धर्म एवं ज्योतिष
रास्ते में अर्थी दिख जाए तो क्या यह शुभ है या अशुभ, जानें क्या कहती हैं धार्मिक मान्यताएं?
7 May, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आज के आधुनिक दौर में समाज काफी आगे निकल चुका है लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जिसे जेन जी जनरेशन भी शुभ और अशुभ संकेत के तौर पर देखती है. हालांकि ऐसी घटनाओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है लेकिन बड़े बुजुर्गों की बातें और धर्म में आस्था रखने वाले लोग इनको गुड़लक और बैडलक के तौर पर देखते हैं. जैसे कि अगर आप रास्ते में जा रहे हों और तभी बिल्ली रास्ता काट दे तो कई लोग इसे अशुभ संकेत के तौर पर मानते हैं. वहीं अगर आपको रास्ते में अर्थी दिख जाए तो क्या यह शुभ संकेत है या अशुभ, आइए जानते हैं…
हाथ जोड़कर करें प्रणाम
शकुन शास्त्र के अनुसार, रास्ते में अगर अर्थी दिख जाए तो यह शुभ संकेत माना जाता है. अगर आप किसी काम के लिए घर से बाहर जा रहे हों और आपको रास्ते में अर्थी दिख जाए तो इसका मतलब है कि उस काम के सफल होने की संभावना जल्द बढ़ जाती है. इसलिए जब भी रास्ते में अर्थी मिले तो हाथ जोड़कर प्रणाम करें.
सभी दुख होते हैं दूर
रास्ते में अर्थी दिखना ना केवल शुभ माना गया है बल्कि कई जगहों पर तो इसको भाग्यशाली के तौर पर देखा जाता है. मान्यता है कि रास्ते में अर्थी देखने से मरने वाला व्यक्ति आपके दुख और कष्ट अपने साथ लेकर चला जाता है. इसलिए इसे सौभाग्यशाली भी माना गया है.
शिव बारात से पहले निकली थी अर्थी
क्षेत्रिय मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव की बारत निकलने से पहले अर्थी निकली थी. इसलिए आज भी शिव और पार्वती के विवाह को आज भी सबसे पवित्र और शक्तिशाली विवाह माना जाता है. आज भी शिव और पार्वती के विवाह में जो भी रस्में हुई थीं, वह रस्में आज भी निभाई जाती हैं, चाहें वह मंडप में पति पत्नी के वचन से जुड़े हों या फिर फेरों से.
अंतिम सत्य है अर्थी
वैसे भी भगवान की ओर जा रही अंतिम यात्रा अशुभ कैसे हो सकती है. ना तो वह अर्थी अपवित्र है और ना ही जहां जा रही हो वह जगह यानी श्मशान घाट. क्योंकि संपूर्ण जीवन काल में केवल यही सत्य है और सत्य ही सुंदर है और सुंदर ही शिव है. जो लोग अर्थी या श्मशान घाट को अशुभ मानते हैं, वह गलत है क्योंकि यह किसी भी स्तर पर अशुभ नहीं हो सकते.
बाबा बद्रीनाथ से जुड़ी टिहरी राजघराने की परंपरा, महारानी के साथ मिलकर ये रस्म पूरा करती हैं सुहागिनें
7 May, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इस साल 4 मई को सुबह 6 बजे विधि-विधान के साथ बाबा बद्रीनाथ धाम के कपाट खोल दिए गए. ग्रीष्मकाल के दौरान बाबा बद्री की पूजा-अर्चना के लिए तिल के तेल का उपयोग किया जाता है, जो बहुत विशेष होता है क्योंकि यह सदियों पुरानी परंपरा से जुड़ा है, जो टिहरी के राज परिवार से जुड़ी है. चमोली जनपद स्थित बद्रीनाथ धाम में उपयोग होने वाले तिलों के तेल को निकालने की खास परंपरा है
टिहरी सांसद और महारानी माला राज्यलक्ष्मी शाह ने कहा कि बाबा बद्रीनाथ के लिए हमारे पूर्वजों की सदियों पुरानी परंपरा है, जिसमें सिर्फ सुहागिन महिलाएं ही शामिल हो सकती हैं.
इसमें महिलाओं के अलावा पुरुषों के शामिल होने की इजाजत नहीं होती है. बद्रीनाथ धाम की कृपा से यह सदियों पुरानी परंपरा ऐसे ही चल रही है, जो आगे भी जीवित रहेगी.
रुद्रप्रयाग निवासी चंद्रा डंगवाल ने बताया कि टिहरी के नरेंद्रनगर राजमहल में महारानी और हम स्थानीय महिलाएं तिल के तेल को अपने हाथों से पिरोती हैं.
बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले ही सदियों पुरानी गाडू घड़ी परंपरा के तहत टिहरी राज परिवार की महिलाओं के साथ प्रजा यानी अन्य महिलाएं व्रत लेकर मुंह पर पीले रंग का कपड़ा बांधकर तेल पिरोने का काम करती हैं.
इसमें सबसे पहले पूजा करके तिल को सूप पर लेकर फटका जाता है, ताकि उसमें से सारी गंदगी निकल जाए. इसके बाद महारानी सबसे पहले ओखली में तिल डालकर उसे पिरोना शुरू करती हैं. यहां अन्य महिलाएं सिल-बट्टे की मदद से तिल की कुटाई करती हैं.
इसके बाद हाथों से निकाले गए तिलों के तेल को चांदी के घड़े में भरकर बद्रीनाथ धाम के लिए रवाना कर दिया जाता है और बाबा बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने के बाद अगले 6 महीने तक उनके श्रृंगार और पूजा-अर्चना में इसका उपयोग होता है.
राशिफल: कैसा रहेगा आपका आज का दिन
7 May, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- भाग्य का सितारा साथ देगा, बिगड़े कार्य बनेंगे, कार्य योजना अवश्य बनेगी।
वृष राशि :- नवीन कार्य सफल होगा, संवेदनशील होने से बचिये, समय पर ध्यान दें।
मिथुन राशि :- स्त्री वर्ग से हर्ष, कुछ चिन्ता, व्यवसायिक अवरोध कष्टकारी अवश्य होगा।
कर्क राशि :- व्यग्रता, मन उद्विघ्न रखे, कार्यगति मंद होवे, रुके कार्य बनेंगे, स्थितिगत ध्यान दें।
सिंह राशि :- साधन सम्पन्नता के योग बने, दैनिक व्यवसाय गति अनुकूल बनी ही रहेगी।
कन्या राशि :- विरोधी परेशान करें, व्यर्थ धन का व्यय, असमंजस व अस्थिति बनी ही रहेगी।
तुला राशि :- कार्य-व्यवसाय में बाधा, तनाव-क्लेश से बचने का प्रयास करें।
वृश्चिक राशि :- चिन्ता बनी रहेगी, कुटुम्ब की समस्याऐं को समझदारी से सुलझाऐं।
धनु राशि :- बिगड़े कार्य बनेंगे, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, सहयोग अवश्य ही मिलेगा।
मकर राशि :- स्थिति में सुधार कार्य, सफलता से सहयोग, संतोष अवश्य होगा।
कुंभ राशि :- स्वास्थ नरम एवं कहीं तनावपूर्ण स्थिति कष्टप्रद होवेगी।
मीन राशि :- दूसरों के कार्यों में समय तथा धन नष्ट न करें, समय स्थिति का ध्यान रखें।
महाभारत में युधिष्ठिर कई बार रोए, क्या थी वजह, कुंती किसकी मौत पर दहाड़ मारकर रोईं
6 May, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
महाभारत में युधिष्ठिर ने कई बार रोये. कभी अपनी स्थिति के कारण तो कभी सगे संबंधियों, भाइयों और प्रियजनों की मृत्यु पर. युद्ध के दौरान और उसके बाद उनकी पीड़ा कई बार जाहिर हुई. वैसे केवल युधिष्ठिर ही क्यों महाभारत में तो धृतराष्ट्र, कर्ण, दुर्योधन सभी रोए. लेकिन सबसे ज्यादा दहाड़कर मारकर रोने वाली कुंती थीं. वो जिस तरह रोईं तो हर कोई हिल गया.
पहले ये जानेंगे कि युधिष्ठिर की पीड़ा कब रोने के रूप में बाहर निकली. पांडव जब वनवास काट रहे थे. तो वो कभी कभी अपनी जगह बदलते थे. उस समय पांडव वन में निवास कर रहे थे.
अर्जुन द्वियास्त्र हासिल करने के लिए इंद्र के पास चले गए थे. उनके बगैर भीम युधिष्ठिर से लगातार झगड़ते रहते थे. जरूरत से ज्यादा सहिष्णु और धैर्यवान होने के लिए युधिष्ठिर की आलोचना करते रहते थे. द्रौपदी अपने भाग्य पर रोती रहती थी, जिसने उन सभी को ये दिन दिखाए थे.
तब युधिष्ठिर ऋषि के सामने फफक पड़े
इसी दौरान महान ऋषि वृहदश्व उनसे मिलने आए. युधिष्ठिर जो दुख और आत्मनिंदा से भरे हुए थे, ऋषि के सामने फूट-फूटकर रो पड़े. क्या आपने मुझसे अधिक दुर्भाग्यशाली को देखा या सुना है, कहकर वह सुबकने लगे. खैर ऋषि ने युधिष्ठिर को ढांढस बंधाया. अच्छे दिनों का आश्वासन दिया.
कम से कम तीन बार रोए
हालांकि ये युधिष्ठर का पहली बार रोना नहीं था. वह इसके बाद भी कई बार रोए. कम से कम तीन बार इसका जिक्र महाभारत में मिलता ही है. युद्ध के दौरान जब युधिष्ठिर को लगा कि अर्जुन मारा गया है, तो वह रोने लगे. यह स्थिति तब आई जब उन्होंने श्री कृष्ण की भयंकर शंखध्वनि सुनी, लेकिन गांडीव की टंकार नहीं सुनाई दी, जिससे उन्हें लगा कि अर्जुन की मृत्यु हो गई है.
युद्ध में अपने भाइयों और सगे संबंधियों की मृत्यु से भी युधिष्ठिर को गहरा दुख और आत्मग्लानि हुई. इस पर भी उन्होंने विलाप किया. वे इसके चलते मनोवैज्ञानिक तौर पर बेचैन और व्याकुल हो गए. सपनों में युद्ध के दृश्य देखते थे. इस व्यथा को श्री कृष्ण के सामने भी जाहिर किया.
तब कुंती दहाड़कर मारकर रोईं
जब युद्ध खत्म हुआ. कुंती कर्ण के मृत शरीर को गोद में लेकर रो रही थीं, तब युधिष्ठिर को यह पता चला कि कर्ण भी उनके भाई थे. इस तथ्य को जानकर वो भी भावुक हुए, रोए. गुस्से में आकर उन्होंने महिलाओं को श्राप दिया कि वे अपने मन की बात छिपा नहीं पाएंगी. युद्ध के बाद भी युधिष्ठिर ने अपने परिवार और संबंधियों के विनाश पर गहरा शोक व्यक्त किया, जो कई बार उनके रोने और विलाप के रूप में सामने आया.
कहा जाता है कि सबसे जबरदस्त विलाप कुंती ने किया था. वह कर्ण की मृत्यु के बाद उसके शव को गोद में लेकर दहाड़ें मारकर रोने लगीं. ये महाभारत का बहुत भावुक क्षण था. कुंती के विलाप को देखकर युधिष्ठिर भी भावुक हुए थे. हर कोई इसलिए भी तब हैरान था कि कुंती भला कर्ण के लिए क्यों इतना विलाप कर रही हैं. बाद में पता लगा कि कर्ण भी कुंती के बेटे थे.
अर्जुन क्यों रोए थे
महाभारत के पुरुष पात्रों में कई बार भावुक और रोने के प्रसंग आते हैं. अर्जुन ने तब विलाप किया और बहुत दुखी हो गए जबकि अभिमन्यु की मृत्यु के बारे में जाना. अर्जुन तब भी फफकर रो पड़े जब उन्होंने महाभारत युद्ध की शुरुआत अपने सगे संबंधियों को सामने देखा. तब वह श्रीकृष्ण के सामने भावुक होकर रो पड़े. युद्ध करने से मना कर दिया.
भीम की आंखों में आए आंसू
भीम की आंखों में तब आंसू आ गये जब द्रौपदी के चीरहरण के समय सबके सामने पांडवों को अपमानित होना पड़ा, तब भीम की आंखों में भी आंसू आ गए थे.
महाभारत युद्ध के दौरान धृतराष्ट्र पुत्रों की मृत्यु के समाचार पर कई बार रोए. गांधारी भी दुर्योधन व अन्य पुत्रों की मृत्यु पर रोईं. जब उन्होंने श्रीकृष्ण को श्राप दिया, उससे पहले भी युद्धस्थल में जाकर वह रोईं थीं. अपने भाइयों और मित्रों की मृत्यु के बाद दुर्योधन ने भी युद्धभूमि में आंसू बहाए.
कर्ण ये रहस्य पता लगने पर रोए
कर्ण तब श्रीकृष्ण के सामने रो पड़े, जब उन्होंने कर्ण को पहली बार ये बताया कि वो पांडवों के भाई और कुंती के सबसे बड़े पुत्र हैं. ये रहस्य अब तक छिपा हुआ था लेकिन जब ये पता लगा तो कर्ण ने भावनात्मक तौर पर खुद को ऐसी स्थिति में पाया कि वो रोने लगे.
सबसे ज्यादा बार द्रौपदी रोईं
वैसे महाभारत के महिला पात्रों में सबसे ज्यादा रोने वालों में द्रौपदी हैं. वह पहली बार तब रोईं जब युधिष्ठर ने उन्हें दांव पर लगाया. सभा में उनका सबके सामने अपमान हुआ. तब भी वह फफक उठीं जब अभिमन्यु की मृत्यु की सूचना मिली. अपने पाचों पुत्रों (उपपांडवों) की अश्वतथामा द्वारा हत्या के बाद भी वह खूब रोईं. उनके आंसू थमने का नाम नहीं लेते थे.
पेड़ नहीं, जीवित देवता हैं ये! जानिए मंदिरों में पेड़ों की पूजा के पीछे छिपे राज, क्या है इसका आध्यात्मिक महत्व?
6 May, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आपने अक्सर देखा होगा कि जब भी कोई मंदिर जाता है, तो वहां मूर्ति के साथ साथ किसी पेड़ की भी पूजा करता है. कई बार लोग उस पेड़ के पास दीया जलाते हैं, जल चढ़ाते हैं और हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं. यह सब देखकर मन में सवाल उठता है कि आखिर मंदिर में पेड़ की पूजा क्यों होती है? दरअसल, हिंदू परंपरा में पेड़ों को सिर्फ पर्यावरण का हिस्सा नहीं, बल्कि ईश्वर का रूप माना गया है. पुराने समय से ही यह मान्यता रही है कि कुछ खास पेड़ों में ईश्वरीय शक्ति होती है और इन पेड़ों के माध्यम से भगवान से जुड़ा जा सकता है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
मंदिरों में क्यों होते हैं विशेष पेड़?
मंदिरों में आप कई बार पीपल, बरगद, तुलसी, केला या बिल्व का पेड़ देखेंगे. ये कोई आम पेड़ नहीं होते. हर एक पेड़ के पीछे एक गहरी धार्मिक मान्यता जुड़ी होती है.
1. पीपल का पेड़: इसे भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है. शनिवार या एकादशी को इसके नीचे दीया जलाने से शुभ फल मिलता है.
2. बरगद का पेड़: इसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों का प्रतीक माना जाता है. वट सावित्री जैसे व्रत इसी पेड़ की पूजा के साथ जुड़ते हैं.
3. तुलसी का पौधा: यह माता लक्ष्मी का रूप मानी जाती है और भगवान विष्णु को भी बहुत प्रिय है. इसे रोज़ पूजा में शामिल किया जाता है.
4. केले का पेड़: इसे गुरुवार को पूजा जाता है और यह भी भगवान विष्णु से जुड़ा होता है.
5. बिल्व का पेड़: शिव पूजा में इसका विशेष महत्व है. इसकी पत्तियां शिवलिंग पर चढ़ाई जाती हैं.
ग्रहों से संबंध
हिंदू ज्योतिष में यह बताया गया है कि हर पेड़ किसी न किसी ग्रह से जुड़ा होता है. जैसे:
-पीपल – शनि और गुरु ग्रह से जुड़ा होता है.
-तुलसी – शुक्र और चंद्रमा से संबंधित होती है.
-नीम – मंगल और केतु से संबंध रखता है.
इन पेड़ों की पूजा करने से ग्रहों के दोष कम हो सकते हैं और मन को शांति मिलती है.
मानसिक और आत्मिक लाभ
मंदिरों में लगे पेड़ सिर्फ धार्मिक नजरिए से ही नहीं, मानसिक शांति के लिए भी अहम होते हैं. माना जाता है कि इन पेड़ों के पास सकारात्मक ऊर्जा होती है. जब कोई व्यक्ति इन पेड़ों के पास जाता है या पूजा करता है, तो उसे मन की शांति मिलती है, ध्यान लगाने में आसानी होती है और एक विशेष ऊर्जा का अनुभव होता है.
क्यों कुंवारी लड़कियों पर ही ज्यादा चिपकता है प्रेत? ज्योतिषाचार्य से जानें किन चीजों से रहें सतर्क
6 May, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आज के मॉर्डन युग में भूत-प्रेत जैसी नेगेटिव एनर्जी से जुड़ी घटनाओं पर कुछ लोग विश्वास करते हैं को कुछ नहीं. हालांकि ऐसी घटनाओं के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता है लेकिन फिर कई लोग इस तरह पारलौकिक शक्तियों को सच मानते हैं. आपमें से कुछ लोगों ने भूत-प्रेत से ग्रसित व्यक्तियों को भी देखा होगा, जो अजीब सी हरकत और आवाज निकालते हैं. ऐसे लोगों को किसी मजार पर तांत्रिक के पास ले जाया जाता है, जहां भूत बाधा को दूर किया जाता है. लेकिन आखिर किस तरह लोग भूत-प्रेत की चपेट में आ जाते हैं. उज्जैन के ज्योतिषाचार्य राकेश त्रिपाठी बताएंगे कि कुंवारी लड़कियां ऐसी क्या गलतियां कर देती हैं, जिनसे भूत-प्रेत की चपेट में आ जाती हैं…
बालों को रखें ध्यान
आपने अक्सर देखा होगा कि कुंवारी लड़कियां जब बाल काड़ती हैं, तब वे अपने बालों को इधर उधर फेंक देती हैं, जो कि बहुत गलत है. इन्हीं बालाों का प्रयोग करके आप पर कोई टोना टोटका या वशीकरण कर सकता है. इसलिए इस तरह की लापरवाही करने से बचें.
इस अवस्था में ना जाएं कहीं
कुंवारी लड़िकयां पीरियड्स के समय किसी भी चौराहे, तिराहे, किसी भी पीपल के पेड़ के पास या शमशान के पास से जाने से बचें. पीरियड्स के दौरान महिलाओं को कमजोरी महसूस करती हैं और हार्मोनल में बदलाव देखने को मिलते हैं, जिसकी वजह से भूत-प्रेत जैसी नेगेटिव एनर्जी आकर्षित होती है और कमजोरी का फायदा उठाती है. इसलिए इस अवस्था में कहीं भी जाने से बचें.
इन सामान का रखें ध्यान
अपने पुराने कपड़े, परफ्यूम, लिपस्टिक आदि चीजें किसी को भी भूलकर भी ना दें. साथ ही ध्यान रखें कि आपका कोई भी पर्सनल सामान या मेकअप किसी को भी यूज ना करने दें. अगर कोई आपके इन सामान तक पहुंच बना सकता है तो वह इन सामान के जरिए टोना टोटका भी कर सकता है, इसलिए किसी को भी अपने चीजों को यूज ना करने दें.
ना करें इन चीजों का इस्तेमाल
कुंवारी लड़कियों को मेंहदी लगवाने का बहुत शौक होता है लेकिन जाने-अनजाने वह मेंहदी लगवाकर इधर उधर चली जाती हैं. मेंहदी की खुशबू भूत-प्रेत जैसी नेगेटिव एनर्जी को आकर्षित करती हैं, जिससे भूत-प्रेत जैसी बाधा आ सकती है. साथ ही ध्यान रखें कि किसी के श्रृंगार का इस्तेमाल किया गया सामान भेंट में ना लें. साथ ही किसी के भी इस्तेमाल किए गए कपड़े ना पहनें.
इस मंदिर में तीन सीढ़ी चढ़ते ही आने लगती है हल्दी उबटन की महक, जान तक पता नहीं चल पाई वजह!
6 May, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भीलवाड़ा जिले के करेड़ा में एक चमत्कारी मंदिर अपनी महक के कारण हमेशा श्रद्धालुओं के बीच चर्चा में बना रहता है. गुर्जर समुदाय के आराध्य भगवान श्री देवनारायण के पिता भोजा जी का मंदिर भीलवाड़ा जिले के करेड़ा क्षेत्र में स्थित है. हर साल इस मंदिर में बड़ी संख्या में देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं.
इस मंदिर के गर्भगृह में स्थित मूर्ति के नजदीक जैसे ही भक्त पहुंचते हैं, तो उन्हें विवाह समारोह में इस्तेमाल किए जाने वाली हल्दी के उबटन की खुशबू आने लगती है. जबकि मूर्ति से दूर-दूर तक हल्दी और उससे जुड़ी किसी वस्तु की मौजूदगी नहीं होती है. यहां देवनारायण के पिता भोजा जी जिनको सवाई भोज भी कहते हैं, उनकी मूर्ति स्थापित है. मंदिर की तीन सीढ़ियों से ही हल्दी-पीटी की खुशबू आती है. इसे भक्त महत्वपूर्ण चमत्कार मानते हैं.
मंदिर के तीसरे सीढ़ी से आने लगती है खुशबू
देवनारायण जन्म स्थली मालासेरी और अंतरराष्ट्रीय तीर्थ स्थल सवाई भोज के साथ ही भीलवाड़ा जिले के करेड़ा क्षेत्र में स्थित भोजा पायरा का मंदिर भी विश्व प्रसिद्ध है, जहां गुर्जर समाज के साथ ही सर्व समाज के लोग भगवान भोजा जी के दर्शन कर परिवार में सुख, शांति व समृद्धि की कामना करते हैं. भोजा पायरा मंदिर के अध्यक्ष सुखलाल गुर्जर ने कहा कि भोजपरा का स्थान प्रसिद्ध है. यहां बगड़ावतों का ऐतिहासिक इतिहास है.
आज से लगभग 1300 वर्ष पूर्व देवनारायण के पिता भोजा जी ने यह स्थान बनाया था. आज भी वही स्थित है और कोई छेड़छाड़ नहीं हुआ है, न कोई छेड़छाड़ कर सकता है. यह बगड़ावतों के समय का भोजा पायरा के नाम से विख्यात स्थान है. यहां देवनारायण के पिता भोजा जी, जिनको सवाई भोज भी कहते हैं, उनकी मूर्ति स्थापित है. मंदिर की तीन सीढ़ियों से ही हल्दी-पीटी की खुशबू आती है. इसे समाज के लोग महत्वपूर्ण चमत्कार मानते हैं.
यह है मंदिर का इतिहास
भोजा पायरा मंदिर के अध्यक्ष सुखलाल गुर्जर ने कहा कि भोजा जी मंदिर के इतिहास की अगर बात करें, तो गोटा नगरी से देवनारायण भगवान के पिता भोजा जी गाय चराने आते थे. इसी स्थल पर रानी जेमती ने भगवान श्री देवनारायण के पिता सवाई भोज (भोजा जी) को विराट मां जगदम्बा के रूप में दर्शन दिया था. इस दौरान रानी जेमती ने सवाई भोज को वरदान दिया था कि उनका नाम अब हमेशा के लिए सवाया रहेगा. वो सवाई भोज के नाम से विश्व में पूजे जाएंगे.
रानी जेमती जब यहां आई थी, तब भगवान देवनारायण के पिता सवाई भोज (भोजा जी) दूल्हे के रूप में थे और उनके शरीर पर पीटी लगी हुई थी. सवाई भोज (भोजा जी) युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए थे, तभी से यहां पीटी की खुशबू आती है. उन्होंने बताया कि मंदिर के ऊपर छत भी नहीं है. कई बार बनाने की कोशिश की, लेकिन बना नहीं पाए. इस जंगल में पास ही स्थित रूपनाथ जी की धुणी है, वहां पर लोगों ने छतरी बनाई थी. वह छतरी भी दूर जाकर गिर गई.
विश्व शांति के लिए हो रहा यज्ञ
ईश्वर गुर्जर ने कहा कि विश्व शांति व विश्व कल्याण के लिए यज्ञ का आयोजन हो रहा है. यहां यज्ञ में आहुतियां दी जा रही हैं. प्रतिदिन शाम को भगवान देवनारायण से जुड़े भजनों की प्रस्तुति और गाथाओं का वाचन किया जाएगा.
राशिफल: कैसा रहेगा आपका आज का दिन
6 May, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- बेचैनी, उद्विघ्नता से बचिये, समय पर सोचे कार्य अवश्य ही बन जायें।
वृष राशि :- चिन्ताऐं कम हों, सफलता के साधन जुटायें, अचानक लाभ के योग अवश्य बनेंगे।
मिथुन राशि :- परिश्रम विफल हो, चिन्ता व यात्रा, व्यग्रता तथा स्वास्थ्य नरम होगा।
कर्क राशि :- व्यर्थ धन का व्यय हो, समय व शांति नष्ट होवे, विघटनकारी तत्व परेशान करें।
सिंह राशि :- ऐश्वर्य, स्वास्थ्य नरम रहे, विरोधी वर्ग अवश्य ही आपको परेशान करे, ध्यान दें।
कन्या राशि :- परिश्रम से सफलता के साधन अवश्य जुटायें, कार्य बाधा, कार्य अवश्य होंगे।
तुला राशि :- परिश्रम, चोट आदि से बचिये, भाग्य का सितारा बड़ा ही प्रबल हो।
वृश्चिक राशि :- चोट आदि से बचिये, भाग्य का सितारा प्रबल होगा, ध्यान दें स्वास्थ्य नरम होगा।
धनु राशि :- क्लेश व अशांति से बचिये, मानसिक उद्विघ्नता होगी, ध्यान अवश्य दें।
मकर राशि :- परिश्रम विफल होगा, चिन्ता व यात्रा, व्याग्रता तथा स्वस्थ्य नरम होगा।
कुंभ राशि :- आकस्मिक घटना से चोट आदि का भय होगा, समय का ध्यान दें।
मीन राशि :- अधिकारियों से कष्ट, इष्ट मित्र सहायक न होवें, समय का ध्यान अवश्य दें।
भगवान शिव ने सपने में दिया आदेश, फिर एक रात में बना था यह चमत्कारी मंदिर, अनोखा है इतिहास
5 May, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
उत्तराखंड की पवित्र भूमि बागेश्वर को ‘धर्मनगरी’ यूं ही नहीं कहा जाता. यहां के कण-कण में अध्यात्म और इतिहास की झलक दिखाई देती है. इसी धार्मिक नगरी में स्थित है बैजनाथ मंदिर. यह एक ऐसा चमत्कारी स्थल है, जिसे लेकर मान्यता है कि इसका निर्माण सिर्फ एक ही रात में हुआ था. यह मंदिर न केवल अपनी खूबसूरत वास्तुकला बल्कि पौराणिक कथाओं के कारण भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.
मंदिर के पुजारी त्रिलोक गिरी गोस्वामी ने लोकल 18 को बताया कि बैजनाथ मंदिर उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के बैजनाथ कस्बे में गोमती नदी के किनारे स्थित है. यह स्थान प्राचीन काल में ‘कार्तिकेयपुर’ नाम से जाना जाता था, जो कत्यूरी राजाओं की राजधानी थी. इतिहासकारों के अनुसार कत्यूरी वंश ने इस क्षेत्र में 7वीं से 11वीं शताब्दी तक शासन किया और लगभग 1150 ईस्वी में इस मंदिर का निर्माण कराया.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक रात कत्यूरी राजाओं को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन देकर आदेश दिया कि वे एक रात में एक भव्य मंदिर का निर्माण करें. राजाओं ने स्वप्न को आदेश मानकर रातों-रात इस मंदिर को खड़ा कर दिया. इस मंदिर परिसर में कुल 18 मंदिर समूह हैं, जिनमें मुख्य मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है. मंदिर की वास्तुकला नागर शैली में निर्मित है, जिसमें पत्थर की बारीक नक्काशी और उत्कृष्ट शिल्पकला देखने को मिलती है
मंदिर परिसर में भगवान गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं. खास बात यह है कि यहां की मूर्तियां काले पत्थर से बनी हैं और इन पर की गई कलाकारी देखते ही बनती है. वर्तमान में यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) द्वारा संरक्षित है और धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. हर साल शिवरात्रि और अन्य पर्वों पर यहां भारी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं.
बैजनाथ मंदिर न केवल एक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह कुमाऊं की प्राचीन संस्कृति, कला और स्थापत्य का जीवंत उदाहरण भी है. यहां की शांति, प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिकता मिलकर इसे एक अद्वितीय तीर्थस्थल बनाते हैं, जिसे देखने के बाद हर कोई इसकी भव्यता में खो जाता है.
कर्बला की जंग और हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करने का दिन है मुहर्रम,जानें 2025 में कब है
5 May, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मोहर्रम की शुरुआत के साथ इस्लामी नववर्ष की शुरुआत हो जाती है. इस नववर्ष को हिजरी नववर्ष भी कहा जाता है. इस्लाम में मोहर्रम का महत्व किसी से छिपा नहीं है. इस दिन इमाम हुसैन की शहादत हुई थी. इमाम हुसैन पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे थे. मोहर्रम पर कर्बला की जंग को याद किया जाता है और हुसैन की शहादत के लिए मातम मनाया जाता है.मुहर्रम वर्ष 2025 में 27 जून दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा. आइये कर्बला की जंग और इमाम हुसैन की शहादत के बारे में विस्तार से जानते हैं.
मुहर्रम पर होती है इस्लामिक नववर्ष की शुरुआत : मोहर्रम का महीना इस्लामी नव वर्ष का पहला महीना होता है. मुसलमानों में इस महीने को बलिदान का महीना माना जाता है. इस दिन अल्लाह के नेक बंदे इमाम हुसैन की शहादत हुई थी. इसलिए मोहर्रम के दिन हुसैन को याद किया जाता है और उनका मातम मनाया जाता है. इस दिन हुसैन की याद में ताजिया का जुलूस मुस्लिम समुदाय के लोग मातम मनाते हुए और रोते हुए निकालते हैं.
कर्बला की जंग में हुई हुसैन की शहादत : लगभग 1400 वर्ष पहले इस दिन कर्बला की जंग हुई थी. कर्बला की जंग के दौरान पैगंबर मोहम्मद की सबसे छोटे नवासे इमाम हुसैन की शहादत हुई थी. मदीना के पास मुआवजा नमक शासन की मृत्यु के बाद उसके बेटे यजीद को सत्ता सौंप गई. यह जीत बहुत ही क्रूर और जल्लाद किस्म का शासक था. वह इस्लाम के समकक्ष अपना खुद का एक मजहब का विस्तार करना चाहता था. इमाम हुसैन लोगों के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय थे. इमाम के समर्थकों को यजीद ने खुद को इस्लाम का खलीफा करने का पैगाम दिया.
हुसैन के समर्थकों ने नहीं माना यजीद का पैगाम : यजीद के पैगाम को हुसैन के समर्थकों ने मानने से मना कर दिया. जिससे नाराज यजीद ने अपनी फौज के साथ हुसैन के काफिले के ऊपर हमला कर दिया. यजीद के पास बड़ी सेना और हथियार थे उसके बावजूद भी हुसैन ने यजीद के सामने झुकने से मना कर दिया. दोनों की बीच मुकाबला के दौरान मोहर्रम की 10 तारीख को हुसैन और उनके तमाम साथियों को घेर कर सरेआम का कत्ल कर दिया. इमाम हुसैन के बेटे अली अकबर, अली असगर एवं भतीजे कासिल को भी मार दिया गया. इस्लाम को मानने वाले लोग मोहर्रम पर हुसैन की शहादत का शोक मनाते हैं एवं ताजिए का जुलूस निकालकर उन्हें याद करते हैं.
हिजरी संवत का महत्व : हिजरी संवत इस्लामी नववर्ष को कहा जाता है. इसे इस्लाम में रमजान ईद उल फितर, ईद उल अजहा के अलावा सभी त्यौहार एवं धार्मिक तथा महत्वपूर्ण अवसरों की तिथियां और समय की गणना के लिए किया जाता है. इसकी शुरुआत मोहर्रम के महीने से होती है.
कब है बुद्ध पूर्णिमा? इस दिन करें यह उपाय, मिलेगा कई गुना अधिक फल, जानें महत्व, शुभ मुहूर्त समेत सबकुछ
5 May, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वैदिक पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को बुद्ध पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था, जिन्हें विष्णु का भी अवतार माना जाता है. बुद्ध पूर्णिमा का महत्व केवल उनके जन्म तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस दिन बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए यह दिन बेहद खास माना जाता है. इस दिन को ज्ञान तप और करुणा के आभास का प्रतीक भी माना जाता है, तो चलिए इस रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं, आखिर कब है बुद्ध पूर्णिमा. क्या है शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व.
दरअसल अयोध्या के ज्योतिषी पंडित कल्कि राम बताते हैं कि हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख माह की पूर्णिमा तिथि 11 तारीख को रात्रि 8:01 से शुरू होकर 12 मई को रात 10:25 तक समाप्त होगा. उदया तिथि के अनुसार बुद्ध पूर्णिमा का पर्व 12 मई दिन सोमवार को मनाया जाएगा. इस दिन भगवान गौतम बुद्ध की 2587 वी जयंती मनाई जाएगी. इसके अलावा इस दिन कई शुभ संयोग का निर्माण भी हो रहा है जिसमें वारियां योग रवि योग के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है इस योग में पवित्र नदियों में स्नान करने का कई गुना फल प्राप्त होगा.
बुद्ध पूर्णिमा का पर्व हिन्दू और बौद्ध दोनों ही धर्मों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है इस दिन न केवल भगवान गौतम बुद्ध का जन्मदिन है, बल्कि इसी दिन उन्हें सत्य का ज्ञान भी प्राप्त हुआ था शायद यही वजह है कि बौद्ध धर्म के अनुयायी इस दिन को भगवान बुद्ध द्वारा दिखाए गए जीवन के सत्य और उनके धर्म के उपदेशों का पालन करने के रूप में मनाते हैं.
राशिफल: कैसा रहेगा आपका आज का दिन
5 May, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- कुटुम्ब में तनाव, क्लेश व अशांति, व्यर्थ धन का व्यय तथा प्रतिष्ठा हानि होगी।
वृष राशि :- इष्ट मित्र से सुख, अधिकारियों से मेल-मिलाप तथा लाभप्रद बना ही रहेगा।
मिथुन राशि :- व्यर्थ व्यय, व्यवस्था अनुकूल हो, सफलता के साधन जुटायें, कार्य अवश्य ही बनेंगे।
कर्क राशि :- मनोवृत्ति उदार बनाए रखें, तनाव-क्लेश व हानि संभावित बनी ही रहेगी, ध्यान दें।
सिंह राशि :- समय नष्ट न होवे, व्यवसाय गति मंद, असमंजस की स्थिति से बचकर चलें।
कन्या राशि :- आर्थिक योजना सफल हो, व्यवसायिक क्षमता अवश्य अनुकूल, बेचैनी होगी, ध्यान दें।
तुला राशि :- धन का व्यय, परिश्रम से हानि, मानसिक उद्विघ्नता से बचें, ध्यान दें।
वृश्चिक राशि :- स्त्री कार्य से क्लेश व हानि, विघटनकारी तत्व परेशान कर सकते हैं।
धनु राशि :- कुटुम्ब की समस्या सुलझे, धन का व्यय होगा, व्यर्थ भ्रमण अवश्य होगा।
मकर राशि :- अर्थ-व्यवस्था छिन्न-भिन्न रहेगी, छोटे कार्य व्यय, व्यवसायिक गति पर ध्यान दें।
कुंभ राशि :- दैनिक कार्यगति में सुधार, चिन्ताऐं कम होंगी, सफलता के साधन बनेंगे।
मीन राशि :- मनोबल उत्साह वर्धक रहेगा, कार्यगति में सुधार, सफलता के साधन बनेंगे।
पति की लंबी उम्र और संतान सुख का वरदान, जानिए कब है वट सावित्री व्रत
4 May, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिन्दू धर्म में हर तिथि, हर पर्व का अत्यधिक महत्व शास्त्रों मे बताया गया है. ज्येष्ठ महीने की अमावस्या तिथि पर वट सावित्री व्रत किया जाता है. इस शुभ तिथि पर वट वृक्ष की विधि-विधान के साथ व्रत करने से पति की लंबी आयु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. साथ ही जो लोग संतान सुख से वंचित हैं. उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है. इस दिन दान-पुण्य करने का भी विशेष महत्व होता है. इस बार इस तिथि को लेकर असमंजस बना हुआ है.
जानिए कब रखा जाएगा वट सावित्री का व्रत?
वैदिक पंचांग के अनुसार इस साल 26 मई को अमावस्या तिथि का आरंभ दोपहर में 12 बजकर 12 मिनट के लगभग होगा और 27 तारीख को सुबह में 8 बजकर 32 मिनट के लगभग पर अमावस्या तिथि समाप्त होगी. शास्त्रीय विधान के अनुसार अमावस्या तिथि दोपहर के समय होने पर वट सावित्री व्रत किया जाता है. इसलिए यह व्रत 26 मई को किया जाएगा.
वट सावित्री व्रत का महत्व
यह व्रत करने से आपका वैवाहिक जीवन खुशहाल होगा और आपसी प्रेम संबंध प्रगाढ़ होंगे. साथ ही यह व्रत करने से संतान सुख भी प्राप्त हो सकता है. इस पूजा में वट यानी बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है, क्योंकि माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों वटवृक्ष में वास करते हैं.
जानिए वट सावित्री की पूजन सामग्री
वट सावित्री व्रत में देसी घी, भीगा हुआ काला चना, मौसमी फल, अक्षत, दूध, वट वृक्ष की डाली, गंगाजल, मिट्टी का घड़ा, सुपारी, पान, सिंदूर, हल्दी और मिठाई को पूजन सामग्री में शामिल किया जाता है. जहां तक पूजा विधि की बात है, तो इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए, भगवान सूर्य को जल चढ़ाना चाहिए, श्रृंगार करना चाहिए. उसके बाद वट वृक्ष की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए.
इस मंदिर में देवी की पूजा करने से भर जाती है महिलाओं की सूनी गोद, जानें क्या है इसके पीछे का रहस्य!
4 May, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अनुसूया देवी मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले के गोपेश्वर में स्थित एक बहुत ही प्रसिद्ध और पवित्र मंदिर है. ये मंदिर समुद्र तल से करीब 2000 मीटर की ऊंचाई पर बसा है. यह मंदिर माता अनुसूया को समर्पित है. देवी अनुसूया, महर्षि अत्रि की पत्नी थीं. मंदिर के अंदर मां अनुसूया की भव्य मूर्ति स्थापित है. मान्यता है कि इस मंदिर के गर्भगृह में रात्रिभर जागरण, ध्यान, जप-तप करने से संतान की इच्छा रखने वाली महिलाओं की गोद भर जाती है. संतान की इच्छा रखने वाले दंपत्ति यहां दूर-दूर से आते हैं.
मान्यता है कि जो भक्त माता की सच्चे मन से सेवा करता है, उसे रात के स्वप्न में माता का आशीर्वाद मिलता है और संतान प्राप्ति का वरदान प्राप्त होता है.
माता अनुसूया की कथा
मान्यता है कि इस स्थान पर महर्षि अत्रि ने तपस्या की थी और उनकी पत्नी माता अनुसूया उनके साथ यहीं निवास करती थीं. माता अनुसूया की पतिव्रता धर्म और शक्ति की ख्याति तीनों लोकों में फैल गई थी. यह देखकर देवी पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के मन में ईर्ष्या और क्रोध आ गया. वे देवी अनुसूया की सच्चाई और पवित्रता की परीक्षा लेना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने अपने-अपने पतियों-भगवान शिव, विष्णु और महेश को देवी अनसूया की परीक्षा लेने भेजा.
तीनों देवता एक साधु के वेश में अनुसूया माता के आश्रम के द्वार पर पहुंचे और भोजन मांगने लगे. लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी कि भोजन बिना वस्त्रों के परोसा जाए. यह सुनकर देवी अनुसूया चिंतित हो गईं, क्योंकि वे अतिथि का अपमान भी नहीं करना चाहती थीं और अपनी मर्यादा भी नहीं खोना चाहती थीं.
आखिरकार देवी अनुसूया ने आंखें बंद कीं और साधुओं के रूप में आए देवताओं को पहचान लिया. उन्होंने अपनी तपस्या और शक्ति से तीनों देवताओं को छोटे बच्चों में बदल दिया और फिर उन्हें गोद में लेकर बिना वस्त्रों के भोजन कराया.
बद्रीनाथ मंदिर बंद होने से पहले करते हैं ये विशेष रस्म, जानें बद्रीविशाल की सेवा के नियम
4 May, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
उत्तराखंड के चमोली जिले में भगवान विष्णु के धाम बद्रीनाथ धाम के पट 6 महीने के बड़े इंतजार के बाद 4 मई को खोले जाएंगे. 17 नवंबर 2024 को चारधाम यात्रा के समापन पर इस मंदिर को वैदिक रीति-रिवाज से 6 माह के लिए अस्थाई रूप से बंद कर दिया गया था. अब यह मंदिर 4 मई 2025 को वैदिक रीति रिवाज के साथ खोला जाएगा.बंद करते समय मंदिर में प्रभू की मूर्ति और मंदिर प्रांगण में अनेकों वैदिक रस्म और रिवाज निभाई जाती हैं. आइये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं.
भगवान विष्णु को उढाते हैं कंबल : मंदिर बंद होने की प्रक्रिया में बद्रीनाथ धाम को कई कुंटल फूलों के साथ सजाया जाता है. श्री हरि के बमंग में मां लक्ष्मी की मूर्ति को अगले 6 माह के लिए विराजमान किया जाता है. मंदिर को बंद करने से पहले भगवान बद्री विशाल को गाय के घी से कंबल को गीला करके उढ़ाया जाता है. ये कंबल कच्चे सूत से बना होता है.
जलाते हैं अखंड दीप : कपाट बंद होने से पहले श्री हरि के सम्मुख गर्भ ग्रह में एक दीप प्रज्वलित किया जाता है. 6 माह बाद कपाट खुलने पर दीप जलता हुआ मिलता है. माना जाता है इन दिनों में देव ऋषि नारद मुनि श्री हरि की सेवा एवं पूजा करते हैं.
महिला के वेश में जाते हैं पुजारी : जब मंदिर में गर्भ ग्रह को बंद किया जाता है तब मंदिर के मुख्य पुजारी रावल महिला के वेश धारण करके मां लक्ष्मी को प्रभु के साथ विराजमान करते हैं. मुख्य पुजारी रावल महिला वेश इसलिए धारण करते हैं कि वह मां लक्ष्मी की सखी देवी पार्वती का रूप धर के माता को श्री हरि के साथ विराजमान करते हैं. मंदिर के कपाट बंद होने पर मुख्य पुजारी रावल इतने भावुक हो जाते हैं कि उन्हें उल्टे पैर मंदिर से बाहर लाया जाता है.
6 माह तक जोशीमठ में होती है पूजा : बद्रीनाथ मंदिर के गर्भ ग्रह के बंद होने के पश्चात बद्री विशाल की डोली को जोशीमठ स्थित नरसिंह मंदिर में स्थापित किया जाता है. जहां शीतकाल में उनके चल विग्रह की पूजा होती है. श्री बद्री विशाल धाम के पट खुलने पर इस डोली को बड़ी धूमधाम से वापस बद्रीनाथ धाम में स्थापित किया जाता है.
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