धर्म एवं ज्योतिष
शीतला सप्तमी में इन सामग्री की पड़ेगी जरूरत
10 Mar, 2026 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
शीतला सप्तमी या बसौड का पर्व 10 मार्च दिन मंगलवार को मनाया जाएगा, हर वर्ष यह पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है. हालांकि कुछ जगहों पर सप्तमी तिथि की पूजा अर्चना की जाती है और कुछ जगहों पर अष्टमी तिथि को पूजन करते हैं. मां शीतला को समर्पित इस पर्व में बासी भोजन का माता को भोग लगाया जाता है और घरों में भी बासी भोजन किया जाता है. मान्यता है कि मां शीतला की पूजा करने से चेचक, दाने-फुंसी और अन्य संक्रामक रोगों से परिवार की रक्षा होती है. अगर आप 10 मार्च को शीतला सप्तमी का पर्व मना रहे हैं तो पूजा से संबंधित चीजें अभी से इकट्ठा कर लें ताकि पूजन में कोई सामान ना होने से व्यवधान ना आए. यहां जानें संपूर्ण शीतला सप्तमी पूजा लिस्ट…
कैसा है माता शीतला का स्वरूप?
धार्मिक ग्रंथों में मां शीतला को गधे पर सवार, हाथ में झाड़ू, सूप और जल से भरा कलश धारण किए हुए बताया गया है. झाड़ू को साफ-सफाई का प्रतीक माना जाता है, जबकि कलश का जल रोगों को शांत करने का संकेत देता है. इसलिए इस पर्व को स्वच्छता और स्वास्थ्य से भी जोड़कर देखा जाता है.
शीतला सप्तमी (बसौड़ा) की पूजा सामग्री लिस्ट
रोली और हल्दी
अक्षत (चावल)
कुमकुम
फूल और फूलों की माला
धूप और दीपक
चने की दाल
घी या तेल
कपूर
नारियल
सुपारी और पान
कलश और जल
गंगाजल
मौली (कलावा)
गुड़ और बताशे
दही और दूध
हलवा या मीठा प्रसाद
एक दिन पहले बनाया हुआ भोजन (पूड़ी, पूरी-सब्जी, मीठे चावल आदि)
झाड़ू (मां शीतला का प्रतीक माना जाता है)
बासी भोजन रखने के लिए थाली
क्या है बसौड़ा की परंपरा?
शीतला सप्तमी को कई जगहों पर बसौड़ा कहा जाता है. बसौड़ा का अर्थ होता है बासी या एक दिन पहले बनाया हुआ भोजन. इस दिन घरों में चूल्हा या गैस नहीं जलाया जाता. इसके बजाय एक दिन पहले ही भोजन बनाकर रख लिया जाता है और अगले दिन उसी ठंडे भोजन को मां शीतला को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है. इस परंपरा के पीछे धार्मिक मान्यता यह है कि मां शीतला को ठंडा भोजन प्रिय है, इसलिए उन्हें ठंडे प्रसाद का भोग लगाया जाता है. बसौड़ा के प्रसाद में आमतौर पर पूड़ी, मीठे चावल, कढ़ी, सब्जी, दही, गुड़ और अन्य व्यंजन शामिल होते हैं.
चैत्र नवरात्रि के पहले दिन एक दुर्लभ संयोग: काशी में स्थित इस घाट पर, जो माता त्रिपुरसुंदरी से जुड़ा हुआ है, एक भव्य गंगा आरती का आयोजन किया जाएगा।
10 Mar, 2026 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
काशी जाने वाले भक्तों के लिए खुशी की खबर आई है. अब काशी में नवरात्रि के पहले दिन से नए घाट से भव्य गंगा आरती का आयोजन किया जा रहा है. नवरात्रि के साथ इस दिन हिंदू नववर्ष भी है, जिसे बेहद दुर्लभ संयोग माना जा रहा है. बताया जा रहा है कि इस घाट का संबंध मां त्रिपुरसुंदरी से है. आइए जानते हैं काशी मे अब किस घाट पर होने जा रही है भव्य गंगा आरती...
वाराणसी के ललिता घाट पर भी अब गंगा आरती शुरू होने जा रही है. यह आरती श्री काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट द्वारा 19 मार्च से आयोजित की जाएगी. पहले से ही नमो घाट पर गंगा आरती होती रही है लेकिन अब ललिता घाट पर भी यह आरती श्रद्धालुओं के लिए शुरू हो रही है. यह आरती चैत्र नवरात्रि के पहले दिन यानी हिंदू नववर्ष से शुरू हो रही है. हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि नवरात्रि की शुरुआत होती है. चैत्र नवरात्रि के दौरान, भक्तगण मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की हर दिन पूजा-अर्चना करते हैं. हिंदू नववर्ष से काशी में ललिता घाट पर गंगा आरती का होना सभी भक्तों के लिए खुशी की खबर लेकर आया है.
खास बात यह है कि विक्रम संवत 2083 की शुरुआत ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 19 मार्च से हो रहा है और यह नवरात्रि का भी पहला दिन है. ऐसे दुर्लभ संयोग बहुत कम देखने को मिलते हैं. इस दिन से ललिता घाट पर गंगा आरती का शुरू होना अपने आपमें बहुत महत्वपूर्ण है.
ललिता घाट, जिसे चौरासी घाटों में से एक माना जाता है, इस नए आरती आयोजन के लिए चुना गया है. इस घाट का नाम और महत्व इस आयोजन को और भी विशेष बना रहे हैं. दरअसल, मां ललिता 'मां त्रिपुरसुंदरी' का ही एक नाम है, जिन्हें तंत्र साधना में सर्वोच्च देवी माना जाता है और नवरात्रि में इनकी विशेष पूजा-अराधना होती है. ऐसे शुभ संयोग मिलकर यह आयोजन बहुत ही दुर्लभ और खास बना रहे हैं.
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास का उद्देश्य ही सनातन आस्था को बनाए रखना और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए लगातार काम करना है. न्यास ने इस आरती का आयोजन इसलिए किया है ताकि लोग धार्मिक अनुभव के साथ-साथ सुविधा और सहजता से इसका आनंद ले सकें. ट्रस्ट का ध्यान सिर्फ आयोजन तक सीमित नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि श्रद्धालु पूरी तरह सुरक्षित और आरामदायक वातावरण में आरती में भाग ले सकें.
इस नई गंगा आरती का समय शाम 6 बजे रखा गया है और यह निरंतरता के साथ नियमित रूप से आयोजित की जाएगी. ट्रस्ट का कहना है कि श्रद्धालु इस अवसर पर आएं और माता गंगा की आराधना में शामिल होकर अपनी भक्ति व्यक्त करें.
इस आयोजन के साथ ही वहां सुरक्षा, साफ-सफाई और अन्य व्यवस्थाओं का भी पूरा ध्यान रखा जाएगा. श्रद्धालु अगर इस आयोजन के बारे में कोई सुझाव या शिकायत देना चाहें तो इसके लिए ट्रस्ट की ईमेल आईडी उपलब्ध है.ट्रस्ट का कहना है कि हर सुझाव और शिकायत का समाधान किया जाएगा.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (10 मार्च 2026)
10 Mar, 2026 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- किसी आरोप से बचिये, मान-प्रतिष्ठा, प्रभुत्व वृद्धि के योग अवश्य ही बनेंगे।
वृष राशि :- कुछ बाधायें कष्टप्रद होंगी, स्त्री शरीर कष्ट होगा, समय का ध्यान रखें।
मिथुन राशि :- स्त्री वर्ग से हर्ष, चिन्ता, व्यवसाय कार्य में आरोप-प्रत्यारोप से बचिये।
कर्क राशि :- दैनिक व्यवसाय गति मंद रहेगी, असमर्थता का वातावरण बना ही रहेगा।
सिंह राशि :- धन का व्यर्थ व्यय होगा, दूसरों के कार्यों में हस्ताक्षेप न करें।
कन्या राशि :- विशेष कार्य स्थगित रखें फिर भी कार्य सफलता पूर्वक अवश्य होंगे।
तुला राशि :- आशानुकूल सफलता से हर्ष, दैनिक व्यवसाय गति उत्तम बनेगी।
वृश्चिक राशि :- अधिकारियों का मेल-मिलाप फलप्रद होगा तथा चिन्ता कम होगी।
धनु राशि :- विशेष कार्य स्थगित रखें, कार्यगति में सुधार होगा, कार्य योजना बनेगी।
मकर राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक होगा, कार्यगति में सुधार होगा, कार्य पर ध्यान दें।
कुंभ राशि :- कार्य क्षमता में अचानक असमर्थता का वातावरण बनेगा, धैर्य पूर्वक आगे बढ़ें।
मीन राशि :- अर्थ व्यवस्था में सुख, संतोष, धन प्रप्ति व समृद्धि के योग बनेंगे।
चाणक्य नीति: कठिन समय में चाणक्य की इन तीन बातों को हमेशा याद रखें, आप बड़े से बड़े संकट को भी आसानी से पार कर लेंगे।
9 Mar, 2026 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
चाणक्य वह दार्शनिक थे, जिन्होंने भारतीय राजनीति और राज्य व्यवस्था को सबसे अधिक प्रभावित किया. अपनी गहरी समझ, अध्ययन और तेज दिमाग के बल पर चाणक्य ने 320 ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त के नेतृत्व में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की. इस आर्टिकल में हम चाणक्य की 3 ऐसी शक्तिशाली शिक्षाओं के बारे में जानेंगे, जिन्हें हम कठिनाइयों और संघर्ष के समय अपना सकते हैं.
आचार्य चाणक्य को भारत का महान अर्थशास्त्री, कूटनीतिज्ञ और नीति-विशारद माना जाता है. उनके द्वारा लिखी गईं नीतियों से आज भी कई लोगों को ज्ञान और आगे बढ़ने का प्रोत्साहन मिलता है. पृथ्वी पर जन्म लिया है तो आपको कभी खुशियां मिलेंगी तो कभी बड़े से बड़े संकट एक साथ सामने आ जाएंगे, इसके लिए चाणक्य ने कई नीतियां बनाई हैं कि ऐसी परिस्थितियों में क्या करना चाहिए. अपनी गहरी समझ, अध्ययन और तेज दिमाग के बल पर चाणक्य ने एक नीति में 3 शक्तिशाली शिक्षाओं के बारे में बताया है, जो मुश्किल समय में राहत दिलाती हैं और बड़े से बड़ा संकट भी इन नीतियों के माध्यम से टल जाता है. आइए जानते हैं मुश्किल समय के लिए चाणक्य ने कौन सी नीति के बारे में बताया है...
अपनी प्रसिद्ध रचना चाणक्य नीति में आचार्य चाणक्य ने लिखा है कि 'मैं उनका आभारी हूं जिन्होंने मुझे छोड़ दिया, क्योंकि उन्होंने मुझे सिखाया कि मैं अकेले भी कर सकता हूं.' चाणक्य ने कहा है कि जीवन में हर किसी को कभी ना कभी झटके और असफलताओं का सामना करना पड़ता है. लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इन संघर्षों से और भी मजबूत होकर निकलते हैं. वे दूसरों की नकारात्मकता और राय को महत्व नहीं देते, वे अपने जीवन के मुख्य उद्देश्यों पर फोकस बनाए रखते हैं. आप भी अपने जीवन को एक मजबूत उद्देश्य से जोड़ों और बिना डरे उसकी ओर बढ़ें. यकीन मानिए कि आप अपनी इच्छाशक्ति और मेहनत से हर लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं. लोग क्या सोचते हैं या कहते हैं, इसका कोई फर्क नहीं पड़ता.
आचार्य हमेशा अपने मन को तेज करने पर जोर देते थे. उन्होंने लिखा है कि शिक्षा सुंदरता और जवानी से श्रेष्ठ है. आज के समय में लोग बाहरी चीजों के पीछे भागते हैं. वे कॉस्मेटिक सर्जरी, ब्रांडेड सामान या सुंदरता बढ़ाने वाले उत्पादों पर लाखों खर्च कर देते हैं. लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि इस दुनिया में सबसे बड़ी ताकत ज्ञान है. अगर आप इंसान की प्रकृति और जीवन के अलग-अलग पहलुओं को सही से समझ लेते हैं, तो आप संतुलित हो जाते हैं. आप आसानी से बेकार की चीजों और व्यर्थ की दौड़ से दूर हो सकते हैं. सच आपको आजाद कर सकता है. इसलिए अपने दिमाग को तेज करें. पढ़ें, सीखें. सही समझ विकसित करना ही हमारा उद्धार है.
'व्यक्ति अपने कर्मों से महान बनता है, जन्म से नहीं.' आचार्य चाणक्य का यह सच हमें अपनी जिंदगी की दिशा खुद चुनने की आजादी देता है. कोई व्यक्ति गरीब पैदा हो सकता है, लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसके पास अपनी किस्मत बदलने की ताकत होती है. अपने विचारों पर नियंत्रण रखें. अपने दिमाग को क्या खिला रहे हैं, इस पर ध्यान दें. महान लोगों की किताबें पढ़ें. ऊंचे सपने देखने वाले लोगों से दोस्ती करें. वर्तमान की छोटी-छोटी इच्छाओं का त्याग करें ताकि भविष्य में मिलने वाली महानता को पा सकें. अगर आप डटे रहे और मुश्किलों का सामना करते रहे, तो आपकी सफलता उतनी ही साफ नजर आएगी जितनी कल की धूप.
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर श्री काशी विश्वनाथ धाम में महिलाओं को मिलेगा खास उपहार! बनारस वालों के लिए विशेष व्यवस्था
9 Mar, 2026 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर वाराणसी स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन ने महिलाओं के लिए एक अत्यंत सराहनीय निर्णय लिया है. मंदिर प्रबंधन ने घोषणा की है कि इस विशेष दिन पर सभी महिलाओं को बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए निशुल्क और सुगम व्यवस्था प्रदान की जाएगी. यह सुविधा स्थानीय निवासियों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाली सभी महिला श्रद्धालुओं के लिए उपलब्ध होगी.
दर्शन के लिए विशेष प्रबंध
मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी, विश्वभूषण मिश्रा ने जानकारी दी कि 8 मार्च को महिलाओं के प्रवेश के लिए द्वार संख्या 4-बी को निर्धारित किया गया है. यहां से मातृशक्ति को सीधा प्रवेश दिया जाएगा, जिससे उन्हें लंबी कतारों और टिकट की परेशानी से मुक्ति मिलेगी.
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जो महिलाएं अपनी गोद में छोटे बच्चों को लेकर आएंगी, उन्हें दर्शन में विशेष प्राथमिकता दी जाएगी ताकि उन्हें किसी भी प्रकार की असुविधा न हो.
समय सारिणी और व्यवस्था
मंदिर प्रशासन के अनुसार, काशीवासियों के लिए सुबह 4 से 5 बजे और शाम 4 से 5 बजे तक का समय पहले की तरह आरक्षित रहेगा. इसके अतिरिक्त, शेष पूरे दिन महिलाओं के लिए यह विशेष प्रवेश और निःशुल्क दर्शन की सुविधा निरंतर जारी रहेगी.
इस पहल का उद्देश्य न केवल धार्मिक सुगमता प्रदान करना है, बल्कि समाज में ‘नारी शक्ति’ के सम्मान का एक सशक्त संदेश देना भी है.
न्यास की ओर से कल्याण कामना
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास ने इस निर्णय को मातृशक्ति के प्रति एक विनम्र भेंट बताया है. विश्वभूषण मिश्रा ने कहा, “हम कामना करते हैं कि भगवान विश्वनाथ का आशीर्वाद समस्त मानवता और आराधकों पर बना रहे. बाबा विश्वनाथ सभी श्रद्धालुओं और सनातन धर्मावलंबियों का कल्याण करें. हर हर महादेव.”
यह मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है. श्री काशी विश्वनाथ धाम में भव्य कॉरिडोर, निशुल्क दर्शन और विशेष पूजा व्यवस्था है. बाबा के दर्शन को प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. प्रशासन ने सभी भक्तों से अपील की है कि वे इस दिन शांति बनाए रखें ताकि नारी शक्ति को बाबा के दर्शन सुगमता से प्राप्त हो सकें.
अनोखा है 600 साल पुराने बुढ़िया माई मंदिर का इतिहास, यहां अकाल मृत्यु के संकट से मुक्ति की है अटूट मान्यता
9 Mar, 2026 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
19 मार्च से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होने वाली है और शक्तिपीठ और सिद्धपीठ मंदिरों में नव दुर्गा के पूजन की तैयारी शुरू हो चुकी है. हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होती है. प्रतिपदा तिथि से नवमी तिथि तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है. चैत्र नवरात्रि के दौरान, भक्तगण मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करते हैं. व्रत और उपवास का पालन किया जाता है और विशेष पूजा, हवन और कन्या पूजन का आयोजन होता है. नवरात्रि के पवित्र मौके पर आज हम आपको ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे, जहां मौत से पहले की चेतावनी मिल जाती है और यह सब मां दुर्गा के आशीर्वाद से संभव है. ऐइए जानते हैं माता रानी के इस पवित्र मंदिर के बारे में…
चमत्कारी और सिद्धपीठ मंदिर
देशभर में मां भगवती के कई चमत्कारी और सिद्धपीठ मंदिर मौजूद हैं, जिनकी मान्यताएं भक्तों को माता रानी की चौखट तक खींच लाती हैं, लेकिन क्या आपने कभी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है, जो मौत से पहले की चेतावनी देता है? यूपी के गोरखपुर में ऐसा मंदिर है, जो घटित होने वाली घटना के बारे में बताता है.
बुढ़िया माई मंदिर काल का मंदिर
गोरखपुर के कुसम्ही जंगल में बुढ़िया माई मंदिर है, जो जिला गोरखपुर से 12 किलोमीटर दूर है. जंगल के बीचो-बीच होने के बावजूद भी मंदिर में नवरात्रि के मौके पर भक्त बड़ी संख्या में दर्शन के लिए पहुंचते हैं. माना जाता है कि सिद्धपीठ में शामिल बुढ़िया माई मंदिर काल का मंदिर है, जो अकाल मृत्यु को टालने की क्षमता रखता है और इसकी गवाह है मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा. स्थानीय लोक कथाओं की मानें तो मंदिर के पास एक पुल हुआ करता था, जो बड़े नाले पर बना था. नाले के पास एक दिन बारात आकर रुकी. वहां सफेद साड़ी में मौजूद बुढ़िया ने आकर पुल पर न जाने की सलाह दी, लेकिन बारात के लोग नहीं माने. जैसे ही बारात पुल के बीचों-बीच पहुंची, पुल टूटकर गिर गया और सभी बारातियों की मौत हो गई.
बुढ़िया माई का मंदिर मौजूद
स्थानीय लोगों के मुताबिक, भविष्यवाणी के बाद बुढ़िया कहां गायब हो गई, किसी को नहीं पता. इसके बाद भी जंगल में रहने वाले जनजातीय लोगों ने बूढ़ी महिला को देखा, लेकिन वह एक पल में ओझल हो जाती थी. इसी पुल के पास आज भी बुढ़िया माई का मंदिर मौजूद है.
600 साल पुराना है मंदिर
मंदिर 600 साल पुराना है, लेकिन आस्था से प्रदेश के मंत्री और मुख्यमंत्री भी अछूते नहीं हैं. सीएम योगी कई बार मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचे हैं. नवरात्रि के समय मंदिर में विशेष अनुष्ठान होते हैं, और भक्त मनोकामना पूर्ति के लिए पैदल जंगल की यात्रा भी करते हैं. इस मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को एक बड़ी नदी भी पार करनी होती है, जिसके लिए नाव का प्रबंधन रहता है. मंदिर तक पहुंचने के लिए शहर के मोहद्दीपुर चौराहे से ऑटो या जीप जैसे वाहन का सहारा ले सकते हैं. वाहन आपको एयरपोर्ट होते हुए कुसम्ही जंगल पहुंचाएगा.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (09 मार्च 2026)
9 Mar, 2026 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- कुटुम्ब की समस्या में समय बीतेगा, धन का व्यय होगा, लाभ मिलेगा।
वृष राशि :- मानसिक बेचैनी, क्लेश व अशांति के योग बनेंगे तथा कार्य व्यवसाय से लाभ होगा।
मिथुन राशि :- व्यर्थ भ्रमण से धन हानि होगी, आरोप व क्लेश से बचें, मानसिक स्थिति पर नियंत्रण अवश्य रखें।
कर्क राशि :- परिश्रम से कुछ सफलता मिले, अर्थ-व्यवस्था की अनुकूलता होगी ध्यान दें।
सिंह राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक होगा, कार्यगति में सुधार होगा, समय का ध्यान रखें।
कन्या राशि :- सामाजिक कार्य में प्रभुत्व वृद्धि होगी, धन का लाभ अवश्य ही मिलेगा।
तुला राशि :- अधिकारी वर्ग से विशेष समर्थन फलप्रद होगा तथा व्यय भार बढ़ेगा।
वृश्चिक राशि :- धन लाभ, कार्य कुशलता से संतोष, पराक्रम एवं समृद्धि के योग बनेंगे।
धनु राशि :- व्यवसाय गति उत्तम, मित्रों से सहयोग मिलेगा, रुके कार्य बनेंगे।
मकर राशि :- मनोबल उत्साहवर्धक होगा, दैनिक कार्यगति में सुधार, सफलता मिलेगी।
कुंभ राशि :- कार्य व्यवसाय में धन का व्यय अधिक होगा, व्यय संभलकर करें।
मीन राशि :- समृद्धि के साधन जुटायें, इष्ट मित्र सुखवर्धक होंगे, कार्य पर ध्यान रखें।
रंग पंचमी को देवताओं की होली क्यों कहा जाता है? ये अनुष्ठान घरों और मंदिरों में किए जाते हैं।
8 Mar, 2026 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
रंग पंचमी का पर्व 8 मार्च दिन रविवार को धूमधाम से मनाया जाएगा, हर वर्ष यह पर्व होली के पांचवे दिन यानी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है. रंग पंचमी को देव पंचमी भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन देवी-देवता पृथ्वी पर आकर भक्तों के साथ धूमधाम से होली खेलते हैं. रंग पंचमी का पर्व ब्रज में 40 दिन तक लगातार चलने वाली होली के समापन के तौर पर भी मनाया जाता है. हिंदू धर्म में जिस तरह कार्तिक पूर्णिमा को देवताओं की दिवाली मनाई जाती है, ठीक उसी तरह रंग पंचमी को देवताओं की होली मनाई जाती है. इस दिन मंदिरों और घरों में कुछ खास अनुष्ठान किए जाते हैं. आइए जानते हैं रंग पंचमी का महत्व…
रंग पंचमी का महत्व
रंग पंचमी को कृष्ण पंचमी और देव पंचमी के नाम से भी जाना जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन ब्रज में भगवान श्रीकृष्ण ने राधारानी और गोपियों के साथ होली खेली थी इसलिए सभी देवी-देवता इस दिन पृथ्वी पर होली खेलने आते हैं. चंदन, हल्दी समेत सभी तरह के फूलों से बने रंग को आसमान में उड़ाते हैं और कृष्ण लीला का आनंद लेते हैं. यह पर्व मुख्यत: ब्रज, राजस्थान, इंदौर समेत कुछ ही जगहों पर मनाया जाता है
होली की विदाई का पर्व रंग पंचमी
रंग पंचमी के दिन मंदिरों और घरों में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं, जिसमें नृत्य, संगीत और खेल शामिल हैं. रंग पंचमी का त्योहार सामाजिक एकता और भाईचारे को बढ़ावा देता है. रंगों के माध्यम से सभी लोग एक दूसरे के करीब आते हैं और पुरानी दुश्मनियों को भूलकर एक नए सिरे से दोस्ती की शुरुआत करते हैं. इस अवसर पर लोग अपने घरों को सजाते हैं और स्वादिष्ट पकवान बनाते हैं. रंग पंचमी का उत्सव बच्चों और बूढ़ों, सभी के लिए यादगार होता है. इस दिन की खुशियां हर चेहरे पर रंग भर देती हैं और हर दिल में उमंग जगाती हैं. रंग पंचमी पर होली खेलकर होली के पर्व को विदाई भी देते हैं.
रंग पंचमी पर मंदिरों और घरों में होते हैं ये अनुष्ठान
रंग पंचमी पर कृष्णजी के मंदिरों में धूमधाम से होली मनाई जाती है और विशेष झांकियों के दर्शन होते हैं.
इस दिन मंदिरों और अन्य जगहों पर सामूहिक रंगोत्सव होता है और घर के सदस्य शामिल होते हैं.
रंग पंचमी पर राधा-कृष्ण की पूजा अर्चना करते हैं और सबसे पहले गुलाल उनके चरणों में अर्पित करते हैं.
शहर-गांव व कस्बों में पारंपरिक गायन, नृत्य, लोक कार्यक्रम आदि आयोजित किए जाते हैं.
रंग पंचमी पर घरों में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं.
रंग पंचमी को एक दूसरे को गुलाल लागकर बधाईयां देते हैं और होली की विदाई भी करते हैं
800 से ज्यादा मूर्तियां और बड़े पत्थरों को काटकर बनाया गया है खजुराहो का यह मंदिर, देखते रह जाएंगे इसकी खूबसूरती
8 Mar, 2026 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आपने भगवान शिव के कई मंदिरों के दर्शन किए होंगे लेकिन भगवान शिव का एक ऐसा मंदिर है, जिसका हर पत्थर महादेव का गुणगान करता है. यह मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है. इस मंदिर की वास्तुकला देखने लायक है और मंदिर को बनाने की इंटरलॉकिंग तकनीक अपनाई गई है. आइए जानते हैं भगवान शिव के इस मंदिर के बारे में...
देश के हर हिस्से में देवों के देव महादेव को समर्पित बड़े और विशाल मंदिर हैं, जहां अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए भक्त लंबे समय से आते रहे हैं. भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग के प्रति हर भक्त की आस्था बड़ी है, लेकिन खजुराहो में भगवान शिव का ऐसा मंदिर है जो कला और संस्कृति के साथ मनोकामना पूर्ति के लिए विश्व प्रसिद्ध है. हम बात कर रहे हैं कंदरिया महादेव मंदिर की, जिसका हर पत्थर महादेव का गुणगान करता है. मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त कंदरिया महादेव मंदिर में आकर पूजा अर्चना करता है, उसकी सभी मनोकामना पूरी होती हैं और ग्रह-नक्षत्र के अशुभ प्रभाव से मुक्ति भी मिलती है. आइए जानते हैं महादेव के इस मंदिर के बारे में...
वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है कंदरिया महादेव मंदिर - मध्य भारत के खजुराहो मंदिर स्थल पर बचे हुए मंदिरों में सबसे बड़े और सबसे ऊंचे मंदिरों में शामिल कंदरिया महादेव मंदिर ना सिर्फ आस्था की दृष्टि से, बल्कि कला और संस्कृति के नजरिए से भी खास है. मंदिर के बड़े गर्भगृह में भगवान शिव की लिंग स्वरूप पूजा की जाती है. मंदिर पर हुए आक्रमणों की वजह से भी मंदिर इतिहास के पन्नों में दर्ज है, लेकिन सबसे खास है मंदिर को बनाने की 'इंटरलॉकिंग तकनीक'. 'इंटरलॉकिंग तकनीक' से तात्पर्य मंदिर की आर्किटेक्चर से है, जिसे देखकर ऐसा लगता है कि मंदिर पर उकेरी गई हर प्रतिमा एक दूसरे में उलझी हुई है. यह पता लगाना मुश्किल है कि कौन सी प्रतिमा कहां से शुरू होती है और कहां खत्म.
मंदिर में बनीं प्रतिमाएं देखने लायक - मंदिर होने के बावजूद भी मंदिर की दीवारों पर खजुराहो की संस्कृति भी देखने को मिलती है. मंदिर की दीवारों से मंदिर के भीतर 800 से ज्यादा प्रतिमाएं पत्थरों पर बारीकी से उकेरी गई हैं, और यही मंदिर की सबसे अद्भुत बात है. मंदिर पर उकेरी गई प्रतिमाओं को इतनी बारीकी से उकेरा गया है कि साड़ी की सिलवटें, नाखून और आभूषणों की चमक को देखा जा सकता है.
यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है मंदिर - यह मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है. खास बात ये है कि मंदिर का निर्माण बलुआ पत्थर की चट्टान से किया गया है और देखने पर ऐसा लगता है कि मंदिर के निर्माण में एक ही विशाल चट्टान का इस्तेमाल किया गया है.
चंदेल राजा विद्याधर ने करवाया था निर्माण - कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण चंदेल राजा विद्याधर ने महमूद गजनवी को दूसरी बार हराने के बाद किया था और इसे उनकी जीत का प्रतीक माना गया. मंदिर इतना बड़ा और इस तरीके से बनाया गया है कि जब सुबह सूरज की पहली किरण मंदिर पर पड़ती है, तो मंदिर सोने की तरह चमक उठता है और एक दिव्य और शक्तिशाली ऊर्जा शरीर में महसूस होती है.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (08 मार्च 2026)
8 Mar, 2026 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- धन का व्यय संभव, तनावपूर्ण वार्ता से बचिये, कार्य समय पर निपटा लें।
वृष राशि :- अधिकारियों के समर्थन से सफलता, कार्य कुशलता से संतोष अवश्य होगा।
मिथुन राशि :- चिन्तायें कम होंगी, सफलता के कार्य जुटायें, शुभ समाचार अवश्य मिलेगा।
कर्क राशि :- बड़े-बड़े लोगों से मेल-मिलाप होगा, सुख-समृद्धि के साधन बनेंगे।
सिंह राशि :- स्त्री वर्ग से हर्ष-उल्लास होगा तथा भोग-ऐश्वर्य की प्राप्ति अवश्य होगी।
कन्या राशि :- प्रतिष्ठा बाल-बाल बचे, संघर्ष से अधिकार प्राप्त होंगे, समय का ध्यान रखें।
तुला राशि :- प्रत्येक कार्य बाधा युक्त रखें, स्थिति सामर्थ पूर्ण होगी, रुके कार्य अवश्य बनेंगे।
वृश्चिक राशि :- कुटुम्ब और धन की इच्छा बनेगी, परिश्रम से सोचे कार्य अवश्य बनेंगे।
धनु राशि :- भावनायें विक्षुब्ध रहेंगी, दैनिक कार्यगति मंद रहेगी, सामाजिक कार्य में सहयोग करेंगे।
मकर राशि :- तनाव, क्लेश व अशांति, धन का व्यय, सामाजिक खिन्नता अवश्य बनेगी।
कुंभ राशि :- कार्य कुशलता से संतोष, व्यवसायिक समृद्धि के साधन जुटायेंगे, कार्य बनेंगे।
मीन राशि :- कुटुम्ब के कार्यों में समय बीतेगा, हर्षप्रद समाचार अवश्य ही मिलेगा।
10 या 11 मार्च कब मनाई जाएगी शीतला अष्टमी?
6 Mar, 2026 06:45 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
हिंदू धर्म में Sheetala Mata की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है. माता शीतला को रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है. खासकर त्वचा से जुड़ी बीमारियों से बचाव के लिए भक्त माता शीतला की आराधना करते हैं. इसी वजह से शीतला अष्टमी का पर्व धार्मिक के साथ-साथ स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना जाता है.
कब है शीतला सप्तमी और अष्टमी
वैदिक पंचांग के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि 9 मार्च की रात 11 बजकर 27 मिनट से शुरू होगी और 11 मार्च की रात 1 बजकर 54 मिनट तक रहेगी. उदया तिथि के अनुसार 10 मार्च को शीतला सप्तमी मनाई जाएगी.
इस दिन पूजा का शुभ समय सुबह 6 बजकर 24 मिनट से शाम 6 बजकर 26 मिनट तक रहेगा. वहीं 11 मार्च को बसोड़ा या शीतला अष्टमी मनाई जाएगी.
क्यों खाया जाता है एक दिन पहले बना भोजन
शीतला अष्टमी की खास परंपरा यह है कि इस दिन घरों में ताजा भोजन नहीं बनाया जाता. व्रत रखने वाली महिलाएं सप्तमी के दिन ही भोजन तैयार कर लेती हैं. अगले दिन उसी भोजन को माता का प्रसाद मानकर ग्रहण किया जाता है. इस परंपरा को बसोड़ा कहा जाता है.
बच्चों की रक्षा के लिए रखा जाता है व्रत
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. आनंद भारद्वाज के अनुसार यह व्रत खासतौर पर बच्चों की सेहत और रोगों से बचाव के लिए रखा जाता है. महिलाएं एक दिन पहले स्नान करके माता के लिए भोग तैयार करती हैं, जिसमें कढ़ी-चावल, पूड़ी, पकौड़ी और बरा जैसे व्यंजन शामिल होते हैं.
मंदिरों में उमड़ती है भक्तों की भीड़
शीतला अष्टमी के दिन शहर के देवी मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है. भक्त माता शीतला की पूजा कर परिवार के सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना करते हैं.
गदा नहीं, धनुष-बाण वाले ‘हनुमान’! इस मंदिर में छिपा है शत्रुघ्न और लवणासुर युद्ध का त्रेतायुगीन रहस्य
6 Mar, 2026 06:30 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
आज हम आपको एक ऐसे हनुमान मंदिर की कहानी बताने जा रहे हैं जिनका इतिहास त्रेतायुग से बताया गया है. किंवदंती है कि इस मंदिर में श्री राम के अनुज शत्रुघ्न ही महावीर के रुप में विराजमान हैं. इसलिए यहां हनुमान जी की मूर्ति गदा नहीं धनुष-बाण लिए है. यह मूर्ति भी एक चट्टान से प्रकट बताई जाती है.
मां लवकुश नगर शहर का इतिहास माता बंबरबेनी से जुड़ा है. दरअसल, माता बंबरबेनी मां सीता ही थीं. रामायण में वाल्मीकि आश्रम चित्रकूट बताया जाता है. और यह जगह चित्रकूट से 150 किमी दूर है. यहां भी वाल्मीकि आश्रम का परिसर आता था. यहां मां बंबरबेनी पहाड़ी है. जहां साधु-संत, ऋषि मुनि तपस्या करते रहते थे लेकिन इसी पहाड़ी के सामने एक और पहाड़ी है जहां पर लवणासुर नाम का राक्षस रहता था. यह राक्षस आए दिन साधु-संत की तपस्या और यज्ञ हवन-पूजन में बाधा डालता रहता था.
साधु-संत ने ली रामजी की शरण
फिर एक दिन सभी ऋषि मुनि और साधु-संत प्रभु श्री राम की शरण में गए. प्रभु श्री राम जी उन्हें आश्वासन दिया कि निश्चिंत होकर अपनी तपस्या कीजिए. लवणासुर के वध के लिए मैं अपने छोटे भाई शत्रुघ्न को भेजता हूं. जैसे ही शत्रुघ्न को जानकारी दी जाती है वह लवणासुर का वध करने के लिए निकल पड़ते हैं.
लवणासुर का किया वध
सभी ऋषि मुनि शत्रुघ्न का स्वागत करते हैं और लवणासुर की उस पहाड़ी की भी जानकारी देते हैं जहां लवणासुर रहता था. इसके बाद शत्रुघ्न और लवणासुर के बीच भीषण युद्ध होता है. जिसमें लवणासुर मारा जाता है और शत्रुघ्न की जीत होती है. सभी ऋषि मुनि और भक्त शत्रुघ्न महाराज से विनती करते हैं कि आपका इसी पहाड़ी के सामने आपको स्थापित करना चाहते हैं. इसके बाद एक बड़ी सी शिला से शत्रुघ्न महाराज की मूर्ति प्रकट होती है. जिसके बाद यहां शत्रुघ्न भगवान स्थापित कर दिए जाते हैं और कालांतर में यहां मंदिर भी बना दिया जाता है.
महावीर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध
वहीं मंदिर के पुजारी बताते हैं कि ये मंदिर तो शत्रुघ्न भगवान का है लेकिन अब इस मंदिर को महावीर मंदिर के नाम से जाना जाने लगा है. ज्यादातर लोग इस मूर्ति को ध्यान से नहीं देखते हैं और वह हनुमान जी की मूर्ति समझ लेते हैं. जबकि इस मूर्ति में शत्रुघ्न भगवान ने गदा नहीं धनुष-बाण ले रखा है. फिर भी जो इस मूर्ति के बारे में जानते नहीं हैं तो वह इसे हनुमान मंदिर ही समझ लेते हैं.
वारंगल में देवी का अद्भुत मंदिर! जहां भद्रकाली की बाईं आंख में लगा था कोहिनूर हीरा, जानें कैसे पहुंचा अंग्रेजों तक?
6 Mar, 2026 06:15 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
19 मार्च से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो रही है, जो 27 मार्च तक है. चैत्र नवरात्रि में मां भगवती के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है, जो देश के हर हिस्से में विद्यमान हैं, लेकिन क्या आप मां के ऐसे उग्र रूप के बारे में जानते हैं कि जिनका संबंध कोहिनूर हीरे से था. आज हम आपको वारंगल की भद्रकाली मां के चमत्कारों के बारे में बताएंगे, जिस पर कई बार आक्रमण हुआ, लेकिन मंदिर आज भी मजबूती से खड़ा है. लेकिन कोहिनूर हीरा अंग्रेजों के पास पहुंच गया.
भद्रकाली झील के किनारे है देवी का मंदिर
तेलंगाना के वारंगल में स्थित भद्रकाली मंदिर भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है, जो देवी भद्रकाली को समर्पित है. वारंगल और हनमकोंडा शहरों के बीच एक पहाड़ी की चोटी पर भद्रकाली झील के किनारे स्थित इस मंदिर का निर्माण 625 ईस्वी में चालुक्य साम्राज्य ने कराया था.
काकतीय वंश के राजा ने भेंट की कोहिनूर
हालांकि इतिहास में मंदिर के निर्माण का श्रेय काकतीय वंश से भी जोड़कर देखा जाता है, जहां के राजा ने मां भद्रकाली को कोहिनूर भेंट किया था.
दिल्ली सल्तनत के मंदिर पर आक्रमण करने से पहले मंदिर में पत्थर की विशाल मां भद्रकाली की प्रतिमा स्थापित थी. काकतीय राजा प्रतापरुद्र द्वितीय ने खदान से निकलने कोहिनूर हीरे को सुरक्षित रखने के लिए मां भद्रकाली की बाईं आंख में लगवा दिया था.
आक्रमणकारियों ने हमला कर ले लिया कोहिनूर
लेकिन दो शताब्दियों के बाद मंदिर पर आक्रमणकारियों ने हमला किया और मंदिर को खंडित करके कोहिनूर को अपने साथ ले गए. मंदिर आक्रमणकारियों के राज में कई सालों तक वीरान पड़ा रहा. दिल्ली के मुस्लिम शासकों से होते हुए वह कोहिनूर अंग्रेजों तक पहुंच गया.
1950 से पूर्व दोबारा हुआ मंदिर का निर्माण
1950 से पहले लोगों ने आपसी सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया और धातु से बनी और रत्न जड़ी प्रतिमा की स्थापना की. 1950 के बाद ही मंदिर में भक्त दोबारा दर्शन के लिए जा रहे हैं और आज मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला, समृद्ध इतिहास और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है.
गर्भगृह में है धातु और रत्नों से जड़ी प्रतिमा
मंदिर के गर्भगृह में मां की धातु और रत्नों से जड़ी प्रतिमा स्थापित है, जिनकी आठ भुजाएं हैं और आठों भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र स्थापित हैं. मां भद्रकाली का यह स्वरूप ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक है. मूल रूप से यह मंदिर नागर शैली में निर्मित है, जिसमें एक वर्गाकार गर्भगृह, एक पिरामिडनुमा शिखर और एक स्तंभों वाला हॉल है.
खास बात यह भी है कि स्थानीय मान्यता रही है कि जिसने भी कोहिनूर को पाने का लालच किया, वो हमेशा बर्बाद हुआ, चाहे वो मुगल आक्रमणकारी हों या फिर फारसी या अंग्रेज शासक. जिसने भी कोहिनूर को पाया, वो बर्बाद ही हुआ. माना जाता है कि कोहिनूर सिर्फ मां भद्रकाली के पास ही संरक्षित था.
महाभारत : क्या थे द्रौपदी के 3 महापाप, जिसके कारण स्वर्ग के रास्ते में ही सबसे पहले उड़े प्राण पखेरू
6 Mar, 2026 06:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
पांडवों को एक समय के बाद लगा कि अब उनका राजपाट करने का समय पूरा हो गया. अब समय इसे त्यागकर हिमालय के रास्ते स्वर्ग की चढ़ाई करने का है. पांचों पांडवों के साथ द्रौपदी भी इस यात्रा में उनके साथ थीं. हिमालय की आधी चढ़ाई उन्होंने चढ़ ली थी. सभी को लग रहा था कि उन्होंने इतने अच्छे काम किए हैं कि सब शरीर के साथ स्वर्ग पहुंचेंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. जैसे ही मुश्किल चढ़ाई शुरू हुई तब सबसे पहले द्रौपदी गिरीं और फिर उठी नहीं. उनके प्राण पखेरू उड़ गए. युधिष्ठर को छोड़कर चारों पांडव भाई हैरान रह गए कि ऐसा क्यों हो गया. इसकी वजह थी द्रौपदी के तीन महापाप, जो उनकी राह में अड़ंगा बन गए.
क्या ये द्रौपदी के तीन बड़े महापाप. जिसके बारे में युधिष्ठर ने विलाप करते अपने भाइयों को बताया. भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव विलाप कर रहे थे कि आखिर कैसे द्रौपदी उन्हें इस स्वर्ग के रास्ते में सबसे पहले ही छोड़कर चली गईं. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था. तब युधिष्ठर ने ही अपने विचलित भाइयों को इसकी वजह बताई. ये थी द्रौपदी के तीन महापाप, जिसे सुनकर सभी को झटका लगा. अर्जुन का सिर झुक गया.
दरअसल हस्तिनापुर में राजपाट करते हुए ये संकेत मिलने लगे थे कि अब युधिष्ठिर और बाकी पांडवों को राजपाट छोड़कर आध्यात्म के रास्ते पर जाने का समय आ गया है. कृष्ण के निधन ने पांडवों और द्रौपदी को झकझोर दिया था. लिहाजा उन्होंन तय कर लिया कि अब वो हिमालय की ओर जाएंगे और वहां स्वर्ग के रास्ते पर चढ़ाई करेंगे.
इस रास्ते पर जब उन्होंने चढ़ाई शुरू की तो एक के बाद एक परेशानी आनी शुरू हो गई. ये रास्ता कतई आसान नहीं था. हिमालय के आगे के रास्ते पर सबसे पहले द्रौपदी लड़खड़ाईं. फिर गिरीं. पता लगा कि उनकी सांस जा चुकी है. अब वह सशरीर स्वर्ग नहीं पहुंचेंगी. तो ऐसा क्या हुआ था.
चूंकि युधिष्ठिर ही उनमें सबसे ज्यादा जानकार थे. धर्म को सबसे ज्यादा जानते थे. कर्म को जानते थे तो उन्हें पता लग गया कि ऐसा क्यों हुआ है. उन्होंने ही अपने भाइयों से बताया कि द्रौपदी अपने तीन बड़े पापों के कारण सबसे पहले उन लोगों का साथ छोड़ गईं
3 महापाप आखिर क्या थे
तो वो तीन पाप क्या थे. युधिष्ठिर इनके बारे में भी जानते थे. बेशक वो जीवन भर चुप रहे. इस बारे में कभी एक शब्द भी नहीं बोला लेकिन उस दिन उन्होंने पहली बार ये बताया कि आखिर उन सभी की पत्नी द्रौपदी ने कौन से तीन पाप कर डाले.
पहला महापाप, जिससे अर्जुन का सिर झुका
द्रौपदी ने अर्जुन को अपने अन्य पतियों की तुलना में अधिक प्रेम और महत्व दिया था, जो धर्म के अनुसार अनुचित था. एक पत्नी का कर्तव्य सभी पतियों के प्रति समान भाव रखना था, लेकिन द्रौपदी ऐसा नहीं कर पाई. ये उनका सबसे बड़ा पाप था. वो अर्जुन को लेकर सबसे ज्यादा फिक्र करती थीं. किसी भी पति के साथ रहने पर भी उन्हें अर्जुन का ही खयाल रहता था. जब अर्जुन ने दूसरी शादियां कीं तो द्रौपदी सबसे ज्यादा विचलित और नाराज हुईं. ऐसा उन्होंने किसी और पांडवों की शादी पर नहीं किया.
जब युधिष्ठर ने द्रौपदी के इस पहले महापाप के बारे में अपने भाइयों को बताया तो अर्जुन का सिर झुक गया. उन्हें पश्चाताप होने लगा कि उन्होंने क्यों ऐसा होने दिया.
दूसरा महापाप यानि द्रौपदी का अहंकार
द्रौपदी को अपने रूप पर बहुत अहंकार था. वह हमेशा अपनी बुद्धिमत्ता और सौंदर्य पर गर्व करती थीं. ये उनका एक पाप था. इसे लेकर उन्होंने अपने स्वयंवर में कर्ण समेत कई राजाओं का अपमान किया.
द्रौपदी का सौंदर्य-गर्व उनकी पहचान का अंग था. वह जानती थीं कि वह अपूर्व सुंदर हैं. इसका उपयोग उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव के लिए भी किया. हालांकि महाभारत सीख देता है कि शारीरिक या बौद्धिक गुणों पर अत्यधिक गर्व मोक्ष के मार्ग में रुकावट बन सकता है. उनका अहंकार भी महाभारत में कई मौकों पर झलकता रहा.
द्रौपदी के स्वयंवर में शर्त थी कि कोई धनुर्विद्या में निपुण योद्धा मछली की आँख को निशाना लगाए. जब कर्ण (जो सूतपुत्र माने जाते थे) उठे, तो द्रौपदी ने स्पष्ट रूप से कहा, “मैं एक सूतपुत्र को वरमाला नहीं पहनाऊंगी.” ये उनके अहंकार का पहलू था, यहां द्रौपदी ने अपने राजकुलीन अभिमान और जातिगत दंभ को प्रकट किया.
तीसरा महापाप, जो दुर्योधन से संबंधित था
उन्होंने दुर्योधन का जिस तरह अपमान किया, वो वाकई गलत था और गलत तरीके से किया गया. द्रौपदी ने दुर्योधन का “अंधे का पुत्र अंधा” कहकर अपमान किया था, जिसके पाप का प्रभाव भी उसके जीवन में रहा. पांडवों के जीवन में इसके बाद ही कष्ट आने शुरू हुए. इसी वजह से उन्हें वनवास हुआ और इसकी परिणति महाभारत जैसे युद्ध के रूप में भी हुई.
एक राजकुमारी होने के नाते उसे इतना कठोर अपमान नहीं करना चाहिए था. इसी घटना ने दुर्योधन के मन में द्रौपदी और पांडवों के प्रति घृणा भर दी, जो चीरहरण और महाभारत युद्ध का एक कारण बना.
क्या द्रौपदी के पाप क्या बहुत ज्यादा थे
द्रौपदी के पाप (दोष) अन्य पांडवों की तुलना में अधिक थे, लेकिन उसकी मृत्यु सबसे पहले इसलिए हुई क्योंकि उसमें आसक्ति, पक्षपात और कुछ अहंकार जैसे दोष मौजूद थे, जो मोक्ष प्राप्ति में बाधक थे. हालांकि, यह नहीं कहा जा सकता कि उसके पाप “बहुत ज्यादा” थे.
सहदेव का पाप
इसके बाद रास्ते में सहदेव गिरे. तब भीम ने युधिष्ठिर से पूछा, माद्रीपुत्र सहदेव के अंदर तो ना किसी तरह का घमंड और ना उसने कभी हम लोगों की सेवा में कोई कोताही की तो फिर वो गिर गया. युधिष्ठिर ने जवाब दिया कि सहदेव का पाप ये था कि वो सोचते थे कि उनसे अधिक बुद्धिमान और कोई नहीं.
नकुल का पाप
उसके बाद नकुल गिरे. भीम ने फिर सवाल किया कि हमारा ये भाई तो कभी धर्म से अलग नहीं हुआ. हमेशा हमारी आज्ञा का पालन किया, फिर वो क्यों गिरे. अब युधिष्ठिर ने जवाब दिया, नकुल सोचते थे कि उन जैसा रूपवान कोई नहीं. इसी वजह से नकुल को अपने कर्मों का फल मिला है.
अर्जुन भी नहीं बच पाए पाप से
सभी बचे पांडव शोकाकुल थे. सभी को लग रहा था कि पता नहीं कब किसका नंबर आ जाए. अब तो केवल युधिष्ठिर, अर्जुन और भीम ही बचे थे. कुछ देर जाने पर अर्जुन गिरे और प्राण छोड़ दिया. अब दुखी भीम ने पूछा – भाई युधिष्ठिर अब ऐसा क्यों हो गया. अर्जुन ने तो कभी झूठ नहीं बोला, फिर ये दशा क्यों हुई. युधिष्ठिर बोले, अर्जुन हमेशा घमंड किया करते थे कि एक ही दिन में सभी शत्रुओं का नाश कर देंगे, परंतु कभी ऐसा कर नहीं सके. घमंड ही उनका पाप था. इसके साथ साथ वह दूसरे धनुर्धरों का अनादर भी करते थे. ऐसा कहकर युधिष्ठिर आगे बढ़ गए.
और आखिर में कौन सा पांडव गिरा
अब भीम भी जमीन पर गिर पड़े. गिरते गिरते बड़े भाई से पूछा, महाराज मैं भी गर पड़ा हूं. मैं हमेशा आपका प्रिय रहा. आखिर मेरी ये हालत क्यों हो गई. युधिष्ठिर बोले, तुम बहुत अधिक भोजन किया करते थे. हमेशा अपनी ताकत पर कुछ ज्यादा ही घमंड करते थे. अब युधिष्ठिर के साथ उनका कुत्ता ही बचा रह गया.
तब इंद्र किसके लिए रथ लेकर पहुंचे
तभी इंद्र वहां स्वर्ग से रथ के साथ पहुंचे. युधिष्ठिर से बोले, तुम मेरे रथ पर आ जाओ और सशरीर स्वर्ग पर चलो. तब दुखी युधिष्ठिर ने कहा, इंद्र मेरे सारे भाई और पत्नी मरकर यहां पड़े हुए हैं. मैं इनको छोड़कर कैसे जा सकता हूं. तब इंद्र ने कहा, ये लोग देह छोड़कर पहले ही स्वर्ग पहुंच चुके हैं. इसलिए धर्मराज आप मेरे साथ चलिए.
तब भी वह तैयार नहीं हुए. उन्होंने कहा, युधिष्ठिर बोले, यह कुत्ता मेरा भक्त है. मैं इसे भी अपने साथ ले जाना चाहता हूं, नहीं तो ये मेरी निर्दयता होगी.
तब इंद्र को कौन सी बात माननी पड़ी
इंद्र ने फिर युधिष्ठिर को समझाने की कोशिश की कि कुत्ते को छोड़ दें लेकिन युधिष्ठिर नहीं माने. तब आखिरकार इंद्र को मानना पड़ा. और तभी कुत्ते की जगह भगवान धर्म प्रगट हो गए और युधिष्ठिर की तारीफ करते हुए बोले तुमने जिस तरह भक्त कुत्ते के लिए दया दिखाई. उससे तुमने साबित कर दिया कि तुम हर तरह से श्रेष्ठ हो और सशरीर स्वर्ग में पहुंचोगे. तब इंद्र उन्हें अपने रथ पर बिठाकर स्वर्ग ले गए. जहां पांडव पहले से मौजूद थे.
राशिफल: जानिए, कैसा रहेगा आपका आज का दिन (06 मार्च 2026)
6 Mar, 2026 12:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मेष राशि :- मान-प्रतिष्ठा बाल-बाल बचे, कार्य व्यवसाय गति उत्तम होगी, हर्ष होगा।
वृष राशि :- धन हानि के योग बनेंगे, नवीन मैत्री-मंत्रणा अवश्य ही प्राप्त होगी।
मिथुन राशि :- इष्ट मित्र सहायक रहेंगे, व्यवसायिक क्षमता में वृद्धि होगी, कार्य अवश्य होंगे।
कर्क राशि :- भाग्य का सितारा प्रबल होगा, बिगड़े कार्य अवश्य ही बनेंगे ध्यान दें।
सिंह राशि :- इष्ट मित्र सुखवर्धक होंगे, कुटुम्ब की समस्यायें सुलझेंगे, समय का ध्यान रखें।
कन्या राशि :- भावनायें संवेदनशील रहें तथा रुके कार्य बनेंगे, सोचे कार्यों पर ध्यान दें।
तुला राशि :- समय अनुकूल नहीं स्वास्थ्य का ध्यान रखें, विरोधी तत्व परेशान करेंगे।
वृश्चिक राशि :- स्त्री शरीर कष्ट, मानसिक बेचैनी, मन में उद्विघ्नता अवश्य ही बनेगी।
धनु राशि :- आशानुकूल सफलता, स्थिति में सुधार तथा व्यवसाय गति उत्तम होगी।
मकर राशि :- धन का व्यर्थ व्यय होगा, मानसिक उद्विघ्नता हानिप्रद होगी ध्यान रखें।
कुंभ राशि :- इष्ट मित्रों से सहयोग, कार्य बनेंगे, कार्यगति अनुकूल अवश्य होगी।
मीन राशि :- भाग्य का सितारा प्रबल होगा, कार्य अवश्य बनेंगे ध्यान दें।
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