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इजराइली राष्ट्रपति सिडनी पहुंचे, कुछ समूह और आम लोग इस यात्रा का कर रहे विरोध
10 Feb, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
सिडनी। इजराइल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग सोमवार को सिडनी पहुंचे। उनका चार दिन का ऑस्ट्रेलिया दौरा पिछले साल दिसंबर में बॉन्डी बीच पर हुए आतंकी हमले के बाद यहूदी समुदाय के प्रति समर्थन दिखाने के लिए है। हालांकि फिलिस्तीनियों को लेकर इजराइल को लेकर विवाद भी हो रहा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एक बयान में हर्जोग ने कहा कि वह पूरे ऑस्ट्रेलिया में यहूदी समुदायों का दौरा करेंगे ताकि हमले के बाद समुदाय के प्रति एकजुटता व्यक्त कर सकें और उन्हें ताकत दे सकें।
रिपोर्ट के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया के गवर्नर-जनरल और पीएम के निमंत्रण पर आए हर्ज़ोग अपने दौरे में यहूदी समुदाय के नेताओं के साथ कार्यक्रमों में शामिल होंगे। इसके अलावा, उनकी वरिष्ठ राजनेताओं से भी मुलाकात हो सकती है। दूसरी ओर फिलिस्तीनियों को लेकर इजराइल की नीतियों और कार्रवाइयों के विरोध में ऑस्ट्रेलिया में समूहों और आम लोगों ने इस यात्रा का विरोध कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलियाई यहूदियों और लोगों ने एक खुला पत्र लिखकर कहा है कि हर्ज़ोग यहां स्वागत योग्य नहीं हैं।
हर्ज़ोग की जिन शहरों में यात्रा तय है, वहां विरोध प्रदर्शन किए जाने की योजना है। इनमें कैनबरा और मेलबर्न भी शामिल हैं। सिडनी में सोमवार शाम शहर के केंद्र में रैली और मार्च निकाले जाने की तैयारी है। इस दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। न्यू साउथ वेल्स राज्य में हर्ज़ोग की यात्रा के समय 3,000 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात रहेंगे, जिनमें से करीब 500 पुलिसकर्मी केवल प्रस्तावित प्रदर्शन की सुरक्षा में लगाए जाएंगे। बता दें पिछले साल 14 दिसंबर को सिडनी के बॉन्डी बीच पर यहूदी त्योहार के जश्न में गोलीबारी हुई थी। इस हमले में 16 लोगों की मौत हो गई थी।
पुर्तगाल में राष्ट्रपति चुनाव में बच्चों ने भी किया मतदान, यह दुनिया में पहला प्रयोग
10 Feb, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लिस्बन। पुर्तगाल में रविवार को हुए राष्ट्रपति चुनाव में मतदान केंद्रों पर एक दिलचस्प नजारा देखने को मिला। अपने माता-पिता के साथ एक मतदान केंद्र पर पहुंचे बच्चों को भी मतदान करने का मौका दिया गया। हालांकि उनके मतपत्रों पर असली उम्मीदवारों के नाम नहीं थे। बच्चों के लिए बनाए गए खास मतपत्रों पर सुपर मारियो और रोब्लॉक्स जैसे लोकप्रिय काल्पनिक किरदारों के नाम थे। अभिभावकों ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इस कवायद से बच्चों को लोकतंत्र के बारे में सीखने का मौका मिलेगा। राजधानी लिस्बन के एक मतदान केंद्र ने बच्चों के लिए यह अनोखी पहल की, ताकि लोकतंत्र का पहला पाठ किताबों से नहीं बल्कि अनुभव से सिखाया जा सके।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कि पुर्तगाल में चुनाव के दौरान पहली बार ऐसा प्रयोग किया गया और दुनिया के किसी अन्य देश में अभी ऐसा नहीं किया गया है। बच्चों के लिए बनाए गए मतपत्र पर लिखा था, अपने पसंदीदा किरदार को वोट दीजिए। आठ साल के एक बच्चे की मां ने इसे अपने बेटे के लिए सीखने का अच्छा अनुभव बताया। उन्होंने कहा कि वह हमेशा उसे साथ लाती हैं ताकि उसे प्रोत्साहन मिले। वह चाहती हैं कि जब वह 18 साल का हो, तो घर पर सोफे पर बैठा न रहे बल्कि वोट डालने जरूर जाए। यह मजेदार है क्योंकि इस तरह उसे भी लगता है कि वह मतदान कर रहा है और नागरिक के तौर पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है।
भारत-जापान के संबंध वैश्विक शांति और समृद्धि को आगे बढ़ाने पर दिया जोर
10 Feb, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
टोक्यो। जापान की सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) ने रविवार को आम चुनाव में प्रतिनिधि सभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया है, जिससे पीएम सनाए ताकाइची को अपनी रूढ़िवादी नीतियों को आगे बढ़ाने का जनादेश मिल गया है। 465 सदस्यीय निचले सदन में 310 सीटों के दो-तिहाई बहुमत को पार करने से एलडीपी को संवैधानिक संशोधन करने और ऊपरी सदन द्वारा अस्वीकृत किए जाने पर भी विधेयक पारित करने की अनुमति मिल गई है, जहां सत्तारूढ़ गठबंधन अल्पमत में है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एलडीपी युद्धोत्तर जापान में इतना बहुमत हासिल करने वाली पहली पार्टी है। इस शानदार जीत से पार्टी की चुनाव-पूर्व 198 सीटों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है और इसका श्रेय ताकाइची की व्यक्तिगत लोकप्रियता को दिया जा रहा है। एलडीपी और उसके गठबंधन सहयोगी, जापान इनोवेशन पार्टी (जेआईपी), मिलकर सदन में एक मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएंगे, जिससे अक्टूबर में पदभार संभालने के बाद ताकाइची की स्थिति और मजबूत होगी। रिपोर्ट के मुताबिक जीत की घोषणा के बाद एक टेलीविजन कार्यक्रम में ताकाइची ने कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादों को लगातार पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करना हमारी बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वह मौजूदा मंत्रिमंडल को काफी हद तक बरकरार रखेंगी, जिसे चार महीने से भी कम समय पहले गठित होने के बाद से जनता का अपेक्षाकृत मजबूत समर्थन हासिल है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पीएम नरेंद्र मोदी ने जापान की पीएम सनाए ताकाइची को चुनाव में संभावित ऐतिहासिक जीत पर हार्दिक बधाई दी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत-जापान के संबंध वैश्विक शांति, स्थिरता और साझा समृद्धि को आगे बढ़ाने के लिए अत्यंत अहम हैं, और यह मजबूत विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी के जरिए से संभव हो पाता है। एक्स पर एक पोस्ट में पीएम मोदी ने कहा कि हमारी विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी वैश्विक शांति, स्थिरता और समृद्धि को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मुझे विश्वास है कि आपके सक्षम नेतृत्व में हम भारत-जापान की मित्रता को और ऊंचाइयों पर ले जाएंगे।
अमेरिका से नहीं डरा ईरान कहा- हम किसी भी देश के दबाव में आने वाले नहीं
9 Feb, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तेहरान। ओमान में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच हुई हालिया बातचीत ने वैश्विक कूटनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। हालांकि इस मुलाकात को एक अच्छी शुरुआत माना जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दोनों देशों के बीच मतभेदों की खाई कम होने के बजाय और गहरी होती दिख रही है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। तेहरान ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि वह केवल परमाणु मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है और मिसाइल कार्यक्रम या क्षेत्रीय गुटों के समर्थन जैसे विषयों को बातचीत की मेज से पूरी तरह बाहर रखता है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कड़े लहजे में कहा कि यूरेनियम संवर्धन ईरान का अविभाज्य अधिकार है और यह प्रक्रिया किसी भी कीमत पर नहीं रुकेगी। उन्होंने अमेरिका को सीधी चेतावनी देते हुए कहा कि यदि ईरानी धरती पर किसी भी तरह का हमला हुआ, तो मध्य पूर्व में मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य ठिकाने ईरान की मिसाइलों के निशाने पर होंगे। अराघची ने ओमान वार्ता को सकारात्मक बताते हुए अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से शिष्टाचार भेंट की बात तो स्वीकार की, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा कि भरोसे की बहाली के लिए अभी एक बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है। ईरान का मानना है कि समाधान केवल सम्मानजनक बातचीत से ही निकल सकता है, प्रतिबंधों या धमकियों से नहीं। दूसरी ओर, अमेरिका ने इस मामले में डबल गेम की नीति अपनाई है। एक तरफ जहां बातचीत को सफल बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया कार्यकारी आदेश जारी कर ईरान पर आर्थिक शिकंजा और कस दिया है। इस आदेश के तहत ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर भारी टैरिफ और ईरान के तेल निर्यात में शामिल दर्जनों जहाजों व कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए गए हैं। ट्रंप प्रशासन की ताकत के दम पर शांति की नीति के तहत अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर ने हाल ही में अरब सागर में तैनात विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन का दौरा कर अपनी सैन्य तैयारियों का प्रदर्शन भी किया। इस कूटनीतिक रस्साकशी के बीच इजरायल की चिंताएं चरम पर हैं। इजरायल चाहता है कि अमेरिका केवल परमाणु कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल नेटवर्क और हिजबुल्लाह व हमास जैसे गुटों को मिलने वाली मदद पर भी कड़ा रुख अपनाए। ईरान द्वारा इन मुद्दों पर बात करने से इनकार करने के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अपनी निर्धारित वाशिंगटन यात्रा को समय से पहले करने का निर्णय लिया है। नेतन्याहू अगले हफ्ते राष्ट्रपति ट्रंप से मुलाकात करेंगे, जहां उनके साथ इजरायली वायु सेना के भावी प्रमुख ब्रिगेडियर जनरल ओमर टिशलर भी होंगे। यह संकेत देता है कि इजरायल अब ईरान के खिलाफ किसी बड़े सैन्य विकल्प या अत्यंत कठोर प्रतिबंधों के लिए अमेरिका पर दबाव बना सकता है। फिलहाल, तेहरान की सड़कों पर आम लोगों के बीच इस बातचीत को लेकर बहुत अधिक उत्साह नहीं है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि जब तक दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े रहेंगे, तब तक किसी ठोस नतीजे पर पहुँचना नामुमकिन है। एक तरफ परमाणु संवर्धन की जिद और दूसरी तरफ प्रतिबंधों का पहाड़—इन दोनों के बीच मध्य पूर्व का भविष्य एक बार फिर अनिश्चितता और युद्ध के बादलों के बीच घिरा नजर आ रहा है।
इधर शांति की बातें होतीं रहीं उधर 400 ड्रोन्स और मिसाइलों ने यूक्रेन में मचा दी तबाही
9 Feb, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
कीव। रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। एक तरफ जहाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति बहाली के लिए उच्च स्तरीय बैठकें हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ यूक्रेन की धरती पर आसमान से तबाही बरस रही है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने दावा किया है कि शांति समझौतों पर चल रही चर्चाओं के बीच रूस ने पिछले 24 घंटों में 400 से ज्यादा मौत के दूतों (ड्रोन्स और मिसाइलों) के जरिए उनके देश के ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाया है। जेलेंस्की का आरोप है कि रूस भीषण ठंड को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर यूक्रेन को घुटने टेकने पर मजबूर करना चाहता है।
यूक्रेनी राष्ट्रपति के अनुसार, रूस ने अब तक का सबसे बड़ा हवाई हमला करते हुए देश के पावर ग्रिड और बिजली वितरण केंद्रों को छलनी कर दिया है। इस हमले में 400 से अधिक आत्मघाती ड्रोन्स और 40 घातक मिसाइलों का उपयोग किया गया। मास्को के इस हमले ने वोलिन, लविव, रिव्ने और विन्नित्सिया जैसे प्रमुख क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई है। रिव्ने में तो एक रिहायशी इमारत को भी निशाना बनाया गया, जिससे आम नागरिकों में दहशत का माहौल है। जेलेंस्की ने सोशल मीडिया पर क्षतिग्रस्त बिजली केंद्रों की तस्वीरें साझा करते हुए कहा कि मास्को ने कूटनीति के बजाय विनाश का रास्ता चुना है और अब दुनिया को मास्को से ठंड को हथियार बनाने की ताकत छीननी होगी।
इस भीषण तनाव के बीच एक बड़ी कूटनीतिक खबर यह आई है कि अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस युद्ध को समाप्त करने के लिए जून 2026 की समय-सीमा (डेडलाइन) तय कर दी है। ट्रंप प्रशासन का लक्ष्य है कि इससे पहले दोनों पक्षों के बीच एक ठोस समझौता हो जाए। हाल ही में 4 और 5 फरवरी को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में अमेरिका की मध्यस्थता में एक त्रिपक्षीय बैठक हुई थी। हालांकि क्षेत्रीय विवादों और युद्धविराम पर कोई अंतिम सहमति नहीं बन सकी, लेकिन मानवीय आधार पर एक बड़ी सफलता मिली। लगभग पांच महीनों के अंतराल के बाद दोनों पक्षों ने 314 कैदियों (प्रत्येक पक्ष से 157) की अदला-बदली की है। शांति की इन कोशिशों के बावजूद जमीन पर हालात पेचीदा बने हुए हैं। रूस अभी भी डोनबास क्षेत्र से यूक्रेन की सेना की पूर्ण वापसी की मांग पर अड़ा है, जिसे कीव ने स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। अब सबकी नजरें अगले चार महीनों के बाद अमेरिका के मियामी में होने वाली त्रिपक्षीय वार्ता पर टिकी हैं। अमेरिका पहली बार अपनी धरती पर इस स्तर की बैठक की मेजबानी करेगा। यह बैठक तय करेगी कि क्या जून 2026 की डेडलाइन हकीकत में बदल पाएगी या यह विनाशकारी युद्ध अपने पांचवें साल में प्रवेश करेगा। फिलहाल, यूक्रेन के नागरिक अंधेरे और कड़कड़ाती ठंड के बीच अगले हवाई हमले के डर में जीने को मजबूर हैं।
उत्तर कोरिया में देख लिया दक्षिण कोरियाई टीवी शो........फांसी की सजा तय
9 Feb, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
प्योंगयान । उत्तर कोरिया में लोगों को जानी दुश्मन देश दक्षिण कोरियाई के टीवी शो देखने या के-पॉप सुनने पर फांसी की सजा दी जा रही है और उन्हें लेबर कैंप में भेजा जा रहा है। इसमें स्कूल के बच्चे भी शामिल हैं। यह जानकारी एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में दी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर कोरिया से भागकर आए लोगों ने बताया कि क्रैश लैंडिंग ऑन यू, डिसेंडेंट्स ऑफ द सन और स्क्विड गेम जैसे लोकप्रिय दक्षिण कोरियाई ड्रामा देखने या के-पॉप सुनने पर मौत तक की सजा हो सकती है। जिन लोगों के पास पैसा या अच्छे संपर्क नहीं होते, उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान होता है।
तानाशाह के देश से भागकर आए लोगों ने बताया कि देश में डर का माहौल है और दक्षिण कोरियाई संस्कृति को बड़ा अपराध माना जाता है। वहीं अमीर लोग कई बार अधिकारियों को रिश्वत देकर सजा से बच जाते हैं। लेकिन गरीबों के पास पैसा नहीं होने के कारण उन्हें सजा भुगतनी पड़ती है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की डिप्टी रीजनल डायरेक्टर सारा ब्रूक्स ने कहा कि उ.कोरिया इसतरह कानून लागू कर रहा है जिसमें एक टीवी शो देखना भी आपके लिए जानलेवा हो सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार जानकारी तक पहुंच को अपराध बना रही है और अधिकारी इसका फायदा उठा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तर कोरियाई सरकार के डर की वजह से पूरा देश एक तरह के वैचारिक कैदखाने में बंद है। जो लोग बाहरी दुनिया के बारे में जानना चाहते हैं या सिर्फ मनोरंजन करना चाहते हैं, उन्हें सबसे कठोर सजा दी जाती है। यह व्यवस्था डर और भ्रष्टाचार पर आधारित है और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का उल्लंघन करती है।
अमेरिकी कांग्रेस सदस्य गिल ने डलास मॉल की पाकिस्तान से की तुलना, छिड़ी बहस
9 Feb, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी से ताल्लुक रखने वाले अमेरिकी कांग्रेस सदस्य ब्रैंडन गिल ने कहा कि वहां के स्थानीय मॉल में जाने पर ऐसा महसूस होता है जैसे आप पाकिस्तान में हों, डलास में नहीं। इस बयान के बाद बहस छिड़ गई। कई यूजर्स ने उनकी टिप्पणियों को उनकी भारतीय मूल की पत्नी डेनियल डीसूजा गिल से जोड़कर देखा।
ब्रैंडन गिल ने इंटरव्यू में डलास की सांस्कृतिक पहचान बदलने पर चिंता जताई। गिल ने दावा किया कि उनका निर्वाचन क्षेत्र डलास मॉल की पाकिस्तान से तुलना की। उन्होंने आरोप लगाया कि उन जमीनों के पास मस्जिदें बनाई जा रही हैं जो दशकों से स्थानीय परिवारों के पास रही हैं। उन्होंने पोस्ट किया कि बड़े पैमाने पर इस्लामी प्रवासन उस अमेरिका को खत्म कर रहा है जिसे वे जानते और प्यार करते हैं।
ब्रैंडन गिल की पत्नी डेनियल डीसूजा गिल मशहूर भारतीय-अमेरिकी लेखक और ट्रंप के सहयोगी दिनेश डीसूजा की बेटी हैं। गिल के पाकिस्तान वाले बयान पर सोशल मीडिया यूजर्स ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कई यूजर्स ने लिखा कि गिल केवल अपनी भारतीय मूल की पत्नी को खुश करने के लिए पाकिस्तान का नाम ले रहे हैं। एक यूजर ने तंज कसते हुए लिखा- गिल साहब नई दिल्ली में रहने के इतने आदी हो गए हैं कि अब पाकिस्तान से नफरत करना उनके स्वभाव में आ गया है।
यह पहली बार नहीं है जब यह दंपत्ति चर्चा में है। कुछ समय पहले न्यूयॉर्क के नवनिर्वाचित मेयर जोहरान ममदानी के साथ उनका विवाद हुआ था। ब्रैंडन गिल ने ममदानी का हाथ से चावल खाते हुए एक वीडियो साझा कर उन्हें असभ्य कहा था और उन्हें तीसरी दुनिया में वापस जाने की सलाह दी थी। डेनियल डीसूजा गिल ने अपने पति का बचाव करते हुए कहा था कि वह अमेरिका में पली-बढ़ी हैं और हमेशा फोर्क का इस्तेमाल करती हैं। जब लोगों ने उन्हें उनकी भारतीय जड़ों की याद दिलाई, तो उन्होंने खुद को क्रिश्चियन मागा देशभक्त बताते हुए कहा कि उनके ईसाई रिश्तेदार भी हाथ से खाना नहीं खाते।
ब्रैंडन गिल टेक्सास के 26वें कांग्रेस जिले का प्रतिनिधित्व करते हैं। 2024 में निर्वाचित होने के बाद से वे अपने सख्त आव्रजन विरोधी रुख और शरिया मुक्त अमेरिका जैसे अभियानों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने हाल ही में सोमालिया से आने वाले प्रवासियों पर 25 साल के प्रतिबंध का बिल भी पेश किया था।
इमरान और उनकी पत्नी बुशरा बीबी को 17-17 साल की लंबी सजा
9 Feb, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इस्लामाबाद। पाकिस्तान की राजनीति से बड़ी खबर आ रही है जहाँ पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान और उनकी पत्नी बुशरा बीबी की परेशानी बढ़ गई हैं। तोशाखाना-2 भ्रष्टाचार मामले में अदालत ने दोनों को 17-17 साल की लंबी सजा सुनाई है।
रावलपिंडी की अदियाला जेल में बनी स्पेशल कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। जज ने दोनों को अलग-अलग धाराओं में कुल 17 साल की सजा दी है। साथ ही, उन पर 1 करोड़ 64 लाख पाकिस्तानी रुपये का भारी जुर्माना लगा दिया है। हालांकि, बुशरा बीबी के महिला होने के नाते सजा में थोड़ी नरमी की बात कही जा रही है, लेकिन सजा फिर भी काफी सख्त है।
दरअसल पूरा मामला 2021 का है, जब सऊदी अरब की सरकार ने इमरान को कुछ महंगे तोहफे दिए थे। इसमें कीमती घड़ियाँ, हीरे और सोने के गहने शामिल थे। नियम कहता है कि सरकारी पद पर रहते हुए विदेशी नेताओं से जो भी गिफ्ट मिलते हैं, उन्हें तोशाखाना (सरकारी खजाने) में जमा करना पड़ता है। आप चाहें, तब तय कीमत चुकाकर उन्हें बाद में खरीद भी सकते हैं। अब मामले में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान और उनकी पत्नी बुशरा बीबी पर आरोप यह है कि इन तोहफों की असली कीमत करीब 7 करोड़ रुपये थी, लेकिन कागजों पर इन्हें सिर्फ 58-59 लाख का दिखाया गया। कहा जा रहा है कि इन दोनों ने मिलकर बहुत कम कीमत पर ये कीमती चीजें हथियाने की कोशिश की।
अदालत में 21 गवाहों ने अपनी बात रखी। फैसले के वक्त इमरान और बुशरा दोनों वहां मौजूद थे। इमरान का साफ कहना है कि ये सब उनके खिलाफ एक राजनीतिक साजिश है और उन्हें फंसाया जा रहा है। इमरान खान अगस्त 2023 से ही सलाखों के पीछे हैं। हालांकि उन्हें कुछ मामलों में पहले जमानत मिल चुकी थी, लेकिन अब इस नए फैसले ने उन्हें फिर से मुश्किल में डाल दिया है।
अपनी शर्तों पर अमेरिका से बात करने वाला ईरान झुकने को तैयार नहीं, खामनेई तय करेंगे सब कुछ
8 Feb, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
मस्कट। मिडिल ईस्ट में जारी भीषण सैन्य तनाव और महीनों की तल्खी के बीच कूटनीति की एक नई किरण दिखाई दी है। ओमान की राजधानी मस्कट में शुक्रवार को अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच एक महत्वपूर्ण लेकिन अप्रत्यक्ष वार्ता संपन्न हुई। यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब पिछले साल अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमलों के बाद पूरा क्षेत्र युद्ध के मुहाने पर खड़ा था। इस वार्ता में ओमान के विदेश मंत्री बद्र अलबुसैदी ने संदेशवाहक की भूमिका निभाई, क्योंकि दोनों देशों के प्रतिनिधि एक मेज पर आमने-सामने नहीं बैठे। हालांकि, इस बातचीत के तुरंत बाद अमेरिका द्वारा नए प्रतिबंध लगाने के फैसले ने इस सकारात्मक शुरुआत पर अनिश्चितता के बादल भी मंडरा दिए हैं।
इस उच्च स्तरीय बैठक में ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अराघची शामिल हुए, जबकि अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर ने किया। ओमान द्वारा जारी आधिकारिक तस्वीरों में अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर की मौजूदगी ने दुनिया का ध्यान खींचा, जिससे संकेत मिलता है कि बातचीत में सुरक्षा और सैन्य सुरक्षा के पहलुओं पर भी चर्चा हुई है। गौरतलब है कि इस वार्ता से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि यदि ईरान परमाणु समझौते और मानवाधिकारों के मुद्दे पर कड़ा रुख नहीं अपनाता, तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला है। वहीं, ईरानी विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि उनका देश खुली आंखों से कूटनीति कर रहा है और अतीत की सैन्य घटनाओं को भूला नहीं है।
ईरान ने ओमान के माध्यम से अमेरिका को एक प्रस्ताव सौंपा है, जिसे वर्तमान संकट को टालने की एक कोशिश माना जा रहा है। ईरान का रुख इस वार्ता में काफी सख्त और स्पष्ट रहा; उसने साफ कर दिया कि वह केवल अपने परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा करने को तैयार है। ईरान ने अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और घरेलू राजनीति जैसे मुद्दों को बातचीत के एजेंडे से बाहर रखने की शर्त रखी है। इसके विपरीत, वाशिंगटन चाहता है कि एक व्यापक समझौता हो जिसमें ईरान की मिसाइल तकनीक और मानवाधिकारों का मुद्दा भी शामिल हो। इस कूटनीतिक कवायद का सबसे विवादास्पद पहलू वार्ता के तुरंत बाद अमेरिका द्वारा लगाए गए नए प्रतिबंध रहे। अमेरिका ने ईरानी तेल का परिवहन करने वाले 14 जहाजों और कई संबंधित कंपनियों को काली सूची में डाल दिया है। व्हाइट हाउस का आरोप है कि ईरान तेल निर्यात से प्राप्त धन का उपयोग अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता फैलाने और अपने नागरिकों के दमन के लिए करता है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति ट्रंप ने एक नए कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत उन देशों पर भारी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी गई है जो ईरान के साथ व्यापार जारी रखेंगे। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि बातचीत और प्रतिबंध की यह दोहरी नीति ईरान पर अधिकतम दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है, लेकिन यह देखना शेष है कि क्या ईरान इन शर्तों के साथ अगली बैठक में शामिल होगा।
अफगानिस्तान गया था हमलावर, नमाजियों को मारने वाले धर्म और देश के दुश्मन
8 Feb, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
इस्लामाबाद। पाकिस्तान की शहबाज सरकार ने शुक्रवार को हुए इस्लामाबाद में आत्मघाती हमले का सख्ती से जवाब देने की बात कही है। पाकिस्तान ने इस हमले के लिए अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को जिम्मेदार बताया है। शुक्रवार को इस्लामाबाद की एक शिया मस्जिद में आत्मघाती हमलावर ने खुद को उड़ा लिया था। इस हमले में कम से कम 31 लोग मारे गए थे और करीब 169 लोग घायल हुए हैं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि शहबाज सरकार इस हमले का सख्ती से जवाब देगी।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रक्षामंत्री आसिफ ने हमले के लिए अफगान तालिबान को निशाने पर लिया और कहा कि हमले में शामिल आतंकवादी पहले अफगानिस्तान गया था। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर आसिफ ने लिखा, यह साबित हो गया है कि हमले में शामिल आतंकवादी ने अफगानिस्तान की यात्रा की थी। आसिफ ने कहा कि मस्जिद में नमाजियों को मारने वाले धर्म और देश के दुश्मन थे। उन्होंने बताया कि सुरक्षाबलों ने हमलावर का सामना किया, जिसके बाद उसने नमाजियों की आखिरि लाइन में खुद को उड़ा लिया।
आसिफ ने बिना किसी सबूत के भारत का नाम भी इस आत्मघाती हमले से जोड़ने की कोशिश की और कहा कि भारत और अफगनिस्तान के बीच मिलीभगत का पर्दाफाश हो रहा है। इसके साथ ही आसिफ ने अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के साथ किसी भी बातचीत से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अफगानिस्तान के अंदर आतंकवादी कैंपों को खत्म करना होगा और सरकार इस हमले का पूरी ताकत से जवाब देगी। धमाके की भारत ने निंदा की है और लोगों की मौत पर दुख जताया है। भारत ने ख्वाजा आसिफ के दुष्प्रचार को भी खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पाकिस्तान अपने सामाजिक ताने-बाने को परेशान करने वाली समस्याओं को गंभीरता से सुलझाने के बजाय अपनी घरेलू बुराइयों के लिए दूसरों को दोष देकर खुद को धोखा दे रहा है। भारत ऐसे किसी भी आरोप को खारिज करता है जो जितना आधारहीन है, उतना ही बेकार भी है।
पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तान में हो रही घटनाओं को देखने से पता चलता है कि शहबाज सरकार और देश का सैन्य नेतृत्व अपनी हर नाकामी का ठीकरा भारत पर फोड़ने की कोशिश करता रहा है। इस्लामाबाद जिस तालिबान को देश में हमलों के लिए जिम्मेदार मानता है, वह कभी पाकिस्तानी सेना के बड़े चेहते हुआ करते थे। अमेरिका से युद्ध के दौरान तालिबान नेताओं को पाकिस्तान में सुरक्षित पनाहगाह मिली थी। जब अगस्त 2021 में तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता में वापसी की तो तत्कालीन आईएसआई चीफ की काबुल में चाय पीते तस्वीर दुनियाभर में वायरल हुई थी।
बांग्लादेश में चुनाव से पहले पुलिस और प्रदर्शनकारियों में हिंसक झड़पें, दर्जनों घायल
8 Feb, 2026 10:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ढाका। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में पुलिस और प्रदर्शनकारियों में हिंसक झड़पें हुईं, जिसमें करीब 40-50 लोग घायल हुए हैं। शुक्रवार को हजारों प्रदर्शनकारियों ने मोहम्मद यूनुस के सरकारी आवास पर धावा बोलने की कोशिश की। बांग्लादेश में आम चुनाव के ठीक छह दिन पहले अशांति में इजाफा हुआ है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि इंकलाब मंच ने छात्र नेता उस्मान शरीफ हादी के लिए न्याय की मांग को लेकर प्रदर्शन किया गया था।
बता दें हादी को 12 दिसम्बर 2025 को ढाका के पलटन इलाके में गोली मार दी गई थी, जब वह चुनाव प्रचार कर रहे थे। तीन दिन बाद हादी को एयरलिफ्ट करके सिंगापुर ले जाया गया था, लेकिन उनकी मौत हो गई। हादी की मौत के बाद बांग्लादेश में हिंसक घटनाओं की एक शृंखला शुरू हो गई थी। हादी के लिए न्याय की मांग को लेकर इंकलाब मंच ने शुक्रवार को शाहबाग चौराहे पर प्रदर्शन आयोजित किया था। प्रदर्शनकारी संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में हत्या की जांच की मांग कर रहे थे। जब प्रदर्शनकारियों ने मोहम्मद यूनुस के सरकारी आवास जमुना की तरफ बढ़ने की कोशिश की जिसे पुलिस ने रोक दिया। अधिकारियों ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठी चार्ज, वॉटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। यह टकराव 12 फरवरी को होने वाले चुनाव से ठीक एक सप्ताह पहले हुआ है। ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट से पता चलता है कि इन झड़पों के बाद करीब 50 लोगों को अस्पताल ले जाया गया।
विरोध प्रदर्शनों पर सुरक्षाबलों की कार्रवाई के बाद अंतरिम सरकार ने एक बयान जारी किया और हादी की हत्या के मामले में न्याय सुनिश्चित करने का वादा दोहराया। यूनुस के प्रेस सेक्रेटरी शफीकुल आलम ने कहा कि सरकार हादी की हत्या की जांच के लिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय से जिम्मा लेने को कहेगी। उन्होंने कहा कि विरोध मार्च के दौरान सुरक्षा कर्मियों ने एक भी गोली नहीं चलाई। बयान में कहा गया है कि स्थिति तब बिगड़ी जब प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बैरिकेड तोड़कर जमुना की तरफ बढ़ने की कोशिश की। प्रदर्शनकारी वॉटर कैनन पर चढ़ गए, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियों को स्थिति को नियंत्रण में लेने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा।
ब्रिटेन की अदालत ने नीरव मोदी की याचिका खारिज की, बैंक ऑफ इंडिया का मुकदमा तय समय पर चलेगा
8 Feb, 2026 09:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लंदन। लंदन हाईकोर्ट ने हीरा कारोबारी नीरव मोदी को बड़ा झटका देते हुए बैंक ऑफ इंडिया (बीओआई) के बकाया ऋण से जुड़े मुकदमें को स्थगित करने की उसकी याचिका खारिज कर दी है। भगोड़े नीरव मोदी ने दृष्टिहीनता, अवसाद और जेल की परिस्थितियों का हवाला देते हुए सुनवाई टालने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया।
यहां बताते चलें कि 54 वर्षीय नीरव मोदी पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) से जुड़े करीब दो अरब अमेरिकी डॉलर के धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में भारत प्रत्यर्पण का सामना कर रहा है। वह उत्तरी लंदन की एचएमपी पेंटनविले जेल में बंद है और बैंक ऑफ इंडिया के लगभग 80 करोड़ अमेरिकी डॉलर के अलग मामले में वीडियो लिंक के जरिए मुकदमा-पूर्व समीक्षा के लिए पेश हुआ। मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस साइमन टिंकलर ने कहा कि नीरव मोदी को मुकदमे में किसी तरह की “महत्वपूर्ण क्षति” नहीं होगी और 23 मार्च से शुरू होने वाले आठ दिवसीय ट्रायल में उसे समान अवसर मिलेंगे। अदालत ने टिप्पणी की कि यह याचिका देरी की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है।
नीरव मोदी की ओर से बैरिस्टर जेम्स किनमैन ने दलील दी कि दक्षिण लंदन की एचएमपी थेम्साइड जेल से स्थानांतरण के बाद उसे कानूनी दस्तावेजों तक पर्याप्त पहुंच नहीं मिल पाई। उन्होंने बताया कि मोदी अपनी आंखों की 60 प्रतिशत रोशनी खो चुका है और नैदानिक अवसाद से पीड़ित है। हालांकि बैंक ऑफ इंडिया के बैरिस्टर टॉम बेस्ली ने अंतिम समय में दायर याचिका का विरोध किया।
नीरव 2019 से हैं ब्रिटेन की जेल में बंद
नीरव मोदी मार्च 2019 से ब्रिटेन की जेल में बंद है। भारत में उसके खिलाफ सीबीआई और ईडी की ओर से धोखाधड़ी, मनी लॉन्ड्रिंग और साक्ष्य से छेड़छाड़ के तीन मामले चल रहे हैं। अप्रैल 2021 में ब्रिटेन की तत्कालीन गृह मंत्री प्रीति पटेल ने उसके प्रत्यर्पण का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ उसकी कई अपीलें अब तक खारिज हो चुकी हैं।
शेख हसीना के करीबी नेता सेन की हिरासत में मौत, कस्टोडियल डेथ पर उठे सवाल
8 Feb, 2026 08:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
ढाका। बांग्लादेश की राजनीति में एक बार फिर उबाल आ गया है। अवामी लीग के वरिष्ठ नेता, हिंदू समुदाय के प्रमुख चेहरे और पूर्व जल संसाधन मंत्री रमेश चंद्र सेन की शनिवार को हिरासत में मौत हो गई। 85 वर्षीय सेन लंबे समय से बीमार चल रहे थे और दीनाजपुर जिला जेल में बंद थे। शनिवार सुबह उन्हें जेल से दीनाजपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल के इमरजेंसी विभाग लाया गया, जहां कुछ ही मिनटों बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
जेल प्रशासन के अनुसार, रमेश चंद्र सेन को सुबह करीब 9:10 बजे अस्पताल लाया गया था और 9:29 बजे डॉक्टरों ने उनकी मृत्यु की पुष्टि की। हालांकि, उनकी मौत के बाद कस्टोडियल डेथ को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विपक्षी दलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे सिर्फ बीमारी से हुई मौत मानने से इनकार किया है।
गौरतलब है कि रमेश चंद्र सेन बांग्लादेश की राजनीति में एक प्रभावशाली नाम थे। वे पांच बार सांसद चुने गए और शेख हसीना सरकार में जल संसाधन मंत्री रह चुके थे। उन्होंने 2024 के आखिरी आम चुनाव में भी जीत दर्ज की थी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शेख हसीना सरकार के पतन के बाद अवामी लीग नेताओं के खिलाफ जिस तरह से मामले दर्ज किए गए, उनमें राजनीतिक बदले की भावना साफ नजर आती है। सेन के खिलाफ भी हाल के महीनों में हत्या समेत तीन मामले दर्ज किए गए थे, जिन्हें कई विश्लेषक “घोस्ट केस” करार दे रहे हैं।
सूत्रों का दावा है कि हिरासत के दौरान रमेश चंद्र सेन को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं दी गई। अगस्त 2024 में उनकी गिरफ्तारी के समय सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें वायरल हुई थीं, जिनमें उनके हाथ रस्सियों से बंधे हुए दिखे थे। उस वक्त भी उनकी उम्र और स्वास्थ्य को लेकर सवाल उठे थे। कई अवामी लीग नेता देश छोड़कर चले गए थे, लेकिन सेन अपने घर पर ही रुके रहे। उनका कहना था कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया और उन्हें न्याय व्यवस्था पर भरोसा है।
उनकी मौत के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई यूजर्स ने इसे “प्रिजन मर्डर” और “कस्टोडियल किलिंग” बताया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हिरासत में बीमारी के दौरान मरने वाले अवामी लीग नेताओं की संख्या अब कम से कम पांच हो चुकी है।
रमेश चंद्र सेन का राजनीतिक कद इस बात से भी समझा जा सकता है कि उन्होंने विपक्ष के बड़े नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगिर को चुनाव में हराया था। उनकी मौत ने बांग्लादेश में मानवाधिकार, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिशोध को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है।
ईरान की ये ‘डांसिंग मिसाइल..........जो इजराइल में मचा चुकी तबाही
7 Feb, 2026 12:00 PM IST | GRAMINBHARATTV.IN
तेहरान । एक ओर अमेरिका और ईरान वार्ता की मेज पर आने वाले हैं, लेकिन इससे पहले अमेरिका की ओर से ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को खुली धमकी दी गई है। ट्रंप पहले ही अपने जंगी जहाजों को समंदर में उतार चुके हैं, वहीं अब वे खुली धमकी दे रहे हैं कि ईरान को चिंतित होने की जरूरत है। अमेरिका की ये धमकी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है, इस अमेरिका ने पिछले साल जून में नेस्तानबूत करने का दावा किया था। हालांकि ईरान बार-बार कहता रहा कि उसके परमाणु कार्यक्रम को नुकसान नहीं पहुंचा। हालांकि ईरान के तरकश में भी कई तीर हैं, जिन्हें उसने इस्तेमाल किया तब अमेरिकी एडवांस टेक्नोलॉजी को कड़ी टक्कर मिल सकती है। ऐसा ही एक ईरानी हथियार है, उसकी ‘डांसिंग मिसाइल’, जिसका कहर 12 दिनों के छोटे से युद्ध में इजरायल देख चुका है। इजारयल की राजधानी तेल अवीव पर इस मिसाइल ने घूम-घूमकर हमला किया था।
ईरानी सेजिल मिसाइल का नाम चर्चा में जून, 2025 में आया था, जब इस मिसाइल ने अपना कहर ढाया था। ये मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है, जो सॉलिड फ्यूल से चलती है और इस मिसाइल को तेजी से लांच किया जा सकता है। सेजिल मिसाइल फैमिली की ये दूसरी पीढ़ी की मिसाइल है। जैसा नाम से ही पता चलता है कि अपडेटेड वर्जन और भी ज्यादा ताकतवर और सटीक है। इस मिसाइल की की मारक क्षमता लगभग 2000–2500 किलोमीटर तक है यानि यह ईरान से सीधे इजरायल जैसे देशों को निशाना बना सकती है। इस मिसाइल को इंटरसेप्ट करना बेहद मुश्किल है क्योंकि ये दुश्मन के रेडार सिस्टम को चकमा देने में एक्सपर्ट है।
ईरान की सेजिल-2 एक मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है, जो दो चरणों वाली और ठोस ईंधन पर आधारित है। यह लगभग 700 किलोग्राम तक का वारहेड ले जा सकती है। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) के मुताबिक सेजिल मिसाइल लगभग 18 मीटर लंबी, 1.25 मीटर चौड़ी है और इसका वजन करीब 23600 किलोग्राम तक है।
सेजिल-2 की सबसे बड़ी खासियत इसका ठोस ईंधन होता है। इससे इस मिसाइल को लांच करने की तैयारी बहुत तेजी से हो जाती है, जो पुराने तरल ईंधन वाली शाहाब मिसाइलों की तुलना में इसे और ज्यादा प्रभावी बना देता है। इस मिसाइल का पहला परीक्षण साल 2008 में किया गया था, जिसमें यह करीब 800 किलोमीटर तक गई थी। इसके बाद मई 2009 में दूसरा परीक्षण हुआ, जिसमें इसके मार्गदर्शन और नेविगेशन सिस्टम को परखा गया।
59 फीट लंबी मिसाइल अपने साथ 7 क्विंटल का पेलोड ले जा सकती है, लेकिन वहां जिस तरह से इस्तेमाल करती है, वही इस मिसाइल की खासियत है। डांसिंग मिसाइल इसलिए कहते हैं क्योंकि ये हाइली मैनुवरेबल है। ये सेजिल मिसाइल अपने टार्गेट को हिट करने के लिए न सिर्फ तेजी दिखाती है बल्कि घूम-घूमकर हिट भी करती है।
एप्स्टीन: गलत आदमी से दोस्ती के चक्कर में फंसे ब्रिटेन के पीएम स्टार्मर, अब कुर्सी पर मंडराया संकट
7 Feb, 2026 11:00 AM IST | GRAMINBHARATTV.IN
लंदन। यौन अपराधी जेफ्री एप्स्टीन से जुड़े नए सनसनीखेज खुलासों ने ब्रिटेन के राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। हालांकि प्रधानमंत्री केअर स्टार्मर का एप्स्टीन से कभी कोई सीधा व्यक्तिगत संबंध नहीं रहा, लेकिन अपनी सरकार में एप्स्टीन के करीबी रहे पीटर मैंडलसन की नियुक्ति को लेकर वे अब चौतरफा घिर गए हैं। ताजा दस्तावेजों में मैंडलसन और एप्स्टीन के बीच गहरी दोस्ती की बात सामने आने के बाद स्टार्मर की मध्यमार्गी-वामपंथी सरकार के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं।
यह संकट तब गहराया जब स्टार्मर को एप्स्टीन के अपराधों के पीड़ितों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी। उन्होंने स्वीकार किया कि मैंडलसन ने अपनी दोस्ती को लेकर उनसे लगातार झूठ बोला और वे उस झूठ को पहचान नहीं सके। स्टार्मर ने भावुक अपील करते हुए कहा, मैं उन पीड़ितों से माफी मांगता हूँ जिन्होंने ताकतवर लोगों के हाथों उत्पीड़न सहा। मुझे खेद है कि मैंने मैंडलसन के दावों पर यकीन किया और उन्हें महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया। प्रधानमंत्री की इस माफी को उनकी राजनीतिक कमजोरी और खराब निर्णय क्षमता के रूप में देखा जा रहा है।
विवाद की जड़ में पीटर मैंडलसन की वह नियुक्ति है, जिसे स्टार्मर ने लेबर पार्टी के अंदरूनी विरोध के बावजूद आगे बढ़ाया था। हाल ही में सार्वजनिक हुई एप्स्टीन फाइल्स ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मैंडलसन और एप्स्टीन के बीच संबंध केवल औपचारिक नहीं, बल्कि काफी करीबी थे। इस खुलासे के बाद स्टार्मर ने मैंडलसन को पद से तो हटा दिया है, लेकिन अब पार्टी के भीतर ही उनके खिलाफ बगावत के सुर तेज हो गए हैं। लेबर पार्टी की सांसद पाउला बार्कर ने खुले तौर पर कहा है कि प्रधानमंत्री का निर्णय संदिग्ध था और अब उन्हें जनता के साथ-साथ अपनी पार्टी का विश्वास फिर से जीतने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रकरण स्टार्मर की प्रतिष्ठा के लिए एक मृत्यु दंड जैसा साबित हो सकता है। जानकारों के अनुसार, भले ही सरकार अभी न गिरे, लेकिन स्टार्मर की साख को जो ठेस पहुँची है, उससे उबरना नामुमकिन लग रहा है। प्रोफेसर रॉब फोर्ड जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि उनकी सरकार की उम्र अब महीनों या शायद कुछ ही सालों की बची है। ब्रिटेन के पूर्व राजकुमार एंड्रयू के बाद अब मैंडलसन और स्टार्मर का नाम इस विवाद से जुड़ने के कारण यह मामला केवल एक कूटनीतिक चूक न रहकर एक बड़ा नैतिक संकट बन गया है। आने वाले दिन तय करेंगे कि स्टार्मर अपनी कुर्सी बचा पाते हैं या एप्स्टीन का काला साया उनकी सरकार को निगल जाएगा।
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