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विदेशों में बढ़ी भारतीय आमों की मांग, कई देशों की पहली पसंद बने देसी स्वाद
13 Jun, 2026 01:37 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। भारत का राष्ट्रीय फल 'आम' अपनी मिठास और बेजोड़ स्वाद के कारण दुनिया भर में फलों का राजा कहलाता है। वैश्विक स्तर पर आम की 1,500 से अधिक विभिन्न किस्में पाई जाती हैं, जिनकी बागवानी 140 से भी ज्यादा देशों में की जाती है। इस मामले में भारत का दबदबा सबसे अनूठा है, क्योंकि अकेले हिंदुस्तान में ही आम की 1,000 से ज्यादा किस्में मौजूद हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश के मलिहाबादी दशहरी से लेकर महाराष्ट्र के रत्नागिरी अल्फोंसो तक शामिल हैं। आम के कुल वैश्विक उत्पादन में भारत शीर्ष पायदान पर काबिज है। हालांकि, भारत में पाई जाने वाली इन हजार किस्मों में से केवल 30 प्रजातियां ही ऐसी हैं, जिनकी बागवानी बड़े पैमाने पर व्यावसायिक (कमर्शियल) रूप से की जाती है ताकि उन्हें देश के अलग-अलग राज्यों के बाजारों में बेचने के साथ-साथ विदेशों में निर्यात किया जा सके।
जापान और नेपाल ने भारतीय आमों के आयात पर लगाया प्रतिबंध
हाल ही में भारतीय आम के निर्यात बाजार को कुछ अंतरराष्ट्रीय झटके भी लगे हैं। पिछले महीने जापान ने भारत से आने वाले आमों की खेप पर अस्थाई रोक लगा दी थी, जिसका मुख्य कारण भारत के ट्रीटमेंट सेंटर्स में पेस्ट-कंट्रोल (कीटनाशक प्रबंधन) की प्रक्रियाओं में पाई गई गंभीर खामियां थीं। पिछले दो दशकों में यह पहला मौका है जब जापान ने भारतीय आम को लेकर ऐसा सख्त रुख अपनाया है। इससे पहले जापान ने 'फ्रूट फ्लाइज़' (फल मक्खियों) के खतरे को देखते हुए प्रतिबंध लगाया था, जिसे साल 2006 में भारत सरकार द्वारा सुरक्षा के कड़े मानक तय करने के बाद हटाया गया था। जापान के बाद पड़ोसी देश नेपाल ने भी भारतीय आमों के आयात पर पाबंदियां लागू कर दी हैं, क्योंकि सीमा पर तैनात क्वारंटीन निरीक्षकों को जांच के दौरान आमों की एक खेप में तय सीमा से कहीं अधिक रासायनिक कीटनाशकों (पेस्टिसाइड्स) की मात्रा मिली थी।
वैश्विक बाजार में भारतीय आमों की मांग और प्रमुख खरीदार देश
भले ही कुछ देशों ने तकनीकी और रासायनिक कारणों से पाबंदियां लगाई हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय आमों की दीवानगी और मांग में कोई बड़ी कमी नहीं आई है। भारत से सबसे ज्यादा आम खरीदने वाले देशों की सूची में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सबसे आगे है, जो कुल एक्सपोर्ट का अकेले 31.16 प्रतिशत हिस्सा खरीदता है और इसके लिए भारत को 16.28 मिलियन डॉलर का भुगतान करता है। संयुक्त अरब अमीरात मुख्य रूप से अल्फांसो, केसर, बंगनपल्ली और तोतापुरी किस्मों का आयात करता है। इसके बाद दूसरे नंबर पर ब्रिटेन है, जिसकी हिस्सेदारी 19.27 प्रतिशत (3.25 मिलियन डॉलर) है और वह अल्फांसो, केसर व लंगड़ा आम मंगाता है। तीसरे स्थान पर 17.72 प्रतिशत शेयर (0.57 मिलियन डॉलर) के साथ अमेरिका का नाम आता है, जो अल्फांसो, केसर और दशहरी का आयात करता है।
अन्य देशों का निर्यात शेयर और चुकाई जाने वाली कीमतें
विश्व के कई अन्य देशों में भी भारतीय आम की विभिन्न किस्मों की भारी मांग है। कुवैत कुल निर्यात का 4.65 प्रतिशत हिस्सा (0.84 मिलियन डॉलर) खरीदकर अल्फांसो, तोतापुरी और सफेदा आम मंगाता है। कनाडा का एक्सपोर्ट शेयर 4.19 प्रतिशत (0.20 मिलियन डॉलर) है, जहां अल्फांसो, केसर और बंगनपल्ली पसंद किए जाते हैं। सऊदी अरब तोतापुरी, अल्फांसो और लंगड़ा आम के लिए 1.20 मिलियन डॉलर चुकाकर 3.50 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है। कतर की बाजार हिस्सेदारी 2.90 प्रतिशत (0.88 मिलियन डॉलर) है, जहां अल्फांसो, केसर और बंगनपल्ली भेजे जाते हैं। इसके अतिरिक्त, नेपाल दशहरी, लंगड़ा और चौसा के लिए 2.10 प्रतिशत शेयर (0.60 मिलियन डॉलर) रखता है। सिंगापुर अल्फांसो, केसर और बादामी के लिए 1.80 प्रतिशत हिस्सेदारी (0.41 मिलियन डॉलर) तथा ओमान बंगनपल्ली और तोतापुरी किस्मों के लिए 1.10 प्रतिशत शेयर (0.30 मिलियन डॉलर) के साथ भारत के प्रमुख खरीदार देशों में शामिल हैं।
ITR 2026 में टैक्स कैलकुलेशन को लेकर भ्रम, जानें 20% टैक्स दिखने का कारण
13 Jun, 2026 01:31 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। भारत में आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करना हर करदाता के वित्तीय जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन टैक्स नियमों की जटिलता के कारण अक्सर लोग असमंजस में पड़ जाते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प मामला तब सामने आया, जब एक टैक्सपेयर ने शिकायत की कि लिस्टेड शेयरों को बेचने से उसे शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन (STCG) के रूप में ₹8,15,000 की आय हुई थी और इसके अलावा उसकी कोई अन्य कमाई नहीं थी। करदाता का तर्क था कि नई टैक्स व्यवस्था के तहत चूंकि उसकी कुल सालाना आमदनी ₹12 लाख की टैक्स-फ्री सीमा से काफी नीचे है, इसलिए उसकी टैक्स देनदारी शून्य होनी चाहिए, मगर इसके बावजूद इनकम टैक्स विभाग का ई-फाइलिंग पोर्टल उसकी इस आय पर सीधे 20 फीसदी की फ्लैट दर से टैक्स की गणना कर रहा है।
टैक्सपेयर की उलझन और ई-फाइलिंग पोर्टल पर उठते सवाल
करदाता ने 'आस्क वॉलेट वाइज' नामक एक वित्तीय परामर्श मंच पर अपनी समस्या साझा करते हुए पूछा कि उसने मात्र 8 महीनों के भीतर घरेलू शेयर बाजार में लिस्टेड स्टॉक बेचकर ₹8,15,000 का अल्पकालिक पूंजीगत लाभ कमाया है। करदाता के अनुसार, नई कर व्यवस्था (New Tax Regime) के नियमानुसार जब ₹12 लाख तक की आय पर धारा 87A (Section 87A) के तहत टैक्स रिबेट (छूट) का प्रावधान है, तो पोर्टल द्वारा उस पर टैक्स लगाना तकनीकी रूप से गलत है। उसने आशंका जताई कि शायद इनकम टैक्स यूटिलिटी या पोर्टल के सॉफ्टवेयर में कोई तकनीकी खराबी (गड़बड़ी) है, जिसके कारण उसकी कुल आय को सामान्य स्लैब रेट के बजाय एक विशेष उच्च दर से आंका जा रहा है।
विशेषज्ञों का स्पष्टीकरण: पोर्टल में कोई खराबी नहीं, टैक्स नियम ही अलग हैं
इस वित्तीय उलझन पर कर विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि इनकम टैक्स पोर्टल पूरी तरह सही तरीके से काम कर रहा है और सॉफ्टवेयर में किसी भी प्रकार की कोई तकनीकी खामी नहीं है। जानकारों के मुताबिक, आयकर अधिनियम की धारा 87A के तहत नई टैक्स व्यवस्था में मिलने वाली अधिकतम ₹60,000 तक की कर छूट (रिबेट) केवल उन आय पर लागू होती है, जिन पर सामान्य टैक्स स्लैब के आधार पर कर की गणना की जाती है। यह रिबेट उन विशेष श्रेणियों की कमाई पर देय नहीं होती, जिनके लिए आयकर कानून में पहले से ही 'विशेष कर दरें' (Special Tax Rates) निर्धारित की गई हैं, भले ही टैक्सपेयर की सभी स्रोतों से मिलाकर कुल शुद्ध आय ₹12 लाख के दायरे के अंदर ही क्यों न आती हो।
विशेष आय पर लागू होती है फ्लैट दर और एनआरआई के लिए अलग नियम
टैक्स एक्सपर्ट्स ने नियमों का ब्यौरा देते हुए बताया कि अगर कोई व्यक्ति भारत का निवासी (रेजिडेंट) करदाता है, तो पोर्टल लिस्टेड शेयरों से होने वाले शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन पर ₹4,00,000 की शुरुआती मूल छूट सीमा (बेसिक एग्जॉप्शन लिमिट) का लाभ देने के बाद, शेष बची राशि पर 20 प्रतिशत की फ्लैट दर से टैक्स वसूलता है। निवासी भारतीयों को अपनी इस विशेष आय को सामान्य स्लैब की बची हुई छूट के साथ एडजस्ट (सेट-ऑफ) करने की आंशिक सुविधा मिलती है। वहीं दूसरी ओर, यदि करदाता एक अनिवासी भारतीय (NRI) है, तो उसे इस अल्पकालिक पूंजीगत लाभ पर बिना किसी मूल छूट का फायदा मिले, पूरे ₹8,15,000 पर सीधे 20 फीसदी की दर से फ्लैट टैक्स चुकाना होगा, क्योंकि गैर-निवासियों के लिए सामान्य आय की कमी को शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन से समायोजित करने का कोई कानूनी विकल्प मौजूद नहीं है।
पेट्रोल पंपों पर नई व्यवस्था, ईंधन खरीद पर तय होगी अधिकतम सीमा
13 Jun, 2026 01:26 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के राजस्व घाटे को थामने के लिए एक बड़ा कदम उठाते हुए खुदरा पेट्रोल पंपों से थोक में ईंधन (बल्क परचेज) खरीदने पर तत्काल प्रभाव से पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। नए दिशानिर्देशों के तहत, अब कोई भी बड़ा खरीदार आम रिटेल आउटलेट्स से ईंधन की खरीद नहीं कर सकेगा। इस बड़े फैसले के बाद मॉल, अस्पताल, बड़ी फैक्ट्रियां, ट्रैवल एजेंसियां और निजी बस संचालक, जो अब तक अपनी भारी-भरकम जरूरतों के लिए नजदीकी पेट्रोल पंपों से डीजल खरीदते थे, उन्हें अब केवल अधिकृत बल्क सेल पॉइंट्स (थोक बिक्री केंद्रों) से ही तेल लेना होगा। इसी बीच, बीते शुक्रवार को अमेरिका और ईरान के बीच सकारात्मक समझौते की खबरों के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत फिसलकर 86 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से नीचे आ गई है।
डीजल की बिक्री पर एक दिन में 200 लीटर की अधिकतम सीमा तय
सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, इस नए नियम का सबसे बड़ा असर डीजल (हाई स्पीड डीजल - HSD) की बिक्री पर पड़ेगा, जिसके लिए अब प्रति वाहन एक दिन में अधिकतम 200 लीटर की सीमा (कैपिंग) निर्धारित कर दी गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि आम जनता या छोटे कमर्शियल वाहन चालक भी एक बार में या पूरे दिन में किसी भी पेट्रोल पंप से 200 लीटर से ज्यादा डीजल नहीं ले पाएंगे। रिटेल आउटलेट डीलर्स को सख्त हिदायत दी गई है कि वे केवल वाहनों के मूल टैंक या पीईएसओ (PESO) से मान्यता प्राप्त कंटेनरों में ही ईंधन भरें। इसके साथ ही, खुदरा पंपों से खरीदे गए इस डीजल की दोबारा व्यावसायिक बिक्री (री-सेल) पर भी पूरी तरह रोक लगा दी गई है। यह अंतरिम आदेश तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है, जो आगामी तीन महीनों तक प्रभावी रहेगा।
भारी मुनाफे के खेल और डायवर्जन को रोकने के लिए प्रशासनिक सख्ती
तेल कंपनियों के अधिकारियों ने गोपनीयता की शर्त पर बताया कि यह सख्त कदम खुदरा और थोक कीमतों के बीच पैदा हुए भारी अंतर के कारण उठाया गया है, जिसका फायदा उठाकर तेल का गलत इस्तेमाल (डायवर्जन) किया जा रहा था। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली के खुदरा पेट्रोल पंपों पर डीजल की कीमत जहां 95.20 रुपये प्रति लीटर है, वहीं थोक खरीदारों के लिए इसकी दर 134.50 रुपये प्रति लीटर तय है। इस ₹39.30 प्रति लीटर के बड़े अंतर के चलते थोक खरीदार कंपनियों को ऑर्डर देने के बजाय सीधे आम पंपों से गाड़ियां भरकर तेल उठा रहे थे, जिससे सरकारी कंपनियों को भारी वित्तीय चपत लग रही थी। प्रशासन का मानना है कि इस पाबंदी से आम पेट्रोल पंपों पर लगने वाली भारी भीड़ और अचानक होने वाली तेल की किल्लत से आम उपभोक्ताओं को निजात मिलेगी और वास्तविक वाहन चालकों को आसानी से ईंधन मिलता रहेगा।
खरीदारों के लिए राहत! सोना और चांदी हुए सस्ते, जानें ताजा भाव
13 Jun, 2026 12:40 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई। इस कारोबारी सप्ताह सर्राफा बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे दोनों कीमती धातुएं क्रमशः 6,400 रुपये और 14,300 रुपये से अधिक सस्ती हो गई हैं। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (आईबीजेए) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, चालू सप्ताह के दौरान 24 कैरेट शुद्ध सोने का भाव 6,438 रुपये टूटकर 1,47,800 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर आ गया है, जबकि इस गिरावट से पहले यह 1,54,238 रुपये पर कारोबार कर रहा था। सर्राफा बाजार में आई इस मंदी से आभूषण खरीदारों और निवेशकों को बड़ी राहत मिली है।
सोने के विभिन्न कैरेट में आई कमी और साप्ताहिक उतार-चढ़ाव
बाजार विश्लेषकों के मुताबिक, शुद्ध सोने के साथ-साथ जेवर बनाने में इस्तेमाल होने वाले 22 कैरेट सोने की कीमत भी घटकर 1,35,385 रुपये प्रति 10 ग्राम रह गई है, जो पूर्व में 1,41,282 रुपये दर्ज की गई थी। इसी तरह, 18 कैरेट सोने का दाम भी 1,15,679 रुपये से घटकर अब 1,10,850 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ चुका है। इस सप्ताह सोने के दामों में बड़ा उतार-चढ़ाव देखा गया, जहां 11 जून के सुबह के सत्र में सोना अपने न्यूनतम स्तर 1,44,782 रुपये पर पहुंच गया था, वहीं 9 जून को सुबह के कारोबार के दौरान यह 1,52,519 रुपये प्रति 10 ग्राम के उच्चतम स्तर पर था।
चांदी की कीमतों में बड़ा क्रैश और वैश्विक बाजार का हाल
सोने की तर्ज पर ही चांदी के खरीदारों के लिए भी यह सप्ताह मुनाफे वाला रहा, जहां चांदी की कीमतों में 14,326 रुपये प्रति किलोग्राम की बड़ी गिरावट आई है। इस गिरावट के बाद चांदी का भाव 2,56,908 रुपये से लुढ़ककर 2,42,582 रुपये प्रति किलो पर बंद हुआ। चांदी ने इस हफ्ते 11 जून की शाम को 2,32,591 रुपये का अपना सबसे निचला स्तर छुआ, जबकि 9 जून की शाम को यह 2,45,938 रुपये प्रति किलो के शिखर पर थी। वैश्विक बाजारों में चल रही उथल-पुथल के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सोना फिसलकर 4,248 डॉलर प्रति औंस और चांदी 68 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रही है।
बाजार में आई इस बड़ी गिरावट के मुख्य कारण और रिटर्न
कमोडिटी बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि कीमती धातुओं में आई इस मंदी की मुख्य वजह वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ने का डर और अमेरिका व ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों का रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचना है। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी किए जाने की संभावनाओं ने निवेशकों को अपनी संपत्तियों से मुनाफावसूली करने के लिए प्रेरित किया है। हालांकि, इस हालिया गिरावट के बावजूद पिछले एक साल में दोनों धातुओं ने निवेशकों को बंपर रिटर्न दिया है, जिसमें डॉलर के मूल्य में सोने ने 24 प्रतिशत से अधिक और चांदी ने 87 प्रतिशत से ज्यादा की शानदार बढ़त दर्ज की है।
इतनी दौलत कि कई देशों की अर्थव्यवस्था पड़ जाए छोटी, मस्क की संपत्ति चर्चा में
13 Jun, 2026 12:13 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली | टेस्ला के सीईओ एलन मस्क दुनिया के पहले 'ट्रिलियनेयर' बन गए हैं। स्पेसएक्स के रिकॉर्ड आईपीओ के बाद मस्क की कुल संपत्ति 1.11 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 105.45 लाख करोड़ रुपये) पहुंच गई है। यह संपत्ति पाकिस्तान जैसे देशों की कुल जीडीपी से दोगुनी से भी ज्यादा है।
स्पेसएक्स का मेगा आईपीओ बना टर्निंग पॉइंट
मस्क की रॉकेट कंपनी स्पेसएक्स ने शेयर बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ लाकर 75 अरब डॉलर जुटाए, जिससे कंपनी का मूल्यांकन 1.77 ट्रिलियन डॉलर हो गया। कंपनी में करीब आधी हिस्सेदारी होने के कारण मस्क की संपत्ति में अचानक 841 बिलियन डॉलर का इजाफा हो गया। हालांकि, विशेषज्ञों का एक धड़ा इसे केवल बाजार की 'हाइप' मान रहा है क्योंकि कंपनी ने अब तक कोई बड़ा सालाना मुनाफा दर्ज नहीं किया है।
दुनिया के शीर्ष अमीरों और देशों से बहुत आगे
एक ट्रिलियन डॉलर इतनी बड़ी रकम है कि यदि कोई व्यक्ति हर घंटे 9.5 करोड़ रुपये खर्च करे, तो भी इसे खत्म करने में 100 साल से ज्यादा लगेंगे। मस्क की नेटवर्थ अब ताइवान, सिंगापुर और स्वीडन जैसे कई देशों की कुल अर्थव्यवस्था से अधिक हो चुकी है। यदि दुनिया के अगले चार सबसे अमीर लोगों (जेफ बेजोस, लैरी पेज आदि) की संपत्ति को मिला भी दिया जाए, तो भी वह मस्क की अकेले की दौलत से कम बैठती है।
कंपनी पर नियंत्रण बरकरार और निवेशकों पर असर
इस आईपीओ के बाद भी स्पेसएक्स पर मस्क का दबदबा कायम रहेगा और उनके पास 82% वोटिंग अधिकार रहेंगे। नियमों के मुताबिक वे एक साल तक अपने शेयर नहीं बेच सकेंगे। इस बड़े आईपीओ के कारण नैस्डैक 100 जैसे प्रमुख इंडेक्स फंड्स ने अपने नियमों में ढील देकर इसे शामिल किया है, जिसका सीधा असर आम निवेशकों के रिटायरमेंट फंड पर पड़ेगा। चीन के निवेशकों को राष्ट्रीय सुरक्षा के चलते इसमें शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी।
16 महीने का रिकॉर्ड टूटा, महंगाई ने आम आदमी की चिंता बढ़ाई
13 Jun, 2026 11:13 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। चिलचिलाती धूप और तपन के बीच अब आम जनता की जेब भी महंगाई की आंच से झुलसने लगी है। शुक्रवार को जारी हुए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के आधिकारिक आंकड़ों ने स्पष्ट कर दिया है कि घरेलू बजट और रसोई का खर्च लगातार बेकाबू हो रहा है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा साझा की गई रिपोर्ट के अनुसार, मई महीने में खुदरा महंगाई दर उछलकर पिछले 16 महीनों के उच्चतम स्तर पर जा पहुंची है। इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह सोने-चांदी के आभूषणों की कीमतों में आया रिकॉर्ड उछाल और रसोई में इस्तेमाल होने वाले टमाटर व अदरक के दामों में आई तेजी है। अगर केवल खाद्य महंगाई की बात करें तो यह अप्रैल के 4.20 फीसदी से बढ़कर मई में 4.78 फीसदी पर पहुंच गई है।
खाने-पीने की वस्तुओं और व्यक्तिगत खर्चों में भारी उछाल
बाजार विश्लेषकों के मुताबिक, इस समय आम आदमी के बजट को बिगाड़ने में खान-पान की चीजों और पर्सनल केयर (व्यक्तिगत रखरखाव) से जुड़े खर्चों का सबसे बड़ा हाथ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, व्यक्तिगत देखभाल, सामाजिक सुरक्षा और अन्य विविध सेवाओं की श्रेणी में सालाना आधार पर 18.46 प्रतिशत की ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई है। इसके अतिरिक्त, होटल व रेस्टोरेंट की सेवाएं 5.75 प्रतिशत और पान-तंबाकू जैसी वस्तुएं 4.83 प्रतिशत तक महंगी हुई हैं, जिसने मध्यमवर्गीय परिवारों की मासिक वित्तीय योजना को पूरी तरह प्रभावित किया है।
आभूषणों और टमाटर-अदरक के दामों में लगी आग
बाजार में कुछ चुनिंदा चीजों के दामों ने उपभोक्ताओं को सबसे ज्यादा परेशान किया है। इस सूची में सबसे ऊपर चांदी के गहने हैं, जिनकी कीमतों में पिछले साल के मुकाबले 155.23 प्रतिशत की रेकॉर्ड तोड़ तेजी आई है। वहीं, रसोई का मुख्य हिस्सा माना जाने वाला टमाटर 48.43 प्रतिशत महंगा हो चुका है। सोने, हीरे और प्लेटिनम के आभूषणों की महंगाई दर भी 40.93 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जबकि अदरक के दाम 32.49 प्रतिशत और किशमिश-मुनक्का जैसे सूखे मेवे 21.97 प्रतिशत तक तेज हो गए हैं। हालांकि, इस चौतरफा मार के बीच आलू (-23.71%), हरी मटर (-11.47%), कार व जीप (-7.19%), जीरा (-4.59%) और दोपहिया वाहन (-3.56%) के दामों में गिरावट आने से कुछ राहत जरूर मिली है।
शहरी इलाकों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ी तपन
आंकड़ों का एक अन्य चिंताजनक पहलू यह है कि इस बार शहरों की तुलना में गांवों के लोग महंगाई से अधिक प्रताड़ित हो रहे हैं। बीते महीने ग्रामीण क्षेत्रों में खुदरा महंगाई दर 4.25 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 3.53 प्रतिशत रहा। इसी तरह ग्रामीण इलाकों में खाद्य महंगाई भी बढ़कर 4.85 प्रतिशत हो गई है, जो शहरों में 4.66 प्रतिशत है। राज्यों की बात करें तो देश में सबसे ज्यादा महंगाई तेलंगाना (6.15%) और तमिलनाडु (5.11%) में देखी गई, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 3.97% और देश की राजधानी दिल्ली में सबसे कम 2.50% रिकॉर्ड की गई। ग्रामीण इलाकों में बढ़ती इस आर्थिक तंगी के चलते कपड़े, जूते, मोबाइल और रोजमर्रा के सामानों की मांग घटने की आशंका है, जिससे आने वाले दिनों में बड़ी कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है।
3.93% पर पहुंची रिटेल महंगाई, रोजमर्रा के बजट पर पड़ेगा असर
12 Jun, 2026 04:39 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। देश में रोजमर्रा के खाद्य उत्पादों और ईंधन की कीमतों में आई हालिया तेजी के कारण खुदरा मुद्रास्फीति (रिटेल महंगाई दर) का ग्राफ एक बार फिर ऊपर की तरफ बढ़ गया है। शुक्रवार को जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मई महीने में देश की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 3.93% के स्तर पर पहुंच गई है। हालांकि, राहत की बात यह है कि बाजार में आई इस तेजी के बावजूद महंगाई का यह आंकड़ा लगातार 16वें महीने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा निर्धारित 4% की संतोषजनक विनियामक सीमा के भीतर बना हुआ है। सरकार की ओर से जारी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के ये आंकड़े स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि वैश्विक स्तर पर विशेष रूप से पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं का सीधा असर अब भारतीय उपभोक्ताओं की घरेलू रसोई और जेब पर साफ तौर पर दिखने लगा है।
अप्रैल के मुकाबले मई में दर्ज हुई बड़ी बढ़त
सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि मई महीने की खुदरा महंगाई दर ने अप्रैल के 3.48% के स्तर से एक लंबी छलांग लगाई है और यह सीधे 3.93% पर जा पहुंची है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सीपीआई (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) की गणना श्रृंखला में हाल ही में किए गए ढांचागत बदलावों के बाद से अब तक की यह सबसे बड़ी और उच्चतम रीडिंग दर्ज की गई है। इस वृद्धि का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आया उतार-चढ़ाव और घरेलू स्तर पर चुनिंदा खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आई मौसमी तेजी को माना जा रहा है, जिसने खुदरा बाजार के रुख को बदल दिया है।
आरबीआई के निर्धारित बजटीय लक्ष्य के भीतर आंकड़े
महंगाई के इस बढ़ते ग्राफ के बीच आम आदमी और नीति निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी तसल्ली यह है कि यह आंकड़ा अब भी केंद्रीय बैंक के नियंत्रण दायरे में है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक को देश की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए खुदरा महंगाई दर को 4% के मानक स्तर से नीचे रखने का वैधानिक लक्ष्य सौंपा हुआ है, जिसमें परिस्थितियों के अनुसार 2% का ऊपरी और निचला मार्जिन (टोलरेंस बैंड) शामिल किया गया है। वर्तमान में 3.93% की दर पर होने के कारण यह केंद्रीय बैंक के लिए नीतिगत ब्याज दरों (रेपो रेट) की समीक्षा करते समय बहुत अधिक आक्रामक रुख अपनाने के दबाव को कम करती है।
पश्चिम एशिया के संकट का घरेलू बाजार पर सीधा असर
बाजार विश्लेषकों का स्पष्ट अनुमान है कि पश्चिम एशिया क्षेत्र में जारी सैन्य और राजनीतिक गतिरोध के चलते वैश्विक व्यापारिक मार्गों पर माल ढुलाई की लागत में भारी इजाफा हुआ है। इस वैश्विक संकट के कारण भारत आयातित खाद्य तेलों, ईंधनों और अन्य आवश्यक कच्चे माल के लिए अधिक भुगतान कर रहा है, जिसका संचयी प्रभाव देश के भीतर खुदरा वस्तुओं के अंतिम मूल्य संवर्धन पर दिखाई दे रहा है। यदि आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर यह तनाव और गहराता है, तो आगामी तिमाहियों में घरेलू बाजार के भीतर खुदरा महंगाई दर के इस 4% के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार करने की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।
Oil Impact: बढ़ती तेल कीमतों के बीच बैंक क्रेडिट ग्रोथ ने पकड़ी रफ्तार
12 Jun, 2026 04:32 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी तेजी ने न केवल आम उपभोक्ताओं की जेब पर असर डाला है, बल्कि औद्योगिक जगत का वित्तीय गणित भी बिगाड़ दिया है। वर्तमान वित्तीय वर्ष के शुरुआती दो महीनों के भीतर बैंकों में जमा राशि (डिपॉजिट) में गिरावट आने के बावजूद ऋण (क्रेडिट) की मांग में अप्रत्याशित उछाल दर्ज किया गया है। इस विपरीत रुख के कारण बैंकिंग प्रणाली में 'फंडिंग गैप' काफी बढ़ गया है, जिससे वित्तीय बाजारों में लिक्विडिटी (नकदी) की गंभीर किल्लत पैदा हो गई है। 31 मई तक लोन वितरण और जमा पूंजी के बीच की यह खाई बढ़कर लगभग 3.8 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गई है। बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि कर्ज की इस तेज मांग के पीछे मुख्य रूप से देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियां हैं, क्योंकि कच्चे तेल के दाम बढ़ने से उनके परिचालन मार्जिन पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और उन्हें अपनी तात्कालिक वित्तीय जरूरतों के लिए बैंकों से भारी कर्ज उठाना पड़ रहा है।
ऋण वितरण में रिकॉर्ड उछाल और जमा पूंजी में गिरावट
ताजा वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, 31 मई 2026 को समाप्त हुए पाक्षिक चक्र में बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ 17.7% के उच्च स्तर पर दर्ज की गई। यह चालू वित्त वर्ष का अब तक का सबसे उच्चतम स्तर होने के साथ-साथ जून 2024 के बाद से सालाना आधार पर देखी गई सबसे मजबूत वृद्धि भी है। 31 मार्च 2026 के बाद से बैंकों द्वारा दिए गए कुल बकाया कर्ज में 1.5 लाख करोड़ रुपये (0.7%) का इजाफा हुआ, जिससे कुल क्रेडिट का आंकड़ा 215.2 लाख करोड़ रुपये पर जा पहुंचा है। इसके विपरीत, इसी समयसीमा के भीतर बैंकों में जमा होने वाली धनराशि (डिपॉजिट) का ग्राफ नीचे गिरा है। मार्च के आखिर से अब तक कुल बैंक डिपॉजिट में 2.3 लाख करोड़ रुपये यानी 0.9% की कमी आई है, जिससे 31 मई 2026 तक कुल जमा राशि सिमटकर 260 लाख करोड़ रुपये रह गई है। इस तरह चालू वित्तीय वर्ष के महज दो महीनों में ही लोन और डिपॉजिट के बीच 3.8 लाख करोड़ रुपये का एक बड़ा अंतर पैदा हो गया है, जबकि इसके उलट बीते पूरे वित्त वर्ष के दौरान डिपॉजिट में 36.5 लाख करोड़ रुपये और क्रेडिट में 31.1 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो पहुंचा अपने उच्चतम स्तर के करीब
बैंकिंग क्षेत्र में जमा राशि की वृद्धि दर (डिपॉजिट ग्रोथ) में अमूमन बहुत बड़ा बदलाव नहीं देखा गया है और यह ऐतिहासिक रूप से 9% से 13% के दायरे में ही बनी हुई है। हालांकि, 31 मई 2026 तक जमा वृद्धि दर जहां 12.2% पर रुकी थी, वहीं यह ऋण वृद्धि दर (क्रेडिट ग्रोथ) के मुकाबले पूरे 5 प्रतिशत पीछे चल रही थी। इस असंतुलन के परिणामस्वरूप अक्टूबर 2025 के बाद से ही देश का 'क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो' (सीडी रेशियो) लगातार 80% के मनोवैज्ञानिक स्तर के पार बना हुआ है। मार्च 2026 के अंत में यह रेशियो 83% से अधिक के अपने रिकॉर्ड शिखर पर पहुंच गया था, जो कि मई 2026 के अंत तक मामूली गिरावट के साथ 82.8% पर दर्ज किया गया। तुलनात्मक रूप से देखें तो कोरोना महामारी के दौर में जब बाजार में नकदी की भारी बहुतायत थी, तब नवंबर 2021 में यह अनुपात गिरकर महज 69.6% के निचले स्तर पर आ गया था।
नकदी का संकट दूर करने के लिए बैलेंस शीट में फेरबदल
ऋण की इस निरंतर बढ़ती मांग को पूरा करने और बाजार में पूंजी का प्रवाह बनाए रखने के लिए व्यावसायिक बैंकों को अपनी बैलेंस शीट में बड़े रणनीतिक बदलाव करने पर मजबूर होना पड़ा है। बैंकों ने नए लोन बांटने के लिए फंड जुटाने के उद्देश्य से सरकारी प्रतिभूतियों (गवर्नमेंट सिक्योरिटीज) में किए जाने वाले अपने निवेश को काफी हद तक कम कर दिया है। यही वजह है कि जनवरी 2026 में ऐसी सरकारी होल्डिंग्स की ग्रोथ रेट गिरकर महज 2% के आसपास रह गई थी, हालांकि 31 मई 2026 तक इसमें मामूली सुधार देखा गया और यह 4.9% पर पहुंच गई। बांड और सरकारी निवेश में की जा रही यह कटौती स्पष्ट रूप से इस बात का संकेत है कि नई जमा पूंजी के अभाव में बैंकों को अपनी ब्लॉक लिक्विडिटी को हर हाल में फ्री करना पड़ रहा है, ताकि उद्योगों को दिए जाने वाले ऋण की रफ्तार प्रभावित न हो सके।
LPG ग्राहकों के लिए जरूरी खबर: घरेलू और कमर्शियल सिलेंडर के नए दाम जारी
12 Jun, 2026 12:35 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। देश भर के आम बजट पर एक बार फिर महंगाई का बोझ बढ़ गया है, जिससे रसोई का बजट पूरी तरह गड़बड़ा गया है। केंद्र सरकार और सरकारी तेल कंपनियों ने आम जनता के उपयोग वाले 14.2 किलोग्राम के घरेलू एलपीजी गैस सिलेंडर के दामों में 29 रुपये की सीधी बढ़ोतरी कर दी है। बढ़ी हुई ये नई कीमतें 7 जून 2026 से पूरे देश में प्रभावी हो चुकी हैं। हालांकि, उपभोक्ताओं के लिए आज राहत की बात यह रही कि आज के कारोबारी सत्र में घरेलू या व्यावसायिक (कमर्शियल) दोनों में से किसी भी सिलेंडर की कीमतों में कोई नया बदलाव नहीं किया गया है। वर्तमान दरों के अनुसार, देश की राजधानी दिल्ली में घरेलू एलपीजी सिलेंडर अब 942 रुपये में मिल रहा है, जबकि आर्थिक राजधानी मुंबई में इसकी कीमत 941.50 रुपये, कोलकाता में 968 रुपये और चेन्नई में 957.50 रुपये तय की गई है। बिहार की राजधानी पटना में रसोई गैस उपभोक्ताओं को सबसे ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ रही है, जहां एक सिलेंडर का भाव 1,031.50 रुपये पर पहुंच गया है, वहीं उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में यह 979.50 रुपये और राजस्थान के जयपुर में 945.50 रुपये के भाव पर बिक रहा है।
अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण बढ़े दाम
पेट्रोलियम मंत्रालय और तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल और गैस की बढ़ती इनपुट लागत के कारण घरेलू स्तर पर दाम बढ़ाना अपरिहार्य हो गया था। वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक उथल-पुथल से तेल कंपनियों पर वित्तीय घाटा लगातार बढ़ रहा था। विभिन्न व्यापारिक रिपोर्टों में यह दावा भी किया गया है कि हालिया 29 रुपये की इस बढ़ोतरी के बावजूद, सरकारी तेल कंपनियां खुदरा बाजार में आम उपभोक्ताओं को दिए जाने वाले प्रति घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर अब भी घाटा (अंडर-रिकवरी) झेल रही हैं, जिसे संतुलित करने का प्रयास किया जा रहा है।
कमर्शियल सिलेंडर की कीमतों में भी भारी उछाल
महंगाई की यह मार केवल घरेलू रसोई तक ही सीमित नहीं है, बल्कि व्यावसायिक इस्तेमाल वाले गैस सिलेंडरों पर भी इसका बड़ा असर देखा गया है। चालू महीने की 1 तारीख से ही 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की दरों में भी अलग-अलग राज्यों के टैक्स के आधार पर 42 रुपये से लेकर 54 रुपये तक का तगड़ा इजाफा किया गया था। इस मूल्य वृद्धि के बाद व्यावसायिक सिलेंडर की कीमतें दिल्ली में 3,113.50 रुपये, मुंबई में 3,067.50 रुपये, कोलकाता में 3,255.50 रुपये, चेन्नई में 3,283 रुपये, पटना में 3,400 रुपये और लखनऊ में 3,236 रुपये के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं। इस बढ़ोतरी का सीधा असर होटल, रेस्टोरेंट, ढाबा संचालकों और छोटे खाद्य व्यवसायियों की लागत पर पड़ेगा, जिससे बाहर खाना-पीना भी महंगा होने के आसार हैं।
उपभोक्ता ऐसे जान सकते हैं ताजा रेट
आमतौर पर देश में एलपीजी गैस सिलेंडरों के दामों की समीक्षा और निर्धारण प्रत्येक महीने के पहले दिन या विशेष परिस्थितियों में बीच महीने में किया जाता है। देश के विभिन्न राज्यों और दूर-दराज के शहरों में परिवहन लागत और स्थानीय शुल्कों की वजह से इन कीमतों में मामूली अंतर हो सकता है। गैस उपभोक्ता अपने क्षेत्र के सटीक और नए दामों की प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करने के लिए इंडेन (Indane), भारत गैस (Bharat Gas) और एचपी गैस (HP Gas) की आधिकारिक वेबसाइटों पर लॉग इन कर सकते हैं अथवा उनके द्वारा जारी अधिकृत मोबाइल एप्लीकेशन की मदद से अपने शहर की रेट लिस्ट देख सकते हैं।
सोना-चांदी खरीदने का प्लान है? पहले जान लें आज के नए रेट
12 Jun, 2026 12:26 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। यदि आप भी आने वाले दिनों में सोने या चांदी के आभूषण खरीदने का विचार बना रहे हैं, तो बाजार जाने से पहले आज के नए भावों पर नजर डालना आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। भारतीय सर्राफा बाजार में आज बहुमूल्य धातुओं की कीमतों में तेजी का रुख देखा जा रहा है। वैश्विक बाजारों में आई मजबूती और स्थानीय स्तर पर जेवरों की मांग बढ़ने के कारण सोने और चांदी के दाम काफी ऊंचे पायदान पर बने हुए हैं। देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में लगने वाले स्थानीय टैक्स, मेकिंग चार्ज और चुंगी के कारण सोने-चांदी की अंतिम खुदरा कीमतों में थोड़ा अंतर देखने को मिल सकता है, इसलिए ग्राहकों को हमेशा अपने शहर के भाव जांचकर ही खरीदारी करनी चाहिए।
मेट्रो शहरों में आज सोने की कीमतें
देश के प्रमुख महानगरों में शुद्धता के आधार पर सोने के दाम में मामूली उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के साथ-साथ लखनऊ, जयपुर और चंडीगढ़ में आज 24 कैरेट (शुद्ध) सोने की कीमत 1,45,790 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गई है, जबकि इन शहरों में 22 कैरेट आभूषण वाले सोने का भाव 1,33,650 रुपये और 18 कैरेट का दाम 1,09,380 रुपये प्रति 10 ग्राम चल रहा है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और पुणे के बाजारों में आज 24 कैरेट सोना 1,45,640 रुपये, 22 कैरेट 1,33,500 रुपये तथा 18 कैरेट 1,09,230 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर ट्रेंड कर रहा है। वहीं चेन्नई में सोने के दाम सबसे ऊंचे बने हुए हैं, जहां 24 कैरेट के लिए 1,47,280 रुपये और 22 कैरेट के लिए 1,35,000 रुपये प्रति 10 ग्राम चुकाने पड़ रहे हैं। बिहार की राजधानी पटना और मध्य प्रदेश के इंदौर में 24 कैरेट का भाव 1,45,690 रुपये दर्ज किया गया है।
चांदी के दामों में भी जोरदार उछाल
सोने की चमक बढ़ने के साथ-साथ आज चांदी के बाजार में भी भारी तेजी का रुख बना हुआ है। देश के अधिकांश बड़े शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, पटना, लखनऊ, इंदौर और अहमदाबाद में आज एक किलोग्राम चांदी का भाव 2,50,000 रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इन शहरों में 100 ग्राम चांदी की कीमत 25,000 रुपये और 10 ग्राम का रेट 2,500 रुपये बना हुआ है। वहीं, दक्षिण भारत के प्रमुख केंद्रों जैसे चेन्नई, हैदराबाद और केरल के साथ-साथ ओडिशा के भुवनेश्वर और कटक में चांदी की कीमतें थोड़ी और अधिक हैं। इन जगहों पर आज एक किलोग्राम चांदी का दाम 2,60,000 रुपये, 100 ग्राम का भाव 26,000 रुपये और 10 ग्राम की कीमत 2,600 रुपये दर्ज की गई है।
बाजार विशेषज्ञों ने बताई तेजी की मुख्य वजह
कमोडिटी बाजार के जानकारों और आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी भू-राजनीतिक संकट, वैश्विक आर्थिक मोर्चे पर बनी अनिश्चितता और अमेरिकी डॉलर के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने-चांदी की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त, घरेलू मोर्चे पर वैवाहिक सीजन की शुरुआत होने की वजह से सर्राफा दुकानों पर खरीदारों की भारी भीड़ उमड़ रही है, जिससे मांग और आपूर्ति का संतुलन प्रभावित हुआ है और कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। आम उपभोक्ता रोज बदलते इन दामों की सटीक और प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करने के लिए इंडियन बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं या अपने शहर के स्थानीय विश्वसनीय ज्वैलर्स से संपर्क साध सकते हैं।
90 दिन की रोक से मचेगी हलचल, जानिए किन लोगों को नहीं मिलेगा पेट्रोल-डीजल
12 Jun, 2026 12:17 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में जारी भू-राजनीतिक संकट और बढ़ते तनाव के बीच देश में ईंधन की खपत और उसकी उपलब्धता को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। यदि आप भी रोज वाहन चलाते हैं और पेट्रोल पंपों पर जाते हैं, तो यह खबर आपके लिए जानना बेहद जरूरी है। केंद्र सरकार ने एक बड़ा नीतिगत फैसला लेते हुए औद्योगिक (इंडस्ट्रियल), व्यावसायिक (कमर्शियल) और संस्थागत (इंस्टीट्यूशनल) उपभोक्ताओं के लिए रिटेल पेट्रोल पंपों से सीधे पेट्रोल और डीजल की खरीद पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी है। इस नए आदेश के मुताबिक, अब इन बड़े उपभोक्ताओं को अपनी दैनिक आवश्यकता का ईंधन केवल अधिकृत बल्क सेल पॉइंट्स (थोक बिक्री केंद्रों) से ही क्रय करना होगा। प्रशासन ने साफ किया है कि यह विशेष अस्थायी व्यवस्था आगामी 90 दिनों तक प्रभावी रहेगी।
यह कड़ा कदम उन चिन्हित क्षेत्रों में ईंधन की मांग में अचानक आई अप्रत्याशित तेजी को देखने के बाद उठाया गया है, जहां कई बड़े थोक खरीदार थोक केंद्रों को छोड़कर आम जनता के लिए बने रिटेल पेट्रोल पंपों से भारी मात्रा में डीजल खरीद रहे थे। वास्तव में, थोक और खुदरा कीमतों के बीच एक बहुत बड़ा अंतर पैदा हो गया था, जिसके चलते ये बड़े कॉरपोरेट और औद्योगिक यूजर्स रिटेल आउटलेट्स की तरफ रुख कर रहे थे। एक उदाहरण के तौर पर देखें तो देश की राजधानी दिल्ली में आम जनता के लिए पेट्रोल पंपों पर डीजल की खुदरा कीमत जहां 95.20 रुपये प्रति लीटर बनी हुई है, वहीं बल्क (थोक) मार्केट में यही डीजल 134.50 रुपये प्रति लीटर के भाव पर मिल रहा है। दोनों दरों के बीच प्रति लीटर लगभग 39 रुपये से अधिक का यह भारी अंतर ही बड़े खरीदारों को पेट्रोल पंपों से डीजल उठाने के लिए प्रेरित कर रहा था, जिससे उनके लिए यहां से तेल खरीदना कहीं ज्यादा किफायती साबित हो रहा था।
कंट्रोल प्राइसिंग और मिडिल ईस्ट संकट का असर
थोक और खुदरा दरों में इतना बड़ा फासला आने की मुख्य वजह यह है कि सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने आम उपभोक्ताओं को महंगाई की मार से बचाने के लिए रिटेल कीमतों को पूरी तरह नियंत्रित (कंट्रोल) रखा है। फरवरी महीने के अंतिम सप्ताह में मध्य पूर्व में भड़के संकट के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की लागत में भारी उछाल आया था, जिससे तेल कंपनियों की इनपुट कॉस्ट काफी बढ़ गई थी। हालांकि, सरकार के निर्देश पर इस बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ आम जनता की जेब पर नहीं डाला गया और खुदरा कीमतें स्थिर रखी गईं, जबकि थोक बाजार की कीमतें अंतरराष्ट्रीय मार्केट के अनुसार बढ़ा दी गईं।
खुदरा पेट्रोल पंपों पर सुचारू सप्लाई का लक्ष्य
पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि इस प्रतिबंधात्मक निर्णय का मुख्य उद्देश्य देश के भीतर ईंधन की देशव्यापी आपूर्ति व्यवस्था को पूरी तरह संतुलित और सुचारू बनाए रखना है। सरकार के इस कदम से सबसे बड़ी राहत आम उपभोक्ताओं को मिलेगी, क्योंकि बड़े व्यावसायिक वाहनों और उद्योगों के पेट्रोल पंपों पर न आने से खुदरा आउटलेट्स पर ईंधन की किल्लत नहीं होगी। इससे आम जनता के लिए पेट्रोल-डीजल की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित होगी और खुदरा सप्लाई चेन पर पड़ रहा अतिरिक्त लॉजिस्टिक दबाव भी काफी हद तक कम हो जाएगा।
90 दिनों की अवधि के बाद होगी समीक्षा
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल यह प्रतिबंध केवल अगले तीन महीनों के लिए लगाया गया है। इस 90 दिनों की अवधि के दौरान तेल मंत्रालय और फॉरेंसिक टीमें देश भर के पेट्रोल पंपों पर होने वाली बिक्री के आंकड़ों की लगातार निगरानी करेंगी। यदि कोई रिटेल पेट्रोल पंप संचालक किसी औद्योगिक या कमर्शियल वाहन को नियमों के विरुद्ध जाकर भारी मात्रा में ईंधन बेचता हुआ पाया गया, तो उसका लाइसेंस रद्द करने जैसी सख्त वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। तीन महीने पूरे होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति और घरेलू स्टॉक की समीक्षा कर इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने या हटाने पर विचार किया जाएगा।
क्रूड कीमतों में नरमी से शेयर बाजार को मिला बूस्ट, सेंसेक्स ने लगाई छलांग
12 Jun, 2026 12:05 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई। शुक्रवार की सुबह भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों के लिए बेहद मंगलमय और मुनाफे से भरी रही। पिछले कारोबारी सत्र में देखी गई मंदी और सुस्ती के बाद आज दलाल स्ट्रीट पर खरीदारों ने पूरी ताकत झोंक दी, जिससे बाजार में चौतरफा रौनक लौट आई। अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिल रहे बेहतर रुझानों, अमेरिका और ईरान के मध्य शांति वार्ता सफल होने की बढ़ती संभावनाओं तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के दामों में आई गिरावट ने घरेलू बाजार के सेंटिमेंट को पूरी तरह बदल दिया है। इन सकारात्मक वैश्विक बदलावों के कारण निवेशकों का भरोसा काफी मजबूत हुआ है, जिसके चलते बाजार खुलते ही दोनों प्रमुख बेंचमार्क सूचकांकों ने एक बड़ी छलांग लगाई।
शुरुआती कारोबार में ही लिवाली का यह दौर इतना तेज था कि सुबह 9:36 बजे तक बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स 870.98 अंक यानी 1.17 प्रतिशत की जोरदार बढ़त दर्ज करते हुए 74,703.53 के स्तर पर जा पहुंचा। वहीं दूसरी ओर, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी भी पूरी रफ्तार से आगे बढ़ा और 23,400 के मनोवैज्ञानिक स्तर के बिल्कुल नजदीक पहुंचते हुए 23,396.25 के अंक पर ट्रेंड करता नजर आया। दोनों बड़े इंडेक्स में एक फीसदी से अधिक का यह उछाल साफ तौर पर दिखाता है कि ट्रेडर्स इस समय बाजार में आक्रामक होकर निवेश कर रहे हैं।
रीयल्टी और ऑटो शेयर्स में दिखी सबसे ज्यादा चमक
आज की इस शानदार तेजी की विशेष बात यह रही कि यह किसी एक विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं थी, बल्कि बाजार के लगभग सभी सेक्टर्स में निवेशकों ने जमकर पैसा लगाया। इस बड़ी रैली की कमान मुख्य रूप से रीयल्टी इंडेक्स ने संभाली, जिसने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया। रीयल्टी के अलावा ऑटोमोबाइल, मीडिया और फाइनेंशियल सर्विसेज के शेयरों में भी तगड़ी खरीदारी दर्ज की गई, जो यह प्रमाणित करती है कि घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़ी थीम्स को लेकर निवेशक काफी उत्साहित हैं। बैंकिंग सेक्टर के दिग्गज शेयरों ने भी सूचकांक को ऊपर ले जाने में बड़ा योगदान दिया, जबकि एफएमसीजी, फार्मा और हेल्थकेयर जैसे सुरक्षित माने जाने वाले सेक्टर्स में भी निरंतर बढ़त का रुख बना रहा। हालांकि, इस पूरे उल्लास के बीच सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र के शेयरों में आज चमक थोड़ी फीकी रही और यह सेक्टर केवल मामूली बढ़त ही बना सका।
वैश्विक बाजारों की हरियाली से मिला भरपूर सहारा
भारतीय शेयर बाजार की इस बंपर तेजी को दुनिया भर के अन्य प्रमुख बाजारों से मिल रहे मजबूत आंकड़ों का भी पूरा सहयोग मिला है। आज सुबह से ही एशियाई और यूरोपीय बाजारों के वायदा (फ्यूचर्स) में सकारात्मक माहौल देखा गया, जहां जापान का टोपिक्स सूचकांक 1.4 प्रतिशत और ऑस्ट्रेलिया का एसएंडपी/एएसएक्स 200 इंडेक्स 1.5 प्रतिशत की शानदार बढ़त के साथ कारोबार कर रहे थे। वहीं हांगकांग के हैंग सेंग फ्यूचर्स में भी 0.9 फीसदी की मजबूती दर्ज की गई। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी बाजार के एसएंडपी 500 फ्यूचर्स में 0.2 प्रतिशत और यूरोपीय बाजार के यूरो स्टॉक्स 50 फ्यूचर्स में 0.5 प्रतिशत की तेजी देखी गई, जिसने भारतीय निवेशकों के हौसले को और बुलंद कर दिया।
कच्चे तेल में नरमी से निवेशकों ने ली राहत की सांस
वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक मोर्चे से आ रही सकारात्मक खबरों, विशेषकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की उम्मीदों ने कच्चे तेल की कीमतों को नीचे ला दिया है, जिससे भारत जैसी बड़ी तेल आयातक अर्थव्यवस्था के लिए चिंताओं के बादल छंट गए हैं। भारतीय शेयर बाजार के सभी सेक्टर्स में आज जो हरियाली छाई हुई है, वह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि निवेशक आने वाले समय के लिए बाजार के दृष्टिकोण को लेकर बेहद आश्वस्त हैं। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां इसी प्रकार अनुकूल और स्थिर बनी रहती हैं, तो आने वाले दिनों में दलाल स्ट्रीट का यह सकारात्मक और मजबूत मोमेंटम नए रिकॉर्ड बना सकता है।
घरेलू और कमर्शियल गैस सिलेंडर के नए रेट जारी, कीमतों में नहीं हुआ कोई बदलाव
11 Jun, 2026 03:56 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। देश की सरकारी तेल कंपनियों ने आज 11 जून 2026 को रसोई गैस (एलपीजी) के दामों में किसी भी तरह का फेरबदल नहीं किया है। इससे पहले कंपनियों ने बीते 7 जून को घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों में 29 रुपये की वृद्धि की थी, जिसके बाद से ही पूरे देश में ईंधन की दरें यथावत बनी हुई हैं। ताजा समीक्षा के बाद राजधानी दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमत अब बढ़कर 942 रुपये के स्तर पर पहुंच गई है, जो इस बढ़ोतरी से पहले 913 रुपये पर उपलब्ध था। महानगरों और प्रमुख राज्यों की राजधानियों में उपभोक्ताओं को नए रेट कार्ड के अनुसार ही भुगतान करना पड़ रहा है।
महानगरों में रसोई गैस के दाम और उज्ज्वला योजना की राहत
हालिया वृद्धि के बाद अगर विभिन्न शहरों में घरेलू सिलेंडर (14.2 किलोग्राम) की कीमतों पर नजर डालें तो मुंबई में यह 941.50 रुपये, कोलकाता में 968 रुपये, चेन्नई में 957.50 रुपये, पटना में 1,031.50 रुपये, लखनऊ में 979.50 रुपये और जयपुर में 945.50 रुपये में मिल रहा है। दूसरी ओर, व्यावसायिक (कमर्शियल) गतिविधियों में इस्तेमाल होने वाले 19 किलोग्राम के गैस सिलेंडर के दाम भी 1 जून को हुई बढ़ोतरी के बाद से काफी ऊंचे बने हुए हैं, जिसके तहत दिल्ली में व्यावसायिक सिलेंडर 3,113.50 रुपये, मुंबई में 3,067.50 रुपये और पटना में 3,400 रुपये का बिक रहा है। हालांकि, इस महंगाई के बीच प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के पात्र परिवारों के लिए राहत की बात यह है कि उन्हें सरकार की तरफ से मिलने वाली 300 रुपये की सब्सिडी जारी है, जिससे दिल्ली में उन्हें यह सिलेंडर महज 642 रुपये के आसपास पड़ रहा है।
वैश्विक ऊर्जा संकट और बढ़ती लागत के कारण बढ़ी कीमतें
पेट्रोलियम मंत्रालय और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में आई भारी तेजी के चलते घरेलू स्तर पर भी कीमतें बढ़ाना अपरिहार्य हो गया था। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं और विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव के कारण लागत का बोझ सीधे तौर पर खुदरा कीमतों पर पड़ा है। तेल कंपनियों के अनुसार, हर महीने अंतरराष्ट्रीय बाजार के रुख और वैश्विक कीमतों की गहन समीक्षा की जाती है, जिसके आधार पर ही घरेलू स्तर पर नई खुदरा दरें निर्धारित की जाती हैं। आम नागरिक एलपीजी की इन दैनिक व मासिक दरों को इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर आसानी से देख सकते हैं।
रसोई के बजट पर सीधा प्रहार और खाद्य सामग्री महंगी होने के आसार
मार्च और जून के महीनों में क्रमिक रूप से की गई इस मूल्य वृद्धि ने आम आदमी के मासिक बजट को पूरी तरह से असंतुलित कर दिया है, जिसका सीधा असर मध्यमवर्गीय परिवारों के किचन पर पड़ रहा है। घरेलू गैस के महंगे होने से जहां गृहणियों को घर चलाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम तीन हजार रुपये के पार बने रहने से होटल, रेस्टोरेंट, कैफे और ढाबा संचालकों की परिचालन लागत काफी बढ़ गई है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि व्यावसायिक ईंधन की इस तपिश के कारण आने वाले दिनों में बाहर खाना-पीना और विभिन्न खाद्य सामग्रियां भी महंगी हो सकती हैं, जिसका अंतिम भार आम उपभोक्ताओं की जेब पर ही पड़ेगा।
भारत में बढ़ रहे गोल्ड रेट, लेकिन इन देशों में सस्ता मिलता है सोना; वजह भी जानिए
11 Jun, 2026 03:49 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में केवल कच्चे तेल की कीमतें ही नहीं सुलग रही हैं, बल्कि सुरक्षित निवेश के रूप में सोने और चांदी के दामों में भी ऐतिहासिक तेजी देखी जा रही है। घरेलू बाजार में 8 जून 2026 को 24 कैरेट शुद्ध सोने की कीमत लगभग 1.53 लाख रुपये से 1.56 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई, जबकि आभूषणों के लिए उपयोग होने वाला 22 कैरेट सोना भी करीब 1.40 लाख रुपये से 1.45 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के बीच बिकता नजर आया। कीमती धातुओं के आसमान छूते भावों के बीच आम उपभोक्ताओं और निवेशकों के मन में यह कौतूहल अक्सर रहता है कि आखिर वैश्विक स्तर पर वह कौन सी जगहें हैं जहां सबसे किफायती दामों पर सोना खरीदा जा सकता है। यद्यपि वैश्विक बाजार में सोने की मूल दरें लगभग एक समान ही तय होती हैं, परंतु विभिन्न देशों की कर प्रणालियां, वैट (VAT), सीमा शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी) और आभूषण निर्माण शुल्क (मेकिंग चार्ज) के अंतर के चलते खुदरा बाजार की अंतिम कीमतें बदल जाती हैं।
दुनिया के ये 5 देश जहां मिलता है सबसे किफायती सोना
वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो कुछ चुनिंदा देश अपनी उदार कर नीतियों के कारण सोना खरीदने के लिए सबसे मुफीद माने जाते हैं। इस सूची में पहला नाम संयुक्त अरब अमीरात के 'दुबई' शहर का आता है, जिसे वैश्विक स्वर्ण बाजार का मुख्य केंद्र माना जाता है; यहां बेहद कम टैक्स और आभूषण विक्रेताओं के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते कीमतें भारत से काफी कम रहती हैं। दूसरा स्थान 'हांगकांग' का है, जहां सोने के व्यापार पर कर की दरें न्यूनतम रखी गई हैं। तीसरे नंबर पर 'सिंगापुर' है, जो निवेश के योग्य शुद्ध सोने (इन्वेस्टमेंट-ग्रेड गोल्ड) पर करों में भारी छूट प्रदान करता है। चौथे पायदान पर दुनिया का सबसे बड़ा गोल्ड रिफाइनिंग हब 'स्विट्जरलैंड' है, जो अपनी बेजोड़ शुद्धता और आकर्षक मूल्य निर्धारण के लिए विख्यात है। वहीं पांचवें स्थान पर 'सऊदी अरब' आता है, जहां कम मेकिंग चार्ज और सीमित कर व्यवस्था के कारण भारतीय बाजार के मुकाबले सोना काफी सस्ता मिल जाता है।
इन कारणों से भारतीय बाजार में लगातार महंगी हो रही है पीली धातु
सस्ते विदेशी बाजारों के विपरीत भारत में सोने की कीमतें हमेशा ऊंचे स्तर पर बनी रहने के पीछे कई महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक कारण जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत अपनी घरेलू खपत और आभूषण उद्योग की मांग को पूरा करने के लिए मुख्य रूप से विदेशी आयात पर ही निर्भर रहता है। जब यह सोना देश में आता है, तो इस पर भारी-भरकम आयात शुल्क (कस्टम ड्यूटी), माल एवं सेवा कर (जीएसटी), सुरक्षित परिवहन की लागत और फिर स्थानीय स्तर पर आभूषणों की ढलाई का मेकिंग चार्ज जुड़ जाता है, जिससे इसकी लागत कई गुना बढ़ जाती है। इन करों के अलावा, भारतीय समाज में शादी-ब्याह के सीजन, पारंपरिक त्योहारों और अक्षय तृतीया जैसे खास मौकों पर सोने की मांग में अचानक आने वाला भारी उछाल भी स्थानीय स्तर पर कीमतों को लगातार तेज बनाए रखता है।
विदेश से सोना लाने के नियम और सीमा शुल्क का ध्यान रखना जरूरी
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोने की कम कीमतें देखकर अक्सर भारतीय पर्यटकों और प्रवासियों के मन में वहां से भारी मात्रा में खरीदारी करने का विचार आता है, लेकिन जानकारों का कहना है कि यह बचत उतनी आसान नहीं है जितनी दिखाई देती है। यदि कोई भारतीय नागरिक विदेशी धरती से सस्ता सोना खरीदकर देश में लाता है, तो भारतीय हवाई अड्डों पर सीमा शुल्क विभाग (कस्टम) के कड़े नियम और ड्यूटी दरें लागू होती हैं। भारत सरकार द्वारा निर्धारित मुफ्त भत्ता सीमा (फ्री बैगेज अलाउंस) से अधिक मूल्य का सोना लाने पर भारी टैक्स चुकाना पड़ता है, जो कई बार विदेशी बाजार से मिली छूट से भी ज्यादा हो जाता है। इसलिए किसी भी देश से सोने के आभूषण या बार खरीदने से पहले भारतीय कस्टम्स के नियमों और देश में लैंडिंग के बाद लगने वाली कुल वास्तविक लागत का सटीक आकलन करना बेहद अनिवार्य है।
अमेरिकी शुल्क में कमी का असर, भारतीय टेक्सटाइल कंपनियों को मिल रहा फायदा
11 Jun, 2026 03:31 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई। वैश्विक स्तर पर मांग में आए सकारात्मक उछाल और अमेरिकी आयात शुल्क से जुड़ी अनिश्चितताएं समाप्त होने के चलते भारतीय टेक्सटाइल (कपड़ा) उद्योग अब एक मजबूत सुधार के दौर में कदम रख चुका है। बाजार विश्लेषकों की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, कपड़ा क्षेत्र के बुनियादी सिद्धांतों में आया सुधार, मांग की स्पष्टता और सरकार की अनुकूल नीतियां इस उद्योग के लिए नए आशावाद का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव फरवरी 2026 के अंत में देखने को मिला, जब भारतीय कपड़ा उत्पादों पर लगने वाले अमेरिकी शुल्कों को 50 प्रतिशत से घटाकर सीधे 10 प्रतिशत के स्तर पर ला दिया गया। अमेरिका द्वारा पूर्व में लगाए गए इन दंडात्मक और प्रतिशोधात्मक शुल्कों के हटने से भारतीय निर्यातकों को बहुत बड़ी राहत मिली है, जिससे न केवल व्यापार सामान्य हुआ है बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात की मात्रा भी स्थिर हुई है।
अमेरिकी शुल्क कटौती से बहाल हुई वैश्विक प्रतिस्पर्धा
अमेरिकी बाजार में आया यह नीतिगत बदलाव भारतीय कपड़ा क्षेत्र के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो रहा है। इससे पहले दंडात्मक शुल्कों की वजह से भारतीय वस्त्रों पर कुल कर का बोझ 65 से 69 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जिसने भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजार में काफी महंगा बना दिया था। अब इन भारी-भरकम शुल्कों के हटने से भारतीय निर्यातकों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी खोई हुई प्रतिस्पर्धात्मकता फिर से हासिल कर ली है। इसके साथ ही अमेरिकी बाजार में जो मांग लंबे समय से थमी हुई थी, वह अब तेजी से बाहर आ रही है, जिसके कारण भारतीय उत्पादों के क्रय आदेशों (ऑर्डर्स) में भारी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।
उत्पादन दक्षता में वृद्धि और कताई खंड के बुनियादी ढांचे में सुधार
उद्योग के आंतरिक ढांचे की बात करें तो कताई (स्पिनिंग) खंड में क्षमता का बड़े पैमाने पर समेकन हुआ है, जिसने परिचालन और उत्पादन की दक्षता को काफी बढ़ा दिया है। इसके अलावा कच्चे कपास की कीमतों में आई स्थिरता ने भारतीय निर्माताओं की लागत प्रतिस्पर्धा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोबारा मजबूत किया है। यार्न (धागे) के प्रसार और विपणन में देखे जा रहे इस तेज सुधार ने पूरी टेक्सटाइल वैल्यू चेन (मूल्य श्रृंखला) के मुनाफे को बढ़ा दिया है। आंतरिक रूप से मजबूत हुए ये बुनियादी सिद्धांत भारतीय निर्माताओं को भविष्य की बड़ी वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए एक बेहद ठोस और सुरक्षित धरातल प्रदान कर रहे हैं।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत का बढ़ता दबदबा और मुक्त व्यापार समझौते
भारत इस समय ब्रिटेन (यूके), यूरोपीय संघ (ईयू) और ऑस्ट्रेलिया जैसे दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) को अंतिम रूप देने में जुटा है, जो इस उद्योग को एक मजबूत ढांचागत संबल देंगे। दूसरी तरफ, वैश्विक खरीदार अब अपनी आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा के लिए बांग्लादेश और कंबोडिया जैसे पारंपरिक शुल्क-मुक्त देशों पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को कम कर रहे हैं। वे चीन के विकल्प के रूप में अपनी सोर्सिंग में विविधता लाना चाहते हैं, जिसमें भारत एक भरोसेमंद और दीर्घकालिक सोर्सिंग हब के रूप में उभर रहा है। मजबूत घरेलू मांग और अनुशासित पूंजी निवेश के बल पर यह क्षेत्र स्थायी विकास के लिए पूरी तरह तैयार है, हालांकि जानकारों का मानना है कि निवेशकों को कपास की कीमतों की भविष्य की चाल पर भी नजर रखनी होगी।
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