धर्म एवं ज्योतिष
विजेता बनना है तो धारण करें वैजयंती माला
5 Jun, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
धर्म में सफल होने के लिए पूजा पाठ और हवन के साथ ही कई अन्य उपाय भी है। धर्म शास्त्रों के अनुसार
वैजयंती माला- एक ऐसी माला जो सभी कार्यों में विजय दिला सकती है। इसका प्रयोग भगवान श्री कृष्ण माता दुर्गा, काली और दूसरे कई देवता करते थे। रत्न के जानकार मानते हैं कि अगर इस माला को सही विधि-विधान के साथ प्राण प्रतिष्ठित करके धारण किया जाए तो इसके परिणाम आपको तत्काल मिल सकते हैं। कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो जिसमें रुकावट आएगी।
वैजयंती माला को धारण करने वाला इंद्र के समान सारे वस्त्रों को जीतने वाला बन जाता है और श्री कृष्ण के समान सभी को मोहित करने वाला बन जाता है और महर्षि नारद के समान विद्वान बन जाता है। इस सिद्ध माला को धारण करने वाला हर जगह विजय प्राप्त करता है। उसके सर्व कार्य अपने आप बनते चले जाते हैं । यदि किसी काम में लंबे समय से बाधा आ रही है तो वह काम आसानी से बन जाता है। यह माला शत्रुओं का नाश भी करती है। वैजयंती माला को सिद्ध करने के लिए इसी विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए। पूरा फल पाने के लिए जरूरी है कि माला सही विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठा के बाद ही पहनी चाहिए।
आज का राशिफल: जानिए क्या कहती हैं आपकी किस्मत की सितारे
5 Jun, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- दैनिक व्यवसाय गति में सुधार तथा योजनाएं फलीभूत होगी।
वृष राशि :- दैनिक क्षमता में वृद्धि, सफलता एवं प्रभुत्व के योग अवश्य ही बनेंगे।
मिथुन राशि :- आर्थिक योजना पूर्ण होंगे, कार्यक्षमता में वृद्धि, इष्ट मित्रों से सुख सहयोग मिलेगा।
कर्क राशि :- व्यवसाय अनुकूल, चिन्ताएं कम होगी, इष्ट मित्र सुखवर्धक होंगे।
सिंह राशि :- धन लाभ, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा तथा कार्यवृत्ति में सुधार होगा।
कन्या राशि :-कुछ समस्याएं सुलझे, कुछ पैदा होगी तथा कार्य वृत्ति में सुधार अवश्य होगा।
तुला राशि :- कार्य व्यवसाय क्षमता कुछ अनुकूल हो, आशाओं से सफलता के कार्य बनेंगे।
वृश्चिक राशि :- धनालाभ आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, बिगड़े कार्य अवश्य बनेंगे।
धनु राशि :- प्रत्येक कार्य में विलंब संभव, धन का लाभ, आशानुकूल सफलता होगी|
मकर राशि :- आरोप प्रत्यारोप, क्लेश संभव, धन लाभ आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा|
कुंभ राशि :- सफलता के साधन जुटाए, समय ऐशो आराम से बीतेगा, ध्यान रखे|
मीन राशि :- किसी तनाव क्लेश से बचिए, क्लेश व अशांति मन में अवश्य होगी।
जब भगवान ने की चोरों के भागने में मदद... 700 साल पुराना रहस्यमयी मंदिर, हुई कई चमत्कारी घटनाएं!
4 Jun, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जयपुर के आसपास छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में कई वर्षों पुराने ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिर हैं. इनमें से एक मंदिर जयपुर शहर से 55 किलोमीटर दूर रूपाड़ी गांव में स्थित है. यहां का 700 वर्ष पुराना मंशा माता मंदिर अपने चमत्कारों और इतिहास की रोचक घटनाओं के कारण विशेष पहचान रखता है. इस मंदिर को चमत्कारी मंदिर के रूप में भी जाना जाता है.
यह मंदिर अरावली पर्वत श्रृंखला की एक पहाड़ी पर समुद्र तल से लगभग 700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. मंदिर तक पहुंचने के लिए 500 सीढ़ियों की चढ़ाई करनी पड़ती है. लोकल-18 टीम ने मंदिर पहुंचकर स्थानीय लोगों और पुजारी से बातचीत की. मंदिर के पुजारी पवन ने एक अनोखी घटना का जिक्र करते हुए बताया कि यह मंदिर चोरों की मदद से जुड़ी एक चमत्कारी घटना के लिए प्रसिद्ध है.
चोरों के लिए बना था पहाड़ी में रास्ता
पुजारी पवन बताते हैं कि वर्षों पहले गांव में चोरी करने के बाद चोर इस मंदिर पर पहुंचे. गांववालों ने उन्हें घेर लिया और उनके भागने का कोई रास्ता नहीं बचा. तभी माता के मंदिर की पहाड़ी के बीचोंबीच एक संकरा रास्ता बन गया जिससे चोर वहां से बचकर निकलने में सफल रहे. इस घटना के बाद मंदिर का नाम मंशा माता मंदिर पड़ गया. आज भी यह रास्ता मौजूद है जिसे ‘चोर गली’ कहा जाता है. यहां से एक बार में केवल एक व्यक्ति ही निकल सकता है.
मंदिर में स्थित है चमत्कारी अंध कुंआ
मंदिर परिसर में स्थित एक अंध कुंए से जुड़ी एक और चमत्कारी घटना भी चर्चित है. बताया जाता है कि एक बार एक बंजारा पूजा करने आया और उसका सोने का कटोरा उस कुएं में गिर गया. रात में मंशा माता ने सपने में बंजारे को बताया कि उसका कटोरा निवाई के एक मंदिर के कुंड में मिलेगा. लेकिन माता ने यह भी चेताया कि वहां कई कटोरे होंगे और उसे केवल अपना कटोरा ही लेना है. बंजारा लालचवश अन्य कटोरे भी साथ ले आया. इसके बाद उसकी पत्नी का निधन हो गया. दुखी होकर वह माता के मंदिर में क्षमा मांगने आया. फिर उसने मंदिर की पहाड़ी के लिए सात सीढ़ियों का निर्माण करवाया जो आज भी मंदिर में मौजूद हैं.
अवैध खनन के चलते हुई थी मृत्यु की घटना
यह मंदिर एक भव्य पहाड़ी पर स्थित है जिसे मनसा डूंगरी के नाम से जाना जाता है. स्थानीय लोग बताते हैं कि एक बार एक ठेकेदार ने इस पहाड़ी पर अवैध खनन शुरू किया. लोगों ने विरोध किया लेकिन वह नहीं रुका. कुछ समय बाद उसके बेटे की मृत्यु हो गई. लोगों का मानना है कि यह माता की शक्ति का परिणाम था. आज भी इस पहाड़ी पर खनन की गई चट्टानें वैसे की वैसे पड़ी हैं.
सवामणी की परम्परा और सामूहिक आयोजन
मंदिर की प्राकृतिक छटा मन को शांति देती है. यहां मनोकामना पूर्ण होने के बाद सवामणी चढ़ाने की परम्परा है. हर वर्ष 56 गांवों के लोग मिलकर सामूहिक सवामणी का आयोजन करते हैं. यह आयोजन मंदिर परिसर में विशेष आस्था और उल्लास के साथ होता है.
ओलावृष्टि से बचाने की मान्यता
मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता यह है कि मंशा माता प्राकृतिक आपदाओं से गांव की रक्षा करती हैं. स्थानीय लोग बताते हैं कि आज तक रूपाड़ी गांव में तेज ओलावृष्टि नहीं हुई. किसी को कभी नुकसान नहीं पहुंचा. गांव में बारिश नहीं होने की स्थिति में सामूहिक रूप से माता का पूजन किया जाता है. लोगों का विश्वास है कि इसके बाद अच्छी वर्षा होती है. इसलिए हर साल गांववाले बारिश के लिए विशेष पूजा का आयोजन करते हैं.
6 जून को निर्जला एकादशी, एकादशी के दिन चावल का क्यों नहीं करना चाहिए सेवन
4 Jun, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सनातन धर्म में वैसे तो सभी एकादशियों का विशेष महत्व है लेकिन इन सभी में निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, निर्जला एकादशी का व्रत करने से भक्तजनों को वर्षभर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है. निर्जला एकादशी का व्रत सभी एकादशियों में सबसे कठिन माना जाता है क्योंकि द्वादशी तिथि तक पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती इसलिए इस तिथि को निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है. आपने अक्सर बुजुर्गों को यह कहते सुना होगा कि एकादशी के दिन चावल मत खाना! लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों कहा जाता है? क्या यह सिर्फ धार्मिक नियम है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक वजह भी छुपी है. आइए जानते हैं एकादशी के दिन चावल का सेवन क्यों नहीं किया जाता…
कब है निर्जला एकादशी?
निर्जला एकादशी को लेकर लोगों में कन्फ्यूजन की स्थिति बनी हुई है. कुछ लोग 6 जून को एकादशी की तिथि बता रहे हैं तो कुछ 7 जून को. इस साल हरिवासर की वजह से दो दिन निर्जला एकादशी का व्रत किया जाएगा. गृहस्थ लोग निर्जला एकादशी व्रत 6 जून को करेंगे बल्कि साधु संत 7 जून को एकादशी का व्रत करेंगे. वहीं जो लोग 6 जून का व्रत करेंगे, वे 7 जून को पारण करेंगे. वहीं जो साधु संत 7 जून को व्रत करेंगे, वे 8 जून को एकादशी का पारण करेंगे और तभी पानी का सेवन भी करेंगे. आज हम जानेंगे कि एकादशी पर चावल न खाने की परंपरा कहां से शुरू हुई, इसके पीछे कौन-सी मान्यताएं हैं और क्या यह स्वास्थ्य से भी जुड़ा कोई संकेत देता है.
चावल न खाने की पौराणिक मान्यता
एकादशी हर हिंदू पंचांग के अनुसार हर महीने दो बार आती है—शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को. यह दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत के लिए बेहद खास माना जाता है. निर्जला एकादशी का व्रत करने से सभी पापों के नाश होता है और व्रत के शुभ प्रभाव से आत्मशुद्धि भी होती है. जल में पके हुए चावल में नकारात्मक ऊर्जा आकर्षित होती है इसलिए माना जाता है कि अगर कोई व्यक्ति एकादशी को चावल खाता है, तो व्रत का फल नहीं मिलता और पाप बढ़ता है. गरुड़ पुराण में भी उल्लेख है कि एकादशी को चावल खाना आध्यात्मिक रूप से वर्जित है क्योंकि यह भोजन तमोगुणी होता है—यानी आलस्य और भारीपन लाता है.
यह है कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि मेधा ने मां क्रोध से बचने के लिए अपनी योग शक्तियों के माध्यम से शरीर का त्याग कर दिया और उनका अंश पृथ्वी में समा गया. यह घटना एकादशी के दिन हुई थी इसलिए एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित है. फिर उन्होंने जौ और चावल के रूप में जन्म लिया. माना जाता है कि एकादशी के दिन चावल और जौ खाने की तुलना महर्षि मेधा के शरीर से की जाती है इसलिए एकादशी के दिन चावल नहीं खाया जाता.
प्रेत्योनियों को आकर्षित करता है चावल
पद्म पुराण, स्कंद पुराण तथा अन्य धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और पाप ग्रहण करने वाली शक्तियां सक्रिय होती हैं. ऐसे में चावल या अन्न का सेवन पाप के संयोग का कारण बनता है. कथा अनुसार, एक बार माता पृथ्वी ने भगवान विष्णु से पूछा कि कौन सा भोजन एकादशी पर निषिद्ध है. तब भगवान ने उत्तर दिया कि एकादशी के दिन चावल खाने से वही पाप प्राप्त होता है, जो ब्रह्म हत्या से होता है. इसलिए धर्मशास्त्रों में एकादशी पर अन्न, विशेषकर चावल वर्जित बताए गए हैं. चावल प्रेत्योनियों को आकर्षित करता है, इसलिए इसे पितृ पक्ष या श्राद्ध में अर्पित किया जाता है — यह एकादशी जैसे उद्धारकारी तिथि पर उपयुक्त नहीं माना जाता.
आयुर्वेदिक कारण
चावल में जल तत्व अधिक होता है, जो शरीर में अवसाद, तामसिक वृत्ति और आलस्य बढ़ाता है. एकादशी व्रत का उद्देश्य शरीर को शुद्ध, सक्रिय और सात्त्विक बनाए रखना है. चावल इस प्रवृत्ति के विपरीत कार्य करता है. चावल के पाचन से अत्यधिक ग्लूकोज उत्पन्न होता है, जो उपवास के दौरान विषाक्तता बढ़ा सकता है. बरसात के मौसम में या मौसम परिवर्तन के समय (जब एकादशी अधिक आती है), चावल आसानी से संक्रमित हो सकते हैं, जिससे गैस, अपच, और सर्दी-जुकाम जैसी समस्याएं हो सकती हैं. एकादशी के व्रत में शरीर को हल्का और मन को शांत रखने की कोशिश होती है, जबकि चावल भारी और नींद बढ़ाने वाला आहार माना जाता है.
फ्लावर नहीं फायर हैं इस तालाब की मछलियां, नागों की जानी दुश्मन, सुख-शांति की वाहक
4 Jun, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
उत्तराखंड की पावन धरती ऋषिकेश में ऐसे कई रहस्यमयी और चमत्कारी स्थल हैं, जो आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर हैं. गरुणचट्टी स्थित गरुण भगवान का मंदिर, इन्हीं में से एक है. ये जगह श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना चुकी है. इस मंदिर में बना एक प्राचीन तालाब न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि इसके जल को गरुण गंगा का पवित्र जल माना जाता है, जो कई रोगों और ग्रहदोषों से मुक्ति दिलाने की क्षमता रखता है. यह तालाब कालसर्प दोष से पीड़ित लोगों के लिए एक दिव्य समाधान है.
गरुण गंगा का पानी
कि गरुणचट्टी का यह मंदिर ऋषिकेश से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर बद्रीनाथ मार्ग पर पड़ता है. गरुण जी, भगवान विष्णु के वाहन माने जाते हैं और उन्हें आध्यात्मिक शक्ति, साहस व रक्षा का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि इस स्थल पर गरुण जी ने घोर तपस्या की थी और भगवान विष्णु से दिव्य वरदान प्राप्त किए थे. मंदिर प्रांगण में स्थित यह तालाब देखने में तो सामान्य प्रतीत होता है, लेकिन इसकी धार्मिक महत्ता अत्यंत गहन है. लोक मान्यता के अनुसार, इस तालाब का जल सीधे गरुण गंगा से आता है, जो एक अलौकिक जल स्रोत है. यह जल बेहद शीतल, निर्मल और औषधीय गुणों से युक्त होता है. स्थानीय श्रद्धालु मानते हैं कि इसमें स्नान करने अथवा इससे शरीर को स्पर्श कराने मात्र से कई चर्म रोग, मानसिक क्लेश और नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है.
विघ्न-बाधा का कारण
भारतीय ज्योतिष में कालसर्प दोष एक गंभीर ग्रहदोष माना गया है, जो व्यक्ति के जीवन में बाधाओं, विघ्नों और मानसिक अशांति का कारण बनता है. गरुण जी नागों के शत्रु माने जाते हैं. इसी कारण उनके मंदिर में पूजा और उपाय करने से कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है. इस मंदिर में लोग तालाब में मौजूद रंग-बिरंगी मछलियों को पेड़ा या आटे की गोली खिलाते हैं. माना जाता है कि ऐसा करने से दोष की शांति होती है और जीवन में सुख-शांति आती है. यम कार्य जीवदया (प्राणियों को अन्न दान) का प्रतीक भी है, जिससे पुण्य की प्राप्ति होती है. यहां हर साल देशभर से हजारों श्रद्धालु आते हैं, विशेषकर वे लोग जो लंबे समय से शनि, राहु, केतु या नागदोष से पीड़ित हैं.
इन 5 लोगों को कभी नहीं काटता सांप, सर्पदंश भय से भी हमेशा रहते हैं मुक्त
4 Jun, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सांप का नाम सुनते ही लोगों के मन में डर समा जाता है. जहर से भरे फन वाले इस जीव से हर कोई बचना चाहता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ खास तरह के लोगों को सांप कभी नुकसान नहीं पहुंचाते? विभिन्न धार्मिक, तांत्रिक और ज्योतिषीय परंपराओं में कुछ विशेष व्यक्तियों को सांप (नाग) नहीं काटते या उनका विष उन पर प्रभाव नहीं डालता. साथ ही ये व्यक्ति हमेशा सर्पदंश भय से भी मुक्त रहते हैं. तो कौन हैं ये लोग जिनसे सांप भी डरते हैं और क्यों उनके आस-पास जाते ही ये विषधर शांत हो जाते हैं?
ऐसे लोगों की शिवजी करते हैं रक्षा
शिवजी को नागों का स्वामी कहा जाता है और उनके गले में वासुकि नाग का वास होता है. मान्यता है कि जो व्यक्ति भक्ति भाव से शिवजी की पूजा करता है और शिव तांडव स्त्रोत या महामृत्युंजय मंत्र जप करता है. साथ ही प्रदोष तिथि या शिवरात्रि के मौके पर रुद्राभिषेक करता है तो उनको सांप कभी नहीं काटते. कहते हैं, जिस पर भोलेनाथ की कृपा हो, उसकी नाग भी रक्षा करते हैं. महामृत्युंजय मंत्र का प्रभाव नागदोष और विष से रक्षा करता है.
कुंडली में ग्रहों की विशेष स्थिति
ज्योतिषाचार्य के अनुसार, कुछ लोगों की कुंडली में विशेष ग्रह स्थिति होती है, जिसे कालसर्प दोष कहते हैं. माना जाता है कि जिनकी कुंडली में यह दोष नहीं होता, उन्हें सर्पदंश का भय भी नहीं होता है. हालांकि यह पूरी तरह धार्मिक विश्वास पर आधारित है. जब किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में सभी 7 मुख्य ग्रह—सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि—राहु और केतु के बीच में आ जाएं, तो उस योग को कालसर्प दोष कहा जाता है.
नाग पंचमी पर पूजा अर्चना करने वाले
नाग पंचमी पर जो लोग नाग देवता की पूजा, दूध अर्पण और व्रत करते हैं, उनको सर्पदंश का भय नहीं रहता. मान्यता है कि नाग पंचमी की पूजा करने वालों को नाग देवता का आशीर्वाद मिलता है और सांप जीवनभर उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाते. वहीं गरुड़ पुराण व अन्य ग्रंथों में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्व जन्म में नागों की सेवा, पूजा या रक्षा करता है उसे इस जन्म में नाग नहीं काटते.
गोरखनाथजी की सेवा करने वाले
गोरखनाथजी और सांप का संबंध अत्यंत रहस्यमयी, आध्यात्मिक और योगिक शक्ति से जुड़ा हुआ है. नाथ संप्रदाय की परंपराओं और लोककथाओं में गोरखनाथ जी को नागों के स्वामी, वशकर्ता और रक्षक के रूप में माना जाता है. मान्यता है कि जो व्यक्ति गोरखनाथजी की पूजा अर्चना करता है या फिर सांप दिखने पर गोरखनाथजी का नाम लेता है, तो उसको कभी भी सांप नहीं काटता. साथ ही वह हमेशा सर्पदंश से भय मुक्त रहते हैं.
राहु और केतु शांत हैं तो शुभ
ज्योतिष शास्त्र अनुसार, राहु और केतु नागों से संबंधित छाया ग्रह हैं. अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में राहु और केतु शुभ स्थिति में हों या उनकी शांति कर दी गई हो, तो सर्प दोष नहीं होता है और सांप जैसे जीव निकट भी नहीं आते. साथ ही माना गया है कि सर्प कभी बिना कारण नहीं काटता. जो व्यक्ति हिंसा नहीं करता, गौ-सेवा करता है, उनके शरीर की गंध और ऊर्जा सांपों को आकर्षित नहीं करती. वहीं साधु-संतों और योगियों के आस-पास सांप निडर होकर घूमते हैं, लेकिन उन्हें काटते नही हैं.
आज का राशिफल: जानिए क्या कहती हैं आपकी किस्मत की सितारे
4 Jun, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- हर्ष, यात्रा, सुख-सफलता, हानि, गृह-कलह, मानसिक अशांति कारक हो।
वृष राशि :- विरोध, व्यय, कष्ट, अशांति, लाभ होगा, शिक्षा-लेखन कार्य में सफलता मिले।
मिथुन राशि :- व्यापार में क्षति, यात्रा, विवाद, उद्योग-व्यापार की स्थिति में कमी, हानि होगी।
कर्क राशि :- शरीरादि मध्यम, भूमि व राजलाभ, असफलता का दिन सबित होगा।
सिंह राशि :- वाहन आदि भय, कष्ट, राजसुख, यात्रा होगी, शुभ कार्य में व्यावधान होगा।
कन्या राशि :- व्यय, प्रवास, विरोध, भूमि लाभ होगा, राजकार्य में व्यावधान, लाभ होगा।
तुला राशि :- रोगभय, मातृ-सुख, खर्च, यात्रा, व्यापार में सुधार हो सकता है, कार्य होगा।
वृश्चिक राशि :- कार्यसिद्ध, लाभ, विरोध, भूमि लाभ होगा, राजकार्य में व्यस्तता रहेगी।
धनु राशि :- लाभ, धर्म रुचि, यश, हर्ष, यात्रा, समय शिक्षा जगत की ख्याति सामान्य रहेगी।
मकर राशि :- विरोध, व्यापार में हानि, शरीर कष्ट, अधिक खर्च करने से कुछ कार्य होवेंगे।
कुंभ राशि :- व्यय, प्रभाव, लाभ, प्रतिष्ठा, रोगभय, विरोधी असफल अवश्य होंगे।
मीन राशि :- राजभय, यश लाभ, मान, चोटभय, राजकार्य में विलम्ब, परेशानी बढ़ेगी।
लगती थी तगड़ी भूख, साधु ने बताई ऐसी ट्रिक, बरसने लगे एकादशियों के फल
3 Jun, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में एकादशी का काफी महत्त्व है. एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है. इस दिन भगवान विष्णु के निमित्त व्रत और पूजा पाठ करने पर सभी मनोकामनाएं बिना मांगे ही पूर हो जाती हैं. साल में 24 एकादशी तिथि का आगमन होता है. एकादशी का व्रत करने से जीवन में चल रही सभी समस्याएं और बाधाएं खत्म हो जाती हैं. सभी एकादशियों का अपना अलग-अलग महत्त्व है. ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत करने से सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है. पौराणिक कथा के अनुसार, निर्जला एकादशी माता कुंती और पांडवों से जुड़ी हुई है.
कुंती और भीम से कनेक्शन
पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है. सभी एकादशी तिथि के दिन विष्णु भगवान की पूजा अर्चना, आराधना, स्त्रोत और व्रत आदि करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस एकादशी का महत्त्व महाभारत से जुड़ा हुआ है. माता कुंती साल में होने वाली सभी एकादशियों का व्रत विधि विधान से करती थीं. भीम अपनी भूख पर नियंत्रण न रखने के कारण कोई भी व्रत नहीं कर पाते. इसका समाधान जानने के लिए भीम ने महर्षि वेदव्यास के सामने अपनी समस्या रखी. वेदव्यास ने कहा कि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में निर्जला एकादशी का आगमन होता है. यदि इस एकादशी का व्रत किया जाए तो सभी 24 एकादशी का फल प्राप्त होता है. भीम ने पहली बार निर्जला एकादशी का व्रत किया, जिस कारण उन पर विष्णु भगवान की कृपा सदैव बनी.
सबसे कठिन व्रत
निर्जला एकादशी का व्रत विधि विधान से करने पर सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है और विष्णु भगवान की कृपा सदैव बनी रहती है. निर्जला एकादशी का व्रत सबसे कठिन और विशेष फल प्रदान करने वाला होता है. इस दिन सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठकर व्रत का संकल्प करके स्नान आदि करते हैं. पूरे दिन बिना खाए पिए रहकर विष्णु भगवान की पूजा पाठ, आराधना और महा फलदायक मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का 108 या अपनी सामर्थ्य के अनुसार जाप करने पर सभी समस्याएं खत्म हो जाती हैं. साल 2025 में निर्जला एकादशी का व्रत 6 और 7 जून को किया जाएगा, जिसमें गृहस्थ जीवन में रहने वाले साधक 6 जून और साधु संत 7 जून को निर्जला एकादशी का व्रत करके पुण्य अर्जित कर सकते हैं.
चमत्कारी है ये मंदिर...जहां शांत हुआ भगवान शिव का रौद्र रूप, ब्रह्मांड की आई जान में जान
3 Jun, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
उत्तराखंड की देवभूमि ऋषिकेश आध्यात्मिकता, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता का अनूठा संगम है. यह तीर्थनगरी योग और ध्यान के लिए जितनी प्रसिद्ध है, उतनी ही यहां स्थित प्राचीन मंदिरों के लिए भी जानी जाती है. इन्हीं मंदिरों में से एक है– वीरभद्र मंदिर, जो ऋषिकेश के आमबाग आईडीपीएल कॉलोनी क्षेत्र में है. यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि इसका ऐतिहासिक और पौराणिक महत्त्व भी अत्यंत गहरा है. Local 18 के साथ बातचीत में इस मंदिर के पुजारी प्रदोष थपियाल बताते हैं कि वीरभद्र मंदिर को सैकड़ों साल पुराना माना जाता है. इसकी मान्यता सीधे भगवान शिव से जुड़ी है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया और माता सती ने उसी अपमान के कारण यज्ञ अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव ने क्रोध में आकर अपने जटाओं को पृथ्वी पर पटका. उसी से उत्पन्न हुए उनके रौद्र अवतार वीरभद्र. वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ को विध्वस्त कर दिया और पूरे ब्रह्मांड में भय व्याप्त हो गया.
रौद्र और शांत दोनों रूपों की पूजा
कहा जाता है कि यहीं ऋषिकेश के वीरभद्र क्षेत्र में भगवान शिव ने वीरभद्र को शांत किया था, तभी से यह स्थान वीरभद्र शिवलिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुआ और एक मंदिर का स्वरूप ले लिया. वीरभद्र मंदिर का यह शिवलिंग स्वयंभू माना जाता है. यहां भगवान शिव के रौद्र और शांत दोनों स्वरूपों की पूजा होती है. मंदिर की वास्तुकला प्राचीन शैली की है. परिसर में प्रवेश करते ही श्रद्धालु आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं. यह मंदिर स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र तो है ही, देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी खास स्थान है.
सावन में जमघट
स्थानीय लोग मानते हैं कि यहां दर्शन मात्र से जीवन के संकट कट जाते हैं और शिव कृपा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. वीरभद्र मंदिर में सावन के महीने और श्रावण सोमवार को भी बड़ी संख्या में भक्त जुटते हैं और जलाभिषेक कर भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. हर वर्ष महाशिवरात्रि पर यहां एक विशाल और भव्य मेला आयोजित किया जाता है. इस मेले में दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं और रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और विशेष पूजा अनुष्ठानों का आयोजन होता है. यह मेला न केवल धार्मिक गतिविधियों का मंच होता है, बल्कि यहां सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और स्थानीय हस्तशिल्प की झलक भी देखने को मिलती है.
क्या धरती पर आने वाली है आपदा? उज्जैन महाकाल मंदिर से मिला बड़ा संकेत, पुजारी ने बताया शिवजी का इशारा
3 Jun, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकाल के दरबार में करोड़ो लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है. यहां मंदिर को लेकर सैकड़ो मान्यता प्रचलित है, जो समय-समय पर देखने को मिलती है. नोतपा के दौरान भी मौसम में गर्मी नही ठंडी हवा के साथ आंधी-तूफान देखनें को मिला. इसी बीच, महाकाल मंदिर में एक अप्रत्याशित घटना हुई. तेज हवा के कारण महाकालेश्वर मंदिर के शिखर पर लगा सोने का ध्वज अचानक गिर गया, जिससे महाकाल के श्रद्धांलु तरह-तरह की बात सामने आ रही है.
दरअसल, यह पूरा मामला दो से तीन दिन पुराना बताया जा रहा है. इस घटना में अच्छी बात यह रही कि किसी को चोट नहीं आई. लेकिन, इस घटना ने मंदिर प्रशासन की सावधानी और व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं. ध्वज को फिर से लगाने का काम शुरू हो गया है. वहीं, पुजारी मान रहे हैं कि ये अनिष्ट के भी संकेत होते हैं. हालांकि यहां भगवान स्वंय विराजमान हैं तो ऐसी संभावना कम है.
जानिए कब गिरा ध्वज?
दो-तीन दिन पहले तेज हवा चलने से उज्जैन मे कहीं जगह आंधी-तूफान देखने वाली स्थिति थी. हो सकता है जब यह ध्वज ढीला होगया होगा और नीचे गिर गया. यह ध्वज सालों से भक्ति और परंपरा का प्रतीक रहा है. दो-तीन दिन पहले तेज हवा चलने से यह ढीला हो गया और नीचे गिर गया. जब यह घटना हुई, तब मंदिर में सैकड़ों भक्त दर्शन के लिए मौजूद थे. मंदिर प्रशासन ने तुरंत उस जगह को खाली करा लिया और गिरे हुए ध्वज को सुरक्षित रख लिया.
महाकाल के आगे नहीं हो सकता अनिस्ट
मंदिर के पुजारि महेश शर्मा नें बताया कि यह घटना बहुत ही असामान्य है. यह धार्मिक रूप से चिंता का विषय है. परंपरा के अनुसार, गिरे हुए ध्वज को फिर से लगाया जाएगा. इसके लिए शिखर पर मचान बांधकर ध्वजा लगाने का काम चल रहा ह, लेकिन महाकाल स्वयंम मृत्यु को हरने वाले कहे गए है. उनके रहते कुछ अनिस्ट नहीं हो सकता है. इसलिए यह भन्ति ना रखें की कुछ गलत होने वाला है.
कालों के काल है भगवान महाकाल
मंदिर के पुजारी ने इस घटना पर अपना जवाब देते हुए स्पस्ट कर दिया वैसे, तो बाबा महाकाल कालों के काल हैं. वे खुद सभी प्रकार की विपत्तियां को दूर करने वाले हैं. परंतु शिखर का ध्वज गिरने की घटना को यदि अनिष्ट माना जा, तो इसके लिए सभी को भक्ति भाव पूजन पाठ व ध्यान करना चाहिए.
आज का राशिफल: जानिए क्या कहती हैं आपकी किस्मत की सितारे
3 Jun, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- तनाव, रोग, उदर विकार, लाभ, राजभय, पारिवारिक समस्या उलझी रहेंगी।
वृष राशि :- शत्रुभय, सुख, मंगल कार्य, विरोध, मामले-मुकदमे में जीत की सम्भावना रहेगी।
मिथुन राशि :- कुसंगत से हानि, विरोध, व्यय, यात्रा व सामाजिक कार्यों में सावधानी रखें।
कर्क राशि :- पराक्रम, कार्यसिद्ध, व्यापार लाभ, सामान्य लाभ हो सकता है, कार्य बनेंगे।
सिंह राशि :- तनाव, प्रवास से बचें, विरोध, चिन्ता, राजकार्य में प्रतिष्ठा मिल सकती है।
कन्या राशि :- भूमि लाभ, स्त्री सुख, हर्ष, प्रगति, स्थिति में सुधार, लाभ की गति बढ़ेगी।
तुला राशि :- प्रगति, वाहन भय, भूमि लाभ, कलह, कुछ अच्छे कार्य भी होंगे, लाभ होगा।
वृश्चिक राशि :- कार्य सिद्ध, विरोध, लाभ, कष्ट, हर्ष, व्यय होगा, व्यापार में सुधार, कार्य होगा।
धनु राशि :- यात्रा में हानि, मातृ-पितृ कष्ट, व्यय, उन्नति में कुछ कमी, व्यवस्था की अनुभूति।
मकर राशि :- शुभ कार्य, वाहनादि रोगभय, धार्मिक कार्य, कुछ अच्छे कार्य हो सकते हैं, ध्यान रखें।
कुंभ राशि :- अभिष्ट सिद्धी, राजभय, कार्य बाधा, सामाजिक कार्यों से लाभ होगा।
मीन राशि :- अल्प हानि, रोगभय, सम्पत्ति लाभ, राजकार्य में विलम्ब, परेशानी होगी।
भगीरथ के पुरखों को तारने पृथ्वी पर आई थीं गंगा, अपने पितरों के लिए गंगा दशहरा पर करें ये उपाय, मिलेगा मोक्ष!
2 Jun, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में हर साल ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है. इस दिन गंगा मैया की पूजा-अर्चना की जाती है. मान्यता है कि गंगा दशहरा के अवसर पर गंगा नदी में स्नान करने से व्यक्ति को अनजाने में की गई गलतियों के लिए पाप से मुक्ति मिलती है. शुभ फलों की प्राप्ति होती है.
इसके अलावा, गंगा दशहरा पितृ पूजा के लिए भी जाना जाता है. क्योंकि, मांग गंगा का धरती पर अवतरण भगरीरथ के पूरखों की मुक्ति के लिए ही हुआ था. इसी क्रम में उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज ने बताया कि अगर गंगा दशहरा पर आप गंगाजी में जाकर स्नान नहीं कर पा रहे तो निराश न हों. घर पर कुछ अचूक उपाय से गंगा स्नान के बराबर ही पुण्य प्राप्त किया जा सकता है. पितरों को भी प्रसन्न किया जा सकता है.
कब मनाया जाएगा गंगा दशहरा
वैदिक पंचांग के अनुसार, गंगा दशहरा की दशमी तिथि की शुरुआत 4 जून को रात 11:55 बजे होगी और यह तिथि 6 जून को रात 2:14 बजे समाप्त होगी. उदया तिथि के अनुसार, इस साल गंगा दशहरा का पर्व 5 जून, 2025 को मनाया जाएगा.
जरूर करें ये काम, पूर्वज का मिलेगा आशीर्वाद
गंगा दहशरा के दिन जो लोग गंगा स्नान नहीं कर सकते हैं, फिर भी अपने पितृ को तृप्त करना चाहते हैं तो सबसे पहले इस दिन स्नान करते वक्त जल में गंगाजल मिला लेना चाहिए. उसके बाद स्नान करें. काला तिल और सफेद पुष्प लेकर पितृ का तर्पण करें. पितृ चालीसा का पाठ करें.
यह दिन पितृ को प्रसन्न करने के लिए बेहद शुभ है. इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण करें, क्योंकि राजा भगीरथ पितृ की तृप्ति के लिए ही मां गंगा को धरती पर लाए थे. इस दिन पितृ तर्पण, पिंडदान, दान, श्राद्ध और दीपदान जरूर करना चाहिए.
इस दिन संध्या के समय पीपल वृक्ष के नीचे पितृ के नाम से दीपदान करें. ऐसा करने से आपको घर बैठे ही पितृ दोष से मुक्ति मिल जाएगी और पितृ प्रसन्न होंगे, जिससे घर में सुख-समृद्धि की वृद्धि होगी और वंश पर सकारात्मक असर पड़ेगा.
जिस नदी के जल को नीम करौली बाबा ने बना दिया घी, विवेकानंद भी उसके किनारे लगा चुके ध्यान
2 Jun, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
उत्तराखंड के नैनीताल का कैंची धाम आज देशभर में आस्था का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है. हर साल लाखों श्रद्धालु यहां बाबा नीम करौली बाबा के दर्शन और उनके चमत्कारों की अनुभूति के लिए पहुंचते हैं. बाबा के जीवन से जुड़ी कई चमत्कारी कथाएं लोगों के बीच आज भी जीवित हैं. ऐसी ही एक कहानी उत्तरवाहिनी शिप्रा नदी से जुड़ी है, जो आज भी कैंची धाम के पास बहती है और रहस्य, श्रद्धा और शांति का प्रतीक मानी जाती है.
कहते हैं कि एक बार कैंची धाम में 15 जून को होने वाले वार्षिक भंडारे के दौरान अचानक घी की भारी कमी हो गई. भक्तों में चिंता का माहौल था क्योंकि प्रसाद के लिए घी अनिवार्य था. आसपास के क्षेत्रों से घी मंगाने की कोशिशें नाकाम रहीं. तब बाबा नीम करौली ने शिप्रा नदी से जल लाने का आदेश दिया. भक्तों ने जैसे ही नदी से जल लाकर बाबा के सामने रखा, बाबा ने उस जल को आशीर्वाद देते हुए कहा “अब यह घी है, जाओ और इससे प्रसाद बनाओ.” आश्चर्य की बात यह थी कि वह जल सचमुच घी में बदल गया. उसी घी से मालपुए बनाए गए और भंडारा सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ. भंडारे के बाद बाबा ने कहा कि जितना घी हमने शिप्रा से लिया था उतना घी वापिस शिप्रा को देकर आओ, जिसके बाद घी को शिप्रा नदी में वापस डाल दिया गया.
मोक्षदायिनी, पाप नाशिनी
यह चमत्कार शिप्रा नदी की धार्मिक और आध्यात्मिक महत्ता को और भी बढ़ा देता है. भवाली से होकर बहने वाली यह शिप्रा नदी एक उत्तरवाहिनी नदी है, यानी यह दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है. भारत में अधिकतर नदियां उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं, इसलिए उत्तरवाहिनी नदियों को अत्यंत पवित्र और दुर्लभ माना जाता है. स्कंद पुराण के मानसखंड में इस नदी का विशेष उल्लेख मिलता है और इसे मोक्षदायिनी तथा पाप नाशिनी कहा गया है.
सदियों बाद भी उतनी पवित्र
शिप्रा कल्याण समिति के अध्यक्ष जगदीश नेगी बताते हैं कि इस नदी का उद्गम भवाली के श्यामखेत स्थित देवदार और चीड़ के जंगलों से होता है. भवाली शहर के लिए यह नदी जीवनरेखा है. कहा जाता है कि बाबा नीम करौली अक्सर शिप्रा नदी के किनारे एक पत्थर पर बैठकर साधना किया करते थे. स्वामी विवेकानंद ने भी उत्तराखंड यात्रा के दौरान इसी नदी के तट पर ध्यान लगाया था. आज भी यह नदी श्रद्धालुओं के लिए उतनी ही पवित्र है जितनी सदियों पहले थी. इसे केवल एक नदी नहीं, बल्कि आस्था और चमत्कार की धारा के रूप में देखा जाता है, जिसे बचाए रखना सबकी जिम्मेदारी है.
जिन महिलाओं में होती हैं ये आदतें, वो अपने ही हाथों से कर देती हैं अपना घर बर्बाद, जानें चाणक्य की ये खास बातें
2 Jun, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आचार्य चाणक्य भारत के प्राचीनतम और सबसे बुद्धिमान नीतिशास्त्रियों में से एक माने जाते हैं. उन्होंने जीवन के हर पहलू को बहुत ध्यान और गहराई से समझा और बताया कि इंसान की आदतें उसका आने वाला समय तय करती हैं. उनके मुताबिक, एक महिला पूरे घर की जान होती है, वो चाहे तो अपने परिवार को खुशहाल बना सकती है और अगर उसके बर्ताव में गड़बड़ हो, तो वही घर परेशानी से भर सकता है. चाणक्य नीति में ऐसी महिलाओं के बारे में बताया गया है, जिनकी कुछ बुरी आदतें परिवार की शांति, इज्जत और तरक्की को धीरे-धीरे खत्म कर देती हैं. ये बातें किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि लोगों को सच्चाई समझाने और सुधार की ओर ले जाने के लिए कही गई हैं. आज के समय में भी इन बातों का मतलब उतना ही जरूरी है जितना पुराने जमाने में था. आइए जानते हैं चाणक्य की उन नीतियों के बारे में.
1. जरूरत से ज्यादा खर्च करने की आदत
आचार्य चाणक्य के अनुसार, अगर कोई महिला सोच-समझकर पैसे खर्च नहीं करती और हर चीज पर जरूरत से ज्यादा पैसा उड़ाती है, तो घर की आर्थिक हालत बिगड़ सकती है. चाहे पति कितना भी कमा ले, अगर पत्नी फिजूलखर्च करती हो तो पैसे कभी टिक नहीं पाते. कपड़े, गहने, मेकअप, सजावट जैसी चीजों में बिना जरूरत के खर्च करना घर को धीरे-धीरे कंगाल बना सकता है.
2. हर बात पर गुस्सा और झगड़ा करना
अगर कोई महिला हमेशा गुस्से में रहती है और छोटी-छोटी बातों पर झगड़ती है, तो घर का माहौल खराब हो जाता है. आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जिस घर में रोज लड़ाई-झगड़ा होता है, वहां लक्ष्मी यानी पैसा और बरकत नहीं टिकती. ऐसा घर शांति और सुख से खाली हो जाता है.
3. हर किसी की बुराई करना
आचार्य चाणक्य के अनुसार, जो महिला दूसरों की बुराई करने, पड़ोसियों की बातें करने और अपने घर की बातें बाहर कहने की आदत में लगी रहती है, वो अपने परिवार की इज्जत को खुद ही खराब कर देती है. इससे रिश्तों में दरार आती है और समाज में परिवार की छवि भी खराब होती है.
4. अपने पैसे या सुंदरता का घमंड करना
जो महिला अपनी सुंदरता, पैसे या परिवार की शोहरत पर घमंड करती है, वो धीरे-धीरे अकेली रह जाती है. घमंड से कोई किसी की इज्जत नहीं करता. जब घर में प्यार की जगह अहंकार आ जाता है, तो रिश्ते टूटने लगते हैं. चाणक्य ने कहा है कि घमंड करने वाली औरत अपने ही हाथों से अपना घर बर्बाद कर सकती है.
5. पति की कमाई को कम समझना
अगर कोई महिला अपने पति की कमाई से खुश नहीं रहती, उसे ताने देती है या दूसरों से तुलना करती है, तो इससे पति का मन टूट जाता है. वो दुखी हो जाता है और रिश्तों में खटास आने लगती है. चाणक्य कहते हैं कि ऐसी स्त्री अपने ही घर की नींव को हिला देती है. धीरे-धीरे परिवार में तनाव और पैसों की तंगी बढ़ जाती है.
आज का राशिफल: जानिए क्या कहती हैं आपकी किस्मत की सितारे
2 Jun, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- किसी शुभ समाचार के मिलने का योग है, व्यवसायिक स्थिति ठीक होगी|
वृष राशि :- मनोवृत्ति संवेदनशील रहेगी, कार्यगति अनुकूल चिन्ता कम अवश्य होगी|
मिथुन राशि :- किसी प्रलोभन से हानि, मनोवृत्ति संवेदनशील रहेगी तथा कार्यगति उत्तम होगी|
कर्क राशि :- अनायास यात्रा में उद्विघ्नता बने, स्त्री वर्ग से कुछ वाद विवाद परेशानी बनेगी|
सिंह राशि :- विरोधियों के षड़यंत्र से मानसिक परेशानी होगी तथा बेचैनी बढ़ेगी ध्यान रखे|
कन्या राशि :- शारीरिक कष्ट, राजभय तथा व्यापार उद्योग धंधे में अड़चन के बाद लाभ होगा|
तुला राशि :- व्यवसाय योग निश्चय, धार्मिक कार्य, कष्ट, व्यय परेशानी बनेगी|
वृश्चिक राशि :- बाधा, उलझने, लाभ यात्रा से कष्ट तथा व्यय अनाप शनाप अवश्य होगा|
धनु राशि :- शत्रु भय मुकदमे में जीत, रोग भय, व्यय होगा, व्यापार में सुधार अवश्य होगा|
मकर राशि :- व्यापार में लाभ, शत्रु भय, धन सुख, धार्मिक खर्च बनेंगे, लाभ होगा।
कुंभ राशि :- कलह, व्यर्थ खर्च, सफलता प्राप्त, विरोधी असफल रहेंगे, व्यापार बढ़ेगा।
मीन राशि :- स्वजन सुख, पुत्र चिन्ता, सुख की हानि, व्यापार की स्थिति अच्छी बनी रहेगी|
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