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खुलेआम हो रही हिंसा, अमेरिकी जनता से अनदेखा करने को कहा जा रहा
28 Jan, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन। अमेरिका में इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (आईसीई) को लेकर बहस और तेज हो गई है। न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने एक बार फिर आईसीई को पूरी तरह खत्म करने की मांग। उन्होंने आरोप लगाया कि यह एजेंसी खुलेआम हिंसा कर रही है, जिसे अमेरिकी जनता से अनदेखा करने को कहा जा रहा है। एक्स पर जारी बयान में ममदानी ने कहा कि आईसीई ने दिनदहाड़े रैनी गुड की हत्या की। तीन हफ्ते भी नहीं बीते थे कि एलेक्स प्रेट्टी को गोलियां मारी गईं। हर दिन हम देखते हैं कि लोगों को उनकी कारों, उनके घरों और उनकी जिंदगी से जबरन छीना जा रहा है। इस क्रूरता से नजरें नहीं फेर सकते। आईसीई को खत्म करो।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एक कार्यक्रम में दिए इंटरव्यू में ममदानी ने मिनियापोलिस में हुई हालिया घटनाओं को भयावह बताया। उन्होंने नेताओं पर आरोप लगाया कि वे अमेरिकियों से उनकी आंखों और कानों पर भरोसा न करने को कह रहे हैं। ममदानी ने कहा कि रैनी गुड से जुड़ा वीडियो साफ है और उसे देखने के बाद किसी और नतीजे पर पहुंचना मुमकिन नहीं। रैनी गुड, 37 साल की अमेरिकी नागरिक थीं। जिन्हें 7 जनवरी को उनकी कार में बैठे हुए आईसीई एजेंट ने गोली मार दी थी।
अधिकारियों के मुताबिक वह किसी इमिग्रेशन रेड का लक्ष्य नहीं थीं। इस घटना के बाद मिनियापोलिस में कई हफ्तों तक विरोध प्रदर्शन हुए। इसके कुछ ही समय बाद, 37 साल के एलेक्स प्रेट्टी की भी एक घटना में मौत हो गई, जहां कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन एजेंट ने उन पर कई गोलियां बरसाईं थी। जोहरान ममदानी का कहना है कि यह डर सिर्फ मिनियापोलिस तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि न्यूयॉर्क के लोग भी खुद को आतंकित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने दो टूक कहा कि वह न्यूयॉर्क सिटी में ऐसी कार्रवाइयों को रोकने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे। बढ़ते विरोध और जांच के बीच ममदानी ने कहा कि अमेरिकी जनता सच सुनना और सच देखना चाहती है।
ट्रंप के हाथ में नीला निशान........इस मेडिसिन के ज्यादा खुराक लेने से
27 Jan, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बाएं हाथ नीले निशान देखने को मिले हैं। नीले निशान की तस्वीरें जब सामने आईं, तब अमेरिका से लेकर दुनिया की मीडिया में हलचल मच गई। सबसे ज्यादा चर्चा उनकी उम्र को लेकर होने लगी। व्हाइट हाउस ने पहले ही इस मामले पर सफाई दी थी। इसके बाद में दावोस से लौटते वक्त एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बात कर ट्रंप ने खुद इसका कारण बताया। उन्होंने कहा कि वह रोज ज्यादा मात्रा में एस्पिरिन लेते हैं, इसलिए उन्हें अगर थोड़ी चोट भी लगाने से जल्दी नील पड़ जाता है।
ट्रंप ने बताया कि यह निशान दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान तब पड़ा, जब उनका हाथ एक टेबल से टकरा गया। उन्होंने कहा, लोग कहते हैं दिल के लिए एस्पिरिन लो, लेकिन अगर शरीर पर नीले निशान नहीं चाहते....तब मत लो। मैं बड़ी वाली एस्पिरिन मेडिसिन लेता हूं। उन्होंने कहा कि डॉक्टर उन्हें ऐसा न करने की सलाह देते हैं। ट्रंप के शब्दों में, डॉक्टर कहते हैं कि आप बहुत स्वस्थ हैं, आपको इसकी जरूरत नहीं है। लेकिन फिर भी मैं कोई खतरा नहीं लेना चाहता। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने कहा कि बोर्ड ऑफ पीस की घोषणा के दौरान ट्रंप का हाथ साइनिंग टेबल के कोने से टकरा गया था। इसकारण निशान पड़ा।
रिपोर्ट के मुताबिक चार डॉक्टरों ने इस बारे में बताय कि यह संभव है कि एस्पिरिन की ज्यादा खुराक से ऐसा नीला निशान पड़ गया हो। एस्पिरिन खून को पतला करती है, जिससे हल्की चोट भी साफ दिखाती है और देर से भरती है। इस महीने की शुरुआत में दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने बताया था कि वह डॉक्टरों की सलाह से ज्यादा मात्रा में एस्पिरिन लेते हैं। उनका कहना था कि वह चाहते हैं कि दिल में खून आसानी से बहता रहे। उन्होंने इस ‘अच्छा पतला खून’ कहा था।
बात दें कि बीते साल भी ट्रंप के हाथ पर नीले निशान दिखाई दिए थे। तब व्हाइट हाउस ने कहा था कि वह लगातार लोगों से हाथ मिलाते हैं, इसलिए ऐसा होता है। 79 साल के ट्रंप अमेरिका के इतिहास में दूसरे सबसे उम्रदराज राष्ट्रपति हैं। उनसे पहले जो बाइडेन इस पद पर रहे, जो 82 साल की उम्र में पद छोड़कर गए थे। बाइडेन ने उम्र और सेहत पर उठते सवालों के चलते 2024 का चुनाव नहीं लड़ा था।
बेटे की भविष्यवाणी हुई सच: ब्रिटेन में जोम्बी नाइफ संस्कृति ने ली 16 साल के किशोर की जान
27 Jan, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ब्रिस्टल। किसी भी माँ के लिए उसका बच्चा उसकी पूरी दुनिया होता है, लेकिन अगर वही बच्चा अपनी मौत का अंदेशा बार-बार जताने लगे, तो यह किसी डरावने सपने से कम नहीं होता। ब्रिटेन के ब्रिस्टल शहर से एक ऐसी ही रूह कपा देने वाली घटना सामने आई है, जहाँ 16 साल के माइकी रोनन की उसके ही डर के अनुरूप हत्या कर दी गई। माइकी अक्सर अपनी माँ हेली से कहा करता था कि उसे डर लगता है कि कोई उसे चाकू मार देगा। वह अपने आसपास बढ़ते अपराधों और चाकूबाजी की घटनाओं को देखकर अपनी मौत की भविष्यवाणी पहले ही कर चुका था, जो अंततः एक खौफनाक हकीकत में बदल गई।
हादसे वाले दिन की यादें साझा करते हुए हेली ने बताया कि उस शाम माइकी एक हाउस पार्टी में जा रहा था। घर से निकलते वक्त उसने फोन पर अपनी माँ को लव यू मॉम कहा था, जो उसके आखिरी शब्द साबित हुए। हेली उस समय एक पुरस्कार समारोह में थीं और उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि उनका बेटा कुछ ही घंटों में इस दुनिया से चला जाएगा। समारोह खत्म होने के बाद जब उन्होंने अपना फोन देखा, तो उस पर 30 से अधिक मिस्ड कॉल थीं। घबराहट में वापस फोन करने पर माइकी के दोस्त ने चीखते हुए बताया कि उसे चाकू मार दिया गया है। जब तक हेली मौके पर पहुँचीं, पुलिस के घेरे और फॉरेंसिक टेंट ने यह साफ कर दिया था कि उनकी दुनिया उजड़ चुकी है।
पुलिस जांच में जो तथ्य सामने आए, वे बेहद विचलित करने वाले थे। माइकी की गर्दन पर जोम्बी नाइफ (एक अत्यंत घातक और बड़ा चाकू) से सिर्फ एक वार किया गया था, जो उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त था। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि माइकी का किसी भी आपराधिक गैंग से कोई संबंध नहीं था और न ही उसका कोई पिछला रिकॉर्ड था, वह बस संगीत का शौकीन एक सामान्य किशोर था। इस मामले में पुलिस ने 16 साल के शेन कनिंघम और उसके साथियों को गिरफ्तार किया। अदालत ने शेन को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है, जिसमें उसे कम से कम 16 साल जेल में बिताने होंगे।
अदालती फैसले के बावजूद हेली का दर्द कम नहीं हुआ है। उनका कहना है कि यह इंसाफ अधूरा है क्योंकि उनका बेटा कभी वापस नहीं आएगा, जबकि हत्यारा अपनी आधी उम्र बीतने से पहले ही जेल से बाहर आकर नई जिंदगी शुरू कर सकेगा। हेली अब सरकार से जोम्बी नाइफ जैसे खतरनाक हथियारों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग कर रही हैं ताकि किसी और परिवार को यह त्रासदी न झेलनी पड़े। विशेषज्ञों का भी मानना है कि वर्तमान में युवाओं के बीच अपराध का पैटर्न बदल गया है। अब किशोर अपनी सुरक्षा के नाम पर साथ में चाकू रखना एक सामान्य बात समझने लगे हैं, जिसके कारण छोटी सी बहस भी पल भर में कत्ल में तब्दील हो जाती है। यह घटना समाज में बढ़ती हिंसा और घातक हथियारों की आसान उपलब्धता पर एक गंभीर चेतावनी है।
10 साल पहले जापान में हुई एक घटना के बाद रोबोट्स को लेकर सवाल हुए खड़े
27 Jan, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
टोक्यो। क्या रोबोट्स भविष्य में इंसानों की जगह ले सकते हैं। यह सवाल लंबे समय से चर्चा में है। हालांकि भविष्य क्या होगा, यह वक्त बताएगा, लेकिन वर्तमान की हकीकत यह है कि आज दुनिया में करोड़ों रोबोट सक्रिय हैं। फैक्ट्रियों से लेकर होटल, मॉल, रेस्टोरेंट और अस्पतालों तक ऑटोमेशन तेजी से बढ़ रहा है।
आज से करीब एक दशक पहले जापान में दुनिया का पहला ‘रोबोट होटल’ शुरू हुआ था। यह होटल भविष्य की झलक जैसा था। रिसेप्शन पर इंसानों की जगह मुस्कुराते डायनासोर रोबोट्स मेहमानों का स्वागत करते थे। बिना चेहरे वाली मधुर आवाज चेक-इन प्रक्रिया समझाती थी और रोबोटिक पोर्टर मेहमानों का सामान उठाकर कमरों तक पहुंचाते थे। इस अनोखे अनुभव ने दुनियाभर के पर्यटकों का ध्यान खींचा और होटल अचानक चर्चा का केंद्र बन गया। लेकिन यह उत्साह ज्यादा समय तक नहीं टिक सका। कुछ ही महीनों में प्रयोग की सीमाएं सामने आने लगीं। होटल प्रबंधन और पर्यटकों दोनों के लिए रोबोट्स आकर्षण से ज्यादा परेशानी साबित हो रहे थे।
सबसे बड़ी समस्या कस्टमर अनुभव को लेकर सामने आई। रोबोट्स अलग-अलग भाषाओं और उच्चारणों को ठीक से समझ नहीं पाते थे। सामान लाने-ले जाने में तकनीकी गड़बड़ियां होती थीं और गलत कमांड फॉलो करने की शिकायतें आम हो गईं। रिसेप्शन पर तैनात रोबोट जटिल सवालों, बुकिंग में बदलाव या अचानक पैदा हुई समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रहे थे। हर छोटी-बड़ी दिक्कत पर इंसानी हस्तक्षेप जरूरी हो जाता था। इसके बाद धीरे-धीरे स्पष्ट हो गया कि रोबोट्स तयशुदा निर्देशों का पालन कर सकते हैं, लेकिन भावनाओं, सहानुभूति और रचनात्मक सोच के मामले में वे इंसानों की बराबरी नहीं कर सकते। इस प्रयोग की विफलता ने दुनिया को ऑटोमेशन को लेकर कई अहम सबक दिए। सबसे बड़ा सबक यह कि मशीनों पर अति-निर्भरता हर क्षेत्र में बेहतर परिणाम नहीं देती। खासकर सर्विस सेक्टर में, जहां इंसानी संपर्क, संवेदनशीलता और समस्या-समाधान सबसे अहम होते हैं।
आज, उस प्रयोग को लगभग 10 साल हो चुके हैं। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रोबोटिक्स के अनुसार, दुनिया में करीब 40 लाख फैक्ट्री रोबोट्स और 3.6 करोड़ सर्विस रोबोट्स सक्रिय हैं, जिनकी संख्या हर साल लगभग 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। चीन, जापान, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जर्मनी इस क्षेत्र में सबसे आगे हैं।
भारत सहित कई देशों में मॉल्स, होटल्स और रेस्टोरेंट्स में सर्विंग, डिलीवरी और रिसेप्शन रोबोट्स का प्रयोग हो रहा है। हालांकि अनुभव ने यह साफ कर दिया है कि रोबोट्स इंसानों के सहायक हो सकते हैं, लेकिन उनका पूर्ण विकल्प नहीं। दुनिया के पहले रोबोट होटल की कहानी हमें यही सिखाती है कि तकनीक की रफ्तार जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी है उसकी समझदारी भरी सीमाएं। ऑटोमेशन का भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन इंसानी भूमिका अब भी अपरिहार्य है।
अमेरिका के साथ चल रहे मतभेद बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाएं: रोड्रिग्ज
27 Jan, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
काराकास। वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज ने कहा है कि अमेरिका के साथ चल रहे मतभेदों को बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाया जाएगा। रविवार को उत्तर-पूर्वी वेनेजुएला प्यूर्टो ला क्रूज़ रिफाइनरी में तेल कर्मचारियों के साथ एक कार्यक्रम में रोड्रिग्ज ने कहा कि उनकी सरकार अमेरिका के साथ लंबे समय से चले आ रहे विवादों पर सीधे बातचीत करेगी। उन्होंने इसे बोलिवेरियन कूटनीति बताया।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रोड्रिग्ज ने कहा कि हम डरते नहीं हैं, क्योंकि एक देश के तौर पर हमें जो बात एकजुट करती है, वह इस देश के लिए शांति और स्थिरता की गारंटी देना है। उन्होंने कहा कि वेनेजुएला ने कभी यह नहीं सोचा था कि किसी दक्षिण अमेरिकी राजधानी पर किसी विदेशी ताकत द्वारा सैन्य हमला किया जाएगा। उन्होंने 3 जनवरी की उस घटना का ज़िक्र किया, जब अमेरिकी सेना ने काराकास पर हमला कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को जबरन उठा लिया था।
डेल्सी रोड्रिग्ज ने देश में एकता की अपील की और कहा कि आंतरिक मतभेदों को आपसी राजनीतिक संवाद से ही सुलझाया जाना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि इसमें किसी भी विदेशी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं। उन्होंने कहा कि वेनेजुएला के राजनेताओं को वाशिंगटन से आदेश मिलना बंद होना चाहिए। वेनेजुएला को अपने मतभेदों और संघर्षों को खुद ही सुलझाना चाहिए। इससे पहले शनिवार को डेल्सी रोड्रिग्ज ने विपक्ष से बातचीत की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि देश में शांति के लिए सभी पक्षों को मिलकर समझौते करने चाहिए।
फिलीपींस में यात्रियों से भी फेरी समुद्र में डूबी, 13 की मौत, 100 से ज्यादा लापता
27 Jan, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मनीला। दक्षिणी फिलीपींस के बासिलान प्रांत के पास समुद्र में एक द्वीपों के बीच चलने वाली फेरी डूब गई। इस फेरी में यात्रियों और कर्मचारियों समेत 300 से ज्यादा लोग सवार थे। मीडिया रिपोर्ट में अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि अब तक कम से कम 13 शव बरामद हुए हैं, जबकि 100 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण-पश्चिमी मिंडानाओ में फिलीपींस तटरक्षक बल ने बताया कि यह फेरी जाम्बोआंगा शहर से सुलु प्रांत के जोलो द्वीप जा रही थी। इसी दौरान बासिलान प्रांत के हाजी मुतामद इलाके में स्थित बालुकबालुक द्वीप के पास यह हादसा हुआ। सोमवार सुबह तक बचाव दल ने समुद्र से कम से कम 13 शव निकाल लिए हैं। वहीं तटरक्षक बल, नौसेना के जहाजों और आसपास मौजूद मछली पकड़ने वाली नौकाओं की मदद से दर्जनों लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है।
कोस्ट गार्ड ने बताया कि 244 यात्रियों को बचा लिया गया है। फेरी के डूबने की वजह फिलहाल साफ नहीं हो सकी है। इस मामले की जांच की जाएगी। तटरक्षक बल का कहना है कि रवाना होने से पहले जाम्बोआंगा बंदरगाह पर फेरी की जांच की गई थी और ज्यादा भार होने के कोई संकेत नहीं मिले थे। बचे हुए लोगों की सही संख्या अभी भी जांची जा रही है। खोज और बचाव अभियान लगातार जारी है। खराब समुद्री हालात के बावजूद विमान और समुद्री साधनों को इलाके में तैनात किया गया है।
अधिकारियों का कहना है कि हादसे की असली वजह जांच के बाद ही सामने आएगी। फिलीपींस द्वीप समहू में समुद्री हादसे अक्सर होते रहते हैं। इसकी बड़ी वजहें हैं- बार-बार आने वाले तूफान, ठीक से रखरखाव न की गई नावें, ज़्यादा भीड़ और सुरक्षा नियमों को सख्ती से लागू न किया जाना, खासकर दूर-दराज के इलाकों में। इससे पहले दिसंबर 1987 में भी फिलीपींस में एक बड़ा समुद्री हादसा हुआ था, जब डोना पाज़ नाम की फेरी एक ईंधन टैंकर से टकरा गई थी। उस हादसे में 4,300 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और उसे शांतिकाल का दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री हादसा माना जाता है।
खोले राज: वेनेजुएला की कैबिनेट से कहा- यूएस की शर्तें मानो या मौत के लिए तैयार रहो
26 Jan, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कराकस। वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी और उसके बाद हुए अचानक सत्ता परिवर्तन को लेकर एक ऐसा खुलासा हुआ है जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लीक हुई रिकॉर्डिंग में सुनाई देने वाली आवाज वेनेजुएला की वर्तमान कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज की बताई जा रही है। लगभग छह मिनट की इस बातचीत में वह उस खौफनाक मंजर का जिक्र कर रही हैं जब मादुरो की गिरफ्तारी के तुरंत बाद अमेरिकी बलों ने उन्हें और कैबिनेट के अन्य शीर्ष मंत्रियों को केवल 15 मिनट का समय दिया था।
3 जनवरी की उस भयावह रात, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर मादुरो को उनके देश से उठाकर अमेरिका ले जाया गया, उस वक्त सत्ता के गलियारों में क्या खेल चल रहा था, इसकी परतें अब एक लीक ऑडियो के जरिए खुल रही हैं। यह ऑडियो गवाही दे रहा है कि उस रात वेनेजुएला की कमान डगमगा गई थी और शीर्ष नेताओं को मौत का डर दिखाकर फैसले लेने पर मजबूर किया गया था।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लीक हुई रिकॉर्डिंग में सुनाई देने वाली आवाज वेनेजुएला की वर्तमान कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज की बताई जा रही है। लगभग छह मिनट की इस बातचीत में वह उस खौफनाक मंजर का जिक्र कर रही हैं जब मादुरो की गिरफ्तारी के तुरंत बाद अमेरिकी बलों ने उन्हें और कैबिनेट के अन्य शीर्ष मंत्रियों को केवल 15 मिनट का समय दिया था। अल्टीमेटम साफ था—या तो वॉशिंगटन की शर्तों को स्वीकार करो या मौत के लिए तैयार रहो। इस ऑडियो ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह महज एक कानूनी कार्रवाई थी या फिर डर और ब्लैकमेल के दम पर किया गया एक पूर्व नियोजित तख्तापलट। ऑडियो में रोड्रिगेज यह कहती सुनाई दे रही हैं कि धमकियां पहले ही मिनट से शुरू हो गई थीं। उनके अनुसार, अमेरिकी सैनिकों ने यह तक झूठ फैलाया कि मादुरो को सिर्फ गिरफ्तार नहीं किया गया, बल्कि उन्हें मार दिया गया है। यह सुनकर गृह मंत्री डियोसदादो काबेलो सहित कई वरिष्ठ नेता बुरी तरह सहम गए थे और किसी भी अंजाम को भुगतने के लिए तैयार थे। रिकॉर्डिंग में सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के बीच फैला भय, असमंजस और लाचारी स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है।
हालांकि, इस घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू और भी चौंकाने वाला है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह दावा किया जा रहा है कि डेल्सी रोड्रिगेज नवंबर 2025 से ही अमेरिकी अधिकारियों के साथ गुप्त बातचीत कर रही थीं। उसी दौरान तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से मादुरो को सत्ता छोड़ने की चेतावनी दी थी। रिपोर्ट्स की मानें तो रोड्रिगेज ने कथित तौर पर पहले ही संकेत दे दिए थे कि मादुरो का जाना तय है और वे अराजकता को रोकने के लिए अमेरिका के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं। मादुरो की गिरफ्तारी के समय कई तरह की अफवाहें भी उड़ी थीं। पहले कहा गया कि रोड्रिगेज मॉस्को भाग गई हैं, फिर उनके मारगारिटा आइलैंड पर होने की खबर आई। अंततः 5 जनवरी को वह कराकस लौटीं और कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में पद की शपथ ली। उनके भाई जॉर्ज रोड्रिगेज को भी नई व्यवस्था में महत्वपूर्ण पद दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सब उस ट्रांजिशन फ्रेमवर्क का हिस्सा था, जिसकी पटकथा महीनों पहले ही लिखी जा चुकी थी। फिलहाल मादुरो अमेरिका की हिरासत में हैं और उन पर गंभीर आरोपों में मुकदमा चल रहा है, लेकिन वेनेजुएला की सत्ता में उस रात हुई इस डील ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
ट्रंप का खुलासा: अमेरिका के गुप्त हथियार डिस्कॉम्बोबुलेटर ने वेनेजुएला में मचाई थी तबही
26 Jan, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने बयानों से वैश्विक रक्षा जगत में खलबली मचा दी है। ट्रंप ने अमेरिका के एक ऐसे गुप्त और अदृश्य हथियार का खुलासा किया है, जिसका इस्तेमाल हाल ही में वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के गुप्त मिशन में किया गया था। इस हथियार का नाम डिस्कॉम्बोबुलेटर बताया गया है। ट्रंप के अनुसार, यह कोई पारंपरिक मिसाइल या बम नहीं है, बल्कि एक ऐसा घातक अस्त्र है जो बिना किसी शोर-शराबे या रोशनी के दुश्मन को पूरी तरह से लकवाग्रस्त कर देता है।
डिस्कॉम्बोबुलेटर तकनीकी रूप से एक पल्स्ड एनर्जी वेपन है। यह हथियार बारूद की जगह अत्यधिक शक्तिशाली ऊर्जा तरंगें छोड़ता है। राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि वेनेजुएला में इस हथियार के प्रभाव से वहां तैनात रूस और चीन के उन्नत सैन्य उपकरणों ने काम करना बंद कर दिया था। जब अमेरिकी कमांडो मादुरो को पकड़ने के लिए आगे बढ़ रहे थे, तब वेनेजुएला की सेना के रडार, रेडियो और डिफेंस सिस्टम पूरी तरह जाम हो गए थे। वहां के सैनिक अपने रॉकेट दागने के लिए बटन दबाते रह गए, लेकिन तकनीकी ब्लैकआउट की वजह से पूरा सिस्टम ठप पड़ा रहा।
यह हथियार केवल मशीनों ही नहीं, बल्कि इंसानी शरीर और दिमाग पर भी घातक प्रहार करता है। जानकारों के मुताबिक, यह हथियार ऐसी सोनिक या माइक्रोवेव लहरें उत्सर्जित करता है जो सीधे मनुष्य के नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) पर हमला करती हैं। इसके प्रभाव से व्यक्ति पूरी तरह भ्रमित हो जाता है और उसके शरीर की गतिशीलता खत्म हो जाती है। वेनेजुएला के एक सुरक्षाकर्मी के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, हमले के वक्त उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका सिर फटने वाला हो। सैनिकों की नाक से खून बहने लगा और कई लोग खून की उल्टियां करने लगे। बिना एक भी गोली चले, सैकड़ों सैनिक जमीन पर गिर पड़े और हिलने-डुलने तक के काबिल नहीं रहे।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप द्वारा इस गुप्त तकनीक का सार्वजनिक रूप से नाम लेना दुनिया के अन्य प्रतिद्वंद्वी देशों, विशेषकर ईरान के लिए एक बड़ी चेतावनी है। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका आने वाले समय में अपने इसी ब्रह्मास्त्र का उपयोग ईरान के खिलाफ भी कर सकता है। अदृश्य रहकर दुश्मन की तकनीक और सेना को अपाहिज बना देने वाला यह हथियार युद्ध के पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखता है। फिलहाल, इस खुलासे के बाद रूस और चीन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन इस डिस्कॉम्बोबुलेटर ने आधुनिक युद्ध कौशल की नई और खौफनाक परिभाषा जरूर लिख दी है।
आव्रजन कार्रवाई के दौरान संघीय अधिकारियों ने की गोलीबारी, एक व्यक्ति की मौत
26 Jan, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की सख्त आव्रजन नीति के बीच मिनियापोलिस में संघीय अधिकारियों द्वारा की गई गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत हो गई। इस घटना के बाद शहर में तनाव का माहौल बन गया और बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरकर आव्रजन कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे।
मिनेसोटा के गवर्नर टिम वाल्ज ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया, कि यह गोलीबारी ट्रंप प्रशासन की आव्रजन संबंधी कार्रवाई के दौरान हुई। अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार, गोली लगने से 51 वर्षीय व्यक्ति की मौत हो गई। हालांकि, घटना से जुड़ा विस्तृत विवरण अभी सामने नहीं आया है और यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि गोलीबारी किन परिस्थितियों में की गई।
इसी बीच सुरक्षा विभाग के एक प्रवक्ता ने दावा किया कि मारे गए व्यक्ति के पास हथियार और कारतूस मौजूद थे। विभाग का कहना है कि संघीय अधिकारियों ने अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कार्रवाई की। वहीं, स्थानीय प्रशासन और मानवाधिकार संगठनों ने इस दावे पर सवाल उठाए हैं और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
दमनकारी आव्रजन कार्रवाई बंद करने की अपील
गवर्नर टिम वाल्ज ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए बताया कि गोलीबारी की घटना के तुरंत बाद उन्होंने व्हाइट हाउस से संपर्क किया। उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मिनेसोटा में चल रही, उनके शब्दों में, “दमनकारी आव्रजन कार्रवाई” को समाप्त करने की अपील की। वाल्ज ने कहा कि इस तरह की कार्रवाइयों से राज्य में डर और असुरक्षा का माहौल बन रहा है, जो सामाजिक सौहार्द के लिए खतरनाक है। गौरतलब है कि घटना के विरोध में हजारों लोग कड़ाके की ठंड के बावजूद मिनियापोलिस की सड़कों पर उतर आए थे। प्रदर्शनकारियों ने संघीय प्रवर्तन अधिकारियों के खिलाफ नारेबाजी की और उनसे शहर छोड़ने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आव्रजन के नाम पर निर्दोष लोगों को निशाना बनाया जा रहा है और बल प्रयोग किया जा रहा है।
ट्रंप की धमकी! अगर चीन से व्यापार समझौता किया तो 100 फीसदी टैरिफ लगा दूंगा
26 Jan, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब कनाडा को चेतावनी दी है कि अगर उसने चीन के साथ व्यापार समझौता बढ़ाया, तो अमेरिका आने वाले सभी सामानों पर 100 फीसदी टैरिफ लगा देगा। वहीं इसके जवाब में कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने भी पलटवार किया और अपने देशवासियों से कनाडा में ही बने सामान खरीदने और स्थानीय उद्योगों को मजबूत करने की अपील की है।
ट्रंप की यह चेतावनी ऐसे समय में आई है, जब कनाडा के पीएम मार्क कार्नी हाल ही में चीन गए थे। इस दौरे में दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत कनाडा ने चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों पर लगाए गए टैक्स को कम करने का फैसला किया। बदले में चीन ने कनाडा के कृषि उत्पादों पर लगाए गए टैक्स घटाने पर सहमति जताई। इस समझौते के बाद ट्रंप और ज्यादा भड़क गए। उन्होंने प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि अगर कनाडा चीन के सामान को अमेरिका भेजने का रास्ता बनता है, तो अमेरिका इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा।
ट्रंप ने यह भी कहा कि अगर कनाडा ने चीन के साथ सौदा किया, तो चीन धीरे-धीरे कनाडा के कारोबार, समाज और जीवनशैली को नुकसान पहुंचा सकता है। उन्होंने साफ कहा कि ऐसा होते ही अमेरिका कनाडा के सभी उत्पादों पर 100 फीसदी टैरिफ लगा देगा। अमेरिका और कनाडा के रिश्ते उस समय से खराब होते जा रहे हैं, जब से ट्रंप दोबारा राष्ट्रपति बने हैं। ट्रंप पहले भी कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने जैसी बातें कर चुके हैं और ग्रीनलैंड को लेकर भी विवादित बयान दे चुके हैं। इसी बीच ट्रंप की धमकी के जवाब में पीएम कार्नी ने बाई कैनेडियन नीति को आगे बढ़ाने की बात कही है। उन्होंने कहा कि कनाडा को अपने देश में बने सामान खरीदने, स्थानीय उद्योगों को मजबूत करने और आत्मनिर्भर बनने पर ध्यान देना चाहिए।
कार्नी ने एक्स पर एक वीडियो शेयर करते हुए कहा कि कनाडाई लोगों को अपने पैसे कनाडाई कंपनियों और कामगारों पर खर्च करने चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार भी अब इसी दिशा में काम कर रही है। इन हालातों को देखते हुए कनाडा अब अमेरिका पर कम निर्भर होना चाहता है। कनाडा ने लक्ष्य रखा है कि वह 2030 तक चीन को अपने निर्यात में 50 फीसदी की बढ़ोतरी करेगा। पीएम कार्नी ने कहा कि आने वाले सालों में कनाडा अमेरिका के अलावा दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ाएगा। खबर है कि वे जल्द भारत का दौरा भी कर सकते हैं।
अमेरिकी हमले की आशंका के चलते खामेनेई अंडरग्राउंड, बेटे ने संभाली ईरान की कमान
26 Jan, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तेहरान। ईरान और अमेरिका के बीच टकराव की आशंका बढ़ती जा रही है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई को तेहरान में एक विशेष अंडरग्राउंड शेल्टर में शिफ्ट किया गया है। रिपोर्ट में सरकार के करीबी सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि वरिष्ठ सैन्य और सुरक्षा अधिकारियों ने संभावित अमेरिकी हमले की आशंका को गंभीर खतरे के रूप में आंका है, जिसके बाद यह फैसला लिया गया। इस बीच खामेनेई ने अपने बेटे को कार्यकारी रुप से कमान सौंप दी है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यह अंडरग्राउंड सुविधा एक अत्यधिक सुरक्षित और मजबूत ठिकाना है, जिसमें आपस में जुड़े कई सुरंगनुमा रास्ते मौजूद हैं। सूत्रों ने दावा किया कि खामेनेई के तीसरे बेटे मसूद खामेनेई फिलहाल सुप्रीम लीडर के कार्यालय के जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और वही सरकार की कार्यकारी शाखाओं के साथ मुख्य संपर्क का जरिया बने हुए हैं। इसी बीच अमेरिका ने मिडिल ईस्ट की ओर अपनी सैन्य तैनाती और तेज कर दी है। अमेरिकी नौसेना का अब्राहम लिंकन जहाज फिलहाल हिंद महासागर में मौजूद है और इसके आने वाले दिनों में अरब सागर या फारस की खाड़ी तक पहुंचने की संभावना है।
इस कैरियर स्ट्राइक ग्रुप में एफ-35सी स्टील्थ फाइटर जेट्स और एफ/ए-18ई सुपर हॉर्नेट विमानों को तैनात किया गया है। इसके अलावा अमेरिका ने एफ-15ई स्ट्राइक ईग्लस और ब्रिटेन ने टाइफून फाइटर जेट्स भी क्षेत्र में भेजे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और वरिष्ठ अधिकारियों ने इस तैनाती को एहतियाती कदम और शक्ति प्रदर्शन बताया है। उनका कहना है कि यह कदम ईरान को आगे किसी भी तरह के उकसावे से रोकने के लिए उठाया गया है, खासतौर पर प्रदर्शनों पर कार्रवाई और परमाणु कार्यक्रम को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच।
वहीं ईरान ने कड़ा रुख अपनाया हुआ है। ईरानी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि किसी भी तरह का सैन्य हमला, चाहे वह सीमित ही क्यों न हो, उसे ऑल-आउट वॉर माना जाएगा। इसके साथ ही ईरान ने अपनी सेनाओं को हाई अलर्ट कर दिया है। खामेनेई के अंडरग्राउंड शेल्टर में जाने की खबर को इसी बढ़ते खतरे के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
आज तक किसी भी विदेशी ताकत का गुलाम नहीं बना भूटान
25 Jan, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
थिम्फू । क्या आप जानते हैं कि दुनिया में एक ऐसा देश भी है, जो आज तक किसी भी विदेशी ताकत का गुलाम नहीं बना और माना जाता है कि भविष्य के बड़े युद्धों का असर भी उस पर बेहद सीमित रहेगा? यह देश है भूटान। हिमालय की गोद में बसा यह छोटा-सा राष्ट्र, जिसे “थंडर ड्रैगन का देश” कहा जाता है, इस बात का जीवंत उदाहरण है कि आकार में छोटा होना कमजोरी नहीं होता। भूटान उन गिने-चुने देशों में शामिल है, जिसे न तो ब्रिटिश साम्राज्य गुलाम बना सका, न मुगल और न ही कोई अन्य विदेशी शक्ति। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह इसकी भौगोलिक स्थिति है। चारों ओर ऊंचे-ऊंचे हिमालयी पर्वत, दुर्गम पहाड़ियां और घने जंगल इसे एक प्राकृतिक किले की तरह सुरक्षा प्रदान करते हैं। सदियों तक भूटान ने बाहरी दुनिया से दूरी बनाए रखी और इसी अलग-थलग नीति ने उसे बड़े युद्धों और आक्रमणों से दूर रखा। भूटान की ताकत सिर्फ उसकी भौगोलिक बनावट तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी राजनीतिक सोच भी उतनी ही अहम है। यह देश हमेशा से तटस्थता की नीति पर चलता आया है। वह किसी बड़े सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है और न ही अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में दखल देता है। भारत और चीन जैसे दो बड़े देशों के बीच स्थित होने के बावजूद, भूटान ने दोनों के साथ संतुलित और शांतिपूर्ण रिश्ते बनाए रखे हैं। यही कारण है कि किसी भी वैश्विक युद्ध की स्थिति में भूटान एक कम आकर्षक और गैर-रणनीतिक लक्ष्य माना जाता है। भूटान की एक और अनोखी पहचान उसका विकास मॉडल है। यहां सकल घरेलू उत्पाद से ज्यादा महत्व सकल राष्ट्रीय खुशी, यानी ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस को दिया जाता है।
1970 के दशक में भूटान के चौथे राजा जिग्मे सिंगये वांगचुक ने यह विचार दिया कि किसी देश की प्रगति सिर्फ धन से नहीं, बल्कि लोगों की खुशी, पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक शांति से मापी जानी चाहिए। इसी सोच का नतीजा है कि भूटान आज दुनिया का पहला कार्बन नेगेटिव देश है। यहां 70 प्रतिशत से अधिक भूमि जंगलों से ढकी है और संविधान में यह प्रावधान है कि कम से कम 60 प्रतिशत क्षेत्र हमेशा वन क्षेत्र ही रहेगा। यदि तीसरा विश्व युद्ध होता भी है, तो भूटान के अपेक्षाकृत सुरक्षित रहने की कई वजहें हैं। यहां न तो बड़े सैन्य अड्डे हैं, न तेल या गैस जैसे रणनीतिक संसाधन। देश काफी हद तक आत्मनिर्भर है—हाइड्रोपावर से ऊर्जा और जैविक खेती से भोजन की जरूरतें पूरी होती हैं। सबसे अहम बात यह है कि भूटान के पास लूटने या कब्जा करने लायक कुछ नहीं, सिवाय शांति, प्रकृति और खुशहाली के। यही कारण है कि युद्ध और हिंसा से भरी दुनिया में भूटान आज भी एक शांत, सुरक्षित और अनोखा उदाहरण बना हुआ है।
ज्ञात हो कि आज की दुनिया युद्ध, संघर्ष और अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर मध्य-पूर्व और अमेरिका की सैन्य कार्रवाइयों तक, वैश्विक तनाव लगातार बढ़ रहा है। इतिहास गवाह है कि अब तक दुनिया दो विश्व युद्ध देख चुकी है और मौजूदा हालात को देखकर तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाएं भी जताई जा रही हैं। बीते समय में शक्तिशाली देशों ने कमजोर राष्ट्रों पर कब्जा किया, उन्हें गुलाम बनाया और अपने साम्राज्य का विस्तार किया। भारत खुद सैकड़ों वर्षों तक ब्रिटिश गुलामी झेल चुका है।
दो विशाल ब्लैक होल लगा रहे एक-दूसरे के चारों ओर परिक्रमा
25 Jan, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन । इवेंट होराइजन टेलीस्कोप (ईएचटी) ने ब्रम्हांड में पहली बार दो सुपरमैसिव ब्लैक होल के बीच हो रहे एक हिंसक और जटिल ‘डांस’ को रिकॉर्ड किया है। खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार, यह अद्भुत खगोलीय घटना पृथ्वी से लगभग 1.6 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित ओजे287 नामक क्वासर के केंद्र में घटित हो रही है।
इस खोज ने न सिर्फ खगोल विज्ञान की दुनिया में हलचल मचा दी है, बल्कि ब्लैक होल से जुड़ी हमारी अब तक की समझ को भी चुनौती दे दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार ओजे287 क्वासर के केंद्र में दो बेहद विशाल ब्लैक होल एक-दूसरे के चारों ओर परिक्रमा कर रहे हैं। इस खतरनाक गुरुत्वाकर्षणीय खेल के दौरान उनसे अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा की किरणें, जिन्हें जेट कहा जाता है, बाहर की ओर फूट रही हैं। ईएचटी द्वारा दर्ज की गई तस्वीरों और आंकड़ों में इन जेट्स के भीतर एक असामान्य घुमावदार संरचना देखी गई है। ऊर्जा की ये किरणें किसी सीधे रास्ते पर न जाकर सर्पिल या कुंडली की तरह मुड़ती हुई दिखाई दीं, जिसे वैज्ञानिक अब तक कभी इतनी स्पष्टता से नहीं देख पाए थे। इस शोध की सबसे बड़ी उपलब्धि ब्लैक होल जेट के भीतर ‘हेलिकल’ यानी सर्पिल चुंबकीय क्षेत्र की पुष्टि है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि जेट्स के भीतर ऊर्जा की लहरें अलग-अलग गति से आगे बढ़ रही हैं। जब ये लहरें एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र से टकराती हैं, तो उनके बीच अस्थिरता पैदा होती है। इस प्रक्रिया को भौतिकी में ‘केल्विन-हेल्महोल्ट्ज़ अस्थिरता’ कहा जाता है, जो ठीक उसी तरह काम करती है जैसे तेज हवा पानी की सतह पर लहरें बना देती है। इसी कारण ब्लैक होल से निकलने वाली ऊर्जा और रोशनी हमें मुड़ी हुई और घूमती हुई नजर आती है। इवेंट होराइजन टेलीस्कोप की अभूतपूर्व क्षमता ने इस खोज को संभव बनाया। वैज्ञानिकों के मुताबिक ईएचटी इतनी बारीकी से देख सकता है कि मानो चंद्रमा पर रखी एक टेनिस बॉल को पहचान ले। अप्रैल 2017 में केवल पांच दिनों के अंतराल पर ली गई दो तस्वीरों में जेट की संरचना और उसके ध्रुवीकरण में बड़े बदलाव दर्ज किए गए। इतनी कम अवधि में ब्लैक होल के व्यवहार में आए इन परिवर्तनों को पकड़ पाना अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है।
यह खोज पुराने सिद्धांतों पर भी सवाल खड़े करती है। अब तक माना जाता था कि ब्लैक होल जेट्स का घूमना ‘प्रेसेशन मॉडल’ यानी उनकी डगमगाहट के कारण होता है। लेकिन नए अवलोकनों से संकेत मिलता है कि यह घुमाव ब्लैक होल के भीतर चल रही जटिल भौतिक प्रक्रियाओं और चुंबकीय शक्तियों का नतीजा है। जेट के भीतर मौजूद कणों की ऊर्जा चुंबकीय बल से कहीं अधिक शक्तिशाली पाई गई, जिससे इस तरह की अस्थिरता जन्म लेती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में ब्लैक होल की संरचना, उनके विकास और ब्रह्मांड पर उनके प्रभाव को समझने में एक नई दिशा देगी।
आम चुनावों में 51 दलों में से 30 ने एक भी महिला को नहीं बनाया उम्मीदवार
25 Jan, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ढाका,। बांग्लादेश में राजनीति से महिलाओं की भागीदारी खत्म होती जा रही है। बांग्लादेश के सियासी इतिहास के पन्नों पर दो ऐसे नाम दर्ज हैं, जिन्होंने देश को एक नई दिशा दी। बांग्लादेश की सियासत का इतिहास खालिदा जिया और शेख हसीना के नाम के बिना अधूरा है। इसके बावजूद आज यहां पर महिलाओं की भागीदारी खत्म होती जा रही है। बांग्लादेश में इस साल 12 फरवरी को होने वाले चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या ना के बराबर है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और उन्हें सशक्त करने के वादे दशकों से किए जा रहे हैं, लेकिन फिर भी आगामी चुनाव में उनकी भूमिका की अलग तस्वीर नजर आ रही है। बांग्लादेशी मीडिया के मुताबिक जमात-ए-इस्लामी समेत 30 से ज्यादा पंजीकृत राजनीतिक दलों ने कोई भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा है। 13वें संसदीय चुनाव में सभी उम्मीदवारों में महिलाओं की संख्या 4.5फीसदी से भी कम है। यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है।
चुनाव के लिए जमा किए गए 2,568 नामांकन में सिर्फ 109 महिलाओं ने अपना नॉमिनेशन दाखिल किया है। आंकड़ों के मुताबिक 2,568 नामांकन में महिलाओं की संख्या सिर्फ 4.24 फीसदी है। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि आने वाले आम चुनाव में हिस्सा ले रही 51 राजनीतिक दलों में से 30 ने एक भी महिला उम्मीदवार को प्रतिनिधि नहीं बनाया है। स्क्रूटनी के दौरान कई महिला उम्मीदवारों ने अपनी उम्मीदवारी खो दी। 37 निर्दलीय महिला उम्मीदवारों में से, सिर्फ छह के नॉमिनेशन वैद्य घोषित किए गए।
रिपोर्ट के मुताबिक जमात-ए-इस्लामी से 276 उम्मीदवार, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश से 268, जातीय पार्टी से 224, गण अधिकार परिषद से 104, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस से 94, और दूसरी छोटी पार्टियों में जिनमें से हर एक में 40 से कम उम्मीदवार हैं, लेकिन इनमें कोई महिला उम्मीदवार नहीं है। महिलाओं, मानवाधिकार और विकास के मुद्दों पर काम करने वाले 71 संगठनों के एक प्लेटफॉर्म, सोशल रेजिस्टेंस कमेटी, ने आने वाले चुनाव में महिला उम्मीदवारों की कम संख्या पर चिंता जताते हुए कहा कि समाज में मौजूद औरतों से नफरत करने वाली संस्कृति को देखते हुए, महिलाएं निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने में हिचकिचा रही हैं। महिलाओं की सियासत में भागीदारी कम होने की वजह वहां पर पुरुष-प्रधान राजनीतिक कल्चर की झलक और पुरुषों के दबदबे वाली राजनीति, पुरुष-प्रधान समाज वाली विचारधारा को बनाए रखने की नीति है।
बांग्लादेश में अमेरिका का नया दांव- जमात-ए-इस्लामी से बढ़ाई नजदीकियां
25 Jan, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन। बांग्लादेश के बदलते राजनीतिक परिदृश्य के बीच अमेरिका की एक कथित नई रणनीति ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। कट्टरपंथ के खिलाफ वैश्विक स्तर पर सख्त रुख अपनाने वाला अमेरिका अब बांग्लादेश की प्रमुख इस्लामी पार्टी, जमात-ए-इस्लामी को साधने की कोशिश करता नजर आ रहा है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ढाका में तैनात एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक की कुछ महिला पत्रकारों के साथ बंद कमरे में हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने आई है, जिसमें जमात-ए-इस्लामी के प्रति अमेरिका के बदलते रुख के संकेत मिलते हैं। इस बातचीत में राजनयिक ने स्वीकार किया कि बांग्लादेश धीरे-धीरे इस्लामिक शिफ्ट की ओर बढ़ रहा है और आगामी 12 फरवरी को होने वाले चुनावों में जमात-ए-इस्लामी अपने अब तक के सबसे शानदार प्रदर्शन की ओर अग्रसर हो सकती है। अमेरिकी राजनयिक ने यहाँ तक कहा कि अमेरिका चाहता है कि जमात उसके दोस्त बने और उन्होंने पत्रकारों को सुझाव दिया कि पार्टी की प्रभावशाली छात्र इकाई, इस्लामी छात्र शिबिर को मीडिया में उचित स्थान दिया जाना चाहिए।
जमात-ए-इस्लामी का इतिहास बांग्लादेश में काफी विवादास्पद रहा है। यह वही संगठन है जिसने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का पुरजोर विरोध किया था और लंबे समय तक इस पर प्रतिबंध लगा रहा। पार्टी शरिया आधारित शासन की कट्टर समर्थक रही है और उस पर अक्सर पाकिस्तान समर्थक रुख अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में जमात ने अपनी छवि बदलने की कोशिश की है और खुद को भ्रष्टाचार विरोधी व सुधार केंद्रित दल के रूप में पेश कर रही है ताकि मुख्यधारा के मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ा सके। अमेरिकी राजनयिक ने बैठक में यह भी स्पष्ट किया कि यदि जमात सत्ता में आने के बाद महिलाओं पर पाबंदियां लगाने या शरिया कानून थोपने जैसे चरम कदम उठाती है, तो अमेरिका मूकदर्शक नहीं बना रहेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे किसी भी प्रयास की स्थिति में अमेरिका अपने आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल करेगा और बांग्लादेश पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लगा सकता है, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।
हालांकि, इस विवाद के तूल पकड़ने के बाद ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि यह एक सामान्य और अनौपचारिक चर्चा थी और अमेरिका किसी विशेष राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करता। दूसरी ओर, जमात के प्रवक्ताओं ने भी इसे एक व्यक्तिगत अवलोकन मात्र बताकर खारिज करने की कोशिश की है। लेकिन अमेरिका की इस कथित गुप्त कूटनीति ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत लंबे समय से जमात-ए-इस्लामी को क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में देखता रहा है, विशेषकर उसके पाकिस्तान के साथ कथित संबंधों और कट्टरपंथी विचारधारा के कारण। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध पहले से ही तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में अमेरिका का जमात के साथ सहयोग बढ़ाना भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंधों में एक नई दरार पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि अटलांटिक काउंसिल जैसे संस्थानों की राय में बांग्लादेश को लेकर भारत की सबसे बड़ी चिंता हमेशा से जमात रही है। यदि वाशिंगटन अपनी नीति में बदलाव करते हुए जमात-ए-इस्लामी को राजनीतिक मुख्यधारा में वैधता दिलाने में मदद करता है, तो इसका असर केवल बांग्लादेश की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। यह दक्षिण एशिया के पूरे भू-राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करेगा और भारत के लिए अपनी सीमाओं पर सुरक्षा चुनौतियों को और अधिक जटिल बना सकता है। कुल मिलाकर, अमेरिका की यह नई पहल एक ऐसे मोड़ पर आई है जहाँ बांग्लादेश अपनी लोकतांत्रिक पहचान और बढ़ते धार्मिक प्रभाव के बीच संघर्ष कर रहा है।
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