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कर्जदारों को फिलहाल राहत, नहीं बढ़ेगा ईएमआई का बोझ: आरबीआई ने मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को रखा यथावत
5 Jun, 2026 12:24 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई | भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने तीन दिनों तक चली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की समीक्षा बैठक में लिए गए फैसलों की घोषणा कर दी है। समिति के सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से मुख्य नीतिगत दर यानी रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखने का निर्णय लिया है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई के दबाव और आर्थिक विकास के सामने खड़ी चुनौतियों के बीच केंद्रीय बैंक का यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। गवर्नर ने आश्वस्त किया कि वैश्विक स्तर पर जारी उथल-पुथल के बावजूद भारत की आंतरिक आर्थिक गतिविधियां मजबूत और स्थिर बनी हुई हैं।
वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच विकास दर का अनुमान घटाकर 6.6% किया
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) में आ रही दिक्कतों का असर अब घरेलू अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। उत्पादन लागत बढ़ने और वैश्विक स्तर पर मांग कमजोर होने के कारण भारत के वस्तु निर्यात के सामने भी मुश्किलें खड़ी हो रही हैं। इन विपरीत परिस्थितियों को देखते हुए रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए देश की जीडीपी ग्रोथ (आर्थिक विकास दर) के अनुमान को पहले के 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। गवर्नर के अनुसार, एमपीसी आने वाले समय में नीतिगत बदलावों के लिए पूरी तरह से आर्थिक आंकड़ों और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर रहेगी।
बढ़ती महंगाई और चालू खाते के घाटे पर पैनी नजर
ऊर्जा उत्पादों के महंगे होने और वैश्विक व्यापार नीतियों में अनिश्चितता के चलते भारत के चालू खाते के घाटे (सीएडी) पर दबाव बढ़ने की आशंका है। पश्चिम एशिया के संकट को ध्यान में रखते हुए आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 के लिए खुदरा महंगाई (सीपीआई) का अनुमान 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया है, जबकि चालू वित्त वर्ष के लिए कोर महंगाई दर 4.7 प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई गई है। हालांकि, केंद्रीय बैंक ने साफ किया है कि भारत के पास किसी भी बाहरी आर्थिक झटके से निपटने के लिए पर्याप्त मात्रा में विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है और स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है।
विदेशी निवेशकों को राहत और बैंकिंग तंत्र में तरलता पर जोर
देश की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए आरबीआई बैंकिंग सिस्टम में नकदी (लिक्विडिटी) की कमी नहीं होने देगा। इसके साथ ही विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए निवेश के नियमों को सरल बनाया गया है। अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) और ओसीआई कार्डधारकों के लिए भी भारतीय शेयर बाजार में निवेश की सीमा को बढ़ा दिया गया है। वहीं, रुपये की विनिमय दर पर केंद्रीय बैंक ने अपनी पुरानी नीति को ही जारी रखा है, जिसका मतलब है कि आरबीआई रुपये को किसी तय दायरे में बांधने के बजाय बाजार के रुख पर छोड़ रहा है।
बिकवाली के बीच FPIs को बड़ी राहत: सरकारी बॉन्ड्स में निवेश पर कैपिटल गेन्स टैक्स से मिली छूट, रुपया थामने की कोशिश
5 Jun, 2026 12:20 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | केंद्र सरकार ने देश में डॉलर की आवक बढ़ाने और कमजोर होते रुपये को मजबूती देने के लिए एक बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। शुक्रवार को जारी एक नए अध्यादेश के माध्यम से सरकार ने आयकर अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधन किया है। इसके तहत विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) में किए जाने वाले निवेश पर लगने वाले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है। इस कदम का मुख्य लक्ष्य भारतीय ऋण बाजार में लंबी अवधि के विदेशी निवेश को आकर्षित करना है।
भारी विदेशी निकासी और टैक्स में मिली बड़ी राहत
इस नए अध्यादेश के लागू होने से पहले विदेशी संस्थागत निवेशकों को सरकारी प्रतिभूतियों से होने वाले मुनाफे पर 12.5 प्रतिशत की दर से लंबी अवधि का पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) देना पड़ता था। सरकार का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक तनाव के कारण विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से इस साल अब तक 2.6 लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि वापस निकाल ली है। यह बिकवाली पिछले साल (2025) की कुल 1.66 लाख करोड़ रुपये की निकासी से कहीं ज्यादा है। केवल जून के शुरुआती तीन दिनों में ही विदेशी फंड्स ने बाजार से 34,000 करोड़ रुपये निकाल लिए थे, जिसके बाद बाजार को संभालने के लिए सरकार ने यह कर छूट दी है।
ऐतिहासिक निचले स्तर पर रुपया और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव
विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, महंगे कच्चे तेल, बढ़ते व्यापार घाटे और अमेरिकी टैरिफ के चौतरफा दबाव के कारण भारतीय करेंसी ऐतिहासिक गिरावट का सामना कर रही है। हाल ही में रुपया डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 96.86 पर बंद हुआ था। इस साल अब तक रुपये में करीब 7 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है। रुपये को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) लगातार बाजार में डॉलर बेच रहा है, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी घटकर 681.384 अरब डॉलर पर आ गया है, जो फरवरी में 728.494 अरब डॉलर के अपने रिकॉर्ड स्तर पर था। स्थिति को सुधारने के लिए आरबीआई ने विदेशी निवेशकों के लिए बिना किसी सीमा के कुछ लंबी अवधि के सॉवरेन नोट्स खरीदने की भी अनुमति दी है।
भारतीय अर्थव्यवस्था और ऋण बाजार पर दिखेगा सकारात्मक असर
सरकारी प्रतिभूतियां (जी-सैक्स) असल में केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा फंड जुटाने के लिए जारी किए जाने वाले सुरक्षित निवेश साधन होते हैं। अब इन पर टैक्स खत्म होने से विदेशी निवेशकों का शुद्ध मुनाफा बढ़ जाएगा, जिससे भारतीय बॉन्ड बाजार उनके लिए बेहद आकर्षक बन जाएगा। इस फैसले से बाजार में विदेशी मुद्रा का प्रवाह तेज होने की उम्मीद है, जिससे वित्तीय तंत्र में लिक्विडिटी (तरलता) बढ़ेगी। यह कदम न केवल रुपये के अवमूल्यन को रोकने में मदद करेगा, बल्कि सरकार के लिए विकास और बुनियादी ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) परियोजनाओं के लिए विदेशी पूंजी जुटाना भी काफी आसान बना देगा।
ब्याज दरों पर आरबीआई के 'नो चेंज' से सुस्त पड़ा बाजार: ऊपरी स्तरों से फिसले मुख्य सूचकांक, जानिए किन सेक्टर्स में दिखी बिकवाली
5 Jun, 2026 12:13 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई | भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक के नतीजों के बाद घरेलू शेयर बाजार में मामूली गिरावट देखने को मिली। केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों को 5.25% पर यथावत (तटस्थ) रखने के फैसले के बाद बाजार ने अपनी सुबह की बढ़त गंवा दी। सुबह 11:20 बजे तक 30 शेयरों पर आधारित बीएसई सेंसेक्स 9.52 अंकों की सुस्ती के साथ 74,350.49 के स्तर पर आ गया, जबकि एनएसई का निफ्टी भी 17.15 अंक फिसलकर 23,399.40 के स्तर पर कारोबार करता दिखा।
शुरुआती कारोबार में दिखी थी अच्छी तेजी
इससे पहले सुबह के सत्र में शेयर बाजार की शुरुआत काफी सकारात्मक रही थी। सुबह 09:32 बजे के करीब सेंसेक्स 197.90 अंक यानी 0.26 प्रतिशत की मजबूती के साथ 74,557.91 के स्तर पर खुला था। वहीं, निफ्टी में भी तेजी का रुख था और यह 51.41 अंक या 0.22 प्रतिशत की बढ़त लेते हुए 23,467.95 के अहम स्तर के पार निकल गया था। शुरुआती कारोबार में खरीदारों ने बाजार में अच्छा उत्साह दिखाया था, लेकिन एमपीसी के फैसले के बाद ऊपरी स्तरों पर बिकवाली हावी हो गई।
इन्फोसिस और अदाणी पोर्ट्स के शेयरों में उछाल
बाजार को शुरुआती घंटों में संभालने का काम कुछ बड़े शेयरों (लार्ज-कैप) ने किया। आईटी और बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) क्षेत्र में निवेशकों की लिवाली से बाजार को सहारा मिला। विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी इन्फोसिस और अदाणी पोर्ट्स के शेयरों में दो-दो फीसदी की जोरदार बढ़त दर्ज की गई, जिसने सूचकांकों को मजबूती देने में मुख्य भूमिका निभाई।
सीमित दायरे में रहेगा बाजार, निवेशक बरत रहे सावधानी
बाजार के जानकारों और विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले कुछ समय तक भारतीय शेयर बाजार में एक सीमित दायरे (रेंज-बाउंड) में ही उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि निवेशक इस समय घरेलू आर्थिक फैसलों और अंतरराष्ट्रीय बाजार के संकेतों को परख रहे हैं। किसी भी बड़े जोखिम से बचने के लिए बाजार में फिलहाल फूंक-फूंक कर कदम रखने और सतर्कता बरतने की रणनीति अपनाई जा रही है।
कौन हैं राजेश मेहता और क्या है ₹15 लाख करोड़ का वित्तीय विवाद? जानिए कैसे फंसा एलआईसी का भारी-भरकम पैसा
5 Jun, 2026 12:07 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | भारतीय शेयर बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने देश की जानी-मानी आभूषण निर्माता कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (REL) और उसके चेयरमैन व प्रबंध निदेशक राजेश मेहता के खिलाफ एक बड़ा अंतरिम एकतरफा आदेश जारी किया है। नियामक ने कंपनी पर वित्त वर्ष 2021 से 2025 के दौरान करीब 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व (रेवेन्यू) को फर्जी तरीके से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने और पैसों की हेराफेरी करने के बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि, कंपनी ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है, लेकिन इस सनसनीखेज खबर के बाहर आते ही कंपनी के शेयरों में भारी बिकवाली देखी जा रही है।
राजस्व में अभूतपूर्व हेराफेरी का सनसनीखेज खुलासा
सेबी के पूर्णकालिक सदस्य कमलेश चंद्र वार्ष्णेय द्वारा जारी 109 पन्नों के अंतरिम आदेश के अनुसार, राजेश एक्सपोर्ट्स ने पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर गैर-वास्तविक लेनदेन किए और संदिग्ध अकाउंटिंग के जरिए प्रमोटर समूह की कंपनियों में फंड ट्रांसफर किया। सेबी की जांच में दावा किया गया है कि वित्त वर्ष 2021 से 2025 के बीच दिखाया गया 15.15 लाख करोड़ रुपये का राजस्व पूरी तरह फर्जी था, जो कि इस अवधि के दौरान कंपनी द्वारा रिपोर्ट किए गए कुल राजस्व का लगभग 99.8% बैठता है। इतनी बड़ी वित्तीय गड़बड़ी को देखते हुए सेबी ने मुख्य निर्णयकर्ता राजेश मेहता पर अगले आदेश तक शेयर बाजार में किसी भी तरह की प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री या ट्रेडिंग करने पर पूरी तरह रोक लगा दी है।
ऑडिटर्स का असहयोग और निवेशकों व एलआईसी को झटका
इस पूरे मामले में कंपनी के वैधानिक ऑडिटर्स की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। सेबी के मुताबिक, बार-बार समन भेजने के बावजूद न तो कंपनी ने पैसों के लेन-देन से जुड़े सही दस्तावेज पेश किए और न ही ऑडिटर्स ने जांच में सहयोग करते हुए वर्किंग पेपर उपलब्ध कराए। इस खुलासे का सीधा असर शेयर बाजार पर पड़ा, जिससे राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयर 5% तक टूट गए। इस गिरावट का बड़ा नुकसान भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) को भी उठाना पड़ा है, जिसकी इस कंपनी में 10.80% की बड़ी हिस्सेदारी है। इस वजह से एलआईसी के शेयरों में भी 1% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई।
1,200 रुपये से शुरू हुआ सफर और कंपनी का पक्ष
महज 1,200 रुपये उधार लेकर चांदी के कारोबार से शुरुआत करने वाले 60 वर्षीय राजेश मेहता ने साल 2015 में स्विस रिफाइनरी 'वालकैम्बी' का $400 मिलियन में अधिग्रहण कर वैश्विक पहचान बनाई थी। इस बड़े विवाद पर अपनी सफाई देते हुए राजेश एक्सपोर्ट्स ने कहा है कि सेबी का यह आदेश केवल अंतरिम है और इसमें कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है। कंपनी का दावा है कि उनके द्वारा घोषित राजस्व पूरी तरह सही है और इसमें कोई हेराफेरी नहीं की गई है। कंपनी के मुताबिक, यह स्थिति केवल सेबी और उनके बीच संवाद की कमी व भ्रम के कारण पैदा हुई है, जिसे वे जल्द ही सभी जरूरी दस्तावेज जमा करके स्पष्ट कर देंगे। फिलहाल कॉरपोरेट जगत की नजरें अब सेबी की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
रसोई गैस पर सरकार की बड़ी मेहरबानी: 10 करोड़ से अधिक परिवारों को मिल रहा ₹587 तक सस्ता सिलेंडर, बजट को मिला सहारा
4 Jun, 2026 02:15 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतें लगातार आसमान छू रही हैं। वैश्विक स्तर पर मची इस उथल-पुथल का असर घरेलू बाजार पर भी पड़ा है, जिसके चलते देश में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए जा चुके हैं। हाल ही में मार्च महीने में घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में भी 60 रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। इसके अलावा व्यापारिक उपयोग वाले कमर्शियल सिलेंडरों के दाम भी पहले मई में 993 रुपये और अब जून में 42 रुपये बढ़ा दिए गए हैं। हालांकि, इस वैश्विक महंगाई के बावजूद भारत के 10 करोड़ से ज्यादा परिवारों को एलपीजी सिलेंडर इसकी वास्तविक लागत से करीब 587 रुपये तक सस्ता मिल रहा है।
सब्सिडी का बड़ा सहारा, आम जनता और उज्ज्वला लाभार्थियों को मिल रही भारी राहत
अंतरराष्ट्रीय बाजार के समीकरणों को देखें तो भारत में एक एलपीजी सिलेंडर की वास्तविक सप्लाई लागत लगभग 1200 रुपये बैठती है। इसके बावजूद सरकारी सब्सिडी के चलते आम उपभोक्ताओं की जेब पर इसका सीधा बोझ नहीं पड़ रहा है। वर्तमान में बिना सब्सिडी वाले सामान्य नागरिक एक सिलेंडर के लिए लगभग 913 रुपये चुका रहे हैं, जो इसकी वास्तविक लागत से 287 रुपये कम है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के तहत आने वाले गरीब परिवारों को सरकार की तरफ से विशेष राहत दी जा रही है। सरकार इन लाभार्थियों के बैंक खातों में सीधे 300 रुपये प्रति सिलेंडर की सब्सिडी (DBT) ट्रांसफर करती है, जिससे उन्हें यह सिलेंडर केवल 613 रुपये का पड़ता है। वहीं, जिन राज्यों में वैट (VAT) की दरें कम हैं या जहां राज्य सरकारें अपनी तरफ से 20-25 रुपये की अतिरिक्त छूट दे रही हैं, वहां यह सिलेंडर वास्तविक लागत से 587 रुपये तक सस्ता मिल रहा है।
मुफ्त गैस कनेक्शन के लिए पात्रता और जरूरी शर्तें
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत नया गैस कनेक्शन लेने और इस विशेष सब्सिडी का लाभ उठाने के लिए सरकार ने कुछ अनिवार्य नियम तय किए हैं, जो इस प्रकार हैं:
योजना के तहत एलपीजी कनेक्शन केवल परिवार की सबसे बड़ी वयस्क महिला (जिसकी आयु 18 वर्ष से अधिक हो) के नाम पर ही जारी किया जा सकता है।
आवेदन करने वाली महिला के राशन कार्ड या उसके पूरे परिवार में किसी भी गैस कंपनी (जैसे इंडेन, एचपी, या भारत गैस) का कोई दूसरा चालू एलपीजी कनेक्शन पहले से मौजूद नहीं होना चाहिए।
आवेदक महिला का परिवार गरीबी रेखा से नीचे (BPL) श्रेणी का होना चाहिए।
इन विशेष वर्गों को भी मिलेगा योजना का सीधा लाभ
गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों के अलावा सरकार ने इस कल्याणकारी योजना का दायरा अन्य जरूरतमंद वर्गों के लिए भी खोला है। नियमों के मुताबिक, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के परिवार, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत आने वाले लाभार्थी, अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के कार्डधारक, वनवासी, अति पिछड़ा वर्ग (MBC), चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिक और नदी द्वीपों पर रहने वाले लोग भी इस मुफ्त एलपीजी कनेक्शन योजना के लिए पूरी तरह पात्र माने गए हैं।
सोना-चांदी खरीदने का सुनहरा मौका: कीमतों में आई गिरावट, दिल्ली-मुंबई समेत बड़े शहरों में ये हैं आज के रेट
4 Jun, 2026 02:10 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | भारतीय सर्राफा बाजार में आज सोने के भाव में हल्की सुस्ती का रुख देखने को मिल रहा है। कल यानी 3 जून को आई बड़ी गिरावट के बाद आज सुबह शुरुआती वायदा कारोबार (MCX) में कुछ मामूली रिकवरी जरूर दर्ज की गई, लेकिन खुदरा बाजार में कीमतें अब भी अपने उच्चतम स्तर से काफी नीचे बनी हुई हैं। आज बाजार में 24 कैरेट शुद्ध सोने का भाव लगभग 1,56,360 रुपये से लेकर 1,59,380 रुपये प्रति 10 ग्राम के दायरे में कारोबार कर रहा है। वहीं, आभूषण बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले 22 कैरेट जेवराती सोने की कीमत आज 1,43,100 रुपये से 1,46,340 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर स्थिर बनी हुई है।
वैश्विक तनाव और अमेरिकी फेड रिजर्व की नीतियां बनीं गिरावट की वजह
सोने की कीमतों में आई इस गिरावट के पीछे अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां मुख्य भूमिका निभा रही हैं। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे सैन्य टकराव की वजह से वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव काफी बढ़ गया है। इस तनाव के कारण कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतें बढ़ने की आशंका है, जिससे दुनिया भर में महंगाई का खतरा गहरा सकता है। अगर महंगाई बढ़ती है, तो अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लंबे समय तक उच्च स्तर पर रख सकता है। जब ब्याज दरें ऊंची होती हैं, तो निवेशक सोने के बजाय सरकारी बॉन्ड्स जैसी सुरक्षित ब्याज देने वाली जगहों पर पैसा लगाना पसंद करते हैं, क्योंकि सोने पर कोई निश्चित ब्याज या लाभांश नहीं मिलता है। इसी वजह से सोने की मांग घटने से कीमतें नीचे आई हैं।
महानगरों से लेकर प्रमुख शहरों तक सोने के ताजा दाम
देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय टैक्स और चुंगी के कारण सोने के भाव में थोड़ा अंतर देखा जा रहा है। आज 24 कैरेट और 22 कैरेट सोने की शहरवार कीमतें प्रति 10 ग्राम इस प्रकार हैं:
नोएडा में 24 कैरेट का दाम 1,56,360 रुपये और 22 कैरेट का दाम 1,43,340 रुपये है।
मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और हैदराबाद में 24 कैरेट सोना 1,59,380 रुपये तथा 22 कैरेट सोना 1,46,100 रुपये पर बिक रहा है।
अहमदाबाद में 24 कैरेट का रेट 1,59,430 रुपये और 22 कैरेट का रेट 1,46,150 रुपये दर्ज किया गया।
लखनऊ और जयपुर में 24 कैरेट का भाव 1,59,530 रुपये तथा 22 कैरेट का भाव 1,46,230 रुपये चल रहा है।
चेन्नई में कीमतें थोड़ी ज्यादा हैं, जहां 24 कैरेट सोना 1,61,240 रुपये और 22 कैरेट सोना 1,47,800 रुपये के स्तर पर है।
भारी गिरावट के बाद संभली चांदी, महानगरों में ये हैं नए भाव
कल 3 जून को चांदी के बाजार में भी भारी बिकवाली देखी गई थी, जहां कीमतें 3000 से 4500 रुपये प्रति किलोग्राम तक टूट गई थीं। हालांकि, आज सुबह वायदा बाजार (MCX) के जुलाई फ्यूचर्स में कुछ सुधार हुआ है और यह 2,64,060 रुपये से 2,76,598 रुपये प्रति किलो के बीच ट्रेड कर रही है। बिना मेकिंग चार्ज और 3% जीएसटी के, आज देश के प्रमुख शहरों में शुद्ध चांदी के दाम नोएडा और गाजियाबाद में 2,79,900 रुपये प्रति किलो हैं। दिल्ली में इसका रेट 2,96,900 रुपये प्रति किलो और मुंबई में 2,95,900 रुपये प्रति किलो पर बना हुआ है। वहीं, चेन्नई और हैदराबाद जैसे दक्षिणी शहरों में चांदी की चमक ज्यादा है, जहां भाव 3,02,900 रुपये से लेकर 3,05,900 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर पहुंच गए हैं।
महिंद्रा ग्रुप के निवेश की अमेरिकी राजदूत ने की सराहना: भारत-यूएस दोस्ती को बताया 21वीं सदी का सबसे ताकतवर गठबंधन
4 Jun, 2026 01:47 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई | अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने 4 जून 2026 को मुंबई में बड़े कारोबारी आनंद महिंद्रा से मुलाकात की। इस बैठक के दौरान महिंद्रा समूह द्वारा अमेरिका में किए जा रहे निवेश और व्यापार को बढ़ाने पर चर्चा की गई। अमेरिकी राजदूत ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच के संबंध इस सदी की सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक साझेदारी के रूप में उभर रहे हैं।
रोजगार और निवेश को बढ़ावा
दोनों देशों के बीच रोजगार के नए अवसर बनाने और माल की आपूर्ति को मजबूत करने पर बात हुई। राजदूत गोर ने सोशल मीडिया पर बताया कि अमेरिका के उत्पादन क्षेत्र में महिंद्रा ग्रुप का निवेश सराहनीय है। उन्होंने यह भी कहा कि कई बड़ी निजी कंपनियां भारत में निवेश कर रही हैं। इसके तहत अमेजन साल 2030 तक तकनीक के विकास के लिए 35 अरब डॉलर का निवेश करेगा, जबकि माइक्रोसॉफ्ट 17.5 अरब डॉलर और गूगल 15 अरब डॉलर से नए केंद्र स्थापित करने की घोषणा कर चुके हैं।
नया खनिज और व्यापार समझौता
हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच महत्वपूर्ण खनिज समझौता पूरा हुआ है। यह समझौता नई तकनीक और ऊर्जा के लिए जरूरी सामान को एक सुरक्षित नेटवर्क के जरिए दोनों देशों को देगा, जिससे व्यापार में किसी एक देश का एकाधिकार खत्म किया जा सके। इसके साथ ही, अमेरिकी सहायक व्यापार प्रतिनिधि ब्रेंडन लिंच भी भारत आए हैं और दोनों देश मिलकर एक नए व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में जुटे हैं।
रणनीतिक सहयोग और आर्थिक प्रगति
अमेरिकी राजदूत ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोच के कारण दोनों देशों के व्यापारिक संबंध मजबूत हो रहे हैं। मुंबई में एक सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि रक्षा, ऊर्जा और नई तकनीक के क्षेत्र में दोनों देशों का सहयोग आर्थिक प्रगति ला रहा है। उन्होंने भरोसा जताया कि भारत और अमेरिका मिलकर आने वाले समय में विश्व को एक नई दिशा देंगे।
बाजार में लौटेगी रौनक, मजबूत होगा रुपया: विदेशी निवेशकों को टैक्स से बड़ी आजादी देने के लिए अध्यादेश लाएगी सरकार
4 Jun, 2026 01:37 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | देश की अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर जारी वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच और विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक नीतिगत फैसला लिया है। सरकार ने भारतीय सरकारी बॉन्ड (G-Sec) में पूंजी लगाने वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) पर लगने वाले कैपिटल गेन्स टैक्स (पूंजीगत लाभ कर) को पूरी तरह से समाप्त करने का निर्णय लिया है। केंद्रीय कैबिनेट ने इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव को अपनी हरी झंडी दे दी है।
यह कदम बाजार में विदेशी डॉलर के प्रवाह (इनफ्लो) को बढ़ाने, डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक रूप से कमजोर हो रहे भारतीय रुपये को सहारा देने और पश्चिम एशिया में जारी युद्ध व कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों से घरेलू अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। इस बदलाव को अमलीजामा पहनाने के लिए कैबिनेट ने आयकर अधिनियम (इंकम टैक्स एक्ट) में संशोधन हेतु एक अध्यादेश को भी स्वीकृति दे दी है, जो राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद तत्काल प्रभाव से लागू हो जाएगा।
विदेशी निवेशकों को तगड़ा झटका देने वाले पुराने टैक्स ढांचे से मिली मुक्ति
मौजूदा कर व्यवस्था के अंतर्गत भारत के बॉन्ड बाजार में पैसा लगाने वाले विदेशी निवेशकों को दोहरे टैक्स की मार झेलनी पड़ती थी। यदि कोई विदेशी निवेशक 12 महीने से अधिक समय तक बॉन्ड रखता था, तो उसे $12.5\%$ का लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (LTCG) देना होता था। वहीं, 12 महीने से कम अवधि में बॉन्ड बेचने पर श्रेणी के अनुसार $30\%$ से $40\%$ तक का अत्यधिक शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (STCG) वसूला जाता था। इसके अलावा, ब्याज से होने वाली कमाई पर भी विदेशी निवेशकों को $20\%$ विथहोल्डिंग टैक्स चुकाना पड़ता था।
नया अध्यादेश लागू होने के बाद सरकारी प्रतिभूतियों पर लगने वाला यह कैपिटल गेन टैक्स पूरी तरह से शून्य (0%) हो जाएगा। साथ ही, सरकार विथहोल्डिंग टैक्स को भी आधा करने या उसमें बड़ी ढील देने के लिए एक विशेष राहत पैकेज पर काम कर रही है।
डॉलर की होगी बरसात, निचले स्तर पर पहुंचे रुपये को मिलेगा बड़ा सहारा
वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव और बाजार में उतार-चढ़ाव के कारण इस वर्ष अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों से लगभग 2.47 लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम बिकवाली की है। इस भारी आउटफ्लो के चलते भारतीय रुपया टूटकर अपने रिकॉर्ड निचले स्तर 96.96 प्रति डॉलर पर पहुंच गया है।
इस कर छूट के बाद सॉवरेन वेल्थ फंड्स और बड़े वैश्विक पेंशन फंड्स भारतीय डेट मार्केट में सालाना 10 बिलियन डॉलर से 30 बिलियन डॉलर (करीब ₹80,000 करोड़ से ₹2.5 लाख करोड़) का नया निवेश ला सकते हैं। जब विदेशी निवेशक भारतीय बॉन्ड खरीदने के लिए बाजार में भारी मात्रा में डॉलर लाएंगे, तो देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा, जिससे रुपये की गिरती कीमत को थामने और उसे मजबूती देने में मदद मिलेगी।
बॉन्ड यील्ड में आएगी गिरावट, सरकार का कर्ज संकट होगा कम
आर्थिक जानकारों और केंद्रीय बैंक (RBI) की सिफारिशों के मुताबिक, इस टैक्स छूट के बाद भारतीय सरकारी बॉन्ड्स की मांग वैश्विक बाजार में तेजी से बढ़ेगी। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों द्वारा बड़े पैमाने पर की जाने वाली इस खरीदारी से भारत सरकार के बॉन्ड्स की यील्ड (Yield यानी प्रभावी ब्याज दर) में गिरावट दर्ज की जाएगी।
बॉन्ड यील्ड गिरने का सीधा और सकारात्मक प्रभाव देश के राजकोषीय प्रबंधन पर पड़ेगा। यील्ड कम होने से भारत सरकार को बाजार से नया कर्ज उठाने के लिए पहले के मुकाबले बेहद कम ब्याज चुकाना होगा, जिससे देश के वित्तीय घाटे (फिस्कल डेफिसिट) को नियंत्रित करने में बड़ी मदद मिलेगी।
खेतों में आई खुशहाली मंडियों में बनी आफत: गेहूं के दामों में भारी गिरावट से किसानों की मेहनत पर पानी फिरा
4 Jun, 2026 11:05 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | देश में इस मर्तबा गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार और उम्मीद से कहीं बेहतर सरकारी खरीद ने अनाज मंडियों की पूरी तस्वीर बदल दी है। चालू रबी विपणन सीजन 2026-27 में सरकार द्वारा की गई गेहूं की खरीद में 17 प्रतिशत का उछाल आया है, जिससे यह आंकड़ा 3.5 करोड़ टन के पार पहुंच गया है। यह सरकारी खरीद 3.45 करोड़ टन के निर्धारित लक्ष्य और बीते साल की तीन करोड़ टन की खरीद, दोनों से काफी आगे है। एक तरफ जहां बंपर आवक से सरकारी गोदाम पूरी तरह भर चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ खुले बाजार में निजी खरीदारों की बेरुखी से गेहूं के भाव लगातार नीचे आ रहे हैं। कमर्शियल मार्केट में दाम टूटने के कारण किसानों की तत्काल आमदनी पर असर पड़ने की आशंका है, जिससे ग्रामीण इलाकों की आर्थिक रफ्तार प्रभावित हो सकती है।
बेमौसम मार और बंपर आवक से मंडियों में लुढ़के दाम
फसल की कटाई के दौरान हुई बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि के चलते इस बार गेहूं के दानों का रंग और उनकी गुणवत्ता प्रभावित हुई थी। इस वजह से निजी आटा मिलर्स और बड़े कॉर्पोरेट खरीदार इस अनाज को ऊंचे दामों पर खरीदने से बचते नजर आए। वहीं, कृषि विभाग के ताजा अनुमानों के मुताबिक इस सीजन में देश का कुल गेहूं उत्पादन 12.06 करोड़ टन के नए रिकॉर्ड स्तर को छू सकता है, जो पिछले साल के 11.79 करोड़ टन के मुकाबले कहीं ज्यादा है। इस अत्यधिक उत्पादन और बाजार में मांग की कमी के चलते पिछले एक महीने के भीतर देश की विभिन्न प्रमुख मंडियों में गेहूं की कीमतों में तकरीबन 2.5 फीसदी की मंदी दर्ज की गई है। हालांकि, सरकारी खजाने में गेहूं का कुल भंडार अब बढ़कर 427.98 लाख टन हो गया है, जो जुलाई के तय बफर नियमों (2.75 करोड़ टन) से काफी अधिक है।
राज्यवार गेहूं खरीद और प्रमुख मंडियों में भाव का उतार-चढ़ाव
गेहूं खरीदारी की राज्यवार स्थिति (लाख टन में):
पंजाब: इस साल 121.63 (बीते साल 119.23) — 2.0% की वृद्धि
मध्य प्रदेश: इस साल 104.36 (बीते साल 77.75) — 34.2% की वृद्धि
हरियाणा: इस साल 81.20 (बीते साल 70.82) — 14.7% की वृद्धि
राजस्थान: इस साल 24.31 (बीते साल 18.79) — 29.4% की वृद्धि
उत्तर प्रदेश: इस साल 17.20 (बीते साल 10.24) — 67.9% की वृद्धि
एक महीने के भीतर प्रमुख मंडियों के दामों में आई गिरावट (रुपये प्रति क्विंटल):
दिल्ली मंडी: 5 मई को ₹2,716 से घटकर 3 जून को ₹2,680 पर आई।
कानपुर मंडी: 5 मई को ₹2,517 से घटकर 3 जून को ₹2,505 पर आई।
इंदौर मंडी: 5 मई को ₹2,543 से घटकर 3 जून को ₹2,495 पर आई।
राजकोट मंडी: 5 मई को ₹2,460 से घटकर 3 जून को ₹2,400 पर आई।
सीमित दायरे में रहेगा बाजार और ग्रामीण मांग पर पड़ेगा असर
कृषि बाजार के जानकारों का मानना है कि आने वाले कुछ समय तक गेहूं की कीमतें एक निश्चित दायरे में ही बनी रहेंगी। खुले बाजार में दामों को सहारा मिलने की एकमात्र उम्मीद विदेशी निर्यात से है, लेकिन वैश्विक बाजार में रूस और यूक्रेन के सस्ते गेहूं के सामने भारतीय अनाज अभी थोड़ा महंगा बैठ रहा है, जिससे बड़े पैमाने पर एक्सपोर्ट की उम्मीदें बेहद कम हैं। इस बार सरकारी एजेंसियों द्वारा लगभग 67 फीसदी गेहूं खरीद लेने और खुले बाजार के दाम गिरने के कारण किसानों को वह अतिरिक्त मुनाफा नहीं मिल पाया, जो पिछले सालों में निजी कंपनियों की होड़ से मिलता था। काश्तकारों की जेब में कम नकदी पहुंचने का सीधा असर ग्रामीण बाजारों में ट्रैक्टर, दुपहिया वाहनों और रोजमर्रा के उपभोक्ता सामानों (FMCG) की बिक्री पर देखने को मिल सकता है, जिससे ग्रामीण मांग में सुस्ती आने की आशंका है।
शुरुआती कारोबार में ही सहमा दलाल स्ट्रीट: सेंसेक्स में 500 अंकों की भारी गिरावट, निफ्टी की टूटी कमर
4 Jun, 2026 10:59 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई | घरेलू शेयर बाजार के दोनों मुख्य सूचकांकों, सेंसेक्स और निफ्टी में गुरुवार को शुरुआती सत्र के दौरान कमजोरी देखने को मिली। बाजार में आई इस गिरावट के पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिले सुस्त संकेत, पश्चिम एशिया में गहराया भू-राजनीतिक संकट और विदेशी निवेशकों द्वारा घरेलू बाजार से लगातार पैसे खींचा जाना प्रमुख वजह रहे। कारोबार की शुरुआत में उतार-चढ़ाव के बीच 30 शेयरों पर आधारित बीएसई (BSE) सेंसेक्स 229.69 अंक टूटकर 74,139.32 के स्तर पर आ गया, जबकि 50 शेयरों वाला एनएसई (NSE) निफ्टी भी 66.30 अंकों की मंदी के साथ 23,339 के स्तर पर कारोबार करता दिखा। हालांकि, इस उठापटक के बीच कुछ समय के लिए बाजार में मामूली सुधार भी देखा गया।
दिग्गज शेयरों में बिकवाली और विदेशी निवेशकों का बाजार से किनारा
सेंसेक्स की शीर्ष 30 कंपनियों में ट्रेंट, इंफोसिस, एचडीएफसी बैंक, बजाज फिनसर्व, कोटक महिंद्रा बैंक और टाटा स्टील जैसी बड़ी कंपनियों के शेयर घाटे के साथ लाल निशान पर कारोबार कर रहे थे। इसके विपरीत इटरनल, टाइटन, अदानी पोर्ट्स और टेक महिंद्रा के शेयरों में लिवाली देखने को मिली और वे बढ़त बनाने में कामयाब रहे। शेयर बाजार के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने बीते सत्र यानी बुधवार को ही 5,616.56 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर बेचे थे, जिसका सीधा असर आज के बाजार पर दिखा। वहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल का बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 0.97 प्रतिशत गिरकर 96.86 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों का रुख और एशियाई सूचकांकों में गिरावट
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, भारतीय शेयर बाजार के लिए आने वाला समय चुनौतियों से भरा रह सकता है। अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे विदेशी बाजारों की मजबूती भारतीय बाजार से और ज्यादा विदेशी निवेश (FPI) बाहर निकलने का कारण बन सकती है। आज के कारोबार में एशियाई बाजारों की बात करें तो दक्षिण कोरिया का कोस्पी, जापान का निक्केई 225, चीन का शंघाई कंपोजिट और हांगकांग का हैंगसेंग भी गिरावट के दबाव में नजर आए। इसके अलावा, बीते बुधवार को अमेरिकी शेयर बाजार भी गिरावट के साथ ही बंद हुए थे, जिससे वैश्विक स्तर पर धारणा कमजोर हुई।
पश्चिम एशिया का तनाव और निवेशकों की बढ़ती चिंताएं
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि इजराइल और लेबनान के मध्य युद्धविराम को लेकर हुए नए समझौतों ने कुछ हद तक राहत जरूर दी है, लेकिन पश्चिम एशिया की बड़ी और बुनियादी समस्याएं अब भी बरकरार हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता गतिरोध तथा हालिया हमलों के बाद ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई के अंदेशे ने बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना दिया है। भू-राजनीतिक स्तर पर किसी ठोस और स्थायी कूटनीतिक समाधान के न मिलने से बाजार अंतरराष्ट्रीय खबरों के प्रति बेहद संवेदनशील बना हुआ है, जिसका सीधा असर आने वाले समय में ईंधन की कीमतों और वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।
मार्केट के उतार-चढ़ाव का असर: भारी संख्या में बंद हुए पुराने SIP, पर कुल निवेश ने बनाया नया रिकॉर्ड
3 Jun, 2026 03:50 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई | भारतीय म्यूचुअल फंड उद्योग से इन दिनों निवेश के कुछ ऐसे अनोखे और दिलचस्प आंकड़े सामने आ रहे हैं, जो पहली नजर में किसी को भी हैरान कर सकते हैं। बाजार में एक तरफ जहां सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) को बंद करने या समय से पहले रोकने वाले रिटेल निवेशकों की तादाद ऐतिहासिक ऊंचाइयों पर है, वहीं दूसरी तरफ एसआईपी के माध्यम से म्यूचुअल फंड में आने वाला मासिक निवेश हर महीने सफलता की नई इबारत लिख रहा है। इस विरोधाभासी स्थिति ने बाजार के विश्लेषकों और आम निवेशकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
एसआईपी स्टॉपेज रेशियो शत-प्रतिशत के पार, फिर भी इनफ्लो मजबूत
एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (एम्फी) द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देश में पिछले दो महीनों से एसआईपी स्टॉपेज रेशियो लगातार सौ फीसदी की लक्ष्मण रेखा को पार कर रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश में जितने नए एसआईपी खाते खोले जा रहे हैं, उसकी तुलना में बंद होने या मैच्योर (पूरे) होने वाले खातों की संख्या कहीं अधिक है। आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल के महीने में जहां पचास दशमलव सात एक लाख नए एसआईपी का पंजीकरण हुआ, वहीं इसके मुकाबले इक्यावन दशमलव दो नौ लाख खाते बंद या रोके गए, जिससे स्टॉपेज रेशियो एक सौ एक प्रतिशत पर पहुंच गया। इसके बावजूद, इस दौरान बाजार में कुल एसआईपी निवेश इकतीस हजार एक सौ पंद्रह करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर दर्ज किया गया।
म्यूचुअल फंड एसेट में जबरदस्त उछाल, निवेशकों के व्यवहार में आया बदलाव
इस उठापटक के बीच राहत की बात यह है कि देश में कुल सक्रिय एसआईपी खातों की संख्या अभी भी नौ करोड़ पैंसठ लाख के मजबूत स्तर पर बनी हुई है। इसके साथ ही, एसआईपी के तहत कुल प्रबंधित परिसंपत्तियां (AUM) बढ़कर सोलह दशमलव आठ पांच लाख करोड़ रुपये हो चुकी हैं, जो पूरे म्यूचुअल फंड उद्योग का लगभग बीस दशमलव छह प्रतिशत है। यूटीआई एएमसी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष (इक्विटी) अमित प्रेमचंदानी के अनुसार, यह रुझान म्यूचुअल फंड से भरोसा उठने का संकेत नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि भारतीय रिटेल निवेशक अब काफी गतिशील (डायनेमिक) हो गए हैं। लोग पोर्टफोलियो को बेहतर बनाने के लिए एक फंड से निकलकर दूसरे अच्छे फंड में जा रहे हैं, फोलियो का एकीकरण कर रहे हैं या फिर एक्टिव फंड्स की जगह पैसिव फंड्स को प्राथमिकता दे रहे हैं।
युवा निवेशकों का धैर्य और तकनीकी प्लेटफॉर्म्स का नया विकल्प
बाजार के जानकारों का कहना है कि एसआईपी बंद करने का यह चलन ज्यादातर उन युवाओं और नए निवेशकों में देखा जा रहा है जो सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए निवेश करते हैं और जिनकी निवेश राशि अपेक्षाकृत कम होती है। निफ्टी-पचास में हाल ही में आई गिरावट के कारण इन नए निवेशकों के सब्र का इम्तिहान हुआ है। हालांकि, कुल निवेश राशि के रिकॉर्ड स्तर पर रहने की दो मुख्य वजहें हैं। पहली यह कि छोटे निवेशक भले ही पैनिक होकर एसआईपी रोक रहे हों, लेकिन पुराने और अनुभवी निवेशक बाजार के उतार-चढ़ाव को भांपकर अपना निवेश और बढ़ा रहे हैं। दूसरी वजह यह है कि आजकल कई फिनटेक ऐप्स पर ऑटोमेटेड लम्पसम (एकमुश्त निवेश) की सुविधा मिल रही है, जो तकनीकी रूप से एसआईपी के आंकड़ों में दर्ज नहीं होती, लेकिन इसके जरिए नियमित निवेश बाजार में लगातार आ रहा है।
बदल रहा है जॉब मार्केट: भारत में प्लंबर-इलेक्ट्रीशियन के संकट की क्या है वजह?
3 Jun, 2026 03:44 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई | वैश्विक स्तर पर इस समय रोजगार के बाजार में एक बड़ा ढांचागत उलटफेर देखने को मिल रहा है। बाजार में 'व्हाइट कॉलर' (सफेदपोश) डिग्रीधारकों की बाढ़ आ चुकी है, लेकिन 'ब्लू कॉलर' यानी प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, बढ़ई और नर्स जैसे तकनीकी व व्यावहारिक पेशेवरों का भारी अकाल पड़ गया है। मैक्रो ट्रेंड्स रिसर्च फर्म पाइनट्री के संस्थापक रितेश जैन के एक हालिया विश्लेषण ने इस बहस को और हवा दे दी है कि आगामी पांच वर्षों में भारत के भीतर इंजीनियरों से ज्यादा प्लंबरों और इलेक्ट्रीशियन की किल्लत हो सकती है। इस व्यापक बिजनेस एक्सप्लेनर के जरिए हम समझने की कोशिश करेंगे कि क्या सचमुच भारतीय बाजार में इस प्रकार का श्रम संकट दस्तक देने वाला है।
विदेशी मांग और वैश्विक श्रम संकट के बीच भारतीय कार्यबल की स्थिति
वर्तमान में अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाएं अपनी बुजुर्ग होती आबादी और घटती जन्म दर के कारण अभूतपूर्व लेबर क्राइसिस (श्रम संकट) का सामना कर रही हैं। अपनी आर्थिक रफ्तार को बनाए रखने के लिए ये अमीर मुल्क भारत जैसे युवा आबादी वाले देशों से बड़े पैमाने पर कार्यबल को आकर्षित कर रहे हैं। इस दिशा में भारत सरकार ने भी ब्रिटेन (UK) सहित कई यूरोपीय देशों के साथ कुशल पेशेवरों की सुरक्षित आवाजाही के लिए द्विपक्षीय समझौते किए हैं। हालांकि, आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत में कामगारों की कुल संख्या का कोई अकाल नहीं पड़ने वाला है। भारत के पास इतनी प्रचुर श्रम शक्ति है कि वह अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ दुनिया भर के श्रम संकट को दूर करने की क्षमता रखता है।
दुनिया की 'स्किल कैपिटल' बनने की राह और प्रशिक्षण की बड़ी खाई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई मंचों से यह विज़न साझा किया है कि अपनी विशाल युवा आबादी के दम पर भारत को वैश्विक स्तर पर 'स्किल कैपिटल' (कौशल राजधानी) के रूप में स्थापित होना चाहिए। सरकार की रणनीति युवाओं को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार कर वैश्विक नौकरियों के काबिल बनाने की है। विकसित देशों में बेहतर वेतन, मजबूत श्रम कानून और अच्छी कार्य संस्कृति के चलते भारतीय युवा तेजी से विदेशों का रुख कर रहे हैं। मगर, इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा 'कौशल की गुणवत्ता' का है। आंकड़ों की मानें तो भारत में लगभग पचासी प्रतिशत से अधिक श्रमबल असंगठित क्षेत्र का हिस्सा है, और मात्र चार दशमलव छह नौ प्रतिशत लोगों के पास ही किसी काम का औपचारिक प्रमाण पत्र या प्रशिक्षण है। देश में हर साल करीब एक करोड़ बीस लाख नए युवा रोजगार की तलाश में बाजार में आते हैं, जबकि हमारे पास सालाना सिर्फ चौंतीस लाख लोगों को प्रशिक्षित करने की ही औपचारिक क्षमता है।
घरेलू इंफ्रास्ट्रक्चर की रफ्तार और स्टाफिंग इंडस्ट्री से समाधान की उम्मीद
इस पूरी चुनौती का सबसे प्रभावी समाधान 'फॉर्मल स्टाफिंग इंडस्ट्री' और संगठित कार्यबल को बढ़ावा देना है। नारेडको महाराष्ट्र की वरिष्ठ उपाध्यक्ष मंजू याग्निक के मुताबिक, रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में कुशल कारीगरों की कमी एक बड़ी बाधा बन रही है, जिसे केवल बड़े पैमाने पर वोकेशनल ट्रेनिंग (व्यावसायिक प्रशिक्षण) देकर ही ठीक किया जा सकता है। सुखद पहलू यह भी है कि इस समय भारत के भीतर बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) का विकास इतनी तीव्र गति से हो रहा है कि भविष्य में कुशल श्रमिकों को आजीविका के लिए विदेश जाने की मजबूरी ही नहीं रहेगी; उन्हें अपने देश में ही सुरक्षित और सम्मानजनक काम के बेहतर अवसर मिल जाएंगे। निष्कर्ष यही है कि चुनौती कामगारों के संख्या बल की नहीं, बल्कि उनके सही प्रशिक्षण की है। यदि सरकारी एजेंसियां और निजी क्षेत्र मिलकर ट्रेनिंग की इस खाई को समय रहते पाट देते हैं, तो भारत अपनी घरेलू मांग को पूरा करते हुए दुनिया का सबसे बड़ा स्किल हब बनकर उभरेगा।
मार्केट अपडेट: शेयर बाजार में बड़ी गिरावट, सेंसेक्स और निफ्टी में भारी बिकवाली
3 Jun, 2026 03:04 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई | अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता में अचानक पैदा हुई अनिश्चितता के कारण घरेलू शेयर बाजार बुधवार को भारी दबाव में आ गया। कमजोर वैश्विक संकेतों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते दलाल स्ट्रीट पर सुबह से ही बिकवाली का माहौल देखा गया। बाजार खुलने के कुछ ही मिनटों के भीतर दोनों प्रमुख सूचकांक—सेंसेक्स और निफ्टी—गहरे लाल निशान में चले गए और निवेशकों में मुनाफावसूली की होड़ मच गई।
सेंसेक्स और निफ्टी में शुरुआती गिरावट, डॉलर के मुकाबले रुपया भी कमजोर
कारोबार की शुरुआत में तीस शेयरों वाला बीएसई (BSE) सेंसेक्स एक सौ बयालीस दशमलव एक एक अंक टूटकर चौहत्तर हजार पांच सौ सात दशमलव सात तीन के स्तर पर खुला, जबकि एनएसई (NSE) निफ्टी भी सरसठ दशमलव छह अंकों की कमजोरी के साथ तेईस हजार चार सौ पंद्रह दशमलव नौ पांच पर आ गया। बाजार खुलने के बाद बिकवाली का यह दौर और आक्रामक हो गया, जिससे सेंसेक्स करीब सात सौ बयासी दशमलव एक शून्य अंक फिसलकर तिहत्तर हजार आठ सौ सरसठ दशमलव सात चार के निचले स्तर पर पहुंच गया। इसी तरह निफ्टी पचास सूचकांक भी दो सौ पांच दशमलव शून्य पांच अंकों की बड़ी गिरावट दर्ज करते हुए तेईस हजार दो सौ अठहत्तर दशमलव पांच शून्य पर कारोबार करता नजर आया। शेयर बाजार के साथ-साथ मुद्रा बाजार पर भी इसका असर दिखा और भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पंद्रह पैसे टूटकर पचानवे दशमलव चार सात के रिकॉर्ड निचले स्तर पर खुला, जो पिछले सत्र में पचानवे दशमलव दो सात पर बंद हुआ था।
आईटी सेक्टर में सबसे बड़ी मार, टीसीएस और इंफोसिस के शेयर लुढ़के
बाजार की इस चौतरफा गिरावट में सबसे ज्यादा नुकसान सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र को उठाना पड़ा। निफ्टी आईटी इंडेक्स करीब तीन दशमलव नौ प्रतिशत तक गोता लगा गया। इसके अलावा रीयल एस्टेट, मीडिया, वित्तीय सेवाओं, एफएमसीजी और सरकारी बैंकों (PSU Banks) के सूचकांकों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई, जबकि ऑटोमोबाइल और मेटल सेक्टर ने अपेक्षाकृत कम नुकसान के साथ बाजार को थोड़ा संभालने की कोशिश की। व्यक्तिगत शेयरों की बात करें तो देश की दिग्गज आईटी कंपनी टीसीएस (TCS) के शेयर शुरुआती कारोबार में ही छह दशमलव छह फीसदी तक टूट गए। इसके साथ ही टेक महिंद्रा, इंफोसिस और एचसीएल टेक्नोलॉजीज के शेयरों में भी तीन दशमलव एक से लेकर चार दशमलव तीन प्रतिशत तक की भारी गिरावट देखी गई।
मिडकैप-स्मॉलकैप भी डूबे, अब आरबीआई की मौद्रिक नीति पर टिकी नजरें
सेंसेक्स के बड़े शेयरों के साथ-साथ व्यापक बाजार में छोटे और मझोले शेयरों पर भी दबाव रहा; निफ्टी मिडकैप में शून्य दशमलव आठ पांच प्रतिशत और स्मॉलकैप इंडेक्स में शून्य दशमलव पांच आठ प्रतिशत की सुस्ती देखी गई। बाजार के तकनीकी जानकारों के मुताबिक, निफ्टी के लिए फिलहाल तेईस हजार दो सौ उनतीस का स्तर एक बेहद महत्वपूर्ण सपोर्ट (सहारा) के रूप में काम कर रहा है और बाजार में दोबारा मजबूती तभी आएगी जब सूचकांक तेईस हजार आठ सौ के मनोवैज्ञानिक स्तर के पार जाकर बंद होने में कामयाब होगा। इस बीच, घरेलू निवेशकों की निगाहें पूरी तरह से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक पर टिक गई हैं। यह तीन दिवसीय समीक्षा बैठक बुधवार से शुरू होकर शुक्रवार तक चलेगी, जिसके फैसलों का असर आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय करेगा।
प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ पर भारत की पैनी नजर: वाणिज्य मंत्रालय बोला- हितों की रक्षा के लिए बातचीत जारी
3 Jun, 2026 02:55 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | अमेरिका द्वारा कथित जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) के मुद्दों को ढाल बनाकर भारत समेत दुनिया के ५४ देशों पर अतिरिक्त आयात शुल्क (टैरिफ) थोपने की तैयारी का भारत सरकार ने कड़ा संज्ञान लिया है। वाणिज्य मंत्रालय ने बुधवार को स्थिति साफ करते हुए कहा कि भारत इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अमेरिकी प्रशासन के साथ लगातार उच्चस्तरीय संवाद बनाए हुए है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच लंबे समय से लंबित अंतरिम व्यापार समझौते को अमलीजामा पहनाने के लिए भी समानांतर बातचीत जारी है।
अमेरिकी यूएसटीआर का प्रस्ताव: ५४ देशों पर साढ़े बारह फीसदी तक अतिरिक्त टैक्स की तैयारी
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने अपने 'सेक्शन ३०१' कानून के तहत भारत सहित ५४ विकासशील और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से आने वाले सामानों पर १२.५ प्रतिशत तक का नया अतिरिक्त शुल्क लगाने का एकतरफा प्रस्ताव तैयार किया है। फिलहाल वाशिंगटन में इस विवादित प्रस्ताव पर संबंधित पक्षों से रायशुमारी की जा रही है, जिसके लिए आपत्तियां और सुझाव भेजने की अंतिम तारीख ६ जुलाई तय की गई है, जबकि ७ जुलाई को इस पर सार्वजनिक सुनवाई होनी है। अमेरिकी प्रशासन का यह नया दांव वर्तमान में लागू १० प्रतिशत के उस अस्थायी आयात शुल्क की जगह ले सकता है, जिसकी कानूनी समयसीमा आगामी २४ जुलाई को समाप्त हो रही है।
तीसरे देशों का बहाना बनाकर भारत पर दबाव बनाने की रणनीति: व्यापार विशेषज्ञ
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव सहित कई अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अमेरिका के इस एकतरफा कदम को कानूनी रूप से चुनौती देनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका यह आरोप नहीं लगा रहा कि भारतीय कारखानों में जबरन श्रम होता है, बल्कि उसका अजीबोगरीब तर्क यह है कि भारत जैसे देश उन वस्तुओं के आयात पर पर्याप्त पाबंदी नहीं लगाते जो किसी तीसरे देश में जबरन श्रम से बनी हों। जानकारों का कहना है कि वाशिंगटन इस जांच और दंडात्मक टैरिफ का हौवा खड़ा करके भारत के साथ चल रही द्विपक्षीय व्यापार वार्ता (BTA) में अपना पलड़ा भारी करना चाहता है, जिसका भारत को कड़ा प्रतिवाद करना चाहिए।
भारतीय कपड़ा, कालीन और चमड़ा उद्योग पर संकट; दिल्ली में वार्ता का दौर जारी
यदि अमेरिका का यह प्रस्ताव कानून का रूप लेता है, तो इसका सबसे सीधा और घातक असर भारत के उन क्षेत्रों पर पड़ेगा जहां बड़े पैमाने पर रोजगार मिलता है। इनमें मुख्य रूप से गारमेंट्स (कपड़ा और परिधान), कालीन उद्योग, लेदर (चमड़ा उत्पाद) और पीतल के हस्तशिल्प शामिल हैं। अतिरिक्त टैक्स लगने से अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान महंगे हो जाएंगे और प्रतिस्पर्धी देशों के सामने हमारे निर्यातकों को नुकसान होगा। ईवाई (EY) इंडिया के नीतिगत रणनीतिकारों के अनुसार, भारत के पास अपनी आपत्तियां दर्ज कराने के लिए द्विपक्षीय वार्ता एक बड़ा मंच है। विशेष बात यह है कि अमेरिकी व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल इस समय १ जून से ४ जून तक नई दिल्ली में ही मौजूद है, जहां दोनों देशों के शीर्ष अधिकारी बाजार पहुंच, कृषि और इस नए टैरिफ विवाद को सुलझाने के लिए गहन मंथन कर रहे हैं।
ऑनलाइन फ्रॉड पर लगेगी लगाम: आरबीआई का नया एआई 'रक्षा तंत्र', डाटा सुरक्षा के साथ ट्रांजैक्शन होंगे और सेफ
3 Jun, 2026 10:50 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) डिजिटल लेन-देन को अधिक सुरक्षित बनाने और बैंकिंग कामकाज को आसान करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक का सहारा लेने जा रहा है। इसके तहत एक एडवांस और एकीकृत एआई प्लेटफॉर्म विकसित किया जा रहा है, जो सुरक्षित डेटा मैनेजमेंट से लेकर केंद्रीय बैंकिंग के बड़े और छोटे भाषाई मॉडलों पर आधारित समाधान देगा। इस नई पहल के तहत विभिन्न पोर्टलों को एक साथ जोड़ने के लिए एक कॉमन वर्क पोर्टल भी तैयार किया जाएगा। इसके साथ ही, भारत बैंकिंग सिस्टम के लिए विशेष डोमेन (bank.in) अनिवार्य करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है, जिससे वित्तीय सेवाओं में सुरक्षा और भरोसा मजबूत होगा।
डिजिटल भुगतान सुरक्षा और साइबर धोखाधड़ी पर कड़ा प्रहार
आरबीआई संदिग्ध लेन-देन की तत्काल पहचान करने के लिए एक 'डिजिटल पेमेंट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म' तैयार कर रहा है। 'पेमेंट विजन दो हजार अठ्ठाइस' (पेमेंट विजन 2028) के तहत पूरे डिजिटल भुगतान तंत्र को अपग्रेड किया जाएगा। आने वाले समय में उपभोक्ताओं को अपनी जरूरत के हिसाब से विभिन्न डिजिटल भुगतान माध्यमों को चालू या बंद (एनेबल/डिसेबल) करने का अधिकार मिलेगा। इसके अतिरिक्त, साइबर जोखिमों को कम करने के लिए एक साझा जिम्मेदारी का ढांचा बनेगा, जिसके तहत किसी भी गड़बड़ी के लिए ग्राहक और लाभार्थी दोनों के बैंक उत्तरदायी माने जाएंगे।
नवाचार को बढ़ावा और मजबूत साइबर सुरक्षा की नई व्यवस्था
बैंकिंग प्रणाली में आधुनिक बदलावों के तहत अब इलेक्ट्रॉनिक चेक शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं, साथ ही कार्ड पेमेंट्स में नए प्रयोगों को बढ़ावा दिया जाएगा। डिजिटल लेन-देन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली वित्तीय और बैंकिंग संस्थाओं को पूरी तरह से नियमों के दायरे में लाया जाएगा। इसके अलावा, गैर-बैंकिंग भुगतान ऑपरेटरों के लिए साइबर रिस्क इंडिकेटर्स का ढांचा लागू होगा। साइबर हमलों से निपटने के लिए एडवांस थ्रेट हंटिंग प्लेटफॉर्म लगाए जाएंगे और डिजिटल भुगतानों को सुरक्षित रूप से बढ़ावा देने के लिए एक विशेष अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र भी स्थापित किया जाएगा।
वैश्विक स्तर पर यूपीआई और रुपे कार्ड का विस्तार
भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली का परचम अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लहरा रहा है। वर्तमान में यूपीआई (UPI) आधारित क्यूआर कोड से भुगतान करने की सुविधा भूटान, फ्रांस, मॉरीशस, नेपाल, कतर, सिंगापुर, श्रीलंका और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देशों में सफलतापूर्वक चल रही है। इस दायरे को और बढ़ाते हुए अब नामीबिया और पेरू में भी यूपीआई आधारित सिस्टम विकसित किया जा रहा है। इसके साथ ही, मॉरीशस और संयुक्त अरब अमीरात में भारत के घरेलू रुपे कार्ड (RuPay Card) नेटवर्क को पूरी तरह से लागू कर दिया गया है, जिससे भारतीय यात्रियों और वहां के नागरिकों को भुगतान में काफी आसानी हो रही है।
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