धर्म एवं ज्योतिष
गुरु गोरखनाथ की वजह से आज भी ज्वालादेवी मंदिर में उबल रहा पानी, मकर संक्रांति पर लगता है खिचड़ी मेला
10 Jan, 2026 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मकर संक्रांति पर गोरखनाथ मंदिर में लगने वाला खिचड़ी मेला श्रद्धा, मनोरंजन और रोजगार का संगम है. पूरी प्रकृति को ऊर्जस्वित करने वाले सूर्यदेव के उत्तरायण होने पर महायोगी गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की अनूठी परंपरा पूरी तरह लोक को समर्पित है. गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी के रूप में चढ़ाया जाने वाला अन्न वर्षभर जरूरतमंदों में वितरित किया जाता है. मंदिर के अन्न क्षेत्र में कभी भी कोई जरूरतमंद पहुंचा है तो खाली हाथ नहीं लौटा. ठीक वैसे ही, जैसे बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाकर मन्नत मांगने वाला कभी निराश नहीं होता. मंदिर में खिचड़ी का यह पर्व इस वर्ष 15 जनवरी को मनेगा.
त्रेतायुग से खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा
गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा त्रेतायुगीन मानी जाती है. मान्यता है कि तत्समय आदियोगी गुरु गोरखनाथ एक बार हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मां ज्वाला देवी के दरबार में पहुंचे, जहां मां ने उनके भोजन का प्रबंध किया. कई प्रकार के व्यंजन देख बाबा ने कहा कि वह तो योगी हैं और भिक्षा में प्राप्त चीजों को ही भोजन रूप में ग्रहण करते हैं. उन्होंने मां ज्वाला देवी से पानी गर्म करने का अनुरोध किया और स्वयं भिक्षाटन को निकल गए.
इसलिए आज भी उबल रहा है ज्वाला देवी का पानी
भिक्षा मांगते हुए गुरु गोरखनाथ गोरखपुर आ पहुंचे और राप्ती और रोहिन के तट पर जंगलों में बसे इस स्थान पर धूनी रमाकर साधनालीन हो गए. उनका तेज देख लोग उनके खप्पर में अन्न (चावल, दाल) दान करते रहे. मकर संक्रांति का पर्व आने पर यह परंपरा खिचड़ी पर्व के रूप में परिवर्तित हो गई. तब से बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने का क्रम हर मकर संक्रांति पर अहर्निश जारी है. कहा जाता है कि उधर ज्वाला देवी के दरबार में बाबा की खिचड़ी पकाने के लिए आज भी पानी उबल रहा है.
नेपाल से लाखों की संख्या में आते हैं भक्त
मकर संक्रांति के पावन पर्व पर गोरक्षपीठाधीश्वर नाथ पंथ की विशिष्ट परंपरानुसार गुरु गोरखनाथ को लोक आस्था की खिचड़ी चढ़ाकर समूचे जनमानस की सुख समृद्धि की मंगलकामना करते हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार तथा देश के विभिन्न भागों के साथ-साथ पड़ोसी राष्ट्र नेपाल से भी लाखों की तादाद में श्रद्धालु शिवावतारी बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाते हैं. मकर संक्रांति के दिन भोर में सबसे पहले गोरक्षपीठ की तरफ से पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ खिचड़ी चढ़ाकर बाबा को भोग अर्पित करते हैं.
नेपाल के राजपरिवार से आती है खिचड़ी
तत्पश्चात नेपाल राजपरिवार की ओर से आई खिचड़ी बाबा को चढ़ाई जाती है. इसके बाद मंदिर के कपाट खोल दिए जाते हैं और जनसामान्य की आस्था खिचड़ी के रूप में निवेदित होनी शुरू हो जाती है. खिचड़ी महापर्व को लेकर मंदिर व मेला परिसर सज धजकर तैयार है. प्रशासन के साथ ही मंदिर प्रबंधन की तरफ से श्रद्धालुओं के ठहरने और अन्य सुविधाओं के पूरे इंतजाम किए गए हैं. गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद भी अब तक तीन बार खिचड़ी मेला की तैयारियों की समीक्षा कर चुके हैं.
मंदिर में बिना भेदभाव सबकी रोजी-रोटी का इंतजाम
गोरखनाथ मंदिर सामाजिक समरसता का ऐसा केंद्र है, जहां जाति, पंथ और मजहब की बेड़ियां टूटती नजर आती हैं. इसके परिसर में क्या हिंदू, क्या मुसलमान, सबकी दुकानें हैं. यानी बिना भेदभाव सबकी रोजी-रोटी का इंतजाम है. यही नहीं, मंदिर परिसर में लगने वाला खिचड़ी मेला भी जाति-धर्म के बंटवारे से इतर हजारों लोगों की आजीविका का माध्यम बनता है. मंदिर परिसर में नियमित रोजगार करने वालों से लेकर मेले में दुकान लगाने वालों तक, बड़ी भागीदारी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की होती है. उन्होंने कभी कोई भेदभाव महसूस नहीं किया, बल्कि अपनेपन के भाव से विभोर होते रहते हैं. मेले में खरीदारी से लेकर मनोरंजन के साधनों तक के भरपूर इंतजाम हैं.
भगवान शिव के इस मंदिर में विशेष अनुष्ठानों के साथ मनाया जाता है पोंगल, इस मंदिर की नहीं है कोई नींव
10 Jan, 2026 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
14 जनवरी को मकर संक्रांति का पर्व उत्तर भारत में मनाया जाता है और इस दिन से दक्षिण भारत में पोंगल की शुरुआत होती है. पोंगल का पर्व तमिलनाडु के तंजावुर में खास तरह से मनाया जाता है और यह पर्व 14 से शुरू होकर 17 जनवरी तक चलता है. आइए जानते हैं इस मंदिर में किस तरह मनाया जाता है पोंगल का उत्सव...
उत्तर भारत में मकर संक्रांति तो दक्षिण भारत में पोंगल मनाया जाता है, जिसमें सूर्य की उपासना कर चावल का भोग लगाया जाता है. इसका सीधा संबंध सूर्य के मकर राशि में प्रवेश (मकर संक्रांति) से है, जो ज्योतिष में अत्यंत शुभ माना गया है. शास्त्रों के अनुसार सूर्य समस्त जीवन-ऊर्जा का स्रोत है. जब सूर्य उत्तरायण होता है, तब देवत्व बलवान होता है और यह काल साधना, यज्ञ, दान और कृतज्ञता के लिए श्रेष्ठ माना गया है. पोंगल के दिन भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर में चार दिन तक उत्सव मनाया जाता है और सूर्य की उपासना के साथ-साथ चावल और गुड़ से बना भोग अर्पित किया जाता है. आइए जानते हैं भगवान शिव के इस मंदिर के बारे में...
पोंगल का पर्व 14 जनवरी से शुरू होकर 17 जनवरी तक चलने वाला है. पोंगल पूरे दक्षिण भारत का मुख्य त्योहार है, लेकिन तमिलनाडु के तंजावुर में इसे विशेष प्रकार से मनाया जाता है. तंजावुर को चावल का कटोरा कहा जाता है, जहां मौजूद बृहदेश्वर मंदिर अपने आप में खास है. यह पर्व फसल कटाई के समय मनाया जाता है, इसलिए यह किसान और धरती माता के सम्मान का पर्व है. गो-पूजन (मट्टू पोंगल) के द्वारा पशुधन के योगदान को स्वीकार किया जाता है, जो वैदिक जीवन-पद्धति का अभिन्न अंग है.
तमिलनाडु के तंजावुर में बना बृहदेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित मंदिर है, लेकिन पोंगल के दिन मंदिर में भव्य आयोजन होता है. मंदिर को फूलों से सजाया जाता है और सुबह से लेकर रात तक मंदिर में विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं.भक्त सूर्य की उपासना के साथ-साथ चावल और गुड़ से बना भोग भगवान शिव को अर्पित करते हैं और कुछ किसान भक्त मंदिर में नई फसलों के कुछ अंश को भगवान को चढ़ाते हैं.
दक्षिण भारत में पोंगल को फसल कटाई और सूर्य की उपासना से जोड़ा जाता है. चार दिन चलने वाले पोंगल में हर दिन मंदिर में विशेष पूजा पाठ होती है. पोंगल के मौके पर बृहदेश्वर मंदिर में भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए अनुष्ठान करते हैं और सारे पापों और रोगों से मुक्ति पाने की कामना करते हैं.
बृहदेश्वर मंदिर तंजावुर का सबसे प्राचीन मंदिर है, जिसकी वास्तुकला से लेकर शिल्पशैली लाजवाब है. मंदिर को सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया गया है. चोल सम्राट राजाराजा चोल प्रथम ने मंदिर का निर्माण कराया था और मंदिर का निर्माण ग्रेनाइट पत्थर से किया गया है. यह उस समय का पहला मंदिर है, जिसका निर्माण ग्रेनाइट पत्थर से किया गया है. तंजावुर के 100 किलोमीटर के दायरे तक में ग्रेनाइट पत्थर उपलब्ध नहीं है.
985-1012 ई. में पत्थर कहां से मंगाया गया, ये किसी को नहीं पता. बृहदेश्वर मंदिर कई मायनों में खास है, क्योंकि इस मंदिर की नींव नहीं है और इसे 16 फीट ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया है. इसका गोपुरम 13 मंजिल का बना है और गोपुरम बनाने में बड़े ग्रेनाइट पत्थर का इस्तेमाल किया गया है, जिसका वजन तकरीबन 80 हजार किलोग्राम है. बताया जाता है कि मंदिर को बनाने में 7 साल लगे थे और मंदिर की दीवारों से लेकर गोपुरम तक पर द्रविड़ शैली की झलक देखने को मिलती है.
अगर यहां है तिल तो अनलिमिटेड किस्मत, सात पुश्तों तक नहीं होगी पैसों की कमी! क्या है आपके पास
10 Jan, 2026 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
क्या आप जानते हैं कि आपके शरीर पर मौजूद तिल आपकी किस्मत का राज खोल सकते हैं? सामुद्रि शास्त्र के अनुसार, शरीर के कुछ खास हिस्सों पर तिल होना अटूट धन और सुख-समृद्धि का संकेत है. जिस व्यक्ति के शरीर के इस हिस्से में तिल होगा वह बहुत भाग्यशाली होगा. सीधा कुबेर की कृपा उनपर होगी. ऐसे लोगों में कभी भी धन की कमी नहीं होगी. उनकी सात पुश्तें इस धन से मामलामाल हो सकती है. जानिए क्या आपके पास भी है वो लकी तिल'!
एस्ट्रो टिप्स: ज्योतिष शास्त्र इंसान की जिंदगी के हर छोटे-बड़े पहलू को खास महत्व देता है. ये छोटी-बड़ी बातें भी हमें भविष्य के बारे में संकेत देती हैं. शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर दिखने वाले छोटे काले तिल भी किसी व्यक्ति के भविष्य के बारे में जानकारी देते हैं. कई बार शरीर के किसी खास हिस्से पर तिल उनकी किस्मत के बारे में बताता है. ये ज्योतिष की एक शाखा सामुद्रिक शास्त्र में विस्तार से बताया गया है.
सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार काले तिल के मुकाबले लाल तिल का होना अधिक शुभ और धन प्राप्त करने वाला माना जाता है. वहीं जिन लोगों के अंगों पर तिल का आकार जितना स्पष्ट और गहरा होगा, उसका प्रभाव उतना ही मजबूत होता है. छोटे और धुंधले तिल का असर कम होता है. इसलिए तिल देखते समय इन बातों को जरूर ध्यान में रखें.
काशी के ज्योतिषाचार्य पंडित विकास पांडे बताते हैं कि हर इंसान के शरीर पर तिल होना आम बात है, लेकिन अगर किसी की हथेली पर तिल हो और वो मुट्ठी बंद करने पर छुप जाए, तो ऐसे व्यक्ति को बहुत ही भाग्यशाली माना जाता है, सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार ऐसे व्यक्तियों में कभी पैसे की कमी नहीं है. यह तिल पैसे का अनलिमिटेड संकेत है. ऐसे व्यक्ति पैसे से अपनी आगे की पीढ़ी का भी भला करता है.
पंडित विकास पांडे कहते हैं कि सामुद्रिक शास्त्र के मुताबिक अगर दाहिने हाथ में तिल हो और तिल स्पष्ट और उभरे हुए हो तो उसका बेहद महत्व है. खासकर अगर ये तिल दाहिने हाथ पर हो तो मुट्ठी बांधने के फायदे और भी ज्यादा होते हैं और ऐसे लोगों को जिंदगी में पैसों की कभी कमी नहीं होती ऐसा बताया गया है. ऐसे लोगों के घरों में सात पुश्तों तक पैसों की कमी नहीं होती है.
शास्त्रों के मुताबिक ऐसे लोग आर्थिक रूप से बहुत अमीर होते हैं. उन्हें जीवनभर लक्ष्मी माता का आशीर्वाद मिलता है. उनके पास कभी भी धन की कमी नहीं रहती और बहुत कम कोशिश में भी ऐसे लोग हमेशा खूब सारा धन जमा कर लेते हैं. ऐसे लोगों के आसपास रहने वाले लोग भी मालामाल हो जाते हैं. ऐसे लोगों का सानिध्य हर कोई चाहता है.
पंडित विकास पांडे ने बताया kf इनका भाग्य बहुत मजबूत होता है. ऐसे लोग सिर्फ धन ही नहीं बल्कि जबरदस्त किस्मत और गजब का आत्मविश्वास भी रखते हैं. ये लोग हर हाल में मानसिक रूप से मजबूत रहते हैं. इनके पास अच्छा टैलेंट और कला भी होती है. ये जो भी काम करते हैं उसमें माहिर हो जाते हैं.
पंडित विकास पांडे ने बताया कि ऐसे लोग हमेशा धन से भरे रहते हैं. पंडित जी ने कहा कि जिनके हाथ पर तिल होता है, उन्हें कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए. उन्हें सबके साथ मिलजुल कर और सरल स्वभाव से रहना चाहिए. ज्यादा आक्रामक नहीं होना चाहिए. उन्हें लोगों से मधुर संबंध रखना चाहिए.
यह जानकारी समुद्र शास्त्र और मान्यताओं पर आधारित है, इसे केवल सूचना के तौर पर लें. किसी भी तरह की सलाह मानने से पहले ज्योतिष एक्सपर्ट से बात करें.
मकर संक्रांति पर यहां सूर्य पूजा से पहले होती है इस शक्तिपीठ के दर्शन, आधी रात को लगता है 56 व्यंजनों का भोग
10 Jan, 2026 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
माता सती के शरीर के अंग जहां जहां गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए. आज हम बात कर रहे हैं बिहार के सहरसा में मौजूद माता के एक शक्तिपीठ के बारे में. बताया जाता है कि मकर संक्रांति के दिन यहां माता को 56 व्यंजनों का भोग लगाया जाता है और उसके बाद सूर्य की उपासना की जाती है. आइए जानते हैं मकर संक्रांति पर इस मंदिर में क्या क्या होता है...
उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक मकर संक्रांति का त्योहार अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है. बिहार में एक ऐसा मंदिर स्थापित है, जहां सूर्य की उपासना से पहले मां का आशीर्वाद लिया जाता है. हम बात कर रहे हैं बिहार के उग्रतारा मंदिर की, जहां मकर संक्रांति पर मां की भव्य उपासना की जाती है और आधी रात छप्पन भोग लगाया जाता है. बताया जाता है कि यहां कोई भी माता के दरबार से खाली नहीं जाता और उसकी हर इच्छा पूरी होती है. बताया जाता है कि ऋषि वशिष्ठ ने उग्र तप की बदौलत मां भगवती को प्रसन्न किया था, उनके प्रथम साधक की इस कठिन साधना के कारण ही भगवती वशिष्ठ आराधिता उग्रतारा के नाम से जानी जाती हैं. आइए जानते हैं मां भगवती के इस मंदिर के बारे में...
सहरसा स्टेशन से लगभग 17 किलोमीटर पश्चिम में महिशी गांव में उग्रतारा मंदिर स्थित है, जिसे महिषासुरमर्दिनी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. मंदिर बहुत प्राचीन है. मंदिर के गर्भगृह में भगवती तारा की प्रतिमा विराजमान हैं. भगवती तारा की मान्यता इतनी ज्यादा है कि भक्त दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं. मकर संक्रांति के दिन मां के भव्य दर्शन होते हैं. भक्त आशीर्वाद लेते हैं और फिर भगवान सूर्य की उपासना करते हैं.
मकर संक्रांति पर मां उग्रतारा को 56 भोग का प्रसाद चढ़ाया जाता है, जिसमें सामिष और निरामिष दोनों प्रकार के व्यंजन और खट्टे-मीठे भोजन भी शामिल किए जाते हैं. मां को भोग लगाने के बाद प्रसाद को भक्तों में वितरित कर दिया जाता है. माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन मां का पूजन करने से जीवन में सुख और समृद्धि का वास होता है और हर कष्ट से मुक्ति मिलती है
मां उग्रतारा का मंदिर 51 शक्तिपीठों में शामिल है, जहां माता सती की बाईं आंख गिरी थी. आंख गिरने की वजह से इस पवित्र स्थान को उग्रतारा नाम दिया गया. मंदिर में तंत्र साधना से जुड़े अनुष्ठान भी होते हैं. वहीं, तंत्र विद्या में सिद्धि पाने वाले अघोरी और साधु मंदिर में विशेष अनुष्ठान करते हैं. कहा जाता है कि अगर किसी पर काले जादू का प्रभाव है, तो मां तारा का दर्शन करने से काला जादू भी कमजोर पड़ जाता है.
स्थानीय मान्यता है कि यह मंदिर इच्छापूर्ति और मुक्ति का मार्ग प्रदान करता है. नवरात्रि के मौके पर मंदिर में विशाल मेला भी लगता है, जहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. नवरात्रि के अलावा हर शनिवार को भी मंदिर में भक्तों का तांता देखने को मिलता है. इस शक्तिपीठ में हर भक्त की इच्छा पूरी होती है. बताया जाता है कि मंडन मिश्र की पत्नी विदुषी भारती से आदिशंकराचार्य का शास्त्रार्थ यहीं हुआ था, जिसमें शंकराचार्य की हार हुई थी.
शक्ति पुराठ के अनुसार, माता सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शिव के अपमान से क्रोधित होकर आत्मदाह कर लिया था. भगवान शिव महामाया सती के मृत शरीर को लेकर इधर-उधर ब्रह्मांड में घूम रहे थे, इससे होने वाली प्रलय को देखते हुए भगवान विष्णु ने शरीर को 52 भागों में विभक्त कर दिया था. सती के शरीर के हिस्सा, जिसे जिस जगह पर गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाएं. बताया जाता है कि बिहार के इस हिस्से में माता सती का नेत्र भाग गिरा था.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (10 जनवरी 2026)
10 Jan, 2026 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- कार्य कुशलता से संतोष तथा मनोबल उत्सावर्धक होगा, उत्साह बना रहेगा।
वृष राशि :- स्वभाव में खिन्नता होने से हीन भावना से बचियेगा अन्यथा कार्य मंद अवश्य होगा।
मिथुन राशि :- अशांति तथा विनम्रता से बचिये तथा झगड़ा होने की संभावना अवश्य बनेगी।
कर्क राशि :- स्त्री वर्ग से हर्ष, ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी, रुके कार्य अवश्य ही बनेंगे ध्यान दें।
सिंह राशि :- आलोचना से बचिये, कार्य कुशलता से संतोष होगा, कार्य व्यवसाय पर ध्यान दें।
कन्या राशि :- धीमी गति से सुधार अपेक्षित है, सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि अवश्य होगी।
तुला राशि :- स्त्री वर्ग से हर्ष-उल्लास, गुप्त शत्रुओं से चिन्ता तथा कुटुम्ब में समस्या बनेगी।
वृश्चिक राशि :- योजना फलीभूत होगी, इष्ट मित्र सुखवर्धक होगा तथा कार्य अवरोध होगा।
धनु राशि :- कुटुम्ब की समस्या कष्टप्रद होगी तथा धन का व्यर्थ व्यय होगा सावधान रहें।
मकर राशिः- कुटुम्ब में सुख मान-प्रतिष्ठा, बड़े लोगों से मेल-मिलाप अवश्य ही होगा।
कुंभ राशि :- भाग्य का सितारा प्रबल होगा, दैनिक गति मंद तथा बिगड़े कार्य अवश्य ही बनेंगे।
मीन राशि :- कार्य व्यवसाय गति अनुकूल बनेगी, समृद्धि के साधन अवश्य बनेंगे।
माघ की पहली एकादशी कब है? बनेंगे 3 शुभ योग, विष्णु पूजा में तिल का विशेष उपयोग, जानें तारीख, मुहूर्त, पारण समय, महत्व
9 Jan, 2026 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
षटतिला एकादशी को माघ माह की पहली एकादशी कहा जाता है. माघ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को षटतिला एकादशी होती है. षटतिला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और उनको तिल चढ़ाते हैं. इस एकादशी व्रत में तिल का विशेष उपयोग होता है, इस वजह से इसे षट्तिला एकादशी कहा जाता है. जो लोग षट्तिला एकादशी का व्रत रखते हैं, उनके जीवन में सुख, समृद्धि, पुण्य की प्राप्ति होती है, वहीं पाप और कष्ट मिट जाते हैं. पंचांग से जानते हैं कि षट्तिला एकादशी या माघ की पहली एकादशी कब है? षट्तिला एकादशी की तारीख, मुहूर्त और पारण समय क्या है?
माघ की पहली एकादशी या षट्तिला एकादशी की तारीख
पंचांग के अनुसार माघ कृष्ण एकादशी तिथि का प्रारंभ 13 जनवरी दिन मंगलवार को दोपहर में 3 बजकर 17 मिनट पर होगा. यह तिथि 14 जनवरी दिन बुधवार को शाम 5 बजकर 52 मिनट तक मान्य रहेगी. ऐसे में उदयातिथि के अनुसार माघ की पहली एकादशी या षट्तिला एकादशी का व्रत 14 जनवरी बुधवार को है. यह नए साल 2026 की पहली एकादशी भी है.
षट्तिला एकादशी मुहूर्त
षट्तिला एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त 05:27 ए एम से 06:21 ए एम तक है. इस समय में आप स्नान आदि से निवृत होकर षट्तिला एकादशी व्रत और विष्णु पूजा का संकल्प कर लें. उसके बाद सुबह में 07:15 ए एम से लेकर 09:53 ए एम के बीच भगवान विष्णु की पूजा कर सकते हैं. इस दिन अभिजीत मुहूर्त नहीं है. एकादशी पर राहुकाल दोपहर में 12:30 पी एम से लेकर दोपहर 01:49 पी एम तक है.
3 शुभ योग में षट्तिला एकादशी
षट्तिला एकादशी के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग और शाम में वृद्धि योग बनेगा. उस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग 07:15 ए एम से लेकर अगले दिन 15 जनवरी को 03:03 ए एम तक है. इन दो शुभ योग में एकादशी की पूजा की जाएगी. ये शुभ फलदायी योग हैं.
उस दिन प्रात:काल से लेकर शाम 07:56 पी एम तक गण्ड योग है, उसके बाद से वृद्धि योग बनेगा. एकादशी के प्रात:काल ही अनुराधा नक्षत्र है, जो 15 जनवरी को 03:03 ए एम तक है, उसके बाद से ज्येष्ठा नक्षत्र है.
षट्तिला एकादशी पारण समय
जो लोग 14 जनवरी को षट्तिला एकादशी का व्रत रखेंगे, वे व्रत का पारण 15 जनवरी गुरुवार को सुबह में 07:15 ए एम से 09:21 ए एम के बीच कर सकते हैं. इस दिन द्वादशी का समापन रात में 08:16 पी एम पर होगा.
षट्तिला एकादशी व्रत का महत्व
षट्तिला एकादशी व्रत और पूजन से पाप मिटते हैं. लेकिन इस दिन जो व्यक्ति तिल का दान करता है, उसकी दरिद्रता मिट जाती है. उसके जीवन में सुख, समृद्धि आती है. इस दिन जो लोग प्रयागराज के संगम में स्नान करते हैं, उनको सहज ही विष्णु कृपा प्राप्त होती है. षट्तिला एकादशी पर दान करने से मृत्यु के बाद व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होती है.
मौनी अमावस्या पर करें ये 5 काम, पितृ दोष से मिल जाएगी मुक्ति! नाराज पितरों का भी मिलेगा आशीर्वाद
9 Jan, 2026 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मौनी अमावस्या माघ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है. मौनी अमावस्या के दिन पवित्र नदियों में स्नान करते हैं, उसके बाद दान किया जाता है. इससे पाप मिटते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मौनी अमावस्या के दिन तीर्थ स्नान करने से भगवान विष्णु की कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है. जो लोग पितृ दोष से परेशान हैं या उनके पितर नाराज हैं, जिसकी वजह से पूरे परिवार की उन्नति नहीं हो रही है, कष्टों का सामना करना पड़ रहा है, उनको मौनी अमावस्या के दिन कुछ उपाय करने चाहिए. आज हम आपको मौनी अमावस्या पर किए जाने वाले उन 5 उपायों के बारे में बता रहे हैं, जिसको करने से आपको पितृ दोष से मुक्ति मिल सकती है और आपके नाराज पितर भी खुश होकर आशीर्वाद देंगे.
मौनी अमावस्या कब है: मौनी अमावस्या के उपायों को जानने से पहले आपको बता दें कि इस साल मौनी अमावस्या 18 जनवरी दिन रविवार को है. पंचांग के अनुसार माघ कृष्ण अमावस्या यानि मौनी अमावस्या की तिथि 18 जनवरी को 12:03 ए एम से लेकर 19 जनवरी को 1:21 ए एम तक है.
मौनी अमावस्या पर पितृ दोष मुक्ति के उपाय-गंगाजल से दें तर्पण: मौनी अमावस्या के दिन आप प्रयागराज के संगम में स्नान करें. कहा जाता है संगम स्नान से पुण्य के साथ भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. स्नान के बाद अपने पितरों का स्मरण करें और गंगा के जल से उनको तर्पण दें. मां गंगा मोक्षदायिनी हैं, उनकी कृपा से पितरों का उद्धार हो जाएगा. आपके नाराज पितर भी खुश होकर आशीर्वाद देंगे. तर्पण के समय हाथ में कुशा की पवित्री धारण करें. कुशा के पोरों से जल पितरों को तर्पित करें.
पितरों के लिए दान: मौनी अमावस्या के दिन स्नान के बाद दान जरूर करना चाहिए. इस दिन आप अपनी क्षमता के अनुसार अन्न का दान करें. पितरों के लिए सफेद वस्त्र का दान किया जाता है. ऐसे में आप मौनी अमावस्या पर अपने पितरों के लिए सफेद रंग के गरम कपड़ों का दान करें
त्रिपिंडी श्राद्ध: यदि आपको पितृ दोष है या आपके पितर किन्हीं भी कारणों से परेशान करते हैं तो आप काशी, गया या त्र्यंबकेश्वर में पितरों के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध कराएं. त्रिपिंडी श्राद्ध कराने से पितृ दोष शांत हो जाता है. पितरों की नाराजगी दूर होती है. वे खुश होकर उन्नति का आशीर्वाद देते हैं. त्रिपिंडी श्राद्ध अपने तीन पीढ़ियों के पूर्वजों के लिए किया जाता है, जिनकी आत्मा दुखी है, वे शांत और तृप्त हो जाते हैं. इस श्राद्ध में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा का विधान है. श्राद्ध के समय पूर्वजों को अन्न से बनाया गया पिंड दान करते हैं
पितृ दोष से मुक्ति का पाठ: मौनी अमावस्या के दिन नाराज पितरों को प्रसन्न करने या पितृ दोष से मुक्ति के लिए पितृ सूक्त या पितृ कवच का पाठ करना चाहिए. इसके अलावा आप चाहें तो गीता के सातवें अध्याय का पाठ कर सकते हैं. इससे पितृ दोष मिटता है, वहीं पितर प्रेत योनि से मुक्ति पा सकते हैं.
दीया जलाना: मौनी अमावस्या की शाम जब सूर्य डूब जाता है तो पितर पितृ लोक वापस लौटने लगते हैं. ऐसे में आपको अपने पितरों के लिए घर के बाहर दक्षिण दिशा में सरसों के तेल का एक दीपक जलाना चाहिए. उनका मार्ग प्रकाश से आलोकित होता है, इसे देखकर वे खुश होते हैं और आशीर्वाद देते है. इस दिन पीपले के पेड़ के नीचे भी दीपक जलाया जाता है.
इस साल वसंत पंचमी पर नहीं होंगे विवाह-गृह प्रवेश, शुभ मुहूर्त पर रोक
9 Jan, 2026 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धार्मिक ग्रंथो के अनुसार, एक संवत में कुछ अबूझ मुहूर्त आते हैं, जिन पर पंडित से बिना पूछे ही मांगलिक कार्य कर सकते हैं. इन अबूझ मुहूर्त पर मांगलिक कार्य विवाह संस्कार, नूतन गृह प्रवेश, नींव पूजा या धार्मिक यात्रा की शुरुआत करने पर कोई दोष नहीं लगता है. यह तिथियां स्वयं सिद्ध और इतनी पवित्र होती हैं कि इनका हर एक पल शुभ होता है.
संवत में अक्षय तृतीया, दशहरा, फुलेरा दूज, शिवरात्रि, वसंत पंचमी आदि ऐसी तिथियां होती हैं, जो खुद में पवित्र और सिद्ध होती हैं. इन तिथियां पर पंचांग से मुहूर्त निकालने की जरूरत नहीं होती है. साल 2026 के पहले महीने जनवरी में वसंत पंचमी का आगमन हो रहा है, जो एक अबूझ मुहूर्त है. इस अबूझ मुहूर्त पर कोई भी मांगलिक कार्य करने पर दोष लगेगा, जो उपाय करने के बाद भी दूर नहीं होगा.
बेहद शुभ और सिद्ध योग
इसकी ज्यादा जानकारी देते हुए हरिद्वार के विद्वान ज्योतिषाचार्य पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि हिंदू पंचांग के अनुसार, साल में कुछ तिथियां ऐसी होती हैं जो बेहद ही शुभ और सिद्ध होती हैं. इन तिथियों को अबूझ मुहूर्त कहा जाता है. साल में अक्षय तृतीया, फुलेरा दूज, दशहरा, शिवरात्रि, वसंत पंचमी आदि तिथियों पर कोई भी मांगलिक कार्य बिना पंडित से पूछे किया जा सकता है. इन तिथियों पर किया गया मांगलिक कार्य बेहद शुभ होता है.
वह बताते हैं कि हिंदू धर्म में मांगलिक कार्य जैसे विवाह संस्कार, नूतन गृह प्रवेश, नीव पूजा, बड़ी धार्मिक यात्रा, बड़े धार्मिक अनुष्ठान आदि में गुरु बृहस्पति ग्रह, शुक्र ग्रह के अस्त और उदय का विचार किया जाता है. यदि यह कार्य अबूझ मुहूर्त पर किया जाए, तो उनका फल अक्षय प्राप्त होता है. संयोग से साल 2026 में वसंत पंचमी अबूझ मुहूर्त पर शुक्र ग्रह के अस्त होने के कारण कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होगा.
ऐसे होगी विशेष फल की प्राप्ति
वह आगे बताते हैं कि अबूझ मुहूर्त वसंत पंचमी 23 जनवरी की होगी और शुक्र ग्रह 12 दिसंबर को अस्त हो गए थे, जो 31 जनवरी तक इसी अवस्था में रहेंगे. शुक्र ग्रह के अस्त होने के कारण वसंत पंचमी पर कोई भी मांगलिक कार्य, जैसे विवाह संस्कार, नूतन गृह प्रवेश, बड़े धार्मिक अनुष्ठान, बड़े धार्मिक पूजा, धार्मिक यात्रा आदि करने पर दोष लगेगा. इस दिन भगवान की आराधना, पूजा पाठ, व्रत आदि करने पर कई गुना शुभ फल प्राप्त होगा और जीवन में चल रही सभी समस्याएं खत्म हो जाएंगी. इस दिन भगवान शिव के स्त्रोत शिव तांडव, रुद्राष्टक, पशुपत्येष्टक, शिव महिमा आदि को करने पर विशेष फल की प्राप्ति होगी.
UP के इस गांव में श्रवण कुमार ने बिताई थी रात, दातून करके जहां फेंका, आज खड़ा विशाल पेड़
9 Jan, 2026 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
उत्तर प्रदेश के गोंडा जिला मुख्यालय से लगभग 70 से 80 किलोमीटर दूर एक ऐसा स्थान है, जिसका नाम सीधे-सीधे रामायण काल से जुड़ा माना जाता है. यह स्थान आज ‘श्रवण पाकड़’ के नाम से जाना जाता है. मान्यता है कि भगवान राम के परम भक्त श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर ले जाते समय यहां एक रात विश्राम किया था. उसी घटना के कारण इस स्थान का नाम श्रवण पाकड़ पड़ा.
श्रवण पाकड़ धाम मंदिर के महंत शिव प्रसाद दास बताते हैं कि सुनने में यही आ रहा है कि अपने माता-पिता को कांवड़ यात्रा के दौरान श्रवण कुमार यहां पर रुके थे और जब उनके माता-पिता को प्यास लगी, तो पानी भरने लगे, तो राजा दशरथ को आवाज सुनाई पड़ी और फिर उन्होंने शब्दभेदी बाण चलाया और श्रवण कुमार की मृत्यु हो गई.
क्या श्रवण कुमार ने यहां पर रात बिताई थी?
शिव प्रसाद दास बताते हैं कि हमारे पूर्वज हम लोग को यही बताते थे कि श्रवण कुमार को यहीं पर बाण लगा था और कुछ लोगों का मानना है कि यहां पर श्रवण कुमार ने रात बिताई थी. इसीलिए इस स्थान का नाम श्रवण पाकड़ धाम पड़ा है. श्रवण पाकड़ धाम के रहने वाले राघव राम पांडेय बताते हैं कि हमारे पूर्वज बताते थे कि यहां पर सरवन कुमार ने रात बिताई थी और सुबह पाकड़ के पेड़ से एक तन तोड़कर दातुन किए थे और जो बचा था, उसको फेंक दिए थे, तो वह विशाल पाकड़ के पेड़ का रूप ले लिया था. विगत कुछ वर्ष पहले वह पेड़ तो गिर गया, लेकिन बगल में ही दो पेड़ पाकड़ के अभी भी लगे हैं.
श्रवण पाकड़ धाम नाम के पीछे क्या है रहस्य?
राघव राम पांडेय बताते हैं कि हमारे बाबा हम लोग को बताते थे कि राजा दशरथ ने श्रवण कुमार को यहीं पर शब्दभेदी बाण चलाया था और यहीं पर उन्होंने अपने शरीर को त्यागा था. उन्होंने बताया कि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यहां पर बाण नहीं लगा था, केवल यहां पर श्रवण कुमार ने रात बिताई थी. इसीलिए इस स्थान का नाम श्रवण पाकड़ धाम पड़ा है.
स्थानीय लोगों के अनुसार, जिस पाकड़ (बरगद प्रजाति का पेड़) के नीचे श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता के साथ रात बिताई थी, वह आज भी श्रद्धा का केंद्र है. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पीढ़ी दर पीढ़ी यह कथा सुनी और सुनाई जाती रही है. समय के साथ यह जगह धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान बन गई. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यहीं पर ही श्रवण कुमार को शब्दभेदी बाण लगा था.
कहां-कहां से आते हैं श्रद्धालु?
विकासखंड छपिया के ग्राम सभा गुरुग्राम के प्रधान प्रतिनिधि विनय कुमार वर्मा बताते हैं कि हमारे लिए बड़े गर्व की बात है कि हम लोगों के ग्राम सभा में जहां पर ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल मौजूद है. उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग में भी श्रवण पाकड़ धाम का उल्लेख किया गया है. बाबूलाल वर्मा बताते हैं कि श्रवण पाकड़ धाम मंदिर में गोंडा, अयोध्या, गोरखपुर, बलरामपुर, श्रावस्ती, बस्ती, बहराइच और गुजरात के श्रद्धालु आकर दर्शन करते हैं, क्योंकि स्वामी नारायण छपिया मंदिर भी यहां से कुछ ही दूरी पर स्थित है. इसीलिए जो श्रद्धालु स्वामीनारायण छपिया के दर्शन करने आते हैं, वह लोग यहां पर आते हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (09 जनवरी 2026)
9 Jan, 2026 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- कुटुम्ब में अशांति, क्लेश व अशांति, धन का व्यर्थ व्यय होगा, पीड़ा अवश्य होगी।
वृष राशि :- इष्ट मित्रों से सुख, अधिकारियों से मेल-मिलाप होगा तथा व्यापार में लाभप्रद स्थिति रहेगी।
मिथुन राशि :- अर्थ व्यवस्था अनुकूल होगी, सफलता के साधन जुटायेंगे, रुके कार्य बन जायेंगे।
कर्क राशि :- मनोवृत्ति उदार बनाये रखें, तनाव, क्लेश व अशांति की स्थिति बनेगी ध्यान रखें।
सिंह राशि :- समय नष्ट होगा, व्यवसायिक गति मंद होगी, असमंजस की स्थिति से बचिये।
कन्या राशि :- आर्थिक योजना सफल होगी, व्यवसायिक क्षमता अनुकूल होगी।
तुला राशि :- धन का व्यय, आलस्य से हानि संभव है, कार्य अवश्य बनेंगे ध्यान दें।
वृश्चिक राशि :- स्त्री वर्ग से क्लेश व अशांति तथा विघटनकारी तत्व परेशान अवश्य करेंगे।
धनु राशि :- कुटुम्ब की समस्यायें सुलझेंगी, धन का व्यर्थ व्यय होगा, व्यर्थ भ्रमण होगा।
मकर राशिः- अर्थ-व्यवस्था छिन्न-भिन्न होगी, कार्य व्यवसाय गति मध्यम होगी।
कुंभ राशि :- दैनिक कार्यगति में सुधार, चिन्तायें कम होंगी तथा सफलता अवश्य मिलेगी।
मीन राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक होगा, कार्यगति अनुकूल बनी रहेगी ध्यान दें।
माघ महीने में स्नान और दान-पुण्य के कार्यों का है विशेष महत्व
8 Jan, 2026 07:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू कैलेंडर के अनुसार 11वां महीना माघ का महीना होता है। इस माह में पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य के कार्यों का विशेष महत्व होता है। माघ के महीने में पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य के कार्यों का विशेष महत्व होता है। इस दौरान जगत के पालनहार श्रीहरि विष्णुजी की पूजा-आराधना करने से भी विशेष फलों की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से घर में धन, सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है। आइए जानते हैं माघ महीने की शुरुआत कब हो रही है।
हिंदू पंचांग के अनुसार 04 जनवरी से ही माघ का महीना शुरु हो गया।
माघ में महीने में क्या करना चाहिए। इस माह में गरीबों और जरुरतमंदों को अपने क्षमतानुसार अन्न-धन का दान करें। माघ के महीने में पवित्र नदियों में स्नान करना काफी पुण्यफलदायी माना जाता है। माना जाता है कि इससे व्यक्ति के जीवन के सभी पाप-कष्ट दूर होंगे।
माघ के महीने में तिल और गुड़ का सेवन करना उत्तम माना गया है।
इस माह में भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा-आराधना करना चाहिए।
माघ में नियमित तुलसी के पौधे पर जल अर्पित करें और माता तुलसी की पूजा करनी चाहिए।
माघ के महीने में भोजन, वस्त्र और तिल का दान करना शुभ होता है।
माघ महीने में क्या नहीं करें
माघ महीने में मांस-मदिरा सहित तामसिक भोजन करने से बचना चाहिए।
इस अवधि में घर की साफ-सफाई का ख्याल रखना चाहिए।
इस महीने में क्रोध से बचना और अपशब्दों का इस्तेमाल न करने की सलाह दी जाती है।
माघ महीने में बड़े-बुजुर्गों का अपमान नहीं करना चाहिए।
इस अवधि के दौरान किसी भी सदस्यों से व्यर्थ में वाद-विवाद न करें और घर में शांति बनाएं रखें।
मेहंदीपुर बालाजी के दर्शन से टल जाते हैं संकट
8 Jan, 2026 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हनुमान जी अपने नाम के अनुरुप ही भक्तों के संकटों को दूर करते हैं। आस्था और सच्ची भक्ति के आगे स्वयं भगवान भी नतमस्तक हो जाते हैं और अपने प्रिय भक्त को संसार का हर सुख देने को आतुर रहते हैं। महाबली हनुमान की भक्ति भी ऐसी ही है। तभी तो प्रभु श्री राम ने उन्हें भक्त शिरोमणि बना दिया।
पवन पुत्र हनुमान की लीलाएं बालपन से ही शुरू हो गई थीं, इसलिए कई जगहों पर इन्हें बालाजी के नाम से पूजा जाता है। मेहंदीपुर में भी महाबली हनुमान अपने बाल स्वरूप में विराजमान है।
मान्यता है कि मेहंदीपुर बालाजी के दर्शन करते ही इंसान के सभी प्रकार के संकट टलने लगते हैं। जो भी मेहंदीपुर धाम जाता है अपने सभी दुख, अपनी सारी विपत्तियां वहीं श्री बालाजी के चरणों में छोड़ आता है।
मेहंदीपुर में बालाजी की सत्ता चलती है। यहां आकर जिसने श्री बालाजी का आशीर्वाद पा लिया उसके मन की हर कामना का भार स्वयं बालाजी महाराज उठाते हैं। तभी तो जो भक्त एक बार मेहंदीपुर बालाजी के दर्शन कर लेता है वो बार-बार मेहंदीपुर जाने को आतुर रहता है।
मेहंदीपुर बालाजी धाम में हनुमान जी के बाल रूप का अति मनमोहक और अलौकिक दर्शन होता है। यहां श्री बाला जी महाराज के भवन के ठीक सामने सीताराम का दरबार सजता है, जिसे देखकर लगता है कि जैसे बाला जी महाराज अपने प्रभु के निरंतर दर्शन से प्रसन्न हो रहे हैं और मां सीता के साथ ही प्रभु श्रीराम भी अपने सबसे प्रिय भक्त को देखकर मुस्कुरा रहे हैं।
मेहंदीपुर में केवल बालाजी के दर्शन नहीं होते। इनके साथ श्री भैरव बाबा और श्री प्रेतराज सरकार के भी साक्षात दर्शन होते हैं। इसीलिए कुछ भक्त इन्हें त्रिदेवों का धाम भी कहते हैं।
मेहंदीपुर बालाजी के दरबार में जो भी इंसान सच्चे मन और भक्ति भाव से अर्जी लगाता है उसकी सुनवाई जरूर होती है। श्री बालाजी उस भक्त की हर मनोकामना पूरी कर देते हैं। कहते हैं मेहंदीपुर धाम कोई भी भक्त उदास नहीं लौटता।
मेहंदीपुर में हर प्रकार की समस्या का समाधान मिल जाता है।
सुबह उठते ही आईना देखने से होता है नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव
8 Jan, 2026 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
अगर आप अपना दिन बेहतर बिताना चाहते हैं तो इसके लिए अच्छी शुरुआत करें। अक्सर हम अपने आसपास की ढेर सारी बातों को अनदेखा कर देते हैं, लेकिन इनका हम पर सीधा असर पड़ता है। वास्तुशास्त्र में कुछ उपाय बताए गए जिन्हें अपनाकर आप अपनी सुबह के साथ ही पूरे दिन को बेहतर बना सकते हैं। यह बात तो हम सब मानते हैं कि अगर हमारी सुबह शुभ कार्यों के साथ शुरु होगी तो हमारा पूरा दिन अच्छा गुजरता है।
आंख खुलते ही न देखें आईना
कई लोगों की आदत होती है, सुबह उठते ही आईना देखने की। वास्तु विज्ञान के अनुसार ऐसा नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से दिनभर आप पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बना रह सकता है। इसकी वजह यह है कि जब आप सोकर उठते हैं तो आपका शरीर नकारात्मक उर्जा के प्रभाव में होता है इसलिए आप आलस महसूस करते हैं। इसलिए कहा जाता है कि फ्रेश होने के बाद आईना देखना चाहिए।
सुबह उठते ही किसका चेहरा देखें
ऐसी मान्यता है कि आंख खुलते ही किसी व्यक्ति का चेहरा देखने से बचना चाहिए। दिन की शुरुआत के साथ सबसे पहले अपने ईष्ट देवता का ध्यान करें और उनके ही दर्शन करने चाहिए। इसके पीछे यह धारणा है कि व्यक्ति के चेहरे पर अलग-अलग तरह के भाव होते हैं जिसे देखकर आपके भाव भी बदलते हैं। लेकिन ईश्वर निर्विकार भाव आपको देखते हैं और आप भी उन्हें ऐसे ही देखते हैं जिससे मन में सकारात्मक भाव जगता है।
इसलिए सुबह उठकर देखें हथेली
कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम ॥ कहा गया है कि हथेली के अगले हिस्से में देवी लक्ष्मी का वास होता है, मध्य में सरस्वती का और मूल भाग में भगवान विष्णु विराजते हैं। यही कारण है कि सुबह उठकर सबसे पहले दोनों हाथों की हथेली को जोड़कर देखना चाहिए, ऐसा शास्त्रों का मत है। इसे व्यावहारिक रूप में देखें तो हथेली से ही सभी कर्म किए जाते हैं और इसी से धन और धर्म दोनों कर्तव्यों को पूरा किया जाता है इसलिए हथेली देखने की बात की जाती है।
शंख या मंदिर की घंटी की आवाज सुनाई दे तो
सुबह उठते ही अगर शंख या मंदिर की घंटियों की आवाज सुनाई दे तो यह आपके भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यही कारण है कि शास्त्रों में कहा गया है कि सुबह उठकर भगवान की पूजा करें और घंटी बजाकर शंखनाद करें।
दिन बन जाता है शुभ
शकुनशास्त्र के अनुसार सुबह घर से निकलते समय नारियल, शंख, मोर, हंस या फूल आपको दिख जाए तो समझिए आपका पूरा दिन शुभ बीतने वाला है।
सफाईकर्मी का दिखना शुभ
ज्योतिषशास्त्र में सफाईकर्मी को शनि से संबंधित माना गया है। लाल किताब के उपायों में बताया गया है कि यदि सुबह घर से निकलते ही आपको कोई सफाईकर्मी दिखाई दे तो उसे कुछ दान जरूर देना चाहिए इससे दिन अच्छा गुजरता है।
नाश्ते से पहले ऐसा न करें
रामचरित मानस के सुंदरकांड में तुलसीदास जी हनुमान जी के एक कथन को लिखते हुए कहते हैं कि, प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।। यानी हनुमान जी कहते हैं कि वह एक वानर जाति से आते हैं। यह श्रेष्ठ योनी नहीं है इसलिए जो कोई सुबह उठकर उनके वानर स्वरूप का नाम लेता है उसे समय से भोजन नही मिलता है। इसलिए कहा जाता है कि नाश्ता पानी करने से पहले इस नाम को नहीं बोलना चाहिए।
नंदी के बिना शिवलिंग को माना जाता है अधूरा
8 Jan, 2026 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भगवान शिव के किसी भी मंदिर में शिवलिंग के आसपास एक नंदी बैल जरूर होता है क्योंा नंदी के बिना शिवलिंग को अधूरा माना जाता है। इस बारे में पुराणों की एक कथा में कहा गया है शिलाद नाम के ऋषि थे जिन्होंाने लम्बेा समय तक शिव की तपस्या की थी। जिसके बाद भगवान शिव ने उनकी तपस्याद से खुश होकर शिलाद को नंदी के रूप में पुत्र दिया था।
शिलाद ऋषि एक आश्रम में रहते थे। उनका पुत्र भी उन्हींक के आश्रम में ज्ञान प्राप्ती करता था। एक समय की बात है शिलाद ऋषि के आश्रम में मित्र और वरुण नामक दो संत आए थे। जिनकी सेवा का जिम्माि शिलाद ऋषि ने अपने पुत्र नंदी को सौंपा। नंदी ने पूरी श्रद्धा से दोनों संतों की सेवा की। संत जब आश्रम से जाने लगे तो उन्होंसने शिलाद ऋषि को दीर्घायु होने का आर्शिवाद दिया पर नंदी को नहीं।
इस बात से शिलाद ऋषि परेशान हो गए। अपनी परेशानी को उन्हों्ने संतों के आगे रखने की सोची और संतों से बात का कारण पूछा। तब संत पहले तो सोच में पड़ गए। पर थोड़ी देर बाद उन्हों।ने कहा, नंदी अल्पायु है। यह सुनकर मानों शिलाद ऋषि के पैरों तले जमीन खिसक गई। शिलाद ऋषि काफी परेशान रहने लगे।
एक दिन पिता की चिंता को देखते हुए नंदी ने उनसे पूछा, ‘क्या बात है, आप इतना परेशान क्योंो हैं पिताजी।’ शिलाद ऋषि ने कहा संतों ने कहा है कि तुम अल्पायु हो। इसीलिए मेरा मन बहुत चिंतित है। नंदी ने जब पिता की परेशानी का कारण सुना तो वह बहुत जोर से हंसने लगा और बोला, ‘भगवान शिव ने मुझे आपको दिया है। ऐसे में मेरी रक्षा करना भी उनकी ही जिम्मेयदारी है, इसलिए आप परेशान न हों।’
नंदी पिता को शांत करके भगवान शिव की तपस्या करने लगे। दिनरात तप करने के बाद नंदी को भगवान शिव ने दर्शन दिए। शिवजी ने कहा, ‘क्याक इच्छास है तुम्हा।री वत्स’. नंदी ने कहा, मैं ताउम्र सिर्फ आपके सानिध्य में ही रहना चाहता हूं।नंदी से खुश होकर शिवजी ने नंदी को गले लगा लिया। शिवजी ने नंदी को बैल का चेहरा दिया और उन्हें अपने वाहन, अपना मित्र, अपने गणों में सबसे उत्तनम रूप में स्वीकार कर लिया।इसके बाद ही शिवजी के मंदिर के बाद से नंदी के बैल रूप को स्थाकपित किया जाने लगा।
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (08 जनवरी 2026)
8 Jan, 2026 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- बढ़िया यात्रा, विवाद, मातृकष्ट, व्यर्थ का विरोध होगा, कार्य शेष हो।
वृष राशि :- धन व्यय व व्यापार में प्रगति शुभ कार्य होवे परिणाम अनुभवशील रहेगा।
मिथुन राशि :- पितृ कष्ट हो सकता है। व्यय, लाभ, अशांति का वातावरण अवश्य रहेगा।
कर्क राशि :- शुभ भूमि का लाभ, हर्ष कार्य सिद्ध, खेती व गृह कार्य व्यवस्था पूर्वक रहेगा।
सिंह राशि :- शत्रु भय, विरोध, लाभ उद्योग व्यापार लाभ कार्य सफलता अवश्य होगा।
कन्या राशि :- चिन्ता लाभ, विद्या, लाभ उन्नति घरेलू, विरोध शिक्षा लेखन कार्य सफलता होगे।
तुला राशि :- सुख सफलता निर्माण, प्रवास मन कार्य में व्यय से लाभ अवश्य होगी।
वृश्चिक राशि :- लाभ सिर, नेत्र परेशानी अवश्य होवेगा ध्यान अवश्य ही दें।
धनु राशि :- हानि होगी, पदोन्नति लाभ होवेगा, व्यर्थ का सामना करना पड़ेगा।
मकर राशि : धन लाभ, स्थानान्तरण होवेगा, राज कार्य में असमंजस्य बना रहेगा।
कुंभ राशि :- अभाव विवाद, चिन्ता लाभ, कर विरोधी असफलता का आभाव रहेगा।
मीन राशि :- संतान सुख, प्रवास धन लाभ, अपने मित्रों व परिवारों का विरोध रहेगा।
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