धर्म एवं ज्योतिष
250 साल पुराना माता तारा का यह मंदिर बेहद रहस्यमयी, गुप्त नवरात्रि में होते हैं विशेष अनुष्ठान, लोग हो जाते हैं हैरान
21 Jan, 2026 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
गुप्त नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है. यह नवरात्रि सामान्य नवरात्रि से अलग और अधिक गोपनीय होती है, जिसमें साधक गुप्त रूप से मां दुर्गा के विभिन्न रूपों की साधना करते हैं. पहले दिन मां काली की पूजा का विधान है, जबकि दूसरे दिन मां तारा के दर्शन-पूजन का विधान है. हिमाचल प्रदेश के शिमला में मां तारा देवी का प्राचीन मंदिर है, जो 250 साल से भी पुराना है. मां तारा देवी का यह मंदिर शिमला शहर से लगभग 13 किलोमीटर दूर शोघी हाईवे पर स्थित है और 7,200 फीट की ऊंचाई पर बसा हुआ है. मंदिर तक पहुंचने के लिए शोघी से एक घुमावदार लेकिन सुंदर सड़क से चढ़ाई चढ़नी पड़ती है. मंदिर की स्थापना लगभग 250 साल पहले हुई थी.
कुलदेवी के रूप में साक्षात विराजमान माता तारा
किंवदंती के अनुसार, सेन राजवंश के राजा भूपेंद्र सेन को एक रात स्वप्न में मां तारा ने दर्शन दिए. देवी ने राजा से कहा कि वह उनके लिए एक मंदिर बनवाएं. स्वप्न को सत्य मानते हुए राजा ने तुरंत मंदिर निर्माण का कार्य शुरू करवाया. बाद में उनके वंशज बलवीर सेन ने मंदिर में अष्टधातु से बनी मां तारा की सुंदर मूर्ति स्थापित की. मान्यता है कि मां तारा यहां कुलदेवी के रूप में साक्षात विराजमान हैं. प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन को पहुंचते हैं. भक्तों का विश्वास है कि मां तारा उनकी हर मनोकामना पूरी करती हैं और मुसीबतों से बचाती हैं. मंदिर में आने वाले श्रद्धालु विशेषकर संतान प्राप्ति, स्वास्थ्य, धन-समृद्धि और सुरक्षा की कामना लेकर आते हैं.
प्राचीन मंदिर की वास्तुकला पहाड़ी शैली में बना
प्राचीन मंदिर की वास्तुकला भी देखने लायक है. यह पारंपरिक पहाड़ी शैली में बना है, जिसमें लकड़ी और पत्थर का प्रयोग किया गया है. छत स्लेट की बनी हुई है, जो हिमाचल की पुरानी इमारतों की खासियत है. मंदिर में जटिल नक्काशी और सुंदर डिजाइन स्थानीय कारीगरों की शानदार कला को दर्शाते हैं. हाल के वर्षों में हिमाचल पर्यटन विभाग ने मंदिर के पास एक नया, आधुनिक लेकिन पारंपरिक शैली में मंदिर भी बनवाया है. इस स्थान की सबसे बड़ी खासियत 360 डिग्री का पैनोरमिक नजारा है. हिमालय की बर्फीली चोटियां, हरे-भरे जंगल और घाटियां एक साथ दिखाई देती हैं, जो मन को शांति और भक्ति का अनुभव कराती हैं.
माता तारा की चढ़ाई जाती है ये चीजें
विशेष अवसर पर मंदिर प्रबंधन भक्तों के लिए मुफ्त सामुदायिक भंडारा भी आयोजित करता है. यहां गुप्त नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना होती है. भक्त मां तारा को लाल फूल, चावल, सिंदूर, धूप-दीप और मिठाई चढ़ाते हैं. कई साधक इस दौरान विशेष अनुष्ठान और जप भी करते हैं. तारा देवी मंदिर ना केवल धार्मिक महत्व का है, बल्कि पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है. शिमला घूमने आने वाले पर्यटक अक्सर यहां दर्शन करने जरूर आते हैं.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (21 जनवरी 2026)
21 Jan, 2026 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- समाज में प्रतिष्ठा, प्रभुत्व वृद्धि के साधन प्राप्त करें, कार्य व्यवस्था बनेगी, ध्यान रखे।
वृष राशि :- आर्थिक योजना सफल हो, सतर्कता एवं तटस्थता से चलकर कार्य करें, लाभ होगा।
मिथुन राशि :- प्रत्येक कार्य में परेशानी व चिन्ता, व्यग्रता, असमंजस में एवं कार्य में ध्यान दें।
कर्क राशि :- दैनिक कार्यगति मंद रहे, असमर्थता का वातावरण मन संदिग्ध रखेगा, कार्य करें।
सिंह राशि :- तनाव क्लेश व अशांति, व्यर्थ धन का व्यय तथा समय नष्ट होवे, ध्यान दें।
कन्या राशि :- स्त्री शारीरिक सुख, भोग ऐश्वर्य सामाजिक कार्यो में मान प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
तुला राशि :- विभ्रम आरोपों से अशांति तथा स्वास्थ्य नरम अवश्य रहेगा, स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
वृश्चिक राशि :- आशानुकूल सफलता का हर्ष, कार्य गति उत्तम, चिन्ता होगी।
धनु राशि :- इष्ट मित्र सुखवर्धक हो, कार्यगति अनुकूल होवे तथा कार्य बनें।
मकर राशि :- परिश्रम से कुछ सफलता के साधन जुटाए, मान प्रतिष्ठा प्रभुत्व वृद्धि होगी।
कुंभ राशि :- परिश्रम से कुछ सफलता के साधन जुटाए, मानसिक व्यग्रता संभंव होगी।
मीन राशि :- लेनदेन में हानि दूसरों के कार्यों में समर्थन नष्ट होवेगा, समय से काम लें।
नाम बदलने से लेकर अंतिम विदाई तक, किन्नर जीवन के वो नियम जो सदियों से निभाए जा रहे हैं, क्यों अलग होता है इनका जीवन और मृत्यु?
20 Jan, 2026 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भारत की सामाजिक बनावट बहुत रंगों से भरी हुई है. यहां अलग-अलग समुदाय, परंपराएं और जीवन जीने के तरीके देखने को मिलते हैं. इन्हीं में से एक समुदाय है किन्नर समुदाय. यह समुदाय सदियों से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है, लेकिन फिर भी इनके जीवन, रीति-रिवाज और भावनाओं को लोग पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं. अधिकतर लोगों को किन्नरों की मौजूदगी केवल शादी, बच्चे के जन्म या फिर मांगने तक ही सीमित लगती है, जबकि इनका जीवन इससे कहीं ज्यादा गहरा और भावनात्मक होता है. किन्नर समुदाय के अपने नियम, अपने गुरु-चेला संबंध, अपनी पूजा पद्धति और अपने सामाजिक बंधन होते हैं. जन्म से लेकर मृत्यु तक उनके जीवन का हर पड़ाव कुछ खास रिवाजों से जुड़ा होता है. इन रिवाजों का मकसद सिर्फ परंपरा निभाना नहीं, बल्कि समुदाय के लोगों को सुरक्षा, पहचान और अपनापन देना भी होता है. अक्सर समाज इन्हें नजरअंदाज कर देता है, लेकिन इनके संस्कार, विश्वास और जीवन के तरीके किसी भी दूसरे समुदाय से कम नहीं हैं. इस लेख में हम किन्नरों के जीवन से जुड़े उन्हीं रिवाजों को सरल शब्दों में समझने की कोशिश करेंगे, ताकि पढ़ने वाला व्यक्ति उन्हें बेहतर ढंग से समझ सके और उनके प्रति सम्मान की भावना विकसित कर सके.
जन्म से जुड़ी मान्यताएं
जब किसी परिवार में ऐसा बच्चा जन्म लेता है, जिसकी शारीरिक पहचान सामान्य से अलग होती है, तो कई बार परिवार उसे स्वीकार नहीं कर पाता. ऐसे हालात में किन्नर समुदाय के लोग उस बच्चे को अपने साथ ले आते हैं. कुछ मामलों में बच्चा बड़ा होने पर खुद इस समुदाय को चुनता है. किन्नर समाज में माना जाता है कि ऐसा बच्चा खास होता है और उसके जीवन का रास्ता अलग तय होता है. बच्चे के समुदाय में आने पर गुरु उसका नामकरण करता है और उसे अपनी छाया में ले लेता है. यही से उसका नया जीवन शुरू होता है.
गुरु-चेला परंपरा
किन्नर समाज की सबसे मजबूत नींव गुरु-चेला रिश्ता होता है. गुरु सिर्फ शिक्षक नहीं होता, बल्कि माता-पिता, दोस्त और मार्गदर्शक भी होता है. चेले को रहना, बोलना, कपड़े पहनना, समुदाय के नियम और कमाने के तरीके गुरु ही सिखाता है. गुरु की आज्ञा का पालन करना जरूरी माना जाता है. बदले में गुरु चेले को सुरक्षा और पहचान देता है. यह रिश्ता जीवन भर चलता है और बहुत भावनात्मक होता है.
रोजमर्रा के रिवाज और पूजा
किन्नर समुदाय में बहुचरा माता की पूजा बहुत प्रचलित है. माना जाता है कि माता उन्हें शक्ति और पहचान देती हैं. रोजमर्रा के जीवन में सुबह पूजा करना, ताली बजाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना और खास गीत गाना उनकी पहचान का हिस्सा है. ये रिवाज उन्हें आपस में जोड़ते हैं और आत्मविश्वास देते हैं.
कमाई से जुड़े रिवाज
किन्नर समाज में कमाई को लेकर भी नियम होते हैं. जो भी चेला कमाता है, उसका एक हिस्सा गुरु को देता है. इसे बुरा नहीं माना जाता, बल्कि इसे समुदाय की व्यवस्था समझा जाता है. शादी, बच्चे के जन्म या नए काम की शुरुआत पर किन्नरों का आशीर्वाद शुभ माना जाता है. इसी वजह से लोग उन्हें बुलाते हैं.
आपसी अनुशासन और दंड
अगर कोई सदस्य समुदाय के नियम तोड़ता है, तो उसे सजा भी मिल सकती है. सजा का मतलब मारपीट नहीं, बल्कि सामाजिक दूरी या जुर्माना होता है. इसका उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि अनुशासन बनाए रखना होता है.
मृत्यु से जुड़े रिवाज
किन्नर समुदाय में मृत्यु के समय खास रिवाज निभाए जाते हैं. माना जाता है कि किन्नर की मृत्यु सामान्य नहीं होती, इसलिए अंतिम संस्कार भी अलग तरीके से किया जाता है. कई जगह शव को रात में दफनाया जाता है और ढोल-नगाड़ों के बजाय चुप्पी रखी जाती है. कुछ मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा को मुक्ति मिले, इसके लिए खास प्रार्थनाएं की जाती हैं. समुदाय के लोग मिलकर उस व्यक्ति को अंतिम विदाई देते हैं और गुरु उसकी जिम्मेदारी निभाता है.
बदलता समय और नई सोच
आज का समय बदल रहा है. शिक्षा, कानून और समाज में जागरूकता बढ़ने से किन्नर समुदाय के जीवन में भी बदलाव आ रहा है. अब कई किन्नर पढ़-लिखकर नौकरी कर रहे हैं और अपनी अलग पहचान बना रहे हैं. फिर भी उनके पुराने रिवाज आज भी उनकी जड़ों से जुड़े हुए हैं और उन्हें एक साथ बांधे रखते हैं.
क्या सिर्फ सुंदरता के लिए शिव ने धारण किया चंद्रमा? इसके पीछे छिपा है सृष्टि बचाने का गहरा रहस्य
20 Jan, 2026 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
भगवान शिव भारतीय संस्कृति के सबसे रहस्यमय देवता माने जाते हैं. उनका हर रूप, हर चिन्ह और हर आभूषण अपने भीतर गहरा अर्थ छिपाए हुए है. उनके गले में लिपटा नाग हो, शरीर पर लगी भस्म हो या फिर माथे पर चमकता हुआ चंद्रमा-हर चीज एक कहानी कहती है. आम तौर पर लोग भगवान शिव के चंद्रमा को सिर्फ एक सुंदर आभूषण समझ लेते हैं, लेकिन इसके पीछे छिपा अर्थ बहुत गहरा है. सवाल यह है कि भगवान शिव, जो खुद संहार और सृजन दोनों के स्वामी हैं, आखिर चंद्रमा को अपने जटाओं में क्यों धारण करते हैं? क्या यह सिर्फ उनकी सुंदरता बढ़ाने के लिए है या फिर इसके पीछे कोई पौराणिक रहस्य छिपा है? हिंदू कथाओं में भगवान शिव और चंद्रमा का संबंध कई घटनाओं से जुड़ा हुआ बताया गया है. इन कथाओं के जरिए हमें जीवन, संतुलन और समय के बारे में भी महत्वपूर्ण सीख मिलती है. इस लेख में हम आसान भाषा में उसी रहस्य से पर्दा उठाने की कोशिश करेंगे.
भगवान शिव और चंद्रमा का संबंध
भगवान शिव को शंकर, महादेव और भोलेनाथ जैसे नामों से जाना जाता है. वे सरल भी हैं और रौद्र भी. यही कारण है कि उनके हर रूप में संतुलन देखने को मिलता है. चंद्रमा को ठंडक, शांति और मन का प्रतीक माना जाता है. वहीं भगवान शिव का तांडव उग्रता और ऊर्जा का संकेत देता है. चंद्रमा को जटाओं में धारण करना इसी संतुलन को दर्शाता है.
पौराणिक कथा: समुद्र मंथन और कालकूट विष
कथाओं के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन किया. इस मंथन के दौरान कई अद्भुत चीजें निकलीं, लेकिन सबसे पहले कालकूट नाम का विष बाहर आया. यह विष इतना भयानक था कि इसकी गंध से ही सृष्टि संकट में आ गई. देवता और असुर दोनों ही डर गए और किसी ने भी उसे ग्रहण करने का साहस नहीं किया.
तब भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया. विष के असर से उनका कंठ नीला पड़ गया, जिस कारण उन्हें नीलकंठ कहा गया. हालांकि विष शरीर में जाने के बाद शिव के भीतर तेज गर्मी फैलने लगी.
चंद्रमा क्यों धारण किया गया
कथाओं में बताया गया है कि भगवान शिव के शरीर में बढ़ती गर्मी को शांत करने के लिए चंद्रदेव आगे आए. चंद्रमा की ठंडी किरणों से शिव के शरीर को शांति मिली. इसी वजह से भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने जटाओं में स्थान दिया. यह केवल मदद का संकेत नहीं था, बल्कि यह दिखाता है कि शिव हर समस्या का हल संतुलन से निकालते हैं.
शिव के मस्तक पर चंद्रमा का अर्थ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्रमा मन का प्रतीक है. भगवान शिव का चंद्रमा धारण करना यह दर्शाता है कि उन्होंने अपने मन पर पूरा नियंत्रण पा लिया है. इसके साथ ही चंद्रमा समय का भी संकेत देता है, जो बढ़ता और घटता रहता है. शिव के सिर पर चंद्रमा यह बताता है कि वे समय से परे हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हैं.
स्वयं प्रकट होती हैं माता, एक फीट तक बढ़ जाती है मूर्ती...छैगांवदेवी मंदिर का 700 साल पुराना इतिहास, 5 देवियों का यहां वास!
20 Jan, 2026 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
खंडवा जिले की पहचान सिर्फ इतिहास से नहीं, बल्कि आस्था और चमत्कारों से भी जुड़ी है. यहां ऐसे कई मंदिर हैं, जिनकी मान्यताएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं. इन्हीं में से एक बेहद रहस्यमयी और चमत्कारी मंदिर खंडवा जिले के छैगांवदेवी गांव में स्थित है. इस मंदिर से जुड़ी मान्यताएं ऐसी हैं, जिन्हें सुनकर अच्छे-अच्छे लोग हैरान रह जाते हैं.
रेणुका चौदस पर खुद प्रकट होती हैं माता!
ग्रामीणों की मान्यता है कि रेणुका चौदस के पावन दिन माता रानी स्वयं प्रकट होती हैं. इस दिन मंदिर में स्थापित माता की प्रतिमाएं लगभग एक फीट तक ऊंची हो जाती हैं. यही कारण है कि हर साल इस खास दिन पर हजारों श्रद्धालु दूर-दूर से माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं. कई भक्तों का कहना है कि उन्होंने यह बदलाव अपनी आंखों से देखा है.
700 साल पुराना मंदिर और पांच देवियों का वास
बताया जाता है कि यह मंदिर करीब 700 वर्ष पुराना है. यहां मां रेणुका के साथ मां बिजासनी, मां हिंगलाज, मां शीतला और खोखली मां की प्रतिमाएं विराजमान हैं. सालों से यह स्थान लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है. गांव वाले मानते हैं कि यहां सच्चे मन से मां को पुकारने वाला कभी खाली हाथ नहीं लौटता.
खुद प्रकट होता है चमत्कारी कुमकुम
मंदिर को लेकर एक और अनोखी मान्यता है. कहा जाता है कि शुभ अवसरों पर माता की प्रतिमा से स्वयं कुमकुम प्रकट होता है. यह कुमकुम प्रतिमा के सामने से निकलता है और जिसे भी लगाया जाता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है. इसी वजह से भक्त इसे चमत्कारी मानते हैं और बड़े विश्वास के साथ अपने माथे पर लगाते हैं.
बीमारियों में भी असरदार है माता का जल
मंदिर के पुजारी आनंद जी तारे, जो पिछले 30 वर्षों से यहां सेवा कर रहे हैं, बताते हैं कि माता की प्रतिमा को स्नान कराने के बाद बचा हुआ जल भी चमत्कारी माना जाता है. मान्यता है कि इस जल से आंखों की कमजोरी, कान से कम सुनाई देना, त्वचा रोग और खासतौर पर मस्सों की समस्या में लाभ मिलता है.
पांच मंगलवार का उपवास और पूरी होती मन्नत
मान्यता के अनुसार जो भक्त माता के जल से उपचार कराता है, उसे पांच मंगलवार का उपवास भी रखना होता है. कई लोगों ने यहां ठीक होने की बात खुद बताई है. यही वजह है कि मंदिर में पूरे साल श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है.
मां ने बसाया था गांव, तभी पड़ा नाम छैगांवदेवी
ग्रामीणों के अनुसार प्राचीन समय में यह क्षेत्र खांडव वन के नाम से जाना जाता था और पूरी तरह वीरान था. कहा जाता है कि मां रेणुका ने यहां तपस्या की और राहगीरों को सपने में दर्शन देकर इसी स्थान पर गांव बसाने का आदेश दिया. तभी से इस गांव का नाम पड़ा छैगांवदेवी.
आज भी जीवित है सदियों पुरानी आस्था
आज भी यह मंदिर खंडवा जिले की धार्मिक धरोहर के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है. यहां सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि विश्वास, परंपरा और चमत्कारों की जीवित कहानी बसती है. मां रेणुका का यह धाम आज भी श्रद्धालुओं के लिए भक्ति और विश्वास का बड़ा केंद्र बना हुआ है.
बसंत पंचमी के अचूक उपाय बदलेंगे किस्मत, पढ़ाई-करियर में मिलेगी उड़ान
20 Jan, 2026 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
उज्जैन. उमंग, उत्साह और विद्या की आराधना का पावन पर्व बसंत पंचमी इस वर्ष 23 जनवरी को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा. खास बात यह है कि इस बार बसंत पंचमी अत्यंत शुभ योग में आ रही है, जिससे इसका महत्व और भी बढ़ गया है. बसंत पंचमी का दिन ज्ञान, बुद्धि और कला की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती को समर्पित होता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन मां सरस्वती की विधिवत पूजा करने से व्यक्ति को ज्ञान, विवेक और सकारात्मक सोच का वरदान प्राप्त होता है.
वैदिक पंचांग के अनुसार, माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को सरस्वती पूजा का विशेष महत्व माना गया है. इस दिन किया गया पूजन शिक्षा, करियर और जीवन में उन्नति के नए मार्ग खोलता है. वहीं, यदि वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार मां सरस्वती की आराधना की जाए, तो इससे न केवल विद्या में वृद्धि होती है, बल्कि धन, सफलता और यश की भी प्राप्ति होती है. कुछ आसान और प्रभावी उपाय अपनाकर व्यक्ति लंबे समय तक सरस्वती माता की कृपा प्राप्त कर सकता है. तो आइए जानते हैं उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित आनंद भारद्वाज से वे कौन-से विशेष उपाय हैं, जिन्हें बसंत पंचमी के दिन करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं.
जरूर करे यह उपाय मिलेगा मां सरस्वती का आर्शीवाद
जिन लोगों का पढ़ाई मे मन नही लगता हो वह, अध्ययन कक्ष में दीवारों का रंग हल्का क्रीम या ऑफ-व्हाइट कराना चाहिए. माना जाता है कि सफेद रंग माता सरस्वती को प्रिय होता है और इस रंग से एक शांत वातावरण का अनुभव होता है.
अगर इस दिन छात्र घर में देवी सरस्वती को लाल फूल विशेषकर गुड़हल या फिर गेंदे का फूल अर्पित करें. इससे उन्हें इच्छित क्षेत्र में सफलता मिलती है.
आपके घर की उत्तर दिशा विकास के अवसरों और बढ़ी हुई कमाई का प्रतिनिधित्व करती है. इसलिए इस स्थान पर शयनकक्ष रखना लाभकारी रहेगा और धन का निरंतर प्रवाह बना रहेगा.
स्टडी टेबल पर देवी सरस्वती की मूर्ति रखने से भी सफलता मिलेगी. साथ ही पढ़ाई करते समय विद्यार्थियों का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए. वास्तु के अनुसार अध्ययन कक्ष घर की उत्तर-पूर्व दिशा में होना चाहिए. इससे शीघ्र सफलता मिलती है.
बसंत पंचमी के दिन कमरे में एक विजन बोर्ड लगाएं. कहा जाता है कि ऐसा करने से माता सरस्वती ध्यान एकाग्र करने में मदद करती हैं और छात्रों के विजन को पूरा करती हैं.
यदि आपके घर/कार्यालय में कोई वास्तु दोष है, तो बसंत पंचमी के इस शुभ दिन पर उनका समाधान करने से जीवन में देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
बिजनेस में सफलता के लिए टेबल का आकार नियमित होना चाहिए और बसंत पंचमी के दिन अपने कार्यालय के उत्तर-पूर्व कोने में देवी सरस्वती की मूर्ति रखने से व्यवसाय में वृद्धि होगी.
आपके घर की दक्षिण दिशा व्यक्तियों के लिए नाम और प्रसिद्धि का प्रतिनिधित्व करती है. इस दिशा का उपयोग शयनकक्ष के साथ-साथ ध्यान के लिए भी किया जा सकता है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (20 जनवरी 2026)
20 Jan, 2026 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- धन लाभ आशानुकूल का हर्ष, कार्यवृत्ति में सुधार होवे, कार्य बनेंगे।
वृष राशि :- मान प्रतिष्ठा, कार्यकुशलता से संंतोष होवे एवं कार्य पूर्ण संतुष्ट का होगा।
मिथुन राशि :- सामर्थ्य वृद्धि भी संभंव है, विरोधियों से डटकर मुकाबला करें, विजय मिलेगी।
कर्क राशि :- तनाव क्लेश व अशांति से चिन्ता व मानसिक व्यग्रता संभंव होगी।
सिंह राशि :- दैनिक कार्यवृत्ति में सुधार, चिन्ताएं कम हो तथा परिश्रम सफल होगा।
कन्या राशि :- शारीरिक थकावट, बैचेनी बढ़ेगी तथा समय और सामर्थ्य व्यर्थ जाएगा।
तुला राशि :- दैनिक कार्यगति अनुकूल, समय की अनुकूलता का उपयोग करें।
वृश्चिक राशि :- योजनाएं विफल जाए, परिश्रम से कुछ सफलता निरर्थक दिखाई देगी।
धनु राशि :- मनोबल बनाए रखें तथा कार्य व्यवसाय में योजना परिपूर्ण अवश्य होगी।
मकर राशि :- कुटुम्ब की समस्याओं में अर्थ व्यवस्था, बाधा पैदा अवश्य होगी, ध्यान दें।
कुंभ राशि :- धन लाभ, आशानुकूल सफलता का हर्ष होगा, तथा मन उत्तम बना रहेगा।
मीन राशि :- सफलता के साधन जुटाए तथा विशेष कार्य स्थिगित रखे।
गुप्त नवरात्रि के दूसरे दिन करें मां तारा की पूजा, धन-वैभव और ऐश्वर्य में होगी अपार वृद्धि
19 Jan, 2026 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू सनातन परंपरा में नवरात्रि को अत्यंत पावन और शुभ पर्व माना गया है. नवरात्रि के 9 दिनों में आदिशक्ति मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की विधिपूर्वक आराधना की जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वर्ष में कुल चार नवरात्रि आती हैं, जिनमें शारदीय और चैत्र नवरात्रि प्रसिद्ध हैं जबकि दो नवरात्रि गुप्त रूप से मनाई जाती हैं. गुप्त नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की 10 महाविद्याओं की साधना विशेष विधि से की जाती है. मान्यता है कि इस गुप्त साधना से भक्तों के जीवन के कष्ट दूर होते हैं और उन्हें माता रानी की विशेष कृपा प्राप्त होती है. आइए जानते हैं कि गुप्त नवरात्रि के दूसरे दिन किस देवी की पूजा करना श्रेष्ठ माना गया है.
कहा कि वैदिक पंचांग के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से गुप्त नवरात्रि का आरंभ होता है. प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 19 जनवरी 2026 दिन सोमवार को दोपहर 01:21 बजे के लगभग हो रही है. वहीं प्रतिपदा तिथि का समापन 20 जनवरी 2026 दिन मंगलवार को दोपहर 02:14 बजे के लगभग हो रहा है. ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, माघ गुप्त नवरात्रि का शुभारंभ 19 जनवरी 2026 को होगा.
कैसे प्रसन्न होंगी मां काली?
उन्होंने आगे कहा कि नवरात्रि के पहले दिन मां काली की पूजा का विधान है. मां को गुड़ का भोग बहुत पसंद है. काली मां की पूजा के बाद भोग के गुड़ को गरीबों में बांट देना चाहिए. काली मां को तत्काल प्रसन्न होने वाली और तत्काल ही रूठने वाली देवी माना जाता है. दूसरे दिन मां तारा की पूजा की जाती है.
भगवान बुद्ध ने की थी मां तारा की उपासना
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, स्वयं भगवान बुद्ध ने भी मां तारा की उपासना की थी. इतना ही नहीं, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पूज्य गुरु महर्षि वशिष्ठ भी मां तारा की आराधना करने वालों में शामिल थे. शास्त्रों में यह भी वर्णित है कि महान विद्वान लंकापति रावण और स्वयं देवों के देव महादेव ने भी मां तारा की शरण ग्रहण की थी. मां तारा की पूजा हमेशा रात के समय करनी चाहिए. मां तारा की पूजा हमेशा एकांत में करनी चाहिए. माता को नीले रंग के वस्त्र और पुष्प अर्पित करें. मां तारा को प्रसाद के रूप में आम चढ़ाएं.
मां तारा की पूजा का महत्व
मां तारा को धन, वैभव और ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है. 10 महाविद्याओं में उनका स्थान दूसरा माना गया है. शास्त्रों के अनुसार मां तारा देवी पार्वती का ही एक दिव्य स्वरूप हैं. उनकी उपासना न केवल हिंदू धर्म में बल्कि बौद्ध परंपरा में भी विशेष महत्व रखती है. मान्यता है कि मां तारा की आराधना से साधक को सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक शक्ति की प्राप्ति होती है.
अगर जीवन में घट रहीं हैं ये घटनाएं तो समझ लें आपके पितर हैं आपसे नाराज, गलती से भी न करें नजरअंदाज
19 Jan, 2026 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ऐसी मान्यता है कि किसी व्यक्ति पर पितृ दोष लगता है तो उसके साथ कुछ भी अच्छा नहीं होता है. वंश आगे नहीं बढ़ता. संतान प्राप्ति में मुश्किलें आती हैं. घर में हर दिन लड़ाई-झगड़े का माहौल बना रहता है. कोई भी कार्य करने जाते हैं तो उसमें रुकावट पैदा हो जाती है. शुभ कार्यों में विघ्न आने लगता है. ये सभी पितरों के नाराज होने का संकेत है. ऐसे में आज मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर आप पितृ दोष को दूर करने के कुछ उपाय करें तो पितृ दोष दूर हो सकता है. उनकी आत्म को शांति मिलती है. पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए आप पितरों के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध, पिंडदान आदि करते हैं तो इससे पितर तृप्त होते हैं. इससे आपके सभी दोष दूर हो सकते हैं.
पितृ दोष क्या है- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पितृ दोष एक ऐसा योग है, जो व्यक्ति की कुंडली के पंचम या नवम भाव में राहु-केतु, अन्य ग्रहों की अशुभ स्थिति होने के कारण बनता है. राहु ग्रह को पितृ दोष का मुख्य कारक कहा जाता है. पूर्वजों के कुछ अधूरे कार्यों, असंतुष्ट आत्मा, माता-पिता को अपने ही बच्चों द्वारा कष्ट देने आदि से बनता है, इससे पितरों को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती और उनकी आत्मा भटकती रहती है. ऐसे में जीवन में सबकुछ अशुभ होने लगता है. शुभ कार्यों में बाधाएं आने लगती हैं. आपके जीवन में पितर दोष है या नहीं, उसे कुछ खास संकेतों से आप पहचान सकते हैं.
ऐसा भी मान्यता है कि अगर किसी को पितरों का आशीर्वाद मिले तो उसे सफलता मिलती है. अगर किसी को पूर्वजों का आशीर्वाद नहीं मिले तो उसकी जिंदगी में बहुत मुश्किलें आती हैं. इसे ही पितृ दोष कहा जाता है. आज मौनी अमावस्या है, इसलिए आज के दिन लोग अपने पितरों को तर्पण देते हैं. इस दिन पिंडदान, पितृ स्तोत्र का पाठ करने, पूर्वजों से क्षमा याचना से भी पितरों का गुस्सा शांत किया जा सकता है. उनकी आत्मा को शांति मिल सकती है.
पैसे की हानि: पितृ दोष होने पर आपके जीवन में अशुभ घटनाएं होनी शुरू हो जाएंगी. अगर आप अचानक पैसे खो देते हैं तो यह पितृ दोष का संकेत हो सकता है. आपके लिए पैसे बचाना मुश्किल हो जाता है और जो पैसा आपने रखा है वह भी खो सकता है. आर्थिक तंगी से आप ग्रस्त हो सकते हैं. कर्ज के बोझ के तले दब सकते हैं.
खाने में बाल: अगर आपके खाने में बार-बार बाल मिलते हैं तो इसका मतलब है कि आपके पूर्वज आपसे खुश नहीं हैं. इसका मतलब ये भी होता है कि आपके पूर्वज भूखे हैं. अचानक आपको आपके घर के किसी भी भाग में, आंगन या दीवारों पर पीपल का पेड़ उगता दिख जाए तो समझ लें ये पूर्वजों के नाराज होने का संकेत है.
सपने में पूर्वजों का आना: अगर सपने में पूर्वज आकर मुस्कुराते हैं तो यह अच्छा माना जाता है. इसका मतलब है कि वे खुश हैं, लेकिन अगर वे सपने में रोते हैं या दुखी होकर बात करते हैं तो इसका मतलब है कि पितृ नाराज हैं. ऐसे में आपको दान देना चाहिए और पितृ पूजा करनी चाहिए.
अजीब सी खुशबू: हर जगह अलग-अलग खुशबू होती है, लेकिन अगर अचानक आपको अजीब सी खुशबू महसूस होने लगे तो ये पितरों की नाराजगी का संकेत है. अगर आपको ये खुशबू बार-बार महसूस हो तो तुरंत पूजा करना जरूरी है.
काम में रुकावटें: आप जो भी कार्य करने जाते हैं, उसमें रुकावट आए, कार्य रुक जाए, पूरा नहीं हो, आपको बार-बार असफलता हासिल हो, तो ये भी पितर दोष के संकेत हैं. करियर में तरक्की ना हो, नौकरी चली जाए या लगातार प्रयास के भी जॉब ना मिले तो इसका कारण भी पितृ दोष ही है. इसके लिए आप अपने घर पर ही पितृ पूजा जरूर करवा सकते हैं.
नाराज पितरों को मनाने के उपाय: विधि-विधान से तर्पण, पिंडदान करें. ब्राह्मण भोजन कराएं, उन्हें दक्षिणा दें. पूर्वजों के नाम पर गरीबों को अनाज, वस्त्र आदि का दान करें. पीपल के पेड़ की पूजा करें. पितृ स्तोत्र पाठ करें. आपके द्वारा अनजाने में पूर्वजों के साथ हुई गलतियों के लिए क्षमा याचना करें. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
सूर्य देव का वो शक्तिशाली स्तोत्र जिसे पढ़ते ही जाग उठती है सोई किस्मत, जानिए कितनी बार करें पाठ और क्या होगा इसका असर?
19 Jan, 2026 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में सूर्य को सिर्फ एक ग्रह नहीं, बल्कि जीवन देने वाला देवता माना गया है. सुबह की पहली किरण से लेकर दिन ढलने तक सूर्य की मौजूदगी हर इंसान की जिंदगी से जुड़ी रहती है. यही वजह है कि सूर्य देव को प्रत्यक्ष देव कहा गया है, जिनके दर्शन हर दिन सभी को होते हैं. मान्यता है कि सूर्य की कृपा से इंसान को सेहत, आत्मविश्वास, मान-सम्मान और सकारात्मक सोच मिलती है. जब जीवन में रुकावटें आने लगती हैं, मेहनत के बाद भी सफलता दूर नजर आती है, मन कमजोर रहने लगता है या बार-बार नकारात्मकता घेरने लगती है, तब सूर्य की साधना बेहद असरदार मानी जाती है. इन्हीं साधनाओं में एक सबसे शक्तिशाली स्तोत्र है आदित्य हृदय स्तोत्र. आदित्य हृदय स्तोत्र सिर्फ मंत्रों का समूह नहीं है, बल्कि यह ऐसा कवच माना जाता है जो मन, शरीर और सोच-तीनों को मजबूत करता है. कहा जाता है कि इस स्तोत्र का तीन बार पाठ करने से व्यक्ति के भीतर नई ऊर्जा का संचार होता है और किस्मत के बंद दरवाजे धीरे-धीरे खुलने लगते हैं. खास तौर पर मकर संक्रांति, रविवार या सूर्य से जुड़े खास दिनों पर इसका पाठ करना बेहद शुभ माना गया है. आइए जानते हैं आदित्य हृदय स्तोत्र की महिमा, इसके फायदे और इससे जुड़ी रामायण की वो कथा, जिसने इसे और भी पावन बना दिया. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं
आदित्य हृदय स्तोत्र क्या है?
आदित्य हृदय स्तोत्र एक पवित्र संस्कृत स्तोत्र है, जिसका वर्णन वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में मिलता है. यह स्तोत्र सूर्य देव की महिमा, शक्ति और उनके दिव्य स्वरूप का सुंदर वर्णन करता है. इसमें सूर्य को सभी देवताओं का सार बताया गया है. इस स्तोत्र के जरिए सूर्य को जीवन देने वाला, अंधकार मिटाने वाला और हर संकट से बाहर निकालने वाला देव कहा गया है. यही वजह है कि इसे पढ़ने से डर, तनाव और निराशा कम होने लगती है.
भगवान राम और आदित्य हृदय स्तोत्र की कथा
रामायण के अनुसार, जब भगवान राम का युद्ध लंकापति रावण से चल रहा था, तब लंबी लड़ाई के कारण उनकी सेना थक चुकी थी. रावण बार-बार घायल होने के बाद भी जीवित हो जाता था क्योंकि उसकी नाभि में अमृत मौजूद था. ऐसे कठिन समय में भगवान राम भी चिंतित दिखाई दिए. तभी युद्धभूमि में महर्षि अगस्त्य प्रकट हुए. उन्होंने भगवान राम को सूर्य देव की उपासना करने और आदित्य हृदय स्तोत्र का तीन बार पाठ करने की सलाह दी. अगस्त्य मुनि ने बताया कि यह स्तोत्र हर शत्रु पर विजय दिलाने वाला है और मन से डर को खत्म कर देता है. भगवान राम ने पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ सूर्य देव को नमन किया और आदित्य हृदय स्तोत्र का तीन बार पाठ किया. इसके बाद उनका आत्मविश्वास लौट आया, शरीर में नई शक्ति आई और अंत में उन्होंने रावण का वध कर विजय प्राप्त की. तभी से यह स्तोत्र विजय, साहस और सफलता का प्रतीक माना जाने लगा.
गृह प्रवेश की है तैयारी? 23 और 26 जनवरी को शुभ मुहूर्त, फरवरी से दिसंबर तक इतनी तिथियां उपलब्ध
19 Jan, 2026 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मकर संक्रांति के साथ ही खरमास की समाप्ति हो चुकी है और इसी के साथ अब मांगलिक व शुभ कार्यों पर लगी रोक भी हट गई है. सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत शुभ मुहूर्त में करने की परंपरा रही है. विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे संस्कार तभी किए जाते हैं जब ग्रह-नक्षत्र अनुकूल हों. खासकर गृह प्रवेश को लेकर लोगों की आस्था और विश्वास बहुत गहरा होता है, क्योंकि यह केवल एक घर में प्रवेश नहीं, बल्कि जीवन के नए अध्याय की शुरुआत मानी जाती है.
कई लोग वर्षों की मेहनत और संघर्ष के बाद अपने सपनों का आशियाना बनाते हैं और उसमें प्रवेश के लिए शुभ तिथि का इंतजार करते हैं. अब ऐसे सभी लोगों के लिए खुशखबरी है, क्योंकि मकर संक्रांति के बाद खरमास समाप्त हो चुका है और अब आप अपने नए घर में विधि-विधान के साथ गृह प्रवेश कर सकते हैं. शुभ तिथि के बारे मे जानते है देवघर के ज्योतिषाचार्य से?
क्या कहते है देवघर के ज्योतिषाचार्य:
गृह प्रवेश हमेशा शुभ तिथि और शुभ मुहूर्त में ही करना चाहिए. शुभ समय में शुरू किए गए कार्य न केवल बिना किसी बाधा के पूर्ण होते हैं, बल्कि परिवार में सुख, शांति और समृद्धि भी लेकर आते हैं. इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है और वास्तु दोष की संभावनाएं भी कम होती हैं. मकर संक्रांति के साथ ही खरमास समाप्त हो गया है. 23 जनवरी, बसंत पंचमी के दिन सबसे विशेष अबूझ मुहूर्त माना जाता है. इस दिन बिना पंचांग देखे भी गृह प्रवेश किया जा सकता है. लेकिन दोपहर 01 बजे के बाद.इसके अलावा 26 जनवरी भी गृह प्रवेश के लिए शुभ तिथि मानी गई है.
ऋषिकेश पंचांग के अनुसार गृह प्रवेश की शुभ तिथियां इस प्रकार हैं:
जनवरी माह में: 23 और 26
फरवरी माह में: 1, 6, 8, 10, 20, 26 और 27
मार्च माह में: 4, 5 और 6
अप्रैल माह में: 20, 23 और 29
मई माह में: 1, 4, 6, 8, 9, 11 और 13
नवंबर माह में: 5, 7, 11, 16, 20, 25, 26 और 28
दिसंबर माह में: 3, 4, 10, 12 और 14
गृह प्रवेश में इन बातों का रखें ध्यान:
हिंदू मान्यताओं के अनुसार शनिवार, रविवार और मंगलवार को गृह प्रवेश नहीं करना चाहिए, क्योंकि इन दिनों में प्रवेश करने से वास्तु दोष लग सकता है. साथ ही गृह प्रवेश के समय शंख और घंटी बजाना अत्यंत शुभ माना गया है.ऐसा न करने पर घर में नकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश की आशंका रहती है.शुभ तिथि और सही विधि से किया गया गृह प्रवेश आपके नए घर को सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (19 जनवरी 2026)
19 Jan, 2026 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- धन लाभ आशानुकूल का हर्ष, कार्यवृत्ति में सुधार तथा प्रतिष्ठा अवश्य ही बढ़े।
वृष राशि :- योजनाएं पूर्ण हो, शुभ समाचार से समस्या संभव पूर्ण हो तथा कार्य अवश्य ही बनेंगे।
मिथुन राशि :- कार्य व्यवसाय गति मंद रहे, असमर्थता का वातावरण अवश्य ही बना रहेगा, ध्यान दें।
कर्क राशि :- दैनिक व्यवसाय कार्य व्यवसाय में थकावट तथा बेचैनी, सफलता के साधन जुटाकर चलेंगे।
सिंह राशि :- आलोचना से बचें, कार्य कुशलता से पूर्ण संतुष्ट होवे तथा संतोष होगा।
कन्या राशि :- भोग ऐश्वर्य में समय बीतेगा, शारीरिक थकावट, बेचैनी अवश्य ही बढ़ेगी।
तुला राशि :- व्यवसायिक चिन्ता बनी रहेगी, आशानुकूल सफलता से संतोष होगा, ध्यान दें।
वृश्चिक राशि :- मित्र वर्ग विशेष फलप्रद रहे तथा सुखवर्धक योजनाएं अवश्य ही बनेगी, ध्यान दें।
धनु राशि :- तनावपूर्ण वातावरण चलता रहेगा तथा चिन्ताएं संभव होवे, ध्यान देवे।
मकर राशि :- कार्यवृत्ति में सुधार तथा सामाजिक कार्यों में प्रतिष्ठा सदैव ही अवश्य बनी रहें।
कुंभ राशि :- कार्य व्यवसाय, गति मंद, चोट आदि का भय अवश्य ही बना रहेगा।
मीन राशि :- आशानुकूल सफलता का हर्ष, बिगड़े हुए कार्य बने, तथा योजना बनेगी ध्यान रखे कार्य होगा।
सुबह उठते ही कर रहे 3 गलतियां? आज ही बदल दें ये आदत, नहीं तो जीवन भर पछताना पड़ेगा!
18 Jan, 2026 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सुबह का समय हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. इस समय की शुरुआत जो भी कार्य या सोच से होती है, उसका असर पूरे दिन पर पड़ता है. कई बार हम अनजाने में ऐसे काम कर लेते हैं, जिनका असर हमारी तरक्की, सफलता और मानसिक शांति पर पड़ता है. वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, सुबह उठते ही कुछ आदतें हमारी ऊर्जा और अवसरों को प्रभावित कर सकती हैं. हमारा मन और शरीर सुबह सबसे अधिक संवेदनशील होता है. अगर इस समय नकारात्मक विचार, आलस्य या गलत आदतें हों, तो दिनभर तनाव, आर्थिक बाधाएं और काम में रुकावटें सामने आ सकती हैं. वहीं, सही तरीके से दिन की शुरुआत करने से न केवल काम में तेजी आती है, बल्कि मानसिक शांति और सफलता भी बढ़ती है. कई लोग सुबह जल्दी उठने के महत्व को कम आंकते हैं और अपने जीवन में पीछे की ओर बढ़ते रहते हैं. इसलिए यह जानना जरूरी है कि सुबह उठते ही कौन सी आदतें हमें नुकसान पहुंचा सकती हैं और उन्हें बदलकर हम जीवन में स्थायी उन्नति पा सकते हैं. आइए जानते हैं सुबह उठते ही होने वाली तीन मुख्य गलतियों के बारे में, जिन्हें दूर करके हम अपने दिन और जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकते हैं. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.
1. सुबह उठते ही नकारात्मक सोच या शब्द बोलना
जब आप सुबह उठते हैं, तो आपका मन सबसे अधिक संवेदनशील होता है. अगर इस समय आप चिंता, गुस्सा या शिकायत के विचार करें या नकारात्मक बातें बोलें, तो इसका असर पूरे दिन की ऊर्जा पर पड़ता है. इसलिए उठते ही ईश्वर का स्मरण करें, अपने परिवार और जीवन की अच्छी चीजों के लिए आभार व्यक्त करें और सकारात्मक सोच अपनाएं. इससे मन शांत रहता है और काम में सफलता की संभावनाएं बढ़ती हैं.
2. बिस्तर से उतरते ही जमीन पर पैर जोर से पटकना
वास्तु शास्त्र में पृथ्वी को माता के रूप में माना गया है. सुबह उठते ही बिस्तर से जोर से पैर जमीन पर रखने से नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. यह आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को बढ़ा सकता है. सही तरीका यह है कि बिस्तर से उतरने से पहले धीरे-धीरे पैर रखें और मानसिक रूप से पृथ्वी से क्षमा याचना करें. इससे दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा से होती है.
सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.
3. सूर्योदय के बाद देर तक सोते रहना
सुबह जल्दी उठना विशेष रूप से शुभ माना गया है. सूर्योदय के बाद लंबे समय तक सोना आलस्य, तनाव और अवसरों की कमी को जन्म देता है. देर से उठने वाले लोगों में काम की गति धीमी रहती है और तरक्की में बाधाएं आती हैं. इसलिए कोशिश करें कि ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठकर दिन की शुरुआत करें. इससे शरीर और मन दोनों सक्रिय रहते हैं और दिनभर सफलता की संभावनाएं बढ़ती हैं.
अगर आप चाहते हैं कि आपका जीवन सफल और संतुलित रहे, तो सुबह उठते ही इन तीन आदतों से बचें. सकारात्मक शुरुआत न केवल दिन को बेहतर बनाती है, बल्कि जीवन में स्थायी उन्नति का मार्ग भी खोलती है. ध्यान रखें कि आपका हर काम और सोच सजीव और सकारात्मक ऊर्जा से भरा हो.
जमुई में महादेव के 5 ऐसे धाम, जहां दर्शन मात्र से मिटते हैं कष्ट! भक्त यहां से नहीं जाते खाली हाथ
18 Jan, 2026 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
जमुई जिला आस्था, पौराणिक कथाओं और धार्मिक विरासत के लिए जाना जाता है. यहां कई प्राचीन शिव मंदिर हैं, जिनका इतिहास काफी पौराणिक है. सावन, महाशिवरात्रि और मकर संक्रांति जैसे पर्वों पर इन मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. इनमें से एक मंदिर तो पहाड़ की चोटी पर स्थित है.
भगवान भोलेनाथ की पूजा के लिए जमुई जिले में कई प्रसिद्ध मंदिर हैं. आप यह परिवार के साथ पूजा अर्चना भी कर सकते हैं, साथ ही आप यहां घूमने भी जा सकते हैं. इन मंदिरों का इतिहास पुराना है.
खैरा प्रखंड के चर्चित गिद्धेश्वर मंदिर का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है. करीब 3 एकड़ 88 डिसमील क्षेत्र में फैले इस मंदिर परिसर का निर्माण वर्ष 1941 में महाराज गिद्धौर के तत्कालीन तहसीलदार लाला हरिनंदन प्रसाद ने कराया था. मान्यता है कि गिद्धेश्वर पर्वत के समीप उन्हें एक शिवलिंग प्राप्त हुआ था, जिसे वे अपने साथ ले जाना चाहते थे. लेकिन उसी रात उन्हें स्वप्न आया कि भगवान शिव का मंदिर उसी स्थान पर बनना चाहिए, जहां शिवलिंग की प्राप्ति हुई थी. इसके बाद मंदिर का निर्माण कराया गया. एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार रामायण काल में गिद्धेश्वर पर्वत पर गिद्धराज जटायु का निवास था और सीता हरण के समय रावण से उनका युद्ध यहीं हुआ था. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नतें पूरी होती हैं और सावन में विशेष पूजा होती है.
झाझा मुख्य मार्ग पर बरहट प्रखंड क्षेत्र में किउल नदी के तट पर स्थित पतनेश्वर पहाड़ धार्मिक और प्राकृतिक आस्था का अनोखा संगम है. करीब 90 फीट ऊंचे पहाड़ की चोटी पर बाबा पतनेश्वरनाथ महादेव विराजमान हैं. श्रद्धालु 104 सीढ़ियां चढ़कर मंदिर परिसर तक पहुंचते हैं. यहां माता पार्वती का भी मंदिर स्थित है. सावन और मकर संक्रांति के अवसर पर यहां भव्य मेला लगता है. मान्यता है कि किउल नदी में स्नान के बाद यहां पूजा करने से सभी मुरादें पूरी होती हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार यहां कुष्ठ रोग तक ठीक हो जाते हैं. ओडिशा के एक कुष्ठ रोगी को स्वप्न में बाबा बैद्यनाथ ने पतनेश्वर धाम आने का आदेश दिया था और एक माह सेवा करने के बाद वह रोगमुक्त हो गया था.
जिला मुख्यालय के सिकंदरा जमुई मुख्य मार्ग पर स्थित बाबा धनेश्वर नाथ मंदिर भी आस्था का बड़ा केंद्र है. इस मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है, जिन्हें बाबा बैद्यनाथ का उपलिंग भी कहा जाता है. जानकारों के अनुसार यह मंदिर 13वीं सदी से भी पुराना है. बिहार के साथ-साथ बंगाल और झारखंड से भी श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि बाबा धनेश्वर नाथ सभी श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी करते हैं. हालांकि मंदिर और इसके समीप स्थित तालाब का रखरखाव संतोषजनक नहीं है. तालाब सूखने के कगार पर है और रखरखाव के नाम पर सिर्फ औपचारिकता देखी जाती है.
जमुई जिला मुख्यालय से महज चार किलोमीटर दूर सिंगारपुर में स्थित झिकुटिया महादेव मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है. करीब 300 साल पुराने इस मंदिर में आज भी गैर ब्राह्मण ही मुख्य पुजारी के रूप में पूजा-अर्चना करते हैं. मान्यता है कि भगवान भोलेनाथ ने एक स्थानीय व्यक्ति को स्वप्न में आकाश की ओर जाते प्रकाश पुंज का दर्शन कराया था. उस समय यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा था. स्वप्न के संकेत पर जब लोग वहां पहुंचे तो शिवलिंग प्रकट अवस्था में मिला. तभी से यहां नियमित पूजा होती आ रही है और यह मंदिर जमुई के प्रमुख शिवालयों में गिना जाता है.
खैरा बाजार स्थित रावणेश्वर शिव मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है. इस मंदिर का निर्माण चंदेल वंश के महाराज द्वारा कराया गया था और इसका इतिहास सौ साल से अधिक पुराना बताया जाता है. स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है. सावन और महाशिवरात्रि के दौरान यहां विशेष भीड़ देखने को मिलती है. रावणेश्वर शिव मंदिर न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि खैरा बाजार की सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है.
कौन है उत्तराखंड के लोक देवता गंगनाथ, जो नेपाल से आए थे कुमाऊं, आज भी करते हैं न्याय
18 Jan, 2026 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कुमाऊं की लोकआस्था में गंगनाथ देवता का नाम न्याय, सत्य और मनोकामना पूर्ति के प्रतीक के रूप में बड़े श्रद्धा भाव से लिया जाता है. जिस तरह गोलू देवता को न्याय का देवता माना जाता है, उसी तरह गंगनाथ देवता भी पीढ़ियों से लोगों के विश्वास का केंद्र रहे हैं. कुमाऊं के गांव-गांव में उनके मंदिर मिल जाते हैं, जहां श्रद्धालु अपनी फरियाद लेकर पहुंचते हैं और घंटियां चढ़ाकर न्याय की गुहार लगाते हैं.
लोककथाओं के अनुसार गंगनाथ देवता का संबंध नेपाल के डोटी राज्य से माना जाता है. कहा जाता है कि वे डोटी के राजा उदय चंद के ज्येष्ठ पुत्र थे. ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि गंगनाथ 12 वर्ष की आयु में बैराग्य धारण कर लेंगे. इस भविष्यवाणी को टालने के लिए राजा ने अनोखा उपाय अपनाया और 12 वर्ष से पहले सात बार उनका विवाह लोहे की मूर्तियों से करवाया, लेकिन नियति को कौन टाल सका है.
इस वजह से देवता के रूप में पूजे जाते हैं गंगनाथ
नैनीताल के चिड़ियाघर स्थित गंगनाथ मंदिर के पुजारी संतोष पांडे के अनुसार 12 वर्ष की आयु में गंगनाथ को स्वप्न में एक युवती दिखाई दी, जिससे उनका प्रेम संबंध स्थापित हो गया. इस युवती का नाम भाना बताया जाता है, जो वर्तमान अल्मोड़ा जिले के दन्यां क्षेत्र के कुरकौली गांव की निवासी थी. कथा कहती है कि गंगनाथ भाना से मिलने के लिए पनार नदी पार कर गांव पहुंचे. एक रात भाना ने रस्सी के सहारे उन्हें अपने कमरे में खींच लिया, लेकिन यह बात गांववालों की नजर में आ गई. इसके बाद गांव में पंचायत बैठी और ब्राह्मणों के निर्णय के बाद गंगनाथ की हत्या कर दी गई.
मान्यता है कि मृत्यु के बाद गंगनाथ प्रेत योनि में चले गए और गांव में तरह-तरह के कष्ट फैलने लगे. भयभीत ग्रामीणों ने अंततः गंगनाथ का मंदिर स्थापित किया और उन्हें देवता का दर्जा दिया. तभी से उन्हें न्याय करने वाले देवता के रूप में पूजा जाने लगा. आज भी उनकी यह गाथा जागरों में गाई जाती है, जो कुमाऊं की लोकसंस्कृति की एक महत्वपूर्ण धरोहर है.
इतिहास के इस युद्ध से जुड़ी है घटना
हालांकि इतिहासकार इस जनश्रुति को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते. प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. अजय रावत के अनुसार गंगनाथ की मृत्यु प्रेम प्रसंग या हत्या से नहीं, बल्कि युद्ध में हुई थी. उनके मुताबिक 17वीं शताब्दी में डोटी के राजा उदय चंद ने कुमाऊं के चंद वंशीय शासकों पर आक्रमण किया था. उस समय चंपावत से राजधानी अल्मोड़ा स्थानांतरित की जा चुकी थी. इसी युद्ध के दौरान गंगनाथ वीरगति को प्राप्त हुए और अपने राज्य के लिए अदम्य साहस का परिचय देते हुए प्राण न्यौछावर कर दिए.
उत्तराखंड और नेपाल में प्राचीन काल से मान्यता रही है कि जो योद्धा युद्ध भूमि में देश के लिए प्राण त्यागता है, उसे देवत्व प्राप्त होता है, इसी परंपरा के तहत ऐसे वीरों को देवता के रूप में पूजा जाने लगा. इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की पत्नी या माता को राजा द्वारा सम्मानित किया जाता था और उन्हें जागीर दी जाती थी, जिसे ‘रौत’ कहा जाता था. आज गंगनाथ देवता कुमाऊं के आराध्य देव माने जाते हैं. नैनीताल के चिड़ियाघर स्थित गंगनाथ मंदिर में लगी असंख्य घंटियां इस बात की साक्षी हैं कि गंगनाथ देवता को आज भी लोग दुःख-कष्ट हरने वाले और सच्चा न्याय देने वाले देवता के रूप में पूजते हैं.
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