धर्म एवं ज्योतिष
पलामू से निकलेगी दुनिया की दूसरी सबसे लंबी जगन्नाथ रथ यात्रा, 40000 श्रद्धालुओं के लिए होगा भंडारा
23 Jun, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
झारखंड के पलामू में विश्व की दूसरी सबसे लंबी जगन्नाथ रथ यात्रा निकाली जाएगी. यह यात्रा 14 किलोमीटर लंबी होगी और मेदिनीनगर शहर के हरे कृष्ण निवास से शुरू होकर पूरे शहर से होते हुए हरे कृष्ण निवास पर समाप्त होगी. रथ की ऊंचाई 41 फीट होगी, जिसे हाइड्रोलिक सिस्टम के जरिए आवश्यकतानुसार कम या ज्यादा किया जा सकता है.
जानें कब होगी आयोजन की तैयारी
विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा की तैयारी पलामू में जोरों पर है. इस्कॉन हरे कृष्ण निवास द्वारा 2019 से निकाली जा रही यह यात्रा भव्य और आकर्षक होती है. इस वर्ष यह यात्रा 27 जून को निकाली जाएगी और दावा है कि यह विश्व की दूसरी सबसे लंबी यात्रा होगी.
14 किलोमीटर की लंबी यात्रा
वहीं, आयोजन समिति के सुंदर माधव दास ने बताया कि इस वर्ष 14 किलोमीटर लंबी रथ यात्रा निकाली जाएगी, जो देश की दूसरी सबसे लंबी रथ यात्रा होगी. गुजरात में 15 किलोमीटर लंबी रथ यात्रा निकाली जाती है, उसके बाद पलामू की इस यात्रा का स्थान आता है.
जानें रूट और समय
यह यात्रा मेदिनीनगर शहर के मेजर मोड़ स्थित हरे कृष्णा निवास से शुरू होगी और भारत माता चौक, छः मुहान, सद्दीक मंजिल चौक, बेलवाटीकर चौक, स्टेशन रोड, ओवरब्रिज, रेड़मा चौक, बैरिया चौक, गायत्री मंदिर से होते हुए वापस हरे कृष्णा निवास पहुंचेगी. 27 जून को यह यात्रा दोपहर 2 बजे निकाली जाएगी. एक घंटे पहले पांडु विजय होगा, जिसमें ढोल, मृदंग आदि पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ जुलूस निकलेगा.
41 फीट ऊंचा रथ
इस बार रथ की ऊंचाई 41 फीट होगी और इसे जरूरत पड़ने पर 18 फीट तक घटाया जा सकता है. रथ यात्रा के बाद भव्य भंडारा का आयोजन होगा, जिसमें लगभग 40,000 श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्था की जाएगी. भंडारा कार्यक्रम पुलिस लाइन के मैदान में आयोजित किया जाएगा, जिसके लिए पुलिस प्रशासन से बात चल रही है.
26 जुलाई से होगी पूजा शुरू
जगन्नाथ रथ यात्रा के कार्यक्रम 26 जून से शुरू होंगे. भगवान मायापुरी से सुबह 6 बजे आएंगे और 7:30 बजे नेत्र दर्शन होगा. इसके बाद भजन-कीर्तन और कथा वाचन होगा, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रसिद्ध साधु भाग लेंगे. 27 जून को मंगला आरती के साथ भव्य रथ यात्रा निकाली जाएगी.
पितरों को प्रसन्न करने का सबसे आसान उपाय, आषाढ़ अमावस्या पर लगा दें ये 2 पौधे, सात जन्मों तक मिलेगी कृपा!
23 Jun, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में आषाढ़ अमावस्या का दिन पितरों को समर्पित माना गया है. मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से सौभाग्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. इस दिन पवित्र नदियों में स्नान कर दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है. इससे पितृ भी प्रसन्न होते हैं. इस दिन तर्पण और पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है. अगर कोई व्यक्ति किसी कारणवश यह कर्म न कर पाए, तो कुछ विशेष उपायों के माध्यम से भी पितरों का आशीर्वाद पाया जा सकता है.
जानिए कब है आषाढ़ अमावस्या
आषाढ़ माह की अमावस्या तिथि की शुरुआत पंचांग के अनुसार 24 जून की शाम 7 बजकर 2 मिनट से होगी. वहीं इसकी समाप्ति 25 जून की शाम 4 बजकर 4 मिनट पर हो जाएगी. उदयातिथि की मान्यता के अनुसार आषाढ़ अमावस्या तिथि 25 जून को मानी जाएगी. इसी दिन तर्पण, दान-पुण्य और धार्मिक क्रियाकलापों को करना शुभ माना जाएगा.
जरूर लगाएं ये पौधे
नीम: आषाढ़ अमावस्या के दिन आपको नीम का पेड़ लगाने से भी काफी लाभ मिल सकता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, घर या आसपास नीम का पौधा लगाने से शनि और राहु के अशुभ प्रभाव से भी राहत मिल सकती है. साथ ही जातक के लिए तरक्की के योग बनने लगते हैं. ऐसे में आषाढ़ अमावस्या के मौके पर नीम का पेड़ लगाना काफ़ी शुभ होता है.
पीपल: अमावस्या पर पीपल पेड़ की पूजा करना बहुत ही शुभ माना जाता है. इससे साधक को पितरों का आशीर्वाद मिलता है. ऐसे में आप पितृ दोष से राहत पाने के लिए आषाढ़ अमावस्या के दिन मंदिर या फिर किसी सार्वजनिक स्थान पर पीपल का पौधा लगा सकते हैं. इससे पितर प्रसन्न होते हैं. साधक को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. कहा जाता है कि सात जन्मों तक पितरों की कृपा बनी रहती है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 23 जून 2025)
23 Jun, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष :- आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, दैनिक कार्यगति में सुधार होगा, कार्ययोजना अवश्य बनेगी।
वृष :- समय की अनुकूलता से लाभांवित होंगे, विवादग्रस्त होने से अवश्य बचें।
मिथुन :- मनोबल उत्साह वर्धक होगा, इष्ट मित्र सुखवर्धक रहें, विशेष कार्य अवश्य ही बनेंगे।
कर्क :- स्वास्थ्य हानि से बेचैनी, मानसिक उद्विघ्नता, शरीर क्षमता कमजोर पड़ेगी, ध्यान रखें।
सिंह :- आशानुकूल सफलता का हर्ष, कार्यवृत्ति में सुधार के योग बनेंगे, समय का ध्यान अवश्य रखें।
कन्या :- समय पर सोचे हुए कार्य बनेंगे किन्तु कुछ बाधा व विलम्ब अवश्य होगा।
तुला :- मानसिक क्लेश व अशांति, मनोवृत्ति मलिन रहे तथा विरोधी तत्व परेशान अवश्य करें।
वृश्चिक :- आर्थिक योजना पूर्ण हों, सफलता के साधन जुटायें, कार्य संतोष की चिन्ता होगी।
धनु :- कार्य योजना फलीभूत होगी, आशानुकूल सफलता से हर्ष होगा, रुके कार्य बनेंगे।
मकर :- इष्ट मित्रों से सुख-ऐश्वर्य की प्राप्ति, स्त्री वर्ग से हर्ष, तनाव तथा क्लेश, अशांति बनेगी।
कुम्भ :- मान-प्रतिष्ठा, प्रभुत्व वृद्धि, कार्य कुशलता से संतोष एवं रुके कार्य बनेंगे।
मीन :- दैनिक कार्यगति में सुधार, प्रत्येक कार्य में बाधा उद्विघ्नता अवश्य बनेगी।
भोलेनाथ के पुत्र मुरुगन को समर्पित 'मासिक कार्तिगाई' जानें इस दिन दीपक जलाना क्यों है महत्वपूर्ण
22 Jun, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष द्वादशी तिथि को रविवार पड़ रहा है. इस दिन मिथुन राशि में सूर्य, बुध और गुरु ग्रह मौजूद रहेंगे, वहीं चंद्रमा मेष से वृषभ राशि में प्रवेश करेंगे. इस दिन मासिक कार्तिगाई, गौण योगिनी एकादशी और वैष्णव योगिनी एकादशी का योग बन रहा है. मासिक कार्तिगाई भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) से जुड़ा है. वे शक्ति और युद्ध के देवता हैं और उन्हें तमिल संस्कृति में तमिल कडवुल के रूप में पूजा जाता है. कार्तिगाई नक्षत्र अग्नि से जुड़ा है, इसलिए इस दिन दीप जलाने की विशेष परंपरा होती है. दीपकों से न केवल देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि घर की नकारात्मक ऊर्जा भी दूर होती है.
पंचांग के अनुसार, इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:55 से दोपहर के 12:51 बजे तक रहेगा और राहुकाल का समय शाम 05:38 से 07:22 तक रहेगा. वैसे तो योगिनी एकादशी 21 जून को है, लेकिन वैष्णव एकादशी अगले दिन यानी 22 जून को मनाई जाएगी.
भगवान शिव के पुत्र को समर्पित है यह दिन
जब मासिक कार्तिगाई, गौण योगिनी और वैष्णव योगिनी एकादशी एक ही दिन पड़ते हैं, तो यह तिथि अत्यंत पुण्यदायी और दुर्लभ मानी जाती है. इन तीनों का संयोग आध्यात्मिक उन्नति, पापों से मुक्ति और दिव्य फल की प्राप्ति के लिए अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है. पुराणों के अनुसार मासिक कार्तिगाई, जिसे मासिक कार्तिगाई दीपम भी कहते हैं, त्योहार हर महीने तब मनाया जाता है जब चंद्र मास के दौरान कार्तिगाई नक्षत्र प्रबल होता है. यह भगवान शिव और उनके पुत्र भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) को समर्पित है और इसे अंधकार पर प्रकाश की विजय के रूप में मनाया जाता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की पूजा करने और दीप जलाने से जीवन से नकारात्मकता दूर होती है.
वैष्णव संप्रदाय वाले रखेंगे व्रत
गौण योगिनी एकादशी भले ही द्वितीय श्रेणी की मानी जाती हो, लेकिन इसका व्रत रखने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. विशेष रूप से यह व्रत रोग, दरिद्रता और मानसिक क्लेशों को हरता है. पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, वैष्णव योगिनी एकादशी का व्रत 88,000 ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य देता है. यह व्रत पापों का नाश करता है, विशेष रूप से पूर्व जन्मों के पापों से मुक्ति दिलाता है. यह कुष्ठ रोग और अन्य शारीरिक व्याधियों से राहत देता है.
वैष्णव संप्रदाय वाले करेंगे योगिनी एकादशी का व्रत
गौण योगिनी एकादशी गृहस्थ लोगों के लिए है, जबकि वैष्णव योगिनी एकादशी वैष्णव संप्रदाय के लोगों के लिए है. गृहस्थ लोग 22 जून को दोपहर में व्रत तोड़ेंगे, वहीं वैष्णव जन 23 जून को सूर्योदय के बाद व्रत तोड़ेंगे. इन तीनों का एक साथ आना एक दुर्लभ संयोग होता है, जिसमें उपवास, दान, दीपदान, विष्णु-स्मरण और शिव पूजन विशेष फलदायक सिद्ध होते हैं. इस दिन एकाग्रता से पूजा, व्रत और मंत्र जाप करने से सौभाग्य, आरोग्य और आध्यात्मिक सिद्धि की प्राप्ति होती है.
चाणक्य नीति से सीखें पैसे का सही इस्तेमाल, आपकी फाइनेंशियल ज़िंदगी बदल सकती हैं ये 6 खास बातें
22 Jun, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आज की जिंदगी में जहां हर दिन कोई नया ऑफर, सेल या इंस्टेंट पेमेंट ऑप्शन सामने आ जाता है, वहां पैसे की प्लानिंग सबसे ज्यादा जरूरी हो गई है. लोग कमाते हैं, खर्च करते हैं, पर बचत और निवेश की समझ अक्सर पीछे रह जाती है. ऐसे समय में अगर कोई कहे कि सालों पहले के एक विद्वान की बातें आज के समय में भी फायदेमंद हैं, तो शायद आप चौंक जाएं. लेकिन ये सच है. आचार्य चाणक्य की नीतियां न सिर्फ राजनीति और कूटनीति में कारगर थीं, बल्कि फाइनेंस और जीवन प्रबंधन में भी उनकी सोच आज के समय में एकदम सटीक बैठती है. हमारे खर्च बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन सेविंग और सुरक्षा के बारे में हम अक्सर आखिरी पल में सोचते हैं.
चाणक्य की नीति इस दौड़ में रुककर सोचने की सलाह देती है. वे कहते थे कि पैसों को लेकर लापरवाही करना जीवन को जोखिम में डालने जैसा है. उनका मानना था कि धन को सिर्फ कमाना काफी नहीं, उसे सही दिशा में चलाना और सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है. तो आइए जानते हैं कि चाणक्य की सोच से हम अपनी आज की फाइनेंशियल लाइफ को कैसे बेहतर बना सकते हैं.
1. अच्छे समय में बचाओ
आचार्य चाणक्य कहते थे कि जब संसाधन आपके पास भरपूर हों, तब ही बचत करनी चाहिए ताकि जब संकट आए तो आप तैयार रहें. आज की भाषा में कहें तो इमरजेंसी फंड बनाना बेहद जरूरी है. इसमें कम से कम 3 से 6 महीने का खर्च सुरक्षित रखें. और अगर आप सतर्क सोच वाले हैं, तो 12 से 24 महीने तक का फंड भी बनाएं. जैसे अगर आपको बोनस मिला है, तो नए गैजेट पर खर्च करने से बेहतर है कि आप उस पैसे को किसी फिक्स्ड इनकम या हाई रिटर्न प्लान में इन्वेस्ट करें.
2. बिना प्लानिंग कुछ न करें
आचार्य चाणक्य मानते थे कि जो इंसान भविष्य की सोच रखता है, वही असली समझदार होता है. आज के दौर में इसका मतलब है- रिटायरमेंट, बच्चों की पढ़ाई या घर खरीदने जैसे बड़े लक्ष्यों के लिए फाइनेंशियल प्लानिंग करना. अगर प्लान नहीं होगा, तो आप अनजाने में खर्चों के जाल में फंसते जाएंगे और कर्ज भी बढ़ता जाएगा. शुरुआत छोटे-छोटे कदमों से करें जैसे SIP, PPF या NPS. जैसे ₹5,000 महीने का SIP अगर 25 की उम्र से शुरू करें तो 50 की उम्र तक ₹1 करोड़ तक का फंड तैयार हो सकता है.
3. सिर्फ पैसा होना काफी नहीं, समझदारी भी जरूरी है
चाणक्य का मानना था कि बिना ज्ञान के धन बेकार है. आज के समय में जब सोशल मीडिया पर कई लोग झूठे वादों के साथ निवेश की सलाह देते हैं, वहां सही जानकारी सबसे जरूरी चीज है. पैसे से जुड़ी किसी भी स्कीम या निवेश से पहले खुद रिसर्च करें, किताबें पढ़ें या किसी अनुभवी व्यक्ति से सलाह लें.
4. छोटे-छोटे खर्च भी धीरे-धीरे जेब खाली कर देते हैं
आचार्य चाणक्य इस बात पर ज़ोर देते थे कि किसी भी छोटी बात को नजरअंदाज मत करो. आज के समय में 200-300 रुपये की कॉफी, सब्सक्रिप्शन जो हम यूज नहीं करते, और हर हफ्ते की ऑनलाइन डिलीवरी- ये सब मिलकर हजारों रुपये का नुकसान कर देती हैं. आपके बजट से जो पैसा रिस रहा है, वही बाद में आपके फाइनेंशियल स्टेबिलिटी में सबसे बड़ी रुकावट बन सकता है.
5. अगर पैसा सिर्फ पड़ा रहे तो उसका कोई फायदा नहीं
आचार्य चाणक्य के अनुसार पैसा वहीं तक फायदेमंद है जब तक वह किसी काम में लगे. अगर आप अपनी कमाई को सिर्फ सेविंग अकाउंट में छोड़ देते हैं तो महंगाई उसकी वैल्यू धीरे-धीरे खत्म कर देती है. इसलिए पैसे को निवेश में लगाएं- जैसे म्यूचुअल फंड, एफडी, गोल्ड या इक्विटी. एक लाख रुपये अगर सिर्फ सेविंग अकाउंट में रखा है तो वह 3-4% ही देगा, जबकि अच्छे निवेश ऑप्शन 9-10% तक ग्रोथ दे सकते हैं.
6. धन की सुरक्षा जीवन की सुरक्षा जैसी है
आचार्य चाणक्य के अनुसार धन को लेकर लापरवाही करना अपने जीवन को खतरे में डालने जैसा है. आज के समय में इसका मतलब है- हेल्थ इंश्योरेंस, टर्म प्लान, साइबर सेफ्टी जैसे सुरक्षा कवच. एक मेडिकल इमरजेंसी या एक्सीडेंट आपकी पूरी सेविंग को मिनटों में खत्म कर सकता है. इसलिए बीमा को खर्च न समझें, ये आपके भविष्य का सबसे मजबूत कवच है.
हम कई बार सोचते हैं कि पुराने समय की बातें आज के दौर में कैसे लागू हो सकती हैं, लेकिन चाणक्य की नीति इस सोच को पूरी तरह बदल देती है. उनकी हर बात आज के इस डिजिटल, खर्चीले और तेज रफ्तार दौर में और भी ज्यादा मायने रखती है. उनकी नीतियां सिर्फ नैतिकता नहीं सिखातीं, बल्कि पैसे को समझदारी से कमाना, बचाना और बढ़ाना भी सिखाती हैं.
चंद्र दोष होने पर होती हैं ये समस्याएं, जानें शुभ व अशुभ स्थिति, कुंडली में दोष होने पर इन मंदिरों के करें दर्शन
22 Jun, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कुंडली के नव ग्रहों में से चंद्रमा को मन और माता का कारक माना गया है. यह बेहद शीतल और शुभ ग्रह है. ऐसे में अगर किसी जातक की कुंडली में चंद्रमा शुभ हो तो ऐसे जातक को समाज में खूब मान-प्रतिष्ठा मिलती है और उसके जीवन में हमेशा शीतलता बनी रहती है. वैदिक ज्योतिष के अनुसार, सभी ग्रहों में चंद्र को सबसे तेज चलने वाला ग्रह माना गया है. चंद्रमा ढाई दिन में राशि परिवर्तन करता है. यह राशियों में कर्क राशि का स्वामी माना गया है, इसके साथ ही वृषभ राशि को इसकी उच्च राशि और वृश्चिक राशि को इसकी नीच राशि माना गया है.
कुंडली में चंद्रमा की शुभ व अशुभ स्थिति
कुंडली में चंद्रमा शुभ हो तो व्यक्ति मान-सम्मान, ज्ञान और धन में वृद्धि करता है, ऐसे व्यक्ति खुशमिजाज होते हैं और दोस्ती करने में माहिर होते हैं. लेकिन जब जातक की कुंडली में चंद्रमा अशुभ, कमजोर, पाप ग्रह राहु, केतु, शनि से पीड़ित हो तो जीवन को संघर्षों से भर देता है. ऐसे में एक बात स्पष्ट कर दें कि चंद्रमा जब-जब राहु और केतु से मिलता है तो चंद्र ग्रहण दोष और जब शनि के साथ युति बनाता है तो विष योग बनता है.
चंद्र दोष एक दाग की तरह
वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी भी जातक की कुंडली में चंद्र दोष एक दाग की तरह होता है. वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जब कुंडली में चंद्रमा खराब स्थिति में होता है तो यह चंद्र दोष बनाता है और व्यक्ति मानसिक रोगों, अनिद्रा और बेचैनी से ग्रस्त होता है. चंद्रमा समुद्र में ज्वार-भाटा का कारण बनता है. इसी तरह, चंद्रमा का मानव शरीर, मन और भावनाओं पर ठोस प्रभाव पड़ता है.
चंद्रमा शुभ ना हो तो ऐसी बनती है स्थिति
ज्योतिषाचार्य गायत्री शर्मा की मानें तो कुंडली में कमजोर चंद्रमा व्यक्ति के मन में नकारात्मकता भरता है. ऐसे जातक के मन में हमेशा अज्ञात भय बना रहता है. ऐसे व्यक्ति मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं. इसके साथ ही ऐसे जातकों को मां का पूर्ण सहयोग नहीं मिलता है. मां की सेहत को लेकर भी समस्या बनी रहती है. इसके साथ ही ऐसे जातकों को सांस संबंधी बीमारी के साथ, मित्रों से धोखा और करियर में बाधा भी आती है. ऐसे जातकों की याददाश्त प्रभावित होने के साथ भ्रम की स्थिति बनी रहती है और जातक का अपनी वाणी पर संयम नहीं रहता है.
चंद्र दोष के उपाय
वैसे महादेव की पूजा ऐसे जातकों के लिए हमेशा शुभ माना गया है. चंद्र दोष से पीड़ित व्यक्ति हर सोमवार को भगवान शिव के मंदिर में जाकर शिवलिंग पर दूध चढ़ाना चाहिए. साथ ही सोमवार को ब्राह्मण को चावल, अनाज, सफेद कपड़ा, चांदी दान करना चाहिए. इससे चंद्रमा की अशुभता में कमी आती है. सोमवार के दिन व्रत करने से भी चंद्रमा का शुभ फल मिलता है. इसके साथ ही जातक अगर मां की सेवा करें तो चंद्रमा बलशाली होता है.
चंद्र दोष के लिए इन मंदिरों में करें पूजा
देश में कुछ मंदिर ऐसे हैं जहां दर्शन करने मात्र से कुंडली में व्याप्त चंद्रमा के दोषों से मुक्ति मिलती है. आइए आपको देश के ऐसे मंदिरों के बारे में बताते हैं, अगर आपकी कुंडली में भी चंद्र दोष है तो आप इस मंदिर में जाकर दर्शन कर सकते हैं.
सोमनाथ मंदिर
इसमें सबसे पहला मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला स्थान रखने वाले गुजरात के द्वारका स्थित सोमनाथ मंदिर का है. इस ज्योतिर्लिंग के बारे में मान्यता है कि अपने श्राप से मुक्ति पाने के लिए सबसे पहले चंद्र देव ने यहां महादेव की पूजा की थी. मान्यता है कि इस मंदिर को पहली बार चंद्र देवता ने बनवाया था. चंद्रमा का एक नाम सोम भी है और यहां चंद्रमा ने अपने नाथ की पूजा की थी, इसलिए इस स्थान को सोमनाथ कहा जाता है. ऐसे में वैदिक ज्योतिष के अनुसार जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा नीच राशि में अथवा अस्त होकर कष्ट दे रहे हैं, उन्हें चंद्र दोष दूर करने के लिए सोमनाथ शिवलिंग ज्योतिर्लिंग का दर्शन करना चाहिए.
चंद्रेश्वर महादेव मंदिर
इसके साथ ही उत्तराखंड के ऋषिकेश में चंद्रेश्वर नगर स्थित गंगा तट के पास स्थित चंद्रेश्वर महादेव मंदिर के बारे में पौराणिक मान्यता है कि इस मंदिर में चंद्रमा ने 10 हजार वर्षों तक तपस्या की थी. जिसके बाद यहां चंद्रमा को दक्ष प्रजापति के श्राप से मुक्ति मिली थी. इसके साथ ही भगवान शिव ने इस स्थान पर चंद्रमा को अपने शीश पर धारण किया था. इस मंदिर में स्थित स्वयंभू शिवलिंग को चांदी का मुकुट लगाया जाता है. इस कारण ही मंदिर के आसपास के इलाके को चंद्रेश्वर नगर के नाम से जाना जाता है. इसकी कथा स्कंद पुराण में भी वर्णित है.
चंद्रमौलेश्वर और अनाथेश्वर मंदिर
कर्नाटक के उडुपी में दो प्राचीन मंदिर हैं, चंद्रमौलेश्वर और अनाथेश्वर मंदिर. भगवान शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए और चांदी के आसन पर विराजमान हुए और यहां एक मंदिर बनाया गया और अनंतेश्वर के रूप में उनकी पूजा की गई. चंद्र देव ने शाप से मुक्ति पाने के लिए पवित्र तालाब ‘चंद्र पुष्करिणी’ के तट पर भगवान शिव की पूजा की. भगवान शिव उनकी पूजा से प्रसन्न हुए और चंद्र के सामने प्रकट हुए और शाप से मुक्ति दिलाई. इसलिए शिव को चंद्रमौलेश्वर कहा जाता है और इसी घटना के बाद इस स्थान पर एक मंदिर बनाया गया, जो चंद्रमौलेश्वर मंदिर के रूप में लोकप्रिय है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चंद्र देव ने भगवान शिव को दक्ष प्रजापति के श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए तपस्या की थी. संस्कृत में, उडु का अर्थ है ‘तारा’ और पा का अर्थ है ‘नेता’. चंद्र सितारों का मुखिया है इस कारण, इस स्थान को ‘उडुपी’ के नाम से जाना जाने लगा. उडुपी बेंगलुरु से 407 किलोमीटर दूर है.
कैलासंथर मंदिर
तमिलनाडु के नवग्रह मंदिरों में से एक कैलासंथर मंदिर, कुंभकोणम से 18 किलोमीटर दूर थिंगलूर में स्थित है. यह मंदिर भगवान चंद्र या चंद्र देवता को समर्पित है, जो नवग्रहों में दूसरे ग्रह हैं. मंदिर की एक खासियत यह है कि यह एक शिव स्थल भी है और भगवान कैलासंथर (शिव) और उनकी पत्नी देवी पेरियानाकी अम्मन यहां पूजे जाने वाले मुख्य देवता हैं. किंवदंतियों के अनुसार भगवान चंद्र ने ब्रह्मा के श्राप से मुक्ति पाने के लिए शिव की पूजा की और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया. इस प्रकार, ऐसा माना जाता है कि जिन लोगों को चंद्र दोष है, वे इस मंदिर में प्रार्थना करके अपने दर्द और पीड़ा से राहत पा सकते हैं.
चंद्रोदय मंदिर
वृंदावन की पवित्र भूमि पर स्थित चंद्रोदय मंदिर के बारे में मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से चंद्र दोष समाप्त होता है और कुंडली में चंद्रमा की स्थिति सुदृढ़ होती है. यह मंदिर चंद्र दोष से मुक्ति पाने और कुंडली में चंद्रमा की स्थिति को मजबूत करने के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है.
बीमार जगन्नाथ महाप्रभु की सेहत में इस औषधि से आया सुधार, 27 जून को बिना परेशानी कर सकेंगे रथ यात्रा
22 Jun, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पुरी श्री जगन्नाथ मंदिर में विराजमान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की सेहत में अब तेजी से सुधार हो रहा है. विगत 10 दिनों से बुखार से पीड़ित महाप्रभु और उनके सहचर देवता ‘अनवसर घर’ नामक विश्रामगृह में विश्राम कर रहे थे और विशेष औषधीय उपचार प्राप्त कर रहे थे. एकादशी के शुभ दिन पर देवताओं को दसमूलमोदक नामक पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधि अर्पित की गई, जिसे 10 प्रकार की जड़ी-बूटियों और औषधीय मूलों से तैयार किया गया है. यह औषधि राजवैद्य (राजकीय वैद्य) द्वारा विशेष रूप से तैयार की गई थी और शुक्रवार को मंदिर प्रशासन को सौंप दी गई थी.
एकादशी पर किया खड़ी लागी का अनुष्ठान
देवसेवक भवानी दैतापति ने बताया कि योगिनी एकादशी का दिन महाप्रभु के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है. एकादशी पर ‘खड़ी लागी’ अनुष्ठान किया जाता है. शाम के समय महाप्रभु के पूरे शरीर पर यह लेप चढ़ाया जाएगा, जिससे उनके शरीर को ठंडक प्राप्त होगी. ठीक वैसे ही जैसे मानव शरीर में बुखार आने पर शरीर गर्म हो जाता है, वैसे ही महाप्रभु ने भी मानवीय लीला करते हुए इस पीड़ा को दर्शाया है. रात में चंदन लेप (सुगंधित ठंडी चंदन की परत) पूरे शरीर पर लगाया जाएगा, जिससे महाप्रभु का शरीर शीतल होगा और वे पूर्णतः स्वस्थ हो जाएंगे.
22 जून को दी जाएगी सूचना
22 जून को द्वादशी के दिन महाप्रभु जगन्नाथ के स्वस्थ होने की सूचना गजपति महाराज (पुरी के राजवंश) को दी जाएगी. इस अवसर पर राजप्रसाद भेजा जाएगा, जिसमें महाप्रभु के शरीर पर लगाए गए चंदन, उपचार में प्रयुक्त वस्तुएं और वस्त्र सम्मिलित होंगे. यह परंपरा यह दर्शाती है कि परम ब्रह्म, हमारे आराध्य भगवान जगन्नाथ अब पूर्णतः स्वस्थ हैं. महाप्रभु की सेहत में सुधार के बाद नेत्र उत्सव और नवजौवन दर्शन की तैयारी शुरू हो गई है.
15 दिन तक नहीं देते दर्शन
यह पर्व भगवान के फिर से दर्शन की शुरुआत मानी जाती है, जो रथ यात्रा के दो दिन पहले होता है. इससे पहले 15 दिनों तक भक्तों को दर्शन नहीं हो पाता क्योंकि महाप्रभु ‘मानव लीला’ के अंतर्गत अस्वस्थ रहते हैं. उन्होंने कहा कि भक्त समाज आनंदित है. कहा गया है कि जो व्यक्ति महाप्रभु को रथ पर विराजमान देखता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता. वह बैकुंठ की प्राप्ति करता है. यह एक ऐसा पर्व है जहां जाति-पंथ-धर्म का भेद समाप्त हो जाता है. सभी लोग भगवान के रथ को खींचते हैं, राजा हो या रंक.
आषाढ़ पूर्णिमा से हो जाते हैं बीमार
हर साल आषाढ़ मास में स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को 108 कलशों से स्नान कराया जाता है. मान्यता है कि इस स्नान के बाद तीनों विग्रह बीमार हो जाते हैं और 15 दिन तक अनवर्षर काल यानी सार्वजनिक दर्शन से दूर रहते हैं. इस दौरान उन्हें शुद्ध औषधियों और आयुर्वेदिक पथ्य द्वारा सेवा दी जाती है लेकिन एकादशी के मौके पर प्रभु के औषधि दी जाती हैं, जिससे प्रभु की सेहत में सुधार आने लगता है. पूरी तरह से स्वस्थ्य होने के बाद 27 जून को बिना किसी परेशानी के भाई-बहन के साथ भगवान जगन्नाथ रथयात्रा में शामिल हो सकेंगे.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 22 जून 2025)
22 Jun, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष :- योजनाएं फलीभूत हों, प्रत्येक कार्य में विलम्ब के कारण विशेष लाभ नही होगा।
वृष :- अधिकारियों का समर्थन फलप्रद होगा, परिश्रम से सोचे गये कार्य अवश्य ही बनेंगे।
मिथुन :- परिश्रम से सफलता के कार्य जुटायें, सोचे हुए कार्य पूर्ण अवश्य ही होवेंगे, ध्यान रखें।
कर्क :- आर्थिक चिन्ताऐं संभव हों, योजनाऐं फलीभूत होंगी, रुके कार्य अवश्य ही बनेंगे।
सिंह :- मानसिक बेचैनी, मित्रों से धोखा, अनायास विभ्रम कष्टप्रद होगा, ध्यान रखें।
कन्या :- इष्ट मित्र सुखवर्धक हों तथा मित्रों से मान-प्रतिष्ठा, प्रभुत्व वृद्धि अवश्य होगी।
तुला :- मान-प्रतिष्ठा पर आंच का भय, किसी की सहायता से सुरक्षा संभव होगी।
वृश्चिक :- आर्थिक योजन पूर्ण हों, सफलता के साधन बनेंगे, कार्य कुशलता से संतोष होगा।
धनु :- असमंजस की स्थिति बनी ही रहेगी, समय की अनुकूलता से लाभांवित होंगे।
मकर :- समय की अनुकूलता से लाभांवित हों, कल्याणकारी योजना अवश्य ही बनेगी।
कुम्भ :- तनाव-क्लेश, अशांति, मानसिक विभ्रम तथा उत्तेजना की वृद्धि होगी, ध्यान रखें।
मीन :- मानसिक तनाव व क्लेश, अशांति, धन लाभ, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, कार्य बनेंगे।
यूपी का यह मंदिर है मिनी बाबाधाम के नाम से प्रसिद्ध, दूसरे देश भी यहां आते भक्त, जानिए इसका इतिहास और मान्यता
21 Jun, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
उत्तर प्रदेश का महराजगंज जिला यहां के अलग-अलग हिस्सों में स्थित धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों के लिए जाना जाता है. वैसे तो जिले के कई हिस्सों में बहुत से धार्मिक स्थल मौजूद है लेकिन जब हम बात करते हैं. इटहिया शिव मंदिर की तो इसकी बात सबसे अलग है.यह प्राचीन इटहिया शिव मंदिर सिर्फ महराजगंज जिले के लोगों के लिए ही आस्था का बड़ा केंद्र नहीं है. बल्कि अब राष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी अलग पहचान बन रही है.
अपने इस ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व की वजह से भी इसे मिनी बाबा धाम के नाम से जाना जाता है. महराजगंज जिले के निचलौल क्षेत्र के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थिति है. यह मंदिर स्थानीय लोगों के बीच श्रद्धा का केंद्र तो है ही इसके साथ ही एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में भी जाना जाता है.
जमीन से निकला पंचमुखी शिवलिंग
प्राचीन इटहिया शिव मंदिर के पुजारी ने लोकल 18 को बताया कि त्रेता युग में जब दक्षिण दिशा से काकभुशुंडी महाराज और उत्तर की दिशा से भगवान शिव आ रहे थे. काकभुशुंडी ने अपने मुंह में फल की झूठी गुठली ले रखी थी जो यही पर गिर गई. समय बितता गया और कलयुग के आखिरी चरण में यहीं पर एक पेड़ विकसित हुआ. इसके साथ ही पेड़ के पास सही पंचमुखी शिवलिंग भी धीरे-धीरे निकलने लगा. अब इसी जगह एक मंदिर का निर्माण हो चुका है जो प्राचीन इटहिया शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है. यह मंदिर महराजगंज जिले के इटिया गांव में स्थित है. इटहिया शिव मंदिर पर सावन के पावन महीने में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती देखने को मिलती है.
पड़ोसी देश नेपाल से भी आते हैं श्रद्धालु
इसके साथ ही सावन के महीने में पूरे महीने मंदिर परिसर में एक बड़े मेले का आयोजन भी होता है. सावन के महीने में यहां महराजगंज जिले के साथ-साथ आसपास के जिलों के अलावा पड़ोसी देश नेपाल से भी श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या मंदिर में आते है. महीने भर चलने वाले इस मेले में स्थानीय दुकानदारों के साथ-साथ दूर-दराज के व्यापारी भी अपनी दुकानें लगाते हैं. यहां आने वाले श्रद्धालु सिर्फ पूजा-अर्चना ही नहीं करते हैं, बल्कि मेले में झूले, खाने-पीने और धार्मिक वस्तुओं की खरीददारी का आनंद भी लेते हैं.
अगर आपके भी सपने में दिख रहा इस रंग का सांप, तो जल्द बदलने वाला है भाग्य, पैसों की होगी बरसात
21 Jun, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में मानसून की बारिश के साथ सांपों की एंट्री भी हो गई है. यहां भारत के चार सबसे जहरीली प्रजातियों के साथ बिना जहर वाले सांप भी देखे जा रहे हैं. जबकि, बीते कुछ वर्षों में एक दुर्लभ सांप की मौजूदगी भी देखी गई है. सफेद रंग का यह सांप नर्मदा नदी और सतपुड़ा पर्वत के आस-पास के इलाको में अक्सर देखा जाता है. वहीं, धर्म शास्त्रों में सफेद रंग के सांप का दिखना बेहद शुभ माना जाता है.
खरगोन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य, गोल्ड मेडलिस्ट डॉ. बसंत सोनी बताते हैं कि, खरगोन जिला खेती किसानी, धरोहरों के अलावा सांपों की पूजा के लिए भी विषयों पहचान रखता है. यहां लोग सांप को पूजते हैं. यहां कई तरह के सांप पाए जाते हैं. धर्म शास्त्रों में सांपों की 144 प्रजातियां बताई गई है. सभी का अपना अपना महत्व है. लेकिन, इनमें सफेद रंग के सांप का अत्यधिक महत्व है.
मिलता है गढ़ा या रुका धन
धर्म ग्रंथों में भी सफेद सांप का जिक्र है. ज्योतिषी का मानना है कि ऐसे सांप दिखना किसी अच्छे समय का संकेत होता है. वो कहते हैं कि कई बार लोगों को सफेद सांप दिखने के बाद जमीन में गढ़ा धन, पुराना पैसा पाया गया या फिर रुका हुआ काम बन जाता है. इसलिए ग्रामीण इसे भगवान का संकेत मानते हैं.
सफेद सांप लक्ष्मी का स्वरूप!
अगर सांप सपने में साथ चलते हुए दिखाई दे, या सांप काट ले तो यह बेहद शुभ होता है. माना जाता है कि सपने सांप दिखाई दे तो कुछ ही समय में आपको अचानक लक्ष्मी (धन) की प्राप्ति होती है. अगर सफेद सांप के साक्षात दर्शन हो जाए तो माना जाता है कि तुरंत धन लाभ होने के संभावना है. जिले के ऊन गांव में ऐसा कई बार देखा और सुना गया है.
नौकरी, प्रमोसन, प्रॉपर्टी में भी लाभ
ज्योतिषी डॉ. बताते है कि, जिले में कई लोगों से सुना भी है कि, सांप के दिखने पर उन्हें कई तरह के लाभ मिलें है. जैसे – को प्रॉपर्टी बिक नहीं रही थी, वह सांप के दिखने के बाद तुरंत बिक गई. नौकरी नहीं लग रही थी, सांप दिखने के बाद नौकरी लग गई. किसी का प्रमोशन रुका हुआ था, लेकिन सांप के दिखने के बाद प्रमोशन हो गया.
इस दिन से बंद हो जाएंगे सभी मांगलिक काम, विष्णु छुट्टी पर, भोलेनाथ चलाएंगे सृष्टि
21 Jun, 2025 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू कैलेंडर के हिसाब से पूरे साल कुल 24 एकादशियों का आगमन होता है. इनका आगमन मानव कल्याण के लिए शुभ है. साल की अलग-अलग तिथियों में पड़ने वाली इन सभी 24 एकादशियों का अपना महत्त्व है.. आषाढ़ मास से चातुर्मास की शुरुआत हो जाती है, जिसमें आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन मास होते हैं. चातुर्मास भगवान शिव को समर्पित है, जिसमें उनकी पूजा, पाठ, आराधना और स्तोत्र आदि से सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं. आषाढ़ माह शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को हरिशयनी एकादशी का आगमन होता है. इस दिन से हरि प्रबोधिनी (देव उठनी) एकादशी तक हिंदू धर्म में सभी मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है.
चार महीने की छुट्टी पर भगवान
कि आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष में हरिशयनी एकादशी आती है. इस दिन विष्णु भगवान क्षीर सागर में विश्राम करने चले जाते हैं. सभी देव भी सो जाते हैं. विष्णु भगवान हरिशयनी एकादशी से अगले 4 महीने तक क्षीर सागर में आराम करते हैं और कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की हरि प्रबोधिनी एकादशी, जिसे देव उठनी एकादशी भी कहते हैं, को नींद से जाग जाते हैं. इन चार महीना तक पूरी सृष्टि का संचालन भोलेनाथ करते हैं.
ये सारे काम वर्जित
वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की देव उठनी एकादशी तक सभी मांगलिक कार्य जैसे विवाह संस्कार, पाणिग्रहण संस्कार, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार आदि सभी करने वर्जित हैं. यदि इन चार महीनों में शादी विवाह, गृह प्रवेश, भूमि खरीदना, बेचना, मुंडन संस्कार आदि किए जाते हैं, तो व्यक्ति को दोष लगता है जिसका उपाय करने के बाद भी निवारण नहीं होता है.
चातुर्मास के 4 महीने पूजा पाठ, पूजा अर्चना, आराधना, भक्ति आदि करने के लिए बेहद ही खास बताए गए हैं. इन चार महीनों में पूजा पाठ करने पर भक्तों को संपूर्ण से अधिक फल की प्राप्ति होती है. साल 2025 में देवशयनी एकादशी 6 जुलाई, रविवार को होगी.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन ( 21 जून 2025)
21 Jun, 2025 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष :- कार्य विफलत्व, समय पर योजनाएं फलीभूत हों किन्तु लाभ से वंचित रहेंगे।
वृष :- कहीं विस्फोटक स्थिति कष्टप्रद हो किन्तु भाग्य का सितारा प्रबल रहे, लाभ अवश्य होगा।
मिथुन :- कुटुम्ब की चिन्ताऐं मन व्याग्र रखें, आकस्मिक भय, उद्वेग अवश्य ही होगा।
कर्क :- सामाजिक कार्यों में मान-प्रतिष्ठा एवं धन लाभ का योग अवश्य ही बन जायेगा ध्यान दें।
सिंह :- धन लाभ, कार्य कुशलता से संतोष, व्यावसायिक क्षमता अनुकूल अवश्य ही बन जायेगी।
कन्या :- दैनिक कार्यगति मंद, मन में उद्विघ्नता बनेगी, रुके कार्यों का पूरा करने में मन लगायें।
तुला :- मानसिक उद्विघ्नता व स्वास्थ्य नरम रहे, कार्य में असंतोष होगा, समय का ध्यान अवश्य रखें।
वृश्चिक :- सफलता के साधन बनें, इष्ट मित्र फलप्रद सुखवर्धक होंगे, कर्मचारी सहयोग करेंगे।
धनु :- विरोधी तत्व परेशान करेंगे, अनायास बाधा, शरीर कष्ट, बचकर चलने से लाभ होगा।
मकर :- मानसिक बेचैनी, अशांति, तनाव, अधिकारियों से विरोध बनेगा, ध्यान अवश्य रखें।
कुम्भ :- लोगों से मेल-मिलाप के पश्चात भी कार्य अवरोध तथा बेचैनी अवश्य ही बनेगी।
मीन :- भाग्य का सितारा मंद रहे, तनाव-क्लेश तथा अशांति अवश्य बनेगी, धन का व्यय होगा।
कम्फर्ट के चक्कर में आप भी पहन लेते हैं मैले या फटे कपड़े? अपनी तरक्की के आप खुद हैं दुश्मन, कंगाल होने से पहले...
20 Jun, 2025 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हमारी रोजमर्रा की आदतें सिर्फ हमारे स्वास्थ्य और सोच को ही नहीं, बल्कि हमारे ग्रहों की स्थिति को भी प्रभावित करती हैं. विशेष रूप से शुक्र ग्रह, जो जीवन में सौंदर्य, ऐशोआराम, प्रेम, वैभव और सुख-सुविधाओं का प्रतिनिधित्व करता है, वह हमारे पहनावे और रहन-सहन से सीधे जुड़ा होता है. शुक्र ग्रह अगर मजबूत होता है, तो व्यक्ति के जीवन में प्रेम, आकर्षण, पैसे, गाड़ी, घर और रिश्तों में संतुलन बना रहता है. लेकिन अगर यही शुक्र कमजोर हो जाए तो व्यक्ति चाहे जितनी मेहनत करे, उसके जीवन में कष्ट, गरीबी, विवाद और असंतोष बना रहता है. ऐसी कौन-कौन सी आदतें हैं जो शुक्र ग्रह को कमजोर कर देती हैं और कब आपकी एक छोटी सी गलती जीवन में भारी परेशानी खड़ी कर सकती है.
1. लगातार पुराने, मैले या फटे कपड़े पहनना
बहुत से लोग आराम या आलस के चलते घर में या बाहर जाते समय भी पुराने या ढीले-ढाले कपड़े पहनते हैं. यह आदत न केवल आत्म-विश्वास को कमजोर करती है, बल्कि शुक्र को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है. शुक्र का संबंध सुंदरता और स्वच्छता से है. अगर आप बार-बार गंदे, पुराने या फटे कपड़े पहनते हैं, तो यह ग्रह अप्रसन्न हो सकता है. इससे आपके आकर्षण में कमी आती है और लोग आपकी ओर ध्यान नहीं देते.
2. इत्र, खुशबू या तेल का उपयोग न करना
शुक्र ग्रह को महक, सुंदरता और सौंदर्य प्रसाधनों से विशेष लगाव होता है. ऐसे में अगर आप पसीने की बदबू के साथ रहते हैं, बालों में तेल नहीं लगाते या इत्र-सुगंध का उपयोग नहीं करते, तो ये आदतें शुक्र को कमजोर कर देती हैं. ज्योतिष के अनुसार, जब शुक्र कमजोर होता है तो व्यक्ति सामाजिक रूप से अनाकर्षक लगने लगता है और रिश्तों में दूरी आने लगती है.
3. बिखरा-बिखरा रहना और गंदे बिस्तर पर सोना
अगर आप घर में भी अस्त-व्यस्त रहते हैं, बिस्तर को साफ-सुथरा नहीं रखते या रोज नहाकर कपड़े नहीं बदलते, तो ये सभी बातें शुक्र के लिए अशुभ संकेत मानी जाती हैं. शुक्र साफ-सफाई, व्यवस्था और आंतरिक ऊर्जा का प्रतीक है. गंदगी और अव्यवस्था शुक्र को नकारात्मक बना सकती है, जिससे धन हानि, रिश्तों में खटास और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां जन्म लेती हैं.
4. फटे जूते-चप्पल या घिसे बेल्ट का इस्तेमाल
कई लोग लंबे समय तक एक ही जूते या बेल्ट का इस्तेमाल करते हैं, चाहे वह टूट जाए या घिस जाए. यह आदत भी शुक्र को पीड़ा देती है. पुराने, टूटे, बदरंग या गंदे फैशन एक्सेसरीज का उपयोग करने से आपके व्यक्तित्व में नकारात्मकता आती है. यह आपके आत्मबल को कमजोर कर सकता है और आपके आसपास के लोगों के साथ संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है.
5. साफ-सुथरा और संतुलित खानपान का अभाव
शुक्र ग्रह स्वाद, मिठास और तालमेल का प्रतिनिधि है. अगर आप बार-बार बासी खाना, जूठा या असंतुलित भोजन करते हैं, तो इससे न केवल स्वास्थ्य बिगड़ता है बल्कि शुक्र भी कमजोर होता है. इससे त्वचा से जुड़ी समस्याएं, मूड स्विंग, और प्रेम संबंधों में खटास जैसे दुष्प्रभाव हो सकते हैं.
शुक्र को प्रसन्न करने के उपाय
1. हर शुक्रवार सफेद या गुलाबी रंग के साफ कपड़े पहनें.
2. सुगंधित इत्र या चंदन का तिलक लगाएं.
3. दुर्गा या लक्ष्मी माता की पूजा करें, सफेद मिठाई चढ़ाएं.
4. कभी फटे पुराने कपड़े या जूते दान न करें, बल्कि अच्छे साफ वस्त्र ही दान करें.
5. अपने बेडरूम को साफ-सुथरा और सुसज्जित रखें.
'जगन्नाथ के भात को जगत पसारे हाथ', दुनिया के सबसे बड़े रसोईघर में तैयार किया जाता है महाप्रसाद
20 Jun, 2025 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हर वर्ष आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की द्वितीया में भगवान जगन्नाथ स्वामी की यात्रा ओडिशा के पुरी में धूम धाम से निकाली जाती है. देश और विदेश से इस भव्य यात्रा में लाखों लोग शामिल होने पहुंचते हैं. इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ के रथ के साथ दो और रथ भी शामिल होते हैं. इनमें से एक में भाई बलराम और एक में बहन सुभ्रदा विराजमान होती हैं. इस वर्ष यह यात्रा 27 जून से होने जा रही है और यह दशमी तिथि यानी 5 जुलाई को समाप्त होगी. आइए जानते हैं
ऐसा कहा जाता है कि, इस रथ यात्रा में शामिल होने मात्र से ही पापों से मुक्ति मिलती है और रथ को खींचने वाले लोगों को कई यज्ञों के बराबर फल मिलता है. लेकिन यहां मिलने वाला प्रसाद का भी काफी महत्व बताया गया है. इसे यहां ‘महाप्रसाद’ के नाम से जाना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि, यह जगन्नाथ स्वामी का मुख्य प्रसाद होता है. आइए जानते हैं इससे जुड़ी प्रमुख बातें.
मिट्टी के बर्तन में बनाया जाता है प्रसाद
आपको बता दें कि, हिन्दू धर्म में मिट्टी को पवित्र माना गया है और पौराणिक काल से इससे बने बर्तनों में खाना बनाया जाता रहा है. ऐसे में प्रभु जगन्नाथ स्वामी का प्रिय प्रसाद भी मिट्टी के बर्तन में ही बनाया जाता है. इसके लिए एक खास प्रक्रिया भी होती है, जिसके अनुसार महाप्रसाद बनाते समय सात बड़े मिट्टी के बर्तनों को एक के ऊपर एक रखा जाता है.
महारसोई में बनता है महा प्रसाद
भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद उड़ीसा के पुरी में तैयार होता है. जिस जगह प्रसादी तैयार की जाती है उसे दुनिया का सबसे बड़ा रसोई घर भी कहा जाता है. क्योंकि यहां करीब 500 रसोइए और करीब 300 सहयोगी मिलकर प्रसादी को तैयार करते हैं. जो 56 भोग से मिलकर बनती है. इसे यहां दर्शन करने के लिए प्रतिदिन आने वाले करीब 2,000 से 2,00,000 के श्रद्धालुओं को वितरित किया जाता है.
सिर्फ पुरी में नहीं यहां भी बनता है महाप्रसाद
जगन्ना स्वामी की मुख्य रथ यात्रा भले ही ओडिशा के पुरी में निकलती है, लेकिन प्रसाद पुरी के अलावा छत्तीसगढ़ में भी बनाया जाता है. हालांकि, पुरी में जहां चावल की खिचड़ी का भोग लगया जाता है, वहीं छत्तीसगढ़ में मालपुआ का भोग लगाया जाता है. जिसके बाद इसे प्रसादी के रूप में यहां कतारों में खड़े श्रद्धालुओं को वितरित किया जाता है.
चित्रकूट का चमत्कारी पर्वत! जहां दंडवत परिक्रमा से दूर होते हैं पाप, मिलती है मनचाही मुराद
20 Jun, 2025 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
धर्म, आस्था और तप की नगरी चित्रकूट को भगवान श्रीराम की तपोभूमि माना जाता है. यह वही पवित्र भूमि है जहां प्रभु श्रीराम ने अपने वनवास के 14 सालों में से करीब साढ़े ग्यारह साल का समय बिताया था. यहीं पर स्थित है एक ऐसा दिव्य पर्वत, कामदगिरी (Kamadgiri Parvat) जिसे श्रद्धालु केवल एक पहाड़ नहीं, बल्कि स्वयं भगवान राम का स्वरूप मानते हैं. कहते हैं कि इस पर्वत की परिक्रमा मात्र से ही पापों का नाश हो जाता है और हर मनोकामना भी पूर्ण होती है.
क्यों इतनी खास है कामदगिरी पर्वत की परिक्रमा?
कामदगिरी पर्वत की परिक्रमा लगभग 5 किलोमीटर की होती है, जिसे लाखों श्रद्धालु हर साल नंगे पांव करके जाते हैं. परिक्रमा का मार्ग धार्मिक स्थलों और मंदिरों से होकर गुजरता है. भक्तों की मान्यता है कि इस परिक्रमा से न सिर्फ मानसिक और आत्मिक शुद्धि मिलती है, बल्कि जिनकी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं, वे यहां आकर दंडवत परिक्रमा करते हैं. दंडवत परिक्रमा का अर्थ है शरीर को जमीन पर सीधा लिटाकर, जितनी दूरी शरीर की लंबाई होती है, उतनी दूरी पर फिर से दंडवत करना. इस तरह पूरा चक्र पूरा करते हैं. यह परिक्रमा शरीर से अधिक श्रद्धा और धैर्य की परीक्षा होती है.
क्या है कामदगिरी का धार्मिक इतिहास?
पुजारी राकेश कुमार पांडे बताते हैं कि यह वही पर्वत है जहां भगवान राम ने ऋषियों और साधुओं के साथ कई सालों तक साधना की थी. जब उन्हें वनवास मिला तो वे चित्रकूट आए और यहीं कामदगिरी पर्वत पर वास किया. यहीं उन्होंने भरत से मिलकर ‘राज धर्म’ पर संवाद किया था और यहीं उन्हें कामतानाथ के रूप में पूजा जाने लगा.
जब प्रभु श्री राम ने दिया आशीर्वाद
मान्यता के अनुसार, एक बार जब श्रीराम चित्रकूट से प्रस्थान कर रहे थे, तो यहां के संत और ऋषि उनके चरणों में गिर पड़े और बोले, “प्रभु, अगर आप चले जाएंगे तो हमारा उद्धार कैसे होगा?” इस पर प्रभु श्रीराम ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा, “मैं सीता के साथ यहीं वास करूंगा. जो भी भक्त श्रद्धा से इस पर्वत की परिक्रमा करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी.” यही कारण है कि आज भी हजारों भक्त यहां परिक्रमा करते हैं.
कामदगिरी पर्वत की परिक्रमा सिर्फ धार्मिक रस्म नहीं, भक्ति और समर्पण की गहराई का प्रतीक है. भक्त यहां न सिर्फ सामान्य परिक्रमा करते हैं, बल्कि दंडवत परिक्रमा के जरिए अपनी श्रद्धा भी प्रकट करते हैं. ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से यह परिक्रमा करता है, उसकी हर अधूरी इच्छा पूरी हो जाती है.
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