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भारत-ब्रिटेन FTA: मई से लागू हो सकता है समझौता, ऑटो और व्हिस्की पर टैक्स में बड़ी राहत
13 Apr, 2026 10:13 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। भारत (India) और ब्रिटेन (UK) के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement) अगले महीने से लागू हो सकता है। सूत्रों के अनुसार, यह समझौता मई के दूसरे सप्ताह से प्रभाव में आने की संभावना है।
दोनों देशों ने 24 जुलाई 2025 को व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (सीईटीए) पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत भारत के 99 फीसदी निर्यात को ब्रिटेन के बाजार में बिना किसी शुल्क के (ड्यूटी फ्री) प्रवेश मिलेगा, जबकि भारत ब्रिटिश उत्पादों जैसे कार और व्हिस्की पर आयात शुल्क में चरणबद्ध तरीके से कमी करेगा। भारत और ब्रिटेन ने वर्ष 2030 तक आपसी व्यापार को मौजूदा 56 अरब डॉलर से बढ़ाकर दोगुना करने का लक्ष्य रखा है।
भारतीय उत्पादों के लिए बेहतर पहुंच: समझौते की शर्तों के मुताबिक, भारत ने चॉकलेट, बिस्कुट और कॉस्मेटिक्स जैसे कई उपभोक्ता उत्पादों के लिए अपना बाजार खोला है, जबकि भारतीय निर्यातकों को कपड़ा, जूते-चप्पल, रत्न एवं आभूषण, खेल सामान और खिलौनों के लिए बेहतर बाजार पहुंच मिलेगी।
इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहन निर्यात का मौका
ब्रिटिश स्कॉच व्हिस्की पर आयात शुल्क को तत्काल 150 फीसदी से घटाकर 75 फीसदी किया जाएगा। वर्ष 2035 तक धीरे-धीरे इसे 40 प्रतिशत तक लाया जाएगा।
ऑटोमोबाइल क्षेत्र में भारत आयात शुल्क को मौजूदा 110 फीसदी से घटाकर पांच वर्षों में 10 फीसदी करेगा।
इसके बदले भारतीय कंपनियों को ब्रिटिश बाजार में इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों के निर्यात के लिए कोटा के आधार पर प्रवेश मिलेगा।
भारत और ब्रिटेन ने दोहरा योगदान संधि करार पर भी हस्ताक्षर किए हैं।
इससे दोनों देशों के अस्थायी कर्मियों को सामाजिक शुल्क को दो बार नहीं देना पड़ेगा।
अमेरिका की कार्रवाई से होर्मुज बंद, वैश्विक तेल सप्लाई पर खतरा—ऊर्जा संकट बढ़ सकता है
13 Apr, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Strait of Hormuz: ईरान-अमेरिका के बीच शांति वार्ता सफल नहीं हो सकी है. पाकिस्तान में 21 घंटों से ज्यादा बातचीत के बाद दोनों ही देश अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े रहे यही वजह है कि बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. बातचीत सफल न होने के बाद ट्रंप ने एक बार धमकी दी है. उन्होंने कहा कि जो भी जहाज होमुर्ज से गुजरने का ईरान को टोल देंगे, उनकी नाकेबंदी की जाएगी. तो वहीं ईरान ने भी साफ कर दिया कि टोल तो देना ही पड़ेगा. अब इस तरह की बयानबाजी के कारण एक बार फिर दुनिया को ये डर सता रहा है कि आने वाले दिनों में तेल और एलपीजी की संकट पैदा हो सकता है.
अमेरिकी राष्ट्रपति जंग शुरू होने के बाद से ही कई तरह के बयान दे रहे हैं. बातचीत फेल होने के बाद उन्होंने कहा कि अमेरिकी नौसेना होर्मुज स्ट्रेट में नाकाबंदी करेगी. ईरान को टोल देने वाले जहाजों को भी रास्ते में रोक लिया जाएगा. ईरान ने दावा किया कि होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह उसके कंट्रोल में है. यहां से गुजरने वाले जहाजों को रियाल में टोल देना जरूरी होगा.
भारत कर दूसरे विकल्पों पर काम
यूएस की नाकेबंदी का असर भारत पर भी देखने को मिल सकता है. हालांकि ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए भारत को वैकल्पिक रास्तों पर काम तेज करना होगा, जिसमें चाबहार बंदरगाह और INSTC विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं.
समुद्री खुफिया फर्म लॉयड्स लिस्ट के मुताबिक, नाकेबंदी के ऐलान के बाद ट्रैफिक रुक गया है. अमेरिका की धमकी के बाद कई जहाजों ने रास्ता बदल लिया या वापस लौट गए हैं.
दुनियाभर में हो सकती है तेल की किल्लत
युद्ध शुरू होने के बाद से ही दुनियाभर में तेल का संकट पहले से ही चल रहा है. कई देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं. सीजफायर होने के बाद हालात कुछ हद तक सुधरे हैं.
लेकिन बातचीत विफल होने के बाद एक बार फिर दुनिया को डर है कि अगर अमेरिका नाकाबंदी करता है. तो तेल और एलपीजी का संकट पैदा हो सकता है. हालांकि ईरान ने दावा किया है कि यह नाकेबंदी फेल होगी और अमेरिका को हार का सामना करना पड़ेगा.
ऐलान के साथ ही बढ़ गई तेल की कीमतें
अमेरिका ने ऐलान किया कि वह सोमवार को ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी की जाएगी. इसके बाद से ही कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी देखी जा रही है. इस समय अमेरिकी क्रूड ऑयल 8% बढ़कर 104.24 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया है. वहीं अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड 7% बढ़कर 102.29 डॉलर प्रति बैरल हो गया.
एक्सपर्ट का मानना है कि अगर अमेरिका की तरफ से नाकेबंदी की जाती है और ईरान इसका विरोध करता है तो सीजफायर खत्म होने के साथ साथ तेल की कीमतों में इजाफा देखने को मिल सकता है.
ईरान पर हमले की आशंका तेज: WSJ रिपोर्ट में बड़ा दावा, डोनाल्ड ट्रंप के फैसले पर नजर
13 Apr, 2026 09:11 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन. अमेरिका-ईरान (US-Iran) के बीच कूटनीतिक बातचीत (Diplomatic Talks) फेल होने के बाद अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) और उनके सलाहकार ईरान के खिलाफ सैन्य हमलों को फिर शुरू करने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी के विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं. एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ये कदम पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता के विफल हो जाने के कुछ घंटों बाद लिया जा रहा है, ताकि दोनों पक्षों के बीच अटके हुए समझौते को तोड़ा जा सके.
वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की रिपोर्ट के अनुसार, रविवार को ट्रंप ने फ्लोरिडा के डोरल स्थित अपने रिसॉर्ट में सलाहकारों से बात की और फॉक्स न्यूज को इंटरव्यू दिया. वार्ता विफल होने के बाद वो ईरान पर दबाव बढ़ाने के कई विकल्प तलाश रहे हैं. अमेरिकी सेना को हाई अलर्ट पर रखा गया है ताकि किसी भी समय ईरान के रणनीतिक ठिकानों पर हवाई हमले किए जा सकें.
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कई दिनों से चल रही पर्दे के पीछे की बातचीत अब बेनतीजा साबित हुई है. ईरान की शर्तों और अमेरिकी मांगों के बीच का अंतर कम नहीं हो सका, जिससे कूटनीतिक रास्ते बंद हो गए. इसके परिणामस्वरूप, ट्रंप प्रशासन ने अब सैन्य दबाव बढ़ाने का रुख अपनाया है.
ट्रंप ने पहले ही दिए थे संकेत
उधर, राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले भी संकेत दिया था कि यदि ‘असली समझौता’ नहीं होता है तो सैन्य कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प बचेगी. अब जबकि बातचीत टूट चुकी है, अमेरिकी रक्षा मंत्रालय यानी पेंटागन संभावित टारगेट की लिस्ट तैयार कर रहा है. ट्रंप का मानना है कि सैन्य शक्ति के जरिए ही ईरान को झुकने पर मजबूर किया जा सकता है.
मिडिल ईस्ट में बढ़ा संकट
वहीं, इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद फिर से युद्ध के बादलों ने मिडिल ईस्ट को अपनी चपेट में ले लिया है. बमबारी की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार और भू-राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है. अगर ये अभियान शुरू होता है तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं. दुनिया भर की नजरें अब व्हाइट हाउस की अगली आधिकारिक घोषणा पर टिकी हैं.
तनाव बढ़ा: डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानी बंदरगाहों पर कसा शिकंजा, महंगा हुआ कच्चा तेल
13 Apr, 2026 08:09 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली. ग्लोबल टेंशन एक बार फिर हाई पर पहुंच गई है. अमेरिका (US) और ईरान (Iran) में पाकिस्तान (Pakistan) के इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता 21 घंटे की चर्चा के बाद भी बेनतीजा निकली यानी फेल हो गई. इसके बाद ट्रंप एक बार फिर तिलमिलाए नजर आ रहे हैं और उन्होंने नेतृत्व वाले US सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने ऐलान कर दिया है कि वो ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी शुरू कर रहा है. इन सबके बीच दो हफ्तों के सीजफायर के बाद धड़ाम हुए कच्चे तेल के दाम में एक बार फिर से आग लगी नजर आई है.
सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत एक झटके में 8 फीसदी से ज्यादा उछलकर फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई और दोनों देशों के बीच युद्ध बढ़ने की स्थिति में ये और भी उछल सकती हैं, जो दुनिया में महंगाई का जोखिम बढ़ाने वाली साबित होंगी.
नाकेबंदी का ऐलान, क्रूड में आग
एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद में हुए US-Iran Talks किसी अंजाम पर नहीं पहुंची. अमेरिकी राष्ट्रपति जेडी वैंस ने इसे ईरान के लिए बेहद खराब बताया, तो ईरान की ओर से अमेरिका पर जमकर पलटवार किया गया. दोनों देशों के बीच अचानक फिर बढ़े तनाव का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिली. अमेरिकी की ओर से सोमवार से ईरानी बंदरगाहों (Iranian Ports) की नाकेबंदी शुरू करने के ऐलान के बाद तो इनमें तगड़ा उछाल आया.
WTI Crude Oil Price 8 फीसदी की तेजी के साथ बढ़कर 104.24 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है. तो वहीं खबर लिखे जाने तक ब्रेंट क्रूड प्राइस (Brent Crude Oil Price) 7 फीसदी से ज्यादा की उछाल के साथ 102.29 डॉलर हो गया था. नेचुरल गैस की कीमतों (Natural Gas Price) में भी तेजी दर्ज की गई है और ये करीब 2 फीसदी बढ़कर 2.684 डॉलर हो गई है.
ईरान युद्ध (Iran War) के दौरान होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के चलते ब्रेंट क्रूड में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. जो Brent Crude Price युद्ध से ऐन पहले फरवरी के अंत में करीब 70 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड करती दिखाई दी थी, वो युद्ध की शुरुआत के बाद बढ़कर 119 डॉलर तक पहुंची. हालांकि, अमेरिका-ईरान में दो हफ्ते के सीजफायर (US-Iran Ceasefire) का ऐलान होने के बाद बीते सप्ताह ये फिर से फिसलीं और जून डिलीवरी के लिए ब्रेंट क्रूड प्राइस 95 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया था.
Hormuz पर टेंशन चरम पर पहुंची
पाकिस्तान में हुई शांति वार्ता फेल होने के बाद से ही ईरानी प्रभाव वाले होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को लेकर ग्लोबल टेंशन चरम पर पहुंच गई है. ऐसा इसलिए क्योंकि ये समुद्री रूट दुनिया के तेल जरूरत के 20 फीसदी की आवाजाही को कंट्रोल करता है. बीते दिनों इसमें रुकावट का असर तमाम देशों में तेल-गैस संकट (Global Oil Gas Crisis) के रूप में देखने को मिला है.
साफतौर पर समझें, तो दुनिया में व्यापार किए जाने वाले कच्चे तेल का लगभग पांचवां हिस्सा हर दिन होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है. सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और ईरान, ये सभी तेल के प्रमुख निर्यातक हैं. सीजफायर के ऐलान के बाद अब तक इस तेल रूट में जहाजों की आवाजाही हालांकि सीमित ही रही है. मरीन ट्रैकर बताते हैं कि इस अवधि में अब तक 40 से ज्यादा कमर्शियल जहाज इस रूट से गुजरे हैं.
अब क्या करने वाले हैं ट्रंप?
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने कहा है कि नाकेबंदी ईरानी पोर्ट्स और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश करने या वहां से निकलने वाले सभी देशों के जहाजों पर निष्पक्ष रूप से लागू की जाएगी. हालांकि, वह अभी भी उन जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की परमिशन देगा, जो गैर-ईरानी बंदरगाहों के बीच यात्रा कर रहे हैं.
इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता फेल होने के बाद वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत विफल होने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ईरान के खिलाफ फिर से भीषण बमबारी ऑपरेशन शुरू करने पर विचार कर रहे हैं.
एपस्टीन मामले पर अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानिया.......मुझे बदनाम करना बंद करो
12 Apr, 2026 01:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। मिडिल ईस्ट में युद्ध और अमेरिका में करीब आते मध्यावधि चुनावों के बीच ऐसा लग रहा था कि वाइट हाउस जेफरी एपस्टीन के मामले से उबर चुका है। एपस्टीन मामले में ट्रंप को उनके दूसरे कार्यकाल के पहले साल से ही परेशान किया था। लेकिन अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप के बयान ने वाइट हाउस के सहयोगियों को हैरान किया है। मेलानिया ने यौन अपराधी एपस्टीन से किसी भी तरह के जुड़ाव से इंकार किया, तब लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर इस समय में यह घोषणा क्यों की, जब यह मामला सुर्खियों से हट चुका था।
फर्स्ट लेडी मेलानिया ने पहले से तैयार बयान पढ़ा जिसमें उन्होंने कहा कि वे और उनके वकील दिवंगत कारोबारी एपस्टीन के साथ संबंधों को लेकर फैलाई जा रही बेबुनियाद और आधारहीन झूठी बातों का मुकाबला कर रहे हैं। बदनाम एपस्टीन से मुझे जोड़ने वाले झूठ आज ही खत्म होने चाहिए। जो लोग मेरे बारे में झूठ फैला रहे हैं, उनमें नैतिक मूल्यों, विनम्रता और सम्मान की पूरी तरह कमी है। मुझे उनकी अज्ञानता पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मैं मेरी प्रतिष्ठा को बदनाम करने की उनकी घटिया कोशिशों को सिरे से खारिज करती हूं। मेलानिया ने बयान में साल 2002 के छोटे से ईमेल का जिक्र किया, जो डीयर जी से शुरू होता है और इसके आखिर में लिखा है...........लव, मेलानिया। इसमें लिखा है, मुझे पता है कि आप पूरी दुनिया में घूमते हुए बहुत व्यस्त हैं। पाम बीस कैसा रहा? मैं वहां जाने का बेसब्री से इंतजार कर रही हूं। जब आप न्यूयार्क वापस आएं, तब मुझे फोन जरूर करें। मेलानिया ने कहा कि वे एपस्टीन या उनकी दोस्त और पूर्व में गर्लफ्रेंड रही घिसलेन मैक्सवेल की दोस्ती नहीं थीं। उन्होंने मैक्सवेल को भेजे ईमेल के जवाब को सामान्य बातचीत बताया। फर्स्ट लेडी ने कहा, उनके ईमेल का मेरा विनम्र जवाब एक छोटी सी चिठ्ठी से ज्यादा कुछ नहीं था।
मेलानिया ने अभी क्यों दिया बयान?
मामले की जानकारी रखने वाले जानकारों ने बताया कि फर्स्ट लेडी की टिप्पणियां प्रेस कवरेज और इंटरनेट पर चल रहीं अटकलों पर उनकी महीनों पुरानी चिंता का नतीजा थीं। इन ब्लॉग्स में एपस्टीन से संबंधों को लेकर उन पर निशाना साधा जा रहा था। मामले से परिचित शख्स ने कहा, उनके बारे में ऐसी कहानियां चल रही थीं, जिन्हें रैंडम ब्लॉग्स ज्यादा फैला रहे थे। वे अभी भी एपस्टीन के मामले को लेकर उन पर निशाना साध रहे थे। शख्स ने बताया कि फर्स्ड लेडी आधिकारिक तौर पर सामने आकर इन बातों से इंकार करना चाहती थीं। वॉइट हाउस को भी यह नहीं पता था कि वह क्या कहने वाली हें। उसी दिन बाद में उनके पति राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उन्हें इस बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी।
चीन का दोमुंही चेहरा.......इधर शांतिवार्ता, उधर ईरान को एयर डिफेंस सिस्टम देने की तैयारी
12 Apr, 2026 12:40 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। अमेरिका की खुफिया एजेंसियों के हवाले से दावा हुआ है कि चीन ईरान को अगले कुछ हफ्तों में एक एयर डिफेंस सिस्टम देने की तैयारी में है। यूएस इंटेलिजेंस के हवाले से कहा गया हैं कि चीन अगले कुछ हफ्तों के भीतर ईरान को नए एयर डिफेंस सिस्टम देने जा रहा है। रिपोर्ट में बताया गया हैं कि ये एक भड़काऊ कदम होगा क्योंकि बीजिंग अमेरिका-ईरान के बीच हुए नाजुक संघर्ष विराम में मध्यस्थता करने में मदद की थी और अब वहां ईरान को एयर डिफेंस सिस्टम दे रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मई महीने में चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं और अगर ईरान को चीनी एयर डिफेंस भेजने की तैयारी की रिपोर्ट सही है, तब उनकी यात्रा पर असर पड़ेगा। दो सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि इसतरह के संकेत हैं कि बीजिंग इन खेपों को तीसरे देशों के रास्ते भेजने पर काम कर रहा है ताकि उसका नाम नहीं आ सके और एयर डिफेंस सिस्टम के मूल देश का पता नहीं चल पाए।
ईरान को हथियारों की खेप भेजने की तैयारी में चीन
सूत्रों के मुताबिक बीजिंग जिन सिस्टम्स को भेजने की तैयारी कर रहा है वे कंधे से दागी जाने वाली एंटी-एयर मिसाइल सिस्टम्स हैं। इन सिस्टम्स ने पांच हफ्ते तक चले युद्ध के दौरान कम ऊंचाई पर उड़ने वाले अमेरिकी सैन्य विमानों के लिए खतरा पैदा किया था और अगर युद्धविराम टूट जाता है, तब ये फिर से खतरा बन सकते हैं। हालांकि वॉशिंगटन में चीनी दूतावास के एक प्रवक्ता ने कहा चीन ने इस संघर्ष में शामिल किसी भी पक्ष को कभी हथियार नहीं दिए हैं। यह जानकारी पूरी तरह से गलत है।
चीनी दूतावास प्रवक्ता ने कहा कि एक जिम्मेदार बड़े देश के तौर पर चीन हमेशा अपनी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों को पूरा करता है। हम अमेरिका से आग्रह करते हैं कि वह बिना किसी आधार के आरोप लगाने, जान-बूझकर गलत संबंध जोड़ने और सनसनी फैलाने से परहेज करें। हमें उम्मीद है कि संबंधित पक्ष तनाव कम करने में मदद के लिए और ज्यादा प्रयास करेगा।
ट्रंप ने संकेत दिया था कि पिछले हफ्ते ईरान ने एफ-15 फाइटर जेट पर हाथ से कंधे पर रखकर चलाई जाने वाली मिसाइल यानी हीट-सीकिंग मिसाइल से हमला किया था जिसमें अमेरिकी विमान गिर गया था। जबकि ईरान ने कहा कि उसने जेट को गिराने के लिए एक नए एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया है लेकिन उसने इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी। यह साफ नहीं है कि वह सिस्टम चीन में बना था या नहीं। सूत्रों ने बताया है कि चीनी कंपनियां ईरान को लगातार ऐसी प्रतिबंधित दोहरे-इस्तेमाल वाली टेक्नोलॉजी बेच रही हैं जिससे ईरान को हथियार बनाने और अपने नेविगेशन सिस्टम को बेहतर बनाने में मदद मिल रही है। लेकिन, अगर चीनी सरकार सीधे तौर पर हथियारों के सिस्टम ईरान को देती है तो यह मदद का एक बिल्कुल नया स्तर होगा।
खाड़ी देशों को बहुत मंहगी पड़ी ट्रंप से दोस्ती, ईरान से जंग ने शक्ति संतुलन की तस्वीर बदली
12 Apr, 2026 11:39 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन। मध्य पूर्व में हालिया जंग ने शक्ति संतुलन की पूरी तस्वीर बदलकर रख दी है। जहां कभी अमेरिका के सैन्य ठिकाने उसकी ताकत और प्रभाव को दिखाते थे, वहीं अब बर्बाद हो चुके बेस उसकी सबसे बड़ी कमजोरी दिखा रहे है। ईरान के जवाबी हमलों ने सऊदी अरब, यूएई, कतर और बहरीन जैसे देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ढांचे को गहरी चोट पहुंची है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कम से कम एक दर्जन सैन्य ठिकाने इतने बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं कि अब उनका इस्तेमाल करना मुश्किल हो गया है। एक अमेरिकी अखबार ने पहले ही बताया था कि हमलों की वजह से अमेरिकी एयरबेस इस्तेमाल करने योग्य भी नहीं हैं। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने अब तक नुकसान की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।
मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट पर रक्षा विशेषज्ञों ने बताया कि, यह अमेरिका की ताकत का पूरा ढांचा था, जिसे ईरान ने 40 दिन में बेकार कर दिया। उनका मानना है कि असली नुकसान की तस्वीर अभी भी सामने नहीं आई है। अरब के जिन देशों में ये बेस मौजूद हैं, जैसे कि बहरीन, सऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात, कुवैत और कतर में इन ठिकानों तक पहुंच बेहद सीमित कर दी गई है। जंग के दौरान इन देशों ने अपने आसमान में मिसाइलों की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्डिंग पर भी रोक लगा दी थी, जिससे यह सवाल भी उठे कि क्या वे इन ठिकानों की असली हालत छिपाना चाहते थे। ईरान ने बहरीन में अमेरिकी नौसेना के फिफ्थ फ्लीट के हेडक्वार्टर को टारगेट किया था, कभी अमेरिका की समुद्री ताकत का केंद्र माना जाता था, अब खुद खतरे में है। विशेषज्ञ कहते हैं, ऐसा नहीं लगता कि हम कभी पहले की तरह वहां अपनी फिफ्थ फ्लीट को वापस रख पाएंगे। यह अब बहुत ज्यादा असुरक्षित हो चुका है।
असल में, अमेरिका का यह सैन्य नेटवर्क 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद मजबूत हुआ था। तब से लेकर अब तक करीब 19 बड़े सैन्य ठिकाने इस क्षेत्र में बने, जहां करीब 50,000 सैनिक तैनात रहते हैं। कहा जाता है कि इससे खाड़ी देशों को सुरक्षा मिलती थी और इसके बदले अमेरिका को तेल और मिडिल ईस्ट में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करने में मदद मिलती थी। लेकिन इस जंग ने यह समीकरण बिगाड़ दिया है। रिपोर्ट में एक्सपर्ट ने बताया, जब इस तरह के समझौते में एक पक्ष को फायदा कम और नुकसान ज्यादा होने लगे, तब वह रिश्ता कमजोर होने लगता है। जंग के दौरान खाड़ी देशों को अपनी एयर डिफेंस क्षमता पर भारी दबाव झेलना पड़ा, एयरपोर्ट और स्कूल बंद करने पड़े और यहां तक कि उनके ऊर्जा ढांचे पर भी हमले हुए।
विशेषज्ञ ने बताया कि अब ये सैन्य ठिकाने सुरक्षा देने के बजाय हमलों का निशाना बन गए हैं। उन्होंने कहा, ये बेस ईरानी हमलों को रोकने के बजाय खुद उन्हें आकर्षित करने लगे हैं। इससे अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर भरोसा टूटता दिख रहा है। इस पूरी घटना का एक बड़ा असर यह हो सकता है कि खाड़ी देश अब अपनी सुरक्षा के लिए नए विकल्प तलाश सकते है।
किलर फॉर्मूला: इजराइल ने बीते 40 दिनों में ईरान पर 18 हजार बम गिराए
12 Apr, 2026 10:34 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तेलअवीव। इजरायल और ईरान के बीच पिछले 40 दिनों से चल रहे संघर्ष में इजरायली वायुसेना ने आक्रामक रणनीति अपनाते हुए 18,000 से ज्यादा बम गिराए हैं। आईडीएफ की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान में 4,000 से अधिक सैन्य ठिकानों, जिनमें एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल लॉन्चर्स और न्यूक्लियर प्लांट शामिल हैं, को निशाना बनाया गया है। इजरायल सवा चार बम प्रति लक्ष्य की रणनीति पर काम कर रहा है ताकि दुश्मन की सैन्य क्षमता को पूरी तरह नष्ट किया जा सके। इन हमलों से ईरान के पेट्रोकेमिकल और हथियार उत्पादन ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। ईरान के साथ-साथ लेबनान में भी इजरायली हमले जारी हैं।
अप्रैल को लेबनान पर महज 10 मिनट में 100 से ज्यादा हमले किए गए, जिसमें 350 से अधिक लोग मारे गए। इजरायल का दावा है कि ये हमले हिजबुल्लाह के कमांड सेंटरों और हथियार डिपो को नष्ट करने के लिए किए गए हैं। इस युद्ध के कारण लेबनान में लाखों लोग बेघर हो गए हैं और मानवीय संकट गहरा गया है। हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर की बात चल रही है, लेकिन इजरायल ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगा। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय और सिविल डिफेंस के अनुसार उस एक दिन में 250 से 350 से ज्यादा लोग मारे गए और 1100 से अधिक घायल हुए। यह लेबनान में हाल के सालों का सबसे खूनी दिन था। पूरे अभियान में लेबनान में 1000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और हजारों लोग घायल हुए हैं। इजरायल ने हिजबुल्लाह के कमांड सेंटर, हथियार डिपो, ब्रिज और रसद मार्गों को नष्ट किया। कई पुल टूट गए जिससे दक्षिणी लेबनान में मदद पहुंचना मुश्किल हो गया है। इजरायल का दावा है कि इन हमलों में सैकड़ों हिजबुल्लाह लड़ाके मारे गए। लेबनान में लाखों लोग बेघर हो गए और देश में बड़ी तबाही मची है। इजरायल हर एक महत्वपूर्ण टारगेट को पूरी तरह खत्म करने के लिए बहुत ज्यादा बम गिरा रहा है. औसतन हर टारगेट पर 4.5 बम या उससे ज्यादा गोला-बारूद का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका मकसद है कि कोई भी सैन्य सुविधा, मिसाइल या कमांड सेंटर बच न सके।
21 घंटे की चर्चा बेनतीजा, जेडी वेंस लौटे अमेरिका, ट्रंप की अगली रणनीति पर निगाहें
12 Apr, 2026 08:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Islamabad Talks: पाकिस्तान के इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर को लेकर वार्ता चल रही थी. लेकिन 21 घंटे चली लंबी बातचीत को कोई नतीजा नहीं निकला. ईरान ने अमेरिका की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया. इसी बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि हम खुले दिल से यहां आए थे, लेकिन अब हम बिना डील के अमेरिका लौट रहे हैं. बड़ा सवाल यह है कि अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस मामले में अब क्या कदम उठाएंगे. इसको लेकर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ‘गुड न्यूज ये है कि हमारी ईरानियों के साथ कई मुद्दों पर सार्थक चर्चाएं हुई हैं. बुरी खबर यह है कि हम किसी समझौते तक नहीं पहुंच पाए हैं. मेरा मानना है कि यह अमेरिकी की तुलना में ईरान के लिए ज्यादा बुरी खबर है. हमने अपनी ओर से फाइनल और बेस्ट ऑफर पेश किया है, लेकिन ईरानियों ने अमेरिकी शर्तों को मानने से इनकार कर दिया है. हमने भी स्पष्ट कर दिया है कि किन चीजों पर समझौता नहीं किया जाएगा. अमेरिका ने अपनी रेड लाइन्स स्पष्ट कर दी है.
पाकिस्तान को लेकर क्या बोले वेंस?
ईरान ने अमेरिका की शर्तों को स्वीकार क्यों नहीं किया. जब इसको लेकर सवाल किया गया तो जेडी वेंस ने कहा कि मैं ज्यादा डिटेल्स में नहीं जाऊंगा और निजी बातचीत को सार्वजनिक भी नहीं करना चाहता. इस दौरान वेंस ने कहा कि बातचीत के दौरान जो भी कमियां थीं. वह पाकिस्तान की वजह से नहीं थी. पाकिस्तान ने शानदार काम किया और उसने वास्तव में ईरानियों और अमेरिका के बीच की खाई को पाटने का काम किया है.
फिलहाल, यह साफ हो गया है कि ईरान और अमेरिका के बीच चल रही वार्ता पर कोई हल नहीं निकला है. ईरान ने अमेरिका की कई शर्तों को मानने से इनकार कर दिया है. अमेरिका का कहना है कि हमें गारंटी चाहिए कि ईरान भविष्य में कभी भी परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं करेगा. अमेरिका का साफ कहना है कि वह परमाणु सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करना चाहता है.
सुरक्षा संकट बढ़ा: 24 घंटों में इजरायल का हिज्बुल्लाह पर बड़ा हमला
11 Apr, 2026 10:26 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
Israel Strikes Lebanon: पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को लेकर वार्ता चल रही है। पिछले तीन घंटों से बातचीत चल रही है लेकिन अभी तक सहमति नहीं बन पाई है। इसी बीच खबर आ रही है कि इजरायल और लेबनान के बीच जारी जंग और तेज हो गई है। इजराइली सेना ने दावा किया है कि अपने नवीनतम ऑपरेशनल में पिछले 24 घंटों में लेबनान भर में 200 से अधिक हिज़्बुल्लाह ठिकानों को निशाना बनाया है।
इजरायली सेना ने जारी किया बयान
इजरायली सेना ने X पर एक पोस्ट में अपडेट साझा करते हुए कहा कि उसकी वायु सेना अपने चल रहे सैन्य अभियान के हिस्से के रूप में दक्षिणी लेबनान में स्थित हिज्बुल्लाह के बुनियादी ढांचे पर हमले करना जारी रखेगी।
ईरानी विदेश मंत्रालय ने किया दावा
इस निरंतर सैन्य गतिविधि के बीच ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने शनिवार को दावा किया कि लेबनान में युद्धविराम अमेरिका के साथ वार्ता में हुए एक समझौते का हिस्सा था। प्रेस टीवी ने बताया कि प्रवक्ता के बयान की पुष्टि पाकिस्तानी पक्ष ने की है। इसके अलावा, ईरानी प्रतिनिधिमंडल कथित तौर पर स्थिति के संबंध में आवश्यक निर्णय लेने के लिए हिजबुल्लाह के संपर्क में है।
पाकिस्तान में चल रही है अमेरिका और ईरान की बातचीत
ये घटनाक्रम इस्लामाबाद में संयुक्त राज्य अमेरिका, ईरान और पाकिस्तान के बीच त्रिपक्षीय युद्धविराम वार्ता के प्रारंभ के साथ हुआ है। अल जज़ीरा ने बताया कि ये वार्ता 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से वाशिंगटन और तेहरान के बीच उच्चतम स्तर की चर्चा का प्रतिनिधित्व करती है।
अमेरिका के साथ औपचारिक वार्ता से पहले ईरानी वार्ता दल ने पाकिस्तानी राजधानी में एक रणनीतिक बैठक की। महत्वपूर्ण चर्चाओं में भाग लेने के लिए इस्लामाबाद पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिका के साथ शांति वार्ता की आधिकारिक शुरुआत से पहले अपने एजेंडे को अंतिम रूप दिया।
व्हाइट हाउस के एक बयान के अनुसार, इस मुलाकात से पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बगेर ग़ालिबफ़ और विदेश मंत्री अब्बास अरघची ने भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से मुलाकात कर राजनयिक कार्ययोजना पर चर्चा की।
सुधार, निवेश और निर्यात आधारित रणनीति ने बदली चीन की तस्वीर
11 Apr, 2026 08:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
बीजिंग। आज की दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ आर्थिक अनिश्चितता, बदलते वैश्विक समीकरण और विकास की नई चुनौतियाँ देशों को अपने रास्ते पुनः परिभाषित करने के लिए प्रेरित कर रही हैं। इस परिदृश्य में चीन का विकास मॉडल केवल एक राष्ट्रीय सफलता की कहानी नहीं, बल्कि एक वैश्विक अध्ययन का विषय बन चुका है, विशेष रूप से उन देशों के लिए जो तेज़, समावेशी और टिकाऊ विकास की तलाश में हैं। पिछले चार दशकों में चीन ने जिस गति और पैमाने पर परिवर्तन किया है, वह अभूतपूर्व है। एक कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था से उभरकर वह दुनिया की अग्रणी औद्योगिक और तकनीकी शक्तियों में शामिल हुआ। इस परिवर्तन का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह रहा कि यह केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने और जीवन स्तर में व्यापक सुधार लाने में भी सफल रहा। चीन के विकास की एक प्रमुख विशेषता है- व्यावहारिकता पर आधारित नीति निर्माण। यहाँ विचारधारा से अधिक महत्व परिणामों को दिया गया। चीन ने “एक ही समाधान सबके लिए”जैसी सोच से हटकर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नीतियाँ विकसित कीं। यही कारण है कि उसके विकास मॉडल की अपील वैचारिक सीमाओं से परे जाकर विभिन्न देशों में देखी जाती है।
इसके साथ ही, क्रमिक सुधार और प्रयोग की रणनीति चीन की नीति निर्माण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZs) के माध्यम से चीन ने छोटे स्तर पर सुधारों को परखा और सफल होने पर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया। इस पद्धति ने जोखिम को कम किया और नीतियों को अधिक प्रभावी बनाया। बुनियादी ढांचे में भारी निवेश भी चीन के विकास की रीढ़ रहा है। हाई-स्पीड रेल, आधुनिक बंदरगाह, ऊर्जा नेटवर्क और डिजिटल कनेक्टिविटी ने न केवल घरेलू अर्थव्यवस्था को गति दी, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में चीन की भूमिका को भी मजबूत किया। इस प्रकार का विकास दृष्टिकोण उन देशों के लिए विशेष रूप से आकर्षक है, जो बुनियादी ढांचे की कमी से जूझ रहे हैं। चीन की दीर्घकालिक योजना प्रणाली, जैसे पंचवर्षीय योजनाएँ, विकास को एक स्पष्ट दिशा देती हैं। इससे नीतियों में निरंतरता बनी रहती है और आर्थिक, सामाजिक तथा तकनीकी क्षेत्रों में संतुलित प्रगति सुनिश्चित होती है। यह दृष्टिकोण उन देशों के लिए एक महत्वपूर्ण सीख है, जहाँ नीतिगत अस्थिरता विकास में बाधा बनती है। गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में चीन की उपलब्धियाँ भी उल्लेखनीय रही हैं। लक्षित योजनाओं, रोजगार सृजन और सामाजिक सुरक्षा उपायों के संयोजन ने व्यापक स्तर पर जीवन स्तर को ऊपर उठाया। इसने यह साबित किया कि यदि विकास रणनीति समावेशी हो, तो उसके परिणाम समाज के हर वर्ग तक पहुँच सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, चीन का बढ़ता सहयोग- विशेषकर बुनियादी ढांचे, व्यापार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में—कई विकासशील देशों के लिए नए अवसर लेकर आया है। यह सहयोग अक्सर व्यावहारिक परिणामों पर केंद्रित होता है, जैसे सड़कें, बंदरगाह, ऊर्जा परियोजनाएँ और डिजिटल नेटवर्क, जो सीधे आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन स्वयं अपने मॉडल को सार्वभौमिक समाधान के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। वह इस बात पर जोर देता है कि हर देश को अपनी परिस्थितियों के अनुसार विकास का मार्ग चुनना चाहिए। यही लचीलापन और विविधता का सम्मान उसके मॉडल को और अधिक स्वीकार्य बनाता है। अंततः, चीन का विकास अनुभव यह दर्शाता है कि तेज़ और स्थायी विकास के लिए किसी एक विचारधारा से बंधे रहना आवश्यक नहीं है। व्यावहारिकता, नीति-प्रयोग, दीर्घकालिक दृष्टि और समावेशिता जैसे तत्व मिलकर एक ऐसा ढाँचा तैयार कर सकते हैं, जो विभिन्न देशों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सके। 21वीं सदी की जटिल चुनौतियों के बीच, चीन का यह मॉडल एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है- क्या विकास का भविष्य विचारधारा में है, या परिणामों में? शायद इसका उत्तर उसी संतुलन में छिपा है, जिसे चीन ने अपने अनुभव से प्रदर्शित किया है।
ईरानी उपराष्ट्रपति की चेतावनी से डिप्लोमैटिक हलचल तेज
11 Apr, 2026 04:58 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तेहरान/इस्लामाबाद|पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हाई-लेवल वार्ता शुरू हो गई है। यह बातचीत बेहद अहम मानी जा रही है, क्योंकि यही तय करेगी कि क्षेत्र में शांति कायम होगी या फिर संघर्ष और बढ़ेगा। इस बीच ईरान के उपराष्ट्रपति का बयान सामने आने के बाद वार्ता पर नया सस्पेंस पैदा हो गया है।
ईरान के उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरिफ ने साफ चेतावनी दी है कि अगर बातचीत में इस्राइल फर्स्ट की सोच हावी रही तो कोई समझौता नहीं होगा। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका फर्स्ट के नजरिए से बातचीत होती है तो दोनों देशों और दुनिया के लिए अच्छा समझौता संभव है। यह बयान साफ तौर पर वार्ता की दिशा और शर्तों को लेकर ईरान का सख्त रुख दिखाता है।
शहबाज शरीफ ने बैठक पर क्या कहा?
शहबाज शरीफ ने इस बैठक को मेक या ब्रेक करार दिया है। यह वार्ता 8 अप्रैल को हुए संघर्षविराम के बाद हो रही है। पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या यह बातचीत स्थायी शांति का रास्ता बनाएगी या फिर हालात और बिगड़ेंगे।
कौन-कौन शामिल है इस अहम बातचीत में?
ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंचा है। वहीं अमेरिकी टीम में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जारेड कुशनर शामिल हैं। इससे साफ है कि दोनों देश इस बातचीत को बेहद गंभीरता से ले रहे हैं।
क्या सुरक्षा इंतजाम दिखा रहे हैं वार्ता की गंभीरता?
इस वार्ता के लिए अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था की गई है। ईरानी प्रतिनिधिमंडल के विमान को पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र में प्रवेश के दौरान लड़ाकू विमानों और विशेष निगरानी प्रणाली की सुरक्षा दी गई। इससे स्पष्ट है कि यह बैठक कितनी संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के मुताबिक, बातचीत के लिए समय सीमित है और अगले 48 घंटे बेहद अहम होंगे। इन्हीं घंटों में यह तय होगा कि संघर्षविराम आगे बढ़ेगा या फिर स्थिति फिर से तनावपूर्ण हो जाएगी। अगर समझौता नहीं हुआ तो क्षेत्र में टकराव और बढ़ सकता है।
‘ईरान सिर्फ बातचीत के लिए जिंदा है’, ट्रंप की धमकी से बढ़ा तनाव
11 Apr, 2026 02:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में आज शांति वार्ता होने जा रही है, जिसमें दोनों पक्ष अपने-अपने मुद्दे उठाएंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वार्ता से पहले ईरान को कड़ी चेतावनी दी है और कहा है कि ईरान के पास कोई विकल्प नहीं है. ट्रंप ने ये भी दावा किया कि ईरान को हर हाल में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलना होगा.
अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में आज शांति वार्ता होने वाली है. दूसरी तरफ, वार्ता से कुछ घंटे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान को धमकी दी है. ट्रंप ने दावा किया है कि 'ईरान के पास कोई ऑप्शन नहीं है और वो सिर्फ बातचीत के लिए जिंदा है.' उन्होंने होर्मुज खोलने को लेकर भी बड़ा बयान दिया.
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर एक पोस्ट शेयर किया है. इसमें उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर कहा कि ईरान अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर कंट्रोल करके दुनिया को जबरन वसूली का शिकार बना रहा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने पोस्ट में लिखा, 'ईरानियों को शायद ये अहसास नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों का इस्तेमाल करके दुनिया को डराने के अलावा उनके पास कोई कार्ड नहीं है. वो आज अगर जिंदा हैं, तो सिर्फ बातचीत करने के लिए.'
शांति वार्ता नाकाम होने पर फिर शुरू हो सकती है जंग
बता दें कि एक अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शांति वार्ता के लिए अपनी टीम के साथ इस्लामाबाद पहुंचे हैं. ट्रंप ने 'न्यूयॉर्क पोस्ट' को दिए इंटरव्यू में ये इशारा किया है कि अगर ये शांति वार्ता नाकाम साबित होती है, तो ईरान पर फिर से हमले शुरू हो सकते हैं. उन्होंने बताया कि अमेरिकी युद्धपोतों को बेहतरीन गोला-बारूद से लैस कर दिया गया है और वो हमलों के लिए तैयार हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि ईरान की सहमति हो या न हो, वाशिंगटन जल्द ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोल देगा. उन्होंने कहा, 'ये आसान नहीं होगा. मैं बस इतना कहूंगा कि हम इसे जल्द ही खोल देंगे.'ट्रंप ने इस दौरान ईरान को लेकर कहा, 'हम ऐसे लोगों से निपट रहे हैं जिनके बारे में हमें नहीं पता कि वे सच बोलते हैं या नहीं. हमारे सामने वो कहते हैं कि वो परमाणु हथियार खत्म कर रहे हैं और फिर प्रेस में जाकर कहते हैं कि वो यूरेनियम संवर्धन करना चाहते हैं.'ट्रंप के मुताबिक, ईरान के लोग लड़ने से बेहतर फेक न्यूज मीडिया और पब्लिक रिलेशंस संभालने में माहिर हैं. बता दें कि ईरान-अमेरिका के बीच होने वाली शांति वार्ता में पाकिस्तान मध्यस्थता कर रहा है. इस्लामाबाद में आज ईरानी-अमेरिकी अधिकारी आमने-सामने होंगे और अपना-अपना पक्ष रखेंगे.
पाकिस्तानी मंत्री ने इजरायल को कहा कैंसर, नेतन्याहू ने हड़काया तो डिलीट कर दी पोस्ट
11 Apr, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तेलअवीव। अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली महत्वपूर्ण शांति वार्ता से ठीक पहले पाकिस्तान ने एक नया अंतरराष्ट्रीय विवाद मोल ले लिया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के एक जहरीले बयान ने कूटनीतिक गलियारों में आग लगा दी है। आसिफ ने इजरायल को मानवता के लिए अभिशाप और कैंसर करार देते हुए लेबनान में जारी सैन्य कार्रवाई को नरसंहार बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर यह टिप्पणी तब की जब इस्लामाबाद शांति वार्ता की मेजबानी की तैयारी कर रहा था।
इजरायल ने इस पर बिजली की गति से तीखी प्रतिक्रिया दी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने साफ तौर पर कहा कि एक शांति मध्यस्थ होने का दावा करने वाले देश के मंत्री का ऐसा बयान अत्यंत आपत्तिजनक और अस्वीकार्य है। इजरायल ने चेतावनी दी कि उसके विनाश की मांग करना किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इजरायली विदेश मंत्री गिदोन सार ने भी इसे खुला यहूदी विरोध बताते हुए कड़ी निंदा की। बढ़ते दबाव के बाद हालांकि ख्वाजा आसिफ ने अपना पोस्ट डिलीट कर दिया, लेकिन तीर कमान से निकल चुका था। इस विवाद का सीधा असर शांति वार्ता पर पड़ता दिख रहा है। एक तरफ इस्लामाबाद को छावनी में बदल दिया गया है, वहीं दूसरी तरफ खबरें आ रही हैं कि ईरान इस बैठक में शामिल होने के लिए नहीं पहुंचा है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान का यह रवैया उसे इजरायल की हिट लिस्ट में ला सकता है। अगर पाकिस्तान से इजरायल के विनाश की आवाजें इसी तरह उठती रहीं, तो वह अगला निशाना बन सकता है। फिलहाल, शांति की मेज बिछने से पहले ही कड़वाहट के बीज बो दिए गए हैं।
म्यांमार के नए राष्ट्रपति ने गिनाईं चुनौतियां, दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के समूह से रिश्ते सुधारने पर जोर
11 Apr, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नेपीडॉ । म्यांमार के नव-शपथ ग्रहण किए राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग ने अपने पहले संबोधन में देश के सामने मौजूद चुनौतियों को स्वीकार करते हुए लोकतंत्र और शांति को सरकार की प्राथमिकता बताया। संसद में दिए गए लगभग 20 मिनट के भाषण में उन्होंने कहा कि म्यांमार लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन अभी कई बाधाओं को पार करना बाकी है।
उन्होंने कहा कि नई सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की स्थिति मजबूत करने के लिए काम करेगी और दक्षिण-पूर्व एशियाई संगठन (एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस) के साथ संबंधों को सामान्य बनाने का प्रयास करेगी। गौरतलब है कि 2021 में सैन्य तख्तापलट और उसके बाद की कार्रवाई के चलते दक्षिण-पूर्व एशियाई संगठन ने म्यांमार के सैन्य नेतृत्व को अपने सम्मेलनों से दूर कर दिया था। मिन आंग ह्लाइंग ने कहा कि उनकी सरकार विदेशी निवेश को बढ़ावा देने, कृषि क्षेत्र के विकास और दीर्घकालिक रणनीतिक योजनाओं पर ध्यान देगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार लोकतंत्र और संघीय ढांचे पर आधारित रोडमैप को लागू करेगी। उनके इस संबोधन को देश में स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा में एक अहम संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
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