व्यापार
महंगाई ने फिर बढ़ाई चिंता, Petrol-Diesel और LPG के ताजा रेट्स देखें
29 Jun, 2026 11:13 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली: देश के आम नागरिक के मासिक बजट पर एक साथ कई अलग-अलग मोर्चों से आर्थिक दबाव बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। एक तरफ जहाँ अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों ने एक बार फिर से तेज रफ्तार पकड़ ली है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय घरेलू बाजार में भी ईंधन के दाम पहले से ही अपने रिकॉर्ड स्तर पर मजबूती से टिके हुए हैं। इसके साथ ही रसोई गैस (एलपीजी) सिलेंडर की ऊंची कीमतों ने आम उपभोक्ताओं की कमर तोड़ दी है। हालत यह हो चुकी है कि माल ढुलाई और ट्रांसपोर्टेशन का खर्च बढ़ने की वजह से अब रोजाना के सामानों की कीमतें भी प्रभावित हो रही हैं, जिससे देश के मध्यम वर्ग के किचन से लेकर गाड़ी चलाने तक का हर खर्च सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है।
देश के महानगरों में ईंधन की कीमतों का पुराना रिकॉर्ड बरकरार
भारत के प्रमुख महानगरों में रहने वाले लोगों को पेट्रोल और डीजल की रोजाना बढ़ती-घटती कीमतों से फिलहाल कोई बड़ी राहत मिलती नजर नहीं आ रही है। अगर देश की राजधानी दिल्ली की बात करें, तो यहाँ पेट्रोल की कीमत लगभग 102 रुपये प्रति लीटर के आसपास बनी हुई है, जबकि डीजल का भाव भी 89 रुपये प्रति लीटर के बेहद करीब टिका हुआ है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में तो हालात और भी ज्यादा खराब हैं, जहाँ आम जनता को एक लीटर पेट्रोल के लिए 111 रुपये से अधिक और डीजल के लिए करीब 97 रुपये का भारी भुगतान करना पड़ रहा है। भले ही तेल कंपनियां रोज कीमतों में कोई नया बड़ा उछाल नहीं कर रही हों, लेकिन इनका वर्तमान का यह उच्चतम स्तर ही आम लोगों के मासिक बजट को बिगाड़ने के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।
कोलकाता से चेन्नई तक महंगाई का बढ़ता दायरा
ईंधन की इस बेलगाम महंगाई का असर सिर्फ दिल्ली-मुंबई तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य बड़े शहरों में भी आम आदमी को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। कोलकाता और चेन्नई जैसे प्रमुख शहरों में भी पेट्रोल की खुदरा कीमतें 107 रुपये से लेकर 113 रुपये प्रति लीटर के बेहद ऊंचे दायरे में घूम रही हैं। इसके साथ ही इन दोनों शहरों में डीजल का भाव भी 94 रुपये से लेकर 99 रुपये प्रति लीटर के बीच बना हुआ है। जानकारों का मानना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी नहीं आती या सरकार टैक्स में कोई बड़ी कटौती नहीं करती, तब तक आम उपभोक्ताओं को इस चौतरफा महंगाई की मार से राहत मिलने की उम्मीद बेहद कम है।
ITR फाइल नहीं कर पाए? जानिए कैसे अब भी वापस मिलेगा आपका TDS रिफंड
29 Jun, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली: क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है कि किसी साल का इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरने की आखिरी तारीख निकल गई और आपका टीडीएस (TDS) फंसा रह गया? ऐसे में ज्यादातर नौकरीपेशा और आम टैक्सपेयर्स को यही लगता है कि जो पैसा एडवांस टैक्स के रूप में कट चुका है, वह अब हमेशा के लिए डूब गया।
लेकिन राहत की बात यह है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। अगर समय सीमा खत्म हो चुकी है, तब भी आप अपना टीडीएस रिफंड वापस पा सकते हैं। हालांकि, इसके लिए आपको सही कानूनी रास्ता पता होना बेहद जरूरी है। आइए जानते हैं कि बिना उलझन के आप अपना पैसा कैसे वापस निकाल सकते हैं।
अपडेटेड ITR (U-ITR) की गलती न करें
अक्सर लोग सलाह देते हैं कि अगर पुरानी डेडलाइन छूट गई है, तो इनकम टैक्स एक्ट की धारा 139(8A) के तहत 'अपडेटेड आईटीआर' भर दें। नियम कहता है कि आप पिछले चार सालों का अपडेटेड रिटर्न भर सकते हैं, लेकिन इसमें एक बड़ा पेंच है। नियम के मुताबिक, आप अपडेटेड आईटीआर सिर्फ तब भर सकते हैं जब आपको अतिरिक्त टैक्स देना हो। अगर आपको सरकार से रिफंड (Refund) लेना है या आपकी टैक्स देनदारी शून्य है, तो आप अपडेटेड आईटीआर दाखिल नहीं कर सकते।
इसके साथ ही, पिछले साल का टीडीएस आप नए वित्तीय वर्ष के रिटर्न में भी क्लेम नहीं कर सकते। हर साल के टीडीएस का हिसाब उसी साल के रिटर्न में देना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
धारा 119(2)(b): फंसा हुआ पैसा निकालने की 'जादुई चाबी'
जब सामान्य रिटर्न की तारीख निकल जाए और अपडेटेड आईटीआर भी काम न आए, तब काम आती है इनकम टैक्स कानून की धारा 119(2)(b)।
यह धारा सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस (CBDT) को यह विशेष अधिकार देती है कि वह उन टैक्सपेयर्स की मदद करे जो किसी ठोस वजह से समय पर अपना रिटर्न नहीं भर पाए थे। सीबीडीटी के हालिया नियमों के अनुसार, अगर आपके पास देरी से रिटर्न भरने का कोई वाजिब कारण है, तो आप 'कॉन्डोनशेन ऑफ डिले' (देरी के लिए माफी) की अर्जी लगा सकते हैं।
अर्जी मंजूर होने की दो मुख्य शर्तें:
ठोस और वास्तविक कारण: आपको टैक्स विभाग को संतुष्ट करना होगा कि आप किसी गंभीर बीमारी, दुर्घटना या किसी बड़े संकट के कारण समय पर आईटीआर नहीं भर पाए थे।
आर्थिक नुकसान की बात: आपको यह साबित करना होगा कि अगर विभाग ने आपको रिफंड की अनुमति नहीं दी, तो आपको भारी वित्तीय नुकसान या कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।
स्टेप-बाय-स्टेप समझें: कैसे आएगा आपका रिफंड?
अगर आप इस प्रक्रिया के तहत अपना टीडीएस वापस पाना चाहते हैं, तो आपको इन चरणों का पालन करना होगा:
माफी की अर्जी दें: सबसे पहले आपको धारा 119(2)(b) के तहत संबंधित इनकम टैक्स कमिश्नर या अथॉरिटी के पास देरी के लिए माफी की ऑनलाइन एप्लीकेशन सबमिट करनी होगी।
आदेश (Order) का इंतजार करें: टैक्स अधिकारी आपकी एप्लीकेशन और दिए गए कारणों की जांच करेंगे। अगर वे आपकी बात से संतुष्ट होते हैं, तो देरी को माफ करने का एक ऑफिशियल ऑर्डर पास कर देंगे।
रिटर्न फाइल करें: माफी का आदेश मिलने के बाद, आप इनकम टैक्स पोर्टल पर जाकर उस आदेश का रेफरेंस नंबर दर्ज करेंगे और अपना पुराना पेंडिंग आईटीआर फाइल कर सकेंगे। इसके बाद आपका रिफंड सीधे आपके खाते में प्रोसेस हो जाएगा।
1 सितंबर से कमोडिटी ETF में नया सिस्टम, बेहतर होगी प्राइस डिस्कवरी
29 Jun, 2026 08:52 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई। अगर आप भी अपने पोर्टफोलियो को सुरक्षित रखने के लिए सोने और चांदी के एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ईटीएफ) में पैसा लगाते हैं, तो आगामी 1 सितंबर 2026 से आपके लिए निवेश और ट्रेडिंग के नियम पूरी तरह बदलने जा रहे हैं। अब तक अक्सर देखा जाता था कि जब अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजारों में रात के समय सोने-चांदी की कीमतों में बड़ी हलचल होती थी, तो भारतीय ईटीएफ बाजार अगले दिन तुरंत उस बदलाव को सही तरीके से नहीं दर्शा पाते थे। इसी विसंगति को दूर करने और निवेशकों को वास्तविक कीमतों के करीब लाने के लिए बाजार नियामक सेबी एक नया फॉर्मूला लागू करने जा रहा है।
क्या है सेबी का नया फॉर्मूला और यह कैसे काम करेगा?
नए नियमों के तहत कमोडिटी ईटीएफ (खासकर गोल्ड और सिल्वर फंड्स) के लिए ट्रेडिंग की शुरुआत प्लस/माइनस 6% के शुरुआती प्राइस बैंड के साथ होगी।
अनलिमिटेड विस्तार: यदि बाजार में उतार-चढ़ाव बहुत तेज होता है, तो एक निश्चित कूलिंग-ऑफ पीरियड (ठहराव अवधि) के बाद इस प्राइस बैंड को 3-3 फीसदी के दायरे में और आगे बढ़ाया जा सकेगा।
कोई ऊपरी सीमा नहीं: मौजूदा सिस्टम के विपरीत, अब नए नियमों में इस बात की कोई ऊपरी सीमा नहीं होगी कि एक ही ट्रेडिंग सेशन के दौरान इस बैंड को कितनी बार चौड़ा किया जा सकता है। इससे वैश्विक कीमतों में होने वाले बदलावों को तुरंत भारतीय बाजारों में एडजस्ट किया जा सकेगा।
नई आधार कीमत: सेबी ने ईटीएफ की आधार कीमत तय करने के तरीके में भी सुधार किया है। अब पिछले कारोबारी दिन के आखिरी 30 मिनट के क्लोजिंग प्राइस को ही संदर्भ मूल्य (Reference Price) माना जाएगा, जिससे अचानक से दिखने वाले भारी प्रीमियम या डिस्काउंट को कम करने में मदद मिलेगी।
आम निवेशकों को इससे क्या फायदे होंगे?
सटीक शुरुआती कीमत: यह नया तंत्र बाजार खुलने से पहले अधिक सटीक शुरुआती कीमत खोजने की अनुमति देगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रातों-रात जो भी उतार-चढ़ाव होगा, वह अगले दिन सुबह भारतीय ईटीएफ निवेशकों को अधिक सटीक रूप से दिखाई देगा।
तर्कहीन घबराहट से बचाव: नया प्राइसिंग मैकेनिज्म मार्केट में कृत्रिम रूप से बढ़ने या घटने वाले अंतर को रोकेगा। निवेशकों को कम मूल्य विस्थापन, बेहतर लिक्विडिटी (तरलता) और ईटीएफ कीमतों व एनएवी (NAV) के बीच बेहतर तालमेल का फायदा मिलेगा।
नई बनाम पुरानी व्यवस्था: एक नज़र में
ईटीएफ श्रेणी
मौजूदा व्यवस्था
नई व्यवस्था (1 सितंबर 2026 से लागू)
कमोडिटी ईटीएफ (गोल्ड व सिल्वर)
फिक्स्ड ±5% से 10% बैंड
प्री-ओपन ऑक्शन + डायनेमिक बैंड। शुरुआत ±6% से, फिर 3% के स्टेप्स में बिना किसी ऊपरी सीमा के विस्तार।
इक्विटी ईटीएफ
फिक्स्ड ±10% बैंड
डायनेमिक बैंड व्यवस्था। शुरुआत ±10% से, कूलिंग-ऑफ के बाद ±20% तक विस्तार संभव।
डेट ईटीएफ
फिक्स्ड ±10% बैंड
इक्विटी ईटीएफ की तरह ही डायनेमिक बैंड व्यवस्था लागू होगी।
लिक्विड ईटीएफ
फिक्स्ड ±5% बैंड
कोई बदलाव नहीं, ±5% का फिक्स्ड बैंड यथावत रहेगा।
करेंसी/ओवरनाइट ईटीएफ
फिक्स्ड ±5% बैंड
बैंड ±5% ही रहेगा, लेकिन क्लोज-आउट नियमों में संशोधन किया जाएगा।
सिल्वर (चांदी) ईटीएफ में निवेशकों के लिए क्या हो रणनीति?
हाल के दिनों में बाजारों में जो सुधार देखा गया है, उसे विशेषज्ञों द्वारा एक संरचनात्मक मंदी के बजाय मुनाफावसूली और बदलती वैश्विक आर्थिक उम्मीदों के रूप में देखा जाना चाहिए।
एक्सपर्ट टेक: चांदी का उपयोग सोलर पैनलों, इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs), इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर निर्माण में व्यापक रूप से किया जाता है, जिससे इसकी औद्योगिक मांग मजबूत बनी हुई है। आपूर्ति सीमित होने और मांग का आउटलुक बेहतर होने के कारण अगले 2 से 5 साल के नजरिये से चांदी काफी आकर्षक दिखाई देती है।
मौजूदा निवेशकों के लिए: यह घबराहट में आकर बिकवाली करने का समय नहीं है। दीर्घकालिक निवेशक अपनी पोजीशन बनाए रख सकते हैं।
एसआईपी (SIP) निवेशक: जो लोग व्यवस्थित तरीके से निवेश कर रहे हैं, वे अपनी एसआईपी को जारी रखें।
नए निवेशक: बाजार के इस दौर में एकमुश्त (Lumpsum) पैसा लगाने के बजाय धीरे-धीरे खरीदारी करने की रणनीति अपनाना अधिक फायदेमंद साबित हो सकता है।
बाहरी लीगल जांच को गैर-जरूरी बताकर पूर्व चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती ने खोला मोर्चा
27 Jun, 2026 05:08 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई:देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के ऋणदाता, एचडीएफसी बैंक में चल रहा कॉर्पोरेट गवर्नेंस (कॉर्पोरेट शासन) का विवाद एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। बैंक के पूर्व चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती ने अपने इस्तीफे की परिस्थितियों को लेकर बैंक प्रबंधन द्वारा कराई गई बाहरी कानूनी जांच की प्रासंगिकता और जरूरत पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने इस पूरी कवायद को पूरी तरह से गैर-जरूरी करार दिया है। पूर्व चेयरमैन के इस कड़े रुख के बाद भारतीय बैंकिंग और वित्तीय जगत में एक बार फिर कॉर्पोरेट गवर्नेंस और बोर्ड के कामकाज के तरीकों को लेकर बहस तेज हो गई है।
जांच की शर्तों और पारदर्शिता की कमी के कारण अतानु चक्रवर्ती ने बनाई दूरी
पूर्व चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती ने इस पूरे मामले पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि उन्होंने इस स्वतंत्र जांच प्रक्रिया का हिस्सा बनने से पूरी तरह इनकार कर दिया था। इसके पीछे उनका सबसे मजबूत तर्क यह है कि बैंक प्रबंधन ने जांच का दायरा, उसकी सीमाएं और इसका कानूनी आधार कभी भी उनके साथ साझा नहीं किया था। विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चक्रवर्ती ने इस जांच प्रक्रिया से जुड़ने से पहले बैंक प्रबंधन से कई बार 'टर्म्स ऑफ रेफरेंस' (जांच की शर्तें और नियम) की मांग की थी, लेकिन बैंक की ओर से उन्हें कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। चक्रवर्ती का साफ कहना है कि उन्होंने जो सैद्धांतिक और नैतिक स्टैंड लिया था, उसे सही साबित करने के लिए उन्हें किसी भी बाहरी या विदेशी एजेंसी से किसी प्रकार की मान्यता अथवा क्लीन चिट की कोई जरूरत नहीं है।
दो प्रतिष्ठित लॉ फर्मों की रिपोर्ट में पूर्व चेयरमैन के दावों को आधारहीन बताया
अतानु चक्रवर्ती की यह तीखी प्रतिक्रिया बैंक के उस आधिकारिक बयान के ठीक एक दिन बाद आई है, जिसमें एचडीएफसी बैंक ने स्टॉक एक्सचेंजों को सूचित किया था कि दो बाहरी कानूनी फर्मों द्वारा की जा रही जांच अब पूरी हो चुकी है। बैंक ने इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच के लिए घरेलू लॉ फर्म वाडिया गांडी एंड कंपनी और अमेरिकी लॉ फर्म विल्सन सोन्सिनी गुडरिच एंड रोसाटी को नियुक्त किया था। इस जांच प्रक्रिया के तहत बैंक के बोर्ड रिकॉर्ड, विभिन्न कमेटियों के दस्तावेज, समकालीन फाइलों और स्वतंत्र निदेशकों सहित सीनियर मैनेजमेंट के साथ बातचीत का बेहद गहन और बारीक परीक्षण किया गया। बैंक का दावा है कि इस विस्तृत जांच में पूर्व चेयरमैन द्वारा मार्च में दिए गए इस्तीफे में उठाई गई चिंताओं या आरोपों को सही ठहराने वाला कोई भी ठोस सबूत नहीं मिला है, और लॉ फर्म्स के निष्कर्ष चक्रवर्ती के दावों से पूरी तरह असंगत पाए गए हैं।
मार्च में हुए अचानक इस्तीफे ने बैंकिंग क्षेत्र में मचाई थी हलचल
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि इस साल 17 मार्च को अतानु चक्रवर्ती के अचानक दिए गए इस्तीफे से जुड़ी है, जिसने देश के बैंकिंग सेक्टर में इस साल की सबसे बड़ी गवर्नेंस बहस को जन्म दिया था। अपने संक्षिप्त त्यागपत्र में उन्होंने स्पष्ट तौर पर लिखा था कि पिछले दो वर्षों में बैंक के भीतर हुए कुछ नीतिगत घटनाक्रम और प्रथाएं उनके व्यक्तिगत मूल्यों तथा नैतिक मानकों के बिल्कुल खिलाफ थीं। हालांकि उन्होंने अपने पत्र में किसी विशेष घटना या उदाहरण का जिक्र नहीं किया था, लेकिन देश के इतने बड़े बैंक के मुखिया द्वारा नैतिक मानकों पर सवाल उठाने से निवेशकों और बाजार में गहरी चिंता फैल गई थी, जिसके बाद बोर्ड को अपनी साख बचाने के लिए इस बाहरी कानूनी जांच का सहारा लेना पड़ा था।
नेतृत्व परिवर्तन और निवेशकों के भरोसे को बहाल करने की चुनौती
यह पूरा घटनाक्रम एचडीएफसी बैंक के लिए एक बेहद नाजुक और चुनौतीपूर्ण समय पर सामने आया है, क्योंकि बैंक इस समय अपने शीर्ष नेतृत्व में होने वाले कई प्रमुख बदलावों पर नियामक मंजूरियों का इंतजार कर रहा है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बैंक के मौजूदा मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ एग्जीक्यूटिव शशिधर जगदीशन की पुनर्नियुक्ति का मामला है। पूर्व चेयरमैन के इस्तीफे के बाद कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर उठे सवालों ने इस साल निवेशकों के सेंटिमेंट पर भारी दबाव डाला था, जिससे बैंक के शेयरों पर भी असर देखा गया। बैंक का बोर्ड अपने उत्तराधिकार के एजेंडे को आगे बढ़ाने से पहले एक स्वतंत्र मूल्यांकन रिपोर्ट चाहता था ताकि बाजार के संदेह को दूर किया जा सके। अब बैंक ने जांच पूरी होने की घोषणा करते हुए गवर्नेंस के उच्च मानकों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, जो आने वाले समय में निवेशकों का भरोसा दोबारा जीतने में बेहद अहम साबित हो सकती है।
प्री-IPO में चमकी Silver Consumer Electricals, दिग्गज निवेशकों ने बढ़ाया भरोसा
27 Jun, 2026 05:04 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
राजकोट:गुजरात की जानी-मानी कंपनी सिल्वर कंज्यूमर इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड अपने आगामी इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (आईपीओ) से ठीक पहले बाजार में बड़ा दांव खेलने में कामयाब रही है। कंपनी ने अपने प्री-आईपीओ राउंड के तहत लगभग 150 करोड़ रुपये का बड़ा फंड जुटाया है। यह फंड प्रमोटर ग्रुप के एक सदस्य द्वारा अपनी आंशिक हिस्सेदारी बेचने के जरिए जुटाया गया है। कंपनी से जुड़े आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, प्रमोटर ग्रुप के सदस्य धर्मशीभाई मोहनभाई बेडिया ने एक सेकेंडरी सेल के माध्यम से जाने-माने निवेशक रियाज सुतरवाला को 73 लाख 15 हजार 288 इक्विटी शेयर ट्रांसफर किए हैं। यह पूरा सौदा 205.05 रुपये प्रति इक्विटी शेयर की तय कीमत पर पूरा हुआ है, जिससे इसकी कुल वैल्यू 150 करोड़ रुपये बैठती है। इस रणनीतिक खरीद के बाद अब कंपनी की प्री-ऑफर इक्विटी शेयर कैपिटल में रियाज सुतरवाला की कुल हिस्सेदारी 2.59 प्रतिशत हो गई है।
सेबी से मिल चुकी है हरी झंडी, 1400 करोड़ रुपये जुटाने का है लक्ष्य
सिल्वर कंज्यूमर इलेक्ट्रिकल्स ने बाजार नियामक सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) के पास पिछले साल अगस्त में अपना ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (डीआरएचपी) जमा कराया था, जिसे नवंबर 2025 में सेबी की तरफ से अंतिम मंजूरी भी मिल चुकी है। जब यह ड्राफ्ट दाखिल किया गया था, तब धर्मशीभाई मोहनभाई बेडिया के पास कंपनी की 7.86 प्रतिशत और उनके बेटे विनीत धर्मशीभाई बेडिया के पास 48.99 प्रतिशत की सबसे बड़ी हिस्सेदारी थी। अब कंपनी इस आईपीओ के जरिए बाजार से करीब 1,400 करोड़ रुपये तक जुटाने की तैयारी में है। इस प्रस्तावित इश्यू के तहत कंपनी 1,000 करोड़ रुपये मूल्य के बिल्कुल नए इक्विटी शेयर जारी करेगी, जबकि प्रमोटर विनीत धर्मशीभाई बेडिया की ओर से 400 करोड़ रुपये तक का ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) लाया जाएगा, जिसके जरिए वे अपनी कुछ हिस्सेदारी जनता के लिए पेश करेंगे।
पंप से लेकर इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स तक, 17 देशों में फैला है कारोबार
गुजरात के राजकोट मुख्यालय वाली यह कंपनी मुख्य रूप से 'सिल्वर' और 'बेडिया' नाम के दो बड़े और स्थापित ब्रांड्स के जरिए अपना बिजनेस चलाती है। कंपनी अपने 'सिल्वर' ब्रांड के तहत कृषि और उद्योगों के लिए काम आने वाले पंप, हैवी मोटर और खेती के आधुनिक उपकरण तैयार करती है। वहीं दूसरी तरफ, 'बेडिया' ब्रांड के अंतर्गत घरों में इस्तेमाल होने वाले पंखे, कंसील्ड लाइटें, रूम हीटर, मिक्सर ग्राइंडर और अन्य कंज्यूमर इलेक्ट्रिकल प्रोडक्ट्स का निर्माण किया जाता है। कंपनी अपने विशाल इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग प्लांट के दम पर घरेलू, कृषि और औद्योगिक क्षेत्र की जरूरतों को पूरा कर रही है। इस आईपीओ से मिलने वाली नई रकम का इस्तेमाल कंपनी अपने मौजूदा कर्ज के बोझ को कम करने और सामान्य कॉर्पोरेट कामकाज को आगे बढ़ाने के लिए करेगी। वर्तमान में कंपनी का नेटवर्क भारत के बाहर 17 से ज्यादा देशों में फैला हुआ है, जहां ये अपने प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट करते हैं। सामाजिक जिम्मेदारी के स्तर पर भी कंपनी की भूमिका बड़ी है, क्योंकि इसके कुल कार्यबल में 700 से अधिक महिला कर्मचारी शामिल हैं।
दिग्गज निवेशकों और पांड्या ब्रदर्स का लगा है बड़ा पैसा
इस कंपनी की वित्तीय मजबूती का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसमें देश के कई बड़े दिग्गजों का पैसा लगा हुआ है। अगस्त 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, मशहूर एंजेल इनवेस्टर और प्लूटस वेल्थ मैनेजमेंट के मैनेजिंग पार्टनर अर्पित खंडेलवाल इसके सबसे बड़े शेयरहोल्डर रहे हैं, जिनकी कंपनी में 26.79 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी और उन्होंने जनवरी 2023 से ही इसमें निवेश शुरू कर दिया था। इनके अलावा, भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार खिलाड़ी हार्दिक पांड्या और उनके भाई क्रुणाल पांड्या ने भी इस कंपनी पर बड़ा भरोसा जताया है। क्रुणाल पांड्या के पास कंपनी के 1.1 प्रतिशत शेयर हैं, जबकि हार्दिक पांड्या की इसमें 0.017 प्रतिशत की हिस्सेदारी है और वे वर्तमान में इस कंपनी के मुख्य ब्रांड एंबेसडर भी हैं। साथ ही, शेयर बाजार की दिग्गज निवेशक मधु केला की पत्नी माधुरी मधुसूदन केला की भी इसमें 0.62 प्रतिशत की हिस्सेदारी रही है। इस मेगा आईपीओ को पूरी तरह सफल बनाने और मैनेज करने के लिए मोतीलाल ओसवाल इनवेस्टमेंट एडवाइजर्स, आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज, जेएम फाइनेंशियल और चॉइस कैपिटल एडवाइजर्स को लीड मर्चेंट बैंकर के रूप में नियुक्त किया गया है, जो इस पूरे इश्यू की कमान संभालेंगे।
गोल्ड-सिल्वर रेट अपडेट: चांदी में बड़ी गिरावट, खरीदने से पहले देखें नए दाम
27 Jun, 2026 12:28 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली / मुंबई:वैश्विक बाजारों में मची उथल-पुथल शांत होने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आए बदलावों के कारण इस हफ्ते सर्राफा बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई है। सोने और चांदी की कीमतों में आई इस बड़ी कमजोरी से निवेशकों और खरीदारों के बीच हलचल तेज हो गई है। महज एक हफ्ते के भीतर सोना जहां करीब 5 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम तक टूट गया है, वहीं चांदी की कीमतों में 15 हजार रुपये प्रति किलो से ज्यादा की बड़ी गिरावट आई है।
24 कैरेट से लेकर 18 कैरेट तक; जानिए सोने के नए दाम
इंडिया बुलियन ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, सोने के सभी कैरेट्स में इस हफ्ते भारी बिकवाली देखी गई:
24 कैरेट (शुद्ध सोना): इस हफ्ते ₹5,097 की भारी कटौती के साथ अब ₹1,39,873 प्रति 10 ग्राम पर आ गया है, जो पहले ₹1,44,970 के स्तर पर था।
22 कैरेट (ज्वेलरी सोना): इसकी कीमत भी घटकर अब ₹1,28,124 प्रति 10 ग्राम रह गई है, जो पहले ₹1,32,793 पर ट्रेंड कर रही थी।
18 कैरेट सोना: इसमें भी कमी आई है और यह ₹1,08,728 से गिरकर ₹1,04,905 प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया है।
हफ्ते का उतार-चढ़ाव: इस कारोबारी हफ्ते में सोने ने अपना उच्चतम स्तर 22 जून की सुबह ₹1,47,310 छुआ था, जबकि सबसे निचला स्तर 25 जून की शाम को ₹1,39,461 प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया।
चांदी की कीमतों में आया बड़ा रिबाउंड, ₹15,400 से ज्यादा की गिरावट
सोने के साथ-साथ चांदी के खरीदारों के लिए भी राहत की खबर है। चांदी की कीमतों में इस हफ्ते एकतरफा गिरावट देखने को मिली। चांदी का भाव ₹15,432 प्रति किलो तक लुढ़क गया है। इस गिरावट के बाद चांदी अब ₹2,16,541 प्रति किलो पर बिक रही है, जबकि हफ्ते की शुरुआत में यह ₹2,31,973 के ऊंचे स्तर पर थी। चांदी ने इस हफ्ते का अपना सर्वोच्च स्तर ₹2,37,801 (22 जून) और न्यूनतम स्तर ₹2,15,485 (25 जून) दर्ज किया।
ग्लोबल मार्केट का असर: $4100 के नीचे आया सोना
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आई स्थिरता के चलते ग्लोबल मार्केट में भी दोनों कीमती धातुओं पर दबाव साफ दिख रहा है। वैश्विक बाजार में सोना अब 4,100 डॉलर प्रति औंस के नीचे आ गया है, वहीं चांदी भी कमजोर होकर 60 डॉलर प्रति औंस के स्तर से नीचे ट्रेड कर रही है।
क्यों आई इतनी बड़ी गिरावट? एक्सपर्ट्स की राय
बाजार विशेषज्ञों (मार्केट एक्सपर्ट्स) के मुताबिक, सोने और चांदी में इस महा-गिरावट के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण काम कर रहे हैं:
यूएस फेडरल रिजर्व का रुख: दुनिया भर में बढ़ती महंगाई को काबू में करने के लिए अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Fed) ने आने वाले समय में ब्याज दरें बढ़ाने के सख्त संकेत दिए हैं।
मुनाफावसूली (Profit Booking): ब्याज दरें बढ़ने के डर से बड़े ट्रेडर्स और निवेशकों ने सोने-चांदी में ऊंचे स्तरों पर अपनी पोजीशन काटकर मुनाफावसूली शुरू कर दी है।
मजबूत होता डॉलर: अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर इंडेक्स के मजबूत होने से कीमती धातुओं में बिकवाली का दबाव और ज्यादा बढ़ गया है।
एक महीने का रिपोर्ट कार्ड:
अगर पिछले एक महीने के आंकड़ों पर नजर डालें, तो सर्राफा बाजार में लगातार सुधार देखा जा रहा है। बीते 30 दिनों के भीतर सोना अपने रिकॉर्ड हाई से करीब 10 प्रतिशत और चांदी अपने उच्चतम स्तर से लगभग 25 प्रतिशत तक सस्ती हो चुकी है।
ट्रंप की भारत यात्रा पर बड़ा अपडेट, अमेरिकी विदेश मंत्री का अहम बयान
27 Jun, 2026 11:56 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वॉशिंगटन / नई दिल्ली:भारत और अमेरिका के रणनीतिक और कूटनीतिक रिश्तों को लेकर एक बहुत बड़ा और सकारात्मक अपडेट सामने आया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने साफ संकेत दिए हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले साल (2027) की शुरुआत में भारत का दौरा कर सकते हैं। इसके साथ ही, पिछले काफी समय से अटकी पड़ी दोनों देशों की द्विपक्षीय व्यापार संधि (ट्रेड डील) भी अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई है।
पीएम मोदी और ट्रंप की ट्यूनिंग बेमिसाल, दौरे की तैयारियां शुरू
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दोनों देशों के मजबूत होते रिश्तों की तारीफ करते हुए कहा कि भारत और अमेरिका बेहद करीबी और मजबूत साझीदार हैं। ट्रंप के संभावित भारत दौरे की पुष्टि करते हुए उन्होंने कहा, "हमारी टीम इसी एजेंडे पर काम कर रही है कि राष्ट्रपति ट्रंप अगले साल की शुरुआत में भारत का दौरा करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच के आपसी संबंध इस समय अपने सर्वश्रेष्ठ दौर में हैं, जो वैश्विक कूटनीति के लिए एक बेहद मजबूत संदेश है।"
व्हाइट हाउस में वापसी के बाद ट्रंप की पहली भारत यात्रा
अगर सब कुछ तय योजना के मुताबिक रहा, तो दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति की कमान संभालने के बाद डोनाल्ड ट्रंप का यह पहला भारत दौरा होगा। इससे पहले ट्रंप ने फरवरी 2020 में भारत की यात्रा की थी। हाल ही में फ्रांस के एवियन में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच एक बेहद अहम द्विपक्षीय बैठक हुई थी, जो पिछले 16 महीनों में दोनों दिग्गजों के बीच पहली आमने-सामने की मुलाकात थी।
आखिरी दौर में ट्रेड डील, लेकिन इन शर्तों पर फंसा है पेंच
दोनों देशों के बीच व्यापारिक समझौते को लेकर बातचीत अंतिम चरण में है, लेकिन भारतीय नीति निर्माता और वार्ताकार कुछ प्रमुख बिंदुओं पर अमेरिका से पूरी तरह आर-पार की स्पष्टता चाहते हैं:
धारा 301 टैरिफ: भारत ने अमेरिकी व्यापार अधिनियम 1974 की धारा 301 के तहत लगने वाले शुल्कों (टैरिफ) पर स्पष्ट रुख मांगा है। भारत का कहना है कि समझौता फाइनल होने से पहले भारतीय बाजार को अन्य वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले बढ़त मिलनी चाहिए।
अमेरिकी ट्रेजरी का रुख: अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने साफ किया है कि ये टैरिफ धारा 301 के तहत पुराने स्तरों पर ही वापस लौट जाएंगे।
रूस से तेल और भारी टैरिफ: हालिया महीनों के तनाव की वजह
पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में जो उतार-चढ़ाव आया था, उसे पूरी तरह सुलझाने के लिए ही विदेश मंत्री मार्को रुबियो इस समय क्वाड (Quad) बैठक के सिलसिले में भारत आए हुए हैं:
ट्रंप का कड़ा फैसला: राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में भारतीय आयातों पर कुल 50% का भारी-भरकम टैरिफ ठोक दिया था। इसमें 25% पारस्परिक टैरिफ और भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण लगाया गया 25% का अतिरिक्त जुर्माना शामिल था, जो 27 अगस्त 2025 से प्रभावी हुआ था।
सुप्रीम कोर्ट से राहत: हालांकि, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के पारस्परिक टैरिफ के फैसले को खारिज कर दिया, जिसके बाद फिलहाल भारतीय निर्यात पर केवल 10% का बेसलाइन टैरिफ लग रहा है।
'ऑपरेशन सिंदूर' और मध्यस्थता के दावे पर मतभेद बरकरार
व्यापार के अलावा भारत-पाकिस्तान के बीच हुए सीजफायर को लेकर भी दोनों देशों के बयानों में थोड़ा विरोधाभास है। राष्ट्रपति ट्रंप ने कई मौकों पर यह दावा किया है कि 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान उन्होंने ही दोनों देशों के बीच दखल देकर युद्धविराम कराया था।
भारत का दोटूक स्टैंड:
नई दिल्ली ने ट्रंप के इस दावे को हमेशा की तरह पूरी तरह खारिज किया है। भारत का रुख साफ और अडिग है कि यह सीजफायर बिना किसी तीसरे देश या बाहरी मध्यस्थता के, पूरी तरह भारत और पाकिस्तान के मिलिट्री ऑपरेशंस के महानिदेशकों (DGMO) के बीच हुई सीधी बातचीत का नतीजा था।
क्रूड सस्ता, लेकिन बारिश कमजोर! महंगाई और ग्रामीण मांग पर डबल असर
27 Jun, 2026 10:51 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली: भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) को लेकर इस वक्त ग्लोबल और घरेलू मोर्चों से दो बिल्कुल अलग और चौंकाने वाले संकेत मिल रहे हैं। एक तरफ जहां अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों से देश के लिए बड़ी राहत की खबर आ रही है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू मौसम वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
पश्चिम एशिया में हुए शांति समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है, जिसे देखते हुए तमाम बड़ी वैश्विक ब्रोकरेज फर्म्स ने भारत की विकास दर (GDP Growth Rate) के अनुमान को बढ़ा दिया है। लेकिन इसके ठीक उलट, घरेलू मोर्चे पर 'अल नीनो' (El Niño) के असर और सुस्त मानसून ने देश के नीति-निर्माताओं की सांसें अटका दी हैं।
वैश्विक एजेंसियों को भारतीय बाजार पर भरोसा: जीडीपी अनुमान में बढ़ोतरी
वैश्विक निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने भारत के आर्थिक प्रदर्शन को देखते हुए वित्त वर्ष 2026-27 के लिए देश का विकास अनुमान 6.1 फीसदी से बढ़ाकर 6.5 फीसदी कर दिया है।
बैंक का मानना है कि चालू तिमाही में भारत की जीडीपी उम्मीद से कहीं बेहतर रफ्तार से आगे बढ़ रही है। कच्चे तेल के दामों में आई कमी का सीधा और बड़ा फायदा भारतीय सरकारी खजाने और आम जनता को मिलेगा।
इसके साथ ही जानी-मानी एजेंसी ईवाई (EY) ने भी मौजूदा वित्त वर्ष में भारत की रियल जीडीपी ग्रोथ रेट 6.6% से 6.8% के बीच रहने का अनुमान जताया है। ईवाई के मुताबिक, भारत का मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) और सर्विस सेक्टर (सेवा क्षेत्र) इतना मजबूत है कि देश किसी भी बाहरी वैश्विक संकट या अनिश्चितता का सामना आसानी से कर लेगा।
घरेलू मोर्चे पर मानसून का खतरा: 300 अरब डॉलर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था दांव पर
जहां एक तरफ विदेशी एजेंसियां भारत के मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और पेट्रोलियम रिफाइनिंग क्षमता को देखकर गदगद हैं, वहीं दूसरी तरफ कृषि और ग्रामीण मामलों के विशेषज्ञ जमीनी हकीकत को लेकर चेतावनी दे रहे हैं।
भारत की लगभग 300 अरब डॉलर की विशाल कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण इलाकों की पूरी डिमांड पूरी तरह से दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon) की बारिश पर टिकी हुई है। अगर अल नीनो के कारण इस बार बारिश कमजोर रहती है, तो इसका सीधा असर देश के गांवों और किसानों की जेब पर पड़ेगा।
अर्थशास्त्री/संस्था
मुख्य चिंता और असर
रजनी ठाकुर (अर्थशास्त्री, एलएंडटी फाइनेंस)
कम बारिश से ग्रामीण इलाकों में सेंटीमेंट खराब होता है। इसका सीधा असर त्योहारी सीजन (Festive Season) के दौरान गांवों में होने वाली खरीदारी और शेयर बाजार पर देखने को मिल सकता है।
युविका सिंघल (क्वांटइको रिसर्च)
मानसून की बारिश में महज 10 फीसदी की कमी भी देश में उपभोक्ता महंगाई (Consumer Inflation) को 1 फीसदी तक बढ़ा सकती है, जिससे खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं।
साफ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक दोराहे पर खड़ी है। अब देखना यह होगा कि कच्चे तेल की गिरावट से मिलने वाली राहत, मानसून की इस सुस्ती और अल नीनो के आर्थिक झटकों को कितना संभाल पाती है।
Byju's डील पर बड़ी अपडेट, कर्जदाताओं की नजर अब Aakash Educational Services की हिस्सेदारी पर
27 Jun, 2026 08:40 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई: एडटेक की दुनिया से इस वक्त की सबसे बड़ी कॉरपोरेट खबर सामने आ रही है। संकट में घिरे Byju's के फाउंडर बायजू रवींद्रन को उनके विदेशी कर्जदाताओं (Lenders) से बड़ी राहत मिल सकती है। दोनों पक्षों के बीच जारी कानूनी विवाद अब अपने आखिरी दौर में पहुंच चुका है, जहां एक बड़े समझौते (Settlement) की तैयारी चल रही है।
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल लेंडर्स बायजू रवींद्रन के खिलाफ दर्ज सभी अदालती मामले और कानूनी कार्रवाई वापस लेने को तैयार हो गए हैं। हालांकि, इसके बदले उन्होंने एक बड़ी शर्त रखी है—वे Byju's के मालिकाना हक वाली मशहूर ऑफलाइन कोचिंग कंपनी 'आकाश एजुकेशनल सर्विसेज' (Aakash Educational Services) में करीब 30 फीसदी हिस्सेदारी (Stake) मांग रहे हैं।
डील के तहत मुकदमों का होगा 'द एंड'
सूत्रों के मुताबिक, इस सेटलमेंट पर बातचीत आखिरी चरणों में है। अगर यह समझौता फाइनल हो जाता है, तो भारत, अमेरिका और सिंगापुर की अदालतों में चल रहे सभी केस आपसी सहमति से एक साथ वापस ले लिए जाएंगे।
याद दिला दें कि Byju's ने साल 2021 में करीब 1 अरब डॉलर (लगभग ₹8,000 करोड़) की भारी-भरकम डील में आकाश एजुकेशनल सर्विसेज को खरीदा था। हालांकि, पिछले कुछ सालों में वित्तीय संकट और कानूनी विवादों के चलते आकाश में Byju's की हिस्सेदारी घटकर बहुत कम रह गई है और अब वह एक माइनॉरिटी शेयरहोल्डर (कम हिस्सेदारी वाली कंपनी) बनकर रह गई है। मौजूदा समय में आकाश में सबसे बड़ी हिस्सेदारी 'मणिपाल हेल्थ' समूह के पास है।
कितनी बड़ी है आकाश एजुकेशनल सर्विसेज?
तमाम विवादों के बावजूद 'आकाश' आज भी देश का एक मजबूत ब्रांड बना हुआ है:
नेटवर्क: पूरे भारत में इसके 300 से ज्यादा ऑफलाइन सेंटर्स हैं।
काम: यह मुख्य रूप से मेडिकल (NEET) और इंजीनियरिंग (JEE) की प्रवेश परीक्षाओं के साथ स्कूली बोर्ड एग्जाम्स की तैयारी कराता है।
फैकल्टी व रेवेन्यू: इसके पास 5,000 से अधिक अनुभवी शिक्षकों की टीम है और इसकी सालाना कमाई लगभग 25.4 करोड़ डॉलर है।
वैल्यूएशन: इस मौजूदा बातचीत में आकाश एजुकेशनल सर्विसेज की कुल वैल्यू लगभग 2 अरब डॉलर आंकी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस महा-समझौते की मेज पर बायजू रवींद्रन, ग्लास ट्रस्ट (लेंडर्स के प्रतिनिधि), आकाश और मणिपाल हेल्थ मिलकर रास्ता निकाल रहे हैं।
Byju's: फर्श पर कैसे आया एडटेक का 'किंग'?
एक दौर था जब Byju's दुनिया के 21 से ज्यादा देशों में अपना पैर पसार चुका था। कोविड-19 महामारी के दौरान जब हर तरफ लॉकडाउन था, तब ऑनलाइन कोर्सेज के दम पर यह कंपनी सफलता के शिखर पर पहुंच गई थी। लेकिन साल 2023 की शुरुआत में इसके बुरे दिन शुरू हुए।
अमेरिका के लेंडर्स (ग्लास ट्रस्ट) ने बायजू रवींद्रन पर फंड के कुप्रबंधन (Mismanagement) के गंभीर आरोप लगाए। विवाद इतना बढ़ा कि साल 2024 में Byju's भारत में दिवालिया (Insolvency) होने की कगार पर पहुंच गई और अमेरिकी लेंडर्स ने अपने 1 अरब डॉलर के बकाये की मांग ठोक दी।
हालांकि, बायजू रवींद्रन और उनकी कंपनी हमेशा से इन आरोपों को खारिज करते आए हैं। लेकिन इस कानूनी खींचतान ने Byju's को पूरी तरह तोड़ दिया। साल 2024 में खुद रवींद्रन ने एक बयान में माना था कि अब उनकी कंपनी की वैल्यू 'शून्य' (Zero) हो चुकी है। अब देखना यह होगा कि क्या 'आकाश' की 30% हिस्सेदारी देकर बायजू रवींद्रन खुद को इस चक्रव्यूह से बाहर निकाल पाते हैं या नहीं।
2026 में तेज रफ्तार से बढ़ेगी भारतीय अर्थव्यवस्था? गोल्डमैन सैक्स ने बढ़ाया अनुमान
26 Jun, 2026 04:56 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली: वैश्विक निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने कैलेंडर वर्ष 2026 के लिए भारत के वृहद आर्थिक परिदृश्य (Macroeconomic Outlook) को पहले से कहीं अधिक मजबूत और बेहतर बताया है। हाल ही में संपन्न हुए ऐतिहासिक अमेरिकी-ईरान शांति समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट और मजबूत घरेलू आर्थिक स्थितियों को देखते हुए बैंक ने भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (Real GDP) वृद्धि दर का अनुमान बढ़ा दिया है।
जीडीपी ग्रोथ अनुमान बढ़कर हुआ 6.8 फीसदी, महंगाई और घाटे में आएगी कमी
गोल्डमैन सैक्स की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2026 के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 0.3 फीसदी बढ़ाकर अब 6.8 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ ही भारतीय उपभोक्ताओं और सरकार को राहत देने वाली कई अन्य घोषणाएं भी की गई हैं:
कोर इन्फ्लेशन (मुख्य महंगाई): इसके अनुमान में 0.2 फीसदी की कटौती कर इसे 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया है।
करंट अकाउंट डेफिसिट (चालू खाता घाटा): कच्चे तेल का आयात सस्ता होने से यह 0.2 फीसदी घटकर जीडीपी का महज 1.1 प्रतिशत रह जाएगा।
क्रूड ऑयल (कच्चा तेल): बैंक की कमोडिटी टीम का मानना है कि 2026 की दूसरी छमाही में तेल औसतन 82 डॉलर प्रति बैरल और 2027 तक घटकर 75 डॉलर प्रति बैरल पर आ सकता है।
वैश्विक तनाव के बीच भी भारत की अर्थव्यवस्था रही लचीली, पहली तिमाही में 7.8% की विकास दर
रिपोर्ट में इस बात की सराहना की गई है कि पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में लंबे समय तक रहे भू-राजनीतिक तनाव और व्यवधानों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत बनी रही। भारत सरकार द्वारा उठाए गए राजकोषीय और अर्ध-राजकोषीय कदमों ने वैश्विक स्तर पर बढ़ी ऊर्जा कीमतों का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ने दिया। यही वजह है कि वर्ष 2026 की पहली तिमाही (Q1) में भारत की आर्थिक गतिविधियां उम्मीद से कहीं ज्यादा बेहतर रहीं और देश ने 7.8 प्रतिशत की शानदार विकास दर दर्ज की।
उर्वरक सब्सिडी और ईंधन की कीमतों पर कम होगा राजकोषीय दबाव
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरने से घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने का खतरा अब पूरी तरह टल गया है। इसके अलावा पेट्रोकेमिकल आधारित उत्पादों की लागत कम होने से खुदरा महंगाई भी नियंत्रण में रहेगी। वैश्विक स्तर पर यूरिया की कीमतों में आए सुधार के चलते सरकार पर बढ़ने वाला फर्टिलाइजर (उर्वरक) सब्सिडी का बोझ भी अब कम होगा, जिससे देश के अल्पकालिक राजकोषीय दबाव (Fiscal Pressure) को कम करने में बड़ी मदद मिलेगी।
अल्पकालिक चुनौतियों के बाद साल के अंत में रफ्तार पकड़ेगी घरेलू खपत
गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि पहले हुई ईंधन की मूल्य वृद्धि के असर के कारण वर्ष 2026 की दूसरी और तीसरी तिमाही में घरेलू खपत (Consumption Growth) की रफ्तार थोड़ी धीमी रह सकती है। हालांकि, कच्चे तेल की ताजा गिरावट के बाद अब आगे खुदरा ईंधन के दाम बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके परिणामस्वरूप, तीसरी तिमाही के बाद आम जनता के घरेलू खर्च पर अतिरिक्त दबाव सीमित हो जाएगा और साल के अंत तक भारतीय अर्थव्यवस्था एक बार फिर जबरदस्त रफ्तार पकड़ लेगी।
मजबूत विदेशी मुद्रा प्रवाह और संतुलित भुगतान शेष
भारत का बाहरी आर्थिक परिदृश्य (External Sector Outlook) भी बेहद सुरक्षित नजर आ रहा है। सस्ते तेल आयात और विदेशों से आने वाले मजबूत प्रेषण प्रवाह (Remittance Flow) के दम पर भारत का विदेशी व्यापार संतुलन बेहतर स्थिति में है। बैंक को उम्मीद है कि इस साल भारत का भुगतान संतुलन अधिशेष (Balance of Payments Surplus) जीडीपी का 0.7 फीसदी रहेगा। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी सचेत किया गया है कि मौसम संबंधी अनिश्चितताएं (अल नीनो या बेमौसम बारिश) और पूर्व में बढ़ी तेल की कीमतें अल्पकालिक तौर पर बाजार के सामने कुछ चुनौतियां खड़ी रख सकती हैं।
1 जुलाई से पासपोर्ट फीस में बढ़ोतरी, विदेश यात्रा की तैयारी पर बढ़ेगा खर्च
26 Jun, 2026 12:59 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
नई दिल्ली: जो लोग वेकेशन मनाने, हायर एजुकेशन (उच्च शिक्षा) या नौकरी के सिलसिले में विदेश जाने की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें अब अपनी जेब थोड़ी और ढीली करनी होगी। केंद्र सरकार ने नया पासपोर्ट जारी करने और पुराने पासपोर्ट के नवीनीकरण (रिन्यूअल) की सरकारी फीस में बड़ा इजाफा कर दिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा अधिसूचित 'पासपोर्ट (संशोधन) नियम, 2026' के अनुसार, ये बढ़ी हुई दरें 1 जुलाई, 2026 से पूरे भारत में प्रभावी हो जाएंगी।
वयस्कों (18+ वर्ष) के लिए 36 और 60 पेज के नए दाम
18 साल या उससे अधिक उम्र के आवेदकों के लिए रेगुलर और जंबो दोनों ही पासपोर्ट की फीस बदल गई है:
36-पेज की पासपोर्ट बुकलेट: सामान्य (नॉर्मल) प्रक्रिया के तहत अब इसके लिए ₹1,500 के बदले ₹2,500 देने होंगे। वहीं, आपातकालीन स्थिति में 'तत्काल' सेवा का उपयोग करने पर यह खर्च ₹5,000 हो जाएगा।
60-पेज की जंबो बुकलेट: बार-बार यात्रा करने वालों के लिए बनने वाले इस जंबो पासपोर्ट की सामान्य फीस ₹2,000 से बढ़ाकर ₹3,500 कर दी गई है। तत्काल कोटे में इसके लिए ₹6,000 चुकाने होंगे।
नाबालिगों (18 साल से कम) के आवेदन पर भी बढ़ी दरें
बच्चों के पासपोर्ट शुल्क में भी बढ़ोतरी की गई है। 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का 36 पन्नों का पासपोर्ट बनवाने के लिए अब ₹1,000 की जगह ₹1,750 देने होंगे, जबकि तत्काल श्रेणी में यह रकम ₹4,250 निर्धारित की गई है। मालूम हो कि नाबालिगों का पासपोर्ट केवल 5 साल या उनके 18 वर्ष के होने तक (जो भी पहले आए) के लिए ही मान्य होता है।
पासपोर्ट गुम या खराब होने पर लगेगा भारी जुर्माना
यदि आपका चालू पासपोर्ट कहीं खो जाता है या फट/डैमेज हो जाता है, तो दूसरा (डुप्लीकेट) पासपोर्ट हासिल करना अब काफी खर्चीला होगा:
36-पेज का रिप्लेसमेंट: सामान्य तौर पर ₹5,000 और तत्काल मोड में ₹7,500 की फीस लगेगी।
60-पेज का रिप्लेसमेंट: नॉर्मल मोड में ₹6,000 और तत्काल में ₹8,500 का भुगतान करना होगा।
बच्चों का रिप्लेसमेंट (36-पेज): इसके लिए सामान्य फीस ₹4,250 और तत्काल फीस ₹6,750 तय की गई है।
पीसीसी (PCC) और अन्य जरूरी प्रमाणपत्रों का नया शुल्क
पासपोर्ट के अलावा अन्य महत्वपूर्ण कागजी कार्रवाइयों के रेट भी रिवाइज किए गए हैं। अब पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट (PCC), सरेंडर सर्टिफिकेट और ग्लोबल एंट्री प्रोग्राम वेरिफिकेशन (GEP) जैसी विविध सेवाओं के लिए ₹750 का फिक्स चार्ज देना होगा। इसके अतिरिक्त, 'सर्टिफिकेट ऑफ आइडेंटिटी' के लिए ₹1,000 की राशि देय होगी।
बुजुर्गों और छोटे बच्चों को मिलती रहेगी 10% की राहत
इस बढ़ी हुई महंगाई के बीच सरकार ने कुछ चुनिंदा वर्गों को राहत दी है। 8 वर्ष तक की आयु के छोटे बच्चों और 60 वर्ष से अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों (सीनियर सिटीजंस) को नए आवेदन पर मिलने वाली 10 फीसदी की विशेष छूट आगे भी जारी रहेगी।
नोट: वयस्कों के पासपोर्ट की वैधता (वैलिटिडी) में कोई बदलाव नहीं किया गया है, यह पहले की तरह ही पूरे 10 वर्षों के लिए वैध रहेगा। हालांकि 1 जुलाई 2026 के बाद ऑनलाइन स्लॉट बुक करने वाले सभी आवेदकों को इसी नए स्ट्रक्चर के अनुसार पेमेंट करना होगा।
एयर इंडिया बम कांड: 41 साल बाद कनाडा ने स्वीकार की ऐतिहासिक चूक
26 Jun, 2026 12:37 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
टोरंटो: 23 जून 1985 को एयर इंडिया की फ्लाइट 182 (सम्राट कनिष्क) में हुए आत्मघाती और घातक बम विस्फोट के 41 वर्ष बाद, कनाडाई सुरक्षा खुफिया सेवा (CSIS) ने आखिरकार आधिकारिक तौर पर कनाडा स्थित खालिस्तानी चरमपंथियों को इस भीषण आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार ठहराया है। कनाडा की खुफिया एजेंसी की यह खुली स्वीकारोक्ति भारत के उस लंबे समय से चले आ रहे रुख की पुष्टि करती है, जिसे कनाडाई सरकारें दशकों तक राजनीतिक कारणों से नजरअंदाज करती आई थीं।
सीएसआईएस ने सोशल मीडिया पर इस हमले की बरसी पर जारी एक पोस्ट में स्पष्ट लिखा कि 23 जून 1985 को कनाडा स्थित खालिस्तानी चरमपंथियों द्वारा लगाए गए बम ने विमान को नष्ट कर दिया था, जिसमें सवार सभी 329 लोग मारे गए थे। खुफिया एजेंसी ने इसे कनाडाई इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला और अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक निर्णायक क्षण बताया है।
हवा में ही टुकड़े-टुकड़े हो गया था 'सम्राट कनिष्क'
टोरंटो से वैंकूवर और लंदन होते हुए मुंबई जा रही एयर इंडिया की फ्लाइट 182 (बोइंग 747-200बी विमान) आयरलैंड के दक्षिण-पश्चिमी तट के पास अटलांटिक महासागर के ऊपर उड़ रही थी, तभी उसमें जोरदार धमाका हुआ। प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन 'बब्बर खालसा' के आतंकवादियों ने चेक-इन किए गए सामान (लगैज) के डिब्बे में यह बम छिपाकर रखा था। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि विमान हवा में ही बिखर गया।
इस हमले में 268 कनाडाई नागरिक, 27 ब्रिटिश और बाकी भारतीय मूल के यात्रियों व चालक दल के सदस्यों सहित कुल 329 निर्दोष लोगों की जान गई थी। साल 2001 में अमेरिका में हुए 9/11 के हमलों से पहले तक, इसे विमानन इतिहास का सबसे बड़ा और भयावह आतंकी हमला माना जाता था।
दोषियों का नाम लेने में क्यों लगे 41 साल?
अब वैश्विक स्तर पर यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि कनाडा को इस हमले के असली मास्टरमाइंड और विचारधारा का नाम सार्वजनिक करने में चार दशक (41 वर्ष) का समय क्यों लग गया। इसके पीछे कई बड़ी वजहें और कनाडाई सिस्टम की नाकामियां सामने आई हैं:
एजेंसियों की आपसी लड़ाई और सबूत नष्ट होना: साल 2010 में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जस्टिस जॉन मेजर की अध्यक्षता वाली आधिकारिक सार्वजनिक जांच रिपोर्ट में इसे 'गलतियों की एक श्रृंखला' कहा गया था। कनाडाई खुफिया एजेंसी (CSIS) और रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) के बीच वर्चस्व की लड़ाई के चलते तालमेल की भारी कमी थी। सीएसआईएस ने बब्बर खालसा के नेता और मुख्य साजिशकर्ता तलविंदर सिंह परमार पर निगरानी तो रखी थी, लेकिन एजेंसी ने सैकड़ों घंटों की महत्वपूर्ण जासूसी वॉयस रिकॉर्डिंग्स को खुद ही नष्ट कर दिया, जो अपराधियों को सजा दिलाने के लिए सबसे अचूक सबूत साबित हो सकते थे।
संस्थागत उदासीनता: हालांकि मारे गए अधिकांश लोग कनाडाई नागरिक थे, लेकिन कनाडाई राजनेताओं और वहां के मीडिया ने इसे लंबे समय तक "दूर देश (भारत) की एक आंतरिक समस्या" मानकर ठंडे बस्ते में डाले रखा। साल 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि पीड़ितों के परिवारों के साथ सरकारी स्तर पर घोर उदासीनता बरती गई थी।
गवाहों की हत्या और कानूनी अड़चनें: इस मामले से जुड़े अहम गवाहों को लगातार डराया-धमकाया गया और कई प्रमुख गवाहों की रहस्यमयी तरीके से हत्या कर दी गई। इसके परिणामस्वरूप, साल 2005 में चले एक हाई-प्रोफाइल मुकदमे में सबूतों के अभाव में मुख्य आरोपी बरी हो गए। बाद में जनता के भारी दबाव के बाद ही इस पर पूर्ण सार्वजनिक जांच बैठाई गई थी।
खालिस्तानी चरमपंथ को पहले ही बताया था गंभीर खतरा
हवाई हमले के लिए सीधे तौर पर नाम लेने से पहले, मार्च 2025 में जारी अपनी वार्षिक सार्वजनिक रिपोर्ट में भी सीएसआईएस ने पहली बार कड़ा रुख अपनाया था। उस रिपोर्ट में एजेंसी ने माना था कि कनाडा की धरती पर सक्रिय खालिस्तानी चरमपंथी समूह कनाडाई राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बन चुके हैं। खुफिया एजेंसी ने आगाह किया था कि ये संगठन भोले-भाले सिख समुदाय का फायदा उठाकर हिंसक एजेंडे के नाम पर भारी फंड जुटाते हैं, जिसका इस्तेमाल बाद में हिंसक गतिविधियों और आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है।
IPO में निवेश का मौका! Aastha Spintex ला रही ₹170 करोड़ का पब्लिक इश्यू
26 Jun, 2026 11:50 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई: प्राइमरी मार्केट के मेनबोर्ड सेगमेंट में निवेश का एक और नया मौका मिलने जा रहा है। टेक्सटाइल सेक्टर की जानी-मानी कंपनी आस्था स्पिनटेक्स लिमिटेड (Aastha Spintex Ltd) अपना आगामी आईपीओ (IPO) लेकर आ रही है। कंपनी इस पब्लिक इश्यू के जरिए बाजार से ₹170 करोड़ जुटाने की योजना बना रही है। यह आईपीओ निवेश के लिए सोमवार, 29 जून को खुलेगा और बुधवार, 1 जुलाई को बंद हो जाएगा। इस पूरे इश्यू के तहत कंपनी 1.25 करोड़ नए फ्रेश शेयर जारी करने जा रही है।
क्या है प्राइस बैंड और लॉट साइज?
कंपनी ने इस आईपीओ के लिए ₹125 से ₹136 प्रति शेयर का प्राइस बैंड (मूल्य दायरा) तय किया है। रिटेल निवेशकों के लिए न्यूनतम लॉट साइज 110 शेयरों का रखा गया है, यानी निवेशकों को कम से कम एक लॉट के लिए बोली लगानी होगी। आईपीओ बंद होने के बाद, शेयरों का आवंटन (Alotment) 2 जुलाई को फाइनल किया जाएगा। जिन निवेशकों को शेयर नहीं मिलेंगे, उन्हें रिफंड प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। इसके बाद 6 जुलाई को कंपनी के शेयरों की लिस्टिंग नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर होने की उम्मीद है।
फंड जुटाने का मुख्य उद्देश्य और कंपनी की भविष्य की रणनीति
आस्था स्पिनटेक्स लिमिटेड मुख्य रूप से कॉटन बेल्स और अलग-अलग वैरायटी के कॉटन यार्न (सूती धागे) का निर्माण और व्यापार करती है। इसके धागों का इस्तेमाल डेनिम, मोजे, शर्टिंग, स्वेटर, होम टेक्सटाइल और इंडस्ट्रियल फैब्रिक बनाने में बड़े पैमाने पर होता है। कंपनी के प्रमोटर, चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर पटेल डी. जशवंतभाई ने बताया कि इस आईपीओ से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल 'फाल्कन यार्न्स प्राइवेट लिमिटेड' के अधिग्रहण (खरीद) की आंशिक अदायगी करने, उसकी वर्किंग कैपिटल (कार्यशील पूंजी) की जरूरतों को पूरा करने और सामान्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए किया जाएगा। इस कदम से कंपनी की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और बिजनेस ग्रोथ को नई रफ्तार मिलेगी।
किस कैटेगरी के लिए कितना हिस्सा है रिजर्व?
कंपनी ने अलग-अलग प्रकार के निवेशकों के लिए कोटा निर्धारित किया है। इस पब्लिक इश्यू में क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIB) के लिए 20 फीसदी हिस्सा सुरक्षित रखा गया है। वहीं, हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स यानी नॉन-इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स (NII) के लिए 40 फीसदी और आम रिटेल निवेशकों के लिए भी 40 फीसदी हिस्सा आरक्षित किया गया है।
ग्रे मार्केट में प्रीमियम पर ट्रेडिंग शुरू
बाजार के जानकारों और अनऑफिशियल सोर्सेज के मुताबिक, आस्था स्पिनटेक्स के शेयरों ने ग्रे मार्केट में भी दस्तक दे दी है। फिलहाल अनऑफिशियल मार्केट (GMP) में कंपनी के शेयर अपने तय प्राइस बैंड से करीब 2.94 प्रतिशत के प्रीमियम (बढ़त) के साथ ट्रेड कर रहे हैं, जो निवेशकों के बीच इसके प्रति सकारात्मक रुझान को दर्शाता है। गौरतलब है कि हाल ही में सेबी (Sebi) से मंजूरी मिलने के बाद यह इश्यू बाजार में आ रहा है।
आम आदमी को लग सकता है बड़ा झटका, पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर मंडराया खतरा
26 Jun, 2026 11:08 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
काराकास: वेनेजुएला में बीते दिनों एक के बाद एक आए दो विनाशकारी भूकंपों ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इस प्राकृतिक आपदा के कारण देश में बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है और मलबे में दबे लोगों को निकालने के लिए युद्ध स्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है। इस मानवीय संकट के बीच, वैश्विक ऊर्जा बाजार (ग्लोबल एनर्जी मार्केट) में भी हड़कंप मच गया है। वेनेजुएला दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में गिना जाता है, ऐसे में अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या इस संकट की आंच भारत के आम उपभोक्ताओं की जेब तक पहुँचेगी और पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे?
भारत के लिए क्यों बढ़ गई है वेनेजुएला की अहमियत?
इस संकट का समय भारत के नजरिए से काफी संवेदनशील है। दरअसल, पिछले कुछ महीनों में मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारत ने रणनीतिक रूप से वेनेजुएला से कच्चे तेल का आयात (इम्पोर्ट) काफी बढ़ा दिया था। पेट्रोलियम मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल और मई 2026 में वेनेजुएला भारत के प्रमुख क्रूड सप्लायर्स की सूची में ऊपर आ गया है। जहाँ वित्त वर्ष 2025-26 में वेनेजुएला से हर महीने औसतन 64,000 मीट्रिक टन कच्चा तेल आता था, वहीं अप्रैल-मई 2026 में यह आयात बढ़कर 10 लाख मीट्रिक टन प्रति माह के पार पहुँच चुका है।
क्या तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को पहुँचा है नुकसान?
शुरुआती समीक्षा रिपोर्टों के अनुसार, भारत के लिए एक राहत भरी खबर यह है कि वेनेजुएला का मुख्य ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर इस भीषण भूकंप की मार से काफी हद तक सुरक्षित है। तेल उत्पादन, रिफाइनिंग और निर्यात से जुड़े कामकाज में फिलहाल किसी बड़े व्यवधान या रुकावट की पुष्टि नहीं हुई है। भूकंप का सबसे घातक असर राजधानी काराकास और उसके आस-पास के आवासीय क्षेत्रों, परिवहन नेटवर्क और सार्वजनिक सुविधाओं पर पड़ा है। हालांकि, औद्योगिक क्षेत्रों, बड़ी पाइपलाइनों और एक्सपोर्ट टर्मिनल्स की सुरक्षा की बारीकी से जांच की जा रही है। अगर भविष्य में किसी आंतरिक या ढांचागत नुकसान का पता चलता है, तो ही सप्लाई प्रभावित होने की आशंका है।
भारत के पास हैं कई विकल्प, तेल संकट का खतरा बेहद कम
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि इस आपदा से भारत में तेल का कोई बड़ा संकट पैदा होने की उम्मीद न के बराबर है। इसकी मुख्य वजह यह है कि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं है, बल्कि वह रूस, इराक, सऊदी अरब, यूएई, अमेरिका और ब्राजील समेत 35 से अधिक देशों से क्रूड ऑयल खरीदता है। इस समय रूस भारत का सबसे बड़ा तेल भागीदार बना हुआ है। यदि वेनेजुएला से तेल की खेप आने में कुछ देरी भी होती है, तो भारतीय तेल कंपनियों के पास पर्याप्त बैकअप इन्वेंट्री (सुरक्षित स्टॉक) मौजूद है और वे दूसरे देशों से भी इसकी भरपाई कर सकती हैं।
आम जनता की जेब पर क्या होगा असर?
भारतीय उपभोक्ताओं के लिए सीधी बात यह है कि इस भूकंप का घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर तुरंत कोई असर नहीं पड़ने वाला है। भारत में ईंधन की खुदरा कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय क्रूड के दामों से तय नहीं होतीं, बल्कि इनमें डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति, केंद्र व राज्य सरकारों के टैक्स और घरेलू तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के मार्जिन की बड़ी भूमिका होती है।
विशेषज्ञों का आकलन: हालांकि तुरंत कोई असर नहीं दिखेगा, लेकिन यदि आने वाले हफ्तों में वेनेजुएला के ऑयल फील्ड्स में किसी बड़े गुप्त नुकसान की बात सामने आती है और ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक आसमान पर बनी रहती हैं, तो भविष्य में भारतीय उपभोक्ताओं पर इसका आंशिक बोझ पड़ सकता है।
गोल्ड- सिल्वर निवेशकों को झटका, फेड की सख्ती से धड़ाम हुए दाम
26 Jun, 2026 10:08 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मुंबई: वैश्विक बाजारों से मिल रहे कमजोर संकेतों और मजबूत होते अमेरिकी डॉलर के कारण शुक्रवार (26 जून) को सर्राफा बाजार में सोने और चांदी की कीमतों पर जबरदस्त दबाव देखा गया। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में और बढ़ोतरी करने की आशंकाओं तथा पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना (स्पॉट गोल्ड) 0.9% की गिरावट के साथ $3,991.49 प्रति औंस पर आ गया, जबकि अमेरिकी गोल्ड फ्यूचर्स भी 1% टूटकर $4,007.30 पर बंद हुआ। इस गिरावट के साथ ही सोना नवंबर 2025 के बाद पहली बार $4,000 के बेहद महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे चला गया है।
अमेरिकी महंगाई और ब्याज दरों के डर ने बिगाड़ा सेंटिमेंट
कीमती धातुओं में आई इस ताजा गिरावट की मुख्य वजह अमेरिका से आए महंगाई के आंकड़े हैं। गुरुवार को जारी डेटा के मुताबिक, पश्चिम एशिया में तनाव के चलते ईंधन (ऊर्जा) की कीमतें बढ़ने से अमेरिका में मई महीने की महंगाई दर तीन साल में पहली बार 4% के पार निकल गई है। न्यूयॉर्क फेड के प्रेसिडेंट जॉन विलियम्स सहित कई शीर्ष अधिकारियों का मानना है कि महंगाई अभी भी बैंक के 2% के तय लक्ष्य से काफी ऊपर है। ऐसे में 'CME फेडवॉच' के अनुसार, ट्रेडर्स अब इस साल तीन बार ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीद कर रहे हैं। ब्याज दरों में बढ़ोतरी से सोने और चांदी जैसे नॉन-यील्डिंग एसेट्स (बिना ब्याज वाले निवेश) के प्रति निवेशकों का आकर्षण कम हो जाता है।
डॉलर की मजबूती और कमजोर ग्लोबल डिमांड से बढ़ा दबाव
बुलियन मार्केट पर दोतरफा मार पड़ रही है। एक तरफ जहां यूएस डॉलर इंडेक्स लगातार दूसरे हफ्ते मजबूत हुआ है, जिससे अन्य मुद्रा (करेंसी) रखने वाले देशों के लिए सोना खरीदना महंगा हो गया है। वहीं दूसरी तरफ, दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ता चीन की तरफ से हांगकांग के रास्ते होने वाले शुद्ध सोना आयात में मई महीने के दौरान करीब 38% की भारी गिरावट दर्ज की गई है। यह वैश्विक स्तर पर सोने की घटती फिजिकल डिमांड (भौतिक मांग) की ओर साफ इशारा करता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी अनिश्चितता का माहौल गहरा गया है। समुद्र में एक व्यापारिक जहाज पर हुए हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र (UN) की अंतरराष्ट्रीय समुद्री संस्था ने होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों को एस्कॉर्ट करने का अपना अभियान फिलहाल रोक दिया है। इस घटना के बाद अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे बेहद संवेदनशील शांति समझौते के भविष्य को लेकर बाजार में नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। निवेशक अब आने वाले अमेरिकी पीसीई (PCE) इन्फ्लेशन डेटा का इंतजार कर रहे हैं, जो बाजार को आगे की दिशा देगा।
क्या और गिरेंगे दाम? जानिए बाजार के दिग्गजों का क्या है कहना
बाजार के जानकारों का मानना है कि शॉर्ट-टर्म में बाजार में उतार-चढ़ाव (वोलाटिलिटी) जारी रहेगी, लेकिन लंबे समय के लिए इसके बुनियादी सिद्धांत (फंडामेंटल्स) अभी भी मजबूत हैं।
पृथ्वीराज कोठारी (मैनेजिंग डायरेक्टर, ऋद्धिसिद्धि बुलियंस): "फेडरल रिजर्व के कड़े रुख और येन कैरी ट्रेड के खत्म होने से बाजार पर चौतरफा दबाव है। तकनीकी रूप से सोना $4,000 के अहम सपोर्ट को तोड़ चुका है, जिससे यह शॉर्ट-टर्म में $3,600 प्रति औंस तक नीचे जा सकता है। वहीं चांदी भी $60 के स्तर से नीचे आ चुकी है और $50 के निचले स्तर को छू सकती है। हालांकि, बाजार ओवरसोल्ड जोन में है, इसलिए जल्द ही एक शॉर्ट-कवरिंग रैली भी देखने को मिल सकती है।"
कॉलिन शाह (मैनेजिंग डायरेक्टर, कामा ज्वेलरी): "यह गिरावट किसी बड़ी मंदी का संकेत नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक आर्थिक हालातों के कारण आया एक 'हेल्दी करेक्शन' है। डॉलर की मजबूती से निवेशकों का रुझान थोड़ा बदला है, लेकिन भारत जैसे देशों में कीमतों में आई इस कमी का फायदा उठाकर लोग वैल्यू बाइंग (सस्ती कीमतों पर खरीदारी) शुरू करेंगे। लंबी अवधि में सोने और चांदी का आउटलुक तेजी का ही बना हुआ है।"
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