 लाख गुना ज्यादा होती है.
भौंककर देते हैं चेतावनी
कुत्ते इंसान की घबराहट, नशा या तनाव की गंध तुरंत जान लेता है, ऐसे लोगों पर ज्यादा भौंकते हैं क्योंकि इस तरह के इंसानों से ज्यादा खतरा लगता है. अगर आपका कुत्ता किसी खास व्यक्ति पर भौंकता है तो उसको गंभीरता से लें. कुत्ते इंसान से बेहतर खतरे को भांप लेते हैं और भौंककर ये उनकी सतर्कता का संकेत है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (25 दिसंबर 2025)
25 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- किसी शुभ समाचार के मिलने का योग है, व्यावसायिक गति उत्तम रहेगी।
वृष राशि :- मनोवृत्ति संवेदनशील रहेगी, कार्यगति अनुकूल, चिन्ता कम होगी, ध्यान रखे।
मिथुन राशि :- किसी प्रलोभन से हानि, मनोवृत्ति संवेदनशील रहेगी तथा कार्य गति उत्तम होगी।
कर्क राशि :- अनायास यात्रा, स्त्री वर्ग से कष्ट, वाद विवाद से परेशानी अवश्य हो।
सिंह राशि :- विरोधियों के षड़यंत्र से मानसिक परेशानी बनेगी, बेचैनी बढ़ेगी, कार्य रुकेंगे।
कन्या राशि :- शरीर कष्ट, लाभ, राजभय, उद्योग व्यापार में आंशिक लाभ होगा।
तुला राशि :- योग विलाप, धार्मिक कार्य कष्ट, व्यय अनाप-शनाप खर्च, परेशानी बनेगी।
वृश्चिक राशि :- बाधा, उलझन से लाभ, यात्रा से कष्ट, गृह कार्य राजकार्य में रुकावट रहेगी।
धनु राशि :- शत्रुभय, मुकदमें, लाभ, जमीन से लाभ, रोग भय बाधा, व्यापार में सुधार होगा।
मकर राशि :- व्यापार में लाभ, शत्रु भय, धन सुख धार्मिक खर्च बढ़ेंगे, कुछ मेहनत के कार्य बनें।
कुंभ राशि :- कलह, व्यर्थ खर्च, सफलता प्राप्त, विरोधी असफल रहे, व्यापार में सुधार होगा।
मीन राशि :- स्वजन सुख, पुत्र चिन्ता, सुख की हानि, व्यापार में स्थायी लाभ न हो।
क्यों खरमास में नहीं होते शुभ काम? गधे की इस कहानी से अनजान हैं 90% लोग, हर किसी को जानना है जरूरी
24 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
खर्मास हिन्दू कालगणना में एक विशेष समय है. यह वो अवधि है जब सूर्योदय का प्रभाव कम माना गया है और इसलिए सामान्य जीवन के शस्त्र यानी विवाह, गृह प्रवेश जैसे बड़े कार्यक्रम टाल दिए जाते हैं. लोग मानते हैं कि इस समय शुभ कार्यों का परिणाम ठीक नहीं मिलता. इसी कारण से खर्मास में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं. पर यह वर्जन केवल विश्वास पर आधारित नहीं बल्कि उसकी पौराणिक कथा भी उपलब्ध है. इंसान समय और ग्रहों के गमन को देखते हुए किसी भी कार्य के आरंभ या समापन का निर्णय लेते रहे हैं. खर्मास की कथा में भी एक पुरानी कथा मिलती है जिसमें सूर्यदेव और अन्य देवों का वर्णन आता है. यह काल एक महीने का होता है और साल में दो बार आता है.
2025 में खर्मास का आखिरी खंड दिसंबर की मध्य से प्रारंभ हुआ है. ज्योतिषीय पंचांग के अनुसार सूर्यदेव जब धनु राशि में प्रवेश करते हैं तो खर्मास आरंभ हो जाता है. इसी प्रकार जब सूर्य मीन राशि में प्रवेश करता है तब भी एक खर्मास आती है. इस आर्टिकल में हम 2025 के इस चल रहे खर्मास, उसकी कथा और उसकी विशेषताओं को सरल भाषा में जानेंगे
खर्मास किस दिन से 2025 में शुरू हुआ?
2025 में वर्तमान खर्मास 16 दिसंबर को लगा, जब सूर्यदेव धनु राशि में प्रवेश किये. यह अवधि लगभग 30 दिन तक रहेगी और 14 जनवरी 2026 को मकर संक्रांति के साथ समाप्त होगी. इन दिनों में सभी बड़े मांगलिक कार्यों को टाला जाता है.
खर्मास की पौराणिक कथा
खर्मास से जुड़ी कथा मार्कण्डेय पुराण में मिलती है. संस्कृत में खर का मतलब होता है गधा. कथा के अनुसार एकबार सूर्यदेव अपने सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करने निकले. इस दौरान जब घोड़ों को भूख और प्यास लगी, तब सूर्यदेव उनकी दयनीय दशा को देखकर सहानुभूत हुए और उन घोड़ों को आराम देने का निर्णय लिया.
फिर उन्हें ध्यान आया कि अगर रथ रुक गया तो सृष्टि का चक्र प्रभावित हो जाएगा. ऐसे सूर्यदेव की नजर उन दो खर यानी गधों पर पड़ी जो तालाब किनारे पानी पी रहे थे. उन्होंने सोचा कि रथ में इन्हें लगाकर घोड़ों को कुछ देर के लिए आराम दे दिया जाए जिससे रथ भी चलता रहेगा और घोड़े आराम भी कर लेंगे. लेकिन गधों और घोड़ों की बराबरी असंभव है. रथ में गधों को जोड़ा तो रथ की स्पीड कम हो गई और पृथ्वी की वो परिक्रमा 1 महीने में पूरी हुई. कथानुसार इस देरी से सूर्यदेव के तेज में कमी आई. यही कारण है कि खरमास में कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता.
खर्मास में क्या नहीं करना चाहिए?
खर्मास के समय विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, मुंडन जैसे बड़े जीवन के आयोजन नहीं किये जाते. ऐसा माना जाता है कि इस समय सूर्यदेव का प्रभाव सामान्य से कम रहता है और इसलिए किसी भी नए आरंभ का परिणाम स्थिर नहीं रह सकता. खर्मास के दिनों में साधारण पूजा, दान और भक्ति के कार्य करने को वर्जित नहीं माना जाता, बल्कि इसे शुभ माना गया है.
खर्मास की सामाजिक परंपरा
समाज में खर्मास को एक तरह से विश्राम, संयम और धार्मिक ध्यान का समय माना गया है. लोग इस महीने में भजन, कीर्तन, दान और सेवा कार्य पर अधिक ध्यान देते हैं. बाल विवाह, नामकरण आदि कार्य टालने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. यह नियम आज भी कई परिवारों द्वारा मनाया जाता है.
समय की गणना और दो खर्मास
जैसा कि बताया गया, खर्मास साल में दो बार आता है. एक बार जब सूर्य धनु राशि में प्रवेश करता है और दूसरी बार जब सूर्य मीन राशि में प्रवेश करता है. दोनों बार लगभग एक महीने का समय खर्मास के नाम से जुड़ा रहता है. इसका कारण ज्योतिषीय गणना में सूर्य की स्थिति का परिवर्तन माना जाता है.
2 या 3 जनवरी? कब रखा जाएगा पौष पूर्णिमा का व्रत? सुख-समृद्धि का खास उपाय
24 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म शास्त्रों में पौष मास को दान, तप और पुण्य अर्जित करने का विशेष समय माना गया है. इस महीने की पूर्णिमा तिथि को अत्यंत फलदायी और शुभ बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों में स्नान करने से पापों का क्षय होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है. पौष पूर्णिमा का दिन विशेष रूप से भाग्य को संवारने और आर्थिक स्थिति को उत्तम करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है. इस वर्ष पौष पूर्णिमा शुभ योगों के साथ पड़ रही है, जिससे इस दिन किए गए दान और धार्मिक कर्म कई गुना फल देने वाले माने जा रहे हैं.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पौष पूर्णिमा न केवल धन-समृद्धि बढ़ाने में सहायक होती है बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति भी प्रदान करती है. नए वर्ष 2026 में यह तिथि विशेष महत्व रखती है. आइए जानते हैं, उज्जैन के प्रसिद्ध आचार्य आनंद भारद्वाज से कि नए साल में पौष पूर्णिमा कब मनाई जाएगी और इस पावन तिथि का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व क्या है.
कब मनाई जाएगी पौष पूर्णिमा?
उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज के अनुसार, इस बार पंचांग के मुताबिक पौष पूर्णिमा तिथि दो जनवरी को शाम 6 बजकर 53 मिनट से शुरू होगी. वहीं इस तिथि का समापन तीन जनवरी को दोपहर तीन बजकर 32 मिनट पर होगा. ऐसे में पौष पूर्णिमा तीन जनवरी को मनाई जाएगी.
पौष पूर्णिमा पर जरूर करें ये काम
पौष पूर्णिमा का दिन विशेष रूप से पुण्यदायी माना जाता है. इस तिथि पर व्रत, पूजा और दान करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और मन को शांति मिलती है. इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा करने से घर-परिवार में सुख, समृद्धि और सौभाग्य बढ़ता है. साथ ही व्रत रखकर चंद्रदेव की आराधना करने से कुंडली से संबंधित चंद्र दोष भी शांत होता है. इस दिन तिल, गुड़, घी, कंबल, भोजन सामग्री या अपनी सामर्थ्य अनुसार धन का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है.
पौष पूर्णिमा पर भूल से भी न करें ये काम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पौष पूर्णिमा का दिन अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है. इस शुभ तिथि पर कुछ कार्यों से परहेज करना आवश्यक होता है ताकि देवी लक्ष्मी की कृपा बनी रहे और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो. इसमें पौष पूर्णिमा के दिन मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज जैसे तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए. सात्विक भोजन ग्रहण करने से मन और वातावरण शुद्ध रहता है. पूर्णिमा की तिथि विशेष ऊर्जा से युक्त मानी जाती है. इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और ईश्वर का स्मरण और ध्यान अवश्य करें. इस दिन विशेषकर बुजुर्गों और जरूरतमंदों का अपमान न करें. वाणी में मधुरता रखें और क्रोध करने से बचें अन्यथा धन की देवी रुष्ट हो सकती हैं. साथ ही इस दिन कर्ज लेना या देना उचित नहीं माना जाता. ऐसा करने से आर्थिक असंतुलन और धन संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं. इन नियमों का पालन करके पौष पूर्णिमा के पुण्य फल को कई गुना बढ़ाया जा सकता है और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है.
अंधेरे का डर, बुरे सपने और घबराहट में कैसे मदद करती है हनुमान चालीसा, 7 पॉइन्ट्स में समझें इसके फायदे
24 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आज के समय में बच्चों की दिनचर्या काफी बदल गई है. मोबाइल, टीवी, ऑनलाइन क्लास, बदलता माहौल और अकेलापन कई बार उनके मन पर गहरा असर डालता है. छोटे बच्चे अकसर बिना वजह डर जाते हैं, रात में चौंककर उठ जाते हैं, बुरे सपने देखते हैं या फिर सोने से कतराते हैं. माता-पिता लाख कोशिश करते हैं, लेकिन हर बार दवाइयों या डांट से समाधान नहीं मिलता. ऐसे में घर के बड़े-बुजुर्गों द्वारा बताए गए आध्यात्मिक उपाय आज भी उतने ही असरदार माने जाते हैं. हनुमान चालीसा को हिंदू धर्म में बहुत शक्तिशाली पाठ माना गया है. यह सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि मन को स्थिर करने और डर को दूर करने में भी मदद करती है. मान्यता है कि रात में बच्चों को सोते समय हनुमान चालीसा सुनाने से उनके मन में सुरक्षा का भाव आता है. इसकी मधुर ध्वनि और सकारात्मक शब्द बच्चों के अवचेतन मन पर अच्छा असर डालते हैं. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
1. बच्चों के मन को मिलती है शांति, नींद होती है बेहतर<br />हनुमान चालीसा की ध्वनि में एक अलग ही सुकून होता है. जब इसे धीमी और मधुर आवाज में सुनाया जाता है, तो बच्चे का मन धीरे-धीरे शांत होने लगता है. दिनभर की भागदौड़, डर या बेचैनी कम होती है और दिमाग आराम की स्थिति में चला जाता है. यही कारण है कि बच्चे जल्दी सो जाते हैं और उनकी नींद भी गहरी होती है. जिन बच्चों को बार-बार नींद टूटने या डरकर उठने की आदत होती है, उनमें भी समय के साथ सुधार देखा जाता है.
2. डर, घबराहट और नकारात्मक सोच से राहत<br />छोटे बच्चों में अंधेरे का डर, अकेले सोने की परेशानी या बुरे सपने आम बात है. हनुमान चालीसा को निडरता और सुरक्षा से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि इसके पाठ से आसपास की नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है. जब बच्चा रोजाना इसे सुनता है, तो उसके मन में एक भरोसा पैदा होता है कि वह सुरक्षित है. इससे घबराहट कम होती है और आत्मबल बढ़ता है.
3. आत्मविश्वास और साहस में बढ़ोतरी<br />हनुमान जी को महाबली और साहसी माना जाता है. उनकी कहानियां और चालीसा के शब्द बच्चों के मन में साहस का बीज बोते हैं. धीरे-धीरे बच्चा खुद को मजबूत महसूस करने लगता है. स्कूल जाने का डर, अकेले कमरे में रहने की परेशानी या नए लोगों से मिलने की झिझक कम होने लगती है. यह बदलाव एक दिन में नहीं आता, लेकिन नियमित रूप से चालीसा सुनाने से असर साफ दिखने लगता है.
4. सेहत और ऊर्जा पर सकारात्मक प्रभाव<br />मान्यताओं के अनुसार हनुमान चालीसा सुनने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है. जब बच्चा मानसिक रूप से शांत रहता है, तो उसका असर उसकी सेहत पर भी दिखता है. बेहतर नींद से इम्यूनिटी मजबूत होती है और बच्चा ज्यादा एक्टिव महसूस करता है. कई माता-पिता मानते हैं कि नियमित रूप से चालीसा सुनाने से बच्चों में सुस्ती कम होती है और वे दिनभर ज्यादा फ्रेश रहते हैं.
5. ध्यान और समझ विकसित करने में मददगार<br />जब बच्चे रोज एक ही समय पर हनुमान चालीसा सुनते हैं, तो यह उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाती है. इससे उनका ध्यान टिकने लगता है. धीरे-धीरे वे इसके शब्दों को पहचानने लगते हैं और अर्थ जानने की जिज्ञासा भी बढ़ती है. माता-पिता अगर सरल भाषा में कुछ पंक्तियों का मतलब समझा दें, तो बच्चे की समझ और सोच दोनों बेहतर होती हैं.
6. संस्कार और आध्यात्मिक जुड़ाव<br />बचपन में जो संस्कार मिलते हैं, वही आगे चलकर जीवन की दिशा तय करते हैं. हनुमान चालीसा बच्चों को भक्ति, विनम्रता और सेवा का भाव सिखाती है. इससे उनमें बड़ों के प्रति सम्मान और अपने अंदर अच्छाई लाने की भावना पैदा होती है. यह एक तरह से नैतिक शिक्षा का भी काम करती है, जो बिना किसी दबाव के बच्चे के मन में बैठ जाती है.
7. कैसे सुनाएं हनुमान चालीसा ताकि असर दिखे<br />बच्चों को हनुमान चालीसा सुनाते समय कुछ छोटी बातों का ध्यान रखें. हमेशा इसे धीमी और प्यार भरी आवाज में सुनाएं. मोबाइल या तेज स्पीकर की जगह खुद सुनाना ज्यादा असरदार माना जाता है. शुरुआत में पूरी चालीसा न भी सुनाएं तो कम से कम कुछ चौपाइयां रोजाना सुनाई जा सकती हैं. हफ्ते में एक-दो बार आसान शब्दों में इसका अर्थ समझाने से बच्चे और ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं.
पुत्र प्राप्ति के लिए कर लिए सभी प्रयास फिर भी नहीं मिला फायदा, तो पुत्रदा एकादशी पर कर लें ये खास उपाय घर में गूंज उठेगी किलकारियां!
24 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
यदि आप पुत्र प्राप्ति के लिए अनेकों उपाय करके थक चुके हैं और आपको निराशा हाथ लगी है, तो यह खबर आपके लिए बेहद ही उपयोगी होगी. हिंदू धर्म में पुत्र प्राप्ति के अनेक उपाय का वर्णन किया गया है, लेकिन एक खास तिथि ऐसी आती है जिस पर श्रद्धा भक्ति भाव, पवित्र ह्रदय और विधि विधान से व्रत करने पर पुत्र की प्राप्ति होने की धार्मिक मान्यता है. साल भर 24 एकादशियों का आगमन होता है जिनका व्रत करना विशेष फलदाई माना गया है.
सभी एकादशी में पुत्रदा एकादशी सबसे अधिक फलदाई होती है. वंश वृद्धि के लिए इस दिन पुत्रदा एकादशी का व्रत करने पर अमोघ फल की प्राप्ति होने की धार्मिक मान्यता है जिससे दांपत्य जीवन में भी खुशियों की बहार आ जाती है. संतान सुख से वंचित दंपति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत एक वरदान है. चलिए विस्तार से जानते हैं…
पुत्रदा एकादशी का महत्व
पुत्रदा एकादशी व्रत की ज्यादा जानकारी देते हुए हरिद्वार के विद्वान धर्माचार्य पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि साल में यानी संवत में 24 एकादशियों का आगमन मानव कल्याण के लिए होता है. सभी एकादशियों का अपना-अपना महत्व होता है. संतान पक्ष से वंचित या पुत्र प्राप्ति करने के लिए पोस्ट शुक्ल पक्ष में पुत्रदा एकादशी का आगमन होता है यदि इस व्रत को दंपत्ति विधि विधान से करते हैं, तो उनकी सभी मनोकामनाएं विष्णु भगवान की कृपा से पूर्ण हो जाती हैं.
साल 2025 में पुत्रदा एकादशी 30 और 31 दिसंबर को होगी. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी तिथि विष्णु भगवान को समर्पित होती है. इस दिन अपनी सामर्थ्य अनुसार सफेद रंग की वस्तुओं का दान करने पर जीवन में चल रही सभी समस्याएं खत्म हो जाती हैं
किन चीजों से रहें दूर
इस व्रत की अवधि में मन में दुर्भावना, गलत विचार, किसी का अहित करना आदि सोच विचारों से दूर रहना और तामसिक वस्तुओं का सेवन, अंडा, मांस, शराब पूर्ण रूप से वर्जित होती हैं. पुत्रदा एकादशी का व्रत वंश को आगे बढ़ाने पुत्र का वरदान और भाग्य के सभी द्वारा खोलकर सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला होता है पोस्ट शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का क्षय होने के कारण दशमी तिथि को यह व्रत किया जाएगा जो दो दिन 30 और 31 दिसंबर को किया जाएगा.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (24 दिसंबर 2025)
24 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- यात्रा, भय, कष्ट, व्यापार बाधा, शुभ समाचार, प्रसन्नता का योग, मित्र सहयोग अवश्य करें।
वृष राशि :- शत्रु, भय, रोग, स्वजन सुख, लाभदायक जीवन, दाम्पत्य सुख असमंजस बना रहेगा।
मिथुन राशि :- वाहन भय, मातृ-पितृ कष्ट, हानि, व्यर्थ तनाव, खर्च से परेशानी अवश्य ही होगी।
कर्क राशि :- सफलता, उन्नति, शुभ कार्य, विवाद, उद्योग, व्यापार में उच्च कोटि की स्थिति बन सकेगी।
सिंह राशि :- शरीर कष्ट, उत्तम व्यय, खर्च में सफलता, व्यवसाय में साधारण लाभ हो सकेगा।
कन्या राशि :- खर्च विवाद, स्त्री कष्ट, विद्या लाभ, कुछ अच्छे कार्य भी होगे तथा संतान प्राप्त होगी।
तुला राशि :- यात्राएं, हानि, राजभय, लाभ, शरीर कष्ट, व्यापार में सुधार व प्रगति की संभावना है।
वृश्चिक राशि :- वृत्ति से लाभ, यात्रा, लाभ कारोबार में उतार चढ़ाव की स्थिति होगी।
धनु राशि :- अल्प लाभ, शरीर कष्ट, चोट आदि का भय, शिक्षा की स्थिति ठीक होगी।
मकर राशि :- शत्रु हानि से अपयश, शारीरिक सुख, समय उद्योग व्यापार के लिए प्रयास करें।
कुंभ राशि :- शुभ व्यय, संतान सुख, कार्य सफलता मित्र वर्ग से संतोष अवश्य ही होगा।
मीन राशि :- पदोन्नति, राजभय, न्याय, लाभ हानि, व्यय, जीवन संतोष जनक होगा।
पौष पुत्रदा एकादशी 2025: 30 या 31 दिसंबर? जानें सही तिथि, पारण समय और महत्व
23 Dec, 2025 12:20 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Pausha Putrada Ekadashi 2025: सनातन परंपरा में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार माना गया है। मान्यता है कि श्रीहरि की आराधना से जीवन के दुख दूर होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए एकादशी व्रत को विशेष फलदायी माना गया है। ऐसे में वर्ष की अंतिम एकादशी पौष पुत्रदा एकादशी 2025 को लेकर श्रद्धालुओं के मन में यह सवाल है कि व्रत 30 दिसंबर को रखा जाए या 31 दिसंबर को।
पंचांग के अनुसार पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 30 दिसंबर 2025 को सुबह 07:50 बजे शुरू होकर 31 दिसंबर 2025 को प्रातः 05:00 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के आधार पर गृहस्थ श्रद्धालु 30 दिसंबर को एकादशी व्रत रखेंगे। वहीं वैष्णव परंपरा में हरि वासर का पालन किया जाता है, इसलिए वैष्णव भक्त 31 दिसंबर को पौष पुत्रदा एकादशी 2025 का व्रत करेंगे।
जो श्रद्धालु 30 दिसंबर को व्रत रखते हैं, वे 31 दिसंबर 2025 को दोपहर 01:26 बजे से 03:31 बजे के बीच पारण कर सकते हैं। वहीं 31 दिसंबर को व्रत रखने वाले वैष्णव भक्त 1 जनवरी 2026 को सुबह 07:14 बजे से 09:18 बजे के बीच पारण करेंगे। इस तरह परंपरा के अनुसार व्रत और पारण का समय अलग-अलग रहेगा।
एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान-ध्यान कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा कर फल, फूल, धूप, दीप और तुलसी दल अर्पित किए जाते हैं। इस दिन अन्न का त्याग कर फलाहार किया जाता है और श्रीहरि की कथा का पाठ विशेष फल देता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पौष पुत्रदा एकादशी 2025 संतान की कामना करने वालों के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। इस व्रत से सुख, शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है तथा अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
खरमास में सूर्यदेव की इस तरह साधना से चमकेगा भाग्य, इन चीजों के दान से पितृ और ग्रह दोष से मिलेगी राहत
23 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
खरमास का नाम सुनते ही अक्सर लोगों के मन में यह बात आती है कि इस दौरान कोई शुभ काम नहीं करना चाहिए. सच भी है कि खरमास में विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने गए हैं. लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि यही समय सूर्यदेव की साधना के लिए बेहद खास और फलदायी माना गया है. खरमास (मलमास) में पूजा, जप, तप और दान का विशेष महत्व शास्त्रों में बताया गया है. यह समय बाह्य कर्मकांड से अधिक आंतरिक साधना का माना गया है. खरमास कोई अशुभ समय नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, साधना और पुण्य संचय का श्रेष्ठ अवसर है. जो व्यक्ति इस काल में पूजा, जप, तप और दान करता है, उसे आने वाले समय में ग्रहों का अनुकूल फल, मानसिक शांति और जीवन में स्थिर उन्नति प्राप्त होती है.
14 जनवरी को होगा खरमास का समापन
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब सूर्यदेव धनु राशि में प्रवेश करते हैं, तब लगभग एक मास की अवधि को खरमास कहा जाता है. यह काल आत्मिक शुद्धि, आत्मबल बढ़ाने और अंदरूनी ऊर्जा को मजबूत करने के लिए उत्तम होता है. साथ ही इस काल में सूर्य की गति धर्म व आत्मचिंतन की ओर मानी जाती है, इसलिए विवाह, गृहप्रवेश जैसे शुभ व मांगलिक कर्म वर्जित होते हैं. इस बार 16 दिसंबर 2025 से खरमास की शुरुआत हो चुकी है, जो 14 जनवरी 2026 तक रहेगा.
खरमास में साधना से आते हैं बड़े बदलाव
ज्योतिष को सूर्यदेव को आत्मविश्वास, तेज, यश और मान-सम्मान का प्रतीक माना गया है. कहा जाता है कि अगर किसी व्यक्ति के जीवन में बार-बार अपमान, असफलता या आत्मविश्वास की कमी महसूस हो रही हो, तो कहीं ना कहीं सूर्य कमजोर हो सकता है. ऐसे में खरमास के दौरान की गई सूर्य साधना जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है. यह साधना ना सिर्फ मन को मजबूत बनाती है, बल्कि समाज में प्रतिष्ठा भी बढ़ाती है. खरमास में साधना व पूजा, जप-तप करने से अंदरूनी ऊर्जा को बल मिलता है और सभी पाप क्षय हो जाते हैं.
खरमास में हर दिन करें यह कार्य
खरमास में रोज सुबह स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य देना बहुत शुभ माना जाता है. अर्घ्य देते समय सूर्यदेव का ध्यान करें और उनके नामों का स्मरण करें. इससे मन शांत होता है और दिन की शुरुआत ऊर्जा के साथ होती है. खरमास में दान को सबसे श्रेष्ठ कर्म माना गया है. लाल किताब और धर्मशास्त्रों के अनुसार, इस समय किया गया दान दरिद्रता नाश करता है, पितृ दोष और ग्रह दोष में राहत देता है. खरमास में अन्न दान, तिल, गुड़, कंबल, वस्त्र, गाय, ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान करें.
हर दिन करें सूर्य चालीसा का पाठ
खरमास में हर दिन सूर्य चालीसा का पाठ भी अत्यंत फलदायी माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, अगर खरमास में सूर्यदेव की चालीसा का पाठ किया जाए, तो वह प्रसन्न होकर साधक पर अपनी कृपा बरसाते हैं. इसके प्रभाव से व्यक्ति का आत्मविश्वास और समाज में सम्मान बढ़ता है. ज्योतिषियों के मुताबिक, सूर्य चालीसा से कुंडली में सूर्य का स्थान मजबूत होता है, जिससे साधक के मान-सम्मान में वृद्धि, बेहतर नेतृत्व क्षमता, उच्च पद और पिता के साथ रिश्ता मजबूत होता है.
देश का पहला मंदिर जहां शिव से मुख मोड़कर बैठते हैं नंदी महाराज, स्त्री वेश में पूरा परिवार, छुपे हैं कई रहस्य
23 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भगवान शिव के अनन्य भक्तों में नंदी महाराज की गिनती होती है, क्योंकि उन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी. हर मंदिर में जहां भगवान शिव विराजमान हैं, वहां उनकी सेवा के लिए नंदी महाराज विराजमान हैं, लेकिन महाराष्ट्र के एक अद्भुत मंदिर में नंदी, भगवान शिव से मुंह मोड़कर बैठे हैं. ये नजारा भुलेश्वर महादेव मंदिर में देखने को मिलता है. यह मंदिर 1000 साल पुराना बताया जाता है और इसमें मुगलकाल से लेकर मराठा सभ्यता की झलक देखने को मिलती है. बताया जाता है कि इस मंदिर में दर्शन करने मात्र से सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं और भगवान शिव के साथ माता पार्वती का आशीर्वाद भी मिलता है. आइए जानते हैं 1000 साल पुराने इस मंदिर के बारे में…
8वीं शताब्दी में मंदिर का निर्माण
महाराष्ट्र के पुणे-सोलापुर राजमार्ग से 10 किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ियों के पास भुलेश्वर महादेव मंदिर स्थापित है. यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है और इसका निर्माण 8वीं शताब्दी में हुआ था. इसकी दीवारों पर शास्त्रीय नक्काशी है और इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है. ये मंदिर अपने बारे में प्रचलित लोककथा के लिए भी जाना जाता है, जिसके अनुसार जब शिवलिंग पर मिठाई या पेड़े का भोग लगाया जाता है तो एक या एक से अधिक मिठाइयां गायब हो जाती हैं.
स्त्री वेश वाली प्रतिमाएं मौजूद
दरअसल, शिवलिंग के ठीक नीचे एक गुफा है, जहां पुजारियों द्वारा रोजाना प्रसाद चढ़ाया जाता है और प्रसाद का कुछ हिस्सा गायब हो जाता है. किसी को नहीं पता कि प्रसाद का हिस्सा कहां जाता है. माना जाता है कि भगवान खुद आकर प्रसाद को भोग लगाते हैं. मंदिर की खास बात ये भी है कि मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव, गणेश और कार्तिकेय की स्त्री वेश वाली प्रतिमाएं मौजूद हैं. भक्त शिवलिंग के अलावा, स्त्री वेश धारण किए भगवान शिव, गणेश और कार्तिकेय का आशीर्वाद लेने आते
इसी अवस्था में आज तक हैं विराजमान
हर मंदिर में जहां शिवलिंग के सामने नंदी का मुख होता है, लेकिन भुलेश्वर महादेव का नजारा अलग है. मंदिर में नंदी महाराज की गर्दन भगवान शिव को ना देखते हुए दाईं साइड मुड़ी हुई है. प्रचलित कथा के मुताबिक जब मां पार्वती भगवान शिव को वापस लेने के लिए आईं थीं, तब नंदी ने दोनों दंपत्ति को ना देखते हुए चेहरा मोड़ लिया था. तब से लेकर अब तक नंदी इसी अवस्था में विराजमान है.
इसी वजह से मंदिर का नाम पड़ा भुलेश्वर महादेव
एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार मां पार्वती से क्रोधित होकर भगवान शिव ने कैलाश छोड़ इसी स्थान पर सालों तक तपस्या की थी. भगवान शिव को मनाने के लिए मां पार्वती ने बेहद सुंदर रूप लिया और अपने नृत्य से भगवान शिव को प्रसन्न करने की कोशिश की. मां पार्वती का इतना मोहित रूप देखकर भगवान शिव अपना सारा गुस्सा भूल गए थे और वापस मां के साथ कैलाश प्रस्थान किया था. इसी वजह से मंदिर का नाम भुलेश्वर महादेव पड़ा.
मंदिर का बनाव और वास्तुकला बहुत अलग
1000 साल पुराने इस मंदिर का बनाव और वास्तुकला बहुत अलग है, जिसमें मुगलकाल से लेकर मराठा सभ्यता की झलक देखने को मिलती है. मंदिर को कई बार तोड़ा गया और कई बार बनाया गया. मंदिर बाहर से ताजमहल की तरह दिखता है, लेकिन अंदर से बहुत प्राचीन है. मंदिर के स्तंभों पर स्त्री रूप धारण किए गणेश और भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा मौजूद है.
साल की अंतिम गणेश चतुर्थी कब? लम्बोदर की पूजा से होगी धनवर्षा, भाग खड़ी होंगी खतरनाक शक्तियां
23 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में किसी भी धार्मिक कार्य में सबसे पहले भगवान गणेश को याद किया जाता है, इसलिए वह प्रथम पूज्य देव भी कहलाते हैं. भगवान गणेश को गजानन, एकदंत, लम्बोदर और विघ्नहर्ता आदि नामों से भी जाना जाता है. श्री गणेश को प्रसन्न करने के लिए भक्त विनायक चतुर्थी का व्रत भी रखते हैं. इस साल की अंतिम विनायक चतुर्थी पौष माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाएगी. इस दिन भद्रा और पंचक का संयोग बन रहा है. भद्रा का वास पाताल लोक में होने के कारण पूजा-पाठ पर इसका विशेष नकारात्मक प्रभाव नहीं माना जाता. लोकल 18 से बात करते हुए अंबाला के ज्योतिषाचार्य पंडित दीपलाल जयपुरी ने बताया कि इस बार विनायक चतुर्थी बुधवार से शुरू हो रही है. इस दिन पंचक होने के कारण इसे अशुभ नहीं माना जा रहा है. पंचांग के अनुसार, पौष शुक्ल चतुर्थी तिथि का आरंभ 23 दिसंबर को दोपहर 12:12 बजे होगा और समापन 24 दिसंबर को दोपहर 1:11 बजे होगा.
दोगुना फल
पंडित दीपलाल जयपुरी के मुताबिक, उदयातिथि के आधार पर विनायक चतुर्थी का व्रत 24 दिसंबर, बुधवार को रखा जाएगा. बुधवार का दिन गणेश जी को समर्पित होने के कारण इस दिन व्रत और पूजा करने से दोगुना फल मिलता है. विनायक चतुर्थी को विघ्नेश्वर चतुर्थी भी कहा जाता है. इस दिन विधि-विधान से व्रत और गणेश पूजन करने से जीवन की सभी बाधाएं और विघ्न दूर होते हैं. विनायक चतुर्थी पर हर्षण योग प्रातःकाल से शाम 4:02 बजे तक रहेगा. इसके बाद वज्र योग बनेगा और धनिष्ठा नक्षत्र पूरे दिन और रात को रहेगा.
मुहूर्त कब से कब
पंडित दीपलाल बताते हैं कि इस साल की अंतिम विनायक चतुर्थी के दिन भद्रा और पंचक है. भद्रा का प्रारंभ सुबह में 7:11 बजे से होगा और दोपहर 01:11 बजे तक रहेगा. विनायक चतुर्थी के दिन राहुकाल दोपहर में 12:21 बजे से 01:38 बजे तक रहेगा. पंचक शाम को 07:46 बजे से लेकर अगले दिन 25 दिसंबर को सुबह 07:12 बजे तक रहेगा. विनायक चतुर्थी के दिन व्रत और गणेश पूजा करने से जीवन में शुभता बढ़ती है. गणेश जी की कृपा से सभी कार्य सफल होते हैं और संकट दूर होते हैं. इस दिन पूजा में गणेश जी को दूर्वा जरूर अर्पित करें. हालांकि इस दिन चंद्रमा का दर्शन करना वर्जित होता है. विनायक चतुर्थी की पूजा का शुभ मुहूर्त दिन में 11:19 बजे से दोपहर 1:11 बजे तक है. इस दौरान शुभ-उत्तम मुहूर्त 11:03 बजे से लेकर दोपहर 12:21 बजे तक रहेगा. ब्रह्म मुहूर्त 05:22 बजे से लेकर 06:16 बजे तक है. अभिजीत मुहूर्त नहीं है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (23 दिसंबर 2025)
23 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- आपके शुभ चिंतक व मित्र भी आप से खिन्न रहेंगे, किनतु कार्य बनेंगे, ध्यान दें।
वृष राशि :- शरीर, स्त्री कष्ट, पद परिवर्तन, उन्नति, नौकरी से लाभ होगा, कार्य होगे।
मिथुन राशि :- आर्थिक कष्ट, विरोधियों का प्रभाव, निर्माण के कार्यों में बाधा, रुके कार्य होगे।
कर्क राशि :- संतान पीड़ा, चोट चपेट ऑपरेशन की संभावना अवश्य बनेगी, ध्यान दें।
सिंह राशि :- शारीरिक सुख, पत्नी-भ्रातृ कष्ट होवे, व्यापार लाभ, स्त्री सुख होगा।
कन्या राशि :- शारीरिक सुख, पत्नी-भ्रातृ कष्ट होवे, कार्य लाभ होगा, ध्यान रखे।
तुला राशि :- शत्रु व रोग पर धन व्यय होगा, सफल यात्रा, व्यापार के कार्य में सफलता होगी।
वृश्चिक राशि :- शारीरिक चोट, दुर्घटना संभावित, शत्रु का प्रभाव अवश्य बढ़ेगा।
धनु राशि :- शरीर आदि सुख, व्यापारिक यात्रा किन्तु निर्माण के कार्य में सफलता हो।
मकर राशि :- नेत्र पीड़ा, आर्थिक हानि, विद्या बाधा, पत्नी को पीड़ा, कष्ट अवश्य होगा, ध्यान दें।
कुंभ राशि :- अभीष्ट सिद्ध, राज भय, कार्य बाधा, राजकार्य में रुकावट का अनुभव होगा।
मीन राशि :- विरोधियों का दमन, सुख साधन की प्राप्ति तथा पारिवारिक प्रभाव समाज में होगा।
संतान सुख से वंचित हैं तो जरूर करें ये व्रत, नए साल में भर जाएगी सूनी गोद
22 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में प्रत्येक तिथि और व्रत का अपना विशेष धार्मिक महत्व माना गया है. पूरे साल में कुल 24 एकादशी व्रत आते हैं, जो हर माह दो बार एक कृष्ण पक्ष और एक शुक्ल पक्ष में रखे जाते हैं. शास्त्रों के अनुसार, एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करने से भक्तों को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है. धार्मिक मान्यता है कि इस पावन तिथि पर किया गया व्रत मनोकामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ जीवन में सुख-समृद्धि और शुभ फल प्रदान करता है. खासतौर पर यह व्रत अनेक प्रकार के लाभ देने वाला माना जाता है. तो आइए, उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित आनंद भारद्वाज से जानते हैं पुत्रदा एकादशी का महत्व, पूजा विधि और इससे मिलने वाले विशेष लाभ क्या है.
कब मनाई जाएगी पुत्रदा एकादशी?
कि वैदिक पंचांग के अनुसार पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी इस बार 30 दिसंबर 2025 को सुबह 7 बजकर 50 मिनट पर शुरू होगी. इस तिथि का समापन अगले दिन 31 दिसंबर की सुबह पांच बजे होगा, इसलिए 30 दिसंबर को पुत्रदा एकादशी मनाई जाएगी. इस दिन भरणी नक्षत्र और सिद्ध का विशेष संयोग बना रहेगा.
कैसे हुई इस व्रत की शुरुआत?
पंडित आनंद भारद्वाज ने आगे बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार महिष्मति राज्य के राजा महीजित को कोई संतान नहीं थी. वह बड़े ही पुण्य का काम करते थे. संतान न होने से नाराज राजा ने अपनी प्रजा और ब्राह्मणों की एक बैठक बुलाई. ब्राह्मण और प्रजा दोनों ने इस समस्या से निजात के लिए तप शुरू किया. इस दौरान उन्हें लोमस ऋषि मिले, जिन्होंने इस समस्या के लिए एकादशी तिथि को व्रत रखने की बात कही. जिसके बाद राजा, प्रजा और ब्राह्मणों ने इस व्रत को रखा. जिसके प्रभाव से राजा महीजित को संतान की प्राप्ति हुई. जो लोग संतान सुख से वंचित हैं, वे यह व्रत जरूर रखें.
एकादशी व्रत के दिन क्या करें?
एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि के बाद व्रत संकल्प लें. पूजा के दौरान भगवान विष्णु को पीली मिठाई का भोग लगाना चाहिए क्योंकि पीला रंग भगवान श्रीहरि को प्रिय माना जाता है. भगवान विष्णु के साथ-साथ देवी लक्ष्मी की भी पूजा करें. इस दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाना भी शुभ माना जाता है.
नहीं करना चाहिए चावल का सेवन
एकादशी व्रत के दिन अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए. एकादशी का व्रत नहीं रखने वालों को भी चावल का सेवन नहीं करना चाहिए. एकादशी व्रत के दिन बाल, नाखून और दाढ़ी कटवाने की भूल न करें. व्रत के दिन ब्राह्मणों को कुछ दान अवश्य करना चाहिए. एकादशी व्रत के पारण करने के बाद अन्न का दान करना शुभ माना गया है.
जरूर करें इस मंत्र का जाप
ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।। ॐ ह्रीं कार्तविर्यार्जुनो नाम राजा बाहु सहस्त्रवान। यस्य स्मरेण मात्रेण ह्रतं नष्टं च लभ्यते।
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