नारी: सृजन, पालन और प्रेरणा की जीवंत प्रतिमा
नारी… एक शब्द, जिसमें पूरी सृष्टि की रचना और पालन की कहानी छुपी है। वह माँ है, जो अपने आँचल में संसार का ममत्व समेट लेती है। वह बहन है, जो घर में अपनापन और हँसी बिखेरती है। वह पत्नी है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने साथी का सहारा बनती है। और वह बेटी है, जो परिवार में नई उम्मीद और उजाला लाती है। वह धरती की तरह धैर्यवान, नदी की तरह निरंतर बहने वाली और आकाश की तरह असीम है। नारी केवल एक इंसान नहीं, वह सृजन की पहली साँस, पालन की मधुर धुन और प्रेरणा की शाश्वत लौ है। जब वह माँ बनती है, तो केवल एक शिशु को जन्म नहीं देती—वह पूरे युग को जन्म देती है। उसकी गोद में पलने वाले नन्हे कदम आने वाले कल की दिशा तय करते हैं। घर का पहला विद्यालय माँ की गोद होती है, और माँ ही उस विद्यालय की पहली शिक्षिका। वह लोरी में भी धर्म, आस्था और प्रेम के बीज बो देती है। पूजा की थाली सजाते समय, दीपक जलाते समय, या किसी त्योहार की तैयारी में, वह अनजाने में बच्चों को परंपरा का पाठ पढ़ाती है। परंपराएं सिर्फ रस्में नहीं हैं। वे जीवन के ऐसे सूत्र हैं जो समाज को जोड़ते हैं, परिवार में अपनापन जगाते हैं और आने वाली पीढ़ियों में सामूहिकता की भावना भरते हैं। नारी जब इन परंपराओं को निभाती है, तो वह समय के साथ-साथ अपनी संतान को धैर्य, अनुशासन, और करुणा भी सिखाती है।
नारी की आस्था उसकी सबसे बड़ी ताकत है। चाहे वह व्रत-उपवास हो, त्यौहार की तैयारी हो, या परिवार के लिए प्रार्थना—इन सबमें उसकी निष्ठा और समर्पण झलकता है। यही आस्था पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि कठिन समय में भी विश्वास और सकारात्मक सोच हमें आगे बढ़ाती है। सनातन संस्कृति में नारी को ‘गृहलक्ष्मी’ कहा गया है, क्योंकि वह घर को सिर्फ ईंट और दीवारों का ढांचा नहीं रहने देती, बल्कि उसमें प्रेम, आदर और संस्कार की सुगंध भर देती है। वह पुरानी परंपराओं को समय के अनुसार ढालते हुए अगली पीढ़ी तक पहुँचाती है—यही उसे संस्कृति की सच्ची वाहक बनाता है।
आज के बदलते दौर में, जब पश्चिमी प्रभाव तेज़ी से फैल रहा है, तब भी नारी ही वह कड़ी है जो हमारी जड़ों को मजबूती से थामे हुए है। उसकी आस्था, उसकी परंपरा-निष्ठा और उसका संस्कार-संवर्धन ही हमारे समाज की असली शक्ति है।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो हर युग में नारी का रूप बदलता रहा है—पर उसकी सार्थकता कभी नहीं बदली। कभी वह झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बनकर रणभूमि में गरज उठी, तो कभी अहिल्याबाई होल्कर बनकर शासन और न्याय का आदर्श बनी। कभी मीरा की भक्ति में डूबी, तो कभी गार्गी की तरह ज्ञान की ज्योति फैलाई। उसके इन रूपों में एक बात समान है—वह हर परिस्थिति में प्रेरणा का स्रोत बनी रहती है।
नारी की ताकत को कम आंकना, मानो सूर्य की रोशनी को नकारना है। वह खेतों में पसीना बहा सकती है, प्रयोगशालाओं में खोज कर सकती है, मंच से क्रांति का बिगुल बजा सकती है और रणभूमि में दुश्मन से लोहा ले सकती है। उसकी शक्ति केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं, बल्कि वह समाज और राष्ट्र के हर क्षेत्र में अपना योगदान देती है।
आज का समय नारी के लिए अवसरों का द्वार खोल चुका है। वह शिक्षित है, आत्मनिर्भर है और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है। परंतु इस जागरूकता के साथ-साथ उसकी जिम्मेदारियाँ भी बढ़ी हैं—वह आधुनिकता के साथ परंपरा का संतुलन भी साध रही है। वह तकनीक के युग में कदम से कदम मिलाकर चल रही है, पर अपनी जड़ों से भी जुड़ी हुई है।
हमारी संस्कृति ने सदियों पहले ही कह दिया था—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता”—जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है। इसलिए नारी का सम्मान केवल उसकी गरिमा के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज की उन्नति के लिए आवश्यक है। नारी—वह है जो सृजन करती है, पालन करती है और प्रेरणा देती है। वह मिट्टी की तरह सहनशील है, दीपक की तरह अंधेरों में रोशनी देती है, और पर्वत की तरह अडिग रहती है। उसका अस्तित्व सिर्फ एक जीवन नहीं, बल्कि लाखों जीवनों का आधार है।
इसलिए, नारी को केवल सम्मान मत दो, उसे निर्णय की शक्ति दो, नेतृत्व का अवसर दो और उसके सपनों को पंख दो। क्योंकि जब नारी आगे बढ़ती है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं—पूरा समाज प्रगति की ओर बढ़ता है।
अनुराधा श्रीवास्तव
सह संपादक

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