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अदाणी ग्रुप के शेयरों में तेजी, अमेरिका ने आरोप वापस लिए
19 May, 2026 12:28 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। मंगलवार सुबह शेयर बाजार के खुलते ही अदाणी ग्रुप की कंपनियों के शेयरों में शानदार उछाल दर्ज किया गया। इसकी मुख्य वजह यह है कि अमेरिकी न्याय विभाग ने उद्योगपति गौतम अदाणी और उनके भतीजे सागर अदाणी के खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक आरोपों को स्थायी रूप से वापस ले लिया है। अमेरिकी न्याय विभाग के इस बड़े फैसले के साथ ही न्यूयॉर्क की अदालत में चल रहा हाई-प्रोफाइल सिक्योरिटीज और वायर फ्रॉड का मामला पूरी तरह समाप्त हो गया है। अमेरिकी सरकारी वकीलों (प्रॉसिक्यूटर्स) का मानना है कि गौतम अदाणी और सागर अदाणी पर लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं।
क्लीन चिट मिलते ही शेयर बाजार में अदाणी कंपनियों का दबदबा
अमेरिका से मिली इस बड़ी राहत की खबर आते ही भारतीय शेयर बाजार में अदाणी ग्रुप के शेयरों में 3% तक की तेजी देखी गई। शुरुआती कारोबार में 'अदाणी ग्रीन एनर्जी' का शेयर 3 प्रतिशत की मजबूती के साथ 1,410.10 रुपये पर पहुंच गया। वहीं, ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी 'अदाणी एंटरप्राइजेज' नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर 2.26 प्रतिशत चढ़कर 2,750.60 रुपये पर कारोबार कर रही थी। इसके अलावा 'अदाणी टोटल गैस' में 2.06 प्रतिशत की बढ़त के साथ भाव 622.65 रुपये और 'अदाणी पावर' में मामूली तेजी के साथ 219.90 रुपये पर ट्रेंड देखा गया। 'अडानी पोर्ट्स' भी हरी बत्ती के साथ 1,792.30 रुपये पर कारोबार करता नजर आया।
6 करोड़ डॉलर के भुगतान के साथ सुलझा सोलर प्रोजेक्ट विवाद
आपराधिक मामले हटने से पहले पिछले कुछ दिनों में अदाणी समूह से जुड़े अमेरिका के कई अन्य बड़े कानूनी और रेगुलेटरी मामले भी खत्म हो चुके हैं। पिछले सप्ताह ही, यूएस सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन ($SEC$) ने भारत में सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट्स से जुड़े निवेशकों को गलत जानकारी देने (इन्वेस्टर डिस्क्लोज़र) के सिविल आरोपों का निपटारा किया था। कोर्ट के दस्तावेजों के अनुसार, इस मामले को रफा-दफा करने के लिए गौतम अदाणी ने 6 करोड़ डॉलर और सागर अदाणी ने 1.2 करोड़ डॉलर की राशि देने पर रजामंदी जताई थी। हालांकि, दोनों ने इन आरोपों को न तो स्वीकार किया है और न ही इनसे इनकार किया है।
ईरान प्रतिबंधों के उल्लंघन का मामला भी हुआ रफा-दफा
इसी सिलसिले में 'ऑफिस ऑफ फॉरेन असेट्स कंट्रोल' ($OFAC$) ने भी उस जांच को बंद कर दिया है, जिसमें आरोप था कि अदाणी ग्रुप ने एलपीजी ($LPG$) के आयात के जरिए ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन किया था। इस मामले के शांतिपूर्ण निपटारे के लिए अदाणी ग्रुप ने 27.5 करोड़ डॉलर का हर्जाना देने की बात मानी। बताया जा रहा है कि ग्रुप ने इस पूरी जांच के दौरान अमेरिकी अधिकारियों को खुद सारी जानकारियां देकर पूरा सहयोग किया था।
अदाणी समूह के लिए राहत भरा हफ्ता, कानूनी संकटों से मिली मुक्ति
ताजा घटनाक्रम के तहत न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट के यूनाइटेड स्टेट्स अटॉर्नी कार्यालय के संघीय अभियोजकों द्वारा सभी आपराधिक आरोपों को पूरी तरह ड्रॉप (खारिज) कर दिए जाने के बाद, अब अदाणी परिवार और उनके बिजनेस साम्राज्य पर मंडरा रहे सभी अंतरराष्ट्रीय कानूनी संकट खत्म हो गए हैं। कॉरपोरेट जगत और निवेशकों ने इस फैसले का स्वागत किया है, जिसका सीधा असर आज सुबह से बाजार के सकारात्मक रुख में दिखाई दे रहा है।
एक हफ्ते में दूसरी बार पेट्रोल-डीजल महँगा, जनता पर असर
19 May, 2026 10:18 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। देश में आम आदमी की जेब पर एक बार फिर ईंधन की बढ़ती कीमतों का भारी बोझ पड़ा है। तेल विपणन कंपनियों ने मंगलवार को पेट्रोल और डीजल के दामों में लगभग 90 पैसे प्रति लीटर की नई बढ़ोतरी कर दी है। आम जनता के लिए सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि मात्र एक हफ्ते के भीतर यह दूसरा मौका है जब तेल के दामों में इस तरह की वृद्धि की गई है।
सिर्फ तीन दिन पहले ही बढ़े थे ₹3 प्रति लीटर दाम
मंगलवार को हुई इस बढ़ोतरी से ठीक तीन दिन पहले यानी शुक्रवार को ही केंद्र सरकार ने देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3-3 रुपये प्रति लीटर का बड़ा इजाफा किया था। उस बढ़ोतरी के बाद राजधानी दिल्ली में पेट्रोल का रेट 94.77 रुपये से बढ़कर 97.77 रुपये और डीजल 87.67 रुपये से बढ़कर 90.67 रुपये हुआ था। अब नई बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में पेट्रोल 87 पैसे और महंगा होकर 98.64 रुपये और डीजल 91 पैसे बढ़कर 91.58 रुपये प्रति लीटर पर पहुँच गया है।
देश के अन्य चार बड़े महानगरों का हाल
दिल्ली के अलावा देश के अन्य प्रमुख महानगरों में भी ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं। मुंबई, कोलकाता और चेन्नई के नए आंकड़े इस प्रकार हैं:
शहर
पेट्रोल में बढ़ोतरी
नया दाम (पेट्रोल)
डीजल में बढ़ोतरी
नया दाम (डीजल)
दिल्ली
87 पैसे
₹98.64
91 पैसे
₹91.58
मुंबई
91 पैसे
₹107.59
94 पैसे
₹94.08
कोलकाता
96 पैसे
₹109.70
94 पैसे
₹96.07
चेन्नई
82 पैसे
₹104.49
86 पैसे
₹96.11
वैश्विक तनाव और ईरान युद्ध बना कीमतों में तेजी की वजह
घरेलू बाजार में तेल महंगा होने के पीछे अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां मुख्य वजह हैं। पश्चिमी एशिया में चल रहे युद्ध और तनाव के कारण दुनिया भर में ऊर्जा संकट गहरा गया है। इस विवाद के चलते समुद्री व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण रास्ते 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में रुकावट आई है। अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच चल रहे इस संघर्ष के कारण ब्रेंट क्रूड (कच्चा तेल) अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है, हालांकि इस क्षेत्र में युद्धविराम के लिए कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं।
दाम बढ़ने से तेल कंपनियों के घाटे में आई कमी
ईंधन की कीमतों में की गई इस बढ़ोतरी से सरकारी तेल कंपनियों को थोड़ा सहारा मिला है। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, कीमतों में सुधार के बाद कंपनियों का रोजाना का घाटा लगभग 25% कम होकर 750 करोड़ रुपये रह गया है, जो पहले 1,000 करोड़ रुपये तक पहुँच चुका था। पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा के अनुसार, इस घाटे की भरपाई के लिए तेल कंपनियों को किसी भी तरह की सरकारी सब्सिडी या राहत पैकेज देने की कोई योजना नहीं है।
मेटा की योजना: छंटनी के साथ AI विभाग में बड़ा रीऑर्गनाइजेशन
19 May, 2026 08:18 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कैलिफोर्निया। सोशल मीडिया दिग्गज फेसबुक की पेरेंट कंपनी 'मेटा' ने इस हफ्ते होने वाली अपनी छंटनी और रीस्ट्रक्चरिंग (पुनर्गठन) योजना का पूरा खाका तैयार कर लिया है। सोमवार को कर्मचारियों को भेजे गए एक आंतरिक मेमो में कंपनी ने साफ किया कि वैश्विक स्तर पर वर्कफोर्स को कम करने के साथ-साथ सांगठनिक बदलाव किए जा रहे हैं। इन भारी बदलावों का मुख्य उद्देश्य कंपनी के कामकाज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीकों को बढ़ावा देना है।
बुधवार को होगी 10 फीसदी कर्मचारियों की छंटनी
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मेटा इसी बुधवार को अपने कुल वर्कफोर्स में से 10 प्रतिशत कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की योजना बना रही है। इतना ही नहीं, यह भी आशंका जताई गई है कि इस साल के अंत तक कंपनी बड़े पैमाने पर और भी कर्मचारियों की कटौती कर सकती है। मार्च 2026 तक मेटा में लगभग 77,986 कर्मचारी काम कर रहे थे, लेकिन अब कई ओपन जॉब पोस्ट्स को भी फ्रीज कर दिया गया है।
7,000 कर्मियों का ट्रांसफर और छोटी टीमों का गठन
मेटा की चीफ पीपल ऑफिसर जेनेल गैल द्वारा जारी मेमो के अनुसार, करीब 7,000 कर्मचारियों को कंपनी से निकालने के बजाय एआई (AI) से जुड़ी नई परियोजनाओं और टीमों में ट्रांसफर किया जाएगा। कंपनी अब मैनेजरों के कई पदों को खत्म कर रही है ताकि मैनेजमेंट का ढांचा छोटा और सीधा (समतल) हो सके। अब कंपनी छोटी-छोटी 'पॉड' और 'कोहोर्ट' टीमों के जरिए काम करेगी, जिससे फैसले तेजी से लिए जा सकें।
माउस-ट्रैकिंग और एआई को लेकर कर्मचारियों में भारी गुस्सा
मेटा के इस फैसले के बाद कर्मचारियों के बीच भारी असंतोष और नाराजगी देखी जा रही है। दफ्तरों में विरोध प्रदर्शन के पोस्टर लगाए गए हैं और कंपनी के आंतरिक प्लेटफॉर्म 'वर्कप्लेस' पर भी कर्मचारी खुलकर विरोध कर रहे हैं। 1,000 से अधिक कर्मचारियों ने एक विरोध पत्र (याचिका) पर दस्तखत किए हैं। उनका आरोप है कि कंपनी 'माउस-ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर' के जरिए उनके काम करने के तरीकों की निगरानी कर रही है, ताकि इंसानी व्यवहार को एआई मॉडल्स को सिखाया जा सके।
पूरी टेक इंडस्ट्री में एआई के कारण नौकरियों पर संकट
नौकरी से निकाले जाने और ट्रांसफर की इस पूरी प्रक्रिया का असर मेटा के करीब 20 प्रतिशत कर्मचारियों पर पड़ने वाला है। गौरतलब है कि तकनीकी क्षेत्र में केवल मेटा ही ऐसी कंपनी नहीं है जो यह कदम उठा रही है। इस साल कई दिग्गज अमेरिकी टेक कंपनियों ने इंसानी कामकाज की जगह एआई ऑटोमेशन को शामिल किया है, जिसके कारण पूरी टेक इंडस्ट्री में लगातार छंटनी का दौर चल रहा है।
SBI समेत बैंकों से फंडिंग, Vodafone Idea को मिलेगा 35,000 करोड़ का कर्ज
18 May, 2026 05:18 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। एजीआर (AGR) मामले में बड़ी राहत मिलने के बाद देश की प्रमुख टेलीकॉम ऑपरेटर कंपनी वोडाफोन आइडिया (Vodafone Idea) अब अपने कारोबार के विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर फंडिंग जुटाने की तैयारी में है। कंपनी अपने ₹35,000 करोड़ के भारी-भरकम लोन पैकेज के लिए भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की अगुवाई वाले बैंकों के एक बड़े कंसोर्टियम (लेंडर ग्रुप) के साथ लगातार संपर्क में है। इस बैंकिंग समूह में देश के सरकारी व निजी बैंकों के साथ-साथ कई विदेशी वित्तीय संस्थान भी शामिल हैं। कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) अभिजीत किशोर ने सोमवार को चौथी तिमाही के वित्तीय नतीजों की घोषणा के दौरान यह अहम जानकारी साझा की। उन्होंने भरोसा जताया कि लोन की यह प्रक्रिया बेहद कम समय में पूरी कर ली जाएगी।
लोन एग्रीमेंट की प्रक्रिया बहुत जल्द होगी पूरी
कंपनी के सीईओ अभिजीत किशोर के अनुसार, बैंकों के समूह के साथ लोन को लेकर चल रही बातचीत अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। टेलीकॉम ऑपरेटर को पूरी उम्मीद है कि इस कर्ज की औपचारिकताएं बहुत जल्द अंतिम रूप ले लेंगी, जिससे कंपनी को बाजार में अपनी रणनीतियों को तेजी से लागू करने के लिए जरूरी पूंजी मिल सकेगी।
मार्केट में आक्रामक निवेश के साथ ब्रांड इमेज चमकाने की योजना
शीर्ष अधिकारी ने स्पष्ट किया कि एजीआर बकाया और लंबे समय से चले आ रहे वित्तीय संकट के कारण कंपनी को काफी अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ा था। लेकिन अब स्थितियां बदलने के बाद, वोडाफोन आइडिया बाजार में अपनी खोई हुई साख और ब्रांड छवि को दोबारा मजबूती से स्थापित करने के लिए तैयार है। इसके लिए कंपनी आने वाले दिनों में और अधिक आक्रामक तरीके से पूंजी निवेश (इन्वेस्टमेंट) करने का बड़ा प्लान बना रही है।
अगले 3 सालों के वित्तीय दायित्वों को पूरा करने का रोडमैप तैयार
अभिजीत किशोर ने आगामी तीन वर्षों के लिए कंपनी के वित्तीय रोडमैप को लेकर भी गहरा विश्वास जताया है। उन्होंने कहा कि वोडाफोन आइडिया अपने सभी आगामी वित्तीय दायित्वों और देनदारियों को समय पर पूरा करेगी। इसके लिए कंपनी ने एक बहु-आयामी रणनीति तैयार की है, जिसके तहत बेहतर एबिटडा (EBITDA), नई फंडिंग, प्रमोटरों द्वारा अतिरिक्त निवेश और मिलने वाले टैक्स रिफंड के सही तालमेल का उपयोग किया जाएगा।
वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद एक्जिम बैंक FY2027 में 10% ऋण वृद्धि पर केंद्रित
18 May, 2026 01:42 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में चल रहे गंभीर भू-राजनीतिक संकट और उथल-पुथल के बावजूद, भारतीय निर्यात-आयात बैंक (एक्ज़िम बैंक) ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए एक मजबूत कदम उठाया है। बैंक ने नए वित्तीय वर्ष में अपनी लोन बुक (ऋण पुस्तिका) को स्थिर मुद्रा के आधार पर 10 फीसदी तक बढ़ाने का लक्ष्य तय किया है। बैंक की प्रबंध निदेशक (MD) और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हर्षा बंगारी ने स्पष्ट किया है कि वैश्विक चुनौतियों के बाद भी भारतीय निर्यातकों की मदद करने और उन्हें वित्तीय संबल देने के लिए बैंक यह क्रेडिट ग्रोथ हासिल करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
विदेशी मुद्रा का गणित और कर्ज का बदलता ट्रेंड
एक्ज़िम बैंक ने पिछले वित्तीय वर्ष (2025-26) के दौरान अपने लोन डिस्ट्रीब्यूशन में 12 प्रतिशत की शानदार बढ़त दर्ज की थी। हालांकि, इस बड़ी उछाल के पीछे विदेशी करेंसी के उतार-चढ़ाव की मुख्य भूमिका थी, जिसका बैंक के कुल आंकड़ों पर करीब 5 फीसदी तक का सीधा असर पड़ा था। सीईओ हर्षा बंगारी ने बताया कि बैंक की कुल लोन बुक का 58 प्रतिशत हिस्सा विदेशी मुद्रा में है, जबकि बाकी का हिस्सा भारतीय रुपये में दिया गया है। आने वाले समय में देश के निर्यातकों की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए उम्मीद जताई जा रही है कि रुपये में लोन लेने का चलन और तेजी से बढ़ेगा।
मिडिल ईस्ट संकट का फिलहाल मामूली असर, लंबी अवधि के प्रोजेक्ट सुरक्षित
चूंकि एक्ज़िम बैंक द्वारा दिए जाने वाले ज्यादातर लोन मध्यम से लंबी अवधि (लॉन्ग टर्म) के लिए होते हैं, इसलिए पश्चिम एशिया के मौजूदा तनाव का इस पर तुरंत कोई बड़ा नुकसान नहीं दिख रहा है। इस अशांत क्षेत्र में बैंक का निवेश बहुत सीमित है, जिससे कर्ज की रिकवरी पर कोई आंच नहीं आई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो सप्लाई चेन प्रभावित होने से भारतीय निर्यातकों के मुनाफे पर दबाव आ सकता है। ऐसी स्थिति में निर्यातक विदेशी बाजारों की बजाय घरेलू मार्केट का रुख कर सकते हैं, जिससे बैंक की नई क्रेडिट ग्रोथ की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ सकती है।
लैटिन अमेरिका बना नया ठिकाना, ब्राजील में खुला नया दफ्तर
भारतीय व्यापारिक कंपनियों में वैश्विक आर्थिक झटकों को झेलने का लंबा अनुभव है। इससे पहले भी अमेरिकी टैरिफ विवाद के समय भारतीय कारोबारियों ने नए देशों में अपने पैर पसारकर खुद को सुरक्षित कर लिया था। इसी रणनीति के तहत अब भारतीय निर्यातकों का मुख्य फोकस लैटिन अमेरिकी देशों पर है। इन नए और उभरते हुए बाजारों में भारतीय कारोबारियों को हर संभव मदद देने के लिए एक्ज़िम बैंक ने ब्राजील के प्रमुख शहर साओ पाउलो में अपना नया दफ्तर खोलकर कामकाज शुरू कर दिया है।
निर्यातकों की मदद के लिए बाजार से जुटाए जाएंगे 99,500 करोड़ रुपये
व्यापारियों को कर्ज की कमी न हो, इसके लिए एक्ज़िम बैंक ने पूंजी जुटाने का एक बेहद आक्रामक और बड़ा प्लान तैयार किया है। बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान बाजार से कुल 99,500 करोड़ रुपये का फंड जुटाने की घोषणा की है, जो पिछले साल के 86,000 करोड़ रुपये के उधारी लक्ष्य से काफी ज्यादा है। इस महा-योजना के तहत विदेशी बाजारों से भी बांड जारी करके लगभग 3.5 अरब डॉलर जुटाने की तैयारी है, जिसकी रूपरेखा को जल्द ही अंतिम रूप दिया जाएगा। वैश्विक संकटों के बीच बैंक का यह कदम भारतीय निर्यात क्षेत्र को नई ऊर्जा देने वाला साबित होगा।
कच्चा तेल 110 डॉलर के पार, सेंसेक्स में गिरावट जारी, आज का मार्केट अपडेट
18 May, 2026 11:55 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
शेयर बाजार में हाहाकार और प्रमुख सूचकांकों का गोता
नई दिल्ली:वैश्विक अनिश्चितता का सीधा असर दलाल स्ट्रीट पर दिखाई दिया, जहां सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही प्रमुख सूचकांक भारी गिरावट के साथ कारोबार कर रहे हैं। सेंसेक्स में 550 अंकों से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है, जिसके चलते यह 74,700 के स्तर के आसपास आ गया है। इसी तरह निफ्टी भी लगभग 200 अंक टूटकर 23,450 के स्तर के बेहद करीब पहुंच चुका है। बाजार में इस गिरावट की मुख्य वजह बैंकिंग क्षेत्र, विशेषकर सरकारी बैंकों के शेयरों में देखी जा रही भारी बिकवाली है। जानकारों का मानना है कि बाजार इस समय बेहद संभलकर चलने की कोशिश कर रहा है। निफ्टी के लिए ऊपर की तरफ 24,000 और 24,250 का स्तर एक बड़ी रुकावट बना हुआ है, जबकि नीचे की तरफ 23,250 और 23,000 के स्तरों पर इसे सहारा मिलने की उम्मीद है। यदि बाजार 23,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर को तोड़ता है, तो बिकवाली का दबाव और अधिक गहरा सकता है, इसलिए ट्रेडर्स को इस उतार-चढ़ाव भरे माहौल में सख्त स्टॉप-लॉस का पालन करने की सलाह दी जा रही है।
कच्चे तेल में उबाल और अमेरिकी चेतावनी से बढ़ा तनाव
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर बड़ा उछाल आया है और क्रूड ऑयल दो प्रतिशत की बढ़त के साथ 111 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया है। कीमतों में आई इस ताजा तेजी के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का वह कड़ा बयान है, जिसमें उन्होंने ईरान को शांति समझौते के लिए खुली चेतावनी दी है। ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर लिखते हुए कहा कि ईरान के लिए समय तेजी से निकल रहा है और यदि उसने जल्द ही कदम नहीं उठाए तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं। दरअसल, पिछले हफ्ते अमेरिका द्वारा रखे गए शांति प्रस्ताव को ईरान ने ठुकरा दिया था, जिसके बाद दोनों देशों के बीच परमाणु हथियारों की क्षमता को लेकर चल रहा विवाद और गहरा गया है। पिछले बारह हफ्तों से जारी इस तनाव के कारण कमोडिटी बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है, जिससे ऊर्जा संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है।
ऐतिहासिक निचले स्तर पर रुपया और विदेशी निवेशकों का पलायन
वैश्विक परिस्थितियों के दबाव में भारतीय मुद्रा में भी रिकॉर्ड कमजोरी देखने को मिल रही है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया आज शुरुआती कारोबार में ही 20 पैसे कमजोर होकर 96.18 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। पिछले कुछ दिनों से डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार गिरावट का दौर जारी है। इस मुद्रा संकट को बढ़ावा देने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की भूमिका भी अहम रही है, जिन्होंने पिछले तीस दिनों के भीतर भारतीय बाजार से लगभग 55 हजार करोड़ रुपये के शेयर बेचकर अपनी पूंजी बाहर निकाल ली है। हालांकि, इस दौरान घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने बाजार को संभालने के लिए खरीदारी जरूर की है, लेकिन वैश्विक बाजारों से मिल रहे नकारात्मक संकेतों और एशियाई बाजारों, जैसे जापान के निक्केई और हॉन्गकॉन्ग के हैंगसेंग में आई गिरावट के चलते घरेलू बाजार पर दबाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है।
आज का सोना-चांदी रेट: सोना हरे निशान में, चांदी गिरावट पर
18 May, 2026 11:49 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। वैश्विक और घरेलू बाजार के मिले-जुले संकेतों के बीच सोमवार को सर्राफा बाजार में सोने और चांदी की वायदा कीमतों में गिरावट का रुख देखने को मिला। हफ्ते के पहले कारोबारी दिन भारतीय वायदा बाजार में दोनों ही बहुमूल्य धातुओं ने कमजोरी के साथ अपने सफर की शुरुआत की। हालांकि बाजार खुलने के कुछ समय बाद जहां सोने ने अपनी शुरुआती सुस्ती को पीछे छोड़ते हुए मामूली रिकवरी दिखाई, वहीं चांदी पर बिकवाली का दबाव लगातार हावी रहा। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी एमसीएक्स पर शुरुआती कारोबार के दौरान सोना करीब शून्य दशमलव शून्य छह प्रतिशत की हल्की बढ़त के साथ एक लाख अट्ठावन हजार पांच सौ त्रेपन रुपये प्रति दस ग्राम के स्तर पर पहुंच गया, जबकि चांदी की कीमतों में आठ सौ पचपन रुपये की बड़ी गिरावट दर्ज की गई और यह दो लाख इकहत्तर हजार इकतीस रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास कारोबार करती नजर आई।
अंतरराष्ट्रीय बाजार के कमजोर संकेतों से घरेलू कीमतों पर बढ़ा दबाव
घरेलू बाजार में आई इस सुस्ती की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिलने वाले कमजोर संकेत माने जा रहे हैं। वैश्विक कमोडिटी बाजार यानी कॉमैक्स पर हफ्ते के पहले दिन से ही कीमती धातुओं पर चौतरफा दबाव साफ दिखाई दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में गिरावट का रुख रहा और यह चार हजार पांच सौ सैंतालीस दशमलव साठ डॉलर प्रति औंस के स्तर पर खुला, जबकि इससे पिछले कारोबारी सत्र में यह चार हजार पांच सौ इकसठ दशमलव नब्बे डॉलर प्रति औंस पर बंद हुआ था। इस दौरान बिकवाली के दबाव के चलते सोने में करीब सत्ताइस डॉलर की बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जिसके बाद यह चार हजार पांच सौ चौंतीस दशमलव पचास डॉलर प्रति औंस के आस-पास ट्रेड करता देखा गया।
वैश्विक बाजार में चांदी की चमक भी पड़ी फीकी
सोने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चांदी की कीमतों में भी सोमवार को अच्छी-खासी कमजोरी देखने को मिली। कॉमैक्स पर चांदी का कारोबार छिहत्तर दशमलव बीस डॉलर प्रति औंस के स्तर पर शुरू हुआ, जो कि इसके पिछले बंद भाव सतहत्तर दशमलव चौवन डॉलर के मुकाबले काफी कम था। बाजार में कारोबार आगे बढ़ने के साथ ही चांदी की कीमतों में करीब ढाई डॉलर की गिरावट आ गई, जिसके बाद यह पचहत्तर दशमलव शून्य पांच डॉलर प्रति औंस के स्तर पर आ गई। गौरतलब है कि चालू वर्ष में चांदी ने अपने शानदार प्रदर्शन के दम पर एक सौ इक्कीस दशमलव नवासी डॉलर प्रति औंस का अब तक का सबसे उच्चतम स्तर भी छुआ था, जिसके मुकाबले अब इसमें मुनाफावसूली देखी जा रही है।
निवेशकों और खरीदारों के लिए बाजार विशेषज्ञों की राय
सर्राफा बाजार में आए इस उतार-चढ़ाव को देखते हुए कमोडिटी विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और डॉलर इंडेक्स में आ रहे बदलावों का सीधा असर इन कीमती धातुओं पर पड़ रहा है। सोने में आई मामूली रिकवरी जहां निचले स्तरों पर खरीदारों के आकर्षण को दर्शाती है, वहीं चांदी में आई गिरावट औद्योगिक मांग में अस्थाई कमी या निवेशकों द्वारा मुनाफावसूली का संकेत हो सकती है। ऐसे में आने वाले दिनों में शादी-ब्याह के सीजन और वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रमों को देखते हुए बाजार में और ज्यादा उतार-चढ़ाव आने की संभावना जताई जा रही है, जिससे निवेशकों को फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है।
डर और लालच पर काबू पाएँ, AI के साथ निवेश करें क्वांट फंड में
18 May, 2026 08:36 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली: निवेश की दुनिया में इंसानी सूझबूझ बनाम कंप्यूटर का बेजोड़ गणित
साल 1997 का वह दौर भला कौन भूल सकता है जब शतरंज के बेताज बादशाह गैरी कास्पारोव को आईबीएम के 'डीप ब्लू' सुपर कंप्यूटर ने शिकस्त दी थी। उस ऐतिहासिक पल ने पूरी दुनिया को यह अहसास कराया कि जहां मानव मस्तिष्क की सीमा समाप्त होती है, वहां से एल्गोरिदम और डेटा का एक नया युग प्रारंभ होता है। वर्तमान समय में ठीक इसी तरह का एक बड़ा बदलाव निवेश के क्षेत्र में भी देखने को मिल रहा है। अब आपके गाढ़े पसीने की कमाई को बढ़ाने का जिम्मा किसी फंड मैनेजर के व्यक्तिगत फैसलों या उसकी अंतरात्मा की आवाज पर निर्भर नहीं है, बल्कि इसकी बागडोर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांट फंड के सटीक गणितीय समीकरणों के हाथों में जा चुकी है।
आमतौर पर शेयर बाजार में पैसा डूबने की सबसे बड़ी वजह डर और लालच जैसी मानवीय भावनाएं होती हैं। बाजार के आसमान छूने पर लोग लालच में आकर महंगी खरीदारी कर लेते हैं और गिरावट आने पर डर के मारे सस्ते में शेयर बेचकर बाहर निकल जाते हैं। इसी मानवीय कमजोरी को दूर करने के लिए क्वांट फंड की शुरुआत हुई है, जो पूरे खेल को ही बदल देते हैं। इस आधुनिक निवेश प्रणाली में किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का कोई महत्व नहीं होता, बल्कि पूरी तरह कंप्यूटर और एआई ही यह तय करते हैं कि किस समय बाजार में दांव लगाना है और कब कदम पीछे खींचने हैं।
मशीन और गणित के तालमेल से चलने वाली निवेश की नई व्यवस्था
क्वांट फंड की पूरी कार्यप्रणाली जटिल गणितीय मॉडलों और आंकड़ों के गहरे विश्लेषण पर टिकी होती है। इसमें शेयर का चुनाव करने के लिए कुछ कड़े नियम पहले से निर्धारित कर दिए जाते हैं, जिनमें कंपनी की वैल्यू, उसकी परफॉर्मेंस की क्वालिटी, बाजार की रफ्तार और उतार-चढ़ाव जैसे महत्वपूर्ण मानकों को शामिल किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बेहतरीन बात यह है कि इसमें इंसानी जज्बात कहीं भी आड़े नहीं आते। फंड मैनेजर का काम केवल सटीक आंकड़े जुटाना और कंप्यूटर के लिए एक मजबूत मॉडल तैयार करना होता है, जिसके बाद का पूरा काम मशीनें खुद-ब-खुद संभाल लेती हैं। पुराने और नए आंकड़ों के मेल से तैयार होने वाले इन मॉडलों को एआई की मदद से समय-समय पर अपडेट भी किया जाता रहता है।
हालांकि भारतीय शेयर बाजार के परिदृश्य को देखा जाए, तो अभी भी यहां क्वांट फंड का दायरा काफी सीमित है और आम रिटेल निवेशकों के बीच इसे लेकर बहुत ज्यादा उत्साह नहीं देखा गया है। वर्तमान में एसबीआई, निप्पॉन और आईसीआईसीआई जैसी गिने-चुने फंड हाउस ही इस रणनीति पर आधारित कुछ म्यूचुअल फंड योजनाएं चला रहे हैं, जो फ्लेक्सी कैप, मल्टी कैप या विशिष्ट थीम्स पर काम करती हैं। शुरुआत में तो इन फंडों ने बेहतरीन रिटर्न देकर सबको चौंकाया था, लेकिन हाल के दिनों में बदलते बाजार के मिजाज के कारण इन्हें प्रदर्शन के मोर्चे पर थोड़ा संघर्ष भी करना पड़ा है।
बाजार के अप्रत्याशित संकट और इस रणनीति की अपनी सीमाएं
यह समझना बेहद जरूरी है कि क्वांट फंड का पूरा ताना-बाना पुराने इतिहास और बीते आंकड़ों पर बुना जाता है, लेकिन शेयर बाजार का यह नियम है कि वहां हमेशा इतिहास दोहराया जाए, ऐसा मुमकिन नहीं है। जब भी दुनिया में युद्ध, महामारी या किसी बड़ी भू-राजनीतिक उथल-पुथल जैसी अचानक घटनाएं होती हैं, तो कंप्यूटर के मॉडल इन अप्रत्याशित हालातों को भांपने में नाकाम साबित होते हैं। ऐसे में एल्गोरिदम को नए सिरे से स्थिति समझने और खुद को ढालने में थोड़ा समय लग जाता है, जिसका सीधा असर निवेशकों के मुनाफे पर पड़ता है और उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके अलावा, मशीनी सिस्टम द्वारा लगातार शेयरों की खरीद-बिक्री करने से टैक्स और ब्रोकरेज का खर्च भी काफी बढ़ जाता है, जो अंततः आपके शुद्ध रिटर्न को कम करता है।
प्रमुख क्वांट फंड्स का पिछले तीन वर्षों का सालाना रिटर्न:
फंड स्कीम का नाम
सालाना रिटर्न (प्रतिशत में)
360 One Quant Fund
21.10%
Nippon India Quant Fund
17.14%
ICICI Pru Quant Fund
14.34%
Tata Quant Fund
14.04%
Axis Quant Fund
11.59%
ऊपर दिए गए आंकड़ों से स्पष्ट है कि 360 वन क्वांट फंड ने 21.10 प्रतिशत के शानदार आंकड़े के साथ बाजी मारी है, जबकि निप्पॉन और आईसीआईसीआई के फंड भी इसके बाद बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रहे हैं। यह साबित करता है कि मशीनी दिमाग भी बाजार से एक तगड़ा रिटर्न निकालने की क्षमता रखता है।
देश के बड़े क्वांट फंड्स का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM):
टॉप फंड का नाम
एयूएम (करोड़ रुपये में)
SBI Quant Fund
3051
ABSL Quant Fund
2026
UTI Quant Fund
1611
Axis Quant Fund
864
Kotak Quant Fund
505
एयूएम के आंकड़ों पर नजर डालें तो एसबीआई क्वांट फंड पर निवेशकों ने सबसे ज्यादा भरोसा जताया है, जहां 3051 करोड़ रुपये की बड़ी रकम लगी हुई है। इसके बाद आदित्य बिड़ला और यूटीआई का स्थान आता है, जिससे यह साफ होता है कि निवेशक अब बड़े और स्थापित फंड हाउस के जरिए इस नई तकनीक पर अपना दांव लगाने के लिए आगे आ रहे हैं।
आम निवेशकों के लिए समझदारी भरा फैसला और सही रणनीति
यदि आपके मन में भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या आपको इस माध्यम में पैसा लगाना चाहिए, तो इसका जवाब आपके निवेश के नजरिए में छिपा है। जो अनुभवी निवेशक बाजार में पहले से मौजूद हैं और अपने पोर्टफोलियो में कुछ नयापन और विविधता लाना चाहते हैं, उनके लिए यह एक बेहतरीन जरिया हो सकता है। मगर यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह हर किसी के लिए अनुकूल नहीं है; एक साधारण निवेशक के लिए कंप्यूटर की इस पेचीदा गणितीय प्रणाली को समझना काफी मुश्किल काम है। जो लोग सुरक्षित निवेश चाहते हैं या जिनका नजरिया कम समय का है, उन्हें इससे दूरी बनाकर रखनी चाहिए। इसमें केवल वही लोग कदम बढ़ाएं जो जोखिम लेने का हौसला रखते हैं और कम से कम 5 से 7 साल तक अपने पैसे को रोकने के लिए तैयार हैं।
विशेषज्ञों की मानें तो क्वांट फंड्स को कभी भी अपने मुख्य निवेश का आधार नहीं बनाना चाहिए। इसे हमेशा एक सपोर्टिंग एसेट या पोर्टफोलियो में केवल डायवर्सिफिकेशन लाने के एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना ही समझदारी है। बेहतर यही होगा कि आप अपने कुल इक्विटी निवेश का केवल 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा ही इन फंडों को अलॉट करें। भारत में अभी यह तकनीक अपने शुरुआती चरण में है और भविष्य में एआई के विस्तार के साथ इसकी लोकप्रियता और बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन निवेश की शुरुआत करने से पहले खुद की जोखिम क्षमता को जरूर तौल लें।
पैसे बचाने का सही तरीका: सस्ता नहीं, पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा लें
18 May, 2026 07:39 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई: बढ़ती मेडिकल महंगाई और टैक्स राहत के बीच बड़े हेल्थ कवर की ओर बढ़ते भारतीय कदम
आज के इस बदलते परिवेश में केवल औपचारिकता के लिए स्वास्थ्य बीमा लेना समझदारी नहीं रह गया है। चिकित्सा जगत में हो रहे बदलावों और गंभीर बीमारियों के बढ़ते खतरों के बीच अब एक ऐसी पुख्ता पॉलिसी की आवश्यकता है, जो अस्पताल में भर्ती होने पर आपकी जमा-पूंजी को पूरी तरह सुरक्षित रखे। वह दौर अब अतीत की बात हो चुका है, जब पूरे कुनबे के लिए तीन या पांच लाख रुपये की पॉलिसी को पर्याप्त मान लिया जाता था। वर्तमान समय में स्वास्थ्य सेवाएं इतनी महंगी हो चुकी हैं कि पच्चीस लाख रुपये से कम का बीमा कवर भी बेहद छोटा नजर आने लगा है। असल में स्वास्थ्य बीमा की किस्त महंगी नहीं होती, बल्कि बिना किसी तैयारी के अस्पताल पहुंचना जेब पर भारी पड़ता है। यही वजह है कि अब बजट फ्रेंडली पॉलिसी ढूंढने के बजाय परिवार की वास्तविक आवश्यकताओं को देखते हुए एक बड़ा और मजबूत सुरक्षा कवच चुनना समय की मांग बन गया है।
चिकित्सा क्षेत्र में बढ़ती लागत का सीधा असर यह हुआ है कि लोगों को अब अपने पुराने और सीमित दायरे वाले इंश्योरेंस को अपग्रेड करना पड़ रहा है। आज के दौर में यदि कोई व्यक्ति किसी कॉर्पोरेट अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में दो-तीन दिन भी गुजारता है, तो पांच लाख रुपये की पूरी पॉलिसी का पैसा चुटकियों में खत्म हो जाता है। इस बीच सरकार द्वारा व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों पर लगने वाले अठारह प्रतिशत के वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को पूरी तरह समाप्त कर शून्य करने के फैसले ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया है। टैक्स हटने से प्रीमियम की राशि में भारी कमी आई है, जिसके चलते देश का आम नागरिक अब छोटी पॉलिसियों को अलविदा कहकर सीधे पचास लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक के सुपर टॉप-अप प्लान को तरजीह दे रहा है।
चिकित्सा लागत में बेतहाशा वृद्धि और छोटे बीमा कवर का सिमटता दायरा
देश के भीतर इलाज के खर्च में सालाना चौदह प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, जिसका सीधा मतलब है कि जो चिकित्सा सेवा पिछले वर्ष एक लाख रुपये में उपलब्ध थी, उसके लिए अब एक लाख चौदह हजार रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। यदि बात कैंसर, हृदय रोग या गुर्दे की गंभीर बीमारियों से जुड़ी सर्जरीज की हो, तो महानगरों के नामी अस्पतालों में यह खर्च बहुत ही आसानी से पंद्रह से पच्चीस लाख रुपये के आंकड़े को पार कर जाता है। ऐसी परिस्थितियों में बड़े शहरों में रहने वाले परिवारों के लिए पच्चीस लाख से पचास लाख रुपये तक का बेस कवर रखना कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।
बीमा बाजार के हालिया रुझान भी इसी बदलाव की तस्दीक करते हैं। स्वास्थ्य बीमा से टैक्स का बोझ हटते ही भारतीय उपभोक्ताओं ने कम वैल्यू वाली पॉलिसियों से दूरी बनाना शुरू कर दिया है, जिसे पॉलिसीबाजार के पिछले आठ महीनों के आंकड़ों में साफ देखा जा सकता है।
बीमा बाजार में कवरेज की बदलती स्थिति:
कवरेज की सीमा
टैक्स हटने से पहले का हिस्सा
वर्तमान हिस्सेदारी
बाजार की मौजूदा हलचल
10 लाख रुपये से कम
26%
10%
इस वर्ग की मांग में भारी गिरावट आई है
10 से 20 लाख रुपये
61%
62%
इस दायरे में स्थिति लगभग स्थिर बनी हुई है
20 लाख से 1 करोड़ रुपये
11%
16%
इस सेगमेंट में लगातार मजबूती देखी जा रही है
1 करोड़ रुपये से अधिक
2%
12%
इस उच्च वर्ग की मांग में छह गुना का उछाल आया है
उपरोक्त आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि उपभोक्ता अब दूरदर्शी सोच के साथ बड़े रिस्क कवर को अपना रहे हैं, ताकि भविष्य की अनिश्चितताओं से निपटा जा सके।
बड़े रिस्क कवर की बढ़ती लोकप्रियता के मुख्य कारण और नियमों में नरमी
बाजार में इस बड़े बदलाव के पीछे मुख्य रूप से तीन वजहें काम कर रही हैं। सबसे पहला कारण टैक्स में मिली पूरी छूट है, जिसने महंगे प्रीमियम को आम आदमी के बजट में ला खड़ा किया है। दूसरी वजह यह है कि भारत में इलाज का सामान्य खर्च हर पांच से सात साल में दोगुना हो जाता है, और सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक आज भी स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च का एक बड़ा हिस्सा लोगों को कर्ज लेकर या अपनी जेब से देना पड़ता है। तीसरा कारण यह है कि अधिकांश कॉर्पोरेट कंपनियां अपने कर्मचारियों को जो ग्रुप इंश्योरेंस देती हैं, उसकी सीमा बेहद सीमित होती है, जिसके कारण लोग व्यक्तिगत तौर पर बड़ा कवर लेना सुरक्षित समझ रहे हैं।
इसके साथ ही नियामक संस्थाओं और बीमा कंपनियों ने भी नियमों को पहले से कहीं अधिक उपभोक्ता अनुकूल बना दिया है। अब नए नियम के तहत पॉलिसी खरीदने के लिए उम्र की कोई अधिकतम सीमा तय नहीं है, जिससे पैंसठ वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग भी आसानी से नई पॉलिसी ले सकते हैं। इसके अलावा पुरानी बीमारियों के लिए दी जाने वाली प्रतीक्षा अवधि (वेटिंग पीरियड) को भी चार साल से घटाकर तीन साल कर दिया गया है। आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों जैसे रोबोटिक सर्जरी, स्टेम सेल थेरेपी और ओपीडी के खर्चों को भी अब नई पॉलिसियों के दायरे में शामिल किया जा रहा है, जिससे उपभोक्ताओं को चौतरफा सुरक्षा मिल रही है।
पॉलिसी नवीनीकरण के समय ध्यान देने योग्य बातें और आदर्श पोर्टफोलियो
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आप अभी भी किसी पुरानी और छोटी पॉलिसी के भरोसे बैठे हैं, तो टैक्स में मिली रियायत का लाभ उठाते हुए उसे तुरंत अपग्रेड करने का यह सबसे बेहतरीन मौका है। इसके लिए आपको अपना बेस प्लान बदलने की भी जरूरत नहीं है, बल्कि एक किफायती सुपर टॉप-अप प्लान जोड़कर आप अपने कुल कवर को एक करोड़ रुपये तक आसानी से पहुंचा सकते हैं। पॉलिसी का नवीनीकरण (रिन्यूअल) करते समय हमेशा नियमों को बारीकी से पढ़ना चाहिए क्योंकि कंपनियां अक्सर शर्तों में बदलाव करती रहती हैं। आपको विशेष रूप से यह देखना चाहिए कि रूम रेंट पर कोई 'सब-लिमिट' तो नहीं लगी है, और अस्पताल के बिल में शामिल होने वाले दस्ताने, मास्क और पीपीई किट जैसे 'कंज्यूमेबल्स' के खर्चों के लिए अलग से राइडर मौजूद है या नहीं। साथ ही, 'अनलिमिटेड रीस्टोर' की सुविधा लेना भी फायदेमंद रहता है ताकि एक ही साल में परिवार के कई सदस्यों के बीमार होने पर भी फंड कम न पड़े।
निवेश और सुरक्षा का यह गणित पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस शहर में रहते हैं और आपके परिवार की संरचना कैसी है। इसे एक व्यवस्थित योजना के तहत समझा जा सकता है।
शहरी परिवेश और परिवार के अनुसार आवश्यक बीमा राशि:
परिवार का ढांचा
निवास स्थान का प्रकार
न्यूनतम अनुशंसित कवर
युवा एवं अविवाहित
टियर 2 या टियर 3 शहर
15 लाख से 20 लाख रुपये
पूर्ण परिवार (पति-पत्नी और दो बच्चे)
मेट्रो शहर (जैसे दिल्ली या मुंबई)
25 लाख से 50 लाख रुपये
वरिष्ठ नागरिक (बुजुर्ग दंपत्ति)
देश का कोई भी क्षेत्र
25 लाख बेस कवर + 50 लाख का सुपर टॉप-अप
इस वर्गीकरण से साफ है कि छोटे शहरों में रहने वाले युवाओं के लिए भले ही बीस लाख तक का कवर काम कर जाए, लेकिन महानगरों के परिवारों और स्वास्थ्य के मोर्चे पर संवेदनशील बुजुर्गों के लिए एक बड़ा बेस कवर और उसके साथ सुपर टॉप-अप का सुरक्षा तंत्र होना बेहद जरूरी है। अंततः समझदारी इसी में है कि अपनी कुल इक्विटी या वित्तीय योजनाओं के साथ-साथ एक मजबूत हेल्थ पोर्टफोलियो तैयार किया जाए, जो संकट के समय आपकी संचित पूंजी को बिखरने से बचा सके।
ईंधन की बढ़ती कीमतें सीधे उपभोक्ताओं पर: आटा-दाल और जरूरी चीजों की बढ़ी हुई दर
16 May, 2026 04:32 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। आने वाले दिनों में आम जनता की रसोई का बजट और घरेलू खर्चों का बोझ काफी बढ़ सकता है। आटा, दाल, पैकेट बंद खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा के इस्तेमाल की अन्य जरूरी चीजों की कीमतों में भारी उछाल आने की पूरी आशंका बन गई है। पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल और ईंधन के दामों में हो रही बढ़ोतरी ने देश की दिग्गज एफएमसीजी कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है, जिससे उनकी माल ढुलाई और उत्पादन लागत में भारी इजाफा हुआ है और इसका सीधा असर अब उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने जा रहा है।
लागत का बढ़ता बोझ और वजन कम करने की कॉर्पोरेट रणनीति
ईंधन की कीमतों में संशोधन के बाद से कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन पर नया दबाव देखने को मिल रहा है। बाजार के सूत्रों और कॉर्पोरेट अधिकारियों के मुताबिक, कच्चे माल और परिवहन के बढ़ते खर्च की भरपाई करने के लिए कंपनियां अब दोतरफा रणनीति पर काम कर रही हैं। इसके तहत या तो चुनिंदा उत्पादों के खुदरा दामों में सीधे तौर पर बढ़ोतरी की जाएगी या फिर पैकेट की कीमतों को स्थिर रखते हुए उनके भीतर मिलने वाले सामान का वजन यानी ग्रामेज कम कर दिया जाएगा, ताकि आम ग्राहकों को सीधे तौर पर झटका न लगे।
दिग्गज एफएमसीजी कंपनियों की तैयारी और मूल्य वृद्धि का खाका
देश की बड़ी एफएमसीजी कंपनियों ने बदलती परिस्थितियों के बीच अपनी अर्निंग कॉल में इस बात के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि यदि महंगाई का यह दबाव इसी तरह बना रहा, तो वे कीमतों में बदलाव करने से पीछे नहीं हटेंगी। डाबर इंडिया के ग्लोबल सीईओ मोहित मल्होत्रा के अनुसार, कंपनी ने अपने विभिन्न उत्पादों के दामों में पहले ही चार प्रतिशत तक की वृद्धि कर दी है और आने वाले समय में वे एक और दौर की मूल्य वृद्धि पर विचार कर रहे हैं। इसी तरह पार्ले प्रोडक्ट्स के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर मयंक शाह, हिंदुस्तान यूनिलीवर (एचयूएल), ब्रिटानिया और नेस्ले जैसी कंपनियों के शीर्ष प्रबंधन ने भी स्वीकार किया है कि कच्चे तेल की कीमतों में आ रही अस्थिरता उनके लिए बड़ी चिंता का विषय है और माल ढुलाई के खर्चों की बारीकी से निगरानी करने के बाद कीमतों को बढ़ाना ही उनका अंतिम विकल्प होगा।
मांग में सुधार पर संकट और ग्रामीण बाजारों पर संभावित असर
यह पूरा घटनाक्रम एक ऐसे नाजुक समय पर सामने आया है, जब पिछले साल माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरों में हुई कटौती के बाद बाजार में ग्राहकों की मांग और खरीदारी के ढर्रे में सुधार होना शुरू ही हुआ था। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईंधन की कीमतें कई तिमाहियों तक इसी तरह ऊंचे स्तर पर बनी रहीं, तो लगातार होने वाली इस मूल्य वृद्धि का सबसे बुरा असर देश के ग्रामीण बाजारों पर पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ता कीमतों में मामूली बदलाव को लेकर भी बेहद संवेदनशील होते हैं, ऐसे में पैकेट का आकार घटने या दाम बढ़ने से वहां उपभोग की रफ्तार सुस्त पड़ सकती है, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था की विकास दर प्रभावित होने का खतरा पैदा हो जाएगा।
चंद्रशेखरन बोले, एआई से कारोबार को नया आयाम मिलेगा
16 May, 2026 02:48 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई। वैश्विक कारोबारी जगत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) अब महज एक अतिरिक्त तकनीकी साधन नहीं, बल्कि बड़े उद्योगों के संचालन का मुख्य आधार बनता जा रहा है। देश की अग्रणी आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने वर्ष 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट में शेयरधारकों को संबोधित करते हुए इस रणनीतिक बदलाव को रेखांकित किया है, जहां एआई के बढ़ते प्रभाव से न केवल कंपनी का मुनाफा बढ़ा है बल्कि आईटी क्षेत्र में नई नौकरियों की भी वापसी हुई है।
एआई मॉडल से अरबों की कमाई और प्रयोगात्मक दौर का समापन
टीसीएस ने अपने विशेष 'ह्यूमन+एआई' ऑपरेटिंग मॉडल के जरिए तकनीकी बाजार में एक बड़ी छलांग लगाई है, जिसके दम पर कंपनी ने एआई सेवाओं से 2.3 अरब डॉलर और क्लाउड व साइबर सुरक्षा जैसी आधुनिक सेवाओं से 11.5 अरब डॉलर का सालाना राजस्व अर्जित किया है। चेयरमैन के अनुसार, जेनरेटिव और एजेंटिक एआई अब शुरुआती परीक्षणों के दौर से बाहर निकलकर विकास के एक नए चरण में पहुंच चुके हैं, जहां दुनिया भर के बड़े कॉर्पोरेट ग्राहक अब इसे अपने रोजमर्रा के मुख्य कामकाज का एक स्थायी और अनिवार्य हिस्सा बना रहे हैं।
भारत में देश का पहला अत्याधुनिक एआई डेटा सेंटर और वैश्विक रणनीति
भविष्य की जरूरतों को भांपते हुए टीसीएस भारत में एक सुरक्षित और संप्रभु एआई बुनियादी ढांचा तैयार करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है, जिसके तहत देश का पहला एआई-केंद्रित डेटा सेंटर स्थापित किया जाएगा जो 160 किलोवाट से अधिक की उच्च रैक डेंसिटी क्षमता से लैस होगा। बिजली और कंप्यूटिंग क्षमता की वैश्विक किल्लत के बीच कंपनी उद्योगों के लिए एक विशेष 'एआई ऑपरेटिंग सिस्टम' भी विकसित कर रही है, जिससे भारत आने वाले समय में दुनिया भर के एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एक बेहद मजबूत और रणनीतिक विकल्प बनकर उभरेगा।
रिकॉर्ड मुनाफा, नए सौदे और आईटी क्षेत्र में नौकरियों की शानदार वापसी
कंपनी ने इस वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में 12.22 प्रतिशत की बढ़त के साथ 13,718 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया है, जिससे पूरे वित्त वर्ष का कुल लाभ बढ़कर 49,210 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इस शानदार वित्तीय प्रदर्शन के साथ ही टीसीएस ने मार्च तिमाही में 12 अरब डॉलर के नए व्यापारिक सौदे हासिल किए हैं और लगातार दो तिमाहियों से जारी मंदी को पीछे छोड़ते हुए अंतिम तिमाही में 2,356 नए कर्मचारियों की भर्ती की है, जिससे कंपनी के कुल कार्यबल की संख्या पांच लाख चौरासी हजार से अधिक हो गई है।
चांदी का इंपोर्ट भी पिछले समय के मुकाबले 157% उछला
16 May, 2026 10:39 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक संकट के बीच देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने के लिए सरकार लगातार बड़े कदम उठा रही है। इस आर्थिक रणनीति का मुख्य उद्देश्य चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करना और अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपये की गिरती कीमत को संभालना है। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आम जनता से आगामी एक वर्ष तक सोने की खरीदारी को टालने की भावुक अपील के बावजूद, अप्रैल महीने में घरेलू बाजार में पीली धातु के आयात में ऐतिहासिक उछाल देखा गया। ऊंची कीमतों के दौर में भी देश का स्वर्ण आयात एकाएक बयासी फीसदी के करीब बढ़कर 5.62 अरब डॉलर के पार पहुंच गया, जिसने आर्थिक नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है।
आयात शुल्क में भारी बढ़ोतरी और भविष्य में गिरावट की उम्मीद
इस बेकाबू होते आयात पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने एक बड़ा वित्तीय फैसला लेते हुए सोने और चांदी पर लगने वाली बेसिक इंपोर्ट ड्यूटी को छह प्रतिशत से सीधे बढ़ाकर पंद्रह प्रतिशत कर दिया है। वाणिज्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि इस टैक्स बढ़ोतरी का सीधा असर आने वाले महीनों में देखने को मिलेगा, जिससे घरेलू बाजार में कीमती धातुओं की मांग और उपभोग दोनों में भारी कमी आने की संभावना है। सरकार को पूरी उम्मीद है कि इस कड़े कदम से भविष्य में आयात के आंकड़ों को नीचे लाने में मदद मिलेगी।
चांदी के आयात में रिकॉर्ड उछाल और व्यापार घाटे पर बढ़ता दबाव
वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक केवल सोने में ही नहीं, बल्कि चांदी के आयात में भी अप्रैल के दौरान एक सौ सत्तावन प्रतिशत से अधिक की भारी वृद्धि दर्ज की गई है, जो बढ़कर 41.1 करोड़ डॉलर के स्तर पर पहुंच गई। सोने और चांदी के इस संयुक्त आयात विस्फोट के कारण देश का व्यापार घाटा पिछले तीन महीनों के उच्चतम स्तर यानी 28.38 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। हालांकि, जानकारों का कहना है कि चांदी का उपयोग औद्योगिक कार्यों में अधिक होने के कारण इस पर टैक्स वृद्धि का प्रभाव सोने की तुलना में थोड़ा कम रह सकता है।
वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी और भारतीय उपभोक्ताओं का दबदबा
अगर वैश्विक स्तर पर भारत के स्वर्ण व्यापार के समीकरणों को देखा जाए, तो देश की कुल सोने की जरूरतों का लगभग चालीस प्रतिशत हिस्सा अकेले स्विट्जरलैंड से पूरा होता है, जबकि इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और दक्षिण अफ्रीका का स्थान आता है। पिछले वित्त वर्ष के दौरान यूएई से होने वाले आयात में मूल्य और मात्रा दोनों के लिहाज से कमी दर्ज की गई है, जिससे भारत के कुल स्वर्ण व्यापार में उसकी हिस्सेदारी थोड़ी घटी है। चीन के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ता के रूप में भारत में होने वाला यह अधिकांश आयात मुख्य रूप से हमारे विशाल आभूषण उद्योग की मांग को पूरा करने के लिए किया जाता है।
तकनीक और निवेश में उनके लगातार बढ़ते लाभ का योगदान
16 May, 2026 10:36 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। दुनिया के सबसे अमीर इंसान एलन मस्क बहुत जल्द इतिहास रचते हुए पहले 'ट्रिलियनेयर' (महा-अरबपति) बनने की दहलीज पर खड़े हैं। उनकी मशहूर रॉकेट और सैटेलाइट निर्माता कंपनी स्पेसएक्स अगले महीने अपना महा-आईपीओ बाजार में उतारने की पूरी तैयारी कर चुकी है। कंपनी का लक्ष्य दो ट्रिलियन डॉलर के विशाल बाजार मूल्यांकन को छूना है, जिसके लिए वह पचहत्तर अरब डॉलर का सार्वजनिक निर्गम लेकर आ रही है। इस कंपनी में एलन मस्क की हिस्सेदारी लगभग चालीस से बयालीस फीसदी है, जिसका सीधा मतलब यह है कि इस लिस्टिंग के सफल होते ही मस्क की कुल संपत्ति में एक झटके में आठ सौ अरब डॉलर का भारी-भरकम इजाफा हो जाएगा और उनका नाम दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर के रूप में दर्ज हो जाएगा।
जून के शुरुआती हफ्तों में बाजार में दस्तक देने की तैयारी
वैश्विक वित्तीय बाजारों से आ रही रिपोर्टों के अनुसार, स्पेसएक्स आगामी ग्यारह जून को शेयर बाजार में अपनी इस ऐतिहासिक लिस्टिंग को अमलीजामा पहनाने के लिए बेहद तेजी से कदम आगे बढ़ा रही है। इसके लिए अमेरिकी शेयर बाजार नैसडैक को लिस्टिंग स्थल के रूप में चुना गया है। कंपनी की प्रशासनिक प्रक्रियाएं इतनी तेज गति से चल रही हैं कि आने वाले बुधवार तक इसका प्रॉसपेक्टस आम जनता के सामने आ सकता है। योजना के मुताबिक, चार जून से इसके लिए रोडशो की शुरुआत होगी और बारह जून को कंपनी आधिकारिक तौर पर बाजार में अपना डेब्यू करेगी, जबकि इससे पहले इसे जून के आखिरी दिनों में मस्क के जन्मदिन के आसपास बाजार में लाने पर विचार किया जा रहा था।
सऊदी अरामको का रिकॉर्ड तोड़कर बनेगा इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ
यह सार्वजनिक निर्गम वित्तीय इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ साबित होने जा रहा है, जो सऊदी अरामको द्वारा साल 2019 में जुटाए गए उनतीस अरब डॉलर के पिछले वैश्विक रिकॉर्ड को काफी पीछे छोड़ देगा। स्पेसएक्स की इस वित्तीय मजबूती के पीछे उसकी स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सेवा का सबसे बड़ा हाथ है, जिसने पिछले साल कंपनी के सोलह अरब डॉलर के कुल राजस्व में आठ अरब डॉलर का शुद्ध मुनाफा कमा कर दिया था। इसके साथ ही कंपनी के पास डायरेक्ट-टू-मोबाइल तकनीक की असीम संभावनाएं मौजूद हैं, जो आने वाले समय में इसके बिजनेस को एक नई ऊंचाई पर ले जाएंगी।
मस्क की भविष्य की योजनाएं और अंतरिक्ष आधारित डेटा सेंटर
वर्तमान में एलन मस्क की कुल संपत्ति लगभग छह सौ अस्सी अरब डॉलर आंकी गई है, जिसमें अकेले इस साल ही साठ अरब डॉलर से अधिक की बढ़ोतरी देखी गई है। स्पेसएक्स की दो ट्रिलियन डॉलर की नई वैल्यूएशन न केवल मस्क को ट्रिलियनेयर की लीग में सबसे आगे खड़ा करेगी, बल्कि कंपनी को अपने दूरगामी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बड़ी पूंजी भी देगी। कंपनी इस आईपीओ से मिलने वाली रकम के एक हिस्से का इस्तेमाल अंतरिक्ष-आधारित अत्याधुनिक डेटा सेंटर विकसित करने में करने वाली है, जो उनके चांद और मंगल ग्रह पर इंसानों की बस्ती बसाने के लिए तैयार किए जा रहे स्टारशिप रॉकेट मिशन को भी नई रफ्तार देगा।
टाटा ट्रस्ट्स की अहम मीटिंग टली, चैरिटी कमिशर के निर्देश को लेकर विवाद
16 May, 2026 10:18 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित कारोबारी घरानों में से एक टाटा समूह से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां सर रतन टाटा ट्रस्ट (एसआरटीटी) के ट्रस्टी बोर्ड की शनिवार यानी सोलह मई को होने वाली बेहद महत्वपूर्ण बैठक को अचानक टालना पड़ा है। महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर ने इस प्रस्तावित बैठक को स्थगित करने का एक सख्त निर्देश जारी किया था, जिसके पीछे मुख्य वजह ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे और बोर्ड स्ट्रक्चर में नियमों के कथित उल्लंघन की चल रही जांच को बताया गया है। इस औचक फैसले पर टाटा ट्रस्ट्स की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया आई है, जिसमें मैनेजमेंट ने चैरिटी कमिश्नर के इस कदम को पूरी तरह से एकतरफा करार देते हुए कहा है कि इस मामले में सर रतन टाटा ट्रस्ट को अपनी दलीलें और पक्ष रखने का कोई उचित अवसर प्रदान नहीं किया गया।
देर रात मिले सरकारी आदेश से मची खलबली और नियमों के उल्लंघन का आरोप
टाटा ट्रस्ट्स द्वारा आधिकारिक रूप से साझा किए गए एक बयान के मुताबिक, शुक्रवार की देर शाम उन्हें एक आधिकारिक ईमेल प्राप्त हुआ, जिसमें चैरिटी कमिश्नर ने कात्यायनी अग्रवाल नामक एक शिकायतकर्ता की अर्जी, वेणु श्रीनिवासन के एक प्रतिवेदन और बॉम्बे हाई कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए बैठक पर रोक लगाने का आदेश दिया था। इस पूरे विवाद की मुख्य जड़ कात्यायनी अग्रवाल की वह शिकायत है जिसमें आरोप लगाया गया है कि सर रतन टाटा ट्रस्ट के कुल छह सदस्यों में से तीन सदस्य स्थायी यानी आजीवन ट्रस्टी के तौर पर काम कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट की वैधानिक सीमाओं का खुला उल्लंघन है।
नए कानूनी संशोधनों और बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का दिया गया हवाला
इस गंभीर आरोप पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए टाटा ट्रस्ट्स ने कहा है कि संबंधित सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम में जो भी बदलाव या संशोधन किए गए हैं, वे एक सितंबर दो हजार पच्चीस से प्रभावी हुए हैं, जबकि ट्रस्ट के भीतर इन स्थायी सदस्यों की नियुक्तियां इस नई कानूनी तारीख से बहुत पहले ही पूरी की जा चुकी थीं। इसके साथ ही ट्रस्ट ने कानून का हवाला देते हुए यह भी दलील दी है कि इसी शिकायत के आधार पर बोर्ड मीटिंग को रोकने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट में जो याचिका दायर की गई थी, उसे अदालत ने विगत तेरह मई को ही वापस ली गई मानते हुए पूरी तरह से निस्तारित कर दिया था, ऐसे में चैरिटी कमिश्नर द्वारा बिना कोई पूर्व नोटिस दिए ऐसा एकतरफा आदेश पारित करना न्यायसंगत नहीं है।
बोर्ड की बैठकों पर रोक के पीछे कानूनी अड़चनों और जांच रिपोर्ट का इंतजार
दूसरी तरफ इस प्रशासनिक कार्रवाई पर अपना रुख साफ करते हुए चैरिटी कमिश्नर मोघ एस कलोटी ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि ट्रस्ट के इस आंतरिक मामले की जांच के लिए एक विशेष निरीक्षक को नियुक्त किया जा चुका है और वर्तमान में उनकी विस्तृत रिपोर्ट आना अभी बाकी है। कमिश्नर कार्यालय का मानना है कि जब तक यह आधिकारिक जांच पूरी तरह से मुकम्मल नहीं हो जाती, तब तक बोर्ड की कोई भी बैठक आयोजित करना पूरी तरह से अनुचित होगा। विभाग के अनुसार यदि इस संवेदनशील अवधि के दौरान ट्रस्ट के भीतर कोई भी बड़ा या महत्वपूर्ण नीतिगत फैसला लिया जाता है, तो इससे भविष्य में गंभीर कानूनी पेचीदगियां पैदा हो सकती हैं और चल रही न्यायिक कार्यवाही में भी बेवजह की देरी होगी।
आजीवन ट्रस्टी की संख्या को लेकर छिड़ी जंग और अरबों के साम्राज्य पर असर
वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था के तहत सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड में कुल छह अहम ट्रस्टी शामिल हैं, जिनमें से जिमी नेवल टाटा, जहांगीर एचसी जहांगीर और नोएल नवल टाटा आजीवन ट्रस्टी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह संख्या मौजूदा बोर्ड की कुल क्षमता के पचास प्रतिशत के बराबर बैठती है, जबकि नए सरकारी नियमों के अनुसार यह वैधानिक सीमा अधिकतम पच्चीस प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, जिसके कारण इस पूरे मामले की गहनता से जांच की जा रही है। गौरतलब है कि सर रतन टाटा ट्रस्ट की पूरे टाटा ग्रुप की मुख्य होल्डिंग कंपनी टाटा संस में लगभग तेईस दशमलव छह प्रतिशत की एक बहुत बड़ी हिस्सेदारी है, जिससे इस आंतरिक बोर्ड विवाद और जांच के नतीजों का असर आने वाले समय में देश के कॉर्पोरेट जगत पर भी पड़ना तय माना जा रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर लेकिन चिंताजनक बनी
16 May, 2026 07:39 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। देश के रोजगार परिदृश्य को लेकर एक चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है, जिसके मुताबिक पंद्रह वर्ष और उससे अधिक उम्र के नागरिकों के बीच बेरोजगारी का ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ रहा है। अप्रैल महीने में राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी की दर बढ़कर 5.2 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई है, जो कि बीते छह महीनों के भीतर दर्ज किया गया सबसे उच्चतम स्तर है। मार्च के महीने में यह आंकड़ा 5.1 फीसदी पर दर्ज किया गया था, जबकि इससे पहले पिछले साल अक्टूबर के दौरान भी बेरोजगारी इसी तरह 5.2 फीसदी के ऊंचे स्तर पर देखी गई थी।
व्यापक सरकारी सर्वेक्षण में सामने आए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बदलते हालात
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा देश के पौने चार लाख से भी अधिक नागरिकों के बीच किए गए व्यापक आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण से यह साफ हुआ है कि इस बार ग्रामीण और शहरी बाजारों में रोजगार की स्थिति अलग-अलग रही है। जहां एक तरफ देश के शहरी इलाकों में थोड़ी राहत देखने को मिली है और वहां बेरोजगारी दर मार्च के 6.8 फीसदी से कम होकर अप्रैल में 6.6 फीसदी पर आ गई, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण अंचलों में स्थिति थोड़ी बिगड़ी है। गांवों में काम की कमी के कारण बेरोजगारी का आंकड़ा 4.3 फीसदी से छलांग लगाकर 4.6 फीसदी पर पहुंच गया है।
पुरुष और महिला वर्ग के बीच रोजगार के मोर्चे पर बढ़ता अंतर
श्रम बाजार के इस नए ब्योरे में लैंगिक आधार पर भी उतार-चढ़ाव साफ तौर पर नजर आ रहा है, जिसके तहत पुरुषों के बीच कुल बेरोजगारी मामूली बढ़त के साथ 5.1 फीसदी दर्ज की गई है। गांवों में रहने वाले पुरुषों के लिए रोजगार के अवसर कम हुए हैं, जिससे उनकी बेरोजगारी दर बढ़कर 4.7 फीसदी हो गई, जबकि शहरों में यह सुधरकर 5.9 फीसदी रह गई है। इसके उलट महिलाओं के मोर्चे पर भी चुनौतियां बढ़ी हैं और उनकी कुल बेरोजगारी दर बढ़कर 5.4 फीसदी के स्तर को छू गई है, जिसमें ग्रामीण महिलाओं की बेरोजगारी में विशेष रूप से इजाफा देखा गया है।
श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी और कार्यरत आबादी के अनुपात में गिरावट
ताजा आर्थिक आंकड़ों के विश्लेषण से यह बात भी उजागर हुई है कि अप्रैल के दौरान देश की श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) में गिरावट आई है और यह कम होकर पचपन फीसदी पर आ गई है। इसमें सबसे ज्यादा असर पंद्रह वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं की भागीदारी पर पड़ा है, जो मार्च के मुकाबले घटकर 33.9 फीसदी रह गई है। इसके साथ ही देश की कुल कार्यरत आबादी का अनुपात (डब्ल्यूपीआर) भी प्रभावित हुआ है, जो गांवों में कामगारों की संख्या घटने की वजह से राष्ट्रीय स्तर पर कम होकर 52.2 फीसदी दर्ज किया गया है।
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