व्यापार
ट्रेडिंग से मुनाफा कमाने वालों के लिए अलर्ट, टैक्स नियमों की अनदेखी पड़ सकती है भारी
8 Jun, 2026 01:55 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। शेयर बाजार में ट्रेडिंग के जरिए मुनाफा कमाने वाले अधिकांश लोग इस बात से पूरी तरह अनजान होते हैं कि अलग-अलग तरीकों से होने वाली इस कमाई पर आयकर के नियम पूरी तरह जुदा हैं। यदि आप भी टैक्स के इन पेचीदा नियमों को समझे बिना ट्रेडिंग की दुनिया में हाथ आजमा रहे हैं, तो आयकर विभाग के दिशानिर्देशों को बारीकी से जान लेना बेहद जरूरी है, अन्यथा भविष्य में आपको विभाग की ओर से बड़ा नोटिस या वित्तीय नुकसान झेलना पड़ सकता है।
इंट्राडे और एफएंडओ निवेश नहीं बल्कि व्यावसायिक आय का हिस्सा
आमतौर पर शेयर बाजार के नए कारोबारी ट्रेडिंग से होने वाले मुनाफे को कैपिटल गेन्स (पूंजीगत लाभ) समझने की भूल कर बैठते हैं। हालांकि, टैक्स विभाग के नियमानुसार इंट्राडे (एक ही दिन में खरीद-बिक्री) और वायदा-विकल्प (F&O) की ट्रेडिंग को निवेश की श्रेणी में नहीं, बल्कि एक सक्रिय व्यवसाय (बिजनेस) माना जाता है। यही वजह है कि इससे होने वाले हर नफा-नुकसान को आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करते समय 'व्यापार या पेशे से लाभ' (प्रॉफिट एंड गेन्स फ्रॉम बिजनेस और प्रोफेशन) के कॉलम में दर्ज करना अनिवार्य है। इस कमाई पर कोई रियायती टैक्स रेट नहीं लगता, बल्कि यह आपकी कुल सालाना आय में जुड़ती है और आपके निर्धारित टैक्स स्लैब के अनुसार इस पर टैक्स वसूला जाता है।
सट्टा व्यवसाय की श्रेणी में आती है इंट्राडे ट्रेडिंग और नुकसान की शर्तें कड़वी
आयकर अधिनियम की धारा 43(5) के तहत यदि आप किसी शेयर को एक ही कारोबारी सत्र के भीतर खरीदकर वापस बेच देते हैं, तो उससे होने वाले लाभ को 'सट्टा व्यवसाय आय' (स्पेक्ट्युलेटिव बिजनेस इनकम) की श्रेणी में रखा जाता है। इस आय पर भी आपके सामान्य टैक्स स्लैब के हिसाब से ही देनदारी बनती है। हालांकि, सबसे कड़ा नियम इसके नुकसान (घाटे) को लेकर है। यदि आपको इंट्राडे ट्रेडिंग में कोई घाटा होता है, तो उसकी भरपाई केवल इंट्राडे या किसी अन्य सट्टा कारोबार से होने वाले मुनाफे से ही की जा सकती है। इसके अलावा, इस तरह के व्यावसायिक घाटे को आप अधिकतम आगामी 4 वित्तीय वर्षों के लिए ही आगे (कैरी फॉरवर्ड) ले जा सकते हैं।
गैर-सट्टा आय है वायदा-विकल्प और समय पर रिटर्न भरना अनिवार्य
टैक्स कानूनों के अनुसार, वायदा और विकल्प (F&O) से होने वाली आय या नुकसान को सट्टा नहीं, बल्कि 'गैर-सट्टा व्यावसायिक आय' (नॉन-स्पेक्ट्युलेटिव बिजनेस इनकम) माना जाता है। इसमें ट्रेडर्स को यह बड़ी राहत मिलती है कि यदि एफएंडओ में घाटा हुआ है, तो उसे उसी साल सैलरी इनकम को छोड़कर अन्य सभी आय (जैसे मकान का किराया, ब्याज या अन्य व्यापारिक मुनाफा) के साथ एडजस्ट (सेट-ऑफ) किया जा सकता है। बचे हुए नुकसान को अगले 8 सालों तक आगे ले जाने की अनुमति भी मिलती है। ऐसे कारोबारियों को आईटीआर-3 या आईटीआर-4 फॉर्म भरना होता है। ध्यान रहे कि यदि आपकी आय 2.5 लाख रुपये या कुल टर्नओवर 25 लाख रुपये से अधिक है, तो खाते बही (बुक्स ऑफ अकाउंट्स) रखना कानूनी रूप से जरूरी है। बिना ऑडिट वाले मामलों के लिए रिटर्न की अंतिम तिथि 31 अगस्त 2026 है, जबकि टैक्स ऑडिट की स्थिति में आखिरी तारीख 31 अक्टूबर 2026 तय की गई है। यदि आप समय सीमा चूकते हैं, तो घाटे को आगे ले जाने का अधिकार छिन जाएगा। इसके साथ ही, बाजार में आईपीओ की हलचल भी तेज है, जहां 8 जून को एसएमआर ज्वेल्स और मेरीट्रोनिक्स, 9 जून को हेक्जागोन न्यूट्रिशन, 11 जून को वाह केमिकल्स और यूएचएम वेकेशन तथा 12 जून को सीएमआर ग्रीन टेक्नोलॉजी व जेनएक्सएआई एनालिटिक्स की लिस्टिंग होने जा रही है।
मांग में तेजी से FMCG कंपनियां उत्साहित, कीमतों में किया इजाफा
8 Jun, 2026 01:52 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष के कारण कच्चे माल की उत्पादन लागत में भारी उछाल आया है, इसके बावजूद भारत के तेजी से बिकने वाले उपभोक्ता उत्पाद (FMCG) क्षेत्र में मांग का रुख बेहद मजबूत बना हुआ है। वित्तीय विश्लेषक फर्म आनंद राठी की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, एफएमसीजी कंपनियों ने कच्चे माल की महंगाई से अपने प्रॉफिट मार्जिन (लाभप्रदता) को सुरक्षित रखने के लिए बाजार में चालाकी से कदम उठाए हैं। कंपनियों ने विभिन्न श्रेणियों के उत्पादों की कीमतों में 3 प्रतिशत से लेकर 10 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की है। इस मूल्य वृद्धि के बावजूद भारतीय उपभोक्ताओं की खरीदारी की क्षमता और इच्छा पर कोई नकारात्मक असर नहीं देखा गया है, जो इस सेक्टर की मजबूती को दर्शाता है।
चौथी तिमाही में राजस्व में 11 फीसदी का शानदार उछाल
आनंद राठी की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही के दौरान देश के उपभोक्ता उत्पाद क्षेत्र ने राजस्व के मोर्चे पर बेहद शानदार प्रदर्शन किया है। बाजार में मांग के लगातार बढ़ते ग्राफ, चुनिंदा उत्पादों की कीमतों में की गई वृद्धि और प्रीमियम (महंगे एवं उच्च गुणवत्ता वाले) प्रोडक्ट्स पर कंपनियों के लगातार फोकस ने इस ग्रोथ को बड़ा सहारा दिया है। आंकड़ों के अनुसार, चौथी तिमाही में इस सेक्टर की राजस्व वृद्धि (रेवेन्यू ग्रोथ) 11 फीसदी दर्ज की गई, जबकि पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान यह औसत वृद्धि दर 8 फीसदी रही थी। हालांकि, अलग-अलग श्रेणियों में मौसम की अनिश्चितता और विशेष चुनौतियों के कारण कंपनियों की विकास दर में थोड़ा अंतर जरूर देखा गया, लेकिन अधिकांश कंपनियों ने अपने मुख्य कारोबार (टॉप-लाइन) में सकारात्मक विस्तार दर्ज किया है।
बिक्री की मात्रा में सुधार और जीएसटी कटौती बने विकास के इंजन
एफएमसीजी क्षेत्र में आई इस तेजी के पीछे कई महत्वपूर्ण कारक काम कर रहे हैं, जिनमें सबसे प्रमुख बाजार में उत्पादों की बिक्री मात्रा (सेल वॉल्यूम) में आया उल्लेखनीय सुधार है। इसके साथ ही सरकार द्वारा माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरों में की गई कटौती ने भी इस सेक्टर के लिए बूस्टर डोज का काम किया है। कंपनियों द्वारा अपने वितरण नेटवर्क (डिस्ट्रिब्यूशन नेटवर्क) का सुदूर ग्रामीण इलाकों तक विस्तार करने और बाजार में ग्राहकों की पसंद के हिसाब से लगातार किए जा रहे नए उत्पाद नवाचारों (प्रोडक्ट इनोवेशन) ने इस गति को और तेज कर दिया है। इन सभी पहलों ने मिलकर बाजार में उपभोक्ता वस्तुओं की उपलब्धता को आसान बनाया है, जिससे नए प्रॉडक्ट्स की खपत तेजी से बढ़ी है।
अल नीनो का खतरा और कम मानसून से ग्रामीण बाजार पर संकट के बादल
स्वस्थ मांग और मुनाफे के बीच आनंद राठी ने निकट भविष्य के लिए मौसम संबंधी बड़े जोखिमों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है, जो इस सेक्टर की रफ्तार को धीमा कर सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आगामी मानसून के सीजन में प्रशांत महासागर में 'अल नीनो' की स्थिति सक्रिय होने की पूरी आशंका बनी हुई है। इसी के मद्देनजर भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने साल 2026 में सामान्य से कम बारिश होने का पूर्वानुमान जारी किया है, जिसके तहत मानसून दीर्घकालिक औसत से 10 फीसदी तक कम रह सकता है। यदि बारिश कमजोर रहती है, तो इसका सीधा और बुरा असर ग्रामीण भारत की खेती, किसानों की आय और उनकी क्रय शक्ति पर पड़ेगा, जो देश में उपभोक्ता उत्पादों की कुल खपत और मांग के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है।
कई पॉलिसियों का झंझट खत्म, एकीकृत बीमा बनाएगा जीवन आसान
8 Jun, 2026 01:39 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। सुबह-सुबह दफ्तर के लिए निकल रहे आशीष के मोबाइल पर जैसे ही एक संदेश चमका, उनके माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। रोजमर्रा की आपाधापी और काम के भारी दबाव के कारण वे अपनी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी की किश्त (प्रीमियम) जमा करना पूरी तरह भूल चुके थे, जिसके चलते उनकी पॉलिसी बंद होने की कगार पर पहुंच गई थी। आज के दौर में आशीष अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जो इस तरह की उलझन से जूझ रहे हों। वर्तमान समय में अमूमन हर जागरूक नागरिक के पास लाइफ, हेल्थ और गाड़ी को मिलाकर दो या उससे अधिक बीमा पॉलिसियां मौजूद हैं। ऐसे में अलग-अलग दस्तावेजों को सहेजकर रखना, प्रीमियम भुगतान की तारीखें याद रखना और समय पर उनका नवीनीकरण (रिन्यूअल) कराना एक थकाऊ मानसिक कसरत बन जाता है। इसी बड़ी सिरदर्दी का परमानेंट इलाज करने के लिए अब इंश्योरेंस सेक्टर में एक अत्याधुनिक तकनीकी बदलाव आ रहा है, जिसे 'एकीकृत बीमा समाधान' (इंटीग्रेटेड इंश्योरेंस सॉल्यूशन) का नाम दिया गया है।
एक ही डिजिटल छत के नीचे मिलेंगी वित्तीय सुरक्षा की तमाम सेवाएं
एकीकृत बीमा पॉलिसी का सीधा सा अर्थ यह है कि उपभोक्ता की तमाम तरह की सुरक्षा जरूरतों को अलग-अलग बिखेरने के बजाय एक ही सुव्यवस्थित ढांचे के तहत संभालना। इस नई व्यवस्था में लाइफ इंश्योरेंस, मेडिकल कवर, व्हीकल इंश्योरेंस, पर्सनल एक्सीडेंटल प्रोटेक्शन और होम इंश्योरेंस जैसे तमाम जनरल कवर्स को एक साथ क्लब किया जा सकता है। भारतीय बाजार में अभी पूरी तरह से एक ही दस्तावेज वाली एकल पॉलिसी का दायरा भले ही शुरुआती चरण में हो, लेकिन देश की नामी वित्तीय कंपनियां जैसे एचडीएफसी लाइफ, एचडीएफसी इर्गो, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल, आईसीआईसीआई लोम्बार्ड, बजाज आलियांज, टाटा एआईए और एसबीआई लाइफ जैसी संस्थाएं अब बंडल्ड या एकीकृत पैकेज की पेशकश करने लगी हैं। इसके जरिए ग्राहक अपनी सभी सक्रिय पॉलिसियों को एक ही एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म या सिंगल रिलेशनशिप मैनेजर के माध्यम से बहुत ही आसानी से ट्रैक और संचालित कर सकते हैं।
केवाईसी के झंझट से मुक्ति और पूरे परिवार को एकमुश्त सुरक्षा का लाभ
इस आधुनिक मॉडल को अपनाने से उपभोक्ताओं को कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ मिलते हैं। सबसे पहला फायदा यह है कि इसमें ग्राहक को अपनी पहचान का सत्यापन (KYC) और पते का विवरण बार-बार हर उत्पाद के लिए अलग से नहीं देना पड़ता, जिससे कागजी औपचारिकताएं न्यूनतम हो जाती हैं। इसके साथ ही, इस फ्रेमवर्क के तहत कोई भी व्यक्ति अपने जीवनसाथी, बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता की सामूहिक वित्तीय सुरक्षा को एक ही जगह बैठकर बेहतर ढंग से प्लान कर सकता है, जिससे परिवार का कोई भी सदस्य अनजाने में कवर होने से नहीं छूटता। जब आपके सारे इंश्योरेंस एक ही डैशबोर्ड पर दिखते हैं, तो आपको यह समझने में भी सहूलियत होती है कि आपके पास कुल कितना लाइफ या हेल्थ कवर मौजूद है, जिससे आप जरूरत से ज्यादा या कम बीमा पोर्टफोलियो लेने की बड़ी गलती से बच जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कई कंपनियां मुख्य प्रीमियम के साथ मुफ्त स्वास्थ्य जांच और रोडसाइड असिस्टेंस जैसी वफादारी योजनाएं भी ऑफर करती हैं। हालांकि, यह स्पष्ट होना चाहिए कि कंबाइंड पॉलिसी लेने मात्र से प्रीमियम की मूल दरें कम नहीं होतीं, क्योंकि प्रीमियम का निर्धारण हमेशा आवेदक की उम्र, सेहत, सम एश्योर्ड और रिस्क फैक्टर के आधार पर ही तय किया जाता है।
पारंपरिक ढर्रे से बिल्कुल जुदा है एकीकृत बीमा मॉडल
यदि पारंपरिक और एकीकृत बीमा व्यवस्था के अंतर को समझें, तो इनके काम करने के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। जहां पुरानी पारंपरिक व्यवस्था में प्रत्येक जरूरत के लिए अलग कंपनी, अलग लॉगिन आईडी और अलग-अलग कागजी भागदौड़ करनी पड़ती थी, वहीं यह नया एकीकृत मॉडल एक केंद्रीकृत व्यवस्था देता है जहां सभी बीमा कवर एक ही जगह समाहित होते हैं।
इसके अलावा, पारंपरिक व्यवस्था में हर पॉलिसी की तारीख अलग होने से प्रीमियम भूलने और पॉलिसी लैप्स होने का बहुत बड़ा जोखिम रहता था, जबकि नए मॉडल में एक ही मुख्य टाइमलाइन होने से बेहतर ट्रैकिंग संभव है और पॉलिसी टूटने का डर खत्म हो जाता है। दावा निपटान (क्लेम सेटलमेंट) के मामले में भी जहां पहले आपातकाल या बीमारी के समय अलग-अलग कंपनियों के काउंटरों के चक्कर लगाने पड़ते थे, वहीं अब एक समर्पित रिलेशनशिप मैनेजर या सिंगल विंडो सिस्टम के जरिए क्लेम पास कराना काफी आसान हो जाता है।
यह नया सिस्टम मुख्य रूप से उन व्यस्त कामकाजी पेशेवरों, बड़े उद्यमियों, उच्च आय वर्ग के लोगों और संयुक्त परिवारों के लिए वरदान साबित हो रहा है, जिनके पास समय की बेहद कमी है। फिर भी, उपभोक्ताओं को सलाह दी जाती है कि वे केवल आराम या छूट के लालच में आकर कोई भी फैसला न लें। पॉलिसी साइन करने से पहले प्रत्येक कवर के छिपे हुए नियमों और शर्तों को ध्यान से पढ़ें, कुल बीमित राशि (सम इंश्योर्ड) की पर्याप्तता की जांच करें और संबंधित कंपनी के ग्राहक सेवा रिकॉर्ड को परखने के बाद ही अंतिम निर्णय लें।
APSEZ को वैश्विक स्तर पर बड़ी सफलता, अर्जेंटीना की LNG परियोजना में मिली अहम भूमिका
8 Jun, 2026 01:27 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। देश के बुनियादी ढांचा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड (APSEZ) ने सोमवार को एक बड़ी रणनीतिक कामयाबी की घोषणा की है। कंपनी को अर्जेंटीना की पहली द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) निर्यात परियोजना के लिए 10 वर्षों की अवधि का समुद्री सेवा अनुबंध हासिल हुआ है। इस वैश्विक सफलता के साथ ही अदाणी समूह ने दक्षिण अमेरिकी बाजार में अपनी पहली मजबूत दस्तक दे दी है। इस कदम से न केवल अंतरराष्ट्रीय समुद्री सेवा क्षेत्र में कंपनी की साख और मजबूत होगी, बल्कि भारत और अर्जेंटीना के बीच भविष्य के ऊर्जा व्यापारिक रिश्तों को भी एक नई दिशा मिलेगी।
वैश्विक निविदा में अंतरराष्ट्रीय कंसोर्टियम को मिली बड़ी सफलता
भारत की अग्रणी एकीकृत परिवहन उपयोगिता प्रदाता कंपनी ने बताया कि यह प्रतिष्ठित अनुबंध उसकी स्टेप-डाउन सहायक इकाई 'अदाणी हार्बर इंटरनेशनल एफजेडसीओ' को मिला है। कंपनी ने अर्जेंटीना के प्रतिष्ठित 'मेरिडियन ग्रुप' के साथ मिलकर एक संयुक्त कंसोर्टियम (साझा मंच) का गठन किया था। इस कंसोर्टियम ने 'सदर्न एनर्जी एसए' द्वारा आयोजित एक बेहद कड़ी और वैश्विक प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया (ग्लोबल टेंडर) में भाग लिया, जहां बेहतरीन तकनीकी और वित्तीय प्रस्तावों के आधार पर इस भारतीय-अर्जेंटीना गठबंधन को विजेता घोषित कर अनुबंध सौंपा गया।
साढ़े सात करोड़ डॉलर का निवेश और 28 कार्गो निर्यात का लक्ष्य
इस दीर्घकालिक समझौते के तहत यह कंसोर्टियम सदर्न एनर्जी एफएलएनजी (FLNG) परियोजना को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए संपूर्ण समुद्री सेवाएं प्रदान करेगा, जिसमें लगभग 7 करोड़ डॉलर (70 मिलियन डॉलर) का पूंजीगत निवेश करने की प्रतिबद्धता भी शामिल है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के शुरुआती चरण में सालाना 2.45 मिलियन टन (एमटी) एलएनजी के उत्पादन का अनुमान लगाया गया है, जो तकरीबन 28 बड़े एलएनजी कार्गो जहाजों की क्षमता के बराबर होगा। इसके चालू होते ही यह परियोजना अर्जेंटीना के इतिहास की पहली कार्यात्मक एलएनजी निर्यात परियोजना का गौरव हासिल कर लेगी।
12 देशों में फैला नेटवर्क और अत्याधुनिक जहाजों का होगा बेड़ा
एपीएसईजेड (APSEZ) के पूर्णकालिक निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अश्विनी गुप्ता ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह अनुबंध वैश्विक स्तर पर बड़े ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को संभालने की हमारी बढ़ती तकनीकी और प्रबंधकीय क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। वर्तमान में कंपनी का समुद्री संचालन नेटवर्क दुनिया के 12 प्रमुख देशों में फैला हुआ है, जिसके पास बंदरगाहों, एलएनजी टर्मिनलों, रिफाइनरियों और अपतटीय (ऑफशोर) संपत्तियों को संभालने का लंबा व्यावहारिक तजुर्बा है। उन्होंने बताया कि इस परियोजना के कुशल संचालन के लिए चार अत्याधुनिक टगबोट, एक विशेष एंकर हैंडलिंग टग सप्लाई वेसल और एक आधुनिक क्रू बोट तैनात की जाएगी, जो एलएनजी कैरियर जहाजों के लिए टगबोट संचालन, अपतटीय लॉजिस्टिक्स और क्रू ट्रांसफर जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं प्रदान करेगी, जिससे नए वैश्विक ऊर्जा गलियारों का निर्माण होगा।
हिमाचल सबसे आगे, लेकिन असंगठित क्षेत्र के उद्योगों में डिजिटल पहुंच अब भी अधूरी
8 Jun, 2026 10:50 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। देश के असंगठित क्षेत्र के गैर-कृषि उद्यमों में से लगभग आधे अभी भी इंटरनेट की पहुंच से कोसों दूर हैं। हालांकि, तकनीक अपनाने के मामले में हिमाचल प्रदेश सबसे अग्रणी राज्य बनकर उभरा है, जिसके बाद हरियाणा और असम का स्थान आता है। दूसरी तरफ, इन छोटे और असंगठित उद्यमों में काम करने वाले श्रमिकों को सबसे अधिक पारिश्रमिक (मजदूरी) देने के मामले में उत्तराखंड देश में शीर्ष पर है। भारतीय स्टेट बैंक (SBI) रिसर्च द्वारा किए गए 'एएसयूएसई 2025' यूनिट-लेवल विश्लेषण में यह महत्वपूर्ण खुलासे हुए हैं, जो यह साबित करते हैं कि कारोबार के बेहतर प्रदर्शन के लिए डिजिटल तकनीक कितनी आवश्यक है। इस अध्ययन के अनुसार, साल 2025 में देश के सभी राज्यों में व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए इंटरनेट का चलन पहले के मुकाबले काफी बढ़ा है।
डिजिटलाइजेशन से श्रम उत्पादकता में रिकॉर्ड बढ़ोतरी
आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2022-23 में केवल 21 फीसदी और 2023-24 में 27 प्रतिशत असंगठित उद्यम इंटरनेट का इस्तेमाल करते थे, जो अब तेजी से बढ़कर 39 फीसदी पर पहुंच गया है। अकेले हिमाचल प्रदेश में यह आंकड़ा 68.2 प्रतिशत दर्ज किया गया है। रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि जो उद्यम इंटरनेट और डिजिटल तकनीकों का उपयोग करते हैं, उनकी श्रम उत्पादकता में 76 प्रतिशत तक का तगड़ा उछाल आता है। देश की अर्थव्यवस्था में रोजगार पैदा करने और आजीविका चलाने के लिए यह क्षेत्र बेहद अहम माना जाता है। इसके अलावा, आईटी (IT) तकनीकों को अपनाने से इन अनौपचारिक फर्मों के आधिकारिक पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) कराने की संभावना भी औसतन 84% तक बढ़ जाती है।
उद्यमों के विकास के लिए प्रभावी रोडमैप की सिफारिश
एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में इस क्षेत्र को मुख्यधारा में लाने के लिए एक विशेष कार्ययोजना लागू करने का सुझाव दिया गया है। इसके तहत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए व्यापारियों को स्थानीय भाषाओं में ऑनलाइन भुगतान, बहीखाता प्रबंधन, डिजिटल मार्केटिंग और सरकारी पंजीकरण के संबंध में व्यावहारिक ज्ञान देने की बात कही गई है। इसके साथ ही, नव-औपचारिकीकृत सूक्ष्म फर्मों (माइक्रो फर्म्स) के लिए कागजी और कानूनी अनुपालन की लागत को कम करने की वकालत की गई है, ताकि छोटे कारोबारी बिना किसी वित्तीय बोझ के डिजिटल व्यवस्था से जुड़ सकें और आगे बढ़ सकें।
ऋण सुविधा, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और महिला सशक्तिकरण पर जोर
छोटे व्यापारियों की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए उनके डिजिटल लेनदेन के इतिहास (ट्रांजैक्शन हिस्ट्री) को आधार बनाकर नकदी प्रवाह-आधारित ऋण (क्रेडिट) देने की नीति को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है। इसके अलावा, लघु उद्यमों को बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक पहुंच देने और स्थानीय डिजिटल मार्केटप्लेस के माध्यम से उनकी बिक्री बढ़ाने में सहायता करने का प्रस्ताव रखा गया है। रिपोर्ट में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में चल रहे, महिलाओं के स्वामित्व वाले और बेहद छोटे स्तर के कुटीर उद्योगों का प्राथमिकता के आधार पर डिजिटलाइजेशन किया जाना चाहिए, ताकि विकास का लाभ समाज के अंतिम छोर तक पहुंच सके।
बिकवाली के दबाव में बाजार धराशायी, निवेशकों को बड़ा झटका
8 Jun, 2026 10:36 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई। वैश्विक स्तर पर कमजोर संकेतों और चौतरफा मुनाफावसूली के चलते भारतीय शेयर बाजार के लिए सप्ताह का पहला दिन बेहद निराशाजनक रहा। सोमवार 8 जून 2026 के कारोबारी सत्र में चारों तरफ 'रिस्क-ऑफ' (जोखिम से बचने) की भावना हावी रही, जिसके कारण प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी भारी गिरावट के साथ धड़ाम हो गए। इस बिकवाली का असर केवल भारतीय बाजारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने समूचे एशियाई और यूरोपीय शेयर बाजारों को भी अपनी चपेट में ले लिया। सुबह से ही बाजार पर भालुओं (बिकवाली) का दबदबा देखने को मिला, जिससे निवेशकों में घबराहट फैल गई।
सेंसेक्स-निफ्टी में भारी गिरावट और रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर
कारोबार के दौरान बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स एक समय 700 अंकों से भी अधिक टूट गया था, लेकिन सत्र के आगे बढ़ने पर यह 645.51 अंक (-0.86%) की गिरावट के साथ 73,597.83 के स्तर पर आ गया। दूसरी ओर, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी भी 199.80 अंक (-0.86%) की कमजोरी दर्ज करते हुए 23,166.90 के स्तर पर खिसक गया। बिकवाली के इस प्रचंड दौर में निफ्टी ने 23,150 का महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर भी तोड़ दिया। इस बीच, घरेलू मुद्रा रुपये पर भी चौतरफा दबाव दिखा और अमेरिकी डॉलर की मजबूती व वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण रुपया 17 पैसे टूटकर 95.35 प्रति डॉलर के भाव पर पहुंच गया। बाजार के सेक्टोरल प्रदर्शन की बात करें तो आईटी, ऑटो, मेटल और रियल्टी इंडेक्स में सबसे ज्यादा बिकवाली हुई, जबकि फार्मा, हेल्थकेयर और मीडिया जैसे डिफेंसिव सेक्टर्स ने मामूली बढ़त के साथ बाजार को संभालने का असफल प्रयास किया।
पश्चिम एशिया का बढ़ता तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग
बाजार के जानकारों के मुताबिक, इस भारी गिरावट की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में गहराता भू-राजनीतिक संकट है। लेबनान में इजरायली सैन्य कार्रवाई के जवाब में ईरान द्वारा इजरायल पर मिसाइलें दागे जाने से युद्ध के आसार और गंभीर हो गए हैं। इस वैश्विक तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल (कच्चा तेल) का भाव 3.51 फीसदी के तगड़े उछाल के साथ 96.36 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है, जो भारत जैसे आयातक देश के लिए बड़ा झटका है। हालांकि, कूटनीतिक स्तर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से शांति वार्ताओं को बचाने की अपील करते हुए जवाबी कार्रवाई न करने को कहा है और ईरान को भी बातचीत के मंच पर आने का आग्रह किया है।
एआई रैली का थमना और विदेशी फंड्स की ताबड़तोड़ बिकवाली
युद्ध के संकट के साथ-साथ अमेरिकी बाजारों में टेक्नोलॉजी शेयरों की 'AI-आधारित रैली' का अचानक थम जाना भी मंदी का एक बड़ा कारण बना। अमेरिकी टेक इंडेक्स नैस्डैक में आई 4.18 प्रतिशत की भारी गिरावट का सीधा असर एशियाई बाजारों पर देखने को मिला। इसके चलते दक्षिण कोरिया के मुख्य सूचकांक 'कोस्पी' में लगभग 8 फीसदी की ऐतिहासिक गिरावट आई, जिसके बाद वहां कुछ समय के लिए ट्रेडिंग (सर्किट) रोकनी पड़ गई। इसके अलावा, वैश्विक बाजारों में मची इस तबाही के बीच जापान का निक्केई 4.2% और टोपिक्स 2.7% तक टूट गए, जबकि हांगकांग और चीन के बाजारों में भी 1 से 1.3% की गिरावट रही। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भी भारतीय बाजार से शुक्रवार को 8,776.25 करोड़ रुपये के शेयरों की भारी-भरकम बिकवाली की, जिससे घरेलू निवेशकों का मनोबल पूरी तरह टूट गया।
LPG उपभोक्ताओं को झटका: 14.2 किलो सिलेंडर पर ₹29 की बढ़ोतरी
7 Jun, 2026 08:56 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली: महंगाई के इस दौर में आम जनता को एक और बड़ा झटका लगा है. घरेलू रसोई गैस (LPG) की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी कर दी गई है. इस बार 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दाम 29 रुपये बढ़ा दिए गए हैं. नई कीमतें आज से ही लागू हो गई हैं. रिपोर्टों के अनुसार, पिछले तीन महीनों के भीतर यह दूसरी बार है जब आम जनता पर रसोई गैस के दाम बढ़ाकर बोझ डाला गया है. इस बढ़ोतरी से मध्यमवर्गीय परिवारों का मासिक बजट पूरी तरह गड़बड़ाने की आशंका है.
देश के महानगरों में अब क्या हैं नए दाम?
कीमतों में हुई इस बढ़ोतरी के बाद देश की राजधानी दिल्ली में घरेलू एलपीजी सिलेंडर अब 913 रुपये से महंगा होकर 942 रुपये का हो गया है. आर्थिक राजधानी मुंबई में भी इसके दाम 912.50 रुपये से बढ़कर 941.50 रुपये तक पहुंच गए हैं. वहीं, कोलकाता में गैस सिलेंडर का रेट 939 रुपये से बढ़कर 968 रुपये हो गया है, जबकि चेन्नई में अब इसके लिए उपभोक्ताओं को 957 रुपये चुकाने होंगे.
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी बढ़ीं कीमतें
महानगरों के अलावा राज्यों की राजधानियों में भी इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में पहले जो सिलेंडर 918.50 रुपये में मिलता था, वह अब 29 रुपये महंगा होकर 947.50 रुपये का हो गया है. वहीं छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में तो रसोई गैस की कीमतों ने 1000 रुपये के आंकड़े को भी पार कर लिया है. रायपुर में आज से घरेलू गैस सिलेंडर के दाम 1013 रुपये हो गए हैं, जिससे वहां के नागरिकों की जेब पर सबसे ज्यादा असर पड़ने वाला है.
तीन महीने में दूसरी बार क्यों बढ़े दाम?
इससे पहले मार्च के महीने में भी रसोई गैस की कीमतों में 60 रुपये प्रति सिलेंडर की बड़ी बढ़ोतरी की गई थी. उस समय पश्चिमी एशिया में उपजे तनाव और संकट के कारण पूरी दुनिया में ईंधन की सप्लाई प्रभावित हुई थी, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतें बढ़ी थीं. तेल उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार के दबाव के कारण लागत की आंशिक भरपाई करने के लिए कीमतों में यह बदलाव करना जरूरी हो गया था. हालांकि, वजह जो भी हो, लगातार हो रही इस बढ़ोतरी ने आम आदमी की रसोई का स्वाद जरूर बिगाड़ दिया है.
पीएम मोदी और आर्थिक सलाहकार परिषद की बैठक: वैश्विक झटकों से घरेलू बाजार को बचाने का बना मेगा प्लान
6 Jun, 2026 04:27 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | वैश्विक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच देश की आर्थिक गति को नई ऊर्जा देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहल की है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी आर्थिक मंदी और संघर्षों के बीच भारत की मजबूत स्थिति को बरकरार रखने के ध्येय से, प्रधानमंत्री ने अपने आर्थिक सलाहकार परिषद (पीएम-ईएसी) के शीर्ष विशेषज्ञों के साथ एक विशेष समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। इस उच्च स्तरीय मंथन का मुख्य उद्देश्य देश की जीडीपी वृद्धि को रफ्तार देना और मौजूदा वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए एक ठोस एवं दूरदर्शी रोडमैप तैयार करना रहा।
अंतरराष्ट्रीय मंदी के बीच आर्थिक संप्रभुता और रणनीति
इस महत्वपूर्ण बैठक में मुख्य रूप से उन रणनीतिक उपायों पर विचार-विमर्श किया गया, जो भारत को वैश्विक स्तर पर जारी उथल-पुथल के बावजूद एक सुरक्षित और गतिशील आर्थिक जोन बनाए रखने में मददगार साबित हो सकें। प्रधानमंत्री और परिषद के सदस्यों ने उन आंतरिक शक्तियों को मजबूत करने पर बल दिया, जिससे बाहरी झटकों का भारतीय बाजारों पर न्यूनतम असर पड़े। बैठक के दौरान देश के आर्थिक विकास की निरंतरता को सुनिश्चित करने के लिए कई नवाचारी वित्तीय मॉडलों और व्यावहारिक उपायों पर विस्तार से प्रजेंटेशन भी दिए गए।
प्रशासनिक सुधार, व्यापार सुगमता और जीवन स्तर में सुधार
आर्थिक प्रगति को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाने के लिए नीतियों के सरलीकरण को अनिवार्य माना गया है। इसी सोच के साथ बैठक में आम जनता और उद्योग जगत को सीधे राहत पहुंचाने वाले सुधारात्मक कदमों पर विमर्श हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने देश में व्यापार को बढ़ावा देने (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) तथा नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन को सुगम बनाने (ईज ऑफ लिविंग) की दिशा में प्रशासनिक बाधाओं और लालफीताशाही को न्यूनतम करने पर जोर दिया ताकि निवेश के अनुकूल माहौल तैयार हो सके।
पश्चिम एशिया संकट का मूल्यांकन और भविष्य की नीतियां
वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय पटल पर जारी पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव का मुद्दा भी इस बैठक के केंद्र में रहा। आर्थिक सलाहकार परिषद के विशेषज्ञों ने इस क्षेत्रीय संघर्ष के कारण वैश्विक आपूर्ति शृंखला, कच्चे तेल की कीमतों और भारतीय वाणिज्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का एक विस्तृत विश्लेषणात्मक खाका प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्तुत किया। यह नीतिगत मूल्यांकन सरकार को आने वाले समय में ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने और आयात-निर्यात को सुचारू बनाए रखने के लिए अग्रिम रणनीतियां तैयार करने में सहायक होगा।
पश्चिम एशिया संकट और कमजोर मॉनसून: वित्त वर्ष 2027 की विकास दर के सामने दोहरी आर्थिक चुनौती
6 Jun, 2026 04:22 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | भारतीय अर्थव्यवस्था ने वैश्विक चुनौतियों के बीच भी शानदार प्रदर्शन करते हुए वित्त वर्ष 2025-26 में 7.7 प्रतिशत की मजबूत विकास दर दर्ज की है। हालांकि, जनवरी-मार्च की अंतिम तिमाही में 7.8 प्रतिशत की बेहतरीन वृद्धि के उपरांत, वित्तीय विशेषज्ञों ने सचेत किया है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल के बढ़ते दाम और वैश्विक अस्थिरता के चलते चालू वित्त वर्ष (2026-27) में आर्थिक प्रगति की यह गति कुछ मंद हो सकती है।
औद्योगिक विनिर्माण और चौतरफा उत्पादन से मिली ताकत
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, बीते वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में जीडीपी की रफ्तार उम्मीद से कहीं बेहतर रही। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रगति पिछले कई तिमाहियों के औसत प्रदर्शन से काफी आगे है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी भारत की आंतरिक मजबूती को दर्शाती है। बाजार जानकारों के अनुसार, इस अवधि में सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) दर 7.9 प्रतिशत पर पहुंचना यह प्रमाणित करता है कि देश का आर्थिक विस्तार केवल उपभोक्ता मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग), बुनियादी ढांचा निर्माण और सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) के दमदार उत्पादन का भी इसे पूरा सहयोग मिला है।
नीतिगत रणनीतियों और घरेलू निवेश से सुरक्षित रहा बाजार
मार्च के महीने में जब मध्य पूर्व का संकट अपने चरम पर था, तब केंद्र सरकार ने देश के भीतर ईंधन (पेट्रोल-डीजल) की कीमतों को नियंत्रित और स्थिर रखकर इसके नकारात्मक आर्थिक प्रभाव को काफी हद तक थाम लिया। बैंकिंग क्षेत्र के शोध बताते हैं कि इस आर्थिक उछाल को बनाए रखने में निजी उपभोक्ता खर्च और घरेलू निवेश में आई भारी तेजी ने मुख्य भूमिका निभाई है। इसके अलावा, विदेशी पूंजी निवेश के प्रवाह को सुगम बनाने और कर प्रणालियों में सुधार के सरकारी प्रयासों ने अंतरराष्ट्रीय झटकों के खिलाफ भारतीय बाजारों के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच का काम किया।
आगामी जोखिम और वित्तीय वर्ष 2027 का परिदृश्य
आने वाले समय को लेकर आर्थिक रेटिंग एजेंसियों और प्रमुख बैंकों ने बेहद सतर्क रुख अपनाया है। चालू वित्त वर्ष (2026-27) के लिए विकास दर का अनुमान 6.5 से 6.6 प्रतिशत के बीच लगाया जा रहा है, जो इस कयास पर टिका है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल औसतन 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मंद वैश्विक विकास, आपूर्ति शृंखला में बाधाएं, बढ़ती उत्पादन लागत और मानसून की अनिश्चितता आने वाले दिनों में आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ा सकती हैं। यदि मुद्रास्फीति नियंत्रण से बाहर होती है, तो केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों में बढ़ोतरी जैसा कड़ा कदम भी उठाना पड़ सकता है, हालांकि मजबूत आंतरिक मांग और सरकार का पूंजीगत व्यय कार्यक्रम इस मंदी को रोकने में मददगार साबित होगा।
पेट्रोल-डीजल खरीदने से पहले पढ़ें यह खबर, आज क्या है आपके शहर में ईंधन का भाव?
6 Jun, 2026 11:44 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। पिछले कुछ हफ्तों के दौरान ईंधन के दामों में लगातार आई तेजी के बाद आज देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरू मध्य (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी के कारण ऊर्जा आपूर्ति में लगातार बाधाएं आ रही हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के भाव में उतार-चढ़ाव का दौर जारी है। इस बीच, बाजार विशेषज्ञ इस बात पर पैनी नजर बनाए हुए हैं कि तेल कंपनियां आने वाले दिनों में ईंधन के दामों में क्या बदलाव करती हैं।
कच्चे तेल की बढ़ती लागत और तेल कंपनियों का घाटा
ईंधन की कीमतों में हाल ही में देखी गई बढ़ोतरी की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का महंगा होना और सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) पर बढ़ता वित्तीय बोझ है। पेट्रोलियम उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, मई महीने में तेल की कीमतों में कई बार इजाफा किए जाने के बावजूद तेल कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर अब भी काफी नुकसान (अंडर-रिकवरी) उठाना पड़ रहा है। रिपोर्टों की मानें तो यह घाटा इतना बड़ा है कि बाजार में इस बात की चर्चाएं तेज हैं कि कंपनियां अपने मुनाफे को पटरी पर लाने के लिए आने वाले समय में कीमतों को और बढ़ा सकती हैं।
पिछले कुछ हफ्तों में कितना महंगा हुआ ईंधन?
बीते कुछ हफ्तों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में काफी तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 15 मई के बाद से दोनों ईंधनों के दामों में सिलसिलेवार ढंग से कई बार वृद्धि की गई, जिसके चलते देश के विभिन्न शहरों में तेल की कीमतें कुल मिलाकर करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ चुकी हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजार में मची उथल-पुथल के बीच तेल कंपनियों ने कच्चे तेल की खरीद और उसे रिफाइन करने की बढ़ती लागत की भरपाई करने के लिए किश्तों में इन दामों को बढ़ाया है।
उपभोक्ताओं और बाजार पर आगामी बदलावों का असर
ईंधन के दामों में हुई इस बढ़ोतरी का सीधा असर आम जनता की जेब और माल ढुलाई की लागत पर पड़ रहा है। हालांकि आज कीमतों में कोई बदलाव न होने से उपभोक्ताओं को थोड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन बाजार के जानकारों का मानना है कि वैश्विक संकट और तेल कंपनियों के घाटे को देखते हुए आने वाले दिनों में आम जनता को एक बार फिर महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। विशेषज्ञ आने वाले हफ्तों में घरेलू तेल दरों पर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के प्रभाव का लगातार आकलन कर रहे हैं।
LPG उपभोक्ताओं के लिए जरूरी खबर! 14.2 किलो सिलेंडर और कमर्शियल गैस के नए रेट चेक करें
6 Jun, 2026 11:29 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। व्यावसायिक रसोई गैस और कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) के दामों में लगातार हो रहे इजाफे के बाद अब आम जनता के बीच LPG, CNG और PNG की कीमतों को लेकर चिंताएं गहरी होने लगी हैं। हालांकि, राहत की बात यह है कि घरेलू उपयोग वाले एलपीजी सिलेंडर की कीमतें फिलहाल अपने पुराने स्तर पर ही स्थिर बनी हुई हैं।
कमर्शियल सिलेंडर और छोटे गैस सिलेंडरों के दाम बढ़े
बीते 1 जून को कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की कीमतों में एक बार फिर संशोधन किया गया। इस बदलाव के तहत देश की राजधानी दिल्ली में 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमत में 42 रुपये और कोलकाता में 53.5 रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके साथ ही, दिल्ली में मिलने वाले 5 किलोग्राम वाले फ्री ट्रेड एलपीजी सिलेंडर के दाम भी 11 रुपये बढ़ा दिए गए हैं, जिसके बाद अब इसकी कीमत 821.5 रुपये पर पहुंच गई है। हालांकि, घरेलू उपयोग वाले उपभोक्ताओं के लिए तुरंत कोई नया बदलाव नहीं किया गया है।
घरेलू रसोई गैस की कीमतें और तेल कंपनियों पर दबाव
आम उपभोक्ताओं के लिए 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत मार्च की शुरुआत से ही 913 रुपये पर टिकी हुई है। मार्च महीने में इसमें 60 रुपये की बढ़ोतरी की गई थी। ईंधन की सीमित उपलब्धता, वैश्विक बाजार में बढ़ती ऊर्जा लागत और तेल कंपनियों पर बढ़ते वित्तीय दबाव के कारण कीमतों में यह उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। सरकार का रुख है कि वह घरेलू आपूर्ति को सुचारू बनाए रखने और ईंधन के भंडार को मजबूत करने के प्रयास कर रही है। टुकड़ों में की जा रही इस बढ़ोतरी का उद्देश्य आम जनता को महंगाई का एकमुश्त बड़ा झटका दिए बिना तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन दबाव को कम करना है, फिर भी इसका असर महंगाई पर पड़ना तय माना जा रहा है।
सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस में उछाल और सप्लाई लागत का संकट
पिछले कुछ महीनों के दौरान 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई कॉस्ट (आपूर्ति लागत) में करीब दो-पेंटा (40%) की भारी वृद्धि हुई है, जिससे इसकी वास्तविक लागत लगभग 1200 रुपये प्रति सिलेंडर तक पहुंच चुकी है। इसके बावजूद आम उपभोक्ताओं को यह सिलेंडर अब भी 913 रुपये में ही मुहैया कराया जा रहा है। सप्लाई लागत में आए इस बड़े उछाल की मुख्य वजह प्रोपेन के सऊदी अनुबंध मूल्य (Saudi Contract Price) में आई भारी तेजी है।
भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिसके लिए सऊदी अरामको के कॉन्ट्रैक्ट प्राइस को ही वैश्विक मानक माना जाता है। होर्मुज जलडमरू मध्य (Strait of Hormuz) के रास्ते में सप्लाई बाधित होने के चलते अप्रैल महीने में इसके दामों में 38% का जोरदार उछाल आया था। हालांकि, सरकारी सूत्रों का दावा है कि वैश्विक स्तर पर कीमतें बढ़ने के बावजूद भारत में घरेलू एलपीजी की दरें इस पूरे क्षेत्र में सबसे कम हैं। पड़ोसी देशों की तुलना में भारत में सब्सिडी वाले और बिना सब्सिडी वाले घरेलू सिलेंडरों के दाम काफी कम बने हुए हैं, भले ही वहां सिलेंडरों के साइज में थोड़ा अंतर हो।
सोना हुआ धड़ाम! कीमतों में आई भारी कमी, चांदी की चमक भी पड़ी फीकी
6 Jun, 2026 11:17 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। भारतीय सर्राफा बाजार में आज सोने और चांदी की कीमतों में भारी गिरावट देखने को मिली है। अमेरिकी बाजार में आए मजबूत रोजगार के आंकड़ों (नॉन-फार्म पेरोल डेटा) और डॉलर में आई मजबूती के कारण वैश्विक बाजार में बड़े पैमाने पर मुनाफावसूली हावी रही। अंतरराष्ट्रीय बाजार के इस दबाव का सीधा असर घरेलू वायदा बाजार (MCX) पर भी पड़ा, जिससे दोनों कीमती धातुओं के दाम काफी नीचे आ गए हैं।
चूंकि शनिवार और रविवार को इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) और MCX वायदा बाजार दोनों में ही अवकाश रहता है, इसलिए शुक्रवार को आई भारी गिरावट के बाद आज भी कीमतें निचले स्तर पर ही टिकी हुई हैं। शुक्रवार को क्लोजिंग के वक्त सोना लगभग 1600 से 1850 रुपये प्रति 10 ग्राम तक लुढ़क गया था, जबकि चांदी में 4000 से 5800 रुपये प्रति किलोग्राम तक की बड़ी कमजोरी दर्ज की गई थी।
विभिन्न शहरों में चांदी के ताजा भाव
देश के प्रमुख शहरों में आज चांदी की खुदरा कीमतें (Retail Price) 2,74,900 रुपये से लेकर 2,79,900 रुपये प्रति किलोग्राम के दायरे में बनी हुई हैं। देश की राजधानी दिल्ली में 10 ग्राम चांदी का भाव 2749 रुपये और एक किलोग्राम का दाम 2,79,900 रुपये चल रहा है। वहीं, मुंबई और कोलकाता के बाजारों में 10 ग्राम चांदी 2750 रुपये और एक किलोग्राम चांदी 2,75,000 रुपये पर कारोबार कर रही है। दक्षिण भारत के चेन्नई में कीमतें थोड़ी ऊंची हैं, वहां एक ग्राम चांदी 2800 रुपये और एक किलोग्राम चांदी 2,80,000 रुपये के स्तर पर है।
अमेरिकी श्रम बाजार के मजबूत आंकड़े और ब्याज दरें
कीमतों में आई इस बड़ी गिरावट की मुख्य वजह अमेरिकी लेबर मार्केट से जुड़े आंकड़े हैं। अमेरिका में मई महीने के दौरान उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन करते हुए 1.72 लाख नई नौकरियां जुड़ी हैं। इस मजबूत डेटा से संकेत मिलते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था फिलहाल बेहद मजबूत स्थिति में है। ऐसे में इस बात की संभावना काफी कम हो गई है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक 'फेडरल रिजर्व' (US Fed) जल्द ही ब्याज दरों में कोई कटौती करेगा। ऊंची ब्याज दरों के लंबे समय तक बने रहने की आशंका के चलते निवेशकों ने सोने से अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया है।
वैश्विक बिकवाली और मिडिल ईस्ट में शांति के संकेत
अंतरराष्ट्रीय हाजिर बाजार (Spot Market) में सोने के दाम फिसलकर 4450 डॉलर प्रति औंस के नीचे आ गए हैं, वहीं चांदी भी 73 डॉलर प्रति औंस के स्तर से नीचे ट्रेड कर रही है। वैश्विक स्तर पर हुई इसी बिकवाली के कारण भारतीय बाजार में भी कीमतें धड़ाम हो गईं। इसके अलावा, मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) से आ रही सकारात्मक खबरों ने भी बाजार का रुख बदला है। इजरायल और लेबनान के बीच सीजफायर (संघर्ष विराम) की चर्चाओं से बाजार में जारी अनिश्चितता कम हुई है, जिसके चलते सुरक्षित निवेश (Safe Haven) के रूप में सोने-चांदी के प्रति निवेशकों का आकर्षण थोड़ा घटा है।
कर्मचारियों को बड़ा तोहफा: महंगाई भत्ते में 2% वृद्धि, जानें किसे मिलेगा फायदा
6 Jun, 2026 11:08 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
गुवाहाटी।असम सरकार ने राज्य के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को एक बड़ा तोहफा दिया है। जहां एक ओर केंद्र सरकार के कर्मचारी आठवें वेतन आयोग (8th Pay Commission) के तहत महंगाई भत्ते (DA) और महंगाई राहत (DR) की आस लगाए बैठे हैं, वहीं दूसरी ओर असम की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने अपने कर्मचारियों के DA और DR में 2% की बढ़ोतरी की घोषणा कर दी है।
हाल ही में हुए चुनावों में जीत दर्ज करने के बाद, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की अध्यक्षता में आयोजित यह पहली कैबिनेट बैठक थी। सरकार के इस फैसले के बाद अब राज्य में महंगाई भत्ता 50% से बढ़कर 60% हो गया है। यह नई दरें 1 जनवरी, 2026 से लागू मानी जाएंगी, जिससे इस महंगाई के दौर में लाखों परिवारों को बड़ी वित्तीय राहत मिलेगी।
कर्मचारियों के वेतन में कितना होगा इजाफा?
महंगाई भत्ते में इस बढ़ोतरी के बाद कर्मचारियों की टेक-होम सैलरी बढ़ जाएगी। उदाहरण के लिए, यदि किसी कर्मचारी का मूल वेतन (Basic Salary) 30,000 रुपये है, तो पहले उन्हें 58% DA के हिसाब से 17,400 रुपये मिलते थे, जो अब 60% होने पर 18,000 रुपये हो जाएंगे। यानी उनके वेतन में सीधे 600 रुपये की बढ़ोतरी होगी।
इसी तरह, जिन कर्मचारियों की बेसिक सैलरी 50,000 रुपये है, उन्हें पहले 58% डीए के तौर पर 29,000 रुपये अतिरिक्त मिलते थे, जो अब बढ़कर 30,000 रुपये हो जाएंगे। इस प्रकार उनके वेतन में 1,000 रुपये का इजाफा होगा। यह बढ़ी हुई राशि जून 2026 के वेतन के साथ कर्मचारियों के खातों में जमा कर दी जाएगी।
चतुर्थ श्रेणी (Grade-4) कर्मचारियों के लिए पदोन्नति का रास्ता साफ
कैबिनेट बैठक में केवल वित्तीय लाभ ही नहीं, बल्कि निचले स्तर के कर्मचारियों के करियर को आगे बढ़ाने के लिए भी एक बड़ा नीतिगत फैसला लिया गया है। सरकार ने 'असम माध्यमिक शिक्षा (प्रांतीयकृत स्कूल) सेवा नियम, 2026' में संशोधन को हरी झंडी दे दी है। इस बदलाव के बाद, स्कूलों और अन्य सरकारी विभागों में कार्यरत ग्रेड-4 (चतुर्थ श्रेणी) के कर्मचारियों को ग्रेड-3 के पदों पर प्रमोट करना बेहद आसान और नियमित हो जाएगा, जिससे इन कर्मचारियों में उत्साह का माहौल है।
वैश्विक स्तर पर फिर बढ़ी सोने की मांग: अप्रैल में सुरक्षित निवेश के लिए खरीदे गए 17 टन गोल्ड, आरबीआई ने नहीं बढ़ाई हिस्सेदारी
5 Jun, 2026 12:45 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | वैश्विक सर्राफा बाजार और आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने एक बार फिर सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने का रुख किया है। 'वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल' द्वारा जारी नए आंकड़ों के अनुसार, मार्च के महीने में बड़े पैमाने पर सोने की बिकवाली करने के बाद, अप्रैल में केंद्रीय बैंक दोबारा शुद्ध खरीदार (नेट बायर्स) के रूप में उभरे हैं। केंद्रीय बैंकों ने अप्रैल के दौरान कुल 17 टन सोने की शुद्ध खरीदारी की है, हालांकि इस दौरान भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सोने की खरीद से दूरी बनाए रखी।
पोलैंड और चीन रहे सोने के सबसे बड़े खरीदार
अप्रैल महीने में वैश्विक स्तर पर 'नेशनल बैंक ऑफ पोलैंड' सोने का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा, जिसने अपने भंडार में रिकॉर्ड 14 टन सोना शामिल किया। वहीं, 'पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना' ने इस दौरान 8 टन सोने की खरीद की, जो दिसंबर 2024 के बाद से उसकी सबसे बड़ी मासिक खरीदारी है। चीन पिछले लगातार 18 महीनों से सोने की जमाखोरी कर रहा है, जिसके बाद उसका कुल स्वर्ण भंडार बढ़कर 2,322 टन के स्तर पर पहुंच गया है। इसके अलावा, चेक गणराज्य ने भी अपनी लगातार 38वीं मासिक खरीद जारी रखते हुए इस महीने दो टन सोना अपने रिजर्व में जोड़ा है।
डॉलर पर निर्भरता घटाने के लिए चीन की सोची-समझी रणनीति
वैश्विक वित्तीय विश्लेषक जेपी मॉर्गन के मुताबिक, चीन द्वारा बड़े पैमाने पर की जा रही यह स्वर्ण खरीद एक गहरी रणनीति का हिस्सा है। चीन का प्राथमिक उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार और अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करना है, ताकि भविष्य में किसी भी भू-राजनीतिक टकराव या युद्ध जैसी चरम स्थिति में वह अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों के प्रभाव से खुद को सुरक्षित रख सके। दरअसल, रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा रूस के डॉलर रिजर्व को फ्रीज किए जाने के बाद से चीन अत्यंत सतर्कता बरत रहा है और डॉलर के विकल्प के रूप में सोने का बैकअप मजबूत कर रहा है।
भारत का रुख रहा शांत और रूस ने की भारी बिकवाली
इस वैश्विक होड़ के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अप्रैल में सोने की कोई नई खरीद नहीं की। चालू वर्ष 2026 में आरबीआई ने अब तक केवल मार्च के महीने में महज 200 किलोग्राम सोना खरीदा है, जबकि इससे पहले साल 2025 में 4.2 टन और 2024 में रिकॉर्ड 72.6 टन सोने की खरीदारी की गई थी। वर्तमान में भारत का कुल स्वर्ण भंडार 880.52 टन पर बना हुआ है। दूसरी तरफ, युद्ध और आर्थिक प्रतिबंधों से जूझ रहे रूस ने अप्रैल में 6 टन सोना बेचा है और वह इस साल अब तक कुल 22 टन सोने की बिकवाली कर चुका है। वहीं, उज्बेकिस्तान ने भी अप्रैल में एक टन सोना बेचा, लेकिन इसके बावजूद वह पोलैंड के बाद इस साल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है।
ग्लोबल टैलेंट की रेस में भारत नंबर वन: अमेरिका के 59% अरबों डॉलर के स्टार्टअप्स प्रवासियों के भरोसे, भारतीय प्रवासियों ने बनाया रिकॉर्ड
5 Jun, 2026 12:34 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | अमेरिका में एक अरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन वाली निजी स्टार्टअप कंपनियों (यूनिकॉर्न) को खड़ा करने में भारतीय मूल के उद्यमियों का दबदबा देखने को मिला है। 'नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी' (NFAP) की एक होलिया रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी यूनिकॉर्न कंपनियों के संस्थापकों में भारतीय मूल के उद्यमी सबसे बड़े प्रवासी समूह के रूप में उभरे हैं। इस अध्ययन से साफ होता है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन में अप्रवासी नवप्रवर्तकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो चुकी है।
96 कंपनियों के साथ भारत शीर्ष पर, प्रवासियों का दबदबा
इस शोध के अनुसार, अमेरिका की कुल 96 यूनिकॉर्न कंपनियों की स्थापना या सह-स्थापना भारतीय मूल के दिग्गजों ने की है। इस सूची में $20 अरब के मूल्यांकन के साथ 12वें स्थान पर मौजूद एआई स्टार्टअप 'पर्प्लेक्सिटी एआई' भी शामिल है, जिसके सह-संस्थापक अरविंद श्रीनिवास हैं। प्रवासी संस्थापकों के मामले में भारत के बाद इस्राइल (60), यूनाइटेड किंगडम (47), चीन (41) और कनाडा (30) का नंबर आता है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि अमेरिका की कुल 775 निजी यूनिकॉर्न कंपनियों में से 59 प्रतिशत (455 कंपनियां) प्रवासियों द्वारा स्थापित हैं, जबकि लगभग 66 प्रतिशत कंपनियों की नींव में प्रवासियों या उनकी अगली पीढ़ी का हाथ है।
रोजगार सृजन और एलन मस्क सहित बड़े नाम शामिल
इन प्रवासी संस्थापकों वाली कंपनियों ने अमेरिका में औसतन प्रति कंपनी 833 नौकरियों का सृजन किया है। इसके अलावा, लगभग 80 प्रतिशत अमेरिकी यूनिकॉर्न में कोई न कोई अप्रवासी संस्थापक या शीर्ष नेतृत्व (जैसे सीईओ या वीपी इंजीनियरिंग) मौजूद है। इस अध्ययन में पाया गया कि कम से कम 15 उद्यमियों ने दो या उससे अधिक यूनिकॉर्न कंपनियां बनाई हैं। इस फेहरिस्त में दक्षिण अफ्रीका में जन्मे एलन मस्क (स्पेसएक्स, ओपनएआई, न्यूरालिंक) और लेबनान के नूबार अफेयान (मॉडर्ना सहित 5 कंपनियां) के साथ-साथ भारत के 6 प्रमुख उद्यमी- मोहित अरोन, ज्योति बंसल, आशुतोष गर्ग, अरविंद जैन, सचिन नय्यर और अजीत सिंह भी शामिल हैं।
5 ट्रिलियन डॉलर का विशाल संयुक्त मूल्यांकन
रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि प्रवासियों द्वारा स्थापित इन 455 यूनिकॉर्न कंपनियों का कुल संयुक्त बाजार मूल्यांकन लगभग 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से 183 अरब डॉलर मूल्य की कंपनियां ऐसे लोगों ने शुरू कीं, जो कभी अंतरराष्ट्रीय छात्रों के तौर पर पढ़ने अमेरिका आए थे। सबसे मूल्यवान यूनिकॉर्न कंपनियों में स्पेसएक्स (1.5 ट्रिलियन डॉलर), एंथ्रोपिक (965 अरब डॉलर), ओपनएआई (852 अरब डॉलर) और डेटाब्रिक्स (134 अरब डॉलर) जैसे बड़े नाम अग्रणी स्थान पर बने हुए हैं।
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