धर्म एवं ज्योतिष
सूअर के शरीर से सने पानी को राजा ने जैसे ही छुआ, मिट गए सारे दुख-दर्द! रोचक है इस मंदिर की कहानी
26 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
बलिया को साधुओं की तपोभूमि कहा जाता है, जहां का इतिहास काफी रोचक है. आज हम आपको उन्हीं में से एक ऐसे अद्भुत और चमत्कारिक धार्मिक स्थल के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका अपना एक अलग ही रोचक इतिहास है. जिले के सिकंदरपुर में स्थित चतुर्भुज मंदिर न केवल एक मंदिर, बल्कि आस्था, चमत्कार और इतिहास की जीवंत धरोहर भी है. इस मंदिर की कथा जितनी रोचक है, उतनी ही अजब-गजब और श्रद्धा से भरी हुई इसकी कथा भी है. यह मंदिर बेहद प्राचीन है. इसकी कहानी सीधे प्रतापी राजा सुरथ से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने अपने हाथों से निर्माण किया था.
चतुर्भुज नाथ मंदिर के महंथ महेन्द्र दास ने कहा कि बु जुर्गों के कहने के अनुसार सिकंदरपुर क्षेत्र कभी घना जंगल हुआ करता था. इसी जंगल में एक विशाल पीपल के पेड़ के नीचे राजा सुरथ अपने सेवक मोहन के साथ विश्राम कर रहे थे. राजा उस समय कुष्ठ रोग से पीड़ित थे. अचानक उन्हें पानी की जरूरत पड़ी और उन्होंने मोहन को पानी लाने को भेजा. मोहन ने पूरा इलाका छान मारा, लेकिन कहीं पानी नहीं मिला. अंत में उसे कुछ दूरी पर एक गड्ढा दिखाई दिया, जिसमें एक सूअर लेटी थी और पास ही थोड़ा पानी था. मोहन ने उसी पानी को छानकर राजा के पास लेकर पहुंचा.
अब चमत्कार यहीं से शुरू होता हैं, जब राजा ने वह पानी शरीर पर लगाया, तो जहां-जहां कुष्ठ रोग था, वहां आराम मिलने लगा. राजा ने पानी के स्रोत के बारे में पूछा, लेकिन मोहन डर के कारण टालता रहा. बार-बार पूछने पर वह राजा को उसी गड्ढे तक ले गया. राजा ने स्वयं उस पानी में स्नान किया और उनका कुष्ठ रोग पूरी तरह समाप्त हो गया. घर लौटने के बाद राजा सुरथ को स्वप्न आया, जिसमें स्वयं भगवान ने कहा कि वह इसी पोखरे के नीचे हैं, उन्हें बाहर निकाला जाए. अगले दिन राजा ने उस स्थान की खुदाई करवाई.
कैसे पड़ा चतुर्भुज नाम
खुदाई में भगवान विष्णु की चतुर्भुज मूर्ति प्राप्त हुई, जिनके चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म की माला थी. खुदाई के दौरान फावड़े से बाएं हाथ पर निशान भी लग गया, जो आज भी मौजूद है. इसके साथ ही लक्ष्मी, साली ग्राम सहित अन्य तमाम मूर्तियां भी मिलीं. बाद में शिव जी की मूर्ति भी प्राप्त हुई, जिनका सिर खुदाई में क्षतिग्रस्त हो गया और पूरा पानी खून में बदल गया. राजा सुरथ ने सभी मूर्तियों को मंदिर में स्थापित कराया और तभी से यह स्थान चतुर्भुज मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया. शिवलिंग का नाम अद्भुत महादेव रखा गया. आज यहां दूर-दराज के जिलों से भी श्रद्धालु दर्शन को आते हैं.
पोखरे के अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा
मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है. दान-पुण्य से मंदिर का निर्माण और विस्तार हो रहा है. जतो दास से लेकर वर्तमान महंत तक, पुजारी परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस दिव्य धरोहर की सेवा करता आ रहा है. चतुर्भुज मंदिर आज भी आस्था और चमत्कार की अद्भुत कहानी सुनाता है. हालांकि, स्थानीय निवासी शुभम कुमार पांडेय और रजनीश कुमार पांडेय ने कहा कि वर्तमान में ऐतिहासिक धरोहर के रूप स्थित इस पोखरे का अस्तित्व खतरे में है. आसपास का पूरा गंदा पानी इसी पोखरे में छोड़ा जा रहा है. यहां इतनी बदबू होती है कि जीना मुश्किल हो जाता है. इस पोखरे के अस्तित्व को बचाने की जरूरत है.
पहाड़ों की गोद में बसा पवित्र धाम, जानें इसका इतिहास, महत्व और चमत्कारिक कथा
26 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जम्मू कश्मीर की खूबसूरत वादियों में छुपा मचैल माता मंदिर सिर्फ आस्था का नहीं बल्कि अद्भुत प्राकृतिक नजारों का भी केंद्र है. मचैल माता मंदिर की पहचान सिर्फ एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे स्थान के रूप में है जहां भक्त हजारों किलोमीटर का सफर तय करके मां के दरबार में हाजिरी लगाने आते हैं. यहां का माहौल, पहाड़ों से घिरी शांत वादियां, और मां का दिव्य रूप भक्तों को बार-बार खींच लाता है. मचैल माता मंदिर जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के पाडर इलाके में स्थित है. समुद्र तल से लगभग 9500 फीट की ऊंचाई पर बसे इस मंदिर तक पहुंचना आसान नहीं है, लेकिन श्रद्धालु मां की भक्ति में हर मुश्किल पार कर लेते हैं. ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में माता की मूर्ति स्वयं प्रकट हुई थी और तभी से यहां पूजा-अर्चना की परंपरा शुरू हुई.
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान की खोज 1980 के दशक में एक साधु ने की थी, जो मां दुर्गा के परम भक्त थे. कहते हैं कि साधु को यहां दिव्य आभा का अनुभव हुआ और उन्होंने लोगों को बताया कि यह स्थान मां के वास का है. इसके बाद धीरे-धीरे यहां मंदिर का निर्माण हुआ और आज यह लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन चुका है.
मचैल माता यात्रा
हर साल यहां मचैल माता यात्रा का आयोजन होता है, जो सावन महीने में शुरू होकर भाद्रपद महीने तक चलती है. यह यात्रा पाडर घाटी से होकर गुजरती है, जहां रास्ते में ऊंचे-ऊंचे पहाड़, बहते झरने और हरे-भरे जंगल नजर आते हैं. यात्रा के दौरान भक्त जयकारे लगाते हुए मां के दरबार की ओर बढ़ते हैं. यात्रा की शुरुआत आमतौर पर छतरो से होती है, जहां से लगभग 32 किलोमीटर का ट्रेक करना पड़ता है. पहले यह यात्रा पूरी तरह पैदल ही होती थी, लेकिन अब प्रशासन ने हेलीकॉप्टर सेवा भी शुरू कर दी है, ताकि बुजुर्ग और कमजोर स्वास्थ्य वाले भक्त भी आसानी से दर्शन कर सकें.
मचैल माता मंदिर का महत्व
मचैल माता मंदिर को शक्ति पीठों में से एक माना जाता है. यहां विराजमान मां को चंडिका माता या दुर्गा माता के रूप में पूजा जाता है. मान्यता है कि मां यहां अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं. विशेष रूप से जो लोग संतान सुख की इच्छा रखते हैं, वे यहां आकर मां से आशीर्वाद मांगते हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि मां के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई कोई भी मुराद खाली नहीं जाती. इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां आने वाला हर भक्त एक अनोखा मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करता है.
मचैल माता से जुड़ी कथा
मान्यता है कि एक बार एक गड़ेरिया अपनी भेड़ों को चराने के लिए इस इलाके में आया था. तभी उसे एक गुफा से तेज प्रकाश दिखाई दिया. जब वह अंदर गया तो उसने वहां मां का दिव्य रूप देखा. मां ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि यहां उनकी पूजा होनी चाहिए. गड़ेरिये ने यह बात पूरे गांव में फैला दी और धीरे-धीरे यहां भक्तों का आना शुरू हो गया.
दूसरी कथा के अनुसार, यह स्थान प्राचीन काल में साधना स्थल हुआ करता था, जहां ऋषि-मुनि मां दुर्गा की आराधना करते थे. समय के साथ यह स्थान जंगल और पहाड़ों में छिप गया, लेकिन मां की इच्छा से यह फिर से लोगों के सामने आया.
प्राकृतिक सौंदर्य और शांति का संगम
मचैल माता मंदिर न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यहां का प्राकृतिक सौंदर्य भी लाजवाब है. ऊंचे बर्फीले पहाड़, ठंडी हवा और बहते झरने इस यात्रा को यादगार बना देते हैं. यह जगह उन लोगों के लिए भी खास है जो ट्रेकिंग और एडवेंचर पसंद करते हैं.
सावधानियां और सुझाव
मचैल माता मंदिर की यात्रा आसान नहीं है, इसलिए यहां आने से पहले पूरी तैयारी करना जरूरी है. मौसम का ध्यान रखें, गर्म कपड़े और जरूरी दवाएं साथ रखें. पैदल यात्रा के दौरान पानी और हल्का खाना साथ होना चाहिए.
मचैल माता मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, साहस और प्रकृति का अद्भुत संगम है. यहां की यात्रा हर भक्त के लिए जीवनभर की यादगार बन जाती है. मां की भक्ति और इस पवित्र स्थल का अनुभव आपको भीतर से बदल देता है. चाहे आप धार्मिक आस्था से जाएं या प्रकृति प्रेमी होकर, मचैल माता मंदिर की वादियां आपको हमेशा अपनी ओर खींचती रहेंगी.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (26 दिसंबर 2025)
26 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- तनावपूर्ण वातावरण से बचिए, स्त्री शारीरिक मानसिक कष्ट, मानसिक बेचैनी अवश्य बनेगी।
वृष राशि :- अधिकारियों के सर्मथन से सुख होवे, कार्य गति विशेष अनुकूल किन्तु विचार भेद अवश्य बनेंगे।
मिथुन राशि :- भोग ऐश्वर्य प्राप्ति, वाद, तनाव व क्लेश होवे, तनाव से बचकर अवश्य चले।
कर्क राशि :- अधिकारियों का समर्थन फलप्रद होगा, भाग्य साथ दें, बिगड़े कार्य अवश्य ही बनेंगे।
सिंह राशि :- परिश्रम सफल हो, व्यवसाय मंद हो, आर्थिक योजना सफल अवश्य ही हो जाएगी।
कन्या राशि :- कार्य गति सामान्य रहे, व्यर्थ परिश्रम, कार्यगति मंद अवश्य होगा, ध्यान रखें।
तुला राशि :- किसी दुर्घटना से बचे, चोट चपेट आदि का भय होगा, रुके कार्य अवश्य ही बन जाएगे।
वृश्चिक राशि :- कार्य गति अनुकूल रहे, लाभान्वित कार्य योजना बनेगी, बाधा आदि से बच सकेंगे।
धनु राशि :- कुछ प्रतिष्ठा के साधन बने, किन्तु हाथ में कुछ न लगे तथा कार्य अवरोध अवश्य होवे।
मकर राशि :- अधिकारी वर्ग से तनाव, क्लेश होगा, मानसिक अशांति, कार्य अवरोध बनेगा।
कुंभ राशि :- मनोबल बनाए रखे, योजनाएं पूर्ण हो तथा नया कार्य अवश्य प्रारंभ होगा।
मीन राशि :- दैनिक कार्य गति उत्तम, कुटुम्ब में सुख समय उत्तम बनेगा, ध्यान रखगें।
New Year 2026: नए साल के पहले दिन भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना रुक सकती है तरक्की
25 Dec, 2025 12:20 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
New Year 2026 सिर्फ कैलेंडर की तारीख बदलने का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवन में नई उम्मीदों, नए संकल्पों और सकारात्मक बदलावों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि अगर नए साल के पहले दिन सही कार्य किए जाएं, तो पूरा साल सुख, समृद्धि और सफलता से भरा रहता है। यही वजह है कि अधिकतर लोग नए साल की शुरुआत पूजा-पाठ, हवन और दान-दक्षिणा से करना पसंद करते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार New Year 2026 के पहले दिन पैसों का लेन-देन करने से बचना चाहिए। न तो किसी से उधार लें और न ही किसी को पैसे दें। यहां तक कि पूजा सामग्री या घरेलू जरूरतों के लिए भी धन का लेन-देन अशुभ माना गया है। ऐसा करने से पूरे साल आर्थिक परेशानियां बनी रह सकती हैं।
नए साल के दिन घर में किसी भी तरह के विवाद या क्लेश से दूर रहें। शास्त्रों में कहा गया है कि जहां हंसी-खुशी का माहौल होता है, वहीं मां लक्ष्मी का वास होता है। इसलिए गुस्सा, झगड़ा या नकारात्मक बातें करने से बचें। साथ ही, किसी बात को लेकर रोना या दुख व्यक्त करना भी शुभ नहीं माना जाता।
New Year 2026 के पहले दिन फटे-पुराने, काले रंग या किसी से उधार लिए कपड़े पहनने से बचना चाहिए। मान्यता है कि ऐसे कपड़े दुर्भाग्य को आमंत्रित करते हैं। इसके अलावा घर में अंधेरा न रखें। मुख्य द्वार और पूजा स्थल पर दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
आलस्य भी नए साल के दिन सबसे बड़ा दोष माना गया है। देर तक सोने के बजाय सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, पूजा-पाठ करें और सकारात्मक सोच के साथ दिन की शुरुआत करें। ऐसा करने से पूरा साल ऊर्जा और उत्साह से भरा रहता है।
घर की छत या दीवार पर उगा पीपल देता है अशुभ संकेत, पितृदोष का माना जाता है संकेत, हटाने से पहले जान लें नियम!
25 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कई बार आपने भी देखा होगा कि किसी न किसी कारण से घर की दीवारों की दरारों में, छत पर या पुराने मकानों के कोनों में पीपल का छोटा पौधा अपने आप उग आता है. शुरुआत में लोग इसे सामान्य पौधा समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन समय के साथ जब यह बढ़ने लगता है, तो कई लोग बिना सोचे-समझे किसी भी दिन इसे उखाड़कर फेंक देते हैं. जबकि वास्तु शास्त्र और ज्योतिष के अनुसार घर में पीपल का पौधा उगना सामान्य घटना नहीं मानी जाती.
घर के अंदर या छत पर पीपल का पौधा उगना अशुभ
वास्तु शास्त्र में पीपल को अत्यंत पवित्र वृक्ष माना गया है, लेकिन इसका स्थान भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है. शास्त्रों के अनुसार पीपल का पेड़ मंदिर, नदी, तालाब या सार्वजनिक स्थानों पर शुभ माना जाता है, लेकिन घर के अंदर, दीवार या छत पर उगना अशुभ संकेत माना जाता है. मान्यता है कि घर में पीपल का पौधा उगना पितृदोष की ओर इशारा करता है, जिससे परिवार में मानसिक तनाव, आर्थिक परेशानियां या स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.
क्या कहते हैं देवघर के ज्योतिषाचार्य
घर में अपने आप उगा पीपल का पौधा शुभ नहीं होता और इसे बिना विधि-विधान के हटाना भी उचित नहीं है. अगर आपके घर में पीपल का पौधा उग आया है, तो सबसे पहले किसी योग्य ब्राह्मण को बुलाकर पीपल की विधिवत पूजा करानी चाहिए. पूजा के दौरान पितरों की शांति और पितृदोष मुक्ति के लिए संकल्प कराया जाता है.
संकल्प करके ही उखाड़ें
संकल्प के समय यह स्पष्ट रूप से कहा जाता है कि हम पितृदोष की मुक्ति के लिए इस पीपल के पौधे को हटाने का कार्य कर रहे हैं. इसके बाद ही पौधे को सावधानीपूर्वक उखाड़ा जाना चाहिए. ध्यान देने वाली बात यह है कि पीपल का पौधा सोमवार और शनिवार के दिन नहीं हटाना चाहिए, क्योंकि ये दिन पीपल से विशेष रूप से जुड़े माने जाते हैं.
अगर हटाना हो, तो रविवार का दिन सबसे उत्तम माना गया है. अगर आपके घर में भी दीवार या छत पर पीपल का पौधा उग आया है, तो नए साल से पहले यह धार्मिक कार्य विधि-विधान से अवश्य कर लें, ताकि पितृदोष से मुक्ति मिले और घर में सुख-शांति व सकारात्मक ऊर्जा
नए साल में चमकाना है किस्मत? घर ले आएं सूर्य से जुड़ी कुछ खास चीजें और कर लें सरल उपाय
25 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अंक ज्योतिष के अनुसार सूर्य का साल माना जा रहा है. सूर्य को हिंदू धर्म में शक्ति, ऊर्जा, नेतृत्व और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. इस साल घर में सूर्य से जुड़ी चीजें रखने से जीवन में सफलता, मान-सम्मान और समृद्धि बढ़ती है. सूर्य का प्रभाव केवल स्वास्थ्य और करियर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह परिवार में सकारात्मक ऊर्जा और खुशहाली भी लाता है. इस वर्ष उन सभी चीजों को अपनाना बेहद शुभ रहेगा जो सूर्य की ऊर्जा को मजबूत करती हैं. इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि साल 2026 में घर में कौन-कौन सी चीजें लाना शुभ रहेगा और इन्हें रखने से आपके जीवन में किस प्रकार के लाभ हो सकते हैं. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
1. सूर्य देव की मूर्ति या तस्वीर साल 2026 में सूर्य देव की मूर्ति या तस्वीर घर में लाना अत्यंत लाभकारी रहेगा. इसे घर की पूर्व दिशा में रखें. इससे परिवार के सदस्यों को मान-सम्मान और करियर में तरक्की मिलेगी. साथ ही घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहेगी.
2. तांबे का सूर्य चिन्ह तांबे का सूर्य चिन्ह घर के मुख्य द्वार या पूर्व दिशा की दीवार पर लगाएं. प्रतिदिन इस पर गंगाजल छिड़कें और रोली का टीका लगाएं. यह उपाय घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और करियर में सफलता दिलाता है.
3. तांबे की अन्य चीजें साल 2026 में सूर्य की शक्ति बढ़ाने के लिए तांबे की चीजें जैसे लोटा, गिलास या अन्य सजावटी वस्तुएं घर में रखें. इससे घर में धन-संपत्ति और सुख-शांति बनी रहती है.
4. सूर्य देव की सात घोड़े वाली तस्वीर सात घोड़े वाली सूर्य रथ की तस्वीर घर में पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है. यह तस्वीर ज्ञान और ऊर्जा का प्रतीक है. इसे रखने से समाज में मान-सम्मान बढ़ता है और परिवार में खुशहाली बनी रहती है.
5. रोजाना सूर्य को जल अर्पित करें स्नान के बाद उगते हुए सूर्य को जल अर्पित करना लाभकारी रहेगा. तांबे के लोटे में जल डालकर लाल फूल, रोली और अक्षत मिलाकर अर्पित करें. यह उपाय जीवन में सफलता और सुख-शांति लाता है.
6. रविवार को दान करें रविवार के दिन गुड़, गेहूं, अन्न और धन का दान करना शुभ रहेगा. इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और घर में समृद्धि आती है.
7. मंत्र का जाप सूर्य को जल चढ़ाते समय 'ॐ सूर्याय नमः' या 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' मंत्र का जाप करें. इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और जीवन में बाधाएं कम होती हैं.
8. पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा सूर्य देव को जल चढ़ाने और पूजा करने के समय पूर्व दिशा की ओर मुख करें. यह दिशा सूर्य की शक्ति को सबसे अधिक आकर्षित करती है. इससे घर में सुख-समृद्धि और ऊर्जा का संचार होता है.
साल 2026 सूर्य का वर्ष है, इसलिए घर में सूर्य से जुड़ी चीजें लाना अत्यंत शुभ रहेगा. सूर्य देव की मूर्ति, तांबे की चीजें और सात घोड़े वाली तस्वीर रखने से परिवार में खुशहाली, सफलता और मान-सम्मान बढ़ेगा. साथ ही रोजाना जल अर्पित करना, मंत्र जाप और दान करने से घर में समृद्धि का वातावरण बनेगा.
क्या आप जानते हैं ठाकुर जी के सामने खड़े होकर दर्शन करने से क्यों मना किया जाता है?
25 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारतीय संस्कृति में भगवान के दर्शन केवल आंखों से देखने का कार्य नहीं होते, बल्कि यह आत्मा और चेतना को अनुभव कराने का एक माध्यम होते हैं. घर हो या मंदिर, अक्सर बड़े बुजुर्ग या पुजारी यह सलाह देते हैं कि ठाकुर जी की प्रतिमा के बिल्कुल सामने खड़े होकर दर्शन न किए जाएं. यह परंपरा केवल रीति-रिवाज का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी आध्यात्मिक और ऊर्जा संबंधी कारण छिपे हैं. चाहे घर का छोटा सा मंदिर हो या वृंदावन का भव्य धाम, दर्शन का विशेष तरीका भक्त और भगवान के बीच सम्मान और विनम्रता का संदेश देता है. सीधे सामने खड़े होने के बजाय थोड़ा किनारे से झुककर दर्शन करना भावनात्मक और ऊर्जा दृष्टि से अधिक उपयुक्त माना जाता है. यह अभ्यास न केवल भक्त के भीतर शांति और भक्ति भाव को जागृत करता है, बल्कि भगवान की ऊर्जा का सही तरीके से अनुभव कराता है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
दर्शन के पीछे का कारण
भगवान की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा के माध्यम से अपार ऊर्जा समाहित होती है. ठाकुर जी, अर्थात श्रीकृष्ण की दृष्टि में विशेष शक्ति होती है. जब कोई प्रतिमा के ठीक सामने खड़ा होता है, तो उस ऊर्जा की तीव्रता शरीर पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकती है. इसे सूरज की सीधी रोशनी में देखने से आंखों पर प्रभाव पड़ने के समान समझा जा सकता है. किनारे से दर्शन करने पर यह ऊर्जा धीरे-धीरे अनुभव होती है और शरीर उसे सहज रूप से ग्रहण कर पाता है.
इसके अलावा सीधे सामने खड़े होना कभी-कभी अहंकार का प्रतीक माना जाता है. इससे यह प्रतीत होता है कि भक्त ईश्वर के सामने अपनी स्थिति में बराबरी का भाव रख रहा है. वहीं थोड़ा तिरछा या हटकर खड़ा होना विनम्रता और दास्य भाव को दर्शाता है. झुककर दर्शन करने पर भक्त के भीतर यह भाव उत्पन्न होता है कि वह भगवान के चरणों का सेवक है. यही भाव उसकी भक्ति को प्रबल और गहन बनाता है
भक्ति शास्त्र में दर्शन को चरणबद्ध तरीके से करने का विधान है. पहले चरणों का, फिर कमर, उसके बाद वक्षस्थल और अंत में मुखारविंद यानी चेहरे का दर्शन किया जाता है. यदि सीधे सामने खड़े हो जाएं तो ध्यान भटक सकता है और भक्ति की गहनता कम हो सकती है. किनारे से दर्शन करने पर भक्त मूर्ति के स्वरूप को क्रमबद्ध और ध्यानपूर्वक देख सकता है.
ब्रज की परंपरा में यह भी मान्यता है कि सीधे सामने देखने से मूर्ति पर नजर लग सकती है. इसलिए भक्त झुककर या तिरछा खड़े होकर भगवान का सम्मान करते हैं. मंदिरों में मूर्तियों को ऐसे स्थान पर रखा जाता है, जहां पृथ्वी की ऊर्जा तरंगें अधिकतम होती हैं. मूर्ति के सामने खड़े होने से इन तरंगों का केंद्र सीधे शरीर पर पड़ता है, जबकि किनारे से खड़े होने पर ये ऊर्जा धीरे-धीरे हमारे शरीर और चक्रों पर प्रभाव डालती है.
ठाकुर जी के दर्शन सीधे सामने से न करना केवल परंपरा नहीं है, बल्कि यह भक्त की सुरक्षा, भक्ति भाव और ऊर्जा संतुलन का ध्यान रखने का तरीका है. झुककर या तिरछा खड़े होकर दर्शन करना विनम्रता और श्रद्धा का प्रतीक है. यह प्रक्रिया भक्त और भगवान के बीच संबंध को गहरा बनाती है और अनुभव को पूर्ण करती है.
कुछ लोगों को देखकर कुत्ते अचानक क्यों भौंकने लगते हैं? शनि दोष से क्या है संबंध
25 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कई बार आपने महसूस किया होगा, गली में चलते वक्त या किसी घर के बाहर, कुत्ता बिना वजह किसी एक इंसान को देखकर जोर-ज़ोर से भौंकने लगता है, जबकि साथ चल रहे बाकी लोगों पर उसका कोई रिएक्शन नहीं होता. ऐसे में मन में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों? क्या ये सिर्फ जानवरों की सामान्य आदत है या इसके पीछे ज्योतिष और ऊर्जा से जुड़ा कोई रहस्य भी छिपा है? भारतीय ज्योतिष शास्त्र और लोक मान्यताओं में कुत्तों को सिर्फ पालतू जानवर नहीं, बल्कि ऊर्जा पहचानने वाला जीव माना गया है. माना जाता है कि कुत्ते उन चीजों को महसूस कर लेते हैं, जिन्हें इंसान नहीं देख पाता. आइए जानते हैं आखिर कुत्ते ऐसा क्यों करते हैं…
ज्योतिष शास्त्र में कुत्ते का महत्व
ज्योतिष के अनुसार कुत्ते का संबंध सीधे न्याय व कर्म के कारक ग्रह शनि से माना जाता है. शनि ग्रह को कर्म, न्याय और अदृश्य शक्तियों का कारक ग्रह कहा जाता है. यही वजह है कि कुत्ते नकारात्मक ऊर्जा को जल्दी पहचान लेते हैं. जिन लोगों पर शनि ग्रह का प्रभाव अशुभ होता है, उन पर कुत्ते ज्यादा प्रतिक्रिया दे सकते हैं. कई मान्यताओं में कुत्तों को यमराज का दूत भी कहा गया है.
अदृश्य शक्तियों को कर लेते हैं महसूस
ज्योतिष का मानना है कि हर इंसान के आसपास एक ऊर्जा क्षेत्र होता है. अगर किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति खराब हो, गुस्सा, डर या बुरे विचार हावी हों तो कुत्ता उसे महसूस कर लेता है. साथ ही माना जाता है कि जिन लोगों की कुंडली में शनि दोष या पितृ दोष होता है, उनके आसपास कुत्ते बार-बार भौंकते या पीछे पड़ जाते हैं. ग्रामीण और पारंपरिक मान्यताओं में कहा जाता है कि कुत्ते नकारात्मक या अदृश्य शक्तियों को देख सकते हैं. इसीलिए रात में अचानक कुत्तों का भौंकना शुभ नहीं माना जाता.
चाल को बारीकी से पढ़ते हैं कुत्ते
सभी जानवरों की तरह कुत्तों की भी अपनी टेरिटरी होती है और जब कोई अजनबी उस टेरिटरी में आता है तो वह भौंककर चेतावनी जारी करता है कि यहां मत आओ. जो तेज-तेज चलकर आते हैं या अचानक से आ जाते हैं, उन पर कुत्ते ज्यादा रिएक्शन देते हैं. कुत्ते इंसान की बॉडी लैंग्वेज और चाल को बारीकी से पढ़ते हैं और उनकी हर चीज पर बारीकी से ध्यान देते हैं. कुत्तों में सूंघने की शक्ति इंसान से 1 लाख गुना ज्यादा होती है.
भौंककर देते हैं चेतावनी
कुत्ते इंसान की घबराहट, नशा या तनाव की गंध तुरंत जान लेता है, ऐसे लोगों पर ज्यादा भौंकते हैं क्योंकि इस तरह के इंसानों से ज्यादा खतरा लगता है. अगर आपका कुत्ता किसी खास व्यक्ति पर भौंकता है तो उसको गंभीरता से लें. कुत्ते इंसान से बेहतर खतरे को भांप लेते हैं और भौंककर ये उनकी सतर्कता का संकेत है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (25 दिसंबर 2025)
25 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- किसी शुभ समाचार के मिलने का योग है, व्यावसायिक गति उत्तम रहेगी।
वृष राशि :- मनोवृत्ति संवेदनशील रहेगी, कार्यगति अनुकूल, चिन्ता कम होगी, ध्यान रखे।
मिथुन राशि :- किसी प्रलोभन से हानि, मनोवृत्ति संवेदनशील रहेगी तथा कार्य गति उत्तम होगी।
कर्क राशि :- अनायास यात्रा, स्त्री वर्ग से कष्ट, वाद विवाद से परेशानी अवश्य हो।
सिंह राशि :- विरोधियों के षड़यंत्र से मानसिक परेशानी बनेगी, बेचैनी बढ़ेगी, कार्य रुकेंगे।
कन्या राशि :- शरीर कष्ट, लाभ, राजभय, उद्योग व्यापार में आंशिक लाभ होगा।
तुला राशि :- योग विलाप, धार्मिक कार्य कष्ट, व्यय अनाप-शनाप खर्च, परेशानी बनेगी।
वृश्चिक राशि :- बाधा, उलझन से लाभ, यात्रा से कष्ट, गृह कार्य राजकार्य में रुकावट रहेगी।
धनु राशि :- शत्रुभय, मुकदमें, लाभ, जमीन से लाभ, रोग भय बाधा, व्यापार में सुधार होगा।
मकर राशि :- व्यापार में लाभ, शत्रु भय, धन सुख धार्मिक खर्च बढ़ेंगे, कुछ मेहनत के कार्य बनें।
कुंभ राशि :- कलह, व्यर्थ खर्च, सफलता प्राप्त, विरोधी असफल रहे, व्यापार में सुधार होगा।
मीन राशि :- स्वजन सुख, पुत्र चिन्ता, सुख की हानि, व्यापार में स्थायी लाभ न हो।
क्यों खरमास में नहीं होते शुभ काम? गधे की इस कहानी से अनजान हैं 90% लोग, हर किसी को जानना है जरूरी
24 Dec, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
खर्मास हिन्दू कालगणना में एक विशेष समय है. यह वो अवधि है जब सूर्योदय का प्रभाव कम माना गया है और इसलिए सामान्य जीवन के शस्त्र यानी विवाह, गृह प्रवेश जैसे बड़े कार्यक्रम टाल दिए जाते हैं. लोग मानते हैं कि इस समय शुभ कार्यों का परिणाम ठीक नहीं मिलता. इसी कारण से खर्मास में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं. पर यह वर्जन केवल विश्वास पर आधारित नहीं बल्कि उसकी पौराणिक कथा भी उपलब्ध है. इंसान समय और ग्रहों के गमन को देखते हुए किसी भी कार्य के आरंभ या समापन का निर्णय लेते रहे हैं. खर्मास की कथा में भी एक पुरानी कथा मिलती है जिसमें सूर्यदेव और अन्य देवों का वर्णन आता है. यह काल एक महीने का होता है और साल में दो बार आता है.
2025 में खर्मास का आखिरी खंड दिसंबर की मध्य से प्रारंभ हुआ है. ज्योतिषीय पंचांग के अनुसार सूर्यदेव जब धनु राशि में प्रवेश करते हैं तो खर्मास आरंभ हो जाता है. इसी प्रकार जब सूर्य मीन राशि में प्रवेश करता है तब भी एक खर्मास आती है. इस आर्टिकल में हम 2025 के इस चल रहे खर्मास, उसकी कथा और उसकी विशेषताओं को सरल भाषा में जानेंगे
खर्मास किस दिन से 2025 में शुरू हुआ?
2025 में वर्तमान खर्मास 16 दिसंबर को लगा, जब सूर्यदेव धनु राशि में प्रवेश किये. यह अवधि लगभग 30 दिन तक रहेगी और 14 जनवरी 2026 को मकर संक्रांति के साथ समाप्त होगी. इन दिनों में सभी बड़े मांगलिक कार्यों को टाला जाता है.
खर्मास की पौराणिक कथा
खर्मास से जुड़ी कथा मार्कण्डेय पुराण में मिलती है. संस्कृत में खर का मतलब होता है गधा. कथा के अनुसार एकबार सूर्यदेव अपने सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करने निकले. इस दौरान जब घोड़ों को भूख और प्यास लगी, तब सूर्यदेव उनकी दयनीय दशा को देखकर सहानुभूत हुए और उन घोड़ों को आराम देने का निर्णय लिया.
फिर उन्हें ध्यान आया कि अगर रथ रुक गया तो सृष्टि का चक्र प्रभावित हो जाएगा. ऐसे सूर्यदेव की नजर उन दो खर यानी गधों पर पड़ी जो तालाब किनारे पानी पी रहे थे. उन्होंने सोचा कि रथ में इन्हें लगाकर घोड़ों को कुछ देर के लिए आराम दे दिया जाए जिससे रथ भी चलता रहेगा और घोड़े आराम भी कर लेंगे. लेकिन गधों और घोड़ों की बराबरी असंभव है. रथ में गधों को जोड़ा तो रथ की स्पीड कम हो गई और पृथ्वी की वो परिक्रमा 1 महीने में पूरी हुई. कथानुसार इस देरी से सूर्यदेव के तेज में कमी आई. यही कारण है कि खरमास में कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता.
खर्मास में क्या नहीं करना चाहिए?
खर्मास के समय विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, मुंडन जैसे बड़े जीवन के आयोजन नहीं किये जाते. ऐसा माना जाता है कि इस समय सूर्यदेव का प्रभाव सामान्य से कम रहता है और इसलिए किसी भी नए आरंभ का परिणाम स्थिर नहीं रह सकता. खर्मास के दिनों में साधारण पूजा, दान और भक्ति के कार्य करने को वर्जित नहीं माना जाता, बल्कि इसे शुभ माना गया है.
खर्मास की सामाजिक परंपरा
समाज में खर्मास को एक तरह से विश्राम, संयम और धार्मिक ध्यान का समय माना गया है. लोग इस महीने में भजन, कीर्तन, दान और सेवा कार्य पर अधिक ध्यान देते हैं. बाल विवाह, नामकरण आदि कार्य टालने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. यह नियम आज भी कई परिवारों द्वारा मनाया जाता है.
समय की गणना और दो खर्मास
जैसा कि बताया गया, खर्मास साल में दो बार आता है. एक बार जब सूर्य धनु राशि में प्रवेश करता है और दूसरी बार जब सूर्य मीन राशि में प्रवेश करता है. दोनों बार लगभग एक महीने का समय खर्मास के नाम से जुड़ा रहता है. इसका कारण ज्योतिषीय गणना में सूर्य की स्थिति का परिवर्तन माना जाता है.
2 या 3 जनवरी? कब रखा जाएगा पौष पूर्णिमा का व्रत? सुख-समृद्धि का खास उपाय
24 Dec, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म शास्त्रों में पौष मास को दान, तप और पुण्य अर्जित करने का विशेष समय माना गया है. इस महीने की पूर्णिमा तिथि को अत्यंत फलदायी और शुभ बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों में स्नान करने से पापों का क्षय होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है. पौष पूर्णिमा का दिन विशेष रूप से भाग्य को संवारने और आर्थिक स्थिति को उत्तम करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है. इस वर्ष पौष पूर्णिमा शुभ योगों के साथ पड़ रही है, जिससे इस दिन किए गए दान और धार्मिक कर्म कई गुना फल देने वाले माने जा रहे हैं.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पौष पूर्णिमा न केवल धन-समृद्धि बढ़ाने में सहायक होती है बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति भी प्रदान करती है. नए वर्ष 2026 में यह तिथि विशेष महत्व रखती है. आइए जानते हैं, उज्जैन के प्रसिद्ध आचार्य आनंद भारद्वाज से कि नए साल में पौष पूर्णिमा कब मनाई जाएगी और इस पावन तिथि का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व क्या है.
कब मनाई जाएगी पौष पूर्णिमा?
उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज के अनुसार, इस बार पंचांग के मुताबिक पौष पूर्णिमा तिथि दो जनवरी को शाम 6 बजकर 53 मिनट से शुरू होगी. वहीं इस तिथि का समापन तीन जनवरी को दोपहर तीन बजकर 32 मिनट पर होगा. ऐसे में पौष पूर्णिमा तीन जनवरी को मनाई जाएगी.
पौष पूर्णिमा पर जरूर करें ये काम
पौष पूर्णिमा का दिन विशेष रूप से पुण्यदायी माना जाता है. इस तिथि पर व्रत, पूजा और दान करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और मन को शांति मिलती है. इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा करने से घर-परिवार में सुख, समृद्धि और सौभाग्य बढ़ता है. साथ ही व्रत रखकर चंद्रदेव की आराधना करने से कुंडली से संबंधित चंद्र दोष भी शांत होता है. इस दिन तिल, गुड़, घी, कंबल, भोजन सामग्री या अपनी सामर्थ्य अनुसार धन का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है.
पौष पूर्णिमा पर भूल से भी न करें ये काम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पौष पूर्णिमा का दिन अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है. इस शुभ तिथि पर कुछ कार्यों से परहेज करना आवश्यक होता है ताकि देवी लक्ष्मी की कृपा बनी रहे और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो. इसमें पौष पूर्णिमा के दिन मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज जैसे तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए. सात्विक भोजन ग्रहण करने से मन और वातावरण शुद्ध रहता है. पूर्णिमा की तिथि विशेष ऊर्जा से युक्त मानी जाती है. इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और ईश्वर का स्मरण और ध्यान अवश्य करें. इस दिन विशेषकर बुजुर्गों और जरूरतमंदों का अपमान न करें. वाणी में मधुरता रखें और क्रोध करने से बचें अन्यथा धन की देवी रुष्ट हो सकती हैं. साथ ही इस दिन कर्ज लेना या देना उचित नहीं माना जाता. ऐसा करने से आर्थिक असंतुलन और धन संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं. इन नियमों का पालन करके पौष पूर्णिमा के पुण्य फल को कई गुना बढ़ाया जा सकता है और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है.
अंधेरे का डर, बुरे सपने और घबराहट में कैसे मदद करती है हनुमान चालीसा, 7 पॉइन्ट्स में समझें इसके फायदे
24 Dec, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आज के समय में बच्चों की दिनचर्या काफी बदल गई है. मोबाइल, टीवी, ऑनलाइन क्लास, बदलता माहौल और अकेलापन कई बार उनके मन पर गहरा असर डालता है. छोटे बच्चे अकसर बिना वजह डर जाते हैं, रात में चौंककर उठ जाते हैं, बुरे सपने देखते हैं या फिर सोने से कतराते हैं. माता-पिता लाख कोशिश करते हैं, लेकिन हर बार दवाइयों या डांट से समाधान नहीं मिलता. ऐसे में घर के बड़े-बुजुर्गों द्वारा बताए गए आध्यात्मिक उपाय आज भी उतने ही असरदार माने जाते हैं. हनुमान चालीसा को हिंदू धर्म में बहुत शक्तिशाली पाठ माना गया है. यह सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि मन को स्थिर करने और डर को दूर करने में भी मदद करती है. मान्यता है कि रात में बच्चों को सोते समय हनुमान चालीसा सुनाने से उनके मन में सुरक्षा का भाव आता है. इसकी मधुर ध्वनि और सकारात्मक शब्द बच्चों के अवचेतन मन पर अच्छा असर डालते हैं. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
1. बच्चों के मन को मिलती है शांति, नींद होती है बेहतर<br />हनुमान चालीसा की ध्वनि में एक अलग ही सुकून होता है. जब इसे धीमी और मधुर आवाज में सुनाया जाता है, तो बच्चे का मन धीरे-धीरे शांत होने लगता है. दिनभर की भागदौड़, डर या बेचैनी कम होती है और दिमाग आराम की स्थिति में चला जाता है. यही कारण है कि बच्चे जल्दी सो जाते हैं और उनकी नींद भी गहरी होती है. जिन बच्चों को बार-बार नींद टूटने या डरकर उठने की आदत होती है, उनमें भी समय के साथ सुधार देखा जाता है.
2. डर, घबराहट और नकारात्मक सोच से राहत<br />छोटे बच्चों में अंधेरे का डर, अकेले सोने की परेशानी या बुरे सपने आम बात है. हनुमान चालीसा को निडरता और सुरक्षा से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि इसके पाठ से आसपास की नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है. जब बच्चा रोजाना इसे सुनता है, तो उसके मन में एक भरोसा पैदा होता है कि वह सुरक्षित है. इससे घबराहट कम होती है और आत्मबल बढ़ता है.
3. आत्मविश्वास और साहस में बढ़ोतरी<br />हनुमान जी को महाबली और साहसी माना जाता है. उनकी कहानियां और चालीसा के शब्द बच्चों के मन में साहस का बीज बोते हैं. धीरे-धीरे बच्चा खुद को मजबूत महसूस करने लगता है. स्कूल जाने का डर, अकेले कमरे में रहने की परेशानी या नए लोगों से मिलने की झिझक कम होने लगती है. यह बदलाव एक दिन में नहीं आता, लेकिन नियमित रूप से चालीसा सुनाने से असर साफ दिखने लगता है.
4. सेहत और ऊर्जा पर सकारात्मक प्रभाव<br />मान्यताओं के अनुसार हनुमान चालीसा सुनने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है. जब बच्चा मानसिक रूप से शांत रहता है, तो उसका असर उसकी सेहत पर भी दिखता है. बेहतर नींद से इम्यूनिटी मजबूत होती है और बच्चा ज्यादा एक्टिव महसूस करता है. कई माता-पिता मानते हैं कि नियमित रूप से चालीसा सुनाने से बच्चों में सुस्ती कम होती है और वे दिनभर ज्यादा फ्रेश रहते हैं.
5. ध्यान और समझ विकसित करने में मददगार<br />जब बच्चे रोज एक ही समय पर हनुमान चालीसा सुनते हैं, तो यह उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाती है. इससे उनका ध्यान टिकने लगता है. धीरे-धीरे वे इसके शब्दों को पहचानने लगते हैं और अर्थ जानने की जिज्ञासा भी बढ़ती है. माता-पिता अगर सरल भाषा में कुछ पंक्तियों का मतलब समझा दें, तो बच्चे की समझ और सोच दोनों बेहतर होती हैं.
6. संस्कार और आध्यात्मिक जुड़ाव<br />बचपन में जो संस्कार मिलते हैं, वही आगे चलकर जीवन की दिशा तय करते हैं. हनुमान चालीसा बच्चों को भक्ति, विनम्रता और सेवा का भाव सिखाती है. इससे उनमें बड़ों के प्रति सम्मान और अपने अंदर अच्छाई लाने की भावना पैदा होती है. यह एक तरह से नैतिक शिक्षा का भी काम करती है, जो बिना किसी दबाव के बच्चे के मन में बैठ जाती है.
7. कैसे सुनाएं हनुमान चालीसा ताकि असर दिखे<br />बच्चों को हनुमान चालीसा सुनाते समय कुछ छोटी बातों का ध्यान रखें. हमेशा इसे धीमी और प्यार भरी आवाज में सुनाएं. मोबाइल या तेज स्पीकर की जगह खुद सुनाना ज्यादा असरदार माना जाता है. शुरुआत में पूरी चालीसा न भी सुनाएं तो कम से कम कुछ चौपाइयां रोजाना सुनाई जा सकती हैं. हफ्ते में एक-दो बार आसान शब्दों में इसका अर्थ समझाने से बच्चे और ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं.
पुत्र प्राप्ति के लिए कर लिए सभी प्रयास फिर भी नहीं मिला फायदा, तो पुत्रदा एकादशी पर कर लें ये खास उपाय घर में गूंज उठेगी किलकारियां!
24 Dec, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
यदि आप पुत्र प्राप्ति के लिए अनेकों उपाय करके थक चुके हैं और आपको निराशा हाथ लगी है, तो यह खबर आपके लिए बेहद ही उपयोगी होगी. हिंदू धर्म में पुत्र प्राप्ति के अनेक उपाय का वर्णन किया गया है, लेकिन एक खास तिथि ऐसी आती है जिस पर श्रद्धा भक्ति भाव, पवित्र ह्रदय और विधि विधान से व्रत करने पर पुत्र की प्राप्ति होने की धार्मिक मान्यता है. साल भर 24 एकादशियों का आगमन होता है जिनका व्रत करना विशेष फलदाई माना गया है.
सभी एकादशी में पुत्रदा एकादशी सबसे अधिक फलदाई होती है. वंश वृद्धि के लिए इस दिन पुत्रदा एकादशी का व्रत करने पर अमोघ फल की प्राप्ति होने की धार्मिक मान्यता है जिससे दांपत्य जीवन में भी खुशियों की बहार आ जाती है. संतान सुख से वंचित दंपति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत एक वरदान है. चलिए विस्तार से जानते हैं…
पुत्रदा एकादशी का महत्व
पुत्रदा एकादशी व्रत की ज्यादा जानकारी देते हुए हरिद्वार के विद्वान धर्माचार्य पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि साल में यानी संवत में 24 एकादशियों का आगमन मानव कल्याण के लिए होता है. सभी एकादशियों का अपना-अपना महत्व होता है. संतान पक्ष से वंचित या पुत्र प्राप्ति करने के लिए पोस्ट शुक्ल पक्ष में पुत्रदा एकादशी का आगमन होता है यदि इस व्रत को दंपत्ति विधि विधान से करते हैं, तो उनकी सभी मनोकामनाएं विष्णु भगवान की कृपा से पूर्ण हो जाती हैं.
साल 2025 में पुत्रदा एकादशी 30 और 31 दिसंबर को होगी. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी तिथि विष्णु भगवान को समर्पित होती है. इस दिन अपनी सामर्थ्य अनुसार सफेद रंग की वस्तुओं का दान करने पर जीवन में चल रही सभी समस्याएं खत्म हो जाती हैं
किन चीजों से रहें दूर
इस व्रत की अवधि में मन में दुर्भावना, गलत विचार, किसी का अहित करना आदि सोच विचारों से दूर रहना और तामसिक वस्तुओं का सेवन, अंडा, मांस, शराब पूर्ण रूप से वर्जित होती हैं. पुत्रदा एकादशी का व्रत वंश को आगे बढ़ाने पुत्र का वरदान और भाग्य के सभी द्वारा खोलकर सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला होता है पोस्ट शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का क्षय होने के कारण दशमी तिथि को यह व्रत किया जाएगा जो दो दिन 30 और 31 दिसंबर को किया जाएगा.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (24 दिसंबर 2025)
24 Dec, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- यात्रा, भय, कष्ट, व्यापार बाधा, शुभ समाचार, प्रसन्नता का योग, मित्र सहयोग अवश्य करें।
वृष राशि :- शत्रु, भय, रोग, स्वजन सुख, लाभदायक जीवन, दाम्पत्य सुख असमंजस बना रहेगा।
मिथुन राशि :- वाहन भय, मातृ-पितृ कष्ट, हानि, व्यर्थ तनाव, खर्च से परेशानी अवश्य ही होगी।
कर्क राशि :- सफलता, उन्नति, शुभ कार्य, विवाद, उद्योग, व्यापार में उच्च कोटि की स्थिति बन सकेगी।
सिंह राशि :- शरीर कष्ट, उत्तम व्यय, खर्च में सफलता, व्यवसाय में साधारण लाभ हो सकेगा।
कन्या राशि :- खर्च विवाद, स्त्री कष्ट, विद्या लाभ, कुछ अच्छे कार्य भी होगे तथा संतान प्राप्त होगी।
तुला राशि :- यात्राएं, हानि, राजभय, लाभ, शरीर कष्ट, व्यापार में सुधार व प्रगति की संभावना है।
वृश्चिक राशि :- वृत्ति से लाभ, यात्रा, लाभ कारोबार में उतार चढ़ाव की स्थिति होगी।
धनु राशि :- अल्प लाभ, शरीर कष्ट, चोट आदि का भय, शिक्षा की स्थिति ठीक होगी।
मकर राशि :- शत्रु हानि से अपयश, शारीरिक सुख, समय उद्योग व्यापार के लिए प्रयास करें।
कुंभ राशि :- शुभ व्यय, संतान सुख, कार्य सफलता मित्र वर्ग से संतोष अवश्य ही होगा।
मीन राशि :- पदोन्नति, राजभय, न्याय, लाभ हानि, व्यय, जीवन संतोष जनक होगा।
पौष पुत्रदा एकादशी 2025: 30 या 31 दिसंबर? जानें सही तिथि, पारण समय और महत्व
23 Dec, 2025 12:20 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Pausha Putrada Ekadashi 2025: सनातन परंपरा में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार माना गया है। मान्यता है कि श्रीहरि की आराधना से जीवन के दुख दूर होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए एकादशी व्रत को विशेष फलदायी माना गया है। ऐसे में वर्ष की अंतिम एकादशी पौष पुत्रदा एकादशी 2025 को लेकर श्रद्धालुओं के मन में यह सवाल है कि व्रत 30 दिसंबर को रखा जाए या 31 दिसंबर को।
पंचांग के अनुसार पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 30 दिसंबर 2025 को सुबह 07:50 बजे शुरू होकर 31 दिसंबर 2025 को प्रातः 05:00 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के आधार पर गृहस्थ श्रद्धालु 30 दिसंबर को एकादशी व्रत रखेंगे। वहीं वैष्णव परंपरा में हरि वासर का पालन किया जाता है, इसलिए वैष्णव भक्त 31 दिसंबर को पौष पुत्रदा एकादशी 2025 का व्रत करेंगे।
जो श्रद्धालु 30 दिसंबर को व्रत रखते हैं, वे 31 दिसंबर 2025 को दोपहर 01:26 बजे से 03:31 बजे के बीच पारण कर सकते हैं। वहीं 31 दिसंबर को व्रत रखने वाले वैष्णव भक्त 1 जनवरी 2026 को सुबह 07:14 बजे से 09:18 बजे के बीच पारण करेंगे। इस तरह परंपरा के अनुसार व्रत और पारण का समय अलग-अलग रहेगा।
एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान-ध्यान कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा कर फल, फूल, धूप, दीप और तुलसी दल अर्पित किए जाते हैं। इस दिन अन्न का त्याग कर फलाहार किया जाता है और श्रीहरि की कथा का पाठ विशेष फल देता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पौष पुत्रदा एकादशी 2025 संतान की कामना करने वालों के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। इस व्रत से सुख, शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है तथा अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
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