बिहार दिवस स्पेशल: नालंदा यूनिवर्सिटी – ज्ञान का वैश्विक केन्द्र
पटना : 22 मार्च को जब पूरा राज्य 'बिहार दिवस' मना रहा है, तो हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है. बिहार सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि वह भूमि है जिसने पूरी दुनिया को ज्ञान का प्रकाश दिया. जब नालंदा विश्वविद्यालय की चर्चा होती है, तो हमारी आंखों के सामने लाल ईंटों के खंडहर उभर आते हैं. लेकिन आज जो महज एक खंडहर है, वह कभी दुनिया का सबसे बड़ा और पहला आवासीय विश्वविद्यालय हुआ करता था.
दुनिया का सबसे पुराना विश्वविद्यालय : एक ऐसा संस्थान जिसने 700 सालों तक पूरी दुनिया में ज्ञान की अलख जगाई. अगर 1193 में आक्रांता बख्तियार खिलजी ने इसे आग न लगाई होती, तो आज ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज जैसी यूनिवर्सिटी का नाम किसी की जुबान पर नहीं होता, बल्कि पूरी दुनिया 'नालंदा' का ही लोहा मान रही होती. नालंदा को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया हुआ है.
413 ई. में हुई थी स्थापना : सम्राटों का मिला साथ स्थानीय टूरिस्ट गाइड और इतिहास के जानकार अनिल कुमार और शिवप्रिय कुमार बताते हैं कि नालंदा महाविहार (बौद्ध विश्वविद्यालय) की स्थापना 5वीं शताब्दी (413 ईस्वी) में गुप्त वंश के शासक कुमार गुप्त ने की थी. बाद में इस विश्वविद्यालय को सम्राट हर्षवर्धन और 9वीं सदी में पाल शासकों का भरपूर संरक्षण मिला. खुदाई में मिली मुद्राओं से भी इसकी पुष्टि होती है. यह उस दौर का ऐसा विश्वविद्यालय था, जिसे चलाने के लिए आसपास के 200 गांवों का लगान दान में दिया जाता था.
अलग-अलग विषयों पर होती थी पढ़ाई : आज के दौर में भले ही हर विषय के लिए अलग-अलग संस्थान हों, लेकिन 5वीं सदी में नालंदा एकमात्र ऐसी संस्था थी, जहां साहित्य, ज्योतिष, मनोविज्ञान, कानून, खगोल विज्ञान, विज्ञान, युद्ध कला, इतिहास, गणित, वास्तुकला, अर्थशास्त्र, चिकित्सा (आयुर्वेद) और योग की एक साथ पढ़ाई होती थी. यहां दाखिला लेना आसान नहीं था.
"यहां प्रवेश के लिए मगध साम्राज्य और बौद्ध धर्म से जुड़े 10 कठिन सवाल पूछे जाते थे. जो छात्र 3 का सही जवाब दे देता था, उसे दाखिला मिल जाता था. एक बार दाखिला मिलने के बाद छात्र की शिक्षा, रहना और खाना सब कुछ पूरी तरह मुफ्त होता था."- प्रवीण कुमार, टूरिस्ट गाइड
विश्व का पहला आवासीय विश्वविद्यालय : नालंदा विश्वविद्यालय विश्व का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था. इसका परिसर इतना विशाल था कि इसमें 300 से ज्यादा छात्रों के कमरे और 7 बड़े-बड़े हॉल थे. यहां भारत के अलग-अलग राज्यों के अलावा चीन, तिब्बत, जापान, कोरिया, मंगोलिया, ग्रीस, ईरान और इंडोनेशिया जैसे देशों से छात्र पढ़ने आते थे. एक समय में यहां 10,000 छात्र अध्ययन करते थे और उन्हें पढ़ाने के लिए 2000 विद्वान शिक्षक नियुक्त थे. सम्राट हर्षवर्धन, धर्मपाल, वसुबंधु, आर्यभट्ट और नागार्जुन जैसे महान विद्वान इसी विश्वविद्यालय की देन हैं.
9 मंजिला लाइब्रेरी सबसे बड़ी धरोहर : चीनी यात्री ह्वेन सांग और इत्सिंग ने यहां ज्ञान प्राप्त किया और लौटकर दुनिया को नालंदा की महानता बताई. नालंदा की सबसे बड़ी धरोहर इसकी 9 मंजिला लाइब्रेरी थी, जिसे 'धर्मगंज' कहा जाता था. इसमें 3 लाख से अधिक हस्तलिखित किताबें और पांडुलिपियां मौजूद थीं. लेकिन 1193 में बख्तियार खिलजी नाम के एक लुटेरे आक्रांता ने इस पूरे विश्वविद्यालय को तहस-नहस कर दिया.
बख्तियार खिलजी ने ईर्श्या में जलाई लाइब्रेरी : इतिहासकार बताते हैं कि एक बार बख्तियार खिलजी बहुत बीमार पड़ गया. उसके हकीमों के इलाज से कोई फायदा नहीं हुआ. तब नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र ने उसका इलाज किया. खिलजी भारत की दवा नहीं खाना चाहता था, इसलिए आचार्य ने कुरान के पन्नों पर दवा का लेप लगा दिया. कुरान पढ़ते हुए दवा उसके शरीर में गई और वह ठीक हो गया.
कई महीने तक धधकती रही नालंदा की लाइब्रेरी : लेकिन, एहसान मानने के बजाय खिलजी इस बात से चिढ़ गया कि एक 'काफिर' (गैर-मुस्लिम) वैद्य उसके हकीमों से ज्यादा ज्ञानी कैसे हो सकता है? इसी ईर्ष्या और कट्टरता में उसने पूरे नालंदा विश्वविद्यालय में आग लगवा दी. उस आग में कई धर्माचार्य, शिक्षक और विद्यार्थी जिंदा जल गए. लाइब्रेरी में इतनी किताबें थीं कि आग कई महीनों तक धधकती रही और किताबों का धुआं उठता रहा. खिलजी ने सिर्फ एक इमारत को नहीं, बल्कि भारत की एक पूरी समृद्ध शिक्षण व्यवस्था को जलाकर राख कर दिया था.
22 साल तक हुई खुदाई : आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) द्वारा 1915 से 1937 तक यहां 22 वर्षों तक खुदाई की गई. इस खुदाई में भगवान बुद्ध के अवशेष, छात्रों के कमरे, चैत्य (मंदिर), कुएं, अन्न भंडार, जले हुए चावल और अष्टधातु की कई मूर्तियां मिलीं. ये सभी आज भी नालंदा संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई हैं. गाइड शिवप्रिय कुमार बताते हैं कि आज जो हम खंडहर देखते हैं, वह पूरे विश्वविद्यालय के मूल आकार का महज 10 प्रतिशत ही है.
प्राचीन गौरव फिर लौटाने की कोशिश : भले ही आज नालंदा खंडहर में तब्दील हो चुका है, लेकिन इसके अवशेष आज भी चीख-चीख कर गवाही देते हैं कि भारत का ज्ञान और विज्ञान कितना समृद्ध था. बिहार दिवस के मौके पर हमें अपनी इस महान विरासत पर गर्व करना चाहिए. हालांकि, साल 2010 में नए 'नालंदा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी' की स्थापना कर उस प्राचीन गौरव को फिर से लौटाने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन प्राचीन नालंदा की उस अनुशासित और लोकतांत्रिक व्यवस्था की बराबरी शायद ही कभी कोई कर पाए.
''प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की ऐतिहासिकता और गरिमा इतनी विरल रही है कि दक्षिण एशियाई देशों के संगठन की एक बैठक में विदेशी शिक्षाविदों ने इसे पुनर्जीवित करने का प्रस्ताव रखा था. इसी परिप्रेक्ष्य में साल 2010 में नए नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की नींव रखी गई और 2014 से यह क्रियाशील हुआ.''- डॉ. धीरेंद्र उपाध्याय, प्रोफेसर, राजगीर सरकारी डिग्री कॉलेज
2024 में पीएम ने किया उद्घाटन : हाल ही में वर्ष 2024 में देश के प्रधानमंत्री द्वारा इसका विधिवत उद्घाटन किया गया. यह नया परिसर पुराने खंडहर से करीब 12-13 किलोमीटर दूर राजगीर की सुरम्य वादियों में प्रकृति की गोद में स्थापित किया गया है, जो कभी 16 महाजनपदों में सबसे शक्तिशाली मगध साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था.
''वर्तमान में नालंदा अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर और पीएचडी की पढ़ाई अनवरत रूप से जारी है. नए परिसर में मुख्य रूप से इतिहास, दर्शनशास्त्र, पर्यावरण व पारिस्थितिकी और विभिन्न धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन की शिक्षा दी जा रही है.''- डॉ. धीरेंद्र उपाध्याय, प्रोफेसर, राजगीर सरकारी डिग्री कॉलेज
कई देशों के छात्र यहां आते हैं पढ़ने : डॉ. धीरेन्द्र उपाध्याय के मुताबिक प्राचीन काल की तरह ही आज भी नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में वियतनाम, लाओस, थाईलैंड, श्रीलंका, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों से छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं, साथ ही भारत के कुछ राज्यों के विद्यार्थी भी यहां शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं.
'छात्र-शिक्षक अनुपात में कमी' : डॉ. धीरेंद्र उपाध्याय प्राचीन और वर्तमान व्यवस्था का तुलनात्मक आकलन करते हुए एक चिंता भी जताते हैं. वे कहते हैं, "प्राचीन नालंदा में जहां 10 हजार छात्र और 2 हजार प्रोफेसर थे, उसके अनुपात में आज नए विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं की संख्या नगण्य है. इस अंतरराष्ट्रीय संस्थान को व्यापक प्रचार-प्रसार की सख्त जरूरत है. प्राचीन नालंदा की जीवंतता को देश भर में प्रचारित किया जाए, ताकि इसकी सार्थकता तभी साबित हो जब भारत के कोने-कोने से विद्यार्थी यहां आकर विद्या अध्ययन का लाभ उठाएं.''

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